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अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की अमर मिसाल प्रीतिलता वड्डेदार: महज 21 साल की उम्र में देश के लिए दिया सर्वोच्च बलिदान

भारत का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिसमें देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अदम्य साहस, वीरता, धैर्य और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया। ऐसे कुछ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में स्थान दिया गया, जबकि अधिकतर को उचित पहचान नहीं मिल सकी। इसके कारण मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले वीर स्वतंत्रता सेनानी भी गुमनामी में चले गए। ऐसा ही मामला बंगाल की पहली महिला बलिदानी प्रीतिलता वड्डेदार/वादेदार (Pritilata Waddedar) का रहा है। उन्होंने 23 सितंबर 1932 को सर्वोच्च बलिदान दिया था।

चिटगाँव (वर्तमान बांग्लादेश) में 5 मई 1911 को जगबंधु वड्डेदार और प्रतिभा देवी के घर जन्मी प्रीतिलता बचपन से ही मेधावी छात्रा थीं। उनके पिता नगरपालिका में क्लर्क थे। आय कम होने के कारण परिवार का मुश्किल से गुजारा चलता था। भले ही परिवार की आर्थिक हालत सही नहीं थी, लेकिन जगबंधु वड्डेदार ने अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा दी। वह अक्सर बेटी प्रीतिलता से कहते थे, “मेरी उम्मीदें तुमसे जुड़ी हुई हैं”। प्रीतिलता ने पहली बार चिटगाँव के खस्तागीर बालिका विद्यालय में एक छात्रा के तौर पर अपनी विलक्षण बुद्धि का प्रदर्शन किया था।

प्रीतिलता ने 1927 में अपनी मैट्रिक और 1929 में इंटरमीडिएट की परीक्षा दी। वह ढाका बोर्ड में नंबर वन आई थीं। इंटर के बाद प्रीतिलता ने दर्शनशास्त्र में स्नातक करने के लिए कोलकाता के बेथ्यून कॉलेज में एडमिशन लिया। यह वही समय था जब उनके पिता की नौकरी चली गई और घर की सारी जिम्मेदारी प्रीतिलता के कंधों पर आ गई। हालाँकि, कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखी, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी डिग्री रोक दी। बाद में मरणोपरांत 22 मार्च 2012 को कोलकाता विश्वविद्यालय ने उन्हें डिग्री प्रदान किया।

क्रांतिकारी संगठनों से जुड़ाव

ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रीतिलता चिटगाँव वापस आ गईं और वो नंदनकरण अपर्णाचरण स्कूल नामक एक हाई स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बन गईं। ईडन कॉलेज से जब वो इंटरमीडिएट कर रही थीं तो उसी दौरान प्रीतिलता ने क्रांतिकारी गतिविधियों में गहरी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी थी। बाद में वो स्वतंत्रता सेनानी लीला नाग के दीपाली संघ में में शामिल हो गईं। 1930 का दशक था जब बंगाल ने गाँधी के अहिंसा के विचारों का परित्याग कर दिया। इसके बाद वहाँ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई को बढ़ावा देने वाले क्रांतिकारी संगठनों ने अपनी जगह ले ली।

उन्हीं दिनों में मास्टरदा सूर्य सेन और निर्मल सेन की मुलाकात उनके एक क्रांतिकारी भाई ने प्रीतिलता वड्डेदार से करवाई। ये उन दिनों की बात थी जब महिलाओं को क्रांतिकारी समूहों में शामिल किया जाना दुर्लभ था। लेकिन मास्टरदा ने प्रीतिलता को न केवल अपने संगठन में शामिल किया, बल्कि उन्हें लड़ने और हमलों का नेतृत्व करने के लिए भी प्रशिक्षित किया। हालाँकि, सूर्य सेन द्वारा चलाए जा रहे जुगंतर समूह के ढलघाट शिविर में प्रीतिलता के शामिल होने से साथी क्रांतिकारी नेता बिनोद बिहारी चौधरी नाराज हो गए। लेकिन सेन को इस बात का पता था कि बिना किसी के शक के एक महिला हथियारों का ले जा सकती है।

यही कारण था कि शुरू में संगठन में उनका इस्तेमाल केवल ब्रिटिश अधिकारियों को चकमा देने के लिए किया गया था। लेकिन बाद में उनके रैंक को बढ़ा दिया गया। चिटगाँव स्थित शस्त्रागार में 18 अप्रैल 1930 छापा मारा गया और उस दौरान प्रीतिलता वड्डेदार ने सफलतापूर्वक टेलीफोन लाइनों, टेलीग्राफ कार्यालय को नष्ट कर दिया। वह सूर्य सेन और क्रांतिकारी रामकृष्ण बिस्वास से भी प्रभावित थीं। क्रांतिकारी रामकृष्ण विश्वास उस दौरान रेल अधिकारी तारिणी मुखर्जी की गलती से हत्या करने के आरोप में अलीपुर सेंट्रल जेल में सजा काट रहे थे। दरअसल, वो चिटगाँव के पुलिस महानिरीक्षक क्रेग की हत्या करना चाहते थे, लेकिन गलती से रेल अधिकारी की हत्या हो गई।

संकल्पों पर सदैव अडिग रहीं

चकमा देने की कला में माहिर प्रीतिलता वड्डेदार बिना किसी शक के करीब 40 बार जेल में बिस्वास से मिली थीं। प्रीतिलता आसानी से उनकी बड़ी बहन बनकर जेल में चली जाती थीं। वर्ष 1931 में अंग्रेजों ने बिस्वास को फाँसी दे दी। उस घटना ने प्रीतिलता के क्रांतिकारी विचारों को और अधिक बल दिया। स्वतंत्रता सेनानी कल्पना दत्ता ने अपनी पुस्तक ‘चटगाँव आर्मरी रेडर्स: रिमिनिसेंस’ में प्रीतिलता वड्डेदार के साथ अपने अनुभव साझा किए हैं।

किताब का स्क्रीनशॉट

किताब में कल्पना दत्ता ने खुलासा किया था कि किस तरह से दुर्गा पूजा के दौरान प्रीतिलता बकरे की बलि देने के लिए तैयार नहीं थीं तो उनके साथी क्रांतिकारियों ने सशस्त्र संघर्ष में उनकी क्षमता पर सवाल उठाया। उन लोगों ने प्रीतिलता से सवाल किया था, “आप देश की आजादी भी अहिंसक तरीके से लड़ना चाहती हैं या क्या?” इस पर उन्होंने जवाब दिया, “जब मैं देश की आजादी के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार हूँ, तो जरूरत पड़ने पर किसी की जान लेने में मैं जरा भी नहीं हिचकिचाऊँगी।” यह घटना उनके दिल में जल रही देशभक्ति की आग और उनके दृढ़ संकल्प को दिखाती थी।

यूरोपियन क्लब पर बोला धावा

13 जून 1932 का दिन था और प्रीतिलता वड्डेदार सूर्य सेन से मिलने गईं थीं, उसी दौरान उनके ठिकाने को ब्रिटिश सैनिकों ने घेर लिया। दोनों तरफ से लड़ाई शुरू हो गई। उस दिन प्रीतिलता बाल-बाल बच गईं और वहाँ से निकलने में सफल रहीं। प्रीतिलता की गतिविधियों को लेकर ब्रिटिश अधिकारी भी सतर्क हो गए और उन्होंने उन्हें ‘मोस्ट वांटेड’ क्रांतिकारियों की लिस्ट में डाल दिया। इसके बाद सूर्य सेन ने प्रीतिलता को अंडरग्राउंड रहने का निर्देश दिया और संगठन दूसरी योजनाओं पर काम करने लगा। दरअसल, मास्टरदा पहाड़ताली यूरोपियन क्लब नाम के एक नस्लवादी और श्वेत वर्चस्ववादी क्लब को निशाना बनाना चाहते थे। भारतीयों से ये इतनी नफरत करता था कि क्लब के बाहर नोटिस बोर्ड पर लिखा गया था, ‘कुत्तों और भारतीयों को इजाजत नहीं है।’

पहाड़ताली य़ूरोपियन क्लब (साभार: विकीमीडिया)

23 सितंबर 1932 का दिन था, जब प्रीतिलता वड्डेदार समेत कई अन्य क्रांतिकारियों को पहाड़ताली यूरोपियन क्लब पर हमला कर उसे नष्ट करने का जिम्मा सौंपा गया। इसके तहत प्रीतिलता को 40 लोगों के ग्रुप का लीडर बनाया गया। मिशन को अंजाम देने के लिए प्रीतिलता ने खुद पंजाबी का रूप धरा और उनके बाकी के साथियों ने शर्ट और लुंगी पहनी थी। रात के करीब 10:45 बजे क्रांतिकारियों ने क्लब को चारों ओर से घेरकर उसमें आग लगा दी। इस दौरना एक महिला और चार पुरुषों की भी मौत हो गई। इस बीच क्लब के अंदर तैनात पुलिस अधिकारियों ने भी जवाबी हमले किए।

वीरगति ने कइयों को दी प्रेरणा

गोली लगने से प्रीतिलता घायल हो गईं। अंग्रेजों की पकड़ में आने से बचने के लिए उन्होंने पोटैशियम सायनाइड की गोली खा ली। 21 वर्ष की अल्पायु में उनके दिए गए बलिदान ने बंगाल में दूसरे क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का काम किया। कल्पना दत्ता ने अपनी पुस्तक में बताया कि कैसे प्रीतिलता वड्डेदार को पोटैशियम सायनाइड कैप्सूल देने के सूर्य सेन खिलाफ थे।

किताब का स्क्रीनशॉट

मास्टरदा ने उस घटना को लेकर बताया, “मैं आत्महत्या में विश्वास नहीं करता। लेकिन जब वह अंतिम विदाई देने आईं तो उन्होंने मुझसे जबरन पोटैशियम सायनाइड ले लिया। वह बहुत जल्दबाजी में थीं और युद्ध के दौरान फँस जाने की स्थिति में इसकी आवश्यकता के बारे में अच्छे तर्क कर रही थीं। मैं उसके आगे टिक नहीं सका। मैंने उसे दिया।”

किताब का स्क्रीनशॉट

अपने बलिदान के जरिए प्रीतिलता वड्डेदार ने बंगाल की महिलाओं को संदेश दिया कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए वे पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकती हैं। अपनी किताब में कल्पना दत्ता बताती हैं कि कैसे प्रीतिलता वड्डेदार को हुए नुकसान के कारण उनके माता-पिता तबाह हो गए थे। वह बताती हैं, “चिटगाँव के लोग प्रीति या उनके महान बलिदान को नहीं भूले हैं। वे उनके पिता की ओर इशारा कर किसी भी अजनबी को बताते हैं- ये उस पहली लड़की के पिता हैं, जिसने हमारे देश के लिए अपनी जान दी।”

सन्दर्भ: Dutt, K. (1945). Chittagong Armoury Raiders: Reminiscences. India: People’s Publishing House

‘बड़ी जात की हो तो जम जाता है’: ब्राह्मण-क्षत्रिय लड़कियों को निशाना बना रहा था मौलाना कलीम सिद्दीकी, वायरल हुआ ऑडियो

लालच देकर व धोखे से इस्लामी धर्मांतरण करने वाले गिरोह के मौलाना कलीम सिद्दीकी को गिरफ्तार किया गया है। अब उसके एक ऑडियो से खुलासा हुआ है कि ब्राह्मण-क्षत्रिय लड़कियों को खास कर के निशाना बनाया जा रहा था। ‘जिहादी’ सोच वाले मौलाना कलीम सिद्दीकी का पाकिस्तान से भी कनेक्शन सामने आया है। वो चाहता था कि हर एक हिन्दू को धर्मांतरण कर के इस्लाम अपना लेना चाहिए। विदेशी फंडिंग का भी खुलासा हुआ है।

वायरल ऑडियो में वो एक अन्य मौलाना के साथ ब्राह्मण लड़कियों के धर्मांतरण की बात कर रहा है। इसमें वो कहता है, “इंशा अल्लाह.. इंशा अल्लाह! कोई कहेगा वो छोटी जात की है। उन्होंने हमें लिख कर भेजा था और कहा था कि छोटी जात का है तो नहीं बदलवाने का। बड़ी जात, जैसे कि क्षत्रिय-ब्राह्मण होगी तो जम जाता है।” ‘इस्लामी दावा सेंटर’ के मौलाना उमर गौतम ने इसकी पोल खोली, जो पहले ही पुलिस के शिकंजे में है।

भारतीय इस्लाम की दुनिया में मौलाना कलीम सिद्दीकी एक बड़ा नाम है और कई तकरीरों में उसे बुलाया जाता है। उसकी सभाओ में मुस्लिम समाज के प्रतिष्ठित लोग आते रहे हैं और यूट्यूब पर हजारों लोग उसे सुनते रहे हैं। काफी पढ़े-लिखे मौलाना कलीम सिद्दीकी को उसके करीबी काफी मृदुभाषी बताते हैं, लेकिन उसकी करतूतें इसके एकदम विपरीत हैं। 64 वर्षीय मौलाना ने मेरठ से विज्ञान में स्नातक किया हुआ है।

मौलाना कलीम सिद्दीकी की तमन्ना है कि पूरी धरती को मुस्लिम बना दिया जाए। धर्मांतरण के लिए नियम-कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए उसने अब तक 5 लाख लोगों को अपना शिकार बनाया है। मेरठ के लिसाडीगेट थाना इलाके से गिरफ्तार किया गया मौलाना कलीम सिद्दीकी जमीयत-ए-वलीउल्लाह और ग्लोबल पीस सेंटर का अध्यक्ष है, जिसे विदेश से हवाला के जरिए अवैध फंडिंग प्राप्त होती थी।

अब तक उसके द्वारा 3 करोड़ रुपए की विदेशी फंडिंग प्राप्त करने की बात पता चला चली है, जिसमें से आधे बहरीन से आए हैं। उधर ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ में उसके समर्थन में तनाव का माहौल है। छात्रों ने उसकी गिरफ़्तारी के विरुद्ध प्रदर्शन किया। सोशल मीडिया पर पोस्टर्स डाल कर ऐलान किया कि जुमे की नमाज के बाद जामा मस्जिद से बाब-ए-सैयद तक विरोध मार्च निकाला जाएगा और विश्वविद्यालय प्रशासन के माध्यम से जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपा जाएगा।

उधर विनोद नाम के एक वयक्ति ने मौलाना कलीम सिद्दीकी और उसके पाँच अन्य साथियों के खिलाफ जबरन धर्मांतरण का मामला दर्ज करवाया है। उसने बताया है कि 2011 में वह अपने परिवार के साथ सेक्टर-17 की प्रेम नगर की झुग्गियों में रहता था। उसके पड़ोस में कुछ मुस्लिम रहते थे जो इस्लाम का महिमामंडन कर हिंदू धर्म की बुराई करते थे। विनोद के मुताबिक, आरोपित उसे बीच-बीच में पैसे और अन्य जरूरी सामान भी दिया करते थे। इस्लामी तालीम के लिए गुजरात और उत्तर प्रदेश भी भेजा गया।

PM मोदी से मुलाकात में खुद कमला हैरिस ने ‘पाकिस्तानी आतंकवाद’ पर की बात: कोरोना, अफगानिस्तान सहित कई अन्य मसलों पर भी चर्चा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय अपने अमेरिकी दौरे पर हैं। इस दौरान उन्होंने वहाँ हाल में अमेरिका की उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात की है। इस द्विपक्षीय मुलाकात में दोनों देश के नेताओं ने कई मुद्दों पर बात की। साल 2021 के जून माह में फोन पर हुई बातचीत को याद करते हुए दोनों देशों के नेताओं ने अफगानिस्तान सहित हाल के वैश्विक विकास मुद्दों पर चर्चा की और हिंद प्रशांत क्षेत्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की। एकांत बैठक और प्रतिनिधि मंडल स्तर की बैठक के बाद पीएम मोदी ने कमला हैरिस को भारत आने का न्योता भी दिया।

इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस ने आतंकवाद का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि वहाँ (पाकिस्तान की सरजमीं पर) कई आतंकी संगठन सक्रिय हैं और इस बाबत उन्होंने पाकिस्तान को कहा भी है कि वो इनके विरुद्ध एक्शन लें, ताकि अमेरिका और भारत की सुरक्षा पर कोई असर न पड़े।

विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने जानकारी देते हुए कहा, “जब आतंकवाद का मुद्दा आया तो उपराष्ट्रपति ने स्‍वयं इस मामले (आतंकवाद) में पाकिस्तान की भूमिका का उल्लेख किय।” श्रृंगला के अनुसार, हैरिस ने कहा कि पाकिस्तान में आतंकवादी समूह काम कर रहे थे।

कमला हैरिस के उप-राष्ट्रपति बनने पर पीएम मोदी ने कहा, “अमेरिका के उपराष्ट्रपति के रूप में आपका चुनाव एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक घटना रही है। आप विश्व भर में बहुत से लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं और मुझे विश्वास है कि राष्ट्रपति जो बायडेन एवं आपके नेतृत्व में हमारे द्विपक्षीय संबंध नई ऊँचाई छुएँगे।” पीएम मोदी ने उन्हें भारत आने के लिए आमंत्रित किया। वह बोले, “भारत के लोग आपका स्वागत करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं आपको भारत आने का निमंत्रण देता हूँ।”

उल्लेखनीय है कि इससे पहले पीएम मोदी ने दुनिया की 5 दिग्गज कंपनियों के प्रमुखों से चर्चा की थी। इनमें क्वालकॉम के प्रेसिडेंट और सीईओ क्रिस्टियानो एमॉन, एडोब के सीईओ शांतनु नारायण, फर्स्ट सोलर के सीईओ मार्क विडमर, जनरल एटॉमिक्‍स के चेयरमैन और सीईओ विवेक लाल और ब्‍लैकस्‍टोन के चेयरमैन और सह-संस्‍थापक स्टीफन श्वार्जमैन शामिल थे।

इसके अतिरिक्त पीएम मोदी ने गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन से मुलाकात की थी। इसके बाद मोदी ने ट्वीट कर कहा कि मॉरिसन उनके दोस्त हैं और उनसे बात कर उन्हें हमेशा अच्छा लगता है। पीएम ने जानकारी दी कि वाणिज्य,व्यापार,ऊर्जा के क्षेत्र में विस्तार से बात की गई।

स्कॉट मॉरिसन के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कमला हैरिस के बाद जापान के पीएम योशिहिदे सुगा के साथ भी बैठक की। उस बैठक के दौरान कई द्विपक्षीय मुद्दों पर विस्तार से बात की गई। ये पीएम मोदी की योशिहिदे सुगा के साथ पहली मुलाकात है। इससे पहले सिर्फ फोन के जरिए ही दोनों नेताओं के बीच बात हुई थी।

गुड न्यूज! मोदी राज में नई ऊँचाई पर बाजार, सेंसेक्स पहली बार 60000 के पार; कोरोना वैक्सीनेशन 84 करोड़ के पार

सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन शुक्रवार (24 सितंबर 2021) को बाजार बेहद मजबूती के साथ खुले। सेंसेक्स ने खुलते ही इतिहास रच दिया और पहली बार 60 हजार के पार गया। दूसरी ओर देश में अब तक 84,15,18,026 लोगों को कोरोना का टीका लग चुका है। बीते 24 घंटे में 72 लाख 20 हजार 642 लोगों को टीका लगा है।

वैश्विक कोरोना संक्रमण से अर्थव्यवस्था के उबरने के भी संकेत मिलने लगे है। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) आज 325.71 अंक की तेजी के साथ 60211.07 के स्तर पर खुला। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 93.30 अंकों की तेजी के साथ 17916.30 के स्तर पर खुला।

शुरुआती कारोबार में बैंक और आईटी के शेयरों में तेजी देखने को मिली। सबसे ज्यादा फायदे में इन्फोसिस का शेयर रहा। मोदी राज में बाजार का यह नया रिकॉर्ड है। जब मोदी पहली बार सत्ता में आए थे तो सेंसेक्स 25 हजार के पार पहुँचा था। इसके करीब सात साल बाद इसी साल 21 जनवरी को सेंसेक्स ने 50 हजार के अंक को पार किया था। यहाँ से 60 हजार के स्तर को पार करने में सेंसेक्स को केवल नौ महीने लगे हैं।

दूसरी तरफ ताजा आँकड़ों के अनुसार देश में कोरोना संक्रमण से 318 और मौतें हुई है। इनमें से 182 मौत अकेले केरल से सामने आई है। इसके साथ ही मरने वालों की संख्या बढ़कर 4,46,368 हो गई। पिछले 24 घंटे में देश में कोरोना के 31,382 नए मामले सामने आए हैं। 32,542 लोग स्वस्थ हुए हैं। नए मामलों में से 19682 अकेले केरल से हैं। फिलहाल देश में कोरोना के 3,00,162 एक्टिव केस हैं। अब तक 3,28,48,273 लोग स्वस्थ हो चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के सक्रिय मामले अब घटकर 0.89% हो गए हैं। मार्च 2020 के बाद से संक्रमितों का यह सबसे कम आँकड़ा है। इसी तरह रिकवरी रेट भी 97.78 प्रतिशत हो गया है। यह भी मार्च 2020 के बाद सबसे ज्यादा है।

5000 साल पुराना शिव मंदिर-30000 एकड़ जमीन, कब्जा हटाने गई पुलिस पर ‘बांग्लादेशियों’ का हमला: असम में क्या हुआ, देखे Video

असम के दारंग जिले में गुरुवार (23 सितंबर 2021) को जमीन से कब्जा हटाने गई पुलिस को हमले के बाद फायरिंग करनी पड़ी। इस घटना में 2 लोगों की मौत और 9 पुलिसकर्मी जख्मी हो गए हैं। एक फोटोग्राफर को भी हिरासत में लिया गया है जिसका वीडियो गुरुवार को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। घटना की सीआईडी जाँच के आदेश दिए गए हैं। सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर लोग बता रहे हैं कि किस तरह जमीन पर कब्जा जमाए बांग्लादेशियों ने सुनियोजित तरीके से पुलिस को निशाना बनाया, जिससे पुलिस फायरिंग को मजबूर हुई।

असम के डीजीपी ने देर रात ट्वीट कर बताया कि सिपाझार में उन्होंने जमीनी हालात का जायजा लिया। उन्होंने जानकारी दी कि जो कैमरामैन वीडियो में घायल को मारते देखा गया था वह फिलहाल असम सीआईडी की कस्टडी में है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा ने सीआईडी को जाँच के आदेश दिए हैं।

बिस्वा सरकार में मंत्री अशोक सिंगला ने कहा है कि प्रशासन की ओर से अतिक्रमण हटवाने की कार्रवाई हजारों साल पुराने हिंदू मंदिर को सुरक्षित करने के लिए की गई थी जहाँ अवैध रूप से कब्जा किया गया था। उन्होंने लिखा, “मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा के नेतृत्व वाली हमारी सरकार गरुखुटी, सिपाझार, दारंग जिले के 5000 साल पुराने विरासत हिंदू मंदिर की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।” सिंगला ने कहा, “हम अपनी सभी प्राचीन संरचनाओं और मंदिरों को अतिक्रमण मुक्त असम के लिए काम करने का संकल्प लेते हैं, जिन्हें अवैध अप्रवासियों द्वारा कब्जा कर लिया गया है।”

वॉयस ऑफ असम ने एक वीडियो शेयर करके दावा किया है कि हजारों बीघा जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के पूर्व ही वहाँ के लोग पुलिस पर हमला करने को तैयार थे। साझा की गई वीडियो में देख सकते हैं कि हजारों की भीड़ मुर्दाबाद, हाय-हाय के नारे लगा रही है।

लाठी डंडों से हमला

पत्रकार अभिजीत मजूमदार भी 1 मिनट का एक वीडियो साझा कर बताया है कि पूरे भारत में एनआरसी की जरूरत क्यों है। वह लिखते हैं, “अतिक्रमणकारियों और घुसपैठियों की इस जानलेवा भीड़ से असम पुलिस को डील करना था। यही कारण है कि पूरे भारत में एनआरसी लागू किया जाना चाहिए। बहुत बढ़िया हिमंत बिस्वा।”

अभिजीत मजूमदार द्वारा साझा की गई वीडियो में देख सकते हैं कि पुलिस के पीछे कई लोग लाठी डंडा बड़े-बड़े फट्टे लेकर दौड़ रहे हैं। अंधाधुंध बिन सोचे हमला हो रहा है। पुलिस उन्हें रोकने का प्रयास कर रही है। जगह-जगह तोड़फोड़ की जा रही है। पत्थर उछाले जा रहे हैं।

आत्मरक्षा में चलाई गोलियाँ: असम पुलिस

इसी झड़प के बाद पुलिस बल की ओर फायरिंग की गई जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। दारंग के एसपी सुसांत बिस्वा सरमा ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में इस कार्रवाई को आत्मरक्षा करार दिया है। उन्होंने बताया कि परेशानी तब शुरू हुई जब धारदार हथियारों से लैस प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों और आम लोगों पर हमला बोल दिया। सुशांत बिस्वा सरमा ने बताया कि पुलिस के जवानों ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। दोनों पक्षों में हुई झड़प में कम से कम 10 लोग घायल हो गए। घायलों में अधिकांश पुलिसकर्मी हैं।”

असम पुलिस पर किया गया हमला

इससे पूर्व मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था, “पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं। इसमें दो आम नागरिकों की मौत हो गई है। हिंसा में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हैं इनमें अस्टिटेंट सब इंस्पेक्टर मोनिरुद्दीन की स्थिति गंभीर बताई जा रही है। उन्हें गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज शिफ्ट कर दिया गया है। मृतकों की पहचान सद्दाम हुसैन और शेख फरीद के रूप में हुई है।”

बता दें कि कि धौलपुर 25000 एकड़ भूमि के साथ करीब 5000 साल पुराने शिव मंदिर और गुफा वाला क्षेत्र है। ऑपइंडिया को सूत्रों के हवाले से यह जानकारी मिली कि फिलहाल यह क्षेत्र अतिक्रमण के अधीन है और धीरे-धीरे और अधिक लोग आ रहे हैं। बाहरी लोगों के आने से वहाँ के स्थानीय लोग पूरी तरह से तबाह हो गए हैं। लूट और डकैती का सिलसिला लगातार जारी है। हमारे सूत्र ने यह भी दावा किया है कि अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान करीब 10,000 से अधिक लोगों ने पुलिस पर हमला किया। जो सभी के सभी मुस्लिम अप्रवासी बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है उन्होंने वहाँ 30000 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया है।

इसी क्रम में सरमा सरकार ने बेदखली की पहल की जिसके लिए स्थानीय मुस्लिमों के साथ चर्चा भी की गई। उन्हें भूमि नीति के अनुसार भूमि देने का वादा किया गया था। जिससे वे सहमत हैं। पिछले दो दिनों तक अतिक्रमण हटाने का अभियान शांतिपूर्ण रहा। लेकिन गुरुवार को 10,000 लोगों ने पुलिस पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने फायरिंग की 2 लोगों की मौत हो गई और करीब 9-10 घायल बताए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। इस झड़प के पहले से राज्य सरकार सभी मुस्लिम संगठनों के संपर्क में है ताकि स्थिति सामान्य रहे।

‘मुस्लिम बने तो नर्क में नहीं जाओगे’: 9वीं के छात्र रहे विनोद को मस्जिद में गले लगा कलीम सिद्दीकी ने बना दिया नूर मुहम्मद

उत्तर प्रदेश एटीएस ने धर्मांतरण मामले में 21 सितंबर 2021 को मौलाना कलीम सिद्दीकी को गिरफ्तार किया था। वह 10 दिनों की पुलिस रिमांड पर है। एटीएस ने एक बयान में बताया था कि मौलाना सिद्दीकी अपने मदरसों, सामाजिक और मजहबी संस्थानों की आड़ में देशव्यापी धर्मांतरण का रैकेट चला रहा था और इसके लिए उसे विदेश से फंडिंग भी मिल रही थी।

उसकी गिरफ्तारी के बाद से ही मीडिया रिपोर्टों से लगातार चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। इस बीच फरीदाबाद के सेक्टर-17 थाने में विनोद नाम के एक शख्स ने खुद का धर्म परिवर्तन कराए जाने को लेकर शिकायत दर्ज कराई है। फरीदाबाद पुलिस के प्रवक्ता सूबे सिंह ने बताया है, “एक व्यक्ति ने शिकायत कर कहा है कि 5-6 लोगों ने बातों में फँसाकर उसका धर्म परिवर्तन किया। उन लोगों ने उसे मस्जिद में मौलवी के द्वारा कलमा पढ़वाया। FIR दर्ज कर कार्रवाई की जा रही है। मामले में जाँच जारी है।”

रिपोर्टों में बताया गया है कि विनोद ने मौलाना कलीम सिद्दीकी और उसके पाँच अन्य साथियों के खिलाफ जबरन धर्मांतरण का मामला दर्ज करवाया है। उसने बताया है कि 2011 में वह अपने परिवार के साथ सेक्टर-17 की प्रेम नगर की झुग्गियों में रहता था। उसके पड़ोस में कुछ मुस्लिम रहते थे जो इस्लाम का महिमामंडन कर हिंदू धर्म की बुराई करते थे।

विनोद के मुताबिक आरोपित उसे बीच-बीच में पैसे और अन्य जरूरी सामान भी दिया करते थे। उसके अनुसार उसे दिल्ली के शाहीनबाग की एक मस्जिद में ले जाकर मौलाना कलीम सिद्दीकी से मिलवाया गया था। यहाँ मौलाना ने उसे गले लगाते हुए उसका धर्मांतरण करवाया। उसे नया नाम नूर मोहम्मद दिया गया। इसके बाद उसे इस्लामी तालीम के लिए गुजरात और उत्तर प्रदेश भी भेजा गया।

विनोद का दावा है कि मौलाना का एक साथी उसे ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान भेजने की बात भी करता था। विनोद ने बताया कि 2018 में आरोपितों के चंगुल से छूटने के बाद उसने फरीदाबाद में ही 2 साल गुमनामी से बिताए। 2020 में जब उसे अपनी बहन की शादी का पता चला तो वह अपने परिवार से मिला।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार विनोद का जब जबरन धर्मांतरण कराया गया तब वह नौवीं में पढ़ता था। विनोद ने बताया है कि 2014-15 में जब वह फरीदाबाद के सेक्टर 16 के एक स्कूल में नौंवी कक्षा में था तब उसका धर्मांतरण कराया गया था। गैस चूल्हा और सिलाई मशीन की रिपेयरिंग-बिक्री का काम करने वाला शहजाद स्कूल आते-जाते वक्त उसे अपने पास बुलाता। उसे खाने-पीने की चीजें देता और इस्लाम का बखान करता। उससे कहता कि यदि तुम मुस्लिम बन गए तो नर्क में जाने से बच जाओगे।

‘मुझे राष्ट्रवादी होने की सजा दी जा रही, कलंकित करने वालों मुझे रोकना असंभव’: मनोज मुंतशिर का ‘गिरोह’ को करारा जवाब

पॉपुलर कवि और गीतकार मनोज मुंतशिर पर 2019 में आई उनकी एक किताब ‘मेरी फितरत है मस्ताना’ की एक कविता ‘मुझे कॉल करना’ को लेकर लोगों का कहना है कि ये कविता किसी और के द्वारा लिखी गई है और मनोज मुंतशिर ने सिर्फ इसका हिंदी अनुवाद करके अपनी किताब में छाप दिया है। कविता के बाद अब उन पर ‘केसरी’ फिल्म का गाना ‘तेरी मिट्टी’ भी पाकिस्तानी गाने से कॉपी करने का आरोप लग रहा है। इस पर विवाद बढ़ने के बाद मनोज मुंतशिर ने एक वीडियो जारी किया है। उन्होंने कहा कि इसे मेरी सफाई नहीं, जवाब समझा जाए। उन्होंने यह भी कहा है कि उनकी कोई रचना शत-प्रतिशत ओरिजिनल नहीं है, उन्हें राष्ट्रवादी होने की सजा दी जा रही है।

मेरे गाने शायरी से प्रेरित: मुंतशिर

मनोज ने अपना ये वीडियो ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया है। उन्होंने कहा, “मेरी कोई रचना शत-प्रतिशत ओरिजिनल नहीं है। मेरे खिलाफ याचिका दायर करें। मुझे माननीय न्यायालय का हर फैसला मंजूर है। तेरी गलियाँ का अंतरा मोमिन के एक शेर से इंस्पायर्ड था। तेरे संग यारा की पंक्तियाँ फिराक गोरखपुरी के एक शेर से आती हैं। तेरी मिट्टी अनेकों भाषाओं में ट्रांसलेट हो चुका है, लेकिन शायद ही कहीं मेरा नाम लिखा गया हो। मैं रुकने, झुकने वाला नहीं हूँ। मैं सिर्फ अपनी मेहनत और कला के दम पर गौरीगंज की पगडंडियों से सफलता के राजपथ तक पहुँचा हूँ।”

‘मेरा पूरा नाम मनोज मुंतशिर शुक्ला, इस पर गर्व है’

उन्होंने आगे कहा- “मुझे राष्ट्रवादी होने की सजा दी जा रही है। मुझे कलंकित करने वाले एक बार ये तय कर लें कि मुझे रोकना आपके लिए असंभव है। देखिए क्या मैंने वहाँ रॉबर्ट लेवरी का नाम लिया है। आज से इस काम में लग जाइए। मेरा पूरा नाम मनोज मुंतशिर शुक्ला है और मुझे अपने पूरे नाम पर गर्व है।”

इसके बाद उन्होंने मीडिया हाउस द्वारा पूछे गए सवाल का जवाब दिया, जो इस प्रकार है-

सवालः सोशल मीडिया पर आपकी आजकल खूब चर्चा हो रही है।

मनोज मुंतशिरः आभार उन सबका जिन्होंने मेरे नाम और काम का इतना चर्चा किया, कि आपको मेरा इंटरव्यू लेना पड़ा। मैं उस दिन का सपना देखता था जब कोई ‘लिखने वाला’ इस देश में ‘बिकने वाला’ समाचार बन जाए। आज मेरी किताब ‘मेरी फितरत है मस्ताना‘ पर इतनी बात हो रही है, मेरी खुशी का आप अंदाज़ा नहीं लगा सकतीं। देश-विदेश में मैंने अपनी किताब के साथ भ्रमण किया, लेकिन इतना शोर कभी नहीं मचा जितना आज 3 साल बाद मच रहा है। अब मैं भी मान चुका हूँ कि ‘ऊपरवाले के घर देर है अंधेर नहीं’। 

सवालः मतलब जो कुछ हो रहा है उस से आप खुश हैं? 

मनोज मुंतशिरः मैंने अपनी आँखों के सामने कितने बड़े-बड़े राइटर्स को नाकामी की जिंदगी जीते और गुमनामी की मौत मरते देखा है। आज हालात बदल गए हैं और इन बदले हुए हालात का मैं खुली बाँहों से स्वागत करता हूँ। जिस देश में हिरोइनों का एयरपोर्ट लुक हेडलाइन बने, सेलिब्रिटीज का कुत्ते घुमाना सुर्खियाँ बटोरे, वहाँ अचानक मीडिया में कविता और कवि की बात होने लगे तो समझ लीजिए सतयुग वापस आ गया। इसी क्रांति का ख्वाब देखते हुए निराला और नागार्जुन चल बसे। मेरा सौभाग्य है कि मैं इस क्रांति का दूत बन पाया।

सवालः लेकिन चर्चा तो आपकी गलत कारणों से हो रही है? कहा जा रहा है कि आपने एक अंग्रेजी कविता का अनुवाद करके अपने नाम से छपवा दिया।

मनोज मुंतशिरः सिर्फ एक? ये बात तो मेरी हर कविता, हर गीत के बारे में कही जा सकती है। मेरी कोई भी रचना शत-प्रतिशत मौलिक (original) नहीं है क्योंकि भारतवर्ष में सिर्फ दो मौलिक रचनाएँ हैं, वाल्मीकि की रामायण और वेद व्यास की महाभारत। इसके अलावा जो कुछ भी लिखा गया है सब घूम-फिर के इन्हीं दो महाग्रंथों से प्रेरित है। 

सवालः तो आप मानते हैं कि ‘मुझे कॉल करना‘ पर रॉबर्ट लेवरी की छाप है?

मनोज मुंतशिरः बिल्कुल है, और सिर्फ रॉबर्ट लेवरी की नहीं, श्री केदारनाथ सिंह, वर्ड्सवर्थ, एमिली डिकिंसन, पाब्लो नेरुदा और सिल्विया प्लैथ की भी छाप है। ये वो लेखक हैं जिनको पढ़ के मैं बड़ा हुआ हूँ, मेरी काव्यात्मक चेतना पर इनका गहरा प्रभाव है। मैं कुछ भी लिखूँ, मेरे शब्दों से ये सभी और अनगिनत और भी लेखक झाँकने लगते हैं। आज तो खैर मेरा मीडिया ट्रायल हो रहा है लेकिन जब किसी ने सवाल नहीं भी पूछा था तो भी मैंने खुद जनता के बीच जा कर सौ बार कहा कि मेरे लिखे हुए सुपर हिट गीतों पर हिंदी-उर्दू कविता के दिग्गजों का गहरा प्रभाव है।

बिना किसी के सवाल पूछे मैंने सैकड़ों मंचों से बोला है कि ‘तेरी गलियाँ‘ का अंतरा मोमिन के एक शेर से प्रेरित था, ‘तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता‘। मैं ये शेर न जानता तो कभी न लिख पाता ‘सरगोशी सी है ख्यालों में, तू न हो फिर भी तू होता है। मेरे एक और बहुत कामयाब गीत ‘तेरे संग यारा’ की पंक्तियाँ, ‘कहीं किसी भी गली से जाऊँ मैं, तेरी ख़ुशबू से टकराऊँ मैं‘ फिराक गोरखपुरी के एक शेर से आती हैं, ‘मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़, तेरे दर को हर रास्ता जाए है’।

कोई एक दो रचनाएँ थोड़ी हैं कि मैं गिनवा दूँ, जो कुछ भी लिखा कहीं न कहीं से प्रेरित है, क्योंकि लिखने का कोई दूसरा तरीक़ा है ही नहीं। आपसे पहले जो लिखा जा चुका है, वही तय करता है कि आप क्या लिखेंगे। हमारे शास्त्रों में इसी को ऋषि-ऋण कहा जाता है। जाने-अनजाने जो हमने अपने बड़ों से या अपनी पहले की पीढ़ियों से सीख लिया वो हमारे कृतित्व पर क़र्ज़ है और ये क़र्ज़ लौटाने से मैं कभी पीछे नहीं हटा।

कुछ बरस पहले की बात है, एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अवॉर्ड शो में, देश से बाहर मुझे सम्मानित किया जाता है। पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री मेरे सामने बैठी हुई थी, मंच से घोषणा होती है,  ‘अवार्ड फ़ॉर द बेस्ट लिरिक्स गोज़ टू मनोज मुंतशिर फ़ॉर रश्के-क़मर‘। मैं मंच पर आता हूँ और धन्यवाद ज्ञापन के साथ जो पहली बात कहता हूँ वो ये थी ‘लेट मी करेक्ट यू, अवार्ड फ़ॉर द बेस्ट लिरिक्स गोज़ टू नुसरत फतह अली खान, फ़ना बुलंदशहरी एंड मनोज मुंतशिर’। वीडियो इंटरनेट पर उपलब्ध है देख लीजिएगा। होना तो ये चाहिए था कि मैं पूरी वाहवाही खुद बटोर लूँ, लेकिन मैंने अपना ऋण अदा किया। मैं अपने करियर की शुरुआत में दूसरों को श्रेय देने से नहीं डरा, अपनी लाइम-लाइट शेयर करने से नहीं डरा, तो अब क्यों डरूँगा? 

सवालः मतलब आप कह रहे हैं कि आपकी कविता सिर्फ प्रेरित है?

मनोज मुंतशिरः कविता बहुत बारीकी का काम है। कविता की रचना-प्रक्रिया समझने के लिए भी खुद कवि होना पड़ता है। जो भाव, या अभिव्यक्तियाँ पब्लिक डोमेन में हों, उन पर कोई भी लेखक अपनी तरह से लिख सकता है। ‘वन्दे-मातरम’ बंकिम चंद्र जी की रचना है, लेकिन इतनी प्रसिद्ध हुई कि पब्लिक डोमेन में आ गई। जब AR रहमान ‘माँ तुझे सलाम’ जैसा बेहतरीन गीत बनाते हैं तो हुक लाइन में ‘वन्दे मातरम‘ का सीधा अनुवाद कर लिया जाता हैं, ‘वन्दे-मातरम‘  यानी, ‘माँ तुझे सलाम‘। गीत के लेखक में कहीं बंकिम जी का नाम नहीं दिया जाता और वो ज़रूरी भी नहीं है क्योंकि ‘वन्दे-मातरम‘ पब्लिक डोमेन में है।

कबीर की रचना , ‘मेरी चुनरी में परी गयो दाग़ पिया‘  फ़िल्मों में आके, ‘लागा चुनरी में दाग़‘ बन जाता है और गीतकार में ‘साहिर‘ का नाम होता है कबीर का नहीं, क्योंकि कबीर की रचना पब्लिक डोमेन में जा चुकी है। मेरा अपना गीत ‘तेरी मिट्टी’ अनेकों भाषाओं में अनुवाद हो चुका है लेकिन शायद ही कहीं मेरा नाम लिखा हो। मुझे इस बात की कोई शिकायत नहीं है बल्कि मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे शब्द पब्लिक डोमेन में आ गए, अब वो सिर्फ़ मेरे नहीं है, दुनिया भर के हैं, जो जैसे चाहे अपना ले। बिलकुल ऐसे ही, रॉबर्ट लेवरी की कविता पब्लिक डोमेन में है, मैंने उसे अपने अंदाज़ और अपने तरीक़े से व्यक्त किया।

अगर कभी किसी मंच पर मेरी इस कविता का ज़िक्र आया होगा, तो मैंने फ़ौरन लेवरी का नाम लिया होगा। जिन लोगों के पास मेरी तीन साल पुरानी किताब खँगालने का समय है, उनको ये काम भी करना चाहिए, मेरे पब्लिक परफॉर्मन्स और लिटरेचर फ़ेस्टिवल्स वाले वो वीडियोज ढूँढ़ने चाहिए जहाँ मैंने ये कविता पढ़ी हो। देखिए वहाँ मैंने रॉबर्ट लेवरी का नाम लिया है या नहीं!    

सवालः ऐसा कहा जा रहा है कि ‘तेरी मिट्टी‘  भी 2005 के एक पाकिस्तानी गीत की हू-ब-हू नक़ल है। इंटरनेट पर वो वीडियो वायरल है जिसमें एक पाकिस्तानी गायिका ये गीत गा रही हैं।

मनोज मुंतशिरः पहली बात वो गायिका पाकिस्तानी नहीं, हमारी अपनी हैं, गीता राबरी, बहुत गुणी लोक गायिका हैं। दूसरी बात जिस वीडियो की बात आप कर रही हैं वो 18 जून 2020 को अपलोड किया गया था और हमारा गीत 15 मार्च 2019 को रिलीज़ हुआ था। फिर भी किसी को कोई शक है, तो गीता जी यहीं हैं हमारे ही देश में, विख्यात कलाकार हैं, हर मीडिया हाउस के पास उनका नंबर होगा, कॉल कर के पूछ लीजिए। तेरी मिट्टी जैसे राष्ट्र-प्रेम को जाग्रत करने वाले गीत पर इस तरह की घिनौनी राजनीति उन करोड़ों भारतवासियों और लाखों सैनिकों की भावनाओं से खिलवाड़ है, जो इस गीत को माथे से लगाते हैं। आप मुझ से ख़फ़ा हैं, ग़ुस्सा मुझपे उतारिए, मैं हाज़िर हूँ, लेकिन मेरे देशप्रेम को बेइज्जत मत कीजिए जो पवित्र है, पावन है और जिसे ‘तेरी मिट्टी‘ में ढाल के मैं धन्य हो गया।  

सवालः लेकिन घिनौनी राजनीति आप ही के साथ क्यों हो रही है?

मनोज मुंतशिरः क्योंकि मैंने ही अपने यूट्यूब चैनल पर वो वीडियो बनाया था जिसने एक बहुत बड़े समुदाय को रातों-रात मेरा दुश्मन बना दिया। ये लोग, जो ट्विटर पर मेरी एक बरसों पुरानी कविता को लेकर इतना तूफ़ान खड़ा कर रहे हैं, ये वही लोग हैं जिन्होंने मेरा वीडियो रिलीज होने के बाद मुझे सीधे निशाने पर ले लिया था और उसके बाद हर दिन, बल्कि हर घंटे मुझे पानी पी-पी के गालियाँ देते रहे। 

देखिए जा के, बात कहाँ से शुरू हुई। पहला ट्वीट किसने किया था? वीडियो में कही मेरी बात बहुतों को वैसे ही चुभी जैसे हर सही बात चुभती है। मेरे कई करीबी दोस्तों ने मुझे आगाह किया कि अब मुझे टारगेट किया जाएगा। बिलकुल यही हो रहा है लेकिन मुझे टारगेट करने वालों के लिए एक बुरी खबर है, मैं रुकने और झुकने वाला नहीं हूँ। मेरे साथ लाखों भारतवासी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। ये लोग जानते हैं कि मैं सच कह रहा हूँ और सच को कभी समर्थन की कमी नहीं होती।

मेरे गीत सुनने वाले और उन गीतों से इश्क़ करने वाले अच्छी तरह समझते हैं कि नक़ल करके एक-दो गीत लिखे जा सकते हैं, इतना बड़ा करियर खड़ा नहीं किया जा सकता। इंडस्ट्री का हाइयस्ट पेड राइटर नहीं बना जा सकता। मुझे अपने विरोधियों पर इस बात के लिए तरस आता है कि वो मेरे विरुद्ध कोई बड़ा स्कैंडल नहीं ढूँढ़ पाए। ढूँढ़ते भी तो कहाँ मिलता, मैंने एक बेदाग़ ज़िंदगी गुज़ारी है और सिर्फ़ अपनी मेहनत और कला के बलबूते पर गौरीगंज की पगडंडियों से सफलता के राजपथ तक पहुँचा हूँ। मेरी कहानी हर उस नौजवान की कहानी है जिसमें सपने देखने और उनके लिए लड़ने की हिम्मत है। 

सवालः इस विवाद के बाद सोशल मीडिया पर आपके फैंस भी ‘डिफेंसिव’ हैं, उनके लिए क्या कहना चाहेंगे?

मनोज मुंतशिरः मेरे पास कोई फ़ैन नहीं है, सब मेरी फ़ैमिली हैं और जब मुझे समर्थन की ज़रूरत होगी, मेरे बिना कुछ कहे ये फ़ैमिली मेरे साथ खड़ी मिलेगी। मेरी या किसी भी राइटर की लेगसी एक दिन में नहीं बनती, बरसों की कलम तोड़ मेहनत और संघर्ष के बाद कामयाबी की धूप चमकती है। मेरी धूप आपके हवाले है, आप तय कीजिए कि मुझे तेरी गलियाँ, तेरे संग यारा, कौन तुझे, फिर भी तुमको चाहूंँगा, बाहुबली, तेरी मिट्टी और मेरी फ़ितरत है मस्ताना के लिए याद रखेंगे, या प्रायोजित और निराधार आरोपों के लिए। आपके लिए मेरे लिखे हुए 400 से ज़्यादा गीत, सैकड़ों कविताएँ और राष्ट्र को समर्पित मेरे अनगिनत वीडियोज महत्वपूर्ण हैं, या वो 4 लाइनें जिनको पूरी बेशर्मी से तोड़-मरोड़ के मुझे राष्ट्रवादी होने की सज़ा दी जा रही है। 

एक आख़िरी बात, इस देश में जंगलराज नहीं है, हर विवाद के लिए कोर्ट और जूडिशीएरी बनी हुई है। अगर मैंने कुछ ग़लत किया है तो मेरे ख़िलाफ़ याचिका दायर करें, मुझे आदरणीय न्यायालय का हर फ़ैसला मंज़ूर है लेकिन सोशल मीडिया ट्रायल मंज़ूर नहीं है। मुझे कलंकित करने वाले एक बार ये तय कर लें कि उनको परेशानी मेरी कविता से है या मेरे राष्ट्रवादी वीडियोज से, क्योंकि मैं राष्ट्रवादी हूँ, राष्ट्रवादी वीडियोज़ बनाता रहूँगा और कविता लिखता रहूँगा, मुझे रोकना असंभव है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों वामपंथी लिबरल गिरोह और कट्टरपंथियों द्वारा भारी रिपोर्टिंग और कई अन्य कारणों की वजह से यू-ट्यूब ने मनोज मुन्तशिर के बहुचर्चित वीडियो ‘आप किसके वंशज है?’ को ‘कॉपीराइट’ का हवाला देते हुए अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया था। जिसका लोगों ने मुखर स्वर में सोशल मीडिया के सभी माध्यमों पर विरोध किया, साथ ही मुन्तशिर ने भी यू-ट्यूब के इस एक्शन को चुनौती दी थी। जिसके बाद यह वीडियो वापस आ गया।

‘₹96 लाख दिल्ली के अस्पताल को दिए, राजनीतिक दबाव में लौटा भी दिया’: अपने ही दावे में फँसी राणा अयूब, दान के गणित ने बिगाड़ा खेल

विवादित पत्रकार राणा अयूब द्वारा चलाने जा रहे तीन फंड रेजिंग के खिलाफ FCRA उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज होने के बाद उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट पर अपना बचाव करते हुए एक लेख लिखा है। हालाँकि लेख में उनके द्वारा किया गया दावा और भी सवाल खड़े करता है।

राणा ने दावा किया कि हिंदू आईटी सेल ने उनसे बदला लेने के लिए FIR दर्ज करवाया है। जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पाठकों और देश की नजरों में नीचा दिखाना था। उन्होंने दावा किया कि जिस समूह ने उसके खिलाफ शिकायत की है, वह बहुत प्रभावशाली है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लगभग पूरी कैबिनेट द्वारा सोशल मीडिया पर फॉलो किया जाता है।

धन का सही उपयोग न करने को लेकर आरोपों पर सफाई देते हुए राणा अयूब ने दावा किया कि उन्होंने नई दिल्ली के एक अस्पताल को 130,000 डॉलर का चेक दिया था। यह अस्पताल कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर बच्चों के वार्ड का निर्माण कर रहा था। हालाँकि, राणा ने दावा किया कि अस्पताल ने राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें चेक वापस कर दिया। वह कहती हैं कि अस्पताल प्रबंधन उनके द्वारा की गई सरकार की आलोचना को लेकर चिंतित था।

चूँकि उन्होंने अस्पताल का नाम नहीं बताया है, इसलिए यह बताना मुश्किल है कि वह किस पार्टी की तरफ से राजनीतिक दबाव की बात कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार द्वारा संचालित कुछ अस्पताल हैं, जबकि निजी अस्पतालों सहित अधिकांश अस्पताल दिल्ली सरकार के नियंत्रण में आते हैं, जो आम आदमी पार्टी द्वारा संचालित है।

उनका दावा है कि उन्होंने एक अस्पताल को 130,000 डॉलर दिए थे, जो उन्हें वापस कर दिए गए थे। इसका मतलब है कि उन्होंने एक ही अस्पताल को लगभग ₹96 लाख दिए थे। अब सवाल यह उठता है कि यह राशि भारत में कोविड-19 से प्रभावित लोगों की मदद के लिए एकत्र की गई पूरी राशि से अधिक है, जो कि केटो पर उनका तीसरा फंड रेजिंग अभियान था। इस अभियान में, राणा अय्यूब द्वारा कुल ₹82,60,899 एकत्र किए गए। इसका मतलब है कि राणा अयूब द्वारा दावा किए गए राशि और एकत्र की गई राशि में ₹10 लाख से अधिक का अंतर है।

इसके अलावा, उनका तीसरा अभियान कोविड -19 प्रभावित लोगों की मदद करना था, न कि अस्पतालों को पैसा दान करना, जो समान चीजें नहीं हैं। केटो अभियान पेज का कहना है कि अभियान के लाभार्थी दिहाड़ी मजदूरी करने वाले हैं। वह दिहाड़ी मजदूरों के लिए जुटाए गए पैसे को अस्पताल को कैसे दे सकती है?

अभियान में, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह कोविड -19 से प्रभावित लोगों की मदद करेंगी और उन्होंने फंड का उपयोग करके करीब 1300 परिवारों को सुविधा प्रदान किया है। अयूब ने यह भी दावा किया कि उन्होंने विदेशी दाताओं को ₹60 लाख लौटा दिए क्योंकि उसके पास एफआरसीए पंजीकरण नहीं था। इस बीच, संख्या फिट नहीं होती है। अगर उन्होंने एकत्र किए गए ₹82.4 लाख में से 1300 परिवारों की मदद की, तो ₹20 लाख (तीन अभियानों में ₹60 लाख को विभाजित करते हुए) विदेशी मुद्रा दान वापस किया, तो फिर उन्होंने दिल्ली अस्पताल को ₹96 लाख कहाँ से दिए थे?

और अगर उन्होंने वाकई में अस्पताल को पैसा दिया था और इसे ‘राजनीतिक दबाव’ के कारण वापस कर दिया गया था, तो इसका खुलासा पहले क्यों नहीं किया गया? अस्पताल द्वारा राजनीतिक दबाव में लगभग एक करोड़ का दान लौटाना बड़ी खबर होगी और जिस राजनीतिक दल ने दबाव डाला होगा, उसे वैश्विक महामारी के समय भारी आक्रोश का सामना करना पड़ता। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस समय सरकारें पीएम केयर्स फंड सहित कोविड -19 के लिए जनता से दान माँग रही थीं, तो राजनीतिक दवाब में आकर पैसे लौटाना बड़ी बात होती, लेकिन राणा अयूब ने इस खबर को शेयर नहीं किया, क्यों? 

अब इस सवाल पर वापस आते हैं कि उन्हें ₹ 96 लाख कहाँ से मिले, जब तीसरे अभियान के फंड का अधिकांश हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका था। कोई यह तर्क दे सकता है कि यह पहले दो अभियानों से बची हुई राशि थी। लेकिन यह भी संभव नहीं है, क्योंकि पहले दो अभियानों में एकत्रित और खर्च की गई राशि इस राशि से मेल नहीं खाती।

झुग्गीवासियों और किसानों के लिए अपने पहले अभियान में, राणा अयूब ने लगभग ₹1.25 करोड़ एकत्र किए थे, और उन्होंने अभियान पेज पर दावा किया था कि पूरी राशि समाप्त हो गई थी। वह दावा करती है कि असम, बिहार और महाराष्ट्र के लिए राहत कार्य के दूसरे अभियान ने 68 हजार रुपए जुटाए थे, जिसका इस्तेमाल बाढ़ प्रभावित लोगों को राशन किट भेजने के लिए किया गया था।

एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि अगर उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल को ₹ 96 लाख जितनी बड़ी राशि दी थी, तो अभियान में किसी भी अपडेट में इसका उल्लेख नहीं किया गया था। इतना बड़ा दान, और कथित राजनीतिक दबाव द्वारा कथित धनवापसी, दोनों को राणा अय्यूब द्वारा व्यापक रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

राणा अय्यूब ने अपने वाशिंगटन पोस्ट में भी उल्लेख किया है कि ‘एक बड़ा हिस्सा करों में भुगतान किया गया था, जरूरतमंदों के लिए कम छोड़कर।’ इसके द्वारा वह जरूरतमंदों के लिए एकत्र किए गए धन से टैक्स लेने के लिए सरकार को दोषी ठहराना चाहती हैं। हालाँकि यह एक वैध तर्क मालूम होता है। दरअसल तथ्य यह है कि अगर उसने नियमों का पालन किया होता तो उसे करों का भुगतान नहीं करना पड़ता। राणा अय्यूब ने भारतीय कानूनों की पूर्ण अवहेलना की है, और उसने अपने तीन फंड रेजिंग वाले अभियानों में कई भारतीय कानूनों का उल्लंघन किया है, जिसकी वजह से वह परेशानी में फँसी, न कि किसी भी राजनीतिक दल के बदले की भावना की वजह से।

केटो प्लेटफॉर्म के अनुसार, राणा अयूब ने उन्हें बताया कि उन्हें अभियानों में लगभग ₹2.69 करोड़ मिले थे, जिसमें भारतीय दानदाताओं से ₹1.90 करोड़ और विदेशी दान में $1.09 लाख शामिल थे। एकत्र किए गए कुल ₹2.69 करोड़ में से, उन्होंने लगभग ₹1.25 करोड़ खर्च किए और उन्हें कर के रूप में फंड से ₹90 लाख का भुगतान करना बाकी है। इसका मतलब है कि लगभग ₹1.44 करोड़ अभी भी खातों में पड़े हैं। इसमें से ₹90 लाख टैक्स लायबिलिटी है, जबकि शेष ₹54 लाख कभी भी इच्छित लाभार्थियों तक नहीं पहुँचे।

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि राणा अयूब कहती हैं कि वह एफसीआरए पंजीकृत गैर सरकारी संगठनों के साथ गठजोड़ करने की कोशिश कर रही थी ताकि वह कानून का पालन करते हुए अपना अभियान चला सके, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी। यह देखते हुए कि भारत वाम-उदारवादी एनजीओ से भरा हुआ है, जिसका एफसीआरए पंजीकरण हो रखा है, मगर उस समय कोई भी राणा की मदद के लिए आगे नहीं आया। यह उनका अपने ही लोगों के बीच विश्वसनीयता के बारे में बहुत कुछ बताता है। यह हमें उस प्रकरण की याद दिलाता है जब मोदी विरोधी मीडिया घरानों ने उनकी ‘गुजरात फाइल्स’ को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था।

असम में अतिक्रमण हटाने के दौरान बड़ा बवाल: हिंसक झड़प में सद्दाम हुसैन और शेख फरीद की मौत, 9 पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल

असम के दरांग जिले में अतिक्रमण हटाने को लेकर एकबार फिर बड़ा बवाल हुआ है। करीब 800 परिवारों के पुनर्वास को लेकर हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में दो लोगों के मारे जाने की खबर है। वहीं प्रदर्शन में पत्तरबाजी और हिंसा की वजह से कई पुलिसकर्मी भी गंभीर रूप से घायल हो गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच ये झड़प तब हुई जब एक स्पेशल टीम अतिक्रमण हटवाने गई थी। कम से कम 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं। घायलों में ज्‍यादातर पुलिसकर्मी हैं। घायलों में कई की हालत बेहद नाजुक बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्‍या में लोग असम के दरांग जिला प्रशासन की ओर से बेदखल किए गए 800 परिवारों के पुनर्वास की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। बेदखल किए गए परिवारों ने सिपझार में विरोध प्रदर्शन शुरू किया था। प्रदर्शनकारियों की माँग थी कि बेदखली को रोका जाए और उन्हें एक व्यापक पुनर्वास पैकेज प्रदान किया जाए। तभी अचानक प्रदर्शनकारियों और पुलिस बल के बीच झड़प शुरू हो गई। बाद में पुलिस बल की ओर से की गई फायरिंग में दो लोगों की मौत हो गई जबकि कम से कम 10 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “पुलिस ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं। इसमें दो आम नागरिकों की मौत हो गई है। हिंसा में कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हैं इनमें अस्टिटेंट सब इंस्पेक्टर मोनिरुद्दीन की स्थिति गंभीर बताई जा रही है। उन्हें गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज शिफ्ट कर दिया गया है। मृतकों की पहचान सद्दाम हुसैन और शेख फरीद के रूप में हुई है।”

इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने ट्वीट कर कहा है- “असम इस वक्त राज्य प्रायोजित आग में जल रहा है। मैं अपने असम के भाई-बहनों के साथ खड़ा हूँ।

वहीं इस मामले में दरांग के पुलिस अधीक्षक सुशांत बिस्वा सरमा ने कहा कि परेशानी तब शुरू हुई जब धारदार हथियारों से लैस प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने पथराव शुरू कर दिया और मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों और आम लोगों पर हमला बोल दिया। सुशांत बिस्वा सरमा ने बताया कि पुलिस के जवानों ने आत्मरक्षा में गोलियाँ चलाईं जिसमें दो लोगों की मौत हो गई। दोनों पक्षों में हुई झड़प में कम से कम 10 लोग घायल हो गए। घायलों में अधिकांश पुलिसकर्मी हैं।”

साथ ही एसपी सुशांत सरमा ने इस हिंसा में 9 पुलिस के जवानों के घायल होने की बात करते हुए कहा कि मैं सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो के बारे में भी जाँच करवा रहा हूँ।

गौरतलब है कि सुशांत बिस्वा सरमा ने यह भी कहा है कि अतिक्रमण हटाए जाने का काम चलता रहेगा। अब तक 602.04 हेक्टेयर जमीन खाली करवा ली गई है। बीते 7 जून को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इलाके का दौरा किया था। उन्होंने इलाके को खाली कराने का निर्देश स्थानीय प्रशासन को दिया था जिससे सामुदायिक खेती करवाई जा सके।

बता दें कि कि धौलपुर 25000 एकड़ भूमि के साथ करीब 5000 साल पुराने शिव मंदिर और गुफा वाला क्षेत्र है। ऑपइंडिया को सूत्रों के हवाले से यह जानकारी मिली है कि फिलहाल यह क्षेत्र अतिक्रमण के अधीन है और धीरे-धीरे और अधिक लोग आ रहे हैं। बाहरी लोगों के आने से वहाँ के स्थानीय लोग पूरी तरह से तबाह हो गए हैं। लूट और डकैती का सिलसिला लगातार जारी है। हमारे सूत्र ने यह भी दावा किया है कि अतिक्रमण हटाने के अभियान के दौरान करीब 10,000 से अधिक लोगों ने पुलिस पर हमला किया। जो सभी के सभी मुस्लिम अप्रवासी बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है उन्होंने वहाँ 30000 एकड़ जमीन पर कब्जा कर लिया है।

सरमा सरकार ने बेदखली की पहल की है जिस पर स्थानीय मुस्लिमों के साथ चर्चा भी की गई है। उन्हें भूमि नीति के अनुसार भूमि देने का वादा किया गया था। कहा जा रहा है वे सहमत हैं। पिछले दो दिनों तक अतिक्रमण हटाने का अभियान शांतिपूर्ण रहा। लेकिन आज 10,000 लोगों ने पुलिस पर हमला किया और जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने फायरिंग की 2 लोगों की मौत हो गई और करीब 10 घायल बताए जा रहे हैं। राज्य सरकार ने न्यायिक जाँच के आदेश दिए हैं। इस झड़प के पहले से राज्य सरकार सभी मुस्लिम संगठनों के संपर्क में है ताकि स्थिति सामान्य रहे।

14 साल की बच्ची, 8 महीने में 29 लोगों ने किया रेप: मुंबई से सटे डोंबिवली की घटना, अब तक 23 गिरफ्तार

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से सटे डोंबिवली में एक नाबालिग से रेप के मामले में पुलिस अब तक 23 गिरफ्तारी कर चुकी है। इनमें दो नाबालिग बताए जा रहे हैं। पीड़िता की उम्र 14 साल है और 29 लोगों पर उसके साथ दरिंदगी का आरोप है। कुछ रिपोर्टों में पीड़िता की उम्र 15 साल और आरोपितों की संख्या 30 बताई गई है। नाबालिग पीड़िता के साथ दरिंदगी का सिलसिला इसी साल जनवरी में शुरू हुआ था और यह आठ महीनों तक जारी रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक, आरोपितों ने रेप की वारदात को जनवरी से सितंबर के बीच अंजाम दिया। पीड़िता से सबसे पहले जनवरी में उसके एक साथी ने रेप किया। उसने इसका वीडियो बना लिया औऱ उसे ब्लैकमेल करने लगा। इसके बाद उसके साथियों ने भी ब्लैकमेल कर नाबालिग से रेप किया।

आरोपितों ने नाबालिग के साथ अलग-अलग स्थानों और अलग समय पर गैंगरेप किया। बार-बार प्रताड़ना से तंग पीड़िता ने बुधवार (22 सितंबर 2021) की रात मानापाड़ा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। अब तक 26 आरोपित गिरफ्तार हुए हैं। डोंबिवली, बदलापुर, रबाले और मुरबाद से इन्हें गिरफ्तार किया गया है। सभी के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 376 (बलात्कार), 376 (N), 376 (3), 376 (D) (A) व पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।

इस घटना की जाँच के लिए पुलिस ने अपर पुलिस कमिश्नर (ईस्ट रेंज) कल्याण दत्तात्रेय कराले के नेतृत्व में जाँच टीमों का गठन किया गया है। इंडिया टुडे के मुताबिक, केस की जाँच अधिकारी एसीपी सोनाली डोले को बनाया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले महाराष्ट्र के पुणे में 14 साल की लड़की के साथ गैंगरेप का मामला सामने आया था। इस मामले में 13 लोगों ने पीड़िता के साथ 5 अलग-अलग ठिकानों पर 48 घंटे के भीतर कई बार रेप किया था। आरोपितों में लड़की का दोस्त, क्लास 4 के 2 रेलवे कर्मचारी और 11 ऑटो रिक्शा वाले शामिल थे।

डीसीपी नम्रता पाटिल के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया था कि 31 अगस्त को नाबालिग अपने 19 साल के दोस्त से मिलने चुपचाप निकली। वो ऑटो रिक्शा करके पुणे स्टेशन पहुँची लेकिन जब दोस्त नहीं आया तो वह वहीं रोने लगी। इसके बाद एक ऑटो ड्राइवर ने उसे कहा कि वो स्टेशन से बाहर चले उसका दोस्त बुला रहा है। लड़की बाहर आई तो उसे पीने को पानी दिया गया लेकिन पानी पीते ही उसे चक्कर आ गए। लड़की के बेहोश होने के बाद ड्राइवर ने सुनसान जगह ले जाकर उसका रेप किया और फिर ठिकाना बदल कर उसके बाकी साथी भी बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म करते रहे। पीड़िता को बिन कपड़े के एक कमरे में बंद किया गया था। कुछ-कुछ घंटे में ये आरोपित उसके पास जाते और उसका रेप करते। वो रो रोकर खाने को खाना और पहनने को कपड़े माँगती लेकिन कोई उसकी बात नहीं सुनता।