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‘2024 में आर्थिक नीतियों का लाभ मुझे मिलेगा या नहीं… मुद्दा यह नहीं बल्कि राष्ट्र तरक्की करेगा, यह है’ – PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक इंटरव्यू दिया। इस दौरान उन्होंने गाँधीनगर से नई दिल्ली तक की अपनी यात्रा, शासन की चुनौतियों, दुनिया में भारत के लिए उनके दृष्टिकोण और इसके साथ ही कई अन्य मुद्दों पर बात की।

इस दौरान उनसे गुजरात त्रासदी और उनके उथल-पुथल भरी जीवन यात्रा से लेकर उनके संतोषजनक क्षण के बारे में सवाल पूछा गया। उन्होंने कहा कि उनका राजनीतिक क्षेत्र से कोई लेना-देना नहीं था। उनका परिवेश, उनकी अपनी दुनिया- ये सब बहुत अलग था। उनका बचपन से ही आध्यात्म की तरफ झुकाव था। ‘जन सेवा ही प्रभु सेवा’ के सिद्धांत ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया है। वह स्वामी विवेकानंद को अपनी प्रेरणा मानते हैं।

राजनीति में आने की बात पर उन्होंने कहा कि उनका इससे दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। हालाँकि परिस्थितियाँ ऐसी आईं कि उन्हें राजनीति में आना पड़ा। 2001 में गुजरात में आए विनाशकारी भूकंप के कारण उन्हें प्रशासन का नेतृत्व करने के लिए उस क्षेत्र में घुसना पड़ा, जो उनके लिए पूरी तरह से अनजान था। 

उन्होंने कहा, “लोगों की परेशानी को करीब से देखने के बाद, मेरे पास यह सोचने का समय या अवसर नहीं था कि मेरे जीवन में नए मोड़ का क्या मतलब है। मैं तुरंत राहत, पुनर्वास और गुजरात के पुनर्निर्माण में लग गया। कुछ हासिल करना कभी भी मेरे अस्तित्व का हिस्सा नहीं रहा है। मेरी आंतरिक इच्छा हमेशा दूसरों के लिए कुछ न कुछ करने की रही है। आज मैं जहाँ पर हूँ, जो भी कुछ कर रहा हूँ, उसकी वजह भी लोगों के लिए कुछ करने की इच्छा है। दूसरों के लिए काम करना ही मुझमें हमेशा ‘स्वंतः सुखाय’ या आत्मसंतुष्टि की भावना पैदा करता है।”

पीएम ने आगे कहा, “दुनिया की नजर में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री होना बहुत बड़ी बात हो सकती है लेकिन मेरी नजर में यह लोगों के लिए कुछ करने के तरीके हैं। मानसिक रूप से मैं खुद को सत्ता, चकाचौंध और ग्लैमर की इस दुनिया से अलग रखता हूँ और उसी के कारण, मैं एक आम नागरिक की तरह सोच पा रहा हूँ और अपने कर्तव्य के रास्ते पर चल रहा हूँ।” वहीं उन्होंने ओलंपिक और पैरालंपिक नायकों से मिलने और बातचीत करने को अपना संतोषजनक क्षण बताया।

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो चाय बेचने से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक के सफर के उतार-चढ़ाव से वो डरते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि नहीं, वो इस बात का आदर करते हैं कि देश के लोग एक गरीब बच्चे को चुन कर वहाँ पहुँचा देते हैं, जहाँ पर वो आज हैं। वो अपने आप को सौभाग्यशाली मानते हैं कि इस देश के लोगों ने उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारियाँ दी और भरोसा किया। यही लोकतंत्र की ताकत है।

वह कहते हैं, “जहाँ तक ​​मेरे लिए बचपन में चाय बेचने और बाद में हमारे देश का प्रधानमंत्री बनने की बात है, मैं इसे आपके तरीके से बहुत अलग तरीके से देखता हूँ। मुझे लगता है कि भारत के 130 करोड़ लोगों में वही क्षमताएँ हैं, जो मेरे पास हैं। मैंने जो हासिल किया है, उसे कोई भी हासिल कर सकता है। अगर मैं कर सकता हूँ तो कोई भी कर सकता है।”

यह पूछे जाने पर कि उनके विरोधी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि वो उनको पूरी तरह से नहीं जान पाए हैं। पीएम कहते हैं, “यहाँ समस्या मोदी नहीं है। लेकिन जब कोई व्यक्ति पूर्वधारणा से ग्रसित मानसिकता से किसी भी चीज को देखने की कोशिश करता है तो या तो वह आधी नजर से ही देख पाता है या गलत चीजों को ही देख पाता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपनी गलतियों को आसानी से स्वीकार नहीं करता। अपनी गलत धारणाओं पर सच्चाई को स्वीकार करने के लिए साहस चाहिए। अगर किसी ने केवल मेरे काम का विश्लेषण किया होता, तो उसे मेरे बारे में कोई भ्रम नहीं होता।” इसके बाद उन्होंने अपने द्वारा किए गए कामों के बारे में विस्तार से बताया।

प्रधानमंत्री से जब यह पूछा गया कि उन्हें जोखिम लेने के लिए जाना जाता है, लेकिन वह किसान आंदोलन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं कर रहे? क्या वह इस मुद्दे पर बात करने से डरते हैं? उन्होंने कहा, “हमारे देश की राजनीति ऐसी है कि अब तक हमने एक ही मॉडल देखा है जिसमें अगली सरकार बनाने के लिए सरकारें चलाई जाती हैं। मेरी मौलिक सोच अलग है। मेरा मानना है कि देश बनाने के लिए सरकार चलानी है। अपनी पार्टी को जिताने के लिए सरकार चलाने की परंपरा रही है, लेकिन मेरा मकसद अपने देश को जिताने के लिए सरकार चलाना है और इसी बुनियादी चिंता के कारण मैं गाँधीजी के जंतर के आधार पर निर्णय लेता हूँ।”

उन्होंने बौद्धिक बेईमानी और ‘राजनीतिक धोखेबाजी’ के बारे में बात करते हुए कहा कि कुछ पार्टियाँ चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करते हैं और उसे अपने घोषणापत्र में भी डालते हैं, लेकिन जब उसे पूरा करने का समय आता है तो वह उससे यू-टर्न मार लेते हैं। अगर आप उन लोगों को देखें जो आज किसान हितैषी सुधारों का विरोध कर रहे हैं, तो आपको बौद्धिक बेईमानी और ‘राजनीतिक धोखेबाजी’ का असली मतलब समझ में आएगा।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि विकास में तेजी लाने, अर्थव्यवस्था और शासन में सुधार और बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने के लिए उनके द्वारा किए गए उपाय सही दिशा में कदम हैं। लेकिन उनका यह भी मानना है कि इसका लाभ मिलने में समय लगेगा, जिसकी वजह से उन्हें 2024 में लाभ नहीं मिलेगा।

इसका जवाब देते हुए वह कहते हैं, “अगर ये सच होता तो लोगों ने मुझे 20 वर्षों तक सरकार के प्रमुख के रूप में काम करने का अवसर नहीं दिया होता। जो लोग यह सोचते हैं, वे न तो अपने देश के लोगों को जानते हैं, न ही उनकी सोच को। देश के लोग इतने समझदार हैं कि अच्छे निस्वार्थ इरादों से किए गए सभी अच्छे कामों को समझ सकते हैं और उसका समर्थन करते हैं। इसलिए मुझे देश की जनता ने लगातार 20 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में काम करने का अवसर दिया है। बीज बोने वाले को इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि उसका फल किसे मिलेगा। मुद्दा यह नहीं है कि मुझे अपनी आर्थिक नीतियों का लाभ मिलेगा या नहीं, मुद्दा यह है कि राष्ट्र तरक्की करेगा।”

इस दौरान उनसे वन कार्ड वन नेशन, मनरेगा, उज्जवला योजना, खाद्यान्न वितरण, बिजली आदि के बारे में बात करते हुए कहा गया कि उन्होंने कई मायनों में हर मुद्दे के शासन प्रतिमान को बदल दिया है।

इस पर उन्होंने कहा, “आप अच्छी तरह जानते हैं कि मैं किसी शाही परिवार से नहीं आता। मैंने अपना जीवन गरीबी में गुजारा है। मैंने 30-35 साल भटकते सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में बिताए। मैं सत्ता के गलियारों से दूर था और जनता के बीच रहा हूँ और इस वजह से मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि आम आदमी की क्या समस्याएँ, आकांक्षाएँ और क्षमताएँ हैं। इसलिए मेरे फैसले (जब देश ने मुझे काम करने का मौका दिया) आम आदमी की मुश्किलें कम करने की दिशा में काम करने का एक प्रयास है।”

पीएम ने कहा, “शौचालय को कभी किसी ने लोगों की सेवा करने के तरीके के रूप में नहीं देखा। लेकिन मुझे लगा कि शौचालय लोगों की सेवा करने का एक तरीका है और इसलिए जब मैं निर्णय लेता हूँ तो आम आदमी को लगता है कि यह प्रधानमंत्री हमें समझता है, हमारी तरह सोचता है और हम में से एक है। उनके बीच अपनेपन की यह भावना हर परिवार को यह महसूस कराती है कि मोदी हमारे परिवार के सदस्य की तरह हैं। यह विश्वास पीआर द्वारा बनाई गई धारणा के कारण विकसित नहीं हुआ है। यह विश्वास पसीने और मेहनत से अर्जित किया गया है। मैंने ऐसा जीवन जीने का प्रयास किया है जहाँ मैं चाकू की धार पर चलता हूँ, लोगों से संबंधित हर मुद्दे का अनुभव करता हूँ और जीता हूँ।”

“जब मैं सत्ता में आया था तो लोगों से तीन चीजों का वादा किया: मैं अपने लिए कुछ नहीं करूँगा। मैं गलत इरादे से कोई काम नहीं करूँगा। मेहनत की नई मिसाल गढ़ूँगा। मेरी इस निजी प्रतिबद्धता को लोग आज भी देखते हैं।”

इस दौरान उनसे पिछले 74 वर्षों में नेहरू, इंदिरा गाँधी, पीवी नरसिम्हा राव और फिर मोदी के कार्यकाल पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, “हमारे देश में बनी सभी सरकारें मूल रूप से कॉन्ग्रेस गोत्र के एक व्यक्ति के नेतृत्व में बनी हैं और इसीलिए, उनमें से प्रत्येक के लिए, उनकी राजनीतिक विचार प्रक्रिया और आर्थिक विचार प्रक्रिया में कोई अंतर नहीं था। अटलजी को लोगों ने मौका दिया लेकिन उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था, यह गठबंधन सरकार थी। मैं भाग्यशाली हूँ कि यह पहली गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार है जिसे लोगों ने पूर्ण बहुमत दिया था। इसका मतलब है कि इस देश के लोगों ने पूर्ण परिवर्तन के लिए मतदान किया।” इस दौरान उनसे वैक्सीन के डिजिटलीकरण को लेकर भी बात की गई।

हमारी राजनीति चुनावी सफलता के लिए भारतीयों के बीच विभाजन को प्राथमिकता देती है। पिछले सात वर्षों में प्रधानमंत्री के रूप में, राजनीतिक व्यवस्था में एकीकृत विचारों को स्वीकार करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा है? इस पर पीएम ने अपने पुराने भाषणों को सुनने का आग्रह किया, चाहे वह उनके गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में हो या भारत के प्रधानमंत्री के रूप में। उन्होंने हमेशा ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सब का प्रयास’ का नारा दिया।

कोविड -19 लड़ाई के दौरान राज्य और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की तैयारियों के बारे में क्या सबक हैं जिन्हें अब वह बदलने की योजना बना रहे हैं? इस पर उन्होंने कहा, “भारत से पहले अन्य देशों में महामारी की शुरुआत हुई थी। मैं वैश्विक स्थिति और रुझानों को देख रहा था। मैं हर जगह भ्रम और व्यक्तिगत स्तर पर गंभीरता की कमी भी देख रहा था। हम जानते थे कि भारत भी हमेशा के लिए प्रभावित होगा। मैंने योजना बनाना शुरू कर दिया कि कैसे पूरे देश को इसके लिए एक साथ लाया जाए। आखिरकार, यह लोगों का संकल्प और अनुशासन था, जिसके बिना, इस महामारी से निपटना असंभव था। तभी मेरे मन में जनता कर्फ्यू का ख्याल आया। यह एक बड़ी सफलता की कहानी है।”

उन्होंने आगे कहा कि इसी तरह, महामारी में सबसे बड़ी भूमिका स्वास्थ्य सेवा और फ्रेटलाइन वर्करों की थी। उनका मनोबल बढ़ाने की जरूरत है। थालियों की धुनाई और दीये जलाने का हुजूम उमड़ा। इसने हमारे स्वास्थ्य कर्मियों के मनोबल को बढ़ाने में मदद की। यह एक बड़ा केस स्टडी हो सकता है। इससे चिकित्साकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार के मामले भी कम हुए और उनके प्रति सम्मान बढ़ा। लोग सफेद कोट में चिकित्सा कर्मियों को भगवान के रूप में देखने लगे। इसके बाद पीएम ने चिकित्सा सेवा के बारे में हो रहे विस्तार के बारे में बताया।

बेटी के जन्म के बाद पता चला मुस्लिम है फर्जी आधार वाला ‘राहुल शर्मा’, हिन्दू महिला को बना दिया मुस्लिम: पहले मंदिर में की थी शादी

दिल्ली में एक मुस्लिम व्यक्ति द्वारा खुद को हिन्दू बता कर एक हिन्दू महिला से धोखे से शादी करने का मामला सामने आया है। अदालत ने आरोपित को जमानत देने से इनकार कर दिया है। शादी के बाद उक्त व्यक्ति ने हिन्दू महिला का इस्लामी धर्मांतरण करा कर उसे मुस्लिम भी बना दिया। आरोप है कि उसने फर्जी आधार कार्ड भी बनवा रखा था, जिसके माध्यम से वो अपनी असली पहचान छिपाने में कामयाब हो जाता था।

महिला ने आरोपित पर फर्जी आधार कार्ड के सहारे अपना मजहब छिपाने का आरोप लगाते हुए कहा कि धर्मांतरण का विरोध करने पर उसने जान से मार डालने की धमकी भी दी थी। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जितेंद्र प्रताप सिंह ने जमानत याचिका ख़ारिज करते हुए आधार कार्ड में जालसाजी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर विषय करार दिया। उन्होंने इस मामले में सरकारी एजेंसियों द्वारा जाँच की आवश्यकता जताई।

उन्होंने कहा कि आधार कार्ड एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। आरोपित ने महिला को शादी से पहले जो आधार कार्ड दिखाया था, उसमें उसका नाम ‘राहुल शर्मा’ अंकित था। स्थानीय पुलिस को UIDAI के माध्यम से कोई जानकारी नहीं मिली। किसी विशेष इकाई द्वारा इसकी जाँच की जाएगी। आरोपित ने महिला से मंदिर में शादी की थी। बेटी के जन्मदिन पर महिला को पता चला कि वो मुस्लिम है। फिर वो इस्लामी परंपरा से शादी की जिद करने लगा।

उसके दबाव के बाद महिला को उसके साथ निकाह भी करना पड़ा। महिला समाज के भय से पुलिस-प्रशासन के समक्ष नहीं गई, जिसके बाद आरोपित इस्लामी धर्मांतरण का दबाव बनाने लगा। महिला इसके लिए तैयार भी हो गई और अपने बच्चे के भविष्य को देखते हुए 26 जून, 2012 को ये निकाह हुआ था। आरोपित ने हिन्दू धर्म को गाली भी दी और महिला व बच्चे को भी प्रताड़ित किया। उसका कहना है कि उसे झूठा फँसाया जा रहा है।

पुलिस ने इस मामले में ‘भारतीय दंड संहिता (IPC)’ की धारा-420 (धोखाधड़ी), 468 (जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग करना) के तहत मामला दर्ज किया था। अदालत ने कहा कि आरोपित को अगर जमानत दी जाएगी तो वो बाहर निकल कर सबूतों के साथ छेड़छाड़ करेगा। निकाह के बाद वो एक अन्य हिन्दू लड़की को भी फँसा रहा था, ऐसा महिला का आरोप है। सभी आरोपों की जाँच की जा रही है।

जजों के साथ मंत्रियों जैसा व्यवहार करें, अदालत का काम रुकने पर मद्रास HC ने सरकारी अधिकारियों को लगाई फटकार

मद्रास हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने शुक्रवार (1 अक्टूबर 2021) को सरकारी अधिकारियों से हाईकोर्ट के जजों से मंत्रियों के समान व्यवहार करने और उस प्रोटोकॉल का पालन करने का आग्रह किया, जिसके वे हकदार हैं। अदालत ने शहर में यातायात पाबंदियों के कारण काम करने में देरी होने के संबंध में यह टिप्पणी की।

न्यायाधीश ने पुलिस द्वारा सड़कों पर बैरिकेड्स लगाने और उनके वाहन सहित अन्य वाहनों को रोकने पर नाराजगी जताई। न्यायाधीश ने उन्हें बिना किसी बाधा के जाने देने लिए कोई व्यवस्था नहीं करने को लेकर पुलिस को फटकार लगाई। उन्होंने कहा, “इसकी वजह से हमें आज देर से अदालत का काम शुरू करना पड़ा।”

दरअसल, दिवंगत दक्षिण भारतीय अभिनेता शिवाजी गणेशन की 94वीं जयंती के अवसर पर आरए पुरम में अड्यार पुल के पास उनके स्मारक पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पुलिस ने वाहनों की आवाजाही को प्रतिबंधित किया था। इस कार्यक्रम में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और अन्य मंत्री भाग लेने पहुँचे थे।

इस दौरान न्यायाधीश की गाड़ी वहाँ करीब 30 मिनट तक रुकी रही। उन्होंने कहा कि उनके पीए द्वारा संबंधित पुलिस अधिकारियों को पहले से सूचित करने के बावजूद ऐसा हुआ। हाईकोर्ट के समन के बाद गृह सचिव एसके प्रभाकर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए न्यायाधीश के समक्ष पेश हुए और इस घटना पर खेद जताया। उन्होंने न्यायाधीश से कहा कि भविष्य में ऐसी घटना दोबारा ना हो, इसके लिए कदम उठाए जाएँगे।

न्यायाधीश ने इस पर कहा कि वह इस आधार पर अदालत की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू कर सकते थे कि उन्हें अपने कर्तव्य का निर्वहन करने से रोका गया। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह ऐसा नहीं कर रहे हैं और मामले को यहीं खत्म किया जाता है।

महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और PM मोदी ने की ‘सपनों के भारत’ की बात

महात्मा गाँधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज (2 अक्टूबर 2021) जयंती है। इस अवसर पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी समाधि स्थल पर गए और उन्हें पुष्प अर्पित कर नमन किया। इस मौके पर वहाँ सर्व धर्म प्रार्थना सभा का आयोजन भी किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को उनकी 152वीं जयंती पर श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि उनका जीवन व आदर्श देश की हर पीढ़ी को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।

प्रधानमंत्री मोदी ने दो ट्वीट किए हैं। अपने पहले ट्वीट में पीएम ने लिखा, ‘‘राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को उनकी जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि। पूज्य बापू का जीवन और आदर्श देश की हर पीढ़ी को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता रहेगा।’’

वहीं अपने दूसरे ट्वीट में उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को नमन किया है। उन्होंने लिखा, ”मूल्यों और सिद्धांतों पर आधारित उनका जीवन देशवासियों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत बना रहेगा।”

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी दो ट्वीट किए हैं। उन्होंने अपने पहले ट्वीट में लिखा, ”गाँधी जयंती के दिन बापू को श्रद्धांजलि। यह दिन हमारे लिए गाँधीजी के संघर्ष और त्‍याग को स्‍मरण करने का अवसर है। आइए, हम सब उनकी शिक्षाओं, आदर्शों और जीवन-मूल्‍यों का अनुसरण करते हुए यह संकल्‍प लें कि हम सब उनके सपनों का भारत बनाने की दिशा में सतत प्रयत्‍नशील रहेंगे।”

उन्होंने दूसरे ट्वीट में लिखा, ”पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री की 117 वीं जयंती पर उनकी स्मृति को नमन। वे देश के एक महान सपूत थे, जिन्होंने पूर्ण निष्ठा, समर्पण तथा लगन के साथ राष्ट्र की सेवा की। उनकी सादगी, सदाचार और सत्यनिष्ठा आज भी सभी देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”

बता दें कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी ट्वीट कर भारत रत्न लालबहादुर शास्त्री और महात्मा गाँधी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन किया।

‘कुछ भी हो जाए, नहीं बनेंगे मुसलमान’ – इस्लाम कबूल चुके चचेरे ससुर की धमकी का UP की जौनपुर वाली बहु ने दिया जवाब

कुछ ही समय पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश के अयोध्या से ईसाई धर्मांतरण की खबरें आई थीं। अब वहाँ से कुछ ही दूर जिला जौनपुर में धर्मान्तरण का दबाव बनाने की खबर ने फिर से हलचल मचा दी है।

मिल रही जानकारी के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर की कोतवाली क्षेत्र के मजडीहा गाँव की एक महिला ने कुछ समय पूर्व इस्लाम कबूल चुके अपने ही रिश्ते के चचिया ससुर (चचेरे ससुर) पर शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना के साथ जबरन मुस्लिम बनाने का दबाव का आरोप लगाया है।

इस पूरे मामले में महिला का कहना है कि उसने इसकी शिकायत जब स्थानीय थाने से की तो उनकी सुनवाई नहीं हुई। बहुत मुश्किलों के बाद पुलिस अधीक्षक के हस्तक्षेप पर केस दर्ज हो पाया, जिस से आरोपित के हौसले बुलंद होते गए।

इस प्रकरण में पीड़िता मनीता प्रजापति (पत्नी का नाम जितेंद्र) द्वारा दिए गए प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया गया है कि उसका चचिया ससुर सालिक पुत्र महाबल कई वर्ष पहले मुस्लिम बन गया है और वह स्वयं को मोहम्मद सालिक कहता है।

पीड़िता के अनुसार अब वो बारी-बारी बाकी सबको इस्लाम कबूल करवाने का दबाव बनाने लगा है। सबसे पहले उसने अपने भाई अर्थात पीड़िता के ससुर लोरिक प्रजापति का धर्मांतरण करवाना चाहा था। उन्होंने हालाँकि अपने धर्मांतरित भाई की बात नहीं मानी।

पीड़िता का कहना है कि ससुर की मौत हो जाने के बाद मो. सालिक पीड़िता और उसके पूरे परिवार को पहले लालच दिया और जब बात नहीं बनी तब पूरे परिवार को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने लगा।

इतना ही नहीं, शिकायत में भी ये कहा गया है कि अपने मंसूबों में असफल मोहम्मद सालिक ने पीड़िता की पूरी संपत्ति हड़पने और उसे जान से मारने की भी धमकी दी है। पीड़िता के अनुसार उसके पति जितेंद्र पर मोहम्मद सालिक कई बार जानलेवा हमला भी करवा चुके हैं।

जौनपुर पुलिस इस पूरे मामले को आपसी पैसे के लेनदेन का मामला बता रही है। जौनपुर पुलिस के अनुसार प्रभारी निरीक्षक शाहगंज द्वारा अवगत कराया गया कि पैसों के लेनदेन को लेकर दोनों पक्ष आपस में विवाद किए थे, जिसमें जितेन्द्र प्रजापति की तहरीर पर मो. सालिक के विरुद्ध एनसीआर पंजीकृत किया गया है। शांति व्यवस्था के दृष्टिगत दोनों पक्षों का चालान धारा 151/107/116 CrPC के अन्तर्गत किया गया है।

पीड़िता ने पुलिस के अब तक के एक्शन पर असंतोष जताते हुए कहा है कि कुछ भी हो जाए, वो मुस्लिम नहीं बनेंगी। आरोप है कि पीड़िता की तहरीर पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, उल्टे शांति भंग के नाम पर उनके ही पति जितेंद्र का चालान कर दिया गया।

सुनिए इस प्रकरण में पीड़िता का बयान और उस पर जौनपुर पुलिस का आधिकारिक जवाब-

आधिकारिक व सामाजिक रूप से धर्मांतरण भारत के हिन्दू समाज की एक विकराल समस्या बनी हुई है, जिसको रोकने के लिए तमाम शासकीय कदम उठाए जा रहे हैं। यहाँ गौर करने योग्य है कि अभी हाल में ही उत्तर प्रदेश के ही कानपुर में एक वरिष्ठ IAS अधिकारी इफ्तिखारुद्दीन का भी धर्मान्तरण कनेक्शन वायरल वीडियो के रूप में सामने आया था, जिसकी जाँच SIT कर रही है।

‘रामचंद्र की तरह तपस्वी राजा का यहाँ राज रहे’: कंगना रनौत ने की CM योगी से मुलाकात, मिला ‘अयोध्या वाला’ सिक्का

बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत ने शुक्रवार (1 अक्टूबर 2021) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके लखनऊ आवास पर मुलाकात की। इस दौरान सीएम योगी ने अभिनेत्री को ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) का गिफ्ट हैंपर तोहफे में दिया। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘एक जिला-एक उत्पाद’ (ODOP) का ब्रांड एंबेसडर बनाया है। अपर मुख्‍य सचिव (सूचना) नवनीत सहगल ने ट्वीट कर यह जानकारी दी है।

कंगना रनौत ने उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्‍यनाथ द्वारा किए गए कार्यों की प्रशंसा की। एक्ट्रेस ने प्रदेश में फ‍िल्‍म सिटी के निर्माण के लिए मुख्‍यमंत्री को धन्यवाद दिया। इस मुलाकात के दौरान सीएम योगी ने कंगना को स्‍मृति चिह्न भी भेंट किया और कहा कि वह अयोध्‍या आएँ तो भगवान श्रीराम के दर्शन जरूर करें। इस पर कंगना ने कहा, ”रामचंद्र की तरह तपस्वी राजा का यहाँ पर राज रहे और आपको बहुत शुभकामनाएँ।”

‘क्वीन’ फिल्म की एक्ट्रेस ने सीएम योगी के साथ मुलाकात और उनके द्वारा दिए गए स्‍मृति चिह्न की तस्वीर अपने इंस्टाग्राम अ​काउंट पर शेयर की है। उन्होंने अपनी मुलाकात के बारे में लिखा

”मैंने उत्तर प्रदेश सरकार को हमारी फिल्म (तेजस) की शूटिंग में सहयोग करने के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही माननीय मुख्यमंत्री को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए शुभकामनाएँ दीं। इस दौरान मैंने उनसे कहा कि हमारे पास उत्तर प्रदेश के एक तपस्वी राजा श्रीराम चंद्र थे और अब हमारे पास योगी आदित्यनाथ हैं, आपका शासन जारी रहे महाराज जी।”

कंगना ने आगे कहा, “उन्होंने मुझे एक सिक्का उपहार में दिया है, जो राम जन्म भूमि के पूजन में इस्तेमाल किया गया था। बहुत ही यादगार शाम रही धन्यवाद महाराज जी।”

मालूम हो कि स्वदेशी उत्पादों को खास पहचान दिलाने के लक्ष्य से उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी)’ परियोजना की शुरुआत की है। इसका उद्देश्‍य पारंपरिक उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए राज्‍य के सभी 75 जिलों के खास उत्पादों को इंडस्ट्री से जोड़ना है।

गौरतलब है कि कंगना इन दिनों अपनी फिल्म ‘थलाइवी’ को लेकर खासा सुर्खियों में ​हैं। ‘थलाइवी’ सिनेमा घरों में अपना कमाल दिखाने के बाद अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर स्ट्रीम हो गई है। फिल्म का हिंदी वर्जन Netflix पर 25 सिंतबर 2021 को रिलीज हो गया है। जल्द ही इसका तमिल और तेलुगू वर्जन भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया जाएगा।

घर में फैले टमाटर.. टूटी गाड़ियाँ.. नारेबाजी और हिंसा… कॉन्ग्रेस नेताओ, अब तो मुँह खोल कर बता दो असहिष्णु कौन?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अनर्गल बयान दिए जाते हैं। देश के सबसे लोकप्रिय नेता के करोड़ों समर्थकों में से एक ने भी किसी ऐसे नेता का घर नहीं घेरा। पश्चिम बंगाल में 200 से अधिक भाजपा कार्यकर्ता मार डाले गए। वहाँ की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बेख़ौफ़ दिल्ली जाती-आती हैं। शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ के संपादक के एग्जीक्यूटिव संजय राउत सांसद हैं। पीएम मोदी के खिलाफ फालतू बोलते रहते हैं, लेकिन निडर होकर दिल्ली में पार्टी करते हैं।

कॉन्ग्रेस नेताओं के मामले में ये अलग केस है। उनकी तो असल में कमाई का जरिया ही मोदी की आलोचना है। कभी प्रधानमंत्री की माँ को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की जाती है, कभी उनकी जाति को लेकर, कभी शैक्षिक योग्यता को लेकर, कभी उनके गुजराती होने को लेकर, कभी पत्नी को लेकर, कभी उद्योगपतियों का नाम लेकर, कभी राफेल पर, कभी देश के लिए नया संसद भवन बनवाने पर तो कभी कृषि सुधारों को लागू करने पर।

कुल मिला कर देखें तो नरेंद्र मोदी जब से गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तभी से उन्हें गालियाँ पड़ ही रही हैं। लेकिन, ये उनकी सहिष्णुता का प्रमाण ही है कि उन्होंने कभी भी पलट कर इस भाषा में जवाब नहीं दिया। हाँ, ऐसे लोगों में से कई को वो जनता के दरबार में सामने ज़रूर ले गए। मोदी सरकार की सहिष्णुता का ही सबूत है कि लाल किला पर चढ़ कर खालिस्तानी झंडा फहराया गया और ‘किसान आंदोलन’ में 300 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए, लेकिन उन्हें छुआ तक नहीं गया।

बाद में कानूनन कार्रवाई कुछ लोगों के खिलाफ हुई, लेकिन इसके असली गुनहगार आज भी जाट और सिख समुदायों के ठेकेदार बने बैठे हैं और अपना आंदोलन चला रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट से भले ही उन्हें फटकार लग रही हो, उन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। पीएम मोदी को गालियाँ तो इस ‘किसान आंदोलन’ में भी पड़ीं। साफ़ है कि राजग सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा कार्यकर्ता और समर्थक सबसे सहिष्णु हैं, सहनशीलता उनमें कूट-कूट कर भरी है।

कुछ मामलों में ये सही भी है तो कुछ मामलों में आलोचना से परे भी नहीं है। अब बात करते हैं कॉन्ग्रेस पार्टी की। कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने पंजाब में पार्टी के लिए सूखा समाप्त किया और मुख्यमंत्री बने। उन्हें हटाने के लिए नवजोत सिंह सिद्धू से बगावत करवाई गई और अंततः उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। फिर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना कर ‘दलित कार्ड’ खेला गया। इधर नई नियुक्तियों से नाराज़ सिद्धू ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा सौंप दिया।

इतनी नौटंकी हो गई, लेकिन कॉन्ग्रेस ने न कोई बैठक बुलाई और न बताया कि किसके आदेश से सब कुछ किया जा रहा है। ‘अंतरिम अध्यक्ष’ के भरोसे चल रही अपनी पार्टी पर काबिल सिब्बल ने सवाल क्या उठा दिया, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता उनके घर पहुँच हर और प्रदर्शन किया। उनके घर में टमाटर सहित कई चीजें फेंकी गईं, गाड़ियों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया और पुलिस के साथ झड़प हुई। उनके विरुद्ध पोस्टर लेकर पहुँचे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने जम कर नारेबाजी भी की।

अब शायद कपिल सिब्बल को पता चल रहा होगा कि असहिष्णु कौन है। सितंबर 2018 में यही कपिल सिब्बल असहिष्णुता का नारा लगाते हुए कह रहे थे कि जहाँ महात्मा गाँधी अहिंसा के लिए खड़े रहे, उनके विरोधियों ने हिंसा का रास्ता अपनाया। उन्होंने आरोप लगाया था कि RSS हिन्दू धर्म के वैभव को दूसरों से श्रेष्ठ मानता है, असहिष्णुता में भरोसा रखता है। आज कपिल सिब्बल बताएँ कि उनके घर के बाहर हिंसा करने वालों में से कितने संघ के लोग हैं और कितने भाजपाई हैं?

आनंद शर्मा की भी बात कर लें, जो दक्षिण अफ्रीका तक में भारत को बदनाम करने वाले संगठन व उसके कार्यक्रम का हिस्सा बनते हैं। मई 2014 में उन्होंने नरेंद्र मोदी को असहिष्णु बता दिया था। अब वो बताएँ कि 7 सालों से वो पीएम की आलोचना कर रहे, कितने भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनका घर घेरा? सितंबर 2016 में वो एक कदम और आगे बढ़े। उन्होंने कह दिया कि पीएम मोदी के DNA में ही बदले की भावना और असहिष्णुता है।

आज आनंद शर्मा इन कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की आलोचना कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने उनके साथी कपिल सिब्बल के घर के बाहर हिंसा की है। पी चिदंबरम और मनीष तिवारी ने भी उनके सुर में सुर मिलाया है। शर्मा ने कपिल शर्मा के बाहर कॉन्ग्रेस समर्थकों की ‘गुंडई’ का जिक्र करते हुए कहा है कि इससे पार्टी बदनाम हो रही है और कॉन्ग्रेस की संस्कृति हमेशा से अहिंसा और सहिष्णुता रही है। ये कोई नया मामला नहीं है। अब इन पर खुद पर आया है, इसीलिए ये चिल्ला रहे।

चिदंबरम की बात भी तो करनी ही पड़ेगी, जो प्रेस कॉन्फ्रेंस कर-कर के मोदी सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं और किस्म-किस्म के आरोप लगाते रहे हैं। आज तक उनके साथ हिंसा नहीं की भाजपा कार्यकर्ताओं ने। मार्च 2016 में उन्होंने असहिष्णुता बढ़ने का दावा करते हुए कहा था कि इससे महिलाओं व दलितों से भेदभाव हो रहा है। उनका दावा था कि घृणा फैलाने वाले असहिष्णुता को संस्थागत बना रहे हैं।

आज पी चिदंबरम से इतना सवाल तो बनता है कि कपिल सिब्बल के घर में टमाटर फेंकने वाले और गाड़ियों को तोड़फोड़ करने वाले किस संस्था के लोग थे? उन्होंने दावा किया था कि असहिष्णु समाज भारत के विकास को भी रोक देगा। गुंडई तो हमेशा से कॉन्ग्रेस की पहचान रही है, लेकिन उन्होंने तब अगर अपनी पार्टी में चल रही तानाशाही पर बोला होता तो शायद आज वो अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं से गाली नहीं खा रहे होते, जिन्हें सहिष्णु बताते-बताते उनकी उम्र गुजर गई।

आनंदपुर साहिब के सांसद मनीष तिवारी को कैसे छोड़ दें? सिख समुदाय के सबसे प्राचीन गढ़ से जीत कर आने वाले सांसद के गृह राज्य में हंगामा बरपा हुआ है, उन्हीं की पार्टी में, लेकिन उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं है। आज वो कपिल सिब्बल के घर के बाहर हुई घटना की निंदा करते हुए पूछ रहे हैं कि ये ‘गुंडई’ नहीं तो क्या है? उन्होंने तो 2012 में ही आरोप लगा दिया था कि कर्नाटक में भाजपा की सरकार आने के बाद से हिंसा और असहिष्णुता बढ़ी है।

इन सबके बीच गुलाम नबी आज़ाद को कैसे छोड़ दें, जिनके पीछे तो कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता तब से पड़े हैं जब से उन्होंने राज्यसभा में अपने कार्यकाल के अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की थी। मोदी की आलोचना में तो ज़िंदगी गुजर गई, लेकिन कभी उनके घर में किसी भाजपा कार्यकर्ता ने टमाटर नहीं फेंका। नवंबर 2015 में तो उन्होंने राजग सरकार पर असहिष्णुता के विनिर्माण तक का आरोप मढ़ दिया था।

इन नेताओं को अब आगे आकर इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे बड़े नेताओं की लगातार आलोचना के बावजूद आज तक किसी भाजपा कार्यकर्ता ने उनकी गाड़ी फोड़ी है? असहिष्णु कौन था और है – इसका भान उन्हें अब हो रहा है। लेकिन, RSS और भाजपा के करोड़ों सदस्यों ने उन्हें छुआ तक नहीं। एक बार हिम्मत दिखाइए, और कहिए कि कॉन्ग्रेसियों का चरित्र ही असहिष्णु है। वरना कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के पास टमाटर की कमी नहीं है।

‘नीनी हटवे’ बन कर देवबंद में रह रहा था रोहिंग्या अब्दुल्ला: फर्जी आधार कार्ड बरामद, मस्जिद में रह कर सीखी थी उर्दू

उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले राज्य के देवबंद में रह रहे अवैध रोहिंग्या के खिलाफ कार्रवाई की खबर सामने आ रही है। ‘रिपब्लिक’ की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, पहली बार अवैध रोहिंग्या के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है। यह चार्जशीट दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने यूपी के देवबंद में तकरीबन साढ़े तीन साल से रह रहे रोहिंग्याओं के खिलाफ दायर किया है।

बताया जा रहा है कि इसमें पुलिस ने आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, लेकिन इस पर अभी तक संज्ञान नहीं लिया गया है। जानकारी के मुताबिक अवैध रोहिंग्याओं के पास से फर्जी आधार कार्ड भी बरामद हुआ है।

रिपब्लिक ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि आरोपित नी नी हटवे उर्फ मोहम्मद अब्दुल्ला कई बार इंफाल जा चुका है। उसे इसी साल जनवरी में गिरफ्तार किया गया था। उसके आधार कार्ड में तमिलनाडु का पता था जबकि वह वहाँ का स्थानीय भाषा नहीं जानता था और सवालों के जवाब नहीं दे पाया। जिसके बाद उसकी गिरफ्तारी हुई। बताया गया कि उसका असली नाम नी नी हटवे है जबकि उसके आधार कार्ड पर मोहम्मद अब्दुल्ला का नाम था।

जानकारी के मुताबिक नी नी हटवे ने स्पेशल सेल के सामने आपना गुनाह कबूल कर लिया है और फर्जी आधार कार्ड बनाने के बारे में भी खुलासा किया। उसने बताया कि शफीक नाम के शख्स ने उसकी फर्जी आधार कार्ड बनवाने में मदद किया और उसी ने उसके लिए इंफाल के हवाई टिकट की भी व्यवस्था की थी। दरअसल नी नी हटवे टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था। यहाँ आकर वह मस्जिद में ठहरा और यूपी के देवबंद में उर्दू सीखा। यहीं पर उसकी मुलाकात शफीक से हुई थी। प्राप्त जानकारी के अनुसार स्पशेल सेल जल्द ही सप्लीमेंट्री चार्जशीट भी दाखिल करेगी।

गौरतलब है कि हाल ही में राजधानी दिल्ली के पास मदनपुर खादर में योगी सरकार ने रोहिंग्याओं के अवैध कब्जे से 150 करोड़ रुपए की जमीन खाली करवाई। ईद के अगले दिन, गुरुवार (जुलाई 22, 2021) की सुबह 4 बजे प्रशासन ने यह कार्रवाई की। रिपोर्ट में बताया गया कि सिंचाई विभाग की भूमि पर अवैध कब्जा करके रोहिंग्या कैंप बनाया गया था। इसी पर योगी सरकार ने बुलडोजर चलाकर जमीन को कब्जे से मुक्त करवाया। पूरी कार्रवाई में सिंचाई विभाग की 2.10 हेक्टेयर जमीन मुक्त की गई थी।

बता दें कि जिस मदनपुर खादर इलाके में यूपी सरकार की कार्रवाई हुई थी। वो इलाका ओखला विधानसभा में आता है और वहाँ के विधायक का नाम अमानतुल्लाह खान है। ऐसे में यूपी के जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह का कहना था कि वहाँ के विधायक ने कुछ अराजकता की है और उनके विरुद्ध शिकायत भी हुई है। राज्य मंत्री ने बताया था कि उक्त जमीन पर लोगों ने कब्जा करके अपने पक्के मकान बना लिए थे। इसके बाद स्थानीय सरकार की मदद से वहाँ रोहिंग्या लोगों को बसाया गया था।

साल भर सेक्युलरिज्म, दीवाली पर प्रदूषण: सरकारी आदेश जो ‘छठ’ पर निकलता है, ‘ईद’ पर फाइलों में बंद रहता है

हिन्दू त्योहारों के दिन आने वाले हैं। हिन्दुओं के दिन नहीं आते इसलिए वे त्योहारों के दिनों से ही संतुष्ट हो लेते हैं। बस लफड़ा तब होता है जब इस संतुष्टि में भी सरकारी तंत्र, यंत्र घुसाकर प्रदूषण का लेवल नापना शुरू कर देता हैं। फिर नाप तौल कर कहते हैं- हमारे शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत गिर गया है। शहर चाहे जितना घटिया रहे पर उसका एयर क्वालिटी इंडेक्स चकाचक होना चाहिए। इधर इंडेक्स देखकर पढ़े-लिखे हिंदू को ‘गिल्टी’ निकल आती है और वो गिल्ट के मारे मरने की तैयारी करने में भी नहीं हिचकता।

फिर क्या, सोशल मीडिया की शरण में पहुँच रोना शुरू कर देता है; देखिए, ग्लोबल वार्मिंग आज सबसे विकट समस्या है। मेरी बात पर विश्वास न हो तो ग्रेटा थन्बर्ग पर विश्वास कर लो। उधर फेलो हिंदू पोस्ट को लाइक कर ग्रेटा के यूट्यूब वीडियो में डूब जाता है और उसके ‘हाउ डेयर यू’ पर मन ही मन पसेरी भर ताली पीट देता है।

सरकारी विभाग का हाथ बँटाने दिल्ली के मुख्यमंत्री खुद उतर पड़े हैं। बाकी कामों में वे गिर लेते हैं पर ऐसे कामों में उतर पड़ते हैं। वे दो दिनों से ट्वीट कर बता रहे हैं कि प्रदूषण के विभिन्न मानकों की वैल्यू कैसे बढ़ गई है। सरकार की वैल्यू चाहे जो हो, हिंदू त्योहारों में प्रदूषण की वैल्यू बढ़ जाए तो उन्हें चैन मिलता है और वे मन ही मन गाते हैं- अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार।


हिंदू त्योहारों पर पर्यावरण विभाग के साथ नेता भी चौकन्ने हो जाते हैं और साल भर सेकुलरिज्म को लेकर चिंतित नेताजी इन दिनों प्रदूषण को लेकर चिंतित रहते हैं। राजनीतिक दल और उनके नेताओं की चिंता यात्रा कुवार महीने में शुरू होकर कार्तिक में ख़त्म हो लेती है, क्योंकि आगे क्रिसमस खड़ा रहता है।

आदेश निकलने लगे हैं। सरकारी आदेशों ने भी निकलने के लिए यही मौसम चुन रखा है। सर्दी अधिक नहीं रहती कि ठिठुरना पड़े और खाँसी-जुकाम की नौबत आए। लिहाजा वे नंग-धड़ंग निकल लेते हैं। निकल पड़े हैं खुली सड़क पर अपना सीना ताने टाइप। क्या कल्लोगे?

एक आदेश दिल्ली सरकार की फाइल से निकल कर विचरण कर रहा है। बता रहा है कि इस बार छठ पूजा सामान्य तरीके से नहीं मनाने देगा। अब पूजा है तो मनाने देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। ईद वगैरह की बात और है। तब ये आदेश न तो फाइल से निकलता और न ही कुछ कहता। पर यहाँ छठ पूजा की बात है लिहाजा किसी ‘छठे’ हुए अफसर ने आदेश को बोल दिया है; जाओ और पूजा पर रोक लगाकर आ जाओ। निश्चिन्त होकर जाओ, कोई तुम्हारा कुछ नहीं कर सकता।

बीएमसी ने दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमा की लंबाई-चौड़ाई निर्धारित कर दी है। घर में पूजा करनी है तो दो फुट और सार्वजनिक पूजा में चार फुट से अधिक नहीं। मानों घरों में स्थापित प्रतिमा दो फुट तक की रही तो वायरस हाथ जोड़कर खड़ा हो जाएगा और कहेगा; हे जगत जननी दुर्गे, महिषासुर की छाती से त्रिशूल निकाल हमारी छाती में भोंक दें तो हमें मोक्ष मिले। तभी हम पृथ्वी छोड़ सीधा स्वर्ग जाएँगे और यहाँ वापस नहीं आएँगे। ये हिंदू लोग बड़ी-बड़ी प्रतिमाएँ बनाते हैं। तभी तो हमें गुस्से में चीन से निकलना पड़ा। छोटी प्रतिमाएँ बनाते तो हमें ये तांडव करने की जरूरत क्यों पड़ती?

सार्वजनिक पूजा मंडलों में प्रतिमा चार फुट तक की रही तभी मुंबई में कानून का राज वापस आ पाएगा और अनिल देशमुख, परमबीर सिंह और सचिन वाजे के कारण सरकार की जो किरकिरी हुई है उसका असर तभी कम होगा।

पश्चिम बंगाल सरकार ने फरमान सुना दिया है कि दुर्गा पूजा पंडालों में पिछले वर्ष के सारे प्रतिबंध इस वर्ष भी यथावत लागू होंगे। क्यों न हो? हिंदुओं पर प्रतिबंध न हो तो संविधान के प्री-एम्बल में जिस सेकुलरिज्म की रक्षा की शपथ ली गई है, वो बेचारा छटपटाता रहेगा। उसकी रक्षा का हर प्रयास हिंदुओं पर प्रतिबंध से शुरू होकर उसी में ख़त्म होता है।

वैसे उसकी रक्षा भले हिंदुओं पर प्रतिबंध से होती है पर उसे मजबूती चुनावी हिंसा से ही मिलती है। दरअसल चुनावी हिंसा से लोकतंत्र को जीवन मिलता है। कोरोना का भी मन बहलना चाहिए। ईद के दौरान इसलिए बाहर नहीं आ पाया था, क्योंकि उन दिनों सरकारी दल के कैडर हिंसा और बलात्कार करने सड़कों पर उतर आए थे और कोरोना को उनसे डर लग रहा था। इसलिए जिद करके बैठ गया था कि मनाएगा तो केवल दुर्गा पूजा, इसके लिए चाहे जो हो जाए।

पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने घोषणा कर दी है कि लोगों को रावण का पुतला जलाने नहीं दिया जाएगा। ये भी सही है। पुतले की रक्षा होनी ही चाहिए। एक दो ही तो बचे हैं। एक रावण और दूसरा… मेरा मतलब पुतलों की रक्षा आवश्यक है। वैसे भी कई बार पुतलों में पटाखे भर दिए जाते हैं और यह जरूरी है कि इस मौसम में दिल्ली में बहने वाली हवा की गुणवत्ता की टेस्टिंग होनी चाहिए। प्रदूषण का नहीं पता पर हिंदू कंट्रोल में रहता है।

दीपावली के पटाखों से कुत्तों को तकलीफ होती है, ऐसा सोशल मीडिया पर जोर-शोर के साथ बताया जाता है। कुत्ते सेंसिटिव होते हैं और तकलीफ के लिए हमेशा तैयार भी।

अब इन फरमानों का कितना हिस्सा कोरोना महामारी के चलते हैं और कितना अन्य कारणों से, यह पिछले वर्ष की भाँति ही इस वर्ष के लिए भी शोध का विषय होगा।

एक अफसर बता रहे थे कि; पर्यावरण और प्रदूषण की बात हिंदू त्योहारों के मौके पर इसलिए की जाती हैं क्योंकि हिंदू त्योहारों की परम्पराएँ पंद्रह सौ सालों से अधिक पुरानी हैं और पर्यावरण विभाग वाले इन त्योहारों और पंद्रह वर्ष से अधिक पुरानी गाड़ियों को एक जैसा समझते हैं। उन्हें किसी प्रखर बाबू ने बता दिया है कि भारतवर्ष में सारा प्रदूषण इन्हीं दोनों की वजह से फैलता है। अफसर बेचारा मंत्र पढ़े जा रहा है; पंद्रह सालों से अधिक पुरानी गाड़ी नहीं रहने देंगे और पंद्रह सौ सालों से अधिक पुराने त्यौहार!

‘कॉन्ग्रेस बीमार पार्टी, बुजुर्ग नेताओं का BJP से समझौता’: शिवसेना ने अपने साथी को दी कड़वी ‘टॉनिक’ – बनाओ स्थायी अध्यक्ष

पंजाब कॉन्ग्रेस में चल रहे संकट को लेकर महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस की सहयोगी पार्टी शिवसेना ने उस पर निशाना साधा है। शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा है कि पंजाब में जो कुछ हो रहा है उससे साफ है कि कॉन्ग्रेस ‘बीमार’ हो गई है। पंजाब, उत्तर प्रदेश और गोवा में कॉन्ग्रेस के कई वफादार नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। शिवसेना ने पूछा है कि इस वक्त कॉन्ग्रेस अध्यक्ष कहाँ हैं? पंजाब में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ बगावत कर दी है। वह अगले कुछ दिनों में अपनी नई पार्टी बनाने वाले हैं।

शिवसेना ने अपने इस संपादकीय शीर्षक का नाम ‘कॉन्ग्रेस का टॉनिक’ दिया है। 

‘सामना’ में लिखा है, “कॉन्ग्रेस पार्टी बीमार है। इसके लिए इलाज भी चल रहा है, परंतु यहाँ गलत है क्या? इसका विचार किया जाना चाहिए। कॉन्ग्रेस पार्टी उफान मारकर उठे, मैदान में उतरे, राजनीति में नई चेतना की बहार लाए, ऐसे लोगों की भावना है। इसके लिए कॉन्ग्रेस को पूर्णकालीन अध्यक्ष ही चाहिए। दिमाग नहीं होगा तो शरीर का क्या लाभ? सिद्धू, अमरिंदर जैसों की खुशामद करने में कोई लाभ नहीं है।”

आगे लिखा कि राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अंदर बुजुर्गों और युवाओं को साथ ले चलने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन कुछ बुजुर्ग नेताओं को यह नहीं पता है कि नए लोग किस तरह से काम करते हैं। वे लोग आलाकमान की आलोचना शुरू कर देते हैं। यह तय है कि इन्हीं लोगों ने भाजपा के साथ गुप्त समझौता किया हुआ है। 

इसमें कहा गया कि कॉन्ग्रेस में कुई युवा, पूर्णकालिक अध्यक्ष की माँग कर रहे हैं। उनकी माँग गलत नहीं है। क्योंकि जैसे बिना सिर वाले शरीर का कोई फायदा नहीं होता वैसे ही बिना अध्यक्ष वाली पार्टी भी किसी का मुकाबला कैसे कर सकती है। इस सवाल का गाँधी परिवार को देना चाहिए कि उनमें से कौन है जो नेतृत्व के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी को स्थायी पार्टी अध्यक्ष पर बने संशय को खत्म करना चाहिए। 

सामना में कहा गया कि कॉन्ग्रेस ने पंजाब में एक दलित को मुख्यमंत्री बनाकर बहुत बड़ा कदम उठाया था। लेकिन, पार्टी के ही नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने राहुल गाँधी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी। उन्होंने कहा कि पार्टी को ऐसे व्यक्ति को न तो ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए और न ही भरोसा जताना चाहिए, जिसने हाल ही में पार्टी ज्वाइन की हो। उन्होंने कहा कि पार्टी में स्थायी अध्यक्ष होना जरूरी है, जो ऐसे बड़बोले नेताओं के मुँह को बंद करा सके। 

गौरतलब है कि पंजाब में कॉन्ग्रेस के लिए विचित्र एवं संकटपूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। दरअसल, चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए उसने कैप्टन से इस्तीफा दिलवाया लेकिन इसके कुछ दिनों बाद प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अपना त्यागपत्र दे दिया। सियासी गलियारों में ऐसी चर्चा है कि कैप्टन को सत्ता से बाहर निकालने में सिद्धू की अहम भूमिका रही है। सीएम पद से इस्तीफा दिलाकर पार्टी आलाकमान ने जिस तरह से अमरिंदर से पल्ला झाड़ा, इसे कैप्टन अपने लिए अपमान मान रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि अब वह कॉन्ग्रेस में नहीं रहेंगे बल्कि अपनी पार्टी बनाएँगे।