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राहुल गाँधी का समर्थन में ‘ट्विटर बर्ड’ तलकर मशहूर हुए युवा नेता को कॉन्ग्रेस ने किया निलंबित, लगाया पार्टी की छवि खराब करने का आरोप

आंध्र प्रदेश में राहुल गाँधी के अकाउंट को लॉक करने पर ट्विटर का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस नेता को पार्टी से निलंबित कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि ‘ट्विटर बर्ड’ को तलने और पार्टी की छवि खराब करने के आरोप में आंध्र प्रदेश कॉन्ग्रेस ने युवा नेता जीवी श्रीराज को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से शुक्रवार (20 अगस्त) को निलंबित कर दिया। सोशल मीडिया पर नेता द्वारा अलग अंदाज में विरोध जताने का वीडियो वायरल होने के बाद पार्टी ने यह कदम उठाया।

दरअसल, बीते दिनों कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और उनकी पार्टी के नेताओं का ट्विटर अकाउंट लॉक होने के बाद कई कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया था। हालाँकि, अब फिर से राहुल का ट्विटर अकाउंट बहाल कर दिया गया है।

श्रीराज को लिखे गए पत्र में कहा गया है कि वह हाल ही में पार्टी में शामिल हुए हैं और कॉन्ग्रेस व राहुल गाँधी की छवि खराब कर रहे हैं। पार्टी ने कहा कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से ट्विटर बर्ड के नाम पर एक पक्षी को फ्राई किया और अहिंसा में विश्वास रखने वाली पार्टी की छवि धूमिल की।

पत्र में आगे लिखा गया है कि पार्टी में शामिल हर व्यक्ति को उसकी विचारधारा का पालन करना चाहिए। आपके इस कृत्य से लोगों में खासा नाराजगी है। इसके साथ ही इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि श्रीराज राहुल गाँधी के नाम का इस तरह से इस्तेमाल करने के आदी हो गए हैं, जिससे पार्टी के मूल्यों का क्षरण होता है।

पार्टी का कहना है कि यह कृत्य कॉन्ग्रेस नेता द्वारा स्वतंत्र रूप से और बिना किसी स्वीकृति के किया गया है। उन्होंने ऐसा करने से पहले पार्टी को सूचित करना भी जरूरी नहीं समझा। इसलिए उन्हें पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया गया है।

प्रदर्शन करने वाले कॉन्ग्रेस नेता जीवी श्रीराज ने कहा था, ”हम लोगों ने ट्विटर डिश बनाई है और इसे ट्विटर के हेडक्वॉर्टर्स भेज रहे हैं। ये ट्विटर के उस एक्शन के विरोध में है, जिसमें उसने राहुल गाँधी का अकाउंट लॉक किया था।” वहीं, जीवी के साथ मौजूद एक कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ता ने कहा कि हम चाहते हैं कि ट्विटर इस डिश का स्वाद चखे और आगे से ऐसी कार्रवाई करने से बचे।

गौरतलब है कि जीवी श्रीराज पूर्व सांसद और कॉन्ग्रेस नेता जीवी हर्ष कुमार का बेटा है। बीते दिनों ट्विटर कंपनी ने नियमों का उल्लंघन करने पर राहुल गाँधी के अकाउंट को लॉक कर दिया था। इसके विरोध में सोमवार (16 अगस्त) को जीवी ने ट्विटर पक्षी के जैसे दिखने वाले बटेर पक्षी को सार्वजनिक रूप से तेल में तल दिया था। श्रीराज और कुछ अन्य कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पूर्वी गोदावरी जिले के राजमुंदरी में पक्षी को तला था। बाद में उन्होंने मुंबई के ट्विटर कार्यालय में तली हुई चिड़िया को कुरियर से भेजा था।

बता दें कि राहुल गाँधी ने दिल्ली की 9 साल की रेप पीड़िता के माता-पिता से मुलाकात करते हुए एक तस्वीर ट्वीट की थी, जिसके बाद देश के कानून का उल्लंघन करने पर ट्विटर ने उनका अकाउंट लॉक कर दिया था। हालाँकि, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता और पार्टी के नेता इसका विरोध करते हुए आरोप लगाते रहे हैं कि ट्विटर ने मोदी सरकार के इशारे पर ऐसा किया है। राहुल के ट्विटर अकाउंट को फिर से बहाल कर दिया गया है।

नाबालिग लड़की से रेप, जमानत पर आते ही भगा ले जाने की धमकी… पीड़िता के पिता ने जान से मार डाला

गुजरात के राजकोट में एक नाबालिग लड़की से रेप के आरोपित 32 साल के व्यक्ति की पीड़िता के पिता द्वारा कथित तौर पर हत्या करने का मामला सामने आया है। वारदात गुरुवार (19 अगस्त 2021) को हुई। मृतक रेप आरोपित विजय मेर के भाई की शिकायत पर पुलिस ने पीड़िता के पिता और उनके दोस्त दिनेश को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपित विजय मेर जमानत पर जेल से बाहर आया था।

राजकोट के कनक नगर के रहने लवाले विजय मेर के भाई अश्विन मेर (35) ने पीड़िता के पिता (42) और उनके सहयोगी दिनेश रांगापाड़ा (30) के खिलाफ हत्या के मामले में केस दर्ज कराया था।

पुलिस को दी गई शिकायत के अनुसार विजय मेर अक्टूबर 2020 में आरोपित की नाबालिग बेटी के साथ भाग गया था। इसके बाद नाबालिग लड़की के पिता ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) के तहत मेर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

पीड़ित लड़की के पिता ने गुजरात हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी, जिसके बाद पुलिस ने नाबालिग और मेर को ट्रेस करना शुरू किया था। पुलिस जाँच में उनका पता चला था कि वो दोनों जूनागढ़ के मनावदर शहर में रह रहे थे। लोकेशन ट्रेस होने के बाद मार्च 2021 में दोनों को वापस लाया गया था।

इसके बाद रेप के आरोप में विजय मेर के गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसके बाद से ही वह जेल में था। पुलिस के मुताबिक, मृतक विजय मेर को कुछ सप्ताह पहले ही जमानत पर छोड़ा गया था। उसकी हत्या पर पुलिस ने बताया:

“जमानत पर बाहर आने के बाद विजय मेर ने लड़की के पिता को फोन कर उनकी लड़की को फिर से भगा ले जाने की धमकी दी। इसके बाद लड़की के पिता ने कसम खाई कि जब तक वो आरोपित को जान से नहीं मार देंगे, तब तक अपना बाल नहीं कटाएँगे। इसके बाद इस वारदात को अंजाम देने के लिए लड़की के पिता ने अपने सहयोगी दिनेश की सहायता से गुरुवार को मेर के घर के पास ही एक तेजधार हथियार से उसकी हत्या कर दी।”

पुलिस का दावा है कि सीसीटीवी फुटेज में मेर की हत्या करते हुए आरोपितों को देखा गया है। जिस वक्त वारदात को अंजाम दिया गया, उस दौरान वो अपने घर के पास ही किसी के साथ बैठा हुआ था। जाँच में उसके शरीर पर 12 से भी ज्यादा घाव के निशान मिले हैं। फिलहाल दोनों आरोपितों से पूछताछ की जा रही है।

स्टानिकजई ने भारत में ली थी ट्रेनिंग, आज टॉप के 7 तालिबानी शासकों में से एक: IMA के बैचमेट बुलाते थे ‘शेरू’

तालिबान 15 अगस्त को काबुल पर कब्जा कर एक बार फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हो गया है। अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके प्रशासन के बड़े नेता और अधिकारी देश छोड़कर जा चुके हैं। वहीं, अफगानिस्तान के नागरिक मुसीबत में हैं। अमेरिका के साथ 20 साल तक चले लंबे संघर्ष के बाद तालिबान फिर से अफगानिस्तान की सत्ता पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा।

तालिबान इस्लामी खिलाफत स्थापित करने के लिए और जिहाद जारी रखने के लिए विभिन्न पृष्ठभूमि के आतंकवादियों को हमेशा से पनाह देता रहा है। इसे सात शक्तिशाली नेताओं के एक समूह द्वारा चलाया जाता है, जिनमें से एक बेहद कट्टर नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्टानिकजई तालिबान के प्रमुख चेहरों में एक है। स्टानिकजई के सरकार में शामिल होने की आंशका जताई जा रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं स्टानिकजई का भारत से भी गहरा संबंध रहा है।  

तालिबानी नेतृत्व का प्रमुख चेहरा स्टानिकजई कभी उत्तराखंड के देहरादून में प्रतिष्ठित भारतीय सैन्य अकादमी (आइएमए) के 1982 बैच में रह चुका है। यहाँ उसके सहपाठी उसे प्यार से ‘शेरू’ कह कर बुलाते थे। बताया जाता है कि जब वह आईएमए में भगत बटालियन की केरेन कंपनी में शामिल हुआ था, तब वह 20 साल का होने वाला था। उसने भारत-अफगान रक्षा सहयोग कार्यक्रम के तहत भारत की यात्रा की। उसके साथ 44 अन्य विदेशी कैडेट भी इस बटालियान का हिस्सा थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्टानिकजई जब देहरादून में था तब उसके विचार बिल्कुल भी कट्टरपंथी नहीं थे। वह बहुत ही मिलनसार और साधारण व्यक्ति था। वह एक आम अफगान कैडेट था, जो यहाँ अपने समय का लुत्फ उठा रहा था। भारतीय सैन्य अकादमी में उसके कई बैचमेट उसे काफी पंसद करते थे और आज भी मिलनसार व्यक्ति के रूप में याद करते हैं।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि आईएमए में ट्रेनिंग लेने वाले एक अफगान सैनिक को एक कट्टरपंथी तालिबान नेता में कैसे बदल दिया गया? सैन्य बलों से इस्लामी आतंकवादी संगठन तालिबान की ओर उनके कदम कैसे बढ़े?

अफगान सेना में स्टानिकजई के प्रारंभिक वर्ष और IMA में उनका प्रशिक्षण

लोगार प्रांत के बाराकी बराक जिले में 1963 में स्टानिकजई का जन्म हुआ था। वह मूल रूप से पश्तून हैं और तालिबान में सबसे अधिक पढ़े-लिखे नेता है। राजनीति विज्ञान में मास्टर्स करने के बाद शेर मोहम्मद स्टानिकजई ने डेढ़ साल में आईएमए में अपना प्री-कमीशन प्रशिक्षण पूरा किया था।

स्टानिकजई के सहपाठी रह चुके मेजर जनरल डीए चतुर्वेदी (सेवानिवृत्त) आईएमए के दिग्गजों में से एक हैं, जिन्होंने उसके साथ प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि जब वह देहरादून में था तब उसके विचार बिल्कुल कट्टरपंथी नहीं थे। वह अकादमी में अन्य कैडेटों की तुलना में थोड़ा बड़ा लगता था। स्टानिकजई की मूंछें काफी आकर्षक थीं और उस समय उनका कोई कट्टरपंथी विचार नहीं था। वह तो केवल अपने सुखद पलों को जी रहा था। मालूम हो कि चतुर्वेदी परम विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक और सेना पदक प्राप्त कर चुके हैं। 

एक अन्य बैचमेट कर्नल केसर सिंह शेखावत (सेवानिवृत्त) भी स्टानिकजई के सहपाठी रह चुके हैं। उन्हें एक साथ प्रशिक्षण के दौरान अपने समय का एक किस्सा याद आता है जब वे सप्ताहांत में लंबी पैदल यात्रा कर ऋषिकेश गए और गंगा नदी में स्नान किया। कर्नल शेखावत ने अंग्रेजी अखबार को बताया है ऋषिकेश में जब हम गंगा नदी में नहाने गए थे तबकी तैराकी की चड्डी में उनकी एक तस्वीर मौजूद है।

तालिबान में कैसे शामिल हुआ

उस समय तक भारतीय सैन्य संस्थान ने अफगानों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वह लेफ्टिनेंट के रूप में अफगान नेशनल आर्मी में शामिल हुआ था। उसने सोवियत-अफगान युद्ध और अफगानिस्तान की मुक्ति के लिए लड़ाई लड़ी। इसके बाद साल 1996 में उसने सेना छोड़ दी और तालिबान में शामिल हो गया। 

लेकिन अफगान बलों के साथ उनके समय और उनके अंतरराष्ट्रीय अनुभव ने उन्हें तालिबान से अलग कर दिया। न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित एक लेख में, स्टानिकजई के पुराने दोस्त ने कहा कि वह शुरू में आतंकवादी संगठन के साथ अच्छी तरह से फिट नहीं थे।

हालाँकि, बाद में जब साल 1996 से 2001 के बीच जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर शासन किया, त​ब स्टानिकजई को उपविदेश मंत्री बनाया गया था। वह तालिबान शासन के दौरान अक्सर विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देता था। बताया जाता है कि वह काफी अच्छी अंग्रेजी बोलता था।

1996 में, स्टानिकजई ने क्लिंटन प्रशासन से तालिबान शासित अफगानिस्तान की राजनयिक मान्यता प्राप्त करने के लिए कार्यवाहक विदेश मंत्री के रूप में वाशिंगटन डीसी की यात्रा की थी। बाद में जब अमेरिका ने तालिबान को अफगानिस्तान से उखाड़ फेंका तो स्टानिकजई भी बाकी कमांडर्स के साथ विदेश भाग गया था।

बता दें कि अफगानिस्तान में एक बार फिर तालिबान शासन करने की तैयारी में है। इसका शीर्ष नेतृत्व कौन है, सरकार में कौन शामिल होगा, इस बात को लेकर दुनिया भर में चर्चा जोरों पर है।

काबुल में तालिबान द्वारा ‘किडनैप’ किए गए सभी 150 भारतीय सुरक्षित, अगली उड़ान से आ रहे हैं वापस

अफगानिस्तान के स्थानीय पत्रकारों ने दावा किया कि तालिबान ने काबुल हवाई अड्डे से लगभग 150 भारतीयों का अपहरण कर लिया है। हालाँकि बाद में, तालिबान ने इन आरोपों को खारिज कर दिया और रिपोर्ट का खंडन किया। अब, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह दावा किया जा रहा है कि सभी भारतीय सुरक्षित हैं।

अफगानिस्तान में भारतीयों के मौजूदा हालात को लेकर पत्रकार आदित्य राज कौल के मुताबिक भारत सरकार के सूत्रों ने जानकारी दी है कि काबुल में सभी भारतीय सुरक्षित हैं और भारतीय राजनयिकों के संपर्क में हैं। उन्होंने बताया कि अब इन लोगों को स्वदेश वापस लाने की तैयारी चल रही है।

सूत्रों के हवाले से ऑपइंडिया को भी इस बात की जानकारी मिली है कि वापस आने वाले सभी भारतीय सुरिक्षत हैं और उन्होंने फ्लाइट ले ली है।

ज्ञात हो कि कुछ दिन पहले जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया था उसके बाद भी भारतीयों को वहाँ से निकालने में मदद की थी। दरअसल, तालिबान द्वारा लगाए गए सड़क बैरियर्स के कारण भारतीय हवाईअड्डे तक नहीं पहुँच पा रहे थे। इसके बाद कथित तौर पर भारत सरकार ने तालिबान से भारतीयों को देश छोड़ने की अनुमति देने के लिए संपर्क किया था।

तालिबान के काबुल शहर में पहुँचने के बाद भारतीय दूतावास में जमा हुए लगभग 50 लोगों को रविवार को ही निकाल लिया गया था, और बाकी लगभग 150 लोगों को अगले दिन निकाला जाना था, क्योंकि भारत सरकार ने काबुल में मिशन को बंद करने का फैसला किया था।

गौरतलब है कि तालिबान ने रविवार (15 अगस्त 2021) को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था और वहाँ उसने राष्ट्रपति भवन को अपने कब्जे में ले लिया था। वहीं पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी देश ही छोड़ कर UAE चले गए थे।

राजमा से सेक्स एक्सपेरिमेंट: डॉक्टरों ने प्राइवेट पार्ट से निकाला 6 दाने, फँसने के बाद खुद चिमटे से कर रहा था कोशिश

अमेरिका के मिशिगन से बेहद अजीबोगरीब मामला सामने आया है। सोशल मीडिया पर 30 वर्षीय एक शख्स काफी चर्चा में है। बताया जा रहा है कि इस शख्स ने सेक्स एक्सपेरिमेंट के नाम पर अपने प्राइवेट पार्ट के अंदर 6 राजमा के दाने डाल लिए। ऐसा करते हुए शायद ही उसने सोचा होगा कि जिस काम को वह एंज्वॉयमेंट के लिए कर रहा है, उससे उसकी जान पर बन आएगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्राइवेट पार्ट में 6 राजमा के दाने डालने के बाद उस शख्स की हालत बहुत खराब हो गई, जिसके बाद उसे तत्काल पास के अस्पताल में भर्ती करवाया गया। डॉक्टर दर्द से कराहते हुए शख्स को ऐसी हालत में देखकर कुछ भी समझ नहीं पाए। उन्होंने बिना समय गँवाए तुरंत सर्जरी कर उसके प्राइवेट पार्ट के अन्दर से एक के बाद एक 6 राजमा के दाने निकाले।

सफल ऑपरेशन के कारण उस शख्स की जान बचाई जा सकी। डॉक्टर भी इस वाकया से बेहद हैरान थे कि उसके प्राइवेट पार्ट में राजमा के दाने कहाँ से आए?

शख्स के होश में आने के बाद डॉक्टरों ने सबसे पहले उससे इस मामले की जानकारी ली। तब उसने डॉक्टरों को बताया कि वो सेक्स एक्सपेरिमेंट कर रहा था। उसने अपने एन्जॉयमेंट के लिए प्राइवेट पार्ट में 6 राजमा के दाने डाल लिए, जो अचानक सरक कर अंदर चले गए।

उसने बताया कि वो हस्तमैथुन करके वीर्य-स्खलन के दौरान राजमा के इन दानों को वीर्य के साथ निकालने और उस स्थिति को फील करना चाहता था लेकिन उसकी सोच के अनुसार चीजें नहीं हुईं। इसके बाद वो खुद ही चिमटी से इन्हें निकालने की बहुत कोशिश की, लेकिन असफल रहा। इसके बाद राजमा के दाने उसकी पेशाब की नली में फँस गए, जिससे उसे पेशाब करने में कठिनाई हो रही थी। इसकी वजह से शख्स की जान पर बन आई।

जब डॉक्टरों ने सीटी स्कैन किया, तब उन्हें पता चला उसकी पेशाब की नली में 6 राजमा के दाने फँसे हुए हैं। इसके बाद उन्होंने तुरंत सर्जरी कर राजमा के दाने निकाले।

असम में तालिबान का समर्थन: मेडिकल स्टूडेंट नदीम और मौलाना सहित 14 गिरफ्तार, हिंदू आईटी सेल की शिकायत पर एक्शन में पुलिस

असम पुलिस ने 14 ऐसे लोगों गिरफ्तार किया है जिन्होंने सोशल मीडिया पर तालिबान के समर्थन में पोस्ट किया। इन सभी को शुक्रवार (20 अगस्त 2021) की रात गिरफ्तार किया गया है।

असम पुलिस के स्पेशल डीजीपी जीपी सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है जो सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान में तालिबान के क्रियाकलापों का समर्थन कर रहे थे। साथ ही डीजीपी सिंह ने बताया कि लोगों को यह हिदायत दी गई है कि वो किसी भी कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए सोशल मीडिया पर किसी भी तरह के आपत्तिजनक पोस्ट करने से बचें। रिपोर्ट्स के मुताबिक गिरफ्तार किए गए लोगों पर UAPA, IT एक्ट और सीआरपीसी की विभिन्न धाराएँ लगाई गई हैं।

पुलिस के एक अन्य अधिकारी ने सूचित किया कि पुलिस लगातार सोशल मीडिया पर नजर रखे हुए है। पुलिस की जानकारी के मुताबिक कामरूप मेट्रोपॉलिटन, बरपेटा, धुबरी और करीमगंज जिले से 2-2 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। इसके अलावा दरांग, कछार, हैलाकांडी, साऊथ कलमारा, गोलपारा और होजई से एक-एक व्यक्ति को आपत्तिजनक पोस्ट के चलते गिरफ्तार किया गया है।

इस मामले की जानकारी हिंदू आईटी सेल के कोर सदस्य रॉन बिकाश गौरव ने असम पुलिस की दी। स्थानीय लोगों के अनुसार नदीम अख्तर नाम का मेडिकल स्टूडेंट आदतन नफरत फैलाने वाला इंसान है। कयास है कि वह मेडिकल छात्रावास परिसर में भी नफरत फैला रहा था।

हिंदू आईटी सेल के अक्षित सिंह (सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर) ने ऑपइंडिया को बताया कि रॉन बिकाश गौरव की सूचना पर असम पुलिस तुरंत एक्शन में आ गई। मेडिकल स्टूडेंट नदीम अख्तर को गिरफ्तार करने के लिए असम पुलिस ने एक टीम का गठन किया। इसी टीम ने उसे गिरफ्तार भी किया।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक गिरफ्तार लोगों में मौलाना भी शामिल हैं। इसके अलावा नदीम अख्तर लश्कर नाम के एक मेडिकल स्टूडेंट को भी गिरफ्तार किया गया है। हैलाकांडी से गिरफ्तार लश्कर तेजपुर मेडिकल कॉलेज का छात्र है। बरपेटा से मजीदुल इस्लाम और फारुख हुसैन खान को गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तार लोगों के किसी कट्टरपंथी इस्लामी समूह से संभावित संबंधों की आशंका के चलते पूछताछ की जा रही है।

असम की डीआईजी वायलेट बरुआ ने कहा है कि असम पुलिस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर किए जाने वाले और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक तालिबान समर्थित कमेंट्स और पोस्ट पर कड़ी कार्रवाई कर रही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया जा रहा है और अगर लोगों की नजर में ऐसी किसी भी प्रकार की गतिविधि आती है तो उसकी सूचना पुलिस को दी जाए।

ज्ञात हो कि कई मुस्लिम धर्मगुरू और नेताओं के द्वारा तालिबान के समर्थन में बातें कही जा रही हैं ऐसे में यह स्वाभाविक है कि कट्टरपंथी स्वभाव के व्यक्ति भी तालिबान का समर्थन करने के लिए प्रेरित होंगे। पिछले कुछ दिनों से शायर मुनव्वर राना और देवबंद के मुफ्ती और फतवा ऑनलाइन के चेयरमैन मौलाना अरशद फारुकी समेत कई अन्य लोगों ने अफगानिस्तान में सत्ता स्थापित करने के लिए तालिबान की पीठ थपथपाई है।

एनसीपी MLA के करीबी ने ₹500 के लिए पालघर के आदिवासी को बनाया ‘गुलाम’: पिटाई से अपमानित कालू पवार ने लगाई फाँसी

महाराष्ट्र के पालघर जिले एनसीपी विधायक सुनील भुसारा के करीबी रामदास अंबु कोर्डे के खिलाफ एक आदिवासी को महज 500 रुपए के लिए गुलाम बनाने का मामला दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जिले के मोखाड़ा के रहने वाले आदिवासी कालू पवार ने कोर्डे के शोषण से तंग आकर पिछले महीने जुलाई में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

दरअसल, कालू पवार के 13 साल के बेटे का निधन हो गया था, जिसके अंतिम संस्कार के लिए उसने रामदास कोर्डे से 500 रुपए उधार लिए थे। पिछले साल उसका बेटा दीवाली के आसपास ही लापता हो गया था और पास के ही गाँव में वह रहस्यमय हालत में मृत पाया गया था। बेटे के अंतिम संस्कार का कर्ज चुकाने के लिए कोर्डे बीते कई महीने से पवार से अपने खेत में काम करवा रहा था। पवार की पत्नी सावित्रा ने अपनी शिकायत में खुलासा किया कि कोर्डे उनके पति को कर्ज लेने के समय से ही परेशान कर रहा था। पवार को कोर्डे के खेत में काम करने और मवेशियों को चराने के लिए ले जाने के लिए कहा गया था।

सावित्रा ने कहा, “दत्तू का अंतिम संस्कार करने के बाद, मेरे पति ने कोर्डे के खेत में काम करना शुरू कर दिया, लेकिन कोई दैनिक वेतन तय नहीं किया गया था। वह (कोर्डे) मेरे पति को सुबह केवल एक भाखरी और रात को भोजन देते थे। जब भी मेरे पति मजदूरी माँगते थे तो उन्हें मारने की धमकियाँ दी जाती थीं।”

पवार ने कोर्डे के खेत और घर में दोनों जगह काम किया। वह इस साल जून और जुलाई के महीने में लगातार कोर्डे के यहाँ काम करता था। इस बीच 10 व 11 जुलाई को बीमार होने के कारण केवल दो दिन आरोपित के यहाँ काम पर नहीं जा सका। हालाँकि, 12 जुलाई को ठीक होने के बाद पवार जब कोर्डे के घर गया तो उसने उसकी बेइज्जती करने के साथ उसे पीटा भी। इसी अपमान को नहीं सह पाने के कारण पवार ने आत्महत्या कर ली।

जिस दिन पवार ने फाँसी लगाई, उस दिन उनकी पत्नी भिवंडी में काम पर गई थीं, जबकि उनकी 16 साल की बेटियाँ धनश्री और 12 साल की दुर्गा अपने मामा के घर गई थीं। दफनाए जाने से पहले करीब 12 घंटे तक पवार का शव लटका रहा। हैरानी की बात यह है कि कोर्डे पवार की मौत की खबर सुनने के बाद उसके गाँव भी गया था, लेकिन उसने पुलिस को इसकी जानकारी तक नहीं दी।

सामाजिक कार्यकर्ता पवार के लिए लड़े

राज्य में आदिवासियों के कल्याण के लिए संघर्ष कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता विवेक पंडित ने पवार के दुर्भाग्यपूर्ण निधन पर संज्ञान लिया। इस मामले को उठाते हुए पंडित ने 4 अगस्त को पुलिस पर इस बात के लिए दबाव बनाया कि वो पवार के शव को जमीन बाहर निकाले, ताकि उसे पोस्टमार्टम के लिए मुंबई के जे जे अस्पताल भेजा जा सके।

पवार के गाँव पहुँचे सामाजिक कार्यकर्ता विवेक पंडित (साभार: मिड डे)

पंडित ने कोर्डे पर कई आरोप लगाए हैं। उन्होंने आरोपित को लेकर कहा, “वह (कोर्डे) भी महादेव कोली समाज का एक आदिवासी है, लेकिन वह इलाके में दूसरों का शोषण कर रहा है।” रिपोर्ट्स के जरिए पता चला है कि पंडित ने आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कराने के लिए एक महीना तक संघर्ष किया है।

कोर्डे को बचाने की कोशिश कर रहे एनसीपी विधायक

आदिवासी योजनाओं की स्थिति की जाँच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित पैनल के अध्यक्ष विवेक पंडित ने मिड-डे को दिए एक साक्षात्कार में खुलासा किया, “कोर्डे विधायक भुसारा के दाहिने हाथ हैं। इसीलिए भुसारा ने पुलिस पर उनके आदमी के खिलाफ कोई भी कार्रवाई नहीं करने के लिए दबाव बना रहे थे।”

उन्होंने कहा, “इस केस में एफआईआर दर्ज कराने से रोकने के लिए भुसारा ने मुझे बुलाया था। हालाँकि, एक महीने की भागदौड़ के बाद आरोपित के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है, लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।”

इस बीच विधायक भुसारा ने इन सभी आऱोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा, “कोर्डे के खिलाफ प्राथमिकी फर्जी है। अगर इस तरह की प्राथमिकी दर्ज की जाती है, तो एक समय आएगा जब किसी भी आदिवासी को खेत में काम करने के लिए नहीं बुलाया जाएगा।” वहीं पुलिस को कार्रवाई करने से रोकने के आरोपों को लेकर भुसारा का कहना है कि उन्होंने केवल पुलिस को कोर्डे के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले मामले की जाँच करने के लिए कहा था।

वहीं, मोखाड़ा थाना प्रभारी सतीश गवई ने कहा है, “हमने आरोपित कोर्डे के खिलाफ आईपीसी की धारा 374 (गैरकानूनी अनिवार्य श्रम) और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम की धारा 17 और 18 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है।”

लादेन भी चाहता था बायडेन बनें राष्ट्रपति… ताकि अमेरिका संकट में हो, अब US रक्षा विभाग भी काट रहा अपने लीडर की बात

अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी और तालिबानी शासन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन की दुनिया भर में आलोचना हो रही है। अब इन आलोचनाओं को सच साबित करता हुआ एक लेटर सामने आया है। यह लेटर अलकायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन ने अपनी मौत के पहले लिखा था। इस लेटर में कहा गया है कि ओसमा ने अलकायदा को बायडेन के खिलाफ साजिश करने से इसलिए रोक दिया क्योंकि उसे पता था कि बायडेन खुद ही अमेरिका को संकट में डालेंगे।

सन् 2011 में अमेरिका ने तत्कालीन अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में घुसकर मारा था। अपनी मौत से पहले मई 2010 में ओसामा ने आतिया अब्द अल-रहमान को 48 पन्नों का एक संदेश लिखा था। यह संदेश उन डॉक्यूमेंट्स में से एक था, जो उस जगह से मिले थे जहाँ ओसामा को मारा गया था। वैसे तो यह डॉक्यूमेंट्स सन् 2012 में ही सार्वजानिक किया गया था लेकिन उसका एक हिस्सा अफगानिस्तान के संकट के चलते चर्चा में है।

Daily Mail की रिपोर्ट के अनुसार 48 पन्नों के इस डॉक्यूमेंट के 36वें पन्ने में ओसामा ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अलकायदा के हिट स्क्वाड बनाने की इच्छा जताई थी। लक्ष्य था- तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को निशाना बनाना। ऐसा करने से जो बायडेन अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाते और इससे अमेरिका खुद एक संकट में फँस जाता। बायडेन की इसी अक्षमता के चलते ओसामा ने अलकायदा को उनके खिलाफ षड्यंत्र करने से मना कर दिया था।

अफगानिस्तान और अमेरिका से जुड़े दशकों पुराने घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि ओसामा ने जो सन् 2010 में कहा था, वह अब सही साबित हो रहा है क्योंकि न तो बायडेन और न ही उनके नेतृत्व में उनकी खुफिया एजेंसियाँ और पेंटागन, अफगानिस्तान में तालिबान की सही स्थिति का आकलन कर सके। 08 जुलाई 2021 को ही राष्ट्रपति बायडेन ने यह कहा था कि पूरे अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे की संभावना कम है और काबुल में किसी तरह की कोई अस्थिरता नहीं होगी।

Daily Mail की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार शुक्रवार (20 अगस्त 2021) को अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा राष्ट्रपति बायडेन के बयान का ही फैक्ट चेक कर दिया गया। बायडेन ने कहा कि अफगानिस्तान में अलकायदा को खत्म करने का मिशन सफल रहा और ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि काबुल में अमेरिकियों को कोई समस्या हुई हो। हालाँकि बायडेन के बयान के कुछ मिनटों के बाद ही रक्षा विभाग के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने स्वीकार किया कि अफगानिस्तान में अभी भी अलकायदा की उपस्थिति है और उनके पास तालिबान के द्वारा अमेरिकियों को पीटे जाने की रिपोर्ट भी आई है। इसके बाद यह सवाल उठने लगे कि क्या राष्ट्रपति बायडेन के पास ‘व्हाइट हाउस मैसेजिंग ऑपरेशन’ का नियंत्रण है भी या नहीं।

‘नंगा ही रहना चाहिए तुम्हें’ – कॉन्ग्रेसी नेता डॉ उदित राज के लिए कट्टरपंथी मुस्लिम क्यों लिख रहे असंसदीय भाषा?

अफगानिस्तान की महिलाओं को लेकर ‘विशेष रूप से चिंतित’ रहने वाले कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता उदित राज ने एक बार फिर तालिबान और इस्लाम पर प्रश्न उठाया है। हाल ही में उन्होंने अफगानिस्तान में धर्मांधता के कारण महिलाओं की दयनीय स्थिति पर ट्वीट कर चिंता जताई थी लेकिन उन्हें मुस्लिम कट्टरपंथियों की गंदी गालियों का सामना करना पड़ा था।

उदित राज ने एक बार फिर तालिबान के बहाने इस्लाम की बात की। उन्होंने ट्वीट करके कहा:

“तालिबानी महिलाओं का शोषण करें, बुर्का में कैद और ड्रग बेचकर पैसा कमाएँ, क्या यही इस्लाम है?”

इस ट्वीट के रिएक्शन में उदित राज को कट्टरपंथी मुस्लिम गालियाँ दे रहे थे। गालियाँ फिर भी ऐसी नहीं थीं, जिसे पचाया नहीं जा सके लेकिन… उदित राज पचा नहीं पाए। एक और ट्वीट कर दिया।

कट्टरपंथियों के लिए नया वाला ट्वीट एकदम जहरीला। कुल मिला कर गालियों का उड़ता तीर अब उदित राज ने अपनी ओर मोड़ लिया। देखिए इसके बाद कैसे-कैसे ट्वीट (गाली बेहतर शब्द) से डॉक्टर उदित राज का सामना हुआ।

इश्तियाक अली नाम के कट्टरपंथी इंसान ने उदित राज की भावना को बिना समझे लिख दिया, “जब तुम नंगा जन्म लिया तो कपड़े क्यों पहनता है, नंगा ही रहना चाहिए तुम्हें”

यह शायद कोई महिला हैं। दिल पर ले लीं। इस्लामी बातों पर रिएक्शन देने तक सही था लेकिन जाति वाली बात भी लिख दीं। उदित राज चाहें तो इस महिला को SC/ST एक्ट में गिरफ्तार करवा सकते हैं। यह लिखती हैं:

“मैं हिज़ाब अपने मर्जी से पहनती हूँ, अगर आपको अपनी पत्नी बच्चों को नंगा रखना है तो आप शौक से रखें। कोई जबरदस्ती नहीं है, लेकिन ऐसी वाहियात पोस्ट कर के अपनी मानसिकता जाहिर ना करें। खैर कुछ भी हो, दलित ही रहोगे।”

# उदितवा नंगा है – यह लिख कर इस शख्स ने मानो कॉन्ग्रेसी नेता डॉ उदित राज के खिलाफ ट्रेंड ही चला दिया।

पहले वाले ट्वीट पर उदित राज को क्या-क्या गालियाँ पड़ीं, देखते हैं। और हाँ, गालियों के अलावा उनके कुछ सदाबहार ‘प्रशंसक’ भी हैं, जो उन्हें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनाने पर तुले हैं, उनके भी ट्वीट देखिए जरा!

उदित राज के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि इस ट्वीट के बाद उन्हें मुस्लिमों की आलोचना झेलनी पड़ी और कई ऐसे यूजर्स ने उनसे इस्लाम की तुलना तालिबान से करने के लिए मना किया तो कुछ यूजर अपने स्वभाव के मुताबिक RSS की विचारधारा तक पहुँच गए।

हालाँकि कॉन्ग्रेस का सदस्य होने के नाते उदित राज के इस्लाम पर प्रश्न उठाए जाने के साहस की कई यूजर्स द्वारा प्रशंसा की गई और उन्होंने उदित राज को कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने की माँग की। एक यूजर ने तो यहाँ तक लिख दिया, ‘सोनिया गाँधी इस्तीफा दो, उदित जी को कॉन्ग्रेस का प्रेसिडेंट बनाओ।”

ज्ञात हो कि हाल ही में अपने एक ट्वीट में कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता डॉ. उदित राज ने कुछ छात्राओं की फोटो पोस्ट की थी, जो स्कर्ट में थीं और उनके बारे में लिखा था कि यह 1960 के दशक के अफगानिस्तान के कॉलेज का दृश्य है लेकिन धर्मांधता ने आज कहाँ पहुँचा दिया। उन्होंने आगे लिखा था कि आज वहाँ महिलाएँ गुलामी व बुर्का में कैद हो गई हैं और भारत भी इसी ओर बढ़ रहा है। लेकिन उदित राज के इस पोस्ट के बाद कई कट्टरपंथी मुस्लिमों को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने उदित राज के लिए अपशब्द कहे थे और कमेंट में गालियाँ भी दी थीं।

अहमद मसूद: ‘पंजशीर के शेर’ का वो बेटा… जो लंदन में पढ़ा, अब तालिबानी शासन से मुक्त करा रहा जिला दर जिला

अफगानिस्तान में तालिबानी शासन के बाद उसके विरोध में दो नाम सामने आ रहे हैं। एक अफगानिस्तान के कार्यवाहक राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह का, जिन्होंने राष्ट्रपति अशरफ गनी के देश छोड़ने के बाद खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया। अहमद मसूद – यह दूसरा नाम है, वर्तमान परिस्थिति में पहले वाले से ज्यादा अहम।

कौन हैं अहमद मसूद? ‘पंजशीर के शेर’ कहे जाने वाले अफगानी कमांडर अहमद शाह मसूद के बेटे हैं अहमद मसूद। अहमद मसूद तालिबान के खिलाफ मोर्चाबंदी में जुटे हुए हैं। ऐसे में अफगानिस्तान के घटनाक्रम पर नजर रखे हुए पूरी दुनिया देखना चाहती है कि क्या अहमद मसूद अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा पाएँगे?

पिता के हत्यारों के खिलाफ आंदोलन खड़ा करना उद्देश्य

अहमद मसूद जब 12 साल के थे, तब तालिबान और अलकायदा ने षड्यंत्र करके उनके पिता अहमद शाह मसूद की हत्या कर दी थी। उनकी हत्या 9/11 के आतंकी हमले से पहले की गई थी। अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से करीब 100 किलोमीटर (किमी) दूर पूर्वोत्तर में स्थित पंजशीर, शुरुआत से ही तालिबान के विरोध का केंद्र रहा।

पंजशीर ही वो जगह है, जहाँ शाह मसूद के नेतृत्व में सन् 1996 में तालिबान विरोधी आंदोलन खड़ा हुआ था। शाह मसूद के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भी जब तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया है, तब पंजशीर ही एकमात्र ऐसा प्रांत है, जो तालिबान के कब्जे से बाहर है।

जब शाह मसूद की हत्या हुई थी, तब अहमद मसूद एक बच्चे थे फिर भी उन्होंने अपने पिता को तालिबान के खिलाफ संघर्ष करते और उसके लिए रणनीति बनाते हुए करीब से देखा और समझा था। अब फिर से अफगानिस्तान की परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी हैं कि 32 वर्षीय अहमद मसूद तालिबान के विरोध का मोर्चा सँभालने के लिए तैयार हैं और इसके लिए उन्होंने काम भी शुरू कर दिया है। अहमद मसूद, पंजशीर प्रांत में कार्यवाहक राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह के साथ मिलकर तालिबान विरोधी आंदोलन को पुनर्जीवित करने में लगे हुए हैं।

अफगानी समस्या और तालिबान से निपटने का अनुभव

1989 में जन्मे अहमद मसूद ने ईरान से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की लेकिन बाद में उनका शैक्षणिक जीवन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध रणनीति के अध्ययन पर केंद्रित रहा। ईरान से स्कूल की शिक्षा ख़त्म करने के बाद अहमद मसूद ने ब्रिटिश आर्मी मिलिट्री एकेडमी से मिलिट्री कोर्स किया और लंदन के किंग्स कॉलेज से वॉर स्टडीज में बैचलर डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन से इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में मास्टर डिग्री भी ली।

अहमद मसूद की इस पूरी शैक्षणिक पृष्ठभूमि को देखने के बाद यह साफ़ हो जाता है कि उन्हें अफगानिस्तान में आगामी संघर्ष का पूर्वानुमान था और उन्हें यह भी पता था कि अंततः एक बार फिर उन्हें तालिबान के खिलाफ संघर्ष का नेतृत्व करना होगा। हालाँकि इसकी शुरुआत उन्होंने 2019 में ही कर दी थी, जब उन्होंने नेशनल रेसिस्टेंस फ्रंट ऑफ अफगानिस्तान का गठन किया गया था। यह ठीक वैसा ही हैस जैसे सन् 1996 के दौरान नॉर्दर्न अलायंस था, जिसने तालिबान से संघर्ष शुरू किया था और अहमद मसूद के पिता भी इसी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे।

‘पता था कि ये दिन जरूर आएगा’

वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखे गए अपने लेख में अहमद मसूद ने कहा, “मैं उन मुजाहिदों के साथ मिलकर अपने पिता के पदचिन्हों पर चलने के लिए तैयार हूँ, जो एक बार फिर तालिबान के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार हैं। हम अपने पिता के समय से ही हथियार और आवश्यक संसाधन जुटाते आ रहे हैं क्योंकि हमें पता था कि यह दिन जरूर आएगा।”

अहमद मसूद ने लिखा कि उनके पास अफगानी सेना के हथियार भी हैं और उनकी अपील पर अफगानिस्तान की सेना के वैसे कई वर्तमान और पूर्व सैनिक भी तालिबान के खिलाफ संघर्ष में साथ आना चाहते हैं, जो अफगानी कमांडर्स के द्वारा तालिबान के आगे सरेंडर किए जाने से व्यथित हैं।

अहमद मसूद का कहना है कि वो और उनकी नेशनल रेसिस्टेंस फोर्स तालिबान के खिलाफ जरूर लड़ेंगे और विरोध का झंडा भी लहराया जाएगा लेकिन उन्हें इसके लिए बाकी देशों की सहायता की आवश्यकता भी होगी। अहमद का कहना है कि भले ही अमेरिका ने उन्हें युद्धभूमि में अकेला छोड़ दिया हो लेकिन अभी भी अमेरिका, अफगानिस्तान में लोकतंत्र की बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

तालिबानी शासन से 3 जिले मुक्त

अफगानिस्तान में तालिबान विरोधी गुटों ने मुल्क के कुछ जिलों को कब्जे से छुड़ा लिया है। इस लड़ाई में लगभग 60 तालिबानी मारे भी गए हैं। तालिबान के साथ हुई लड़ाई के बाद पब्लिक रेजिस्टेंस फोर्सेज ने बघलान प्रांत के तीन जिलों- बानू, पोल-ए-हेसर और डेह सलाह को अपने कब्जे में ले लिया है।

पोल-ए-हेसर जिला काबुल के उत्तर में पंजशीर घाटी के करीब स्थित है। पंजशीर घाटी हिंदूकुश पर्वत के नजदीक है। यह इकलौता ऐसा प्रांत है जिस पर तालिबान आज तक नियंत्रण नहीं कर सका है। बताया जाता है कि तालिबान विरोधी यहाँ इकट्ठे हो रहे हैं। अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह जिन्होंने तालिबान के आगे घुटने टेकने से इनकार करते हुए खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित किया था, उनके भी यहीं होने की खबर है।