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बसपा सांसद पर बलात्कार का आरोप लगाने वाली युवती की मौत, सुप्रीम कोर्ट के बाहर दोस्त के साथ लगा ली थी आग

उत्तर प्रदेश के मऊ के घोसी से बसपा सांसद अतुल राय पर रेप का आरोप लगाने वाली युवती की दिल्ली में मंगलवार (24 अगस्त) की सुबह मौत हो गई। पिछले हफ्ते (16 अगस्त) 24 वर्षीय रेप पीड़िता और उसके 27 वर्षीय दोस्त ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर खुद को आग लगा ली थी। गंभीर हालत में दोनों को राममनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ शनिवार (22 अगस्त) को युवती के साथी गाजीपुर निवासी सत्यम राय ने दम तोड़ दिया था।

डॉक्टरों ने बताया कि हमने पीड़िता को बचाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन सेप्टीसीमिया होने के कारण उसकी हालत बिगड़ती चली गई और आज सुबह साढ़े दस बजे करीब उसकी मौत हो गई।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बलिया की रहने वाली पीड़िता ने लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान वाराणसी के लंका थाने में बसपा सांसद अतुल राय के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस के पकड़ने से पहले ही वह अंडर ग्राउंड हो गया था। चुनाव में जीत हासिल करते ही उसने सरेंडर कर दिया था। इसके बाद से वह नैनी जेल में बंद हैं।

गौरतलब है कि मृतका उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले की छात्रा थी और 16 अगस्त को अपने दोस्त के साथ दिल्ली आई थी। सांसद अतुल राय ने भी पीड़िता पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया था। उसने पीड़िता के साथ रेप मामले में गवाह गाजीपुर के सत्यम राय के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। दोनों की गिरफ्तारी के लिए इसी महीने 2 अगस्त को वारंट भी जारी किया गया था।

इससे परेशान पीड़िता ने अपने दोस्त के साथ फेसबुक लाइव कर बनारस के तत्कालीन एसएसपी अमित पाठक समेत कई अधिकारियों पर संगीन आरोप लगाए। साथ ही आत्महत्या करने की बात भी कही, जिसे पुलिस ने गंभीरता से नहीं लिया। इसके बाद दोनों ने 16 अगस्त को केरोसिन डालकर सुप्रीम कोर्ट के गेट के बाहर खुद को आग लगा ली। उन्होंने एक फेसबुक लाइव वीडियो भी किया था, जिसमें कहा गया था कि घोसी के सांसद अतुल राय ने मेरे (युवती) साथ बलात्कार किया। दोनों ने आरोप लगाया था कि यूपी के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी उनकी शिकायतों पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।

बता दें कि दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट के गेट के बाहर अपने सुरक्षा कर्मचारी के साथ दोनों की मदद के लिए पहुँची। वे उन्हें तत्काल राम मनोहर लोहिया अस्पताल लेकर गए। इस दौरान युवती 85 प्रतिशत झुलस गई थी, जबकि उसका दोस्त 70 प्रतिशत झुलस गया था।

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र नेता रहे सत्यम की शनिवार को इलाज के दौरान मौत हो गई थी। उसके परिवार ने बताया कि कि वह युवती की अदालती मामले में मदद कर रहा था।

‘अफगानिस्तान को तालिबान बनाना चाहता है तालिबानिस्तान’: अमरुल्ला सालेह, ‘तालिबान का कसाई’ बना अंतरिम वित्त मंत्री

अफगानिस्तान के पूर्व उप राष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह ने इंडिया टुडे के साथ एक संक्षिप्त साक्षात्कार में तालिबानी कब्जे को लेकर कहा कि देश तालिबान की ‘तानाशाही’ को खारिज करता है। अशरफ गनी के देश छोड़कर भाग जाने के बाद खुद को अफगानिस्तान का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित करने वाले सालेह ने बातचीत के लिए तैयार रहने की बात कही है।

उन्होंने कहा, “हम तालिबान के साथ सार्थक बातचीत को प्राथमिकता देते हैं।” सालेह ने तालिबान के शासन को किसी भी रूप में मान्यता नहीं देने की अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि देश तानाशाही को खारिज करता है। हम चाहते हैं कि लोग अपनी बात कहें। हम नहीं चाहते कि अफगान लोगों की व्यक्तिगत पहचान छिन्न-भिन्न हो।

तालिबान पर निशाना साधते हुए सालेह ने कहा, “वे अफगानिस्तान को मिटाना चाहते हैं और तालिबानिस्तान की स्थापना करना चाहते हैं।”

उन्होंने मीडिया से बातचीत में आगे कहा कि अफगान लोगों को राज्य के चरित्र को निर्धारित करने का मौका दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “हम पद या व्यक्तिगत पक्ष की माँग नहीं कर रहे हैं।”

पंजशीर को सुरक्षित करने वाले तालिबान के दावों का खंडन करते हुए सालेह ने कहा कि स्थिति उनके नियंत्रण में है। कार्यवाहक राष्ट्रपति ने कहा, “लोगों की नैतिकता का स्तर काफी ऊँचा है। समुदाय सर्वसम्मति से खड़ा हुआ है और प्रतिरोध बहुत ही मजबूत है।”

स्थिति गंभीर है

तालिबान के उदय के साथ अफगानिस्तान में भयावह होते हालात से दुनिया को रूबरू कराने के लिए देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति सालेह ने मंगलवार को ट्विटर का सहारा लिया। उन्होंने इसे मानवीय संकट करार देते हुए कहा कि अंदराब घाटी अभी तक तालिबान के कब्जे में नहीं है औऱ इसीलिए तालिबानी भोजन औऱ ईंधन को यहाँ तक पहुँचने ही नहीं दे रहे हैं।

उन्होंने कहा, “पिछले दो दिनों से तालिब बच्चों और बुजुर्गों का अपहरण कर रहे हैं। ये इन्हें या तो ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं या फिर घरों की तलाशी लेते हैं।” सालेह के मुताबिक, इस डर से हजारों महिलाओं और बच्चों को पहाड़ों की ओर भागने को मजबूर होना पड़ा है।

अफ़ग़ानिस्तान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए सालेह ने ट्वीट किया, “मैं अफ़ग़ानिस्तान का मालिक हूँ और यह मेरा मालिक है। हम एक हैं। यह मुझसे हर दिन बात करता है।”

इस बीच, तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के अधिकांश हिस्सों पर नियंत्रण करने और काबुल पर कब्जा करने के बाद अमेरिका समेत कई यूरोपीय देश और भारत अपने-अपने नागरिकों को सुरक्षित घर वापस लाने के लिए एक गहन बचाव अभियान चला रहे हैं।

तालिबान ने अंतरिम सरकार के मंत्रियों का किया ऐलान

इस बीच तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार के लिए कई मंत्रियों के नामों का ऐलान कर दिया है। इसके तहत तालिबान ने सखाउल्लाह को कार्यवाहक शिक्षा मंत्री और अब्दुल बारी को उच्च शिक्षा मंत्री और सद्र इब्राहिम को अंतरिम गृह मंत्री बनाया गया है। इसके अलावा मुल्ला शिरीन को काबुल का गवर्नर और हमदुल्ला नोमानी को काबुल का मेयर नियुक्त कर दिया है।

इन सब के अलावा किसी वक्त पर तालिबान के कट्टर विरोधी माने जाने वाले गुल आगा शेरजई को तालिबानी सरकार का वित्त मंत्रालय सौंपा गया है। कंधार औऱ नंगरहार के गवर्नर रहे शेरजई को तालिबान का कसाई भी कहा जाता है।

मौलाना साद की अम्मी को मिलेगी निजामुद्दीन मरकज की चाबी: हाईकोर्ट का पुलिस को निर्देश, कोरोना से चर्चा में आया था

दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार (अगस्त 23, 2021) को तबलीगी जमात के प्रमुख मौलाना साद की अम्मी खालिदा की याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस को निर्देश दिए कि पुलिस उनके परिवार (मौलाना साद की अम्मी) को मरकज के आवासीय हिस्से की चाबी सौंपे।

जानकारी के मुताबिक, पिछले वर्ष एक प्राथमिकी के मद्देनजर अधिकारियों द्वारा इस मरकज को बंद किया गया था। मगर, अब मौलाना साद की अम्मी खालिदा की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस योगेश खन्ना ने पुलिस को निर्दश दिया कि उन्हें दो दिनों के भीतर चाबियाँ सौंपीं जाएँ। वहीं अपने फैसले में कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि मरकज के आवासीय हिस्से में रहने वाले लोग संपत्ति के किसी भी गैर-आवासीय हिस्से में प्रवेश नहीं कर सकते हैं।

बता दें कि खालिदा की इस याचिका में निचली अदालत के एक आदेश को चुनौती दी गई थी। उस आदेश में उन्हें उनके आवास में जाने से इनकार किया गया था। इस आवास की चाबी पिछले साल अप्रैल से पुलिस अधिकारियों के पास है।

कथिततौर पर, सुनवाई के समय अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि उक्त परिसर को सील करने या जब्त करने के संबंध में कोई आदेश नहीं है और यह पिछले साल अप्रैल से बंद है। कोर्ट ने इस मामले में नोटिस भी जारी कर दिल्ली सरकार, दिल्ली पुलिस और एसडीएम, डिफेंस कॉलोनी, नई दिल्ली से जवाब माँगा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस जगह पर इस परिवार के 11 सदस्य रहते थे। याचिकाकर्ता खालिदा ने अपनी याचिका में बताया था कि 31 मार्च, 2020 को, अधिकारियों द्वारा सैनिटाइजेशन के उद्देश्य से पूरी निजामुद्दीन मस्जिद को खाली करवाया गया था और फिर उसको बंद कर दिया गया। इसके बाद अधिकारियों ने आवासीय हिस्से सहित मरकज की चाबियाँ 1 अप्रैल, 2020 को दिल्ली पुलिस को सौंप दी। याचिका में कहा गया है कि चाबियाँ सौंपे हुए कई महीने बीत जाने के बावजूद याचिकाकर्ता या उसके परिवार के सदस्यों को अपने आवास में प्रवेश करने से रोका जा रहा है।

शाहीन बाग़ में लंगर, ‘किसान आंदोलन’ में हिंसा: जिसके खिलाफ भड़काया, उसने ही सिखों को तालिबान से बचा कर निकाला

दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे ‘किसान आंदोलन’ को लगभग एक साल होने को ही हैं। जिस तरह से पंजाब में किसानों को मोदी सरकार के खिलाफ भड़काया गया, वो सबने देखा। पंजाब के इन किसानों में अधिकांश सिख ही हैं। उन्हें भड़का कर दिल्ली लाया गया और फिर हिंसा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुले मंच से ‘इंदिरा गाँधी वाला हश्र’ करने की धमकी दी गई। जनहित के एक कानून को रोकने के लिए मजहब का सहारा लिया गया।

लेकिन, केंद्र सरकार लगातार लोगों को ये समझाने में लगी रही कि तीनों कृषि कानून किसानों के फायदे के लिए हैं, उनके लिए पूरे देश का बाजार खोलने के लिए। उधर सिखों को भड़का कर लाल किले पर हिंसा करवाई गई, ‘किसान आंदोलन’ में तलवार चलाने की घटनाएँ आम हो गईं और दिल्ली पुलिस को इससे निपटने के लिए विशेष तैयारियाँ करनी पड़ीं। इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु तेग बहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर शीशगंज गुरुद्वारे में दर्शन किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर ‘मन की बात’ से लेकर अन्य कार्यक्रमों में सिखों की बातें करते रहे हैं और गुरु नानक देव की शिक्षाओं की याद दिलाते रहे हैं। योगराज सिंह जैसों ने खुले मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गालियाँ तक बकीं, लेकिन केंद्र सरकार ने हमेशा नरमदिली से किसानों से बात की और उनकी बातें सुनीं। उधर 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए माहौल तैयार करने के लिए विपक्षी दल सिखों के गुस्से का फायदा उठाते रहे।

आज अफगानिस्तान में हालात चिंताजनक हैं। अफगानिस्तान में सिख सुरक्षित नहीं हैं। 18वीं शताब्दी के मध्य में एक ऐसा समय था जब सिख साम्राज्य मुगलों से आज़ाद हो चुका था और अफगान का दुर्रानी साम्राज्य नादिर शाह के पर्शियन से। तब दोनों के बीच खूब टकराव हुआ था। अहमद शाह दुर्रानी ने लाहौर पर कब्ज़ा किया और अमृतसर की तरफ बढ़ा। इस दौरान कई सिखों का उसने कत्लेआम मचाया।

हालाँकि, सिखों ने भी इसके बाद अहमद शाह दुर्रानी के बेटे तैमूर दुर्रानी और लाहौर में उसके शासक जहाँ खान को हरा कर अपनी ताकत दिखाई। कहने का अर्थ ये है कि इस्लामी कट्टरवादी कभी भी सिखों के खून के ही प्यासे रहे हैं। पाकिस्तान में सिख लड़कियों का अपहरण कर के उनका धर्मांतरण कर दिया जाता है। पाकिस्तान के नानकाना साहिब गुरुद्वारे को घेर कर हमला हुआ था। कश्मीर में सिख लड़कियों के ‘लव जिहाद’ के मामले आए।

इन सबके बीच सिखों के ठेकेदार क्या कर रहे थे? वो भारत सरकार के एक ऐसे कानून का विरोध कर रहे थे, जिससे पाकिस्तान व अफगानिस्तान से प्रताड़ित होकर आए सिखों को भारत की नागरिकता व अधिकार मिलें। आज भले ‘दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी’ के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का कटऑफ डेट बढ़ाने की माँग कर रहे हों, लेकिन उनकी ही पार्टी CAA में मुस्लिमों को घुसाने की माँग करती रही है।

कुछ यही हाल पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह का भी है। हाल ही में उन्होंने अफगानिस्तान में फँसे सिखों को वहाँ से बचा कर लाए जाने की गुहार मोदी सरकार से लगाई। लेकिन पहले? जनवरी 2020 में पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा था कि वो केरल सरकार की तर्ज पर CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। इतना ही नहीं, केरल के बाद पंजाब की विधानसभा ही थी जिसने CAA के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। इस कानून को ‘विभाजनकारी’ और ‘स्वच्छ लोकतंत्र के खिलाफ’ बताया गया था।

कॉन्ग्रेस का हाल इससे जुदा नहीं है। कॉन्ग्रेस नेता जयवीर शेरगिल ने खुद को ‘सिख समुदाय का एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक’ बताते हुए मोदी सरकार से गुहार लगाई कि वो अफगानिस्तान में फँसे सिखों को बचाए, लेकिन इसी तरह का एक पत्र वो अपनी पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी को लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाए कि वो CAA का विरोध न करें। जयवीर के भीतर का सिख तब नहीं जागा, जब भारत सरकार CAA लेकर आई थी। 

ये तो अकाली दल, पंजाब सरकार और कॉन्ग्रेस जैसे दलों का हाल है। अब बात करते हैं उस ‘लंगर’ की, जिसके माध्यम से मुस्लिम-सिख एकता की बड़ी-बड़ी बातें की थीं। कई ऐसे सिख थे, जो शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों को लंगर खिला रहे थे। ‘हमारी लड़ाई ज़िंदाबाद, हमारी एकता ज़िंदाबाद’ लिख कर शाहीन बाग़ की बूढ़ी दादी और एक पगड़ी वाले सिख के पोस्टर लगाए गए थे। यानी, सिखों के लिए बने कानून के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों को कुछ सिखों ने ही लंगर खिलाए।

इसी क्रम में एक एडवोकेट डीएस बिंद्रा का नाम सामने आया, जिसके बारे में खूब प्रचारित किया गया कि शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों की मदद के लिए उसने अपना घर ही बेच डाला। दिल्ली दंगों में कॉन्स्टेबल रतन लाल की हत्या में इस व्यक्ति का नाम सामने आया था। वो असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM का दिल्ली महासचिव था। इसमें ही ‘सिख-मुस्लिम एकता’ की चाशनी डाल कर सिखों को मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश हुई थी।

आज मोदी सरकार ने अफगानिस्तान में फँसे सभी सिखों को भारत लाने में सफलता पाई है। इसके लिए भारतीय वायुसेना व एयर इंडिया ने मिल कर अभियान चलाया। वहाँ के एक सिख सांसद नरेंदर सिंह खालसा को भी अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर भारत आना पड़ा। उन्होंने पीएम मोदी को धन्यवाद दिया। यहाँ तक कि पवित्र गुरु ग्रन्थ साहिब की 3 प्रतियाँ भी भारत सरकार ने ससम्मान भारत मँगाई। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इसे नई दिल्ली में रिसीव किया।

अंत में, अफगानिस्तान में सिखों का इतिहास भी जान लीजिए। ये पहली बार नहीं है, जब अफगानिस्तान से सिखों को भागना पड़ा हो। कोई आधिकारिक आँकड़ा तो मौजूद नहीं है, लेकिन 45 वर्ष पहले अफगानिस्तान में सिखों की संख्या 50,000 के आसपास थी। 2016 तक मुल्क में सिर्फ 363 सिख परिवार बचे थे। अकेले 2015 में 150 सिख परिवारों को अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा था। 1989-96 के सिविल वॉर और 1996-2001 के तालिबानी शासन में बड़ी संख्या में सिखों को भागना पड़ा।

पंजाब में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। कॉन्ग्रेस के नवजोत सिंह सिद्धू प्रदेश अध्यक्ष बने हैं, जिनके सलाहकार पाकिस्तान के खिलाफ न बोलने की सलाह देते हैं। खुद सिद्धू करतारपुर व इस्लामाबाद में इमरान खान की जी-हुजूरी में मशगूल दिख चुके हैं। सिखों के ठेकेदारों को भले अफगानिस्तान के हालात देख कर CAA की याद आई हो, इससे पता चलता है कि मोदी सरकार हमेशा पड़ोसी इस्लामी मुल्कों में अल्पसंख्यकों की मदद के लिए गंभीर है।

जन्नत और 72 हूरों के किस्से सुना युवाओं को आतंकी बनाता था अब्बास शेख, श्रीनगर में सुरक्षा बलों ने कर दिया ढेर

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों ने आतंकी कमांडर अब्बास शेख को मार गिराया। वह टीआरएफ (द रेजिस्टेंस फ्रंट) का सरगना था। उसका एक साथी भी मारा गया। कश्मीर जोन के आईजीपी विजय कुमार ने इसकी जानकारी देते हुए बताया है कि इन दोनों आतंकियों की लंबे समय से तलाश थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, अब्बास शेख और उसका साथी साकिब मंजूर सोमवार (23 अगस्त 2021) को श्रीनगर के आलूचिबाग में क्रिकेट खेलने गया था। इसी दौरान इनपुट मिलने के बाद एसओजी के 10 कमांडो सिविल ड्रेस में पहुँचे और चारों तरफ से घेराव कर चेतावनी दी। आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में सुरक्षाबलों ने दोनों को ढेर कर दिया

आतंकियों की टॉप टेन लिस्ट में शामिल अब्बास शेख ने कई हत्याएँ की थी। वह बच्चों को आतंकी बनने के लिए उकसाता था। कश्मीर जोन के आईजीपी विजय कुमार ने बताया कि अब्बास शेख के इशारे पर साकिब ने श्रीनगर में कई हत्याएँ की थी।

अब्बास शेख पहले दर्जी का काम करता था, लेकिन बाद में वह आतंक की राह पर चल निकला था। उसके दो आतंकी भाई इब्राहिम और अशरफ शेख पहले ही सुरक्षाबलों के हाथों मारे जा चुके हैं। अब्बास शेख उर्फ तुरानी उर्फ मौलवी 17 साल पहले आतंकी बना था। उसे 2004 में पकड़ा गया था और जन सुरक्षा कानून के तहत डेढ़ साल तक जेल में रहने के बाद वह बाहर आ गया।

रिपोर्ट के अनुसार अब्बास कम उम्र के युवकों को जिहाद की शिक्षा देता था। वह उन्हें 72 हूरों की कहानी सुनाकर बताता था कि गैर मुस्लिम, गैर कश्मीरी और जो भी हिंदुस्तान का नाम लेता है वह काफिर है। अब्बास के इशारे पर ही साकिब मंजूर ने वकील बाबर कादरी और हब्बाकदल के दुकानदार और इंस्पेक्टर परवेज डार की हत्या की थी।

टॉप 10 राज्यों में उत्तर प्रदेश अव्वल: भारत की कुल आबादी के एक तिहाई ने ली कोविड-19 वैक्सीन की कम से कम एक खुराक

भारत में एक तिहाई आबादी को कोविड-19 टीके की कम से कम पहली खुराक मिल चुकी है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों के अनुसार, भारत अब तक कोविड-19 वैक्सीन की 58,83,55,950 खुराक लोगों को दे चुका है। इनमें से 45,66,37,831 लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिल चुकी है, जबकि 13,17,18,119 लोगों ने दो-खुराक का कोर्स पूरा कर लिया है।

Source: Covid19india.org

UADAI के अनुमान के मुताबिक, दिसंबर 2020 तक भारत की जनसंख्या 137,05,08,600 है। उक्त जनसंख्या में से लगभग 50,50,52,109 लोग 18 वर्ष से कम उम्र के हैं। अभी तक, भारत ने 18 साल से कम उम्र के बच्चों को कोविड-19 वैक्सीन लेने की अनुमति नहीं दी है। आँकड़ों से पता चलता है कि देश की कुल आबादी के 34% (1/3 से अधिक) से अधिक, जिसमें पात्र और गैर-पात्र (नाबालिग) दोनों लोग शामिल हैं, उनको कम से कम टीके की पहली खुराक मिल चुकी है।

टीकाकरण अभियान में अग्रणी राज्य उत्तर प्रदेश

भारत के टॉप-10 राज्य कोविड-19 के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े टीकाकरण अभियान में सबसे आगे हैं। इनमें छह भाजपा/एनडीए शासित राज्य उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और बिहार शामिल हैं। CoWIN डैशबोर्ड पर उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश राज्य में सबसे अधिक कुल 6,42,44,819 वैक्सीन की खुराक लोगों को दी जा चुकी है। इनमें से 5,40,39,825 लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 1,02,04,994 लोगों ने दो खुराक का कोर्स पूरा कर लिया है।

उत्तर प्रदेश में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। स्रोत: कोविन डैशबोर्ड

वहीं, महाराष्ट्र में अब तक 5,39,29,427 लोगों को वैक्सीन की डोज दी गई है। 3,96,49,625 लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 1,42,79,802 लोगों को कोविड-19 वैक्सीन की दोनों खुराकें मिल चुकी हैं।

महाराष्ट्र में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

गुजरात राज्य में अब तक 4,32,32,726 टीके की खुराक दी गई है। 3,26,30,501 को कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 1,06,02,225 व्यक्तियों ने दोनों खुराक प्राप्त की है।

गुजरात में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

पश्चिम बंगाल की बात करें तो राज्य ने अब तक वैक्सीन की 3,67,15,982 खुराकें दी हैं। 2,65,86,453 लोगों को कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 1,01,29,529 लोगों को दोनों खुराक मिली हैं।

पश्चिम बंगाल में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

मध्य प्रदेश ने अब तक वैक्सीन की 4,01,94,519 खुराकें दी हैं। 3,35,92,821 लोगों को टीके की कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 66,01,698 लोगों ने दो खुराक का कोर्स पूरा कर लिया है।

मध्य प्रदेश में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

राजस्थान राज्य ने टीके की 3,99,98,257 खुराकें दी हैं। 3,03,11,131 को कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 96,87,126 लोगों ने कोविड-19 वैक्सीन का कोर्स पूरा कर लिया है।

राजस्थान में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

कर्नाटक ने कोविड-19 वैक्सीन की 3,75,48,877 खुराकें दी हैं। 2,87,08,236 लोगों को कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 88,40,641 लोगों को दोनों खुराक मिली है।

कर्नाटक में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

बिहार ने टीके की 3,28,29,911 खुराकें दी है। 2,74,36,530 को टीके की कम से कम एक खुराक मिल चुकी है, जबकि 53,93,381 दोनों खुराक प्राप्त कर चुके हैं।

बिहार में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

तमिलनाडु ने अब तक 2,90,72,405 खुराकें दी हैं। राज्य में 2,35,09,570 लोगों को कम से कम एक खुराक मिली है। 55,62,835 लोगों ने कोर्स पूरा किया है।

तमिलनाडु में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

आंध्र प्रदेश ने कोविड-19 वैक्सीन की कुल 2,66,24,972 खुराकें दी हैं। 1,95,40,786 को कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 70,84,186 को दोनों खुराक मिली हैं।

आंध्र प्रदेश में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

आंध्र प्रदेश से करीब 4 लाख पीछे चल रहा है केरल राज्य, जहाँ अभी भी पूरे देश में सबसे ज्यादा कोविड-19 के नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं। राज्य में अब तक 2,62,88,088 लोगों को कोरोना वैक्सीन की खुराकें दी जा चुकी हैं। 1,93,33,756 को कोविड-19 वैक्सीन की कम से कम एक खुराक मिली है, जबकि 69,54,332 लोगों को टीके की दोनों खुराकें मिल चुकी हैं।

केरल में 23 अगस्त, 2021 तक टीकाकरण की खुराक दी गई। Source: Cowin Dashboard

भारत में कोविड-19

बता दें कि 23 अगस्त को भारत ने कोविड-19 के 11,385 नए मामले दर्ज किए। भारत में अब तक कोविड-19 के 3,24,60,354 मामले सामने आ चुके हैं। देश में 3,21,877 एक्टिव केस हैं। 3,16,90,678 कोरोना से ठीक हो चुके हैं। वहीं, 4,35,051 लोगों की कोरोना से मौत हो चुकी है।

तालिबान की कैद में भी बेखौफ थे नजर मोहम्मद: जिस अफगानी कॉमेडियन का गला काटा, उसका Video

अफगानिस्तान में तालिबानियों के आतंक के बावजूद उनपर कॉमेडी वीडियो बनाने वाले एक कॉमेडियन व टिकटॉकर नजर मोहम्मद उर्फ खाशा ज्वैन की पिछले माह जुलाई में बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। शुरुआत में तालिबान इस हत्या में अपना हाथ बताने से इंकार कर रहा था, लेकिन बाद में उसने पूरे कृत्य के मद्देनजर अपनी संलिप्तता की पुष्टि कर दी थी।

डेलीमेल की खबर के अनुसार, नजर मोहम्मद की बेहरमी से हत्या पर तालिबान ने कहा था कि उन्होंने वीडियो में नजर आने वाले संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया है और जल्द उनको तालिबान अदालत में पेश किया जाएगा। इस बयान के साथ ही उन्होंने माना था कि कंधार प्रांत के निवासी नजर की हत्या में तालिबानियों का हाथ था। उनका कहना था कि नजर मोहम्मद दोषी था लेकिन उसे तालिबान की अदालत में पेश किया जाना चाहिए था, न कि इस तरह मौत देनी चाहिए थी।

बता दें कि अफगानिस्तान के लोकप्रिय कॉमेडियन नजर मोहम्मद उर्फ खाशा की पिछले माह अपहरण के बाद हत्या की गई थी। उनकी हत्या से पहले एक वीडियो सामने आई थी जिसमें तालिबानी उन्हें गाड़ी में बैठाकर थप्पड़ मार रहे थे।

कथिततौर पर, वीडियो में दिख रहा था कि कंधारी कॉमेडियन किस तरह तालिबानियों द्वारा पकड़े जाने के बाद भी तालिबान का मजाक उड़ा रहे थे कि तभी बंदूकधारी तालिबानी उनके बगल में बैठा और उनकी बात सुनते ही उन्हें झापड़ मार दिया। इसके बाद सबकों हँसाने वाले खाशा एकदम शांत बैठ गए।

खाशा को पेड़ पर बाँध कर दी गई मौत

जानकारी के मुताबिक, कंधार प्रांत से ताल्लुक रखने वाले कॉमेडियन को तालिबानी मारने के लिए उनके घर से घसीटते हुए बाहर लाए थे और फिर पेड़ से बाँधकर उनकी हत्या कर दी थी। खबरों के मुताबिक, आतंकी सूबे में सरकारी कर्मचारियों की तलाश में घर-घर जा रहे थे। 22 जुलाई को उन्होंने खाशा को पकड़कर एक पेड़ पर बाँध दिया और उनका गला काट दिया। स्थानीय पुलिस के रूप में काम करने वाले कॉमेडियन का कटा हुआ गला जमीन पर पड़ा हुआ मिला और उनका शरीर गोलियों से भुना था।

नजर के शव के साथ उनके परिजन (साभार: डेलीमेल)

इस हत्या के बाद मलाला युसूफजई के पिता जियाउद्दीन ने भी कंधार कॉमेडियन खाशा ज्वैन को श्रद्धांजलि दी थी। अपने ट्वीट में उन्होंने कहा था कि खाशा पूरे जीवन लोगों को हँसाते रहे, लेकिन आतंकियों ने खाशा के बच्चों को हमेशा के लिए रोने के लिए छोड़ दिया है।

डेलीमेल की रिपोर्ट से लिया गया स्क्रीनशॉट

उल्लेखनीय है कि खाशा ज्वैन सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहते थे। उनके ह्यूमर के कारण उनकी फैन फॉलोविंग भी बहुत थी। आखिरी वीडियो की तरह कई वीडियो में उन्होंने तालिबान का मजाक बनाया था। ऐसे में किसे मालूम था कि तालिबान एक दिन उन्हें मारने से पहले ऐसी वीडियो बनाएगा जिसमें न उनके चेहरे पर हँसी होगी और न डर। उनकी आखिरी वीडियो में थप्पड़ पड़ने के बाद उनके चेहरे पर चुप्पी देखी जा सकती है। आज जब तालिबान का कब्जा पूरे अफगान पर हो गया है, तो उस समय की उनकी वीडियो शेयर की जा रही है।

असम पुलिस ने सोशल मीडिया पर तालिबान समर्थक एक और व्यक्ति को टायर की दुकान से धरा, अब तक 16 गिरफ्तार

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा कब्जे के बाद उसके समर्थन में सोशल मीडिया पोस्ट करने के मामले में असम पुलिस द्वारा असम पुलिस के एक कॉन्स्टेबल, जमीयत उलेमा-ए-हिंद की राज्य इकाई के वरिष्ठ नेता, एक मेडिकल छात्र और एक पत्रकार समेत कई लोगों को गिरफ्तार करने के तीन दिन बाद अब एक और व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है। इस बात की जानकारी पुलिस ने सोमवार (23 अगस्त 2021) को दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, गुवाहाटी के जोराबत इलाके में एक टायर की दुकान में काम करने वाले शख्स ने फेसबुक पर तालिबान के समर्थन में एक पोस्ट लिखी थी।

इस गिरफ्तारी से पहले असम पुलिस ने 15 लोगों को गिरफ्तार किया था। इन सभी ने अफगानिस्तान में तालिबान की जीत की सराहना करते हुए ट्विटर और फेसबुक जैसी सोशल मीडिया साइटों पर विभिन्न टिप्पणियाँ की थीं और वीडियो पोस्ट किए थे। ये गिरफ्तारियाँ राज्य के विभिन्न जिलों से 20 और 21 अगस्त को की गई थीं।

असम पुलिस के मुताबिक, इनमें से कामरूप मेट्रोपॉलिटन, बारपेटा, धुबरी और करीमगंज जिलों से दो-दो लोगों को गिरफ्तार किया गया था। जबकि, दरांग, कछार, हैलाकांडी, दक्षिण सलमारा, गोलपारा और होजई जिलों से एक-एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है।

असम पुलिस के उप महानिरीक्षक वायलेट बरुआ ने ट्वीट किया था कि असम पुलिस सोशल मीडिया पर तालिबान समर्थक टिप्पणियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई कर रही है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं। पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर रहे हैं। अगर आपके संज्ञान में ऐसी कोई बात आती है तो कृपया पुलिस को सूचित करें।” इसके अलावा तालिबान का समर्थन करने वाले राज्य के तीन लोगों के देश से बाहर जाने की भी सूचना असम पुलिस को मिली है।

इस बीच पुलिस गिरफ्तार किए गए लोगों से इस्लामिक समूह के साथ किसी भी संभावित संबंध का पता लगाने के लिए लगातार पूछताछ कर रही है।

इस मामले की जानकारी रखने वाले एक एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि गिरफ्तार लोगों पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), आईटी अधिनियम और सीआरपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।

हिन्दू नरसंहारक ‘मोपला विद्रोह’ के 387 नामों को सूची से हटाना PM मोदी का ऐतिहासिक कदम: वामपंथियों के झूठ का हुआ अंत

केंद्र सरकार ने मालाबार ‘विद्रोह’ में शामिल लोगों के नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची से हटाने का निर्णय लिया है। सरकार के निर्णय के अनुसार सूची से 387 ऐसे लोगों के नाम हटाए जाएँगे जिन्हें अब तक स्वतंत्रता सेनानी माना जाता रहा। भारत सरकार की डिक्शनरी ऑफ मार्टियर्स से इन नामों को इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च की एक समिति द्वारा की गई सिफारिश के बाद हटाया जा रहा है।

समिति का मानना है कि 1921 के इस तथाकथित विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई और न ही राष्ट्रवाद के पक्ष में कोई नारे लगाए गए। ऐसे में सरकार द्वारा उठाया गया इस कदम का स्वागत होना चाहिए क्योंकि किसी भी सभ्यता या राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि ऐतिहासिक घटनाओं को तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए न कि कहानियों के परिप्रेक्ष्य में।

तथ्य यही बताते रहे कि 1921 का मालाबार विद्रोह अंग्रेजों के खिलाफ नहीं था। यह किसी से छिपा नहीं है कि महीनों तक चले हिन्दुओं के योजनाबद्ध नरसंहार में तथाकथित मोपला स्वतंत्रता सेनानियों ने दस हजार से अधिक हिन्दुओं की हत्या की थी। इस्लामिक प्रोपेगंडा के तहत दशकों का स्थापित नैरेटिव चाहे जो बताए पर तथ्य यह बताते हैं कि उस क्षेत्र के मुसलमानों ने हिन्दुओं की हत्या, हिंदू महिलाओं का बलात्कार और लूटपाट किया तथा हज़ारों हिन्दुओं को धर्म परिवर्तन के लिए बाध्य किया गया।

ऐसे में एक आम भारतीय के लिए यह आज भी आश्चर्य की बात होगी कि मालाबार में हुए हिन्दुओं के इस नरसंहार को अंग्रेजों से स्वतंत्रता पाने की लड़ाई कैसे कहा गया? यह प्रश्न तब और प्रासंगिक हो जाता है जब हमारी दृष्टि वर्षों की सरकारी सहायता से बुनी गई उन कहानियों पर जाती है जिनमें इस नरसंहार को न्यायसंगत ठहराने के लिए कुछ भी लिख दिया गया और हिन्दुओं के पास इन कहानियों के विरुद्ध केवल कुढ़ने के और कुछ नहीं था।

सरकार का यह कदम आवश्यक है और तर्कसंगत भी। स्वतंत्रता के पहले या उसके बाद दशकों तक ऐतिहासिक तथ्यों को नकारते हुए जो कहानियाँ बुनी गई हैं उन्हें तथ्यों की कसौटी पर कसना सरकार या बुद्धिजीवियों कर्तव्य और आम भारतीय का अधिकार है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही केंद्र सरकार द्वारा लिखित इतिहास को जाँचने, जानने और उसके पुनर्लेखन के प्रयासों की प्रक्रिया भी एक ऐसा ही कदम है जिसकी आवश्यकता थी।

हर सरकार की प्रशासनिक और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्र के विद्यार्थियों को सही इतिहास की शिक्षा सुनिश्चित करे। सरकार के ऐसे प्रयासों का विरोध होगा, उसपर बहस होगी पर यह एक सामान्य बात है। किसी भी बदलाव की प्रक्रिया विरोध से ही शुरू होता है और सरकार को ऐसे हर संभावित विरोध का पता होगा और प्रक्रिया के आड़े आने वाले विरोधियों का संदेह दूर करना सरकार की जिम्मेदारी है।

आवश्यक नहीं कि केंद्र या राज्य सरकारें हर प्रयास का हिस्सा बने पर जहाँ तक संभव हो, उन्हें इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका निर्धारित कर उसे पूरा करने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। इस दिशा में जो शुरुआत हुई है वह आगे चलकर और तीव्र हो, यह आवश्यक है। स्वतंत्र सार्वजनिक विमर्शों में स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ अन्य ऐतिहासिक घटनाओं में तमाम संस्थाओं, व्यक्तियों और नेताओं की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसे इस सूचना क्रान्ति के इस युग में न तो कोई सरकार रोक सकती है और न ही राजनीतिक दल।

स्वतंत्र सूचनाओं और तथ्यों की उपलब्धता से यह सुनिश्चित होता रहेगा कि इतिहास पर आरंभ हुई बहस एक परिणाम तक पहुँचे। हाल के वर्षों में इसका एक प्रमुख उदाहरण इतिहास में टीपू सुल्तान की भूमिका के पुनर्मूल्यांकन का रहा है। तमाम विरोधों के बावजूद तथ्यों के लगातार प्रवाह से इस बहस में एक विस्तृत सहभागिता सुनिश्चित हुई है।

तथाकथित मोपला स्वतंत्रता सेनानियों को सरकार की सूची से निकाल बाहर करने का विरोध शुरू हो गया है। केरल में लंबे समय तक कॉन्ग्रेस के मित्र दल रहे इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने केंद्र सरकार के इस फैसले का विरोध करना आरंभ कर दिया है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इतिहास को तोड़ने मरोड़ने में कॉन्ग्रेस पार्टी की भूमिका जगजाहिर है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग हो, कॉन्ग्रेस पार्टी हो या फिर वामपंथी दल, इस एक विषय पर सभी साथ खड़े नजर आते रहे हैं।

ये हिंदुओं के नरसंहार के लिए जिम्मेदार मोपला नेताओं के नाम को स्वतंत्रता सेनानियों की सूची से निकालने की प्रक्रिया को इतिहास का डिस्टॉरशन बताएँगे पर सच यही है कि सरकार के इस फैसले के पीछे ठोस कारण और आधार हैं। केंद्र सरकार के फैसले का कॉन्ग्रेस, वामपंथियों और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग द्वारा विरोध उनके दशकों के प्रयास से गढ़े गए नैरेटिव के ध्वस्त होने की छटपटाहट है और उस छटपटाहट की तुलना में बहुत छोटी है जो दशकों तक हिंदुओं ने झेली है।

हिरासत में लिए गए केंद्रीय मंत्री नारायण राणे, CM उद्धव के खिलाफ टिप्पणी का आरोप: जन-आशीर्वाद यात्रा पर थे

केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री नारायण राणे को महाराष्ट्र में हिरासत में ले लिया गया है। वो जन-आशीर्वाद यात्रा पर थे। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर टिप्पणी करने के आरोप में उन पर कई धाराओं में 3 FIR दर्ज किए गए थे। उन्हें गिरफ्तार करने के लिए नासिक और पुणे की पुलिस निकली थी। नेता प्रतिपक्ष देवेंद्र फड़नवीस ने कहा है कि पार्टी उनके साथ खड़ी है। भाजपा ने कहा कि जिस राज्य में हत्यारे खुले घूम रहे, वहाँ एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को इस तरह उठाया गया है।

बता दें कि शिवसेना ने केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री नारायण राणे पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे पर विवादित टिप्पणी करने का आरोप लगाया था। पार्टी के सांसद विनायक राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर कहा था कि वो नारायण राणे को अपनी कैबिनेट से हटाएँ। उन्होंने लिखा था कि उद्धव ठाकरे के खिलाफ ‘निंदनीय टिप्पणी’ करने वाले नारायण राणे के पास पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।

आरोप के अनुसार, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने कहा था, “ये शर्मनाक है कि मुख्यमंत्री को ये नहीं पता कि हमें स्वतंत्र हुए कितने वर्ष हुए हैं। अपने भाषण के दौरान उन्होंने पीछे मुड़कर अपने सहयोगी से पूछा था। अगर मैं वहाँ होता तो उन्हें जोरदार थप्पड़ मारता।” मुंबई में नारायण राणे के घर के बाहर उनकी तस्वीरें जलाई गईं। शिवसेना के कार्यकर्ता पार्टी का झंडा लेकर उनके घर का घेराव करने पहुँचे थे।

नारायण राणे के खिलाफ ‘भारतीय दंड संहिता (IPC)’ की धाराओं (विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषाई या क्षेत्रीय समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सद्भाव के ‌खिलाफ किया गया कृत्य, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होती हो), 159 (लोक शांति को भंग करना), 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान करना उकसाना) 505 (विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घॄणा या वैमनस्य की भावनाएँ पैदा करने के आशय से असत्य कथन) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामले दर्ज किए गए हैं।