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‘सत्ता हथियाने के लिए देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहते थे आरोपित’: एल्गार परिषद-माओवादी गठजोड़ केस में NIA ने पेश किया मसौदा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने एल्गार परिषद और माओवादियों के बीच संबंधों के मामले में विशेष अदालत के समक्ष पेश किए गए मसौदा आरोपों में कहा है कि आरोपित अपनी सरकार बनाना चाहते थे और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना चाहते थे। एनआईए ने इस महीने की शुरुआत में मसौदा पेश किया था और इसकी एक प्रति सोमवार (23 अगस्त) को उपलब्ध कराई गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने एल्गार परिषद मामले के आरोपितों के खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत विशेष अदालत के समक्ष इस मसौदे में 15 आरोपितों के खिलाफ 17 आरोप लगाए हैं। एनआईए के अनुसार, आरोपित प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन भाकपा (माओवादी) के सक्रिय सदस्य थे।

मसौदा आरोपों के अनुसार, आरोपितों का हिंसक गतिविधियों के पीछे मुख्य उद्देश्य राज्य से सत्ता हथियाने के लिए क्रांति और सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से एक जनता सरकार स्थापित करना था। एनआईए के अधिकारियों ने कहा कि आरोपितों का इरादा हिंसा को उकसाना और कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति असंतोष फैलाना, साजिश करना, अव्यवस्था पैदा करना था, ताकि भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरा हो। मसौदे में यह भी दावा किया गया कि आरोपित ने भारत और महाराष्ट्र की सरकारों के खिलाफ युद्ध छेड़ने का प्रयास किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मसौदा में यह भी आरोप लगाया गया है कि आरोपित एल्गार परिषद बैठक के दौरान पुणे में भड़काऊ गाने चला रहे थे, लघु नाटक प्रस्तुत कर रहे थे और नक्सलियों के समर्थन में साहित्य बाँट रहे थे।

मसौदा में कहा गया है, ”आपराधिक साजिश का इरादा भारत से एक हिस्से को अलग करना और व्यक्तियों को इस तरह के अलगाव के लिए उकसाना था।” इसमें आरोप लगाया गया है कि आरोपितों का इरादा विस्फोटक पदार्थों का इस्मेताल करके लोगों में भय पैदा करना था।

साथ ही इसमें दावा किया गया है कि आरोपितों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्रों को उग्रवादी गतिविधियों के लिए भर्ती किया था।

आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता की धाराओं 120-बी (साजिश), 115 (अपराध के लिए उकसाना), 121, 121-ए (देश के खिलाफ युद्ध छेड़ना), 124-ए (राजद्रोह), 153-ए (जुलूस में हथियार), 505 (1) (बी) (अपराध को बढ़ावा देने वाले बयान) और 34 (साझा इरादे) के तहत आरोप लगाए गए हैं। उन पर यूएपीए की धाराओं 13, 16, 17, 18, 18ए, 18बी, 20 (आतंकवादी गतिविधियों के लिए सजा), 38, 39 और 40 (आतंकवादी संगठन का हिस्सा होने की सजा) के तहत भी आरोप लगाए गए हैं।

इस मामले में गिरफ्तार आरोपितों में कार्यकर्ता रोना विल्सन, नागपुर के वकील सुरेंद्र गॉडलिंग, नागपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शोमा सेन, रिपब्लिकन पैंथर्स के सुधीर धवले, कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज, कार्यकर्ता अरुण फरेरा और वर्नोन गोंजाल्विस, दिवंगत पिता स्टेन स्वामी, आनंद तेलतुंबडे, गौतम नवलखा, प्रोफेसर हनी बाबू, सागर गोरखे, रमेश गायचोर, ज्योति जगताप और फरार आरोपित मिलिंद तेलतुंबडे शामिल हैं।

बता दें कि एल्गार परिषद मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एक सम्मेलन में दिए गए भड़काऊ भाषणों से संबंधित है। इसके बारे में पुलिस ने दावा किया था कि इन भाषणों के कारण अगले दिन पश्चिमी महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगाँव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई। अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि इस सम्मेलन को माओवादियों के साथ कथित रूप से संबंध रखने वाले लोगों ने आयोजित किया था।

तालिबान की अमेरिका को धमकी- ’31 अगस्त तक खाली करो अफगानिस्तान, वरना भुगतना पड़ेगा अंजाम’

अफगानिस्तान में कब्जा करने के बाद पहली बार तालिबान ने सीधे-सीधे अमेरिका को चुनौती दी है। तालिबान ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अगर अमेरिका 31 अगस्त 2021 तक अफगानिस्तान से अपनी सेनाओं को वापस नहीं बुलाता है तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

तालिबान ने अमेरिका से 31 अगस्त तक अफगानिस्तान छोड़ने के अपने वादे को पूरा करने को कहा है। इसके साथ ही तालिबान ने यह भी कहा है कि अमेरिका के पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ने के बाद ही तालिबान सरकार बनाएगा। संगठन के प्रवक्ता सुहैल शाहीन का कहना है कि जो बाइडेन के अपनी बात से पीछे हटने का कोई अर्थ नहीं है। 31 अगस्त से अधिक दिनों तक अमेरिकी सेना को यहाँ नहीं रहने दिया जा सकता है।

सुहैल शाहीन लोगों द्वारा डरकर अफगानिस्तान छोड़ने की खबरों को खारिज कर दिया और कहा कि अफगानिस्तान बहुत गरीब देश है। यहाँ की 70 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रही है। इसी कारण वो विदेशों में बसना चाहते हैं। इसे डर नहीं कहा जा सकता है। अफगानिस्तान के लोगों का हमें पूरा समर्थन मिल रहा है।

दरअसल, तालिबान का यह बयान अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के उस बयान के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर जरूरत पड़ी तो अफगानिस्तान में 31 अगस्त के बाद भी अमेरिकी सेना रुकेगी। जब तक अफगानिस्तान से अमेरिका का हर नागरिक वापस नहीं लौट आता है तब तक अमेरिकी सेना अफगानिस्तान नहीं छोड़ेगी।

उन्होंने यह भी कहा था कि अफगानिस्तान में 6,000 जवान तैनात हैं और काबुल एयरपोर्ट अमेरिका के कंट्रोल में है। बाइडेन के मुताबिक, अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चला रहा है, जिसके तहत अब तक 18,000 लोगों को बचाया गया है। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति ने अफगान नागरिकों, खासकर महिलाओं की मदद करने की भी बात कही है।

स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों की सूची से हटेंगे ‘मोपला विद्रोह’ के 387 नाम: आज़ादी की लड़ाई नहीं, था हिन्दुओं का नरसंहार

भारत सरकार ने ‘मालाबार विद्रोह’ में शामिल लोगों के नाम ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों’ की सूची से हटाने का फैसला लिया है। बता दें कि जिसे ‘मालाबार विद्रोह’ कहा जाता है, वो असल में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई न होकर एक हिन्दू नरसंहार था, जिसमें मप्पिला मुस्लिमों व उनके नेताओं ने मिल कर 10,000 से भी अधिक हिन्दुओं का नरसंहार किया था। 1921 में लगभग 6 महीनों तक ये कत्लेआम चलता रहा था।

अब ये लोग स्वतंत्रता सेनानी नहीं कहलाएँगे। मोपला नरसंहार के ऐसे 387 लोगों के नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों की सूची से भारत सरकार हटाएगी। इसमें कुन अहमद हाजी और अली मुस्लीयर के नाम प्रमुख हैं। भारत सरकार की डिक्शनरी के पाँचवें वॉल्यूम की तीन सदस्यीय समिति ने समीक्षा की थी। ‘इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च (ICHR)’ ने इन लोगों के नाम हटाने की सिफारिश की थी।

इस समिति का मानना है कि ‘मालाबार विद्रोह’ कभी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध था ही नहीं, बल्कि ये एक कट्टरवादी आंदोलन था जिसका मुख्य उद्देश्य था इस्लामी धर्मांतरण। समिति ने नोट किया कि इस पूरे ‘विद्रोह’ के दौरान ऐसे कोई भी नारे नहीं लगाए गए, जो राष्ट्रवादी हों या फिर अंग्रेज विरोधी हों। हाल ही में RSS नेता राम माधव ने भी कहा था कि ये भारत में तालिबानी मानसिकता का पहला आंदोलन था।

इससे पहले सितंबर 2020 में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इस डिक्शनरी को वापस ले लिया था। लोगों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के बीच मोपला नरसंहार के दोषियों का नाम जोड़े जाने का विरोध किया था। इसे वेबसाइट से हटा लिया गया था। पूरे पाँचवें वॉल्यूम को सरकारी वेबसाइट से हटा लिया था। साल 1921 में केरल में हुए हिंदुओं के नरसंहार के लिए जिम्मेदार वरियमकुन्नथु कुंजाहम्मद हाजी की जिंदगी पर आधारित फिल्म भी बनने वाली है। 

वरियमकुन्नथु या चक्कीपरांबन वरियामकुन्नथु कुंजाहम्मद हाजी (Variyam Kunnathu Kunjahammed Haji), वही शख्स है जो खुद को ‘अरनद का सुल्तान’ कहता था। उसी क्षेत्र का सुल्तान जहाँ सैंकड़ों मोपला हिंदुओं का नरसंहार हुआ। जहाँ इस्लामिक ताकतों ने मिलकर लूटपाट की और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ विद्रोह की आड़ में हिंदुओं का रक्तपात किया। मगर, फिर भी, उन आतताइयों के उस चेहरे को छिपाने के लिए इतिहास के पन्नों में उन्हें मोपला के विद्रोहियों का नाम दिया गया।

वो मालाबार में ‘मलयाला राज्यम’ नाम से एक इस्लामी सामानांतर सरकार चला रहा था। ‘इस्लामिक स्टेट’ की स्थापना करने वाला कोई व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी कैसे हो सकता है? ‘द हिन्दू’ अख़बार को पत्र लिख कर उसने हिन्दुओं को भला-बुरा कहा था। अंग्रेजों ने उसे मौत की सज़ा दी थी। हाजी एक ऐसे परिवार से आता था, जो हिन्दू प्रतिमाएँ ध्वस्त करने के आदी थे। उसके अब्बा ने भी कई दंगे किए थे, जिसके बाद उसे मक्का में प्रत्यर्पित कर दिया गया था।

‘हिंदू नाम रख चूड़ी बेच रहा था तस्लीम, 2 आधार कार्ड भी मिले’: इंदौर में जिसकी पिटाई पर बवाल, मंत्री ने बताई उसकी सच्चाई

सोशल मीडिया पर मध्य प्रदेश के इंदौर में चूड़ी बेच रहे एक मुस्लिम युवक की पिटाई का वीडियो वायरल हो रहा है। मामला प्रकाश में आने के बाद पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। वहीं, चूड़ी बेच रहे मुस्लिम युवक की पिटाई पर गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने दावा किया है कि मुस्लिम युवक तस्लीम खुद को हिंदू बताकर इलाके में चूड़ियाँ बेच रहा था, इसलिए भीड़ उग्र हो गई थी। साथ ही उन्होंने कहा कि युवक के पास से दो आधार कार्ड भी बरामद किए गए हैं।

नरोत्तम मिश्रा ने सोमवार (23 अगस्त) को मामले को गंभीरता से लेते हुए ट्वीट किया, ”इंदौर में दो समुदायों के बीच हुए विवाद के मामले में दोनों पक्षों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की गई है। एमपी गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार एक विशेष समुदाय का व्यक्ति हिन्दू नाम रखकर चूड़ियाँ बेच रहा था, जिसके कारण सारा विवाद हुआ।” उन्होंने कहा कि हमारे यहाँ सावन महीने में बहन बेटियों के चूड़ियाँ पहनने की परम्परा है, उसने महिलाओं को केवल चूड़ियाँ पहनाने के लिए हिन्दू नाम रखा था, जबकि वह किसी दूसरे समुदाय का है। इसी तरह से उसके पास से दो आधार कार्ड बरामद हुए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, चू​ड़ी बेचने वाले युवक का नाम तस्लीम है। वह उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले का रहने वाला है। रविवार को सोशल मीडिया पर उसका एक वीडियो वायरल हुआ था। सावन के दौरान हिंदू महिलाओं को चूड़ियाँ पहनाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था। तस्लीम खुद को हिंदू बताकर इलाके में चूड़ियाँ बेच रहा था, जिसको लेकर स्थानीय भीड़ उग्र हो गई थी।

आरजे सायमा ने घटना का वीडियो ट्वीट कर लिखा, ”ऐसा लगता है कि वे तालिबान के खिलाफ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं! उम्मीद करते हैं कि शिवराज सिंह चौहान इन आतंकियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे।”

पुलिस फोर्स की धर्मनिरपेक्ष छवि होनी चाहिए, अनुच्छेद 25 के तहत पुलिसकर्मियों को दाढ़ी रखने का अधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक फैसला सुनाते हुए कहा कि पुलिस बल के जवान को दाढ़ी रखने के लिए अनुच्छेद 25 के तहत कोई मौलिक अधिकार नहीं है। एक पुलिस अधिकारी का दाढ़ी न कटाना, न केवल गलत व्यवहार है, बल्‍कि उस अधिकारी द्वारा किया गया दुराचार, कुकृत्य और अपराध है।

जस्टिस राजेश सिंह चौहान की बेंच ने कहा कि पुलिस बल को एक अनुशासित बल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसी होने के नाते यह आवश्यक है कि ऐसे बल की एक धर्मनिरपेक्ष छवि हो, जो राष्ट्रीय एकता के भाव को मजबूत करे।

दरअसल कोर्ट उत्तर प्रदेश पुलिस के एक कॉन्स्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कॉन्स्टेबल ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के 2020 के परिपत्र के खिलाफ याचिका दा‌खिल किया था, जिसमें एक अनुशासित बल के सदस्य के लिए उचित वर्दी और उचित पहनावे के संबंध में कुछ दिशानिर्देश जारी किए गए थे। विभागीय जाँच में यह पाए जाने के बाद कि अनुशासित बल का सदस्य होने के बावजूद कॉन्स्टेबल मोहम्मद फरमान ने अपनी दाढ़ी नहीं कटाई है और दाढ़ी कटाने के लिए वरिष्ठ अधिकारी द्वारा विशेष तौर पर निर्देश जारी किए जाने के बावजूद उसने ऐसा नहीं किया है, उसे निलंबित कर दिया गया था।

फरमान ने पुलिस उप महानिरीक्षक/ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, अयोध्या (फैजाबाद) द्वारा जारी निलंबन और उस आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें मुस्लिम धर्म के सिद्धांतों के अनुसार दाढ़ी बनाए रखने की अनुमति माँगने वाले उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था। आदेश कोर्ट ने कहा कि अनुशासित बल के सदस्यों के लिए उचित वेश-भूषा के संबंध में दिशा-निर्देश जारी करना सक्षम प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र में है। कोर्ट ने कहा, “कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि उचित वेश-भूषा को बनाए रखना अनुशासित बल के सदस्यों की पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है।”

इसके अलावा, कॉन्स्टेबल फरमान के खिलाफ जारी आरोप पत्र में कोई दोष या अवैधता नहीं पाते हुए कोर्ट ने कहा, “इसलिए, इस आशय से अवगत कराने के बावजूद कि पुलिसकर्मी दाढ़ी नहीं रख सकते क्योंकि यह उच्च अधिकारियों द्वारा जारी निर्देश/परिपत्र का उल्लंघन है।”

इस बात पर जोर देते हुए कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 इस संबंध में पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं करता है, न्यायालय ने कहा कि अनुशासित बल के सदस्य के दाढ़ी रखने को भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित नहीं किया जा सकता है। साथ ही कोर्ट ने मोहम्मद जुबैर कॉर्पोरल नंबर 781467-जी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य [(2017) 2 एससीसी 115] का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वादी यह स्थापित नहीं कर सका था कि क्या इस्लाम में कोई विशिष्ट जनादेश है, जो बालों को काटने या चेहरे के बालों को साफ करने पर रोक लगाता है। 

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष कोई ठोस सामग्री नहीं रखी गई ताकि यह विश्वास दिलाया जा सके कि इस्लाम को मानने वाले पुलिसकर्मी उसकी दाढ़ी या बाल नहीं काट सकते। यह मानते हुए कि आरोप-पत्र में तय आरोप प्रथम दृष्टया, जाँच अधिकारी के विशिष्ट निष्कर्षों के आधार पर कदाचार है, न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि पिछले दिनों एक ऐसा ही मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से सामने आया था। जिले के रमाला थाने में बतौर सब इंस्पेक्टर (एसआई) तैनात इंतसार अली ने बिना अनुमति पिछले कुछ समय से लंबी दाढ़ी रखी हुई थी, नतीजतन उन्हें पुलिस अधीक्षक ने निलंबित कर दिया गया था।

हालाँकि, बाद में इंतसार अली ने अपनी दाढ़ी कटवा ली। दाढ़ी कटवाने के बाद शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को वह एसपी बागपत के समक्ष पेश हुए, जिसके बाद एसपी अभिषेक सिंह ने उनका निलंबन वापस लेते हुए उन्हें बहाल कर दिया। 

‘बहन की गाली’ और रक्षाबंधन – पत्रकार तनवीर अली ने ऐसे उड़ाया हिंदू पर्व का मजाक, मीडिया कंपनी से कार्रवाई की माँग

मीडिया संस्थान ‘TV9 भारतवर्ष’ के पत्रकार तनवीर अली ने हिन्दुओं के त्योहार रक्षाबंधन को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। तनवीर अली ने सोशल मीडिया पर लिखा, “बहन की गाली देने वाले आज त्योहार मना रहे हैं।” उन्होंने रक्षाबंधन के दिन ये टिप्पणी की, जिस दिन बहन अपनी भाई को राखी बाँधती है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को सम्मान देने वाले त्योहार पर इस तरह की टिप्पणी से लोग आक्रोशित हो गए।

‘हिन्दू आईटी सेल’ ने तनवीर अली के आपत्तिजनक पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए ‘TV9 भारतवर्ष’ को टैग करते हुए बताया कि आपका एक कर्मचारी रक्षाबंधन के पवित्र त्योहार को बदनाम कर रहा है, जिसे दुनिया भर में हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है। ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने मीडिया संस्थान से पूछा कि क्या वो इस तरह की बातों को बढ़ावा देते हैं या उक्त पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी?

साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर तनवीर अली के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो सोशल मीडिया पर चैनल का बहिष्कार किया जाएगा। इसके बाद एक महत्वपूर्ण अपडेट शेयर करते हुए ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने जानकारी दी कि वो ‘हिन्दूफोबिक’ कर्मचारी द्वारा आपत्तिजनक ट्वीट करने के मामले में ‘TV9 भारतवर्ष’ के प्रबंधन से संपर्क में है। साथ ही लिखा, “देखते हैं, वो इस मामले में क्या कदम उठाते हैं।”

सिर्फ तनवीर अली ही नहीं, कई फेमिनिस्टों व लिबरल गैंग के लोगों ने रक्षाबंधन को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर अभियान चलाया। @Sahas_1015 नाम के ट्विटर यूजर ने इसे असमानता और भेदभाव का त्योहार बताने के लिए एक सीरीज चलाया, जिसमें कई लोगों ने इसे पितृ सत्तात्मक तो कई ने इसे बँधन में बाँधना बताया। बिहार की सोनाली का कहना है कि क्यों राखी भाई की कलाई पर ही बाँधी जाती है? क्यों भाई ही बहन की रक्षा करेगा? वो अपनी रक्षा खुद क्यों नहीं कर सकती? इसलिए उसने इस बार खुद को राखी बाँधने का फैसला किया।

नताशा नाम की यूजर ने लिखा, “आज बहनें अपनी सुरक्षा की आशा के साथ भाइयों को धागा बाँधने का जश्न मना रही हैं #रक्षा, वही भाई जो अपनी बहनों और महिलाओं को सामान्य रूप से गाली देते हैं, और अपने ‘मर्दाना कर्तव्यों’ को करने के लिए उनकी पीठ थपथपाते हैं।” सुमन सिद्धू ने लिखा, “यह इस विचार को बढ़ावा दे रही हैं कि भाइयों को पितृसत्ता के कारण अपनी बहनों की रक्षा करनी चाहिए। महिलाओं को सुरक्षा के लिए एक पुरुष की आवश्यकता है। स्पष्ट तौर पर यह एक बेतुका त्योहार है।”

अफगानिस्तान से सिखों को ही नहीं, गुरुग्रंथ साहिब भी ला रही मोदी सरकार: सिर पर पवित्र पुस्तकों को रख विमान का इंतजार

अफगानिस्तान से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए भारत लगातार प्रयासरत है। इसी क्रम में अफगान में फँसे हिंदू और सिखों की मदद भी की जा रही है। ताजा जानकारी के अनुसार अफगानिस्‍तान की राजधानी काबुल में फँसे भारतीय नागरिकों समेत 46 अफगान हिंदू और सिखों को एक विमान के जरिए भारत लाया जा रहा है। खास बात यह है कि वहाँ से ये लोग विमान में तीन श्री गुरुगंथ साहिब साथ में ला रहे हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, “भारतीय वायु सेना के विमान से अफगानिस्तान में फँसे भारतीय नागरिकों और 46 अफगान हिंदुओं और सिखों के साथ तीन श्री गुरु ग्रंथ साहिब को भारत लाया जा रहा है।”

वीडियो में देख सकते हैं कि कई सिख एक गाड़ी में बैठे हैं और कोई एक व्यक्ति श्री गुरु ग्रंथ साहिब की वीडियो रिकॉर्ड करते हुए बता रहा है कि वो लोग बस प्लेन में बैठने जा रहे हैं। वीडियो में देख सकते हैं कि भारत से मदद पाकर ये अफगानी सिख भारत सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्रालय और पुनीत सिंह का आभार जता रहे हैं। सिखों का कहना है कि उनकी मदद करके उन्हें अफगानिस्तान से बाहर निकाला जा रहा है।

इसके अलावा एक तस्वीर सामने आई है जिसमें तीन सिख श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सिर पर लेकर एयरपोर्ट पर प्लेन का इंतजार कर रहे हैं। इस तस्वीर को पिक्चर ऑफ द डे बता कर कई यूजर्स भावुक हो रहे हैं और ‘जो बोले सो निहाल’ कहते हुए भारत को आभार दे रहे हैं।

भाजपा कार्यकर्ता तजिंदर सिंह लिखते हैं, “अफ़गानिस्तान से श्री गुरु ग्रंथ साहिब का भारत लाया जाना भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को मानने वाली संस्कृति का प्रतीक है जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार हर धर्म के हमारे भाइयों बहनों की आस्था, विश्वास और श्रद्धा के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है!”

बता दें कि इससे पहले भारत ने अफगान से अपने नागरिकों को निकालने के प्रयास में करीबन 400 लोगों को एयरलिफ्ट किया था। इनमें 60 अफगानी थे जिनमें 23 सिख और हिंदू थे। इनके अलावा इनमें वहाँ के दो सांसद (अनारकली होनारयार और नरेंद्र सिंह खालसा) भी शामिल थे। एक अफगान महिला ने भारत की जमीन पर कदम रखते ही भारत का धन्यवाद दिया था। महिला ने कहा था कि तालिबान ने उनका घर जला दिया। वो भारत की मदद के लिए धन्यवाद देती हैं।

खालसा ने रिपोर्टरों से बात करते हुए कहा, “भारत हमारा दूसरा घर हैं। चाहे हम अफगान में ही रहे लेकिन तब भी वहाँ के लोग हमें हिंदुस्तानी कहते थे। मैं इस मदद के हाथ के लिए धन्यवाद देता हूँ।” वह कहते हैं, “मुझे रोना आ रहा था। सब कुछ बर्बाद हो गया। देश छोड़ने का निर्णय बहुत ही दर्दनाक और दुखद था। ऐसा लगता है जैसे सब छिन गया।” वहीं होनरयार ने कहा, “मैं भारत का, पीएम मोदी का, विदेश मंत्रालय का, भारतीय वायुसेना का आभार व्यक्त करती हूँ कि उन्होंने काबुल से सब लोगों को लेकर उड़ान भरी और मेरी जान बचाई।”

पंजाब कॉन्ग्रेस की लड़ाई में पाकिस्तान की बल्ले-बल्ले: सिद्धू के सलाहकारों का ‘राष्ट्रविरोधी’ भांगड़ा, क्या टूटेगी आलाकमान की चुप्पी

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिद्धू के सलाहकारों द्वारा कश्मीर और पाकिस्तान पर दिए गए बयानों को गंभीरता से लिया है। उन्होंने इन सलाहकारों को सलाह दी कि वे अपनी भूमिका प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सिद्धू को सलाह देने तक सीमित रखें और राष्ट्रीय महत्व के संवेदनशील विषयों पर बयान देने से बचें।

मुख्यमंत्री सिंह के अनुसार इन सलाहकारों के बयान न केवल कश्मीर और पाकिस्तान पर भारत की विदेश नीति और आधिकारिक दृष्टिकोण के विरुद्ध हैं, बल्कि राष्ट्र विरोधी भी हैं। अमरिंदर सिंह के अनुसार सिद्धू के सलाहकारों के ये बयान राज्य और देश में शांति और स्थिरता के लिए खतरनाक हैं। अमरिंदर सिंह ने कहा है कि सिद्धू के इन सलाहकारों को ऐसे विषयों पर नहीं बोलना चाहिए जिनकी उन्हें समझ नहीं है।

उनके अनुसार ये बयान कश्मीर और पाकिस्तान पर भारत और कॉन्ग्रेस पार्टी के आधिकारिक दृष्टिकोण के विरुद्ध हैं और देशहित के साथ-साथ दल के हित को क्षति पहुँचाने वाले हैं। उन्होंने सिद्धू ने अनुरोध भी किया कि इससे पहले कि उनके ये सलाहकार भारत के हितों को और नुकसान पहुँचाए, वे उन्हें ऐसा करने से रोकें क्योंकि उनके बयान पूरी तरह से राष्ट्रविरोधी हैं।

सिद्धू के सलाहकार प्यारे लाल गर्ग ने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के उस बयान पर सवाल उठाया, जिसमें उन्होंने पाकिस्तान की यह कहते हुए आलोचना की थी कि वह राज्य में ड्रग और हथियार भेजकर अशांति फैलाना चाहता है। मुख्यमंत्री के इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए गर्ग ने कहा था कि पाकिस्तान की आलोचना पंजाब के हित में नहीं है।

इसके पहले सिद्धू के एक और सलाहकार मलविंदर सिंह माली ने कश्मीर पर टिप्पणी करते हुए अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि भारत और पाकिस्तान दोनों ने कश्मीर पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। इसी पोस्ट में माली ने यह भी लिखा था कि अफगानिस्तान को तालिबान एक बेहतर शासन व्यवस्था देगा। माली के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और माली के ऐसे बयान से राष्ट्रहित को क्षति पहुँचती है।

सिद्धू के इन सलाहकारों के राष्ट्र विरोधी बयानों पर अमरिंदर सिंह से जैसी प्रतिक्रिया अपेक्षित थी, उन्होंने वैसी ही दी। इस बात से कौन भारतीय असहमत होगा कि उनके, कॉन्ग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व और सिद्धू के बीच आतंरिक राजनीतिक मुद्दे चाहे जैसे हों पर ऐसे बयानों का सार्वजनिक तौर पर विरोध होना चाहिए। हमें यह याद रखना आवश्यक है कि पंजाब भारत के सीमावर्ती राज्यों में सबसे महत्वपूर्ण है और पाकिस्तान वहाँ से निकलने वाले ऐसे बयानों को अपने प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल करता रहा है।

पर इन घटनाओं से जो प्रश्न उठते हैं वे कई दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। पहला प्रश्न यह उठता है कि पंजाब कॉन्ग्रेस में क्या सब कुछ ठीक है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर दल के अंदर का राजनीतिक माहौल कितना खराब है? प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के सलाहकार यदि मुख्यमंत्री के बयान पर ऐसी प्रतिक्रिया दें तो उसे कैसे देखा जाना चाहिए? यह प्रश्न भी उठता है कि सिद्धू या उनके सलाहकार के बयानों को कॉन्ग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व कैसे देखता है और उसकी क्या प्रतिक्रिया हो सकती है?

सिद्धू के सलाहकार गर्ग का यह कहना कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह द्वारा पाकिस्तान की आलोचना पंजाब के हित में नहीं है, कितना सामान्य है? प्रश्न यह भी उठता है कि इसे किस सीमा तक उनका अपना बयान माना जाना चाहिए, खासकर तब जब अमरिंदर सिंह और सिद्धू के बीच के मतभेद सबको पता हैं। क्या यह संभव है कि पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा पाकिस्तान की आलोचना भारत के हित में तो है, पर पंजाब के हित में नहीं है? पंजाब क्या भारत से अलग है?

किसी भी आम भारतीय के मन में यह प्रश्न उठेगा ही कि प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के सलाहकार का यह आचरण क्या खालिस्तान की वकालत करने वालों के आचरण के सामान नहीं है जो भारत और पंजाब के हितों में अंतर रखकर चलते हैं?

नवजोत सिंह सिद्धू और पाकिस्तान के वर्तमान राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व के बीच नज़दीकियाँ जगजाहिर हैं। सिद्धू इसे लेकर काफी हद तक ढीठ रहे हैं और इसे अपना व्यक्तिगत मामला बताते हैं। कॉन्ग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इसे लेकर अपनी तरफ से कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। पर ऐसा कैसे हो सकता है कि भारत के किसी भी नेता और पाकिस्तान के सैनिक और राजनीतिक नेतृत्व के बीच नज़दीकियाँ व्यक्तिगत हों? ऐसा भी नहीं है कि कॉन्ग्रेस पार्टी में सिद्धू अकेले ऐसे नेता नहीं हैं जो पाकिस्तान को लेकर ऐसे विचार रखते हैं।

भारतीय सेना या वायुसेना द्वारा पाकिस्तान में किए गए ऑपरेशन को लेकर इन नेताओं ने कैसे बयान दिए या कैसा आचरण किया, इसे पूरा देश जानता है। ऐसे में राज्य और देश की जनता के लिए यह जानना आवश्यक है कि जो दल उससे वोट माँगकर केंद्र या राज्य में सरकार बनाना चाहता है, उसका अपने नेताओं के ऐसे राजनीतिक आचरण या बयानों पर अपना दृष्टिकोण क्या है? अपनी सुविधानुसार अपने नेताओं के बयानों से दूरी बना लेना कॉन्ग्रेस आलाकमान की पुरानी राजनीतिक चाल रही है। पर पाकिस्तान के मामले में सिद्धू या अन्य नेताओं के आचरण को देश के भीतर किए जाने वाले आम राजनीतिक आचरण से अलग रखकर देखा जाएगा।

ऐसे में दल के लिए अपने नेताओं द्वारा पाकिस्तान या अन्य अंतरराष्ट्रीय विषयों पर दिए गए बयानों से अलग रखना अब कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए आसान न होगा। मणिशंकर अय्यर हों, राहुल गाँधी हों या फिर नवजोत सिंह सिद्धू, कॉन्ग्रेस के नेताओं के ऐसे बयानों को पाकिस्तान अपने अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल करता रहा है। दल का आलाकामन भी ढीठता दिखाते हुए खुद को इन बयानों से आसानी से अलग रखता रहा है। पर सुरक्षा की दृष्टि से भारतीय उप महाद्वीप की वर्तमान हालत और सम्बंधित खतरों को देखते हुए यह आवश्यक है कि कॉन्ग्रेस पार्टी देशहित के विषयों पर अपने या नेताओं के बयान को लेकर न केवल जिम्मेदार रहे, बल्कि देश के प्रति अपनी जबाबदेही के प्रति भी गंभीर दिखे।

सिद्धू ने ‘गन्ना किसानों’ पर अमरिंदर सरकार को घेरा, विवादित सलाहकारों को भी किया तलब: पंजाब कॉन्ग्रेस में फिर वही रार

पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने राज्य के गन्ना किसानों को मिलने वाले मूल्य को लेकर मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि पंजाब में हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से भी कम दाम गन्ना किसानों को मिल रहा है। साथ ही सिद्धू ने कश्मीर को अलग देश बताने औऱ पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी की विवादित तस्वीर शेयर करने पर मचे बवाल के बीच अपने दोनों सलाहकारों मालविंदर सिंह माली और प्यारे लाल गर्ग को तलब कर लिया है।

दरअसल, पहले माली ने फेसबुक पर कश्मीर को लेकर विवादित पोस्ट किया था, जिसमें केंद्र शासित प्रदेश को अलग देश बताया था। इसके बाद उन्होंने एक पोस्ट और सोशल मीडिया पर शेयर किया, जो कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का था। उनके इस पोस्ट के बाद न केवल कॉन्ग्रेस में सियासी घमासान शुरू हो गया। बहरहाल, विवाद बढ़ने के बाद प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने दोनों एडवाइजरों को तलब किया है।

इस मामले में कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्यारे लाल गर्ग औऱ माली को देश द्रोही करार दिया। इसके साथ ही तिवारी ने कहा कि सिद्धू के दोनों सलाहकार न केवल राज्य, बल्कि देश की स्थिरता के लिए भी बड़ा खतरा हैं।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, तिवारी ने कहा, “1994 में संसद में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के अनुसार जम्मू औऱ कश्मीर देश का अटूट अंग है। अगर देश के बंटवारे के बाद कोई काम बचा है तो वो उन इलाकों को वापिस लेना है जिनपर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है। ऐसे में इस तरह की बात करने वालों को पार्टी तो छोड़िए देश में रहने का अधिकार है?”

बता दें कि जो कार्टून सिद्धू के एडवाइजरों ने शेयर किया था, उसमें इंदिरा गाँधी के पीछे भी खोपडियों का ढेर लगा हुआ है और इस पेज पर पंजाबी में लिखा था, “हर जबर दी इही कहाणी, करना जबर ते मुँह दी खाणी’, अर्थात ‘हर जुल्म करने वाले की यही कहानी है अंत में उसे मुँह की खानी पड़ती है।’ एक तरह से उन्होंने सिख दंगों के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए और स्वर्ण मंदिर में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए इंदिरा गाँधी का ये स्केच शेयर किया था।

इस मामले में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि सिद्धू के सलाहकारों की टिप्पणी भयावह है, जो देश की खराब इमेज दिखाती है। यह कॉन्ग्रेस की विचारधारा को दिखाता है। पात्रा ने राहुल गाँधी से सवाल किया कि क्या वो जवाब देंगे कि उन्होंने सिद्धू के सलाहकार नियुक्त किए हैं?

सिद्धू ने अमरिंदर सिंह को घेरा

सलाहकारों के सोशल मीडिया पोस्ट पर मचे बवाल के बीच पंजाब कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अपनी ही सरकार को गन्ना किसानों के बहाने घेरा है। उन्होंने कहा, “गन्ना किसानों के मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से तत्काल हल करने की जरूरत है। अजीब बात यह है कि पंजाब में खेती की लागत अधिक होने के बावजूद राज्य का सुनिश्चित मूल्य हरियाणा/यूपी/उत्तराखंड की तुलना में बहुत कम है। कृषि के पथ प्रदर्शक के रूप में पंजाब एसएपी बेहतर होना चाहिए!”

‘अकबर महान, जहाँगीर ईमानदार व सहिष्णु, शाहजहाँ आर्किटेक्चर किंग’: भारत सरकार के पोर्टल पर मुगलों का महिमामंडन

जहाँ एक तरफ पूरे देश में आक्रांता मुगलों की करतूतों को लेकर आक्रोश का माहौल है, वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार की ही वेबसाइट पर मुगलों का महिमामंडन किया गया है। भारत सरकार का एक पोर्टल है – ‘Know India‘, जिस पर देश के इतिहास-भूगोल से लेकर भारतीय संविधान व इससे जुड़ी अन्य जानकारियाँ दी जाती हैं। ‘Know India’ पर भारत के विभिन्न पदों, सम्मान व संस्कृति व अन्य सामान्य ज्ञान से सम्बंधित सूचनाएँ रहती हैं।

इस पोर्टल पर मुगलों शासन को ‘सबसे महान साम्राज्यों में से एक’ बताया गया है। साथ ही मुग़ल शासन की ‘संस्कृति व राजनीति’ को समृद्ध बताते हुए भारत को एक करने का श्रेय भी उसे दे दिया गया है। लुटेरे तैमूर को भी इसमें महान कहा गया है और लिखा है कि मुगलों ने टुकड़ों में बँटे कई हिन्दू-मुस्लिम राज्यों को एक किया। मुगलों के साथ-साथ शेरशाह सूरी को भी योग्य प्रशासक बताते हुए जमीन के माप व राजस्व इकट्ठा करने के तरीकों के लिए उसकी तारीफ़ की गई है।

लिखा है कि उसके राज में आम आदमी को न्याय मिला। सड़कें व कुऍं बनवाने के साथ-साथ उसे ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ बनवाने का क्रेडिट भी दिया गया है। अकबर को मुग़ल साम्राज्य को मजबूत करने का क्रेडिट देते हुए लिखा है कि कई लड़ाइयों के बाद उसने भारत के अधिकतर हिस्सों को जीता और राजपूतों के प्रति मेल-मिलाप की रणनीति अपनाई। अकबर को ‘महान विजेता, योग्य व्यवस्थापक और कुशल प्रशासक’ बताया गया है।

साथ ही नॉन-मुस्लिमों के प्रति अकबर की नीतियों को लिबरल बताते हुए उसकी तारीफ़ में लिखा है कि उसने धर्म को लेकर कई एक्सपेरिमेंट्स किए। वहीं जहाँगीर को एक ‘अत्यधिक जोशीला प्रेमी’ बताते हुए लिखा है कि किस तरह बीवी नूरजहाँ के हाथ में उसने प्रशासनिक कार्य सौंप रखे थे। उसे ‘ईमानदार और सहिष्णु’ बताया गया है। हिन्दुओं, यहूदियों व ईसाईयों के प्रति उसकी ‘सहिष्णुता’ की चर्चा करते हुए लिखा है कि उसने कला, साहित्य और वास्तुकला को बढ़ावा दिया।

भारत सरकार की वेबसाइट पर मुगलों का महिमामंडन

इतना ही नहीं, बड़े आराम से लिख दिया गया है कि जहाँगीर के विद्रोही बेटे खुसरो को शरण देने के कारण उसके आदेश पर सिखों के 5वें गुरु अर्जुन देव को ‘प्राणदंड’ दिया गया। साथ ही शाहजहाँ के बारे में लिखा है कि उसके समय मुग़ल काफी उच्च स्तर पर था, जो 100 सालों के असाधारण ‘शांति और समृद्धि’ का परिणाम था। उसे ‘आर्किटेक्चर किंग’ बताते हुए ‘Know India’ ने लिखा है कि लाल किला व जामा मस्जिद इसके उदाहरण हैं।

‘Know India’ ने शाहजहाँ व औरंगजेब की भी तारीफ़ की

साथ ही औरंगजेब के भी करतूतों की चर्चा नहीं की गई है और लिखा है कि उसने पाँचों बेटों को राजदरबार से दूर रखा, जिससे वो कुशल प्रशासक नहीं बन पाए। इसे मुगलों के पतन का कारण बताया गया है। साथ ही लिखा है कि मुग़ल साम्राज्य उसके काल में अपने उच्चतम स्तर पर पहुँचा और उसमें सम्पूर्ण उप-महाद्वीप का शासन बनने की महत्वाकांक्षा थी। बताया गया है कि मृत्यु के बाद उसने कोई व्यक्तिगत संपत्ति नहीं छोड़ी। लोगों ने मुगलों के महिमामंडन का विरोध किया है।