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कोरोना से हुई मौत की संख्या बताई थी कम, अब 7000 और जोड़ेंगे: केरल सरकार ने स्वीकारा आँकड़ों में हेरफेर, पर नहीं मानी गलती

कोरोना से हुई मौतों के आँकड़ों में हेरफेर करने का आरोप झेल रही केरल सरकार आखिरकार बैकफुट पर आ गई है। विपक्ष की तीखी आलोचना के बाद राज्य सरकार ने फैसला किया है कि 7000 मृतकों को भी कोरोना से हुई मौतों की सूची में शामिल किया जाएगा। इन आँकड़ों को शामिल करने के बाद राज्य में कोरोना के कारण हुई मौतों की संख्या 33 हजार पहुँच जाएगी। जबकि, यह अभी 26 हजार है। देश में अभी भी केरल में कोरोना के सबसे अधिक मामले हैं।

केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने शुक्रवार (अक्टूबर 8, 2021) को राज्य विधानसभा में और मौतों को शामिल के फैसले की घोषणा करते हुए कहा कि संबंधित रिकॉर्ड की जानकारी न होने के कारण इन मौतों को कोविड -19 मौतों के आधिकारिक आँकड़ों में शामिल नहीं किया गया था। मंत्री ने कहा, “यदि लिस्ट में चूंक के बारे में कोई शिकायतें हैं, तो स्वास्थ्य विभाग उन पर गौर करने के लिए तैयार है।”

जानकारी के मुताबिक, जो 7000 मौतें राज्य की सूची में जोड़ी जाएँगी वह जून के दूसरे सप्ताह तक होंगी। अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार नए आँकड़ों को शामिल करके अंतिम सूची का आंकलन कर रही है। सही आँकड़े जल्द ही पेश किए जाएँगे। उस समय तक, राज्य मेडिकल बोर्ड मौतों की समीक्षा करता था और फाइनल लिस्ट की घोषणा करता था। स्वास्थ्य विशेषज्ञों और विपक्षी दलों ने इसकी आलोचना की थी। बोर्ड ने कथित तौर पर उन मरीजों को लिस्ट में शामिल नहीं किया जिनका संक्रमित होने के बाद कोविड रिजल्ट नेगेटिव आया था और फिर कोरोना वायरस संक्रमण के कारण हुई जटिलताओं के कारण उनकी मृत्यु हो गई। जून के दूसरे सप्ताह से, बोर्ड द्वारा मौतों की समीक्षा करने की प्रक्रिया को रोक दिया गया और अस्पतालों ने सीधे मृत्यु संख्या अपलोड करना शुरू कर दिया।

हालाँकि राज्य सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य में कोविड -19 से हुई मौतों को कम करके रिपोर्ट किया गया, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने विपक्ष के इस आरोप का खंडन किया कि यह जानबूझ कर किया गया था। वीना जॉर्ज ने शुक्रवार को विधानसभा में कहा,“इतने सारे लोगों की मौतों को टैली से बाहर करने का कोई जानबूझ कर प्रयास नहीं किया गया था। हम कोविड -19 मौतों के संबंध में आईसीएमआर के दिशानिर्देशों का पालन कर रहे हैं, लेकिन कुछ तकनीकी गड़बड़ियों के कारण इन मौतों का आँकड़ा छूट गया। हम सूची को फिर से संशोधित करेंगे।”

‘कलबुर्गी दूरदर्शन केंद्र बंद हो रहा है’: फर्जी खबर पर न्यू इंडियन एक्सप्रेस को प्रसार भारती के सीईओ ने लताड़ा

न्यू इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र ने शनिवार (9 अक्टूबर 2021) को दावा किया कि प्रसार भारती 31 अक्टूबर से कर्नाटक के कलबुर्गी दूरदर्शन केंद्र से अपने कार्यक्रमों का प्रसारण बंद कर देगा। समाचार पत्र के वरिष्ठ विशेष संवाददाता रामकृष्ण बडसेशी (Ramkrishna Badseshi) ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है। इसके बाद प्रसार भारती के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने इस खबर को पूरी तरह भ्रामक बताया।

बडसेशी ने ट्वीट में किया, “प्रसार भारती ने 31 अक्टूबर 2021 से कलबुर्गी रीजनल सेंटर से अपने कार्यक्रमों के प्रसारण को बंद करने फैसला किया है।” अपने दावों की पुष्टि के लिए उन्होंने अपने लेख का स्क्रीनशॉट भी इसके साथ साझा किया। ‘दूरदर्शन केंद्र टू स्टॉप ट्रांसमिशन’ शीर्षक वाली अपनी रिपोर्ट में पत्रकार ने शुक्रवार (8 अक्टूबर 2021) को चैनल द्वारा जारी की गई एक प्रेस विज्ञप्ति का हवाला दिया।

उन्होंने लिखा, “प्रसार भारती के महानिदेशालय के निर्णय के अनुसार, चैनल नंबर 07, फ्रीक्वेंसी: 195.25 मेगाहर्ट्ज विजुअल और 189.75 मेगाहर्ट्ज ऑरल पर चलने वाले कलबुर्गी (कर्नाटक राज्य) के हाई-पावर ट्रांसमीटर को 31-10-2021 से बंद कर दिया जाएगा।”

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के लेख का स्क्रीनशॉट

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने आगे कहा, “हालाँकि, इस बारे में कुछ भी उल्लेख नहीं किया गया है कि क्या यहाँ के सेंटर में प्रोग्राम का प्रोडक्शन होगा या मौजूदा भवन को प्रोडक्शन जारी रखने के लिए पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाएगा और प्रसारण बंद होने बाद यहाँ कितने कर्मचारी काम करना जारी रखेंगे।”

पत्रकार रामकृष्ण ने यह भी कहा कि अधिकारियों ने प्रेस विज्ञप्ति की सामग्री की पुष्टि की थी। उन्होंने कलबुर्गी के सांसद डॉ. उमेश जाधव का हवाला दिया कि उन्होंने दूरदर्शन केंद्र को बंद करने के खिलाफ केंद्र सरकार को एक्शन लेने के लिए कहा था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

कलबुर्गी के सांसद, प्रसार भारती के सीईओ ने भ्रामक दावों को खारिज किया

आधे घंटे से भी कम समय में प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस द्वारा किए गए दावों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा, “मीडिया को सभी तथ्यों की पुष्टि करने के बाद ही जिम्मेदार तरीके से खबरों को आगे बढ़ाना चाहिए। दूरदर्शन कलबुर्गी के कंटेंट क्रिएशन में कोई बदलाव नहीं किया गया है। डीडी कलबुर्गी का कंटेंट डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के अलावा डीडी चंदना के दिए गए स्लॉट पर प्रसारित होता रहेगा।”

शशि शेखर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

प्रसार भारती के सीईओ ने आगे प्रेस विज्ञप्ति की गलत व्याख्या के लिए कुछ ‘मीडिया ग्रुप’ को दोषी ठहराया। उन्होंने इस पर स्पष्टीकरण दिया, “यह अप्रचलित (जो चलन में नहीं है) रूफटॉप एंटेना और एनालॉग ट्रांसमीटरों को एक चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिए था। दशकों पहले स्थापित किए गए एनालॉग ट्रांसमीटरों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना एक आवश्यक सुधार है।”

पिछले महीने (23 सितंबर 2021) बीजेपी सांसद डॉ. उमेश जाधव ने दूरदर्शन कलबुर्गी स्टेशन बंद करने की अफवाहों का खंडन किया था। उन्होंने ट्वीट किया था, “मैंने श्री रमाकांत, एडीजी डीडी चंदनबंग से मुलाकात की थी, जहाँ उन्होंने स्पष्ट किया कि कलबुर्गी स्टेशन एनालॉग टेरिटोरियल ट्रांसमीटर को डिजिटल ट्रांसमीटर में बदल रहा है।”

उन्होंने कहा, “रमाकांत ने कहा कि दूरदर्शन ने एनालॉग टेरिटोरियल ट्रांसमीटर (एटीटी) को डिजिटल ट्रांसमीटर में बदलने का फैसला किया है। इसके अलावा, वे चंदना के लिए एजुकेशनल कंटेट तैयार करने के लिए विश्वविद्यालयों के साथ टाईअप कर रहे हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कलबुर्गी में 29 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें से केवल दो का तबादला किया गया है। वर्तमान में, कलबुर्गी दूरदर्शन डीडी चंदना के लिए साप्ताहिक आधे घंटे का कार्यक्रम तैयार कर रहा है।” इसके ​बारे में भाजपा सांसद ने सितंबर में ही सूचित किया था। इसके बावजूद न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने उन्हें यह दावा करने के लिए जिम्मेदार ठहराया कि कर्नाटक का पहला चैनल जल्द ही बंद होने वाला था।

गौरतलब है कि जब दूरदर्शन को संचालित किया गया था, तब इसकी शुरुआत एनालॉग टेरिटोरियल ट्रांसमिशन से हुई थी। सिग्नल के लिए लोगों को एनालॉग एंटेना, जिसे यागी एंटेना भी कहा जाता है, उसे छतों या ऊँचे खंभों पर लगाना होता था। लेकिन अब सैटेलाइट टीवी, डिजिटल केबल टीवी और स्ट्रीमिंग सेवाओं के आने से टेरेस्ट्रियल ट्रांसमिशन का चलन खत्म हो गया है। इसलिए ट्रांसमीटर और अन्य उपकरण टीवी स्टेशनों से हटाए जा रहे हैं।

भाई तारू सिंह की उखाड़ ली गई थी खोपड़ी, 25000 सिखों का नरसंहार: बाबरी से 57 साल पहले लाहौर में ढहा था ‘ढाँचा’

भारत के इतिहास में एक से बढ़ कर एक योद्धा हुए हैं, जिन्होंने धर्म को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया लेकिन इस्लामी आक्रांताओं के सामने झुके नहीं। उन्हीं में से एक नाम भाई तारू सिंह जी का भी है। लाहौर में आज भी ‘गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारू सिंह जी शहीदी स्थान’ उनके बलिदान की याद दिलाता है। हालाँकि, पाकिस्तान सरकार और वहाँ के कट्टरपंथियों की साजिश है कि इस गुरुद्वारे को मस्जिद में बदल दिया जाए।

इसके लिए वो लगातार लगे भी रहते हैं। तारू सिंह के बारे में हम आपको आगे बताएँगे, लेकिन उनके बारे में इतना जा लीजिए कि इस्लाम न कबूल करने पर उनकी खोंपड़ी उखाड़ ली गई थी। उन्होंने अपने बाल कटवाने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद पंजाब के मुगल सरदार जकरिया खान ने उन्हें भीषण प्रताड़ना दी थी। उन्होंने राष्ट्र, सिख धर्म और खालसा पंथ के लिए खुद को बलिदान कर दिया।

जुलाई 2020 में भारत सरकार ने पाकिस्तान की सरकार के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया था कि ‘गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारू सिंह शहीदी स्थान’ को मस्जिद में परिवर्तित करने के प्रयास न किए जाएँ। ये गुरुद्वारा लाहौर के नौलखा बाजार में स्थित है। पंजाब के राजनीतिक दलों व ‘शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी’ ने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई थी। पाकिस्तान के लोग अब भी मानते हैं कि यहाँ जो मस्जिद हुआ करती थी, उसे सिखों ने जबरदस्ती छीन ली।

पटियाला स्थित ‘पंजाब विश्वविद्यालय’ द्वारा प्रकाशित ‘सिख इनसाइक्लोपीडिया’ के अनुसार, अमृतसर स्थित फुला गाँव में तारू सिंह जी का जन्म एक संधु जाट परिवार में हुआ था। वो एक कृषक थे और अपनी कमाई का इस्तेमाल सिख समुदाय के लिए करते थे। सिख समुदाय तब मुगलिया प्रताड़ना के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था, जिसमें वो मदद करते थे। लाहौर के मुगलिया सरदार ज़करिया खान ने उन्हें इस्लाम चुनने को कहा। ऐसा न करने पर उनकी खोपड़ी उखाड़ ली गई।

1 जुलाई, 1745 को मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें मार डाला गया था। जिस जगह पर उन्हें प्रताड़ित कर के उनकी हत्या कर दी गई थी, वही जगह आज ‘गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारू सिंह जी शहीदी स्थान’ के नाम से जाना जाता है। सिख समुदाय के इतिहास के अनुसार, जकरिया खान की मौत भाई तारू सिंह से पहले ही हो गई थी। उसने उनसे माफी भी माँगी थी। साथ ही उनके जूते से खुद को मारा भी था।

इस स्थल को वहाँ के 4 ऐतिहासिक स्थानों में गिना जाता है, जिसमें शहीद गंज मस्जिद (जो अब मौजूद नहीं है), दरबार हजरत शाह काकू चिश्ती (दरगाह) और गुरुद्वारा शहीद गंज सिंह (सिंघानियाँ) शामिल हैं। सिख समुदाय की काफी पहले से ही माँग थी कि यहाँ मस्जिद नहीं होनी चाहिए और अंग्रेजों का शासन आने के बाद उन्होंने अदालत में इसकी लड़ाई भी लड़ी। इस मस्जिद को शाहजहाँ के राज में बनवाया गया था।

सन् 1720 के दशक में अब्दुल्ला खान नाम के बादशाही खानसामे ने इस मस्जिद को बनवाया था। यहाँ मुगलों ने एक चौराहे को हिंदुओं और सिखों की प्रताड़ना का अड्डा बना लिया था, ताकि लोग इसे देख कर डरें। बड़े पैमाने पर यहाँ सिखों का कत्लेआम हुआ, जिन्होंने इस्लाम अपनाने से इनकार कर दिया था। उन्हें सार्वजनिक रूप से मार डाला जाता था। भाई तारू सिंह जी का बलिदान भी यहीं पर हुआ।

1760 का दशक आते-आते सिख यहाँ प्रभावी हो गए और सिखों का शासन भी या गया। ‘भंगी मिसल सिख सेना’ ने इस इलाके से इस्लामी आक्रांताओं को भगाया। कहा जाता है कि इसके बाद यहाँ नमाज पढ़नी भी बंद हो गई थी। इसके बाद यहाँ के गुरुद्वारे को बड़ी जागीर भी मिली। महाराज रणजीत सिंह के काल में सिख और गुरुद्वारे, दोनों काफी फले-फूले। कुछ दिनों बाद यहाँ पर एक दरगाह भी बन गया।

यहाँ से कुछ ही दूरी पर एक गुरुद्वारा पहले से ही स्थित है, जहाँ 18वीं शताब्दी में हुए सिखों के नरसंहार को याद करते हुए बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन, इन सबके बीच मस्जिद का होना सिख समुदाय को काफी खला। 1935 में शहीदी स्थान पर खड़े उस मस्जिद को सिख समुदाय ने ध्वस्त कर दिया। आज भी उस मस्जिद के अवशेष हैं और उनके ध्वस्त गुंबद भी दिखाई देते हैं।

सिखों ने अदालत में मामला अपने हक में जीतने के बाद ही इस मस्जिद को ध्वस्त किया था। कई इतिहासकार कहते हैं कि वहाँ मस्जिद थी, इसका कोई प्रमाण ही नहीं है। लेकिन, मुगल यहीं पर सिख महिलाओं और बच्चों की हत्याएँ करते थे। 1880 के दशक से ही इस स्थान को लेकर सिख और मुस्लिम समुदाय के बीच संघर्ष शुरू हो गया था। 7 जुलाई, 1935 को अंग्रेज अधिकारियों की मौजूदगी में मस्जिद को ध्वस्त किया गया।

जहाँ पर ये गुरुद्वारा स्थित है, वहाँ पर कभी मुगल शहजादा दारा शिकोह भी आया करता था और ये उसका पसंदीदा स्थानों मे से एक था। लाहौर के एक अन्य मुगल सरदार मीर मन्नू ने भी यहाँ सिखों का कत्लेआम किया था। उसे 25,000 सिखों के नरसंहार का जिम्मेदार माना जाता है। हरमंदिर साहिब के मणि सिंह की हत्या भी यहीं हुई थी।औरंगजेब के काल में भी अंतिम सिख गुरु गोविंद सिंह ने मुगलों से कई युद्ध लड़े थे।

कहानी भाई तारू सिंह जी की

एक बार की बात है कि अपने इसी स्वभाव के कारण भाई तारू सिंह जी एक रहीम बख्स नाम के मछुआरे की मदद की। पहले विश्राम की जगह ढूँढते हुए भाई साहिब के पास आए रहीम बख्स को भाई साहिब ने विश्राम करवाया और फिर रात का भोजन। रहीम ने इसी दौरान तारू सिंह से अपना दुख साझा किया और कहा कि पट्टे जिले से कुछ मुगल उनकी बेटी को अगवा कर ले गए है इसलिए वह नजर चुराते घूम रहे है। रहीम ने कहा कि उसने इस बारे में कई लोगों से शिकायत की है। लेकिन कहीं उसकी सुनवाई नहीं हुई।

रहीम बख्स की सारी बातें सुनकर भाई साहिब मुस्कुरा दिए और कहा गुरु के दरबार में तुम्हारी पुकार पहुँच गई है। अब तुम्हें बेटी मिल जाएगी। रहीम के वहाँ से जाने के बाद भाई तारू सिंह ने ये बात सिंखों के गुट को बताई और उस गुट के सभी सिखों ने मिलकर रहीम की बेटी को छुड़वा लिया। रहीम की बेटी की रिहाई पर तारू सिंह बहुत खुश थे। लेकिन लाहौर का गवर्नर जकारिया खान इस खबर को सुनकर भीतर ही भीतर झुलस चुका था।

दरअसल, एक ओर तो वो लोगों को इस्लाम कबूल करवाकर मुस्लिम बनाना चाह रहा था और दूसरी ओर मुस्लिमों को सिखों के एक गुट ने मार दिया। ये बात उसे किसी कीमत पर गँवारा नहीं थी। उसने तारू सिंह को अपने पास गिरफ्तार करके लाने को कहा। बस फिर क्या, मुगल सैनिक पहुँचे तारू सिंह के घर और जकारिया खान का आदेश सुनाया। इसके बाद भाई तारू घबराए नहीं। बल्कि उन्होंने उन लोगों को खाना खाने का आग्रह किया। पहले तो सैनिकों ने मना किया।

लेकिन बाद में वह भी मान गए। सबने भाई तारू के घर भोजन किया और फिर उन्हें गिरफ्तार करके जकारिया खान के पास ले आए। भाई तारू सिंह को कैदी के रूप में देखकर जकारिया खान बहुत खुश हुआ। उसने सिखों की बहादुरी के किस्से सुने ही हुए थे बस उसने अपने चालाक दिमाग में तारू सिंह को इस्लाम कबूल करवाने की युक्तियाँ जुटानी शुरू कर दी। उसका सोचना था कि अगर आज तारू सिंह मान गया तो कल को और सिख भी मानेंगे। मगर अफसोस, उसकी कोई जुगत काम न आई।

ज़कारिया खान ने तारू सिंह से कहा, “तारू सिंह… तुमने जो किया वह माफी के लायक बिलकुल नहीं है, लेकिन मैं तुम्हें एक शर्त पर छोड़ सकता हूँ। तुम इस्लाम कबूल कर लो, हमारे मित्र बन जाओ मैं तुम्हारी सभी गलतियों को नजरअंदाज कर दूँगा।“ मौत के सामने कोई जिंदगी के लिए सौदा कर रहा था। लेकिन तारू सिंह का जवाब बेहद निर्भीक था। वे जकारिया खान की ओर देखकर मुस्कुराए और कहा चाहे जान चली जाए लेकिन वह अपने गुरुओं के साथ गद्दारी कभी नहीं करेंगे। फिर उनका बलिदान हो गया।

महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक का नया दावा- BJP के कहने पर NCB ने 3 को छोड़ा, पहले कहा था- आर्यन खान को भाजपा वालों ने पकड़ा

ड्रग्स केस में फिल्म अभिनेता शाहरुख खान के बेटे आर्यन की गिरफ्तारी के बाद जारी सियासत थमती नहीं दिख रही है। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री और एनसीपी के नेता नवाब मलिक ने एक बार फिर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) पर आरोप लगाए हैं। मलिक ने क्रूज पर छापेमारी को फर्जी करार देते हुए कहा है कि एनसीबी के अधिकारी समीर वानखेड़े और बीजेपी के बीच कुछ डील हुई है। उन्होंने वानखेड़े की कॉल डिटेल्स की जाँच की माँग की है।

मलिक ने दावा किया क्रूज पर रेड के दौरान एनसीबी को आर्यन खान के पास से कुछ भी नहीं मिला था। एनसीपी नेता ने आरोप लगाया है कि आर्यन खान को फँसाने के लिए प्रदीप गाबा और आमिर फर्नीचरवाला उसे वहाँ लेकर गए थे। मलिक का आरोप है कि एनसीबी ने ऋषभ सचदेवा, प्रदीप गाबा और आमिर फर्नीचरवाला को इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि उनके लिए स्थानीय और दिल्ली के बीजेपी नेताओं ने एजेंसी को कॉल किया था।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मलिक ने कहा कि मुंबई तट पर एक क्रूज पर छापेमारी के बाद एनसीबी के समीर वानखेड़े ने कहा था कि 8-10 लोगों को हिरासत में लिया गया है। लेकिन सच्चाई यह है कि 11 लोगों को हिरासत में लिया गया था। बाद में 3 लोगों को रिहा कर दिया। हम एनसीबी से पूछना चाहते हैं कि जब उन्होंने छापे के बाद 11 लोगों को हिरासत में लिया था, तो उन्होंने किसके निर्देश पर 3 लोगों को रिहा किया। हम एनसीबी से सबूतों को सामने रखने की माँग करते हैं। हमें लगता है कि समीर वानखेड़े और बीजेपी के बीच जरूर कुछ डील हुई होगी।

महाराष्ट्र सरकार के मंत्री मलिक ने इस केस की जाँच मुंबई पुलिस एंटी नारकोटिक्स सेल से करवाने की माँग की। उन्होंने कहा, “मैं सीएम को लिखूँगा। यदि आवश्यक हो तो छापे की जाँच के लिए एक जाँच आयोग का गठन किया जाना चाहिए।”

गौरतलब है कि इससे पहले भी मलिक ने इस मामले में एनसीबी पर कीचड़ उछाला था। उन्होंने कहा था कि आखिर कैसे आर्यन खान और अरबाज मर्चेंट जैसे हाईप्रोफाइल लोगों को NCB दफ्तर ले जा सकती है। एनसीपी प्रवक्ता ने दावा किया कि जिन दो लोगों ने आर्यन खान और अरबाज मर्चेंट को पकड़ कर NCB के ऑफिस पहुँचाया, उनमें से एक भाजपा कार्यकर्ता है। जबकि दूसरा एक फ्रॉड है और खुद को प्राइवेट डिटेक्टिव बताता है।

ममता बनर्जी के घर के पास TMC ने ‘मोदी-शाहसुरमर्दिनी’ का लगाया पोस्टर, भाजपा ने कहा- इससे पता चलती है उनकी ‘संस्कृति’

नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में माँ दुर्गा के नाम पर भी राजनीति शुरू हो गई है। इसी क्रम में तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने हरीश मुखर्जी स्ट्रीट पर एक होर्डिंग लगाया है, जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हाथ जोड़कर एक तस्वीर है। इस होर्डिंग में टीएमसी ने उन्हें ‘मोदी-शाहसुरमदिनी’ बताया है। ममता बनर्जी हरीश मुखर्जी स्ट्रीट पर ही रहती हैं।

होर्डिंग में जो कैप्शन है उसका मतलब ‘महिषासुरमर्दिनी’ है, अर्थात ‘राक्षस महिषासुर’ का वध करने वाली। महिषासुर का वध किया करने के कारण ही माँ दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। इस पोस्टर के माध्यम से ममता बनर्जी के समर्थक कहना चाह रहे हैं कि जैसे देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था, वैसे ही उनकी पार्टी की सुप्रीमो ममता बनर्जी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की ‘हत्या’ करेंगे।

रविवार (3 अक्टूबर) को हुई मतगणना के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा भाजपा की अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी प्रियंका टिबरेवाल को 58,832 मतों के अंतर से हराने के बाद संभवत: यह पोस्टर सामने आया है। टीएमसी के लोकसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता महुआ मोइत्रा ने सबसे पहले होर्डिंग की तस्वीर शेयर की।

हालाँकि, तृणमूल कॉन्ग्रेस ने कहा कि पोस्टर ‘अति उत्साही’ समर्थकों द्वारा लगाया गया था न कि पार्टी द्वारा। हालाँकि, पोस्टर को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि होर्डिंग के नीचे दाएँ कोने में ‘वार्ड नं 83 तृणमूल महिला कॉन्ग्रेस’ लिखा हुआ है। इससे स्पष्ट होता है कि यह होर्डिंग टीएमसी की महिला विंग द्वारा लगाई गई थी।

कोलकाता में ममता बनर्जी के आवास के पास लगा होर्डिंग

टीएमसी की इस करतूत पर भाजपा ने उसकी आलोचना करते हुए कहा कि यह होर्डिंग तृणमूल कॉन्ग्रेस के दुस्साहस और उसकी संस्कृति को दर्शाता है।

यह पहली बार नहीं है, जब तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अपनी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित करने की कोशिश की है। 2 सितंबर को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मूर्ति बनाई गई थी, जिसकी देवी दुर्गा की तरह दस भुजाएँ थीं। इस मूर्ति को देवी दुर्गा की मूर्ति के साथ कोलकाता के एक दुर्गा पूजा पंडाल में रखने की बात कही गई थी।

ममता बनर्जी से मिलती-जुलती मूर्ति बनाई जा रही है, जिसकी माँ दुर्गा के समान दस भुजाएँ हैं।

तब टीएमसी पर कटाक्ष करते हुए भाजपा नेता अमित मालवीय ने ट्वीट किया था, “बंगाल चुनाव के बाद जिस तरह से भीषण हिंसा हुई है, उससे ममता बनर्जी के हाथ निर्दोष बंगालियों के खून से रंगे हैं। यह देवी दुर्गा का अपमान है। ममता बनर्जी को इसे रोकना चाहिए। वह बंगाल के हिंदुओं की संवेदनाओं को ठेस पहुँचा रही है।”

सार्वजनिक जगहों से नेताओं की मूर्ति हटाओ, लीडर्स पार्क में लगाओ: मद्रास HC का ऑर्डर

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को 6 महीने के भीतर सार्वजनिक स्थानों और राजमार्गों पर लगाई गईँ मूर्तियों की पहचान करने और उन्हें हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने इसके लिए अलग से लीडर्स पार्क बनाए जाने का निर्देश दिया। जज एसएम सुब्रमण्यम ने कहा कि तब तक के लिए सार्वजनिक स्थानों पर प्रतिमा लगाने की कोई इजाजत नहीं दी जाएगी।

हाईकोर्ट ने अराकोनम के एम वीरराघवन की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया। इस याचिका में वेल्लोर जिले के अराकोनम तालुक के तहसीलदार द्वारा ‘मेइकल पोराम्बोक’ पर लगाई गई अंबेडकर प्रतिमा को हटाने के लिए जारी नोटिस को चुनौती दिया गया था। यह प्रतिमा बिना अनुमति के लगाई गई थी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “पूरे तमिलनाडु में नेताओं की लगी प्रतिमाओं के नाम पर आम लोगों को अक्सर दंगे और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह सुनिश्चित करना सरकार का कर्तव्य है कि राजनीतिक दलों, सांप्रदायिक, धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और अनुभागीय समूहों या अन्य समूहों के इस तरह के उत्सवों के कारण आम आदमी का शांतिपूर्ण जीवन किसी भी परिस्थिति में प्रभावित न हो।”

कोर्ट ने सरकार को राज्य भर में कई जगहों पर ‘लीडर पार्क’ बनाने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि केवल उचित अनुमति के साथ लगाई गई मूर्तियों को पार्क में स्थानांतरित और उसका रख-रखाव किया जाना चाहिए और प्रतिमाओं के रखरखाव का खर्चा उन लोगों से वसूल की जानी चाहिए, जिन्होंने उसे लगवाया था।

याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम ने कहा, “मूर्तियों का निर्माण विभिन्न राजनीतिक दलों, सांप्रदायिक, धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और अनुभागीय समूहों की मर्जी और पसंद पर किया जाता है।” उन्होंने आगे कहा कि निस्संदेह, वे नेताओं की महिमा का जश्न मनाने के हकदार हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थान पर मूर्ति स्थापित करते समय नियमन सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि विचार, विचारधाराएँ और प्रथाएँ एक समूह की दूसरे समूह से अलग हो सकती हैं।

न्यायमूर्ति एसएम सुब्रमण्यम ने सरकार को राजमार्गों, सार्वजनिक स्थानों और पोरोम्बोक भूमि पार्सल में संरचनाओं या मूर्तियों को स्थापित करने की अनुमति नहीं देने का आदेश दिया। इसके साथ ही राज्य सरकार को मूर्तियों को लगाने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने भी का निर्देश दिया।

कश्मीर में गैर-मुस्लिमों की ‘हत्याओं’ ने कुरेदे 1990 के जख्म, रिपोर्ट्स में दावा- 500 लोग पलायन को तैयार

जम्मू-कश्मीर में गैर-मुस्लिमों की हत्याओं ने एक बार फिर 90 के दशक की भयावह तस्वीर लोगों के जहन में ताजा कर दी है। मृतकों के घरों में जहाँ मातम का माहौल है, वहीं अन्य गैर-मुस्लिम या तो घर में बंद हो गए हैं या फिर घाटी छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं। शेखपुरुरा में दर्जनों कश्मीरी पंडित अपने घरों को छोड़ जाते दिखे। वहीं कुछ इलाकों में कश्मीरी पंडित घर से बाहर कदम रखने से भी कतरा रहे हैं।

कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने 30 साल पहले भी अपने घर को नहीं छोड़ा था लेकिन हालिया घटनाओं ने उन्हें भयभीत कर दिया है। दूसरी ओर बाजार पर भी इस खौफ का असर दिखा। दो शिक्षकों की हत्या के बाद शाम को मार्केट पूरा बंद था। जिन्होंने हिम्मत करके दुकान खोली वो भी शाम तक बंद करके चले गए।

घाटी के हिंदुओं और अन्य गैर-मुस्लिमों में पसरे डर को देखते हुए प्रशासन ने 10 दिन का अवकाश दिया है, ताकि वह हालात सामान्य होने तक या तो अपनी कालोनियों में रहें या फिर कश्मीर से बाहर जम्मू या किसी अन्य शहर में अपने परिजनों के साथ रहें। पुलिस हर स्कूल और विभाग से गैर मुस्लिम कर्मचारीयों को निकाल रही है और उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाने का इंतजाम हो रहा है।

ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले गैर-मुस्लिम कर्मचारियों को आर्मी केंट या अन्य सुरक्षित स्थानों पर भेजा जा रहा है। पूरे कश्मीर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। हर जगह तलाशी हो रही है। गैर-मुस्लिम फील्ड ड्यूटी से हटा दिए गए हैं। हर विभाग को इस संबंध में सूचना भेजी गई है और निर्देश दिए गए हैं कि गैर-मुस्लिम अपने घर में ही रहें।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट 23 परिवारों के कश्मीर से जम्मू पहुँचने का दावा कर रही है। मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए प्रो हरि ओम ने कहा कि कश्मीर 1990 जैसा ही नजर आने लगा है। करीब दो दर्जन परिवार कश्मीर से बीती रात लौट आए हैं। इनमें कई सरकारी कर्मचारी भी हैं। उनके हिसाब से यह कश्मीर से गैर मुस्लिमों को फिर से खदेड़ने की साजिश है।

पिछले दिनों हुई घटनाओं के संबंध में जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व महानिरीक्षक अशकूर वानी ने कहा कि इस समय कश्मीर में कश्मीर हिंदुओं की संपत्ति पर कब्जे छुड़ाने में प्रशासन सक्रिय हो रखा है। ऐसे में आतंकियों ने 4 अल्पसंख्यकों को मारा। ऐसा करके उन्होंने कश्मीर में लौटाने के इच्छुक विस्थापितों को रोकने का प्रयास किया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, कश्मीरी पंडितों के संगठन ने बताया कि संगठन के कर्मचारी जिन्हें 2010-11 में रिहेबिलेशन पैकेज के तहत जॉब दी गई थी वो चुपचाप जम्मू जा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासन उन्हें सुरक्षित माहौल नहीं दे पा रहा।

कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिकू ने पीटीआई को बताया, “500 के करीब या ज्यादा ने बड़गाम, अनंतनाग और पुलवामा के अलग-अलग इलाकों से निकलना शुरू कर दिया है। इनमें कुछ कश्मीरी पंडित नहीं भी थे जिन्होंने जगह छोड़ने का फैसला किया। ये 1990 को दोहराया जा रहा है…ये भले दिख न रहा हो लेकिन पलायन चल रहा है और मुझे इसकी आशंका थी। हमने राज्यपाल कार्यालय में अपॉइंटमेंट माँगी लेकिन वो हमें अभी तक नहीं मिली।”

51 साल की कश्मीरी पंडित ने शोपियाँ अपने परिवार के साथ छोड़ते हुए कहा- “हमने 90 के बुरे दौर में भी घाटी नहीं छोड़ी लेकिन अब अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों ने पलायन को मजबूर कर दिया है।” वहीं आतंकियों के हाथ मारे गए दीपक चंद के भाई विकी मेहरा ने घाटी को उन लोगों के जहन्नुम कहा और बताया कि अब 90 के हालात वापस आ रहे हैं। सरकार अल्पसंख्यकों को बचाने में विफल हो रही है।

उल्लेखनीय है कि अभी हाल में जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने पहचान पत्र देखने के बाद दो गैर-मुस्लिम शिक्षकों की हत्या की थी। उससे पहले भी उन्होंने मंगलवार को आमजन को अपना निशाना बनाया था। लगातार हुई इन आतंकी घटनाओं ने स्थानीयों में गुस्सा और डर भर दिया है। सबके सवाल बस यही हैं कि क्यों वो आज भी घाटी में सुरक्षित नहीं हैं?

चीन की तरह भारत भी कर सकता है बिजली संकट का सामना? पॉवर प्लांट्स के पास बचा है औसतन 4 दिनों का ही कोयला!

क्या चीन के बाद अब भारत भी बिजली संकट का सामना कर रहा है? बताया जा रहा है कि चीन में बिजली संकट का कारण है कोयले की काई ज्यादा खपत और बिजली के दाम कम होना। भारत में भी इस तरह की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि यहाँ भी पॉवर प्लांट्स कोयले की कमी से जूझ रहे हैं। ‘सेन्ट्रल एलेक्ट्रीसिटी अथॉरिटी’ के आँकड़ों के हवाले से बताया गया है कि पॉवर प्लांट्स के पास औसतन 4 दिनों की ही बिजली के लायक कोयला स्टोर में रखा जा रहा है।

जबकि सरकारी नियमों के हिसाब से कम से कम 2 सप्ताह के लिए कोयला स्टोरेज होना चाहिए। भारत के 108 पॉवर प्लांट्स में से 16 ने ईंधन की कमी की बात कही है और 45 ने कहा है कि उनके पास 2 दिनों का ही कोयला बचा है। भारत में बिजली के उत्पादन का 53% हिस्सा कोयला से ही आता है, लेकिन इसका आउटपुट 70% है। ‘कोल इंडिया’ भारत में कोयला का सबसे बड़ा माइनर है। कोयला की सबसे ज्यादा खपत बिजली उत्पादन में ही होती है।

चीन भी कुछ इसी तरह की समस्याओं का सामना कर रहा है, जहाँ फैक्ट्रियों में कोयला की माँग बढ़ी है, लेकिन सप्लाई कम ही है। भारत में भी कोरोना वायरस संक्रमण के कारण लगे लॉकडाउन का दौर बीत चुका है और अब जब मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र फिर से पटरी पर लौट रहा है, कोयले की माँग बढ़ी है। लोगों को महामारी के दौरान लगा था कि अर्थव्यवस्था को उबरने में 2-3 साल लगेंगे, लेकिन काफी जल्द ही सारे सेक्टरों में काम शुरू हो गया।

वैश्विक बाजार में कोयले का दाम काफी ज्यादा है। इसीलिए, देश के कोयला खदानों से ही खरीददारी में बढ़ोतरी हुई और इससे उन पर बोझ बढ़ गया। ऊपर से सितंबर 2021 में हुई भारी बारिश से माइनिंग प्रभावित हुई है। साथ ही मजदूरों का भी टोटा है। हालाँकि, कई मजदूर अब काम पर लौट रहे हैं। भारत को अक्टूबर-दिसंबर में 167 GW बिजली की ज़रूरत है, जिसमें से 126 GW कोयला से ही आना है।

पिछले साल के मुकाबले ये 10% ज्यादा है। अब बाहर से कोयला लाना ही कई सेक्टरों को एकमात्र उपाय लग रहा है, जिससे चीजों के दाम बढ़ने की आशंका है। हालाँकि, मार्च 2022 तक स्थिति सुधरने की संभावना है। एशिया में कोयला के दाम अभी बढ़ते ही जाएँगे, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। इस साल की शुरुआत में इंडोनेशिया के बेंचमार्क थर्मल कोयला का मूल्य प्रति मीट्रिक टन $45 से सीधा $125 पहुँच गया।

भारत में कोयले की एक बड़ी मात्रा इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया से आयात की जाती है। हालाँकि, अभी भारत में उपभोक्ताओं को बिजली की खासी कमी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर और लद्दाख जैसे क्षेत्रों में लोगों को थोड़ी-बहुत परेशानी हुई है। टाटा पॉवर, अडानी पॉवर और JSW उत्पादन में कटौती कर रहे हैं। कोयले पर अत्यधिक निर्भरता भी कम की जा रही है।

मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड और महाराष्ट्र – इन 5 राज्यों में लोगों को ज्यादा बिजली संकट का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि यहाँ भरपूर मात्रा में कोयला खदान हैं और माइनिंग भी सबसे ज्यादा यहीं होती है। लेकिन, बिहार और राजस्थान में लोग अभी से परेशान हैं। कई जगह लोगों को रात-रात भर बिजली नहीं मिल रही। राजस्थान और हरियाणा ने इस मामले को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया भी है।

‘चीन में बनी कारें न बेचे टेस्ला, भारत में निर्माण पर देंगे सहयोग’: नितिन गडकरी ने बताया एलन मस्क से क्या हुई बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इण्डिया’ अभियान को बल देते हुए केंद्रीय सड़क और परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अमेरिकी कार निर्माता कम्पनी टेस्ला को कहा है कि वो चीन के कारखानों में बनी इलेक्ट्रिक कारें भारत में न बेचे और उनका उत्पादन भारत में शुरू करे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, गडकरी ने कहा कि देश में ई-कारों के निर्माण लिए भारत टेस्ला को हर संभव सहायता करने करने के लिए तैयार है। टेस्ला (Tesla) के सीईओ एलन मस्क ने कुछ समय पहले कहा था कि टेस्ला भारत में इलेक्ट्रिक कारें लॉन्च करना चाहती है, लेकिन भारत का आयात शुल्क बाकी देशों के मुकाबले कहीं अधिक है।

इसी पर जवाब देते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि भारत सरकार टेस्ला की न सिर्फ इम्पोर्ट फीस कम करने की, बल्कि बाकी सहूलियतें देने पर भी विचार कर सकती है, पर उसके लिए टेस्ला को अपना कारखाना भारत में स्थापित करना होगा। इसी के साथ ही गडकरी ने भारत में इलेक्ट्रिक कार बना रही कम्पनी टाटा मोटर्स की सराहना की।

इण्डिया टुडे कॉन्क्लेव के अपने बोले गए अंश को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने ट्वीट भी किया है –

एक आंकड़े के अनुसार, भारत 30 लाख रुपए से अधिक मूल्य की आयातित (Import) कारों पर बीमा और परिवहन लागत सहित लगभग 100% टैक्स लगता है। यदि वाहन का मूल्य 30 लाख रुपए से कम हो तो 60% इम्पोर्ट टैक्स का भुगतान करना पड़ता है। टेस्ला ने भारत सरकार से यही 100% टैक्स घटा कर 40% करने की माँग की थी।

प्रीमियर कार बाज़ार भारत में कुल कार बाजार का लगभग 7 प्रतिशत है जिसमें टेस्ला अधिक से अधिक हिस्सेदारी लेना चाहती है। मिली जानकारी के अनुसार टेस्ला कर्नाटक में अपनी मैनुफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने पर विचार भी कर रही है।

उद्योग मंडल फिक्की के कार्यक्रम में बोलते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि वर्ष 2030 तक सरकार की योजना निजी प्रयोग में 30 प्रतिशत इलेक्ट्रिक कारों को शामिल करने की है। वहीं, व्यापारिक क्षेत्र में प्रयोग होने वाले वाहनों में यही लक्ष्य 70 प्रतिशत और दोपहिया वाहनों के लिए 80 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। इस अभियान के पीछे सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रदूषण को नियंत्रित करना है।

असम के CM हिमंता बिस्वा सरमा की दो टूक- मियाँ वोट नहीं चाहिए, अतिक्रमण हटाने का अभियान चलता रहेगा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा शनिवार (9 अक्टूबर 2021) को इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों, सरकार के अतिक्रमण हटाने के अभियान सहित कई मुद्दों पर बात की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बीजेपी को मियाँ वोट नहीं चाहिए। पूर्वी बंगाल मूल के मुस्लिमों को असम में मियाँ कहते हैं।

सरमा ने कहा, “भाजपा को असम में बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के वोटों की जरूरत नहीं है। मुझे मियाँ मुस्लिमों का वोट नहीं चाहिए। हम सद्भाव से रहते हैं। मैं उनके पास वोट के लिए नहीं जाता और वे भी मेरे पास नहीं आते हैं।” इस दौरान उन्होंने लखीमपुर खीरी हिंसा पर राजनीति करने को लेकर कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा को भी आड़े हाथों लिया।

उन्होंने कहा, “प्रियंका के द्वारा फर्श पर झाड़ू लगाने को देशव्यापी मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है? इसे जश्न की तरह क्यों दिखाया जा रहा है? मेरी माँ भी घर में झाड़ू लगाती है। लाखों भारतीय अपने घरों में यह काम करते हैं।” दरअसल, इंडिया टुडे ने अपने कार्यक्रम में मुख्यमंत्री को सीतापुर जिले के PAC गेस्ट हाउस में प्रियंका गाँधी वाड्रा का झाड़ू लगाते हुए वीडियो दिखाया था, जिसके बाद उन्होंने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा कि राज्य के बहुत से लोगों का मानना है कि अप्रवासी मुस्लिमों की वजह से असम ने अपनी पहचान, संस्कृति और भूमि खो दी है। सरमा ने यह भी कहा कि असम में पहले समुदाय आधारित राजनीति नहीं थी। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि अतिक्रमण इसलिए हो रहा था, क्योंकि अप्रवासी मुसलमान बड़ी संख्या में बढ़ रहे। उन्होंने कहा, “कई असमिया लोग ऐसा सोचते हैं। यह सब आजादी से पहले शुरू हुआ था। मैं इतिहास का यह बोझ अपने साथ लेकर जी रहा हूँ।” उन्होंने कहा कि राज्य में अवैध कब्जे हटाने का अभियान चलता रहता है।

गौरतलब है कि असम के सिपाझार में ​पिछले महीने (सितंबर 2021) अतिक्रमण खाली कराने गई पुलिस पर भीड़ ने हमला कर दिया था, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस घटना के पीछे PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) का हाथ होने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि PFI दरंग जिले के धौलपुर में ‘तीसरी ताकत’ के रूप में काम कर रहा था, जिसने अवैध अतिक्रमणकारियों को भड़काया। फिर उन्होंने अतिक्रमण खाली कराने गई सरकारी टीम पर हमला बोल दिया।

बता दें कि असम में 26 सत्रों (वैष्णव मठों) की 5548 बीघा जमीन को घुसपैठियों ने कब्ज़ा कर रखा है। एक RTI से तो यहाँ तक पता चला था कि असम का 4 लाख हेक्टेयर जंगल क्षेत्र अतिक्रमण की जद में है। ये राज्य के कुल जंगल क्षेत्रों का 22% एरिया है। एक सरकारी समिति ने पाया था कि असम के 33 जिलों में से 15 में बांग्लादेशी घुसपैठिए हावी हैं। इन अतिक्रमणकारियों ने अवैध गाँव के गाँव बसा लिए हैं।