दुनियाभर के मलयाली प्रवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन, वर्ल्ड मलयाली काउंसिल (WMC) ने 28-29 जून 2025 को अजरबैजान के बाकू में सम्मेलन की घोषणा की है। डब्लूएमसी के इस फैसले की कई संगठन ने आलोचना की है।
दरअसल मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अजरबैजान उन तीन देशों में शामिल है जिसने पाकिस्तान का समर्थन किया था। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को ध्वस्त किया था।
वर्ल्ड मलयाली काउंसिल के इस आयोजन का प्रचार वेबसाइट पर हो रहा है। ‘रोमांचक WMC वैश्विक सम्मेलन पैकेज’ में आलीशान होटल में ठहरना, निर्देशित शहर में घूमना, दैनिक नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना, हवाई अड्डा स्थानांतरण, ई वीज़ा, फेलोशिप के साथ भव्य रात्रिभोज, फाउंटेन स्क्वायर, अग्नि मंदिर, धधकते पहाड़, बुलेवार्ड वॉकिंग टूर, ओल्ड बाकू वॉकिंग टूर आदि जैसे प्रतिष्ठित स्थलों पर दर्शनीय स्थल, डीजे पार्टी, अरबी और पश्चिमी नृत्य शामिल हैं। मूल रूप से यह किसी सम्मेलन का नहीं, बल्कि अजरबैजान के लिए एक टूर पैकेज का प्रचार-प्रसार जैसा लगता है।
22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई थी, अजरबैजान ने पाकिस्तान का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था और ऑपरेशन सिंदूर के तहत भारत के जवाबी कार्रवाई की निंदा की थी। अजरबैजान ने पाकिस्तान के साथ एकजुटता दिखाई थी। बताया जाता है कि उसने पाकिस्तान को हथियार मुहैया कराए। अजरबैजान के रुख के चलते भारतीयों ने तुर्की के साथ-साथ अजरबैजान का भी बहिष्कार किया। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ बड़ी संख्या में तुर्की में बने हथियारों का भी इस्तेमाल किया, जिसमें ड्रोन भी शामिल हैं।
इसके बावजूद, WMC बाकू में सम्मेलन कर अजरबैजान के पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है। दुनिया भर के मलयाली लोगों से ‘अजरबैजान की यात्रा करने और अनुभव शेयर करने’ को कहा गया है। इससे WMC का भारत में विरोध शुरू हो गया है। आलोचकों का कहना है कि WMC अजरबैजान में पर्यटन को बढ़ावा दे रहा है, जबकि भारतीय पाकिस्तान का समर्थन करने की वजह से उसका बहिष्कार कर रहे हैं। इसका असर वहाँ की अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, खास तौर पर एक्स पर लोगों की प्रतिक्रिया आने लगी है। एक यूजर ने अपने पोस्ट में WMC के फैसले को ‘शर्मनाक’ बताया, समूह पर ‘भारत विरोधी राष्ट्र’ के साथ गठबंधन करने का आरोप लगाया और कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की।
Shame on World Malayalee Council for hosting the 2025 meet in Azerbaijan — a Pakistan ally & anti-India state. NRIs and foreign Malayalees should be ashamed of themselves for betraying their motherland. This isn't global unity — it's betrayal. #BoycottBaku2025#AntiIndiaEventhttps://t.co/2C2y6RpuOX
एक अन्य यूजर्स द राइटवेव ने लिखा कि अजरबैजान की विदेश नीति हमेशा पाकिस्तान के पक्ष में रही है, चाहे वह कश्मीर मुद्दा हो या आतंकवाद का मुद्दा। यूजर्स को शक है कि पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक सफलता के लिए मलयाली लोगों का इस्तेमाल कर रहा है।
ലോക മലയാളി അസോസിയേഷൻ അസർബൈജനിൽ അവരുടെ കോൺഫറൻസ് നടത്താൻ പോകുന്നു. ഈ മാസം 27 മുതൽ 30 വരെയാണ് പരിപാടി. അസർബെയ്ജാൻ വിദേശനയം എന്നും പാകിസ്ഥാന് അനുകൂലമായി എഴുതപ്പെട്ടതാണ്. കശ്മീർ വിഷയത്തിൽ ആയാലും തീവ്രവാദ വിഷയത്തിൽ ആയാലും അവർ എന്നും പാകിസ്ഥാനെ പിന്തുണയ്ച്ചിട്ടെ ഉള്ളൂ. CUBAA ക്ക്… pic.twitter.com/1SzypE7rik
हालाँकि आयोजकों द्वारा यह तर्क दिया गया है कि अजरबैजान में सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय जनता की राय को प्रभावित कर सकता है और भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाले अजरबैजान को ‘सुधार’ सकता है।
Shri Pinarayi Vijayan , the Honorable Chief Minister of Kerala, Chief guest for the inauguration of the 14th Biennial Global Conference, World Malayalee Council – The inauguration ceremony to take place on 2nd August at 5:30 PM at Hyatt Regency Trivandrum Kerala Tourism Kerala pic.twitter.com/Y1xwIVzF1a
— World Malayalee Council – Global (@wmcglobal1) July 25, 2024
मलयाली समुदाय के भीतर डब्ल्यूएमसी का प्रभाव काफी है। अगस्त 2024 में इसके एक कार्यक्रम में केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी मौजूद रहे। सीएम तिरुवनंतपुरम में विश्व मलयाली परिषद के 14वें द्विवार्षिक वैश्विक सम्मेलन के उद्घाटन कार्यक्रम में शामिल हुए ।
इससे पहले केरल के कोचीन यूनिवर्सिटी बी.टेक एलुमनाई एसोसिएशन (CUBAA) ने पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी को आमंत्रित किया था। 25 मई, 2025 को दुबई में ये कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसकी जमकर आलोचना हुई थी। भारत विरोधी टिप्पणियों के लिए जाने जाने वाले अफरीदी ने पहलगाम हमले के बाद भारतीय सुरक्षा बलों की आलोचना की थी, उन्हें “अक्षम” कहा था और ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की “जीत” का जश्न मनाने के लिए एक कार रैली का नेतृत्व किया था।
CUBAA के अध्यक्ष ने हालाँकि बाद में विरोध को देखते हुए माफी मांगी। उन्होने दावा किया कि अफरीदी की मौजूदगी की जानकारी पहले से उन्हें नहीं थी।
भारत में अक्सर एक हिन्दू विरोधी गिरोह समाज को बाँटने की साजिश में लगा रहता है और इसके लिए उसका पहला हथियार होता है – दलितों को भड़काना। दलितों को बार-बार ये एहसास दिलाया जाता है कि वो हिन्दू समाज का हिस्सा नहीं हैं। ऐसे में कोई दलित बेटी UN (संयुक्त राष्ट्र) में ‘जय श्री राम’ के साथ अपने उद्बोधन की शुरुआत करे, तो ख़ुद को दलितों का ठेकेदार बताकर पेश करने वालों को अपनी चूलें हिलने का डर लगने लग्न स्वाभाविक है। ऐसा हुआ भी। उस दलित बेटी का नाम है रोहिणी घावरी वाल्मीकि।
वो रोहिणी, जिनके पिता इंदौर में सफाईकर्मी थे लेकिन बेटी ने स्विट्जरलैंड में PhD के लिए 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त की। ‘जनपॉवर फाउंडेशन’ चला रहीं डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। हालाँकि, उनके फ़िलहाल चर्चा में रहने का विषय कुछ और है। रोहिणी एक सांसद के ख़िलाफ़ ख़ासी मुखर हैं। उक्त सांसद नीले गमछे के लिए जाने जाते हैं, भारत के सबसे चर्चित दलित आइकॉन के नाम पर अपना राजनीतिक दल चलाते हैं और उन्हें Y+ सुरक्षा प्राप्त है। आप डॉ रोहिणी घावरी वाल्मीकि के सोशल मीडिया हैंडल पर जाएँगे तो आपको बख़ूबी पता चल जाएगा कि वो नए-नवेले सांसद कौन हैं।
रोहिणी ने सांसद के कई वीडियो भी जारी किए हैं, जिनमें किसी में वो जमीन पर लेटकर माफ़ी माँगते हुए दिख रहे हैं तो किसी में रोते हुए दिखाई दे रहे हैं। कई चैट्स भी वायरल हुए हैं, जिनमें वो रोहिणी की प्रशंसा करते नहीं थक रहे हैं।
नीले गमछे वाले सांसद जी पर FIR की तैयारी
ख़ैर, तो ताज़ा ख़बर ये है कि अब सांसद जी के विरुद्ध औपचारिक FIR दर्ज होने जा रही है। ये सूचना ख़ुद रोहिणी ने ऑपइंडिया से बात करते हुए साझा की है। फ़िलहाल क़ानूनी सलाहों के कारण वो वीडियो के माध्यम से मीडिया संस्थानों से नहीं जुड़ पा रही हैं, लेकिन FIR दर्ज होने के बाद वो जल्द ही मुखर होकर कुछ नए खुलासे करेंगी। वो अदालत का दरवाजा भी खटखटाने जा रही हैं। डॉ रोहिणी घावरी इससे पहले भी उक्त सांसद के ख़िलाफ़ मुखर रही हैं और उनपर कई लड़कियों का जीवन बर्बाद करने का आरोप लगा चुकी हैं।
रोहिणी ने बताया था कि कैसे सांसद (तब वो सांसद नहीं, एक्टिविस्ट हुआ करते थे) ने अपनी शादी की बात छिपाकर कई लड़कियों की इज्जत के साथ खेला। ऑपइंडिया से बात करते हुए डॉ रोहिणी घावरी ने बताया कि कैसे उन्हें दलित समाज के सामने झूठा साबित करने के लिए उन्हें बदनाम करने की तमाम तरह की कोशिशें हुईं और दबाव डलवाकर उनसे वो पोस्ट्स X से डिलीट करवाए गए। उन्होंने बताया कि उन्हें अब भी धमकियाँ भिजवाई जा रही हैं, सांसद जी अपने लोगों से बातचीत में कह रहे हैं कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, लड़की अपना ही करियर बर्बाद करेगी।
हालाँकि, रोहिणी इतनी अडिग हैं कि उनका कहना है कि उन्हें जेल जाना पड़े तो भी ग़म नहीं, वो इस देश की तमाम महिलाओं के सामने एक उदाहरण बनना चाहती हैं कि आपको घबराए बिना अपने साथ हो रहे अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़नी है। रोहिणी का कहना है कि शुरुआत में उन्होंने सोचा कि इस मामले को अधिक तूल न दिया जाए क्योंकि उनके मन में दलित एकता की बात थी, उन्हें भय था कि इससे दलित एकता खंडित होगी। बता दें कि आरोपित सांसद जहाँ जाटव समाज से आते हैं वहीं रोहिणी वाल्मीकि समुदाय से।
अपने आरोपों को लेकर दोबारा आक्रामक हुईं डॉ रोहिणी घावरी
पिछले एक सप्ताह से रोहिणी कुछ अधिक ही आक्रामक हैं। धोखेबाज, गद्दार, कलंकित, नीच, नामर्द, नालायक… ऐसे तमाम शब्दों का इस्तेमाल वो सांसद जी के लिए कर चुकी हैं। आप इससे ये समझिए कि वो किस आक्रामकता के साथ अपनी लड़ाई लड़ रही हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए वो कहती हैं कि वो गुस्से में हैं, वाल्मीकि समाज उनके साथ खड़ा है। उन्होंने कहा कि जनता हर किसी को जज करती है, पहले उन्हें लगा कि समाज स्वयं ही न्याय करेगा इसीलिए उन्होंने कोई क़ानूनी प्रक्रिया नहीं अपना – लेकिन, अब नहीं। इस दौरान वो समाज और जनता से भी नाराज़ दिखाई देती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस संघर्ष में उन्हें अबतक बदनामी मिली है, लांछन मिले हैं और उन्हें लेकर तरह-तरह की बातें की गई हैं।
डॉ रोहिणी घावरी की विचारधारा क्या है? वो स्वयं को आंबेडकरवादी तो बताती हैं, लेकिन साथ ही कहती हैं कि वो भारत की जनता को विभिन्न जातियों में बाँटकर नहीं देखतीं। विदेश से जब वो देखती हैं तो उन्हें हर भारतवासी अपना लगता है। वो ‘मनुवादी’ जैसे शब्दों से चिढ़ती हैं और ब्राह्मणों को सम्मान की नज़र दे देखती हैं। वो एक बार बता भी चुकी हैं कि स्विट्जरलैंड वाली स्कॉलरशिप की जानकारी देने वाले उनके एक ब्राह्मण शिक्षक ही थे, वहाँ वो नई-नई थीं तो एक ब्राह्मण सहेली ने ही उन्हें सहज बनाया, उन्हें UN का रास्ता दिखाने वाले भी एक ब्राह्मण ही थे। वो कहती हैं कि उनके लिए समर्पण और एकता महत्वपूर्ण है, जब वो विदेश में विदेशी दोस्तों के साथ सहजता के साथ रह सकती हैं, खा-पी सकती हैं – तो फिर देशवासियों संग क्यों नहीं?
सांसद जी को किन ‘बड़ी पार्टियों’ का समर्थन?
डॉ रोहिणी घावरी को लगता है कि उक्त सांसद जी को कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियों का भी समर्थन है। लेकिन, उन्हें विश्वास है कि एक बार उनके असली चरित्र के बारे में खुलासे हुए तो ऐसे दागदार व्यक्ति के साथ ख़ुद को जोड़ने में इन राजनीतिक दलों को शर्म आएगी और वो स्वयं को इनसे अलग कर लेंगे। भारत से कई लोगों ने उन्हें फोन करके FIR दर्ज कराने के लिए कहा है, ताकि वो न्याय के लिए आवाज़ उठा सकें। नीले गमछे वाले सांसद पर FIR होते ही विरोध प्रदर्शन शुरू होंगे। ब्राह्मण समाज के कई एक्टिविस्ट्स ने भी उन्हें समर्थन का भरोसा दिया है। कभी UN के ‘विश्व संसद’ में 3 बार भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं रोहिणी ने राम मंदिर निर्माण का बचाव करते हुए कई तर्क दिए थे।
चंद्रशेखर की राजनीति से ख़ुद चंद्रशेखर के अलावा आज तक किसी को कोई फ़ायदा नहीं हुआ बल्कि हज़ारो युवाओं का भविष्य बर्बाद हुआ है जो रोते रहते है यह फ़ोन तक नहीं उठाता !! इसकी राजनीति से समाज का बहुत नुक़सान हुआ है यह ख़ुद जानता है !! एक अच्छा लीडर लोगो का हित पहले देखता है ख़ुद का… pic.twitter.com/XBOm1lA7Hg
— Dr. Rohini Ghavari ( रोहिणी ) (@DrRohinighavari) June 8, 2025
अब डॉ रोहिणी घावरी की FIR व उनके द्वारा न्यायालय का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद क्या होता है, ये तो समय बताएगा। लेकिन, इतना साफ़ है कि नीले गमछे वाले नए-नवेले सांसद जी के दिन ठीक नहीं चल रहे। रोहिणी कुछ अन्य लड़कियों की आपबीती भी सोशल मीडिया पर साझा कर रही हैं, ताकि अपने आरोपों की पुष्टि कर सकें। वो अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। थोड़ी सी नाराज़गी उन्हें भारतीय क़ानूनों को लेकर भी है, क्योंकि उनका मानना है कि स्विट्जरलैंड में उन्हें किसी ने ग़लत तरीके से घूरा भी तो उसपर कार्रवाई होगी। लेकिन, अपने देश को लेकर नकारात्मक बातें न करने की बात कहकर रोहिणी इसपर चर्चा नहीं करना चाहतीं।
केरल के श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में रविवार (8 जून 2025) को लगभग 270 साल बाद खास धार्मिक अनुष्ठान ‘महाकुंभाभिषेक’ हो रहा है। इस अनुष्ठान के साथ-साथ मंदिर में विश्वकसेन की मूर्ति को फिर से स्थापित किया गया है। इसके अलावा तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामी मंदिर में भी ‘अष्टबंधकलशम’ नाम का एक महत्वपूर्ण पूजा-अनुष्ठान किया जाएगा।
Kerala | Sree Padmanabhaswamy Temple holds 'Maha Kumbhabhishekam' after 270 years. The ceremony will include the dedication of the domes in front of the main shrine, the re-installation of the Vishwaksena idol, and the ‘Ashtabandhakalasam’ ritual at the Thiruvambady Sree… pic.twitter.com/LGxzcUQu7c
महाकुंभाभिषेक: श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में ऐतिहासिक धार्मिक अनुष्ठान
कुंभाभिषेक एक खास धार्मिक अनुष्ठान है, जो किसी तीर्थस्थल या मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए की जाती है। यह प्रक्रिया आगम शास्त्रों पर आधारित होती है, जिनमें मंदिर निर्माण, पूजा और प्रतिष्ठा के नियम बताए गए हैं।
‘कुंभ’ का मतलब होता है जल से भरा पात्र, और ‘अभिषेक’ का अर्थ है मंदिर की मूर्तियों, स्तंभों और अन्य हिस्सों पर पवित्र जल का छिड़काव करना। यह जल अनेकों अनुष्ठानों के बाद तैयार किया जाता है ताकि स्थान को फिर से शक्ति और पवित्रता मिल सके।
जब कोई मंदिर नया बनता है, तब नूतन कुंभाभिषेकम नाम का विशेष अभिषेक किया जाता है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य मंदिर की मूर्तियों में देवताओं की जीवन ऊर्जा को स्थापित करना होता है। इसके बाद 12 वर्ष के निश्चित अंतराल पर इस ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए फिर से कुंभाभिषेक किया जाता है।
आवश्यकता पड़ने पर यह समय कम या ज़्यादा भी हो सकता है। श्रीपद्मनाभस्वामी मंदिर में जब महाकुंभाभिषेक किया जाता है, तब तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामीमंदिर में अष्टबंधकलशम नाम का एक और अनुष्ठान भी होता है।
अष्टबंधकलशम में एक विशेष प्रकार का प्राकृतिक चिपकने वाला मिश्रण तैयार किया जाता है। इसमें लकड़ी की लाख, चूना पत्थर का पाउडर, राल, लाल गेरू, मोम, मक्खन और आठ प्रकार की जड़ी-बूटियाँ मिलाई जाती हैं। यह मिश्रण देवताओं की मूर्तियों को उनके आसनों पर मजबूती से स्थापित करने के लिए इस्तेमाल होता है।
ऐसा माना जाता है कि यह मिश्रण मूर्ति की ऊर्जा को 12 साल तक बनाए रखता है। अगर यही अष्टबंधन सोने से किया जाए, तो उस मूर्ति की ऊर्जा 100 वर्षों तक सक्रिय रहती है। इस तरह, कुंभाभिषेक और अष्टबंधकलशम जैसे अनुष्ठान मंदिरों की आध्यात्मिक शक्ति को बनाए रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
270 सालों बाद मंदिर में फिर से जागी आध्यात्मिक ऊर्जा
महाकुंभभिषेक समारोह श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर में इसलिए हो रहा है क्योंकि 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति ने यह पाया कि मंदिर की कुछ मूर्तियाँ (विग्रह) क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं।
इस रिपोर्ट के बाद मंदिर के जीर्णोद्धार (मरम्मत और नवीनीकरण) का काम शुरू हुआ, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे बीच में ही रोकना पड़ा। मंदिर प्रबंधक बी श्रीकुमार ने बताया कि समिति की सिफारिशों के अनुसार मरम्मत का कार्य किया गया।
इसके पहले चरण में, लगभग चार साल पहले तिरुवंबाडी श्री कृष्णस्वामी मंदिर में चाँदी का एक स्तंभ स्थापित किया गया था। श्रीकुमार ने कहा कि जीर्णोद्धार का काम 2021 से धीरे-धीरे पूरा किया गया और अब यह पूरी तरह तैयार है।
उन्होंने इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह महाकुंभाभिषेक 270 वर्षों के बाद हो रहा है और भविष्य में कई दशकों तक दोबारा होने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा कि इतने सालों बाद मंदिर में हो रहे इस अनुष्ठान से दुनियाभर के भगवान पद्मनाभ के भक्तों के लिए एक दुर्लभ और शुभ अवसर है।
महाकुंभाभिषेक से पहले मंदिर में कई धार्मिक अनुष्ठान किए गए, जिनमें आचार्य वरणम, प्रसाद शुद्धि, धारा और कलशम जैसे अनुष्ठान शामिल हैं। ये सभी अनुष्ठान मंदिर की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा को फिर से जागृत करने के लिए किए जाते हैं।
क्या आपने वृंदावन के श्री बाँके बिहारी मंदिर में दर्शन किए हैं? यदि आपका जवाब हाँ है तो आप भी तंग गलियों से गुजरे होंगे। भीड़भाड़, धक्कामुक्की में दर्शन किए होंगे। अव्यवस्था देखी होगी। आपने भी इस जगह के विकास की जरूरत महसूस की होगी।
हाल के वर्षों ने हिंदू समाज के सामने काशी, उज्जैन, अयोध्या ने उदाहरण प्रस्तुत किए हैं कि कैसे एक कॉरिडोर के निर्माण से धार्मिक स्थलों की तस्वीर बदली जा सकती है। बदहाली और बदइंजामी बीते दिनों की बात हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने श्री बाँके बिहारी मंदिर के कॉरिडोर के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया है।
लेकिन इस फैसले पर एक तरफ सपा और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियाँ राजनीति कर रही हैं। दूसरी तरफ स्थानीय गोस्वामी समाज भी विरोध कर रहा है। सपा-कॉन्ग्रेस जैसी हिंदू पार्टियों का एजेंडा तो समझ में आता है, लेकिन मंदिर से जुड़े लोग क्यों इसका विरोध कर रहे हैं, यह जानने के लिए ऑपइंडिया के पत्रकार मौके तक पहुँचे। सभी पक्षों से बात की ताकि पाठकों तक विरोध से लेकर समर्थन तक की सही तस्वीर पहुँचे। साथ ही गोस्वामी समाज के विरोध के नाम पर मीडिया में परोसे जा रहे प्रोपेगेंडा को भी खत्म किया जा सके।
बाँके बिहारी मंदिर कॉरिडोर क्यों जरूरी?
हम 5 जून 2025 को दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर वृंदावन पहुँचे। वृंदावन में प्रवेश करते ही हमारी गाड़ी को होमगार्ड के एक जवान ने रोकते हुए पार्किंग में लगाने को कहा। लेकिन मीडिया से होने की बात जानने के बाद उसने हमे आगे जाने दिया। हम ई-रिक्शा के भारी ट्रैफिक को चीरते हुए हम गौतम पाड़ा चौराहे तक पहुँचे। यहाँ से बाँके बिहारी मंदिर करीब 500 मीटर दूर है, लेकिन गाड़ी आगे ले जाना संभव नहीं था। वहीं पार्किंग में गाड़ी लगाकर हम पैदल आगे बढ़े।
करीब 500 मीटर पैदल चलने के बाद हम सुबह करीब 11 बजे बाँके बिहारी पुलिस चौकी वाली मंदिर की मुख्य गली के सामने पहुँचे। अधिकांश पेड़े वाली दुकानों के सामने जूते-चप्पल उतरे हुए थे। जगह-जगह नालियाँ जाम थीं। कूड़ा-कचरा फैला हुआ था। यही हाल मंदिर के गेट नंबर-1 और 2 का भी था। सीढ़ियों पर श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल बिखरे हुए थे।
श्रद्धालु बोले- क्या करें, कोई व्यवस्था ही नहीं है
अयोध्या के एपी पांडेय बाँके बिहारी जी का दर्शन कर बाहर निकले। एक दुकान के निचले हिस्से से जूते उठाते हुए ऑपइंडिया को बताया, “क्या करें कोई व्यवस्था नहीं है। यहाँ कॉरिडोर बनना चाहिए।”
एक अन्य श्रद्धालु अशोक कुमार गुप्ता ने कहा, “यहाँ दर्शन करने में ज्यादा समस्या होती है। अयोध्या में अच्छे से दर्शन हो जाता है। यहाँ हमारे बच्चे भीड़ में दब गए थे।”
साथ में खड़ी एक महिला भक्त का कहना था, “वीआईपी दर्शन के नाम पर किसी से 501 तो किसी से 1001 रुपए लिए जा रहे हैं। भीड़ से बच्चों की जान निकली जा रही थी। बच्चे बिना दर्शन के ही बाहर आ गए। इतना दूर दर्शन करने आए और दर्शन न मिले तो इससे बड़ा दुख और क्या होगा। अंदर जो गार्ड (सुरक्षाकर्मी) लगे हैं, उनका व्यवहार बहुत गंदा है। यहाँ भी कॉरिडोर बनना चाहिए।”
श्रद्धालु बोले- बाँके बिहारी मंदिर का भी कॉरिडोर बनना चाहिए
दर्शन करके लौटे एक युवा भक्त ने बताया, “काशी, उज्जैन, अयोध्या जैसा यहाँ भी कॉरिडोर बन जाएगा तो भक्तों को सुविधा हो जाएगी। यहाँ भक्तों के लिए न पीने का पानी है और न आराम करने की जगह।”
एक अन्य भक्त ने बताया, “पहले हम रोज आते थे। लेकिन जब से हादसे होने लगे तो महीने में एक बार आते हैं। कई बार भीड़ ज्यादा देखकर हम लोग लौट जाते हैं। कॉरिडोर जरूर बनना चाहिए।”
मंदिर के गेट नंबर 1 के सामने एक दुकान पर बैठकर रबड़ी खा रहे हरिद्वार से आए एक भक्त ने कहा, “जैसे गुरुद्वारों में भक्तों के लिए व्यवस्था होती है, वैसी हमारे किसी भी धार्मिक स्थल पर सुविधाएँ नहीं हैं। यही हाल वृंदावन का है। मंदिर कमेटियाँ पैसे के लालच में ही रहती हैं। यदि यहाँ कॉरिडोर बन जाए तो 10 गुना श्रद्धालुओं के साथ काम भी बढ़ जाएगा।”
बाँके बिहारी मंदिर में दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु (फोटो: ऑपइंडिया)
शाम के समय 5:30 बजे मंदिर के कपाट खुलने थे। लेकिन 3 बजे से ही भक्तों की भीड़ आनी शुरू हो गई थी। 5:30 बजते-बजते श्रद्धालुओं की करीब 250 मीटर लंबी लाइन लग चुकी थी।
इस बीच भक्त तेज धूप में गेट नंबर 1 पर मंदिर के पट खुलने के इंतजार में जमीन पर बैठे पंखा हिला रहे थे। भक्तों की भीड़ कैमरे को देखते ही सामूहिक तौर पर राधे-राधे का जयकारा लगाने लगती है और बातचीत में कॉरिडोर निर्माण का समर्थन करती है।
कारोबारियों का दावा- मंदिर कमेटी ने नहीं की कोई व्यवस्था
राजकुमार खंडेलवाल की दुकान 1948 से ही मंदिर की मुख्य गली में है। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया, “कॉरिडोर बनना चाहिए। लेकिन दुकान और मकान वालों को मुआवजा मिले।” उन्होंने गली की तरफ दिखाते हुए कहा, “यहाँ की व्यवस्था बहुत ही खराब। नालियाँ जाम पड़ी हैं। चारों और गंदगी है। जूते-चप्पल बिखरे रहते हैं। यात्रियों के लिए लॉकर रूम, टॉयलेट जैसी सुविधा नहीं है। पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है।”
वे कहते हैं, “इसे आप प्रशासन की कमी समझें या फिर मंदिर कमेटी की, श्रद्धालुओं के बैठने का कोई स्थान नहीं है। मंदिर कमेटी की लापरवाही के कारण ही 2022 में हादसा हुआ था।”
कॉरिडोर निर्माण का कारोबारी गोविंद भी समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा, “कॉरिडोर समय की माँग है। हम इसके लिए हाईकोर्ट तक गए थे। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि कॉरिडोर बनने से वृंदावन की कुंज गलियों का महत्व और यहाँ की प्राचीनता नष्ट नहीं हो।” उनका यह भी कहना था कि कॉरिडोर निर्माण से पहले सरकार को भीड़ मैनेजमेंट पर ध्यान देना चाहिए।
कारोबारी नवीन गौतम ने बताया, “हम कॉरिडोर निर्माण के विरोध में नहीं हैं। लेकिन वृंदावन का स्वरूप नहीं बदलना चाहिए। गोस्वामी समाज की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जहाँ सांप है सरकार वहीं लाठी चलाए। हमारे ठाकुर जी को कोई नहीं ले जा सकता।”
ऐसा नहीं है कि सभी कारोबारी कॉरिडोर का समर्थन ही कर रहे हैं। कुछेक इसके विरोध में भी हैं। हमने पाया कि ज्यादातर कारोबारी इस मामले पर खुलकर कैमरे के सामने बात करने से भी बचते रहे थे।
बाँके बिहारी कॉरिडोर का विरोध क्यों कर रहे सेवायत गोस्वामी समाज?
मंदिर के प्रांगण में मौजूद सेवादार श्रीनाथ गोस्वामी ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “यहाँ कॉरिडोर की कोई आवश्यकता नहीं है। हमने सरकार को दो अन्य विकल्प सुझाए थे। लेकिन सरकार ने उन विकल्पों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया। 2016 में इसी तरह के कॉरिडोर का प्रस्ताव जब अखिलेश यादव लेकर आए थे, तब योगी आदित्यनाथ ने विरोध किया था। आज वे खुद इस कॉरिडोर का समर्थन क्यों कर रहे हैं, यह समझ नहीं आ रहा।”
गोस्वामी समाज कॉरिडोर का कर रहा है विरोध (फोटो: ऑपइंडिया)
गोपेश गोस्वामी मंदिर कमेटी के प्रवक्ता रह चुके हैं। वर्तमान में मंदिर के शयनभोग सेवाधिकारी हैं। ऑपइंडिया ने उनसे कॉरिडोर के विरोध की वजह पूछी। उन्होंने सबसे पहले ‘वृंदावन में बढ़ती भीड़’ के आँकड़ों को अविश्वनीय कहा। कहा कि वृंदावन में इतनी भीड़ ही नहीं है कि मंदिर और उसके आसपास के इलाके का स्वरुप किसी भी तरह से बदलने की जरूरत हो। उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार की परियोजना तीर्थ विकास परिषद् को इस पूरे विवाद की जड़ में बताया।
उन्होंने कहा, “इस परिषद् के गठन का उद्देश्य वृन्दावन के अन्य मंदिरों तक भक्तों को पहुँचाना था। लेकिन परिषद् अपने काम में विफल रहा। इसके उपाध्यक्ष शैलजाकान्त मिश्र मंदिर के काम में सदैव से सरकारी दखल चाहते हैं। कॉरिडोर कुछ अधिकारियों और भूमाफियाओं के गठजोड़ का नतीजा है।”
राजयोग सेवाधिकारी ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी का कहना है, “अब हमारे पास दो विकल्प बचते हैं। या तो हमें पलायन करना होगा, या फिर आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उनका कहना है यह कॉरिडोर केवल VIP के लिए बन रहा है। जब तक मंदिर की व्यवस्था हमारे हाथ में थी, कभी कोई अव्यवस्था नहीं रही।”
बाँके बिहारी कॉरिडोर के विरोध में एकत्र हुईं गोस्वामी समाज की महिलाएँ (फोटो: ऑपइंडिया)
जब हम गोस्वामी समाज के लोगों से बातचीत कर रहे थे उस दौरान इस समाज की महिलाएँ भी बाँके बिहारी मंदिर के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए एकत्र हुईं थी। उनका कहना था कि एक महंत होकर भी योगी आदित्यनाथ उनकी बात नहीं सुन रहे हैं। तिरुपति मंदिर के चर्बी वाले लड्डू की घटना का उदाहरण देते हुए उनका कहना था कि सरकारी नियंत्रण के बाद इसी तरह की अव्यवस्था यहाँ भी देखने को मिलेगी।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने कॉरिडोर के निर्माण के लिए जमीन खरीदने की उत्तर प्रदेश सरकार को अनुमति दे दी है। जमीन की रजिस्ट्री श्री बाँके बिहारी के नाम पर होगी। साथ ही सरकार मंदिर के पैसे का इस्तेमाल भी इस कार्य में कर सकेगी। माना जा रहा है कि कॉरिडोर बनने के बाद 10 हजार से अधिक श्रद्धालु एक साथ दर्शन कर सकेंगे। इस फैसले के बाद बाँके बिहारी मंदिर के लिए यूपी सरकार ने ट्रस्ट की भी स्थापना कर दी है।
उत्तर प्रदेश के मथुरा में बकरीद पर गोवंश की हत्या करने का मामला सामने आया है। गोवंश के अंग सड़क किनारे लटके मिले हैं। मामले में हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने विरोध प्रदर्शन कर आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। पुलिस ने इस मामले में 50 से ज्यादा लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।
पुलिस द्वारा दर्ज की गई FIR के अनुसार, 07 जून 2025 की रात 8 बजे बकरीद के मौके पर बरसाना रोड स्थित ईदगाह के सामने कसाईपाड़े पर गोवंश काटा गया। FIR में आरोप लगाया गया है कि गोवंश बचे अवशेषों को सड़क के किनारे लटका दिया गया है।
मामले में मथुरा के गोवर्धन क्षेत्र के रहने वाले 50 से अधिक लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। इनमें साकिर, समीर, सोहिल, अनवर वकील, इन्तजार, अंसार, पिन्टू, आसीन, ओशो, स्टार, फाजल, शाहरूख, हन्नी कुरैशी, आरिफ, धौसी, बाबू, घोसी, सनी, उस्मान, फिरोज, रशीद, नज्जू, चाँद, फारूख, सोहेल समेत 50 अज्ञात लोग शामिल हैं।
घटना की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है। धीरज कौशिक नाम के व्यक्ति ने मामले को लेकर FIR दर्ज कराई है। पुलिस से की शिकायत में बताया गया कि ये कृत्य हिंदुओं को ठेस पहुँचाने के लिए अंजाम दिया गया है।
हिंदू संगठन का विरोध प्रदर्शन
घटना की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग और हिंदू संगठनों ने इलाके में जमकर विरोध किया। आरोपितों के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि अगर गोवर्धन जैसे धार्मिक स्थल पर गाय सुरक्षित नहीं है, तो देश में कहीं भी गाय सुरक्षित नहीं रही जाएगी।
? मथुरा : गोवर्धन में मुस्लिम बस्ती के समीप मिले अवशेष ?
? गौ रक्षक दल ने गोवंश अवशेष होने का किया दावा ? स्थानीय लोग और गौ रक्षकों में भारी आक्रोश ? गोवर्धन थाना पुलिस ने अवशेषों को कब्जे में लिया ? SSP के आदेश के बाद अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज ? घटना के सीसीटीवी फुटेज… pic.twitter.com/tIQwfseMUH
— भारत समाचार | Bharat Samachar (@bstvlive) June 8, 2025
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और स्थिति को नियंत्रित किया। पुलिस ने गोवंश के अवशेषों को कब्जे में लेकर फोरेंसिक जाँच के लिए भेज दिया है। इसके साथ 50 से अधिक लोगों के खिलाफ दर्ज FIR दर्ज कर आरोपितों की तलाश शुरू कर दी गई है।
एसपी देहात ने कहा है कि शुरुआती जाँच में यह गोवंश का मांस ही लग रहा है, लेकिन पूर्ण जाँच के बाद ही पुष्टि की जा सकेगी। पुलिस ने फिलहाल इलाके में शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्होंने कहा कि आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
बेंगलुरु में RCB की IPL जीत के जश्न में हुए इवेंट को लेकर पुलिस ने पहले ही कॉन्ग्रेस को चेतावनी दी थी। पुलिस ने कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को एक पत्र लिखा था। भगदड़ जैसी स्थिति ना बने, इसे रोकने को पुलिस ने कई सिफारिश भी दी थीं। हालाँकि, कॉन्ग्रेस सरकार ने इन्हें नजरअंदाज किया और 11 लोगों की मौत हो गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेंगलुरु में IPL में RCB की जीत का जश्न मनाने के दौरान हुई भगदड़ के एक दिन पहले, DCP एमएन करिबसवाना गौड़ा ने कर्नाटक सरकार को एक पत्र भेज कर सुरक्षा व्यवस्था के लिए आगाह किया था।
इसमें उन्होंने मंगलवार (3 जून 2025) को विधान सौधा में बड़े पैमाने पर फैंस के जमा होने की संभावना और सुरक्षा कर्मियों की कमी के कारण व्यवस्था को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी।DCP गौड़ा ने सुरक्षा के लिए अतिरिक्त पुलिस की तैनाती, ट्रैफिक नियंत्रण, एंटी-ड्रोन सिस्टम लगाने और सचिवालय में आधा दिन की छुट्टी घोषित करने समेत कई सिफारिशें की थी।
उन्होंने सचिवालय कर्मचारियों को अपने परिवार को कार्यक्रम में न लाने का आग्रह किया था। इन सभी सिफारिशों को कॉन्ग्रेस सरकार ने नजरअंदाज किया और 4 जून 2025 को हुए कार्यक्रम में व्यवस्था में चूक हुई और भारी भीड़ के कारण भगदड़ मच गई।
— ChristinMathewPhilip (@ChristinMP_) June 4, 2025
इस भगदड़ में 11 लोगों की मौत हो गई, इस घटना के बाद पुलिस ने अब तक 4 लोगों को गिरफ्तार किया है। कर्नाटक पुलिस ने RCB, DNA एंटरटेनमेंट और कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ (KSCA) के खिलाफ गैर इरादतन हत्या के तहत FIR दर्ज की है।
घटना के बाद कर्नाटक सरकार की सुरक्षा व्यवस्था और आयोजन की तैयारी पर गंभीर सवाल उठे हैं। पुलिस द्वारा दी गई पूर्व चेतावनी को नजरअंदाज करना और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम न करना सरकार के लिए शर्मनाक साबित हुआ है। इसके कारण अब सरकार की ओर से जवाब माँगे जाने और सुरक्षा प्रबंधों में सुधार की संभावना जताई जा रही है।
हाला की मामले की जाँच अब पुलिस के साथ-साथ CID के अधिकारियों ने भी शनिवार (7 जून, 2025) से जाँच शुरु कर दी है। उन्होंने प्रवेश द्वार, भगदड़ वाले स्थान और कार्यालय के साथ-साथ अन्य स्थानों की भी जाँच की।
वही कर्नाटक सरकार ने 4 जून को बेंगलुरु में हुई भगदड़ की घटना की जाँच के लिए सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जॉन माइकल कुन्हा की एक सदस्यीय जाँच आयोग का गठन किया है।
“जैसे हम अपनी माँ को नहीं छोड़ सकते हैं, वैसे ही हम अपनी मातृभाषा को नहीं छोड़ सकते”
साल 2022 में ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के एक एपिसोड में कही थी। उस वक्त उन्होंने देश की जनता से अपील की थी कि हर कोई अपनी मातृभाषा बोले और उस पर गर्व भी करे। ये केवल प्रधानमंत्री का एक कथन मात्र नहीं था बल्कि उनकी एक कोशिश थी ताकि वो हर भाषा को सम्मान दिला सकें।
अब जब बतौर प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को 11 साल हो चुके हैं। ऐसे में हमें उन कार्यों पर भी गौर करना चाहिए जो उनकी नेतृत्व वाली सरकार ने स्थानीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण/संवर्धन, विकास को लेकर किया है।
आगे बढ़ने से पहले बता दें कि ये मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि भाषा ऐसा टॉपिक रहा है जिसको 1952 की जनगणना के बाद नेहरू ने भी तवज्जो नहीं दी थी। वहीं जब इंदिरा गाँधी सरकार आई तो उन्होंने भी भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा अन्याय किया था जिसे कभी नहीं भूला जा सकता। उनकी सरकार ने 1971 की जनगणना के बाद उन भाषाओं के अस्तित्व को ही नकार दिया जिसे बोलने वालों की संख्या 10000 से कम थी। उन्होंने ऐसी भाषा को ‘अन्य भाषाओं’ की श्रेणी में रखा।
तो, ऐसे संघर्षों के साथ जिस देश में भाषा का इतिहास रहा हो, वहाँ तब में और अब में तुलना करना इतना भी मुश्किल नहीं है।
2014 से पहले क्षेत्रीय भाषाओं को सरकार का इतना समर्थन प्राप्त नहीं था, बोलियों को इतना महत्व नहीं दिया जाता था। मगर, मोदी सरकार आने के बाद ये तस्वीर बदली। जितना महत्व अंग्रेजी को दिया गया, उतना ही हिंदी को भी और जितना सम्मान संस्कृत को मिला, उतना ही पंजाबी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, उड़िया को भी।
11 साल पहले भारतीय भाषाएँ जो चुनौतियों को सामने कर रही थीं वो धीरे-धीरे खत्म होने लगीं। भाषाओं के मानकीकरण पर काम होने लगा। बोलियों को महत्व दिया जाने लगा। नौकरियों के अवसर बढ़ने लगे।
टेक्स्ट किताबों का अनुवाद उन लोकल लैंग्वेज में भी होने लगा जिन्हें कोई पूछता नहीं था। जो भाषाई विवाद इस बीच हुए भी उन्हें मोदी सरकार ने सूझ-बूझ से सुलझाया और इस पूरे परिदृश्य को बदलने में उन्हें सिर्फ मौखिक मेहनत नहीं लगी बल्कि हर पल इस के लिए काम हुआ।
साल 2021 में केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक हुई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पाँच और भाषाओं को शास्त्रीय भाषाओं के दर्जे से सुशोभित किया गया। इस फैसले के साथ ही भारत पहला ऐसा देश बना जहाँ 11 भाषाएँ क्लासिकल लैंग्वेज के तौर पर जानी जाती हैं। इतना ही नहीं सरकार ने, जो अकादमिक स्तर पर भाषा का प्रचार करके उसे बच्चे-बच्चे तक पहुँचाने का कार्य किया, वह उल्लेखनीय है।
इस दिशा में केवल प्राइमरी से लेकर 12 वीं तक की पढ़ाई को नहीं…इंजीनियरिंग, मेडिकल की पढ़ाई का कंटेंट भी भारतीय भाषाओं में आना शुरू हुआ। इस तरह युवाओं से लेकर बच्चे-बच्चे तक मातृभाषा पहुँचने लगी।
‘हिंदी शब्दसिंधु’ जैसी डिजिटल डिक्शनरी तैयार की गई जिसमें हिंदी-अंग्रेजी शब्दों के हर संदर्भ में मायने बताए गए। इसमें अलग-अलग क्षेत्र की शब्दावलियों को जोड़ा गया। हर लोकोक्ति- मुहावरे का अर्थ बताया गया और हर वो प्रयास किए गए जिससे लोगों के उनके सर्च के हिसाब से सहज नतीजे मिल सकें।
हाल की बात करें तो 2024 में भी हिंदी दिवस के मौके परभारतीय भाषा अनुभाग की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य ही यही है ताकि क्षेत्रीय भाषाओं का महत्व सरकारी काम-काज में कभी खत्म न हो।
जैसे इसके लिए यूनिवर्सल ट्रांसलेशन सिस्टम तैयार हुआ है। इसके लिए C-DAC और भारतीय भाषा अनुभाग ने मिलकर काम किया ताकि इस तंत्र के जरिए केंद्र और राज्य के बीच आधिकारिक बातचीत बिन किसी भाषा विवाद के हो सके और साथ ही क्षेत्रीय भाषा का भी प्रचार हो सके।
कंठस्थ 3.0 और बहुभाषी जैसे बहुभाषीय अनुवाद सॉफ्टवेयर तैयार किए गए जिनके जरिए हिंदी और अन्य 15 भाषाओं के बीच की दूरियाँ सिमटीं। इसके अलावा ‘प्रोजेक्ट अस्मिता’ लाया गया जिसका उद्देश्य ही 5 सालों में 22000 किताबों को भारतीय भाषाओं में अनुवाद करना है।
BJP ने किया स्थानीय भाषाओं का प्रचार, युवाओं में बढ़ा मातृभाषा के लिए प्यार
गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार में हमेशा से लोकल भाषाओं को महत्व देने का चलन रहा है। मोदी सरकार से पहले जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तब बोदी, डोगरी, मैथिली और संथाली जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को सम्मान मिला था। इसके बाद 2014 में प्रधानमंत्री मोदी बने और ओडिया, मराठी, पाली, प्राकृत, असमी, बंगाली भाषा को भी शास्त्रीय भाषाओं का दर्जा मिला।
इसके अलावा मोदी सरकार ने संस्कृत भाषा, तमिल, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया जैसी भाषाओं के लिए विशेष शैक्षणिक संस्थान खोले, जिनके लिए ऐसा नहीं हुआ उनके लिए अलग से विशेष कोर्स शुरू करवाए गए।
आपको जानकर ये भी हैरानी होगी कि पिछले एक दशक में इन भाषाओं को उठाने के लिए मोदी सरकार की ओर से 130 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा तमिल के लिए 100 करोड़ रुपए दिए गए। तेलुगु और कन्नड़ को 11-12 करोड़ दिए गए। मलयालम और उड़िया को करीबन 16 करोड़… वहीं संस्कृत के प्रचार के लिए उसकी यूनिवर्सिटी के जरिए 2017 से 2022 के बीच में अब तक 1074 करोड़ दिए गए हैं।
इसी तरह राष्ट्रीय शिक्षा नीति के जरिए भी मातृभाषा, क्षेत्रीय भाषाओं के उत्थान पर काम हो रहा है। पढ़ाने के लिए तरीके बदले जा रहे हैं। कविता-कहानियों के जरिए बच्चों को इनसे जोड़ा जा रहा है। जो लोग पहले क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई को कमजोरी मानते थे उन्हें अब नई नीतियों से बल मिला है कि वो भी लोकल लैंग्वेज में पढ़कर बाहरी दुनिया में उतने ही योग्य हैं जितना अंग्रेजी-हिंदी पढ़ने वाला। इस नई नीति ने जनजातीय भाषाओं को संरक्षित करने का काम किया है।
तकनीकी कोर्स हों या वोकेशनल कोर्स… सबको क्षेत्रीय भाषाओं में लाने के प्रयास हो रहे हैं ताकि स्थानीय बोलने वाला भी उनसे ज्ञान अर्जित कर सकें। सरकार ने 200 PM E-एजुकेशन चैनल भी खोले हैं ताकि हर भाषा का व्यक्ति वहाँ से जैसा कंटेंट जिस भाषा में चाहता है ले सके। इसी प्रकार दीक्षा प्लेटफॉर्म है जो 366370 से ज्यादा ई-कंटेंट 133 भाषाओं में उपलब्ध करवाता है इनमें 126 भारतीय हैं जबकि 7 विदेशी। अनुवादिनी ऐप आज मौजूद है जो 11 भाषाओं का अनुवाद उपलब्ध करवाता है।
इतना ही नहीं ये मोदी सरकार के प्रयास का ही परिणाम है कि अब JEE, NEET, CUET जैसी प्रतियोगिता परीक्षाएँ तक 13 क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करवाई जाती हैं। सरकारी जॉब के लिए परीक्षाएँ 15 भाषाओं में होती हैं। तमिल-तेलुगु में लिखे साहित्यों को हिंदी भाषी भी पढ़ते हैं। महर्षि अगस्त्य के लिखी सामग्री पर, तमिल साहित्य में दिए उनके योगदान पर चर्चा होती है। काशी-तमिल, काशी-तेलुगु, काशी सौराष्ट्र संगमम जैसे पहलों से भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और विविध भाषाओं की केवल देश में नहीं विदेशों में भी चर्चा होती है और देश अपनी विविधताओं पर गर्व कर पाता है।
त्रिपुरा के मंडई गाँव में 8 जून 1980 को एक भीड़ ने सैकड़ों बंगाली हिंदुओं की हत्या कर दी थी। इस घटना में करीब 350 से 400 लोग मारे गए, जिसके बाद इस नरसंहार को ‘मंडई नरसंहार’ के नाम से जाना गया और यह स्वतंत्र भारत में जातीय व धार्मिक हिंसा की सबसे भयानक घटनाओं में से एक बन गई।
मंडई गाँव, त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से लगभग 30 किलोमीटर दूर है। वहाँ बड़ी संख्या में जनजातीय लोग रहते थे। यहाँ रहने वाले बंगाली हिंदू अल्पसंख्यक थे, जो 20 साल पहले बांग्लादेश (तब के पूर्वी पाकिस्तान) से शरणार्थी बनकर आए थे।
1970 के दशक की क्षेत्रीय राजनीति और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद त्रिपुरा में बड़ी संख्या में बंगाली हिंदू शरणार्थियों के आने से जनजातीय आबादी में नाराजगी बनी हुई थी। इसी माहौल में बंगाली विरोधी भावना के आधार पर एक कट्टरपंथी जनजातीय राजनीतिक पार्टी ‘त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति (TJUS)’ का उदय हुआ।
16 जून, 1980 को पिट्सबर्ग पोस्ट-गजट द्वारा मंडाई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
मंडई नरसंहार पीछे माहौल तैयार करने में त्रिपुरा के सशस्त्र जनजातीय चरमपंथी समूह जैसे त्रिपुरा नेशनल वॉलंटियर्स (TNV) और संगक्राक आर्मी ने अहम भूमिका निभाई। इन समूहों ने उस समय की उग्र राजनीतिक स्थिति का फायदा उठाया।
नरसंहार से पहले की एक घटना ने तनाव को और भड़का दिया, जब लेम्बुचेरा बाजार में कुछ दुकानदार (जो शायद बंगाली था) उसने एक जनजातीय लड़के पर हमला किया। इसके बाद 1000 से ज्यादा जनजातियों की भीड़ ने बाजार पर हमला कर दिया, दुकानों में तोड़फोड़ की और लोगों को मार डाला।
त्रिपुरा उपजाति जुबा समिति (TJUS) के आंदोलन के चलते बाजार एक हफ्ते तक बंद रहा, जिससे माहौल और भी तनावपूर्ण हो गया। सशस्त्र जनजातीय चरमपंथी समूह ‘सांगक्राक आर्मी’, जो मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) से हथियार खरीद रहा था, उसने हालात का फायदा उठाते हुए थेलाकुंग और गुलिराई जैसे बाजारों पर हमला किया।
इसके बाद 8 जून 1980 को करीब 1,000 जनजातीय लोगों की भीड़ ने हथियारों के साथ जिनमें बंदूक, भाला, तलवार, धनुष-तीर और दाओस (दरांती) लेकर मंडई गाँव के बंगाली हिंदू निवासियों पर अचानक हमला कर दिया, जिससे एक अलग ही हिंसा भड़क उठी।
16 जून, 1980 को सेंट जोसेफ गजट द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट सेंट जोसेफ गजट
चरमपंथियों ने पहले बंगाली हिंदू ग्रामीणों से पैसे की माँग की, जिनके पास मौजूद करीब 250 डॉलर (लगभग ₹21000) की सारी नकदी ले ली। इसके बाद पीड़ितों को गाँव के बाजार क्षेत्र में इकट्ठा किया गया और जबरन अपने घरों को जलते हुए देखने के लिए मजबूर किया गया।
टाइम मैगज़ीन की एक रिपोर्ट जो (दिनांक 30 जून 1980) में प्रकाशित हुई थी। उसके अनुसार “मंडई गाँव में सबसे भयानक नरसंहार में, जनजातियों ने पहले पैसे की माँग की, फिर गाँव के बाजार में बंगालियों को घेर लिया। भयभीत निवासियों को ये सब देखने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि बंदूकों, भालों और दरांतियों से लैस जनजातियों ने घरों में आग लगा दी और उनमें रहने वालों को मार डाला।”
चरमपंथियों ने मंडई में हमला करते समय कोई दया नहीं दिखाई। भारतीय सेना को गाँव में कम से कम 350 बंगाली हिंदुओं के शव मिले, जिनके सिर कुचले हुए थे, अंग कटे हुए थे और बच्चों को चाकू से मारा गया था। कई सड़ी-गली लाशें नदियों में तैरती मिलीं।
एक दर्दनाक मामला 6 महीने के शिशु का था, जिसका शव उसकी माँ की लाश के पास टुकड़ों में फेंका गया था। सेना को पीड़ितों को उथली कब्रों में दफनाना पड़ा। मंडई पूरी तरह खंडहर में बदल गया था, चारों तरफ राख, जली हुई दीवारें, टूटे हुए बर्तन और सिलाई मशीनें बिखरी थीं।
पीड़ितों को समय पर पुलिस सुरक्षा नहीं मिल पाई, क्योंकि सबसे नजदीकी पुलिस चौकी लगभग 11 किलोमीटर दूर जिरानिया में थी।
17 जून, 1980 को द मॉन्ट्रियल गजट द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
मंडई नरसंहार के बाद त्रिपुरा के अन्य जिलों में भी हिंसा और आगजनी की घटनाएँ हुईं। अनुमान है कि इस हिंसा में 2,000 से 10,000 लोगों की मौत हुई। हिंसक और पूर्व नियोजित हमलों के चलते करीब 1,50,000 से 2,00,000 लोग जिनमें ज्यादातर बंगाली थे, अपने घर छोड़कर विस्थापित हो गए।
मंडई में भारतीय सेना की टुकड़ी 9 जून 1980 को कमांडर मेजर R राजमणि ने हत्याओं की क्रूरता की तुलना वियतनाम में हुए ‘1968 माई लाई नरसंहार’ से की। न्यूयॉर्क टाइम्स से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैंने माई लाई के बारे में सुना है। मुझे आश्चर्य है कि क्या वह यहाँ की तुलना में आधी भी भयानक थी।”
उन्होंने आगे कहा, “उस पहले दिन, मैंने एक 6 महीने के बच्चे को दो टुकड़ों में कटा हुआ देखा और प्रत्येक टुकड़ा उसकी मृत माँ के दोनों ओर पड़ा हुआ था। मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा, और न ही मैं ऐसा देखना चाहता हूँ।”
17 जून 1980 को द टेलीग्राफ हेराल्ड द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
UNIके एक रिपोर्टर ने मंडई की स्थिति का वर्णन करते हुए लिखा कि वहां खुली कब्रें थीं, जिनमें से एक में से एक हाथ बाहर निकला हुआ था। तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक सत्यव्रत बसु ने इस घटना को स्पष्ट रूप से ‘नरसंहार’ बताया था।
बंगाली हिंदू पीड़ितों ने सुनाई आपबीती
मंडई नरसंहार में जीवित बचे लोगों में से एक 20 वर्षीय बंगाली नाई हरधेम सील था, जिसने इस भयावह हमले में अपने माता-पिता, तीन बहनों और तीन भाइयों को खो दिया था। उन्होंने टाइम पत्रिका को बताया, “हर जगह खून ही खून था। एक आदमी ने मुझे अपने दाओ से मारा। मैं गिर पड़ा, फिर कई लाशें मेरे ऊपर गिरीं। शायद इसी वजह से मेरी जान बच गई।”
एक जीवित बची सुवर्णा प्रभा देब ने बताया कि मंडई में उनकी दो बेटियों और एक पोते की हत्या कर दी गई, जबकि उनका बेटा गंभीर रूप से घायल हो गया। एक अन्य जीवित बचे 65 वर्षीय अबानी डे ने बताया कि उन्होंने पहले पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में मुस्लिम भीड़ की हिंसा में अपने माता-पिता और बहन को खोया था।
“जब हम आए, तो यहाँ के जनजातीय लोगों ने हमारा स्वागत किया और हमें बसने में मदद की। हमें लगा कि हमें एक सुरक्षित जगह मिल गई है। अब यह। हम कहाँ जा सकते हैं?” उन्होंने मंडई नरसंहार के बाद मीडिया को बताया, जिसमें उन्होंने अपने 15 वर्षीय बेटे को खो दिया था।
उन्होंने दुख जताते हुए कहा, “एक जनजातीय आदमी ने उनके बाल पकड़े और एक दरांती से उनका सिर काट दिया। हम दूर से यह सब देख रहे थे।” एक अन्य जीवित बचे, नागेंद्र साहा (45) ने बताया कि कैसे उनके 2 बेटों को बेरहमी से मार दिया गया।
उन्होंने जोर देकर कहा, “जैसे ही जनजातीय लोग हमारे करीब आए, हमने जोर से प्रार्थना की कि हे भगवान, हमें बचाओ। जैसे ही हम बाहर निकले, उन्होंने हम पर अपने दाओ से हमला कर दिया। एक आदमी ने मेरे सिर पर वार किया और मैं बेहोश हो गया। मुझे मारने से पहले, मैंने देखा कि उसने एक बूढ़ी महिला को ज़मीन पर लेटने के लिए मजबूर किया और दाओ से उसका सिर कुचल दिया। मेरे दो बेटे एक-दूसरे के कुछ सेकंड के भीतर मर गए।”
1980 के मंडई नरसंहार के बाद त्रिपुरा के बंगाली बहुल इलाकों में जनजातीय लोगों पर भी हमले हुए। कई जगहों पर आगजनी हुई और शरणार्थियों का पलायन शुरू हो गया। जनजातीय समुदाय के लिए 12 से अधिक शरणार्थी शिविर बनाए गए। एक पीड़ित सुहेद देब बर्मन ने कहा, “हम अपनी ही ज़मीन पर शरणार्थी बन गए हैं।”
मंडई नरसंहार पर राजनीतिक प्रतिक्रिया
त्रिपुरा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नृपेन चक्रवर्ती ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, “यह पूरी तरह से पूर्व नियोजित हमला लगता है। वे हत्याओं की होड़ में लगे हुए हैं… लेकिन कोई भी इस तरह के नरसंहार की कल्पना नहीं कर सकता था।”
पीड़ितों ने आरोप लगाया कि इंदिरा गाँधी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने त्रिपुरा में बढ़ते जनजातीय असंतोष के बीच समय पर कोई सैन्य सहायता नहीं भेजी। राज्य सरकार को बर्खास्त करने पर विचार हुआ, लेकिन ये कदम नहीं उठाया गया। मंडई नरसंहार के बाद केंद्रीय गृह मंत्री जैल सिंह ने त्रिपुरा का दौरा कर हालात का जायजा लिया।
केंद्र ने राहत के तौर पर 5000 टन चावल भेजा और पीड़ितों के पुनर्वास का आश्वासन दिया। बचे हुए लोगों के लिए अस्थायी शरणार्थी शिविर बनाए गए।
17 जून, 19 को सरसोटा हेराल्ड-ट्रिब्यून द्वारा मंडई नरसंहार पर प्रकाशित एक लेख का स्क्रीनशॉट
त्रिपुरा की बदलती जनसांख्यिकी
त्रिपुरा में जातीय-धार्मिक तनाव की जड़ें दशकों पुरानी हैं। त्रिपुरी शासकों द्वारा बंगालियों को बसाने के प्रोत्साहन, 1947 के विभाजन और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद बंगालियों की बड़ी संख्या में आबादी बढ़ी, जिससे विवाद पैदा हुआ।
1980 के दशक में जनजातीय समुदायों (जो तेजी से ईसाई बन रहे थे) और बंगाली हिंदुओं के बीच संबंध बेहद तनावपूर्ण हो गए, जिसके चलते हिंसा और नरसंहार की घटनाएँ बढ़ीं। इसी दौरान जनजातीय आबादी घटकर 1971 में सिर्फ 28.95% रह गई, जिससे असंतोष और बढ़ गया।
बंगाली हिंदू आबादी, जिन्हें गैर-जनजातीय कहा जाता है, उन्हे 1947 और 1971 में मुस्लिम भीड़ की हिंसा से बचने के लिए त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में शरण लेनी पड़ी। हालाँकि, व्यापार, सेवाओं, आर्थिक प्रगति, राजनीतिक प्रभाव और मैदानी इलाकों तक बेहतर पहुँच के चलते इन शरणार्थियों का प्रभाव बढ़ा।
इससे मूल जनजातीय आबादी में असंतोष और उग्रवाद को बढ़ावा मिला। 1980 का मंडई नरसंहार इस जातीय-धार्मिक संघर्ष का एक बड़ा और भयावह उदाहरण था, लेकिन यह आखिरी नहीं था।
2000 में बागबेर नरसंहार के दौरान प्रतिबंधित ईसाई त्रिपुरी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (NLFT) के आतंकवादियों ने बंगाली हिंदू शरणार्थियों को गोली मार दी, और 2002 के सिंगिचेरा नरसंहार में 16 निहत्थे बंगाली हिंदुओं की बेरहमी से हत्या कर दी।
उग्रवाद का अंत और एक सकारात्मक पहलू
मंडई नरसंहार ने त्रिपुरा में बंगाली और जनजातीय दोनों ही समुदायों की सामूहिक स्मृति पर गहरे निशान छोड़े, और घटना के बाद गाँव के अधिकांश बंगाली निवासी भाग गए। मंडई 2009 तक उग्रवाद और जनजातीय उग्रवाद का केंद्र बना रहा, लेकिन इसके बाद यहाँ काफी सुधार हुआ।
नवंबर 2015 में यह रिपोर्ट किया गया कि मंडई ब्लॉक ने वित्तीय साक्षरता और समावेशन के क्षेत्र में देश के 6,835 अन्य ब्लॉकों से बेहतर प्रदर्शन किया, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में मंडई ब्लॉक को सम्मानित भी किया।
पूर्व डीएम (पश्चिम त्रिपुरा) अभिषेक सिंह ने बताया, “मंडई ब्लॉक ने बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच प्रदान करने में 100% से अधिक लक्ष्य हासिल किया है और दूसरों के लिए एक आदर्श बन गया है। वित्तीय समावेशन के परिणामस्वरूप, ब्लॉक के अधिक से अधिक जनजातीय लोग अब सरकारी सहायता तक पहुँच के लिए बैंकों से जुड़ रहे हैं।”
त्रिपुरा में जातीय-धार्मिक संघर्ष अब कम हो गए हैं क्योंकि अधिकांश जनजातीय चरमपंथी संगठन आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं। आज त्रिपुरा प्रगति और विकास के नए युग में प्रवेश कर चुका है और अपने पुराने विवादों को पीछे छोड़ रहा है।
भारत के सिंधु जल समझौता निलंबित करने का असर पाकिस्तान पर दिखने लगा है। भीषण गर्मी में पाकिस्तान के बाँध सूख रहे हैं। इन बाँधों से पानी भी कम छोड़ा जा रहा है। इसके चलते पाकिस्तान में खेती पर असर पढ़ने की संभावना है। पानी कम होने का असर सीधे-सीधे आँकड़ों में भी दिखा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान में सिंधु नदी पर बने बाँधों से इस वर्ष कम पानी छोड़ा जा रहा है। पिछले वर्ष के मुकाबले इसमें लगभग 15% की कमी आई है। इस बात की पुष्टि आधिकारिक डाटा से हुई है। यह कमी बीते सप्ताह (1 जून 2025-8 जून 2025) में आई है।
सूखे पाकिस्तान के बाँध
पाकिस्तान में सिंधु नदी के सहारे ही खेती और बाकी उद्योग चलते हैं। यह पाकिस्तान के पंजाब समेत बाकी राज्यों की जीवनरेखा सरीखी है। इसी पर कई बाँध भी बनाए गए हैं। अब पाकिस्तान के पंजाब में सिंधु से छोड़ा जाने वाला पानी मात्र 1.24 लाख क्यूसेक रह गया है। पिछले वर्ष यह 1.44 लाख क्यूसेक था।
पाकिस्तान का सबसे महत्वपूर्ण तरबेला बाँध भी सूख रहा है। तरबेला बाँध में सिंधु नदी का स्तर वर्तमान में 1465 मीटर पर है। यह इसके डेड लेवल 1402 मीटर से थोड़ा ही ऊपर है। किसी बाँध का डेड लेवल वह स्तर होता है, जहाँ से पानी को आगे भेजने के लिए पम्प का इस्तेमाल होता है।
इससे ऊपर के स्तर से पानी स्वयं ही आगे बह जाता है। यह हाल सिर्फ तरबेला बाँध का ही नहीं है बल्कि सिंधु नदी पर ही बने चश्मा बाँध का भी यही हाल है। पाकिस्तान के मियांवाली में बने इस बाँध में पानी का स्तर, डेड लेवल मात्र से 6 मीटर ही ऊपर है। यहाँ डेड लेवल 638 मीटर का है, जबकि यहाँ पानी का स्तर 644 मीटर है।
इस भीषण गर्मी में पानी की लगातार माँग बढ़ने वाली है, ऐसे में जल्द ही पाकिस्तान को और पानी इन बाँधों से छोड़ना पड़ेगा। तब यह डेड लेवल पर जा सकते हैं। पाकिस्तान के एक और महत्वपूर्ण मंगला बाँध में भी यही हाल है। यह झेलम नदी पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में बना है।
इसमें भी डेड लेवल 1050 मीटर के निकट ही 1163 मीटर पर पानी आ चुका है। इस पानी की कमी से पाकिस्तान में केवल खेती ही नहीं बल्कि बिजली का उत्पादन भी प्रभावित होने वाला है। पाकिस्तान इन बाँधों से बनने वाली पनबिजली पर बड़े स्तर पर निर्भर है।
खरीफ बुवाई में 21% पानी की कमी
पाकिस्तान का पंजाब और सिंध प्रांत बड़े स्तर पर सिंधु नदी से आने वाले पानी पर निर्भर है, इसी से यहाँ खेती होती है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट कहती है कि 10 जून, 2025 तक चलने वाली खरीफ की बुवाई में 21% पानी की कमी पाकिस्तान को इस वर्ष झेलनी पड़ेगी। यह असर सीधे तौर पर भारत के एक्शन का होगा।
पानी की कमी से परेशान पाकिस्तान अब लगातार भारत से सिंधु जल समझौते पर बात करने की गुहार लगा रहा है। उसने सिंधु जल समझौता निलंबित किए जाने के बाद 4 बार भारत को पत्र लिख कर ऐसा ना करने की गुहार लगाई है। पाकिस्तान ने यह पत्र भारत के जलशक्ति मंत्रालय को लिखे हैं। हालाँकि, भारत अपने स्टैंड पर कायम है।
क्या है सिन्धु जल समझौता?
भारत और पाकिस्तान, एक ही भूभाग का हिस्सा है। भारत से कई नदियाँ बह कर पाकिस्तान जाती हैं। सिंधु नदी तंत्र की नदियाँ पाकिस्तान के पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। इन्हीं के पानी के बँटवारे को लेकर किया गया समझौता सिंधु जल समझौताकहलाता है।
यह समझौता वर्ष 1960 में हुआ था। इसके लिए लगभग एक दशक तक बातचीत पाकिस्तान और भारत के बीच चली थी। तब प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के तानाशाह अयूब खान ने इसको मंजूरी दी थी। सिंधु जल समझौते के तहत सिंधु नदी तंत्र की 6 नदियों (व्यास, रावी, सतलुज, सिन्धु, चेनाब और झेलम) के पानी का बँटवारा होता है।
इस जल समझौते के अनुसार, पूर्वी नदियाँ (व्यास, रावी और सतलुज) के पानी पर पूरा अधिकार भारत का है। यानी इनमें बहने वाले पानी का वह किसी भी तरह से इस्तेमाल कर सकता है। भारत इन नदियों पर बाँध बना सकता है, उनकी जलधाराएँ मोड़ सकता है, उनसे नहरें निकाल सकता है और पूरा उपयोग कर सकता है।
सिंधु जल समझौते के अनुच्छेद 2 का खंड (1) कहता है, “पूर्वी नदियों का पूरा पानी भारत के अप्रतिबंधित उपयोग के लिए उपलब्ध रहेगा, सिवाय इसके कि इस अनुच्छेद में अन्यथा अलग से उसके लिए कोई प्रावधान किया गया हो।” पूर्वी नदियों को लेकर पाकिस्तान को दखलअंदाजी करने का कोई अधिकार नहीं है।
इसको लेकर भी अनुच्छेद 2 के खंड (2) में प्रावधान है। इसमें लिखा है, “घरेलू उपयोग को छोड़कर, पाकिस्तान सतलुज और रावी नदियों के पानी को बहने देने के लिए बाध्य होगा और उन स्थानों पर इनके पानी में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होने देगा, जहाँ ये पाकिस्तान में बहती हैं और अभी तक पूरी तरह से पाकिस्तान में प्रवेश नहीं कर पाई हैं।”
दरअसल, यह नदियाँ पाकिस्तान में अंतिम रूप से घुसने से पहले कई बार दोनों सीमाओं के इधर-उधर बहती हैं। पूर्वी नदियों के अलावा बाक़ी पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चेनाब) के पानी पर पूरा अधिकार पाकिस्तान का है। समझौता के अनुसार, भारत इन नदियों को लेकर कोई भी रोक नहीं लगा सकता।
समझौते का अनुच्छेद 3 का भाग (2) कहता है, “भारत पश्चिमी नदियों के जल को बहने देने के लिए बाध्य होगा, और इसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देगा, कुछ परिस्थितियों को छोड़ कर।” यह परिस्थितियाँ घरेलू उपयोग और कृषि उपयोग से जुड़ी हुई हैं।
इस समझौते के तहत इन 6 नदियों के लगभग 70%-80% पानी पर पाकिस्तान को जबकि 20%-30% पानी पर भारत को अधिकार मिलता है। इसको लेकर पहले भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं कि इसका सीधा फायदा पाकिस्तान को मिला है और भारत का इससे कोई लाभ नहीं है।
अब जब भारत ने 22 अप्रैल, 2025 को हुए पहलगाम हमले के बाद ने यह समझौता रद्द कर दिया है, तो पाकिस्तान में पानी की कमी साफ़ तौर पर दिखने लगी है।
भारत ने वर्ष 12 वर्षों में लगभग 27 करोड़ लोगों को निर्धनता से बाहर निकाला है। अब भारत में लगभग 5% लोग ही निर्धनता में रह रहे है, जिनके लिए काम चल रहा है। यह सारी जानकारी वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में दी है।
वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2011-12 में भारत में अत्यंत निर्धनता में रहने वालों की संख्या 34.4 करोड़ से अधिक थी। वर्ष 2022-23 में यह संख्या 7.5 करोड़ हो गई। यानी इसमें लगभग तीन चौथाई से अधिक की कमी आई।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार, वर्ष 2011-12 में 27% लोग भारत में अत्यंत निर्धनता में रह रहे थे। अब यह संख्या मात्र 5.3% ही रह गई है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक काम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में हुआ है।
इन राज्यों से सबसे अधिक लोग अत्यंत निर्धनता से बाहर निकाले गए हैं। भारत ने यह उपलब्धि तब हासिल की है जब वर्ल्ड बैंक ने किसी व्यक्ति को गरीब माने जाने के मानदंड बदले हैं और उन्हें और ऊँचा कर दिया है। भारत ने इसके बाद भी सफलता पाई है।
वर्ल्ड बैंक पहले $2.15 (लगभग ₹180) प्रतिदिन खर्चने वाले व्यक्ति को अत्यंत गरीब नहीं मानता था। यह पैमाना लम्बे समय से चला आ रहा था। हालाँकि, वर्ल्ड बैंक ने यह बदल कर $3 (लगभग ₹258) कर दी थी। यह मानदंड बढ़ाने के बावजूद भारत ने अत्यंत गरीबी में जी रहे लोगों को बाहर निकाला है।
यदि पुराना मानदंड ही लगाया गया होता तो भारत में 2022-23 में गरीबी का स्तर मात्र 2.3% पर आ जाता। गौरलतब है कि वर्ल्ड बैंक ने भारत की जो यह उपलब्धि बताई है, उसमें अधिकांश समय भाजपा की अगुवाई वाली NDA सरकार का शासन रहा है।
पहले के कई रिपोर्ट और सर्वे से स्पष्ट हुआ है कि उज्ज्वला योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, हर घर बिजली और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं ने देश के उन लोगों का जीवन स्तर उठाने में सबसे अधिक सहायता की है, जो पहले इनसे वंचित थे।