Friday, July 1, 2022
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‘₹96 लाख दिल्ली के अस्पताल को दिए, राजनीतिक दबाव में लौटा भी दिया’: अपने ही दावे में फँसी राणा अयूब, दान के गणित ने बिगाड़ा खेल

तीसरा अभियान कोविड -19 प्रभावित लोगों की मदद करना था, न कि अस्पतालों को पैसा दान करना, जो समान चीजें नहीं हैं। केटो अभियान पेज का कहना है कि अभियान के लाभार्थी दिहाड़ी मजदूरी करने वाले हैं। वह दिहाड़ी मजदूरों के लिए जुटाए गए पैसे को अस्पताल को कैसे दे सकती है?

विवादित पत्रकार राणा अयूब द्वारा चलाने जा रहे तीन फंड रेजिंग के खिलाफ FCRA उल्लंघन के आरोप में मामला दर्ज होने के बाद उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट पर अपना बचाव करते हुए एक लेख लिखा है। हालाँकि लेख में उनके द्वारा किया गया दावा और भी सवाल खड़े करता है।

राणा ने दावा किया कि हिंदू आईटी सेल ने उनसे बदला लेने के लिए FIR दर्ज करवाया है। जिसका उद्देश्य उन्हें उनके पाठकों और देश की नजरों में नीचा दिखाना था। उन्होंने दावा किया कि जिस समूह ने उसके खिलाफ शिकायत की है, वह बहुत प्रभावशाली है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लगभग पूरी कैबिनेट द्वारा सोशल मीडिया पर फॉलो किया जाता है।

धन का सही उपयोग न करने को लेकर आरोपों पर सफाई देते हुए राणा अयूब ने दावा किया कि उन्होंने नई दिल्ली के एक अस्पताल को 130,000 डॉलर का चेक दिया था। यह अस्पताल कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के मद्देनजर बच्चों के वार्ड का निर्माण कर रहा था। हालाँकि, राणा ने दावा किया कि अस्पताल ने राजनीतिक दबाव के कारण उन्हें चेक वापस कर दिया। वह कहती हैं कि अस्पताल प्रबंधन उनके द्वारा की गई सरकार की आलोचना को लेकर चिंतित था।

चूँकि उन्होंने अस्पताल का नाम नहीं बताया है, इसलिए यह बताना मुश्किल है कि वह किस पार्टी की तरफ से राजनीतिक दबाव की बात कर रही हैं। दिल्ली में केंद्र सरकार द्वारा संचालित कुछ अस्पताल हैं, जबकि निजी अस्पतालों सहित अधिकांश अस्पताल दिल्ली सरकार के नियंत्रण में आते हैं, जो आम आदमी पार्टी द्वारा संचालित है।

उनका दावा है कि उन्होंने एक अस्पताल को 130,000 डॉलर दिए थे, जो उन्हें वापस कर दिए गए थे। इसका मतलब है कि उन्होंने एक ही अस्पताल को लगभग ₹96 लाख दिए थे। अब सवाल यह उठता है कि यह राशि भारत में कोविड-19 से प्रभावित लोगों की मदद के लिए एकत्र की गई पूरी राशि से अधिक है, जो कि केटो पर उनका तीसरा फंड रेजिंग अभियान था। इस अभियान में, राणा अय्यूब द्वारा कुल ₹82,60,899 एकत्र किए गए। इसका मतलब है कि राणा अयूब द्वारा दावा किए गए राशि और एकत्र की गई राशि में ₹10 लाख से अधिक का अंतर है।

इसके अलावा, उनका तीसरा अभियान कोविड -19 प्रभावित लोगों की मदद करना था, न कि अस्पतालों को पैसा दान करना, जो समान चीजें नहीं हैं। केटो अभियान पेज का कहना है कि अभियान के लाभार्थी दिहाड़ी मजदूरी करने वाले हैं। वह दिहाड़ी मजदूरों के लिए जुटाए गए पैसे को अस्पताल को कैसे दे सकती है?

अभियान में, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह कोविड -19 से प्रभावित लोगों की मदद करेंगी और उन्होंने फंड का उपयोग करके करीब 1300 परिवारों को सुविधा प्रदान किया है। अयूब ने यह भी दावा किया कि उन्होंने विदेशी दाताओं को ₹60 लाख लौटा दिए क्योंकि उसके पास एफआरसीए पंजीकरण नहीं था। इस बीच, संख्या फिट नहीं होती है। अगर उन्होंने एकत्र किए गए ₹82.4 लाख में से 1300 परिवारों की मदद की, तो ₹20 लाख (तीन अभियानों में ₹60 लाख को विभाजित करते हुए) विदेशी मुद्रा दान वापस किया, तो फिर उन्होंने दिल्ली अस्पताल को ₹96 लाख कहाँ से दिए थे?

और अगर उन्होंने वाकई में अस्पताल को पैसा दिया था और इसे ‘राजनीतिक दबाव’ के कारण वापस कर दिया गया था, तो इसका खुलासा पहले क्यों नहीं किया गया? अस्पताल द्वारा राजनीतिक दबाव में लगभग एक करोड़ का दान लौटाना बड़ी खबर होगी और जिस राजनीतिक दल ने दबाव डाला होगा, उसे वैश्विक महामारी के समय भारी आक्रोश का सामना करना पड़ता। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस समय सरकारें पीएम केयर्स फंड सहित कोविड -19 के लिए जनता से दान माँग रही थीं, तो राजनीतिक दवाब में आकर पैसे लौटाना बड़ी बात होती, लेकिन राणा अयूब ने इस खबर को शेयर नहीं किया, क्यों? 

अब इस सवाल पर वापस आते हैं कि उन्हें ₹ 96 लाख कहाँ से मिले, जब तीसरे अभियान के फंड का अधिकांश हिस्सा पहले ही खर्च हो चुका था। कोई यह तर्क दे सकता है कि यह पहले दो अभियानों से बची हुई राशि थी। लेकिन यह भी संभव नहीं है, क्योंकि पहले दो अभियानों में एकत्रित और खर्च की गई राशि इस राशि से मेल नहीं खाती।

झुग्गीवासियों और किसानों के लिए अपने पहले अभियान में, राणा अयूब ने लगभग ₹1.25 करोड़ एकत्र किए थे, और उन्होंने अभियान पेज पर दावा किया था कि पूरी राशि समाप्त हो गई थी। वह दावा करती है कि असम, बिहार और महाराष्ट्र के लिए राहत कार्य के दूसरे अभियान ने 68 हजार रुपए जुटाए थे, जिसका इस्तेमाल बाढ़ प्रभावित लोगों को राशन किट भेजने के लिए किया गया था।

एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि अगर उन्होंने दिल्ली के एक अस्पताल को ₹ 96 लाख जितनी बड़ी राशि दी थी, तो अभियान में किसी भी अपडेट में इसका उल्लेख नहीं किया गया था। इतना बड़ा दान, और कथित राजनीतिक दबाव द्वारा कथित धनवापसी, दोनों को राणा अय्यूब द्वारा व्यापक रूप से प्रकाशित किया जाना चाहिए था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

राणा अय्यूब ने अपने वाशिंगटन पोस्ट में भी उल्लेख किया है कि ‘एक बड़ा हिस्सा करों में भुगतान किया गया था, जरूरतमंदों के लिए कम छोड़कर।’ इसके द्वारा वह जरूरतमंदों के लिए एकत्र किए गए धन से टैक्स लेने के लिए सरकार को दोषी ठहराना चाहती हैं। हालाँकि यह एक वैध तर्क मालूम होता है। दरअसल तथ्य यह है कि अगर उसने नियमों का पालन किया होता तो उसे करों का भुगतान नहीं करना पड़ता। राणा अय्यूब ने भारतीय कानूनों की पूर्ण अवहेलना की है, और उसने अपने तीन फंड रेजिंग वाले अभियानों में कई भारतीय कानूनों का उल्लंघन किया है, जिसकी वजह से वह परेशानी में फँसी, न कि किसी भी राजनीतिक दल के बदले की भावना की वजह से।

केटो प्लेटफॉर्म के अनुसार, राणा अयूब ने उन्हें बताया कि उन्हें अभियानों में लगभग ₹2.69 करोड़ मिले थे, जिसमें भारतीय दानदाताओं से ₹1.90 करोड़ और विदेशी दान में $1.09 लाख शामिल थे। एकत्र किए गए कुल ₹2.69 करोड़ में से, उन्होंने लगभग ₹1.25 करोड़ खर्च किए और उन्हें कर के रूप में फंड से ₹90 लाख का भुगतान करना बाकी है। इसका मतलब है कि लगभग ₹1.44 करोड़ अभी भी खातों में पड़े हैं। इसमें से ₹90 लाख टैक्स लायबिलिटी है, जबकि शेष ₹54 लाख कभी भी इच्छित लाभार्थियों तक नहीं पहुँचे।

यह ध्यान रखना दिलचस्प है कि राणा अयूब कहती हैं कि वह एफसीआरए पंजीकृत गैर सरकारी संगठनों के साथ गठजोड़ करने की कोशिश कर रही थी ताकि वह कानून का पालन करते हुए अपना अभियान चला सके, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकी। यह देखते हुए कि भारत वाम-उदारवादी एनजीओ से भरा हुआ है, जिसका एफसीआरए पंजीकरण हो रखा है, मगर उस समय कोई भी राणा की मदद के लिए आगे नहीं आया। यह उनका अपने ही लोगों के बीच विश्वसनीयता के बारे में बहुत कुछ बताता है। यह हमें उस प्रकरण की याद दिलाता है जब मोदी विरोधी मीडिया घरानों ने उनकी ‘गुजरात फाइल्स’ को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया था।

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Raju Das
Raju Das
Corporate Dropout, Freelance Translator

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