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कैलाशनाथ मंदिर जिसे कहा गया ‘कांची का महान रत्न’: जिसकी प्रेरणा से हुआ बृहदेश्वर और विरुपाक्ष जैसे मंदिरों का निर्माण

हिन्दुओं के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है कांचीपुरम। मंदिरों की नगरी कहे जाने वाले इस शहर में कई ऐसे मंदिर स्थित हैं जो प्राचीनकाल से ही हिन्दुओं के लिए बहुत महत्व के हैं और अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। कांचीपुरम के इन्हीं मंदिरों में एक कैलाशनाथ मंदिर है जिसे कांचीपुरम का रत्न कहा जाता है। लगभग 1,300 साल पुराना यह मंदिर आज भी अपनी संरचना से यहाँ आने वाले लोगों को मंत्रमुग्ध कर देता है।

मंदिर का इतिहास

तमिलनाडु के कांचीपुरम का कैलाशनाथ या कैलाशनाथर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण भगवान शिव, भगवान विष्णु, देवी, सूर्य, गणेश जी और कार्तिकेय की उपासना करने के लिए बनाया गया था। कांचीपुरम, पल्लव वंश के शासकों की राजधानी हुआ करती थी। कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण भी पल्लव वंश के राजाओं द्वारा किया गया था। अभी तक प्राप्त प्रमाणों से यह जानकारी मिलती है कि मंदिर का निर्माण 7वीं-8वीं शताब्दी के दौरान पल्लव राजा महेंद्रवर्मन द्वितीय ने कराया था। इसके अलावा महेंद्रवर्मन तृतीय के द्वारा भी मंदिर के सम्मुख भाग और गोपुरम के निर्माण की जानकारी मिलती है।

मंदिर की संरचना

कांचीपुरम के कैलाशनाथ मंदिर की संरचना ही उसे बाकि मंदिरों से अलग बनाती है। कहा जाता है कि बृहदेश्वर और विरुपाक्ष जैसे जिन मंदिरों को स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना माना जाता है, वो मंदिर भी कैलाशनाथ मंदिर की प्रेरणा से बनाए गए। संभवतः यही कारण है कि इसे ‘कांचीपुरम का महान रत्न’ कहा गया है। प्रख्यात पुरातत्वविद डॉ. आर नागस्वामी का मानना है कि कैलाशनाथ संभवतः दक्षिण भारत का ऐसा मंदिर है जिसमें पत्थरों के टुकड़ों को आपस में जोड़कर बनाया गया है। कांचीपुरम के इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ मुख्य मंदिर परिसर में 58 छोटे-छोटे मंदिरों का निर्माण किया गया है।

मंदिर के आधार का निर्माण ग्रेनाइट से हुआ है और मंदिर का निर्माण सैंडस्टोन से। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी दीवार पर 8 तीर्थ क्षेत्र हैं। इनमें से दो प्रवेश द्वार के बाईं ओर हैं जबकि 6 दाईं ओर। गर्भगृह के ऊपर द्रविड़ वास्तुकला में विमान का निर्माण किया गया है। गर्भगृह में ग्रेनाइट से बना एक अद्भुत और विशालकाय शिवलिंग स्थापित है। गर्भगृह के चारों ओर स्थित दीवारों पर भगवान शिव के लिंगोद्भव, उर्ध्व तांडवमूर्ति, त्रिपुरान्तक और हरिहर जैसे रूपों को उत्कीर्णित किया गया है। मंदिर के स्तंभों पर विभिन्न देवी-देवताओं के अलावा सिंह (शेर) की कलाकृतियों को प्रमुख रूप से दर्शाया गया है।

वैसे तो भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर में सोमवार, श्रावण मास और महाशिवरात्रि को हिन्दुओं की अच्छी-खासी भीड़ देखी जाती है। साथ ही कई अन्य त्यौहारों में भी यहाँ भक्तों का मेला लगा रहता है लेकिन आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य के अलावा इस मंदिर में कला एवं पुरातात्विक रुचि वाले लोगों का आना-जाना भी बना रहता है।

कैसे पहुँचे?

कांचीपुरम पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा चेन्नई इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, जो कैलाशनाथ मंदिर से मात्र 65 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा कांचीपुरम ट्रेन की सहायता से आसानी से पहुँचा जा सकता है। चेन्नई से ट्रेन के माध्यम से भी कांचीपुरम पहुँचा जा सकता है। चूँकि चेन्नई में कई रेलवे स्टेशन हैं, ऐसे में चेन्नई से कांचीपुरम पहुँचने के लिए कई अलग-अलग ट्रेनें विभिन्न समय पर कांचीपुरम पहुँचती हैं।

सड़क मार्ग से भी कांचीपुरम पहुँचना आसान है क्योंकि यहाँ सड़कों का एक बेहतर नेटवर्क है। चेन्नई से कांचीपुरम की सड़क मार्ग से दूरी लगभग 75 किमी है। इसके अलावा कांचीपुरम तमिलनाडु के कई शहरों और बेंगलुरू जैसे महानगरों से भी सड़क के माध्यम से जुड़ा हुआ है।

‘सेना भेजा तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा’: तालिबान ने भारत को धमकाया, कोरोना वैक्सीन पर भी लगाया प्रतिबंध

तालिबान ने अब तक अफगानिस्तान की 14 प्रांतीय राजधानियों पर कब्ज़ा कर लिया है और वो वहाँ के सबसे बड़े शहर काबुल की तरफ बढ़ रहे हैं। अब खबर आई है कि पूर्वी अफगानिस्तान के पकतिया में तालिबान ने कोरोना वैक्सीन को प्रतिबंधित कर दिया है। वहाँ के क्षेत्रीय अस्पताल में इस सम्बन्ध में नोटिस भी चस्पा दिया गया है। पिछले 3 दिनों से अस्पताल का कोविड-19 वैक्सीन वार्ड बंद पड़ा हुआ है।

जो भी लोग कोरोना वैक्सीन लेने आ रहे हैं, उन्हें बताया जा रहा है कि ये प्रतिबंधित है। वैक्सीन से सम्बंधित प्रशासनिक टीम को भी तालिबान ने कह दिया है कि वो अपना काम बंद कर दें। हालाँकि, तालिबान ने इस सम्बन्ध में कोई बयान नहीं दिया है। तालिबान पर निशान साहिब गुरुद्वारे पर से झंडा हटाने के आरोप भी लगे हैं। हालाँकि, तालिबान का कहना है कि सिखों ने खुद ही अपना झंडा हटा दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि उन्हें प्रताड़ित किया जा सकता है।

बकौल तालिबान, उसके ‘सिक्योरिटी अधिकारियों’ ने सिखों को आश्वासन दिया कि कोई उन्हें प्रताड़ित नहीं करेगा, जिसके बाद वो झंडा फिर लगा दिया गया। तालिबान ने अफगानिस्ता की जनता के लिए भारत द्वारा वहाँ चलाई जा रही परियोजनाओं की तारीफ़ करते हुए कहा है कि भारत पहले से ही ऐसा करता आ रहा है और ये प्रशंसनीय है। लेकिन, साथ ही धमकाया कि अगर भारत अफगानिस्तान में सेना का इस्तेमाल करता है तो ये उसके लिए अच्छा नहीं होगा।

तालिबान के प्रवक्ता मोहम्मद सुहैल शाहीन ने कहा कि अफगानिस्तान में सैनिक गतिविधियों का अंजाम भारत ने भी देखा होगा, इसीलिए अब ये उनके ऊपर है। तालिबानी प्रवक्ता ने ये भी कहा कि भारतीय प्रतिनिधियों से तालिबान के मिलने की खबर आई है, लेकिन वो इसकी पुष्टि नहीं कर सकता है। उसने कहा कि क़तर की राजधानी दोहा में एक बैठक हुई थी, जिसमें भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने भी हिस्सा लिया था।

तालिबान के प्रवक्ता ने ये भी आश्वासन दिया कि अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल पड़ोसी देशों के खिलाफ नहीं किया जाएगा। पकिस्तान के आतंकी संगठनों से अपने संपर्कों को तालिबान ने एक आधारहीन आरोप करार दिया। साथ ही प्रतिबद्धता जताई कि वो किसी भी दूतावास या विदेशी राजनयिकों को नुकसान नहीं पहुँचाएगा। उधर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने भी तालिबान की निंदा की है।

उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान अब नियंत्रण से बाहर जा रहा है, इसीलिए तालिबान को अपनी कार्रवाई रोक देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि युद्ध के रास्ते पर चल कर सत्ता पाने वालों के लिए विश्व समुदाय का संदेश है कि वो विश्वास खो देंगे और अंत में अफगानिस्तान ही अलग-थलग हो जाएगा। साथ ही उन्होंने तालिबान द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन, खासकर महिलाओं व पत्रकारों के खिलाफ अत्याचार पर आपत्ति जताई।

उधर कनाडा के अफगानिस्तान के 20,000 शरणार्थियों को शरण देने का फैसला लिया है, जिन्हें तालिबान से खतरा है। कनाडा ने कहा कि खासकर महिला एक्टिविस्ट्स और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को यहाँ बसाने पर जोर दिया जाएगा, जिन्हें अफगानिस्तान में तालिबान से ज्यादा खतरा है। इसके लिए कनाडा एक स्पेशल इमीग्रेशन प्रोग्राम लेकर आ रहा है। अफगानिस्तान के दूसरे और तीसरे सबसे बड़े शहर कंधार व हेरात पर तालिबान का कब्ज़ा हो चुका है।

‘इन पापियों से हिंदू बेटियों को आजाद कराना होगा’: लव जिहाद पर बनी फिल्म ‘The Conversion’ का ट्रेलर रीलीज, पहले ही दिन 19 लाख ने देखा

लव-जिहाद पर आधारित एक फिल्म का ट्रेलर शुक्रवार (13 अगस्त 2021) को रिलीज किया गया। The Conversion नाम की यह फिल्म उसी सामाजिक समस्या पर आधारित है, जिससे आज देश के कई राज्यों में हिन्दू लड़कियाँ जूझ रही हैं। यूट्यूब पर ट्रेलर को एक दिन के अंदर ही लगभग 19 लाख से अधिक लोग देख चुके हैं। ट्रेलर को 20,000 लोगों ने लाइक भी किया है। फिल्म सितंबर 2021 में रिलीज की जाएगी।

विनोद तिवारी द्वारा निर्देशित और नॉस्ट्रम इंटरटेनमेंट हब के बैनर तले बनाई गई इस फिल्म के ट्रेलर से पता चल जाता है कि यह फिल्म एक ऐसी हिन्दू लड़की की कहानी है, जो ‘बबलू’ जैसे हिन्दू नाम वाले एक मुस्लिम लड़के से प्यार कर बैठती है। वह अपने परिवार के विरुद्ध जाकर उससे शादी करती है, लेकिन शादी के बाद उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जाता है। वह लड़की अपने मुस्लिम पति के चंगुल से छूटकर हिन्दू लड़कियों को इस धोखे और साजिश से बचाने का बीड़ा उठाती है।

मूल चैनल पर व्यूज का आँकड़ा 19 लाख को पार कर गया है।

फिल्म के बारे में बात करते हुए निर्देशक विनोद तिवारी कहते हैं कि वह बहुत समय से इस अवसर का इंतजार कर रहे थे, इसलिए नहीं कि यह फिल्म उनके लिए महत्वपूर्ण है बल्कि इसलिए क्योंकि इस फिल्म की कहानी आज के युवाओं में जागरूकता लाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह फिल्म सिर्फ एक लव ट्रैंगल नहीं है, बल्कि यह भारत में लव मैरिज के बाद होने वाले धर्मान्तरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आधारित है।

हालाँकि, जहाँ बॉलीवुड ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर काम करने से हिचकिचाता है, वहीं एक फिल्म के माध्यम से आधुनिक भारत की एक मजहबी समस्या को सामने लाने के प्रयास की सराहना भी की जा रही है। ट्विटर पर कई यूजर इस फिल्म को प्रमोट करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वैसे बॉलीवुड के मेनस्ट्रीम फिल्म निर्माता और निर्देशक ऐसी फिल्में बनाना तो दूर उल्टे हिन्दू विरोधी फिल्में बनाते हुए दिखते हैं।

फिल्म को समर्थन के साथ विरोध का भी सामना करना पड़ा था। पिछले महीने The Conversion का पोस्टर रिलीज होने के बाद इसके विरोध में #BoycottThe ConversionMovie ट्रेंड किया गया था। कहा जा रहा था कि इस फिल्म के कारण मुस्लिम समुदाय के बारे में गलत सन्देश जाएगा।

‘तुमने पाकिस्तानी सेना को दी थी लोकेशन’: विक्रम बत्रा के इंटरव्यू पर फूली नहीं समा रही थीं बरखा दत्त, अचानक लगा उड़ता तीर, हुई फजीहत

कारगिल युद्ध के हीरो कैप्टन विक्रम बत्रा के जीवन पर बनी ‘शेहशाह’ मूवी के रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर मिले-जुले रिएक्शन देखने को मिल रहे हैं। कुछ लोग विक्रम बत्रा के सर्वोच्च बलिदान को सोचकर जहाँ भावुक हो रहे हैं। वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि सिद्धार्थ मल्होत्रा इस फिल्म के साथ न्याय नहीं कर पाए। हालाँकि, इस बीच बरखा दत्त वो शख्स हैं, जो अलग ही स्तर पर स्पॉटलाइट में बनी हुई हैं।

दरअसल, एक ट्विटर यूजर ने शेरशाह देखने के बाद ट्विटर पर लिखा, “शेरशाह देखी कल, इसने मुझे याद दिलाया कि आखिर कारगिल युद्ध में बरखा दत्त ने क्या किया था। फिल्ममेकर को उसका पार्ट भी दिखाना चाहिए था। कैप्टन बत्रा की ऊर्जा हमारे जेहन में दौड़ती है। कुछ ही लोग उस ऊँचाई पर जा पाते हैं। भावपूर्ण नमन।”

इस ट्वीट में यूजर क्या कहना चाहती थीं, ये संदर्भरहित था। हालाँकि, बरखा दत्त ने इसे अपनी तारीफ समझी और आभार व्यक्त करने लगीं। ऑथर ज्योति नाम की ट्विटर यूजर के ट्वीट पर उन्होंने लिखा, “धन्यवाद। ये दिल माँगे मोर, मेरा इंटरव्यू था और ये मेरे दिमाग और दिल में हमेशा रहेगा।”

इस ट्वीट के बाद एक क्षण ऐसा आया, जहाँ बरखा दत्त की फजीहत पर अधिकांश ट्विटर यूजर हँसने लगे। दरअसल, बरखा दत्त के ट्वीट के बदले उस यूजर ने लिखा था, “आपका स्वागत है, लेकिन मेरा मतलब था कि आपने पाकिस्तानी सेना को लोकेशन का एक्सेस दिया था। आगे की शर्मिंदगी से बचने के लिए आप मुझे ब्लॉक मार सकती हैं।”

अब यह दोनों ट्वीट और उनके जवाब एक साथ स्क्रीनशॉट लेकर शेयर हो रहे हैं और लोग जमकर बरखा दत्त की खिल्ली उड़ा रहे हैं। मालूम हो कि कारगिल युद्ध के दौरान बरखा दत्त का इंटरव्यू हमेशा विवादों में ही रहा है। लोगों का आरोप हमेशा यही रहा कि बरखा दत्त के कारण कम-से-कम एक दफा तो सेना को कारगिल युद्ध में भारी नुकसान हुआ था। अपनी किताब कारगिल: टर्निंग द टाइड में लेफ्टिनेंट जनरल मोहिंदर पुरी ने पूरे वाकये का भी जिक्र किया हुआ है। उन्होंने बताया है कि कैसे बरखा ने उस ऑपरेशन की लाइव टेलीकास्टिंग कर दी थी, जिसे पूरी गोपनीयता के साथ चलाया जाना था। हालाँकि, किताब यह साबित नहीं करती कि बरखा की रिपोर्टिंग के कारण भारत को कोई जान का नुकसान हुआ या नहीं, लेकिन उनकी वह रिपोर्ट भारत के लिए चिंता का विषय जरूर बनी और किताब में इस बात की ओर इशारा भी हैं।

बता दें कि बरखा की रिपोर्टिंग पहली बार देश के दुश्मनों और आतंकियों के काम नहीं आई। मुंबई अटैक को याद करें तो पता चलता है कि 26/11 के समय भी बरखा देश की परवाह किए बिना कैमरे और माइक लेकर ऑन टीवी वो नजारा दिखा रहीं थीं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा था। आतंकी बाहर का सब कुछ टीवी में देख पा रहे थे, एक-एक पल की उन्हें जानकारी मिल रही थी और इसका कारण थीं बरखा दत्त। बाद में उन्होंने खुद माना भी था कि ये सब उनकी नासमझी थी।

अफगानिस्तान में इस्लामी सत्ता की मज़हबी लड़ाई! तालिबान पर बगले झाँकते वैश्विक समुदाय को ये चुप्पी भारी पड़ेगी

अफगानिस्तान में लगभग दो दशक तक सभ्यता बरसा कर अमेरिका बोर हो गया तो निकल लिया। शायद सभ्यता और डेमोक्रेसी बरसाने के लिए किसी और देश की खोज में। इधर पाकिस्तान ताने मारे जा रहा है; हमारे जनरैल कियानी ने तो पहले ही खबरदार किया था कि अमरीका बहादर अफगानिस्तान में कुछ नहीं कर सकेंगे। तालिबान बान की तरह काबुल की ओर बढ़ रहे हैं। चीन उन्हें मॉरल और इम्मॉरल, हर तरह का समर्थन देने के लिए तैयार है। रूस कुछ बोलने की स्थिति में नहीं है इसलिए लेफ्ट आउट फील कर रहा है।

भारत के लिबरल पहले से ही कहने लगे हैं कि फ़ालतू में भारत सरकार ने वहाँ इतने संसाधन खर्च कर दिए। सोशल मीडिया पर सुरक्षा एक्सपर्ट आने वाले भविष्य में भारत की भूमिका पर ट्वीट कर कयास लगा रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स अपने पत्रकारों को अफगानिस्तान से निकालने के लिए उसी भारतीय सरकार से अनुरोध कर रहा है जिसके ऊपर वो लगातार लोकतंत्र को कमज़ोर करने का आरोप लगाता है। हमेशा की तरह यूरोप किसी के मानवाधिकार को लेकर चिंतित है।

कुल मिलाकर दोहरी नैतिकता और मुँहबोले लानतों वाला विकट अंतरराष्ट्रीय माहौल बन गया है।

दोहा में तालिबान के साथ अमेरिका की बातचीत से ही लगने लगा था कि अमेरिका समय से पहले ही “तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा” गाकर अफगानिस्तान से निकलने का मन बना चुका था। लोग अफगानिस्तान में अमेरिका की हालत की तुलना वियतनाम से भले कर रहे हैं पर सच यह है कि पाकिस्तान की वजह से अफगानिस्तान अमेरिका के लिए वियतनाम से भी जटिल बन चुका था। उधर चीन और पाकिस्तान ने इसके लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी।

चीन ने तो यह घोषणा कर दी कि वह अफगानिस्तान की प्रभुसत्ता का पक्षधर है और कभी उसके आंतरिक मामलों में किसी तरह के हस्तक्षेप के पक्ष में नहीं रहा। इस समय चीन के तालिबान प्रेम का यह हाल है कि पंद्रह दिन पहले चीनी विदेश मंत्री ने तालिबानी प्रतिनिधि मंडल से बीजिंग में मुलाक़ात की। अफगान तालिबान वैश्विक मंच पर वैधता के जिस शिखर पर पहुँचना चाहता है उसका बेस कैंप चीन बनाकर दे रहा है। पाकिस्तान अपने कंधे पर ऑक्सीजन और ड्राई फ्रूट्स वगैरह लाद कर उसके साथ चलने के लिए तैयार खड़ा है; चलिए हम साथ चलेंगे और जौन से शिखर पर जाना चाहते हैं, हम वहाँ ले चलेंगे।

चीन के विदेश मंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि तालिबान अफगानिस्तान में बड़ी फौजी और राजनीतिक ताकत है और उनसे यह आशा है कि वे अफगानिस्तान में शांति, समन्वय और पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। तालिबान से शांति की आशा करने वाले लोग इसी दुनियाँ में रहते हैं। वैसे देखा जाए तो यह कहना चीन के लिए आवश्यक है। आखिर उसने अफगानिस्तान में तेल, नून, लकड़ी (आयल, गैस और माइनिंग पढ़ें) के लिए जो दीर्घकालीन संधि की है उसके ऊपर तालिबान ए के 47 तान देंगे तब क्या होगा? फिर चीन अफगानिस्तान के साथ थोड़ा बॉर्डर भी शेयर करता है।

ये अलग बात है कि अभी तक उसने अफगानिस्तान के साथ किसी तरह का सीमा विवाद परोक्ष रूप से नहीं शुरू किया है। ऐसे में यह दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं कि दोनों मिल बाँटकर खाएँ। डाइनिंग हॉल के फर्श की सफाई का काम पाकिस्तान के जिम्मे है। सफाई करते हुए कुछ जूठन उसे भी मिल जाएगा। पर पाकिस्तान तो पाकिस्तान है। वह चीन की सेवा में तो है ही लेकिन उसे इस बात की चिंता भी है कि अगर अमेरिका ने किसी काम के लिए रास्ता माँगा और उसे देना पड़ा तो फिर तालिबान उसका क्या करेंगे?

अफगानिस्तान की वर्तमान हालात ने सुपर पावर, सुपर डुपर पावर, भूतपूर्व पावर, अभूतपूर्व पावर, लगभग हर पावर को विश्व समुदाय के सामने निर्वस्त्र कर दिया है। ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ है। ISIS ने जब यजीदियों पर अत्याचार की सुनामी ठेली थी तब भी तरह-तरह के ये पावर ऐसे ही निर्वस्त्र खड़े थे। दुनियाँ भर पर लोकतंत्र थोपने वाला अमेरिका बगलें झाँक रहा था। मानवाधिकार के लिए सदा रोने वाले यूरोप ने मुँह में गुटखा भर लिया था।

यजीदियों के समर्थन के नाम पर पश्चिमी देशों की मीडिया बीच-बीच में ऐसी किसी यजीदी लड़की पर ISIS के जुल्म की कहानी छापते थे जो उनकी कैद से भाग कर यूरोप या अमेरिका में कहीं पहुँच गई थी और फिर इस छपी कहानी को लोग चटखारे लेकर पढ़ते और सुनते थे और साथ ही अपने सोशल मीडिया अकाउंट से ISIS पर हज़ार लानतें भेजते थे। आश्चर्य न होगा यदि यही कहानी इसबार भी दोहराई जाए।

दुनियाँ भर में लोकतंत्र के झंडाबरदार अबतक तो तालिबानों की गोलियों को ही हज़ार लानतें भेजते हुए बरामद हुए हैं। ऐसे में जब तालिबानियों ने पंद्रह से पैंतालीस वर्ष की आयु की औरतों की लिस्ट बनाने का आदेश दिया तो उसकी चर्चा दो दिन तक होकर शांति हो गई। अफगानिस्तान के सबसे बड़े क्रिकेटर की दुनियाँ भर से अपील वाली ट्वीट आर टी में सिमट गई और मानवता की त्रासदी मीडिया की हैडलाइन में।

अफगानिस्तान में जो हो रहा है वह लोकतंत्र की लड़ाई नहीं है। वह अरब स्प्रिंग भी नहीं है। वह क्लैश ऑफ़ सिविलाइजेशन भी नहीं है। यह शुद्ध रूप से मज़हबी और सियासती सत्ता की लड़ाई है जिसके मूल में इस्लाम है। ऐसे में इन्हें देखते हुए मन में आता है कि जो बदलाव संयुक्त अरब अमीरात या सऊदी अरब में पिछले कुछ वर्षों में दिखाई दिया है वह उन देशों के लोगों के लिए आवश्यक क्यों है?

आखिर ये देश क्यों चाहते हैं कि उन्हें बदलने का समय आ गया है और वे बदलाव के अपने प्रयास में इतनी दूर तक जा सकते हैं जहाँ वे दशकों से इजराइल को मान्यता न देने के अपने निर्णय पर न केवल पुनर्विचार करते हैं बल्कि उसे मान्यता भी देते हैं। जब सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश सुधारों का जोखिम उठा सकते हैं तो पूरी दुनियाँ को सभ्यता सिखाने वाले पश्चिमी देश अफगानिस्तान से आँखें मूँदकर कैसे भाग सकते हैं? अफगानिस्तान में पाकिस्तान और चीन की भूमिका पर चुप कैसे रह सकते हैं और किसके मानवाधिकार के लिए मुँहबोली लड़ाई लड़ सकते हैं?

ममता बनर्जी को ‘विश्व शांति’ कार्यक्रम का न्योता: जिस Sant’Egidio के कारण अल्जीरिया और रोम में थे संकट के आसार, उसी का ये कारनामा

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को संत एगिडियो (Sant’Egidio) समुदाय के अध्यक्ष प्रोफेसर मार्को इम्पाग्लियाजो (Marco Impagliazzo) ने रोम में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में कथिततौर पर आमंत्रित किया है। विश्व शांति व बंधुत्व पर होने वाला यह कार्यक्रम ‘Peoples as Brothers, Future for Earth’ रोम में 6-7 अक्टूबर को आयोजित होगा। इसमें पोप फ्रांसिस, जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल और मिस्र में अल अजहर के बड़े इमाम अहमद तैयब भी बुलाए गए हैं।

इस निमंत्रण के लिए पत्र 22 जुलाई को भेजा गया है। इसमें कथिततौर पर ममता बनर्जी को चुनावों में उनकी जीत, उनके सामाजिक कार्य, देश के विकास और शांति में उनके प्रयासों के लिए सराहा गया है। पत्र में यह भी लिखा गया कि ममता ये सब 10 सालों से करती आ रही हैं। इसके बाद ‘सबसे कमजोर और वंचित’ वर्ग के लिए लड़ाई में उनकी प्रतिबद्धता को लेकर ममता बनर्जी की वाह-वाही की गई है।

अब पूरे पत्र को लेकर थोड़ी अजीब बात ये है कि ये खबर सिर्फ भारतीय मीडिया कवर कर रहा है। अगर वाकई पोप फ्रांसिस और एंजेला मर्केल को निमंत्रण भेजा गया है तो इतनी उम्मीद तो कर सकते हैं न कि ये खबर पश्चिमी मीडिया में भी छाई होगी। इस मुद्दे पर सोच विचार करना अधिक आवश्यक इसलिए भी हो जाता है, क्योंकि ममता बनर्जी के वैश्विक अवार्डों को लेकर जनता के पुराने अनुभव ठीक नहीं हैं।

भारतीय मीडिया कह रहा है कि ममता बनर्जी आयोजन में शामिल नहीं होंगी, क्योंकि ये तारीखें बंगालियों के लिए बेहद खास माने जाने वाले पर्व महालय के उनके कार्यक्रम के साथ क्लैश होंगी। मुख्यमंत्री यह पर्व अपने लोगों के साथ मनाना चाहती हैं। खैर! अब थोड़ा उस संगठन के बारे में जानते हैं जिसने ममता बनर्जी को विश्व शांति कार्यक्रम में आमंत्रित किया है।

संत एगिडियो समुदाय: विश्व शांति कार्यक्रम में ममता बनर्जी को निमंत्रण देने वाला यह संगठन आखिर कौन है?

वेबसाइट के अनुसार, “Sant’Egidio एक ईसाई समुदाय है, जिसकी शुरुआत 1968 में दूसरे वेटिकन काउंसिल के ठीक बाद हुई थी। एंड्रिया रिकार्डी की पहल पर इसे रोम के केंद्र के एक माध्यमिक विद्यालय में बनाया गया था। आज कई दशक बाद इसका नेटवर्क दुनिया के 70 से अधिक देशों में है।”

इटली के पूर्व मंत्री एंड्रिया रिकार्डी एक इतिहासकार के साथ-साथ राजनेता, ऐक्टिविस्ट और प्रोफेसर भी हैं। वह 18 महीने तक सत्ता में रही मारियो मोंटी सरकार में एकीकरण और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग मंत्री के रूप में कार्य किया था। यह समुदाय कथिततौर पर शरणार्थियों और प्रवासियों के कल्याण हेतु काम कर रहा है। इसके अलावा, यह बेघर और HIV/AIDS मरीजों के लिए भी काम करता है।

साभार: वेबसाइट

दिलचस्प बात ये है कि इस समुदाय से जुड़े विवाद भी कम नहीं हैं। संगठन से जुड़े लोगों के संस्मरणों में इसका उल्लेख मिलता है। संगठन की एक पूर्व सदस्या को लेकर बताया गया है कि कैसे उसके माता-पिता को इस बात से आपत्ति थी कि वह सैंट एगिडियो से जुड़कर परिवार को भूल गई। लड़की ने समुदाय से जुड़ने के बाद अपने परिवार को छोड़ दिया था और तन, मन से इसी समुदाय में जुट गई थी। इसके अलावा जो शादी ये समुदाय कराता था, उसमें बच्चे पैदा करने के लिए कुछ शर्तें होती थीं।

यह समुदाय वैश्विक राजनिति और कूटनीति के मामलों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया है। साल 1996-1998 में अल्जीरिया में इटली के राजदूत फ्रेंको डी कर्टन ने इस समुदाय के राजनयिक प्रयासों की कठोर शब्दों में आलोचना की थी।

संस्मरण में उन्होंने लिखा कि कैसे अल्जीरिया के आर्कबिशप के पास जब वो एक दिन गए थे तो उन्होंने इस समुदाय समेत कुछ समूहों के बारे में कठोर शब्द कहे थे, जो आतंकवाद का लाभ उठाकर और चरमपंथियों के साथ बातचीत का प्रस्ताव देकर सत्ता में पदों पर बैठकर ऊपर उठना चाहते थे। आर्कबिशप ने उस किताब की निंदा भी की थी, जो अल्जीरिया के हालातों पर इस समुदाय के लोगों ने इटली में पब्लिश करवाई थी। उनका दावा था कि उसमें कई बातें झूठी थीं, जिनसे उनके साथियों को नुकसान हो सकता था।

कर्टन ने आगे संस्मरण में बताया है कि कैसे इस समुदाय से अल्जीरिया के लोगों को खतरा था। साथ ही रोम और अल्जीरिया में विवाद बढ़ने की भी आशंका थी। ये बात उन्हें खुद अल्जीरिया के विदेश मंत्रालय ने कही थी। वहाँ उनको राजदूत ने कहा था कि अगर रोम “संत एगिडियो समूह” को फिर से खोलने का इरादा रखता है तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है। लेकिन इससे दोनों देशों के बीच संकट आने की उम्मीद है।

उल्लेखनीय है कि इस समुदाय ने साल 2018 में अपनी 50वीं सालगिरह मनाई थी। इस दौरान कार्यक्रम की अध्यक्षता वेटिकन के राज्य सचिव और फ्रांसिस के सबसे वरिष्ठ सहयोगी इतालवी कार्डिनल पिएत्रो पारोलिन ने की। उन्होंने अपने भाषण में संगठन की जमकर तारीफ की थी। पोप फ्रांसिस ने भी इसके हेडक्वार्टर का दौरा किया था।

अब, अगर ये सही बात है कि वाकई बंगाल मुख्यमंत्री को इस कार्यक्रम में बुलाने का न्योता आया है तो सवाल उठना लाजिमी है कि वो क्यों आया है। पोप फ्रांसिस और एंजेला मर्केल तो अपने देशों की प्रमुख हैं, लेकिन मुख्यमंत्री ममता इसमें कैसे फिट बैठती हैं। अगर इनके कदम से यह बात सामने आए कि चर्च भारत के राजनीतिक मुद्दों में भी हस्तक्षेप करना चाहता है तो यह हैरान करने वाली बात नहीं होगी।

वहीं, ऑपइंडिया ने इस निमंत्रण को लेकर पुष्टि करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी हमें कोई जवाब नहीं आया है।

‘पहले नौकरशाहों के पैरों में गिरना पड़ता था’, अब नहीं चलती ‘मस्का पॉलिश’: SII चेयरमैन साइरस पूनावाला ने की मोदी सरकार की प्रशंसा

वैक्सीन इंडस्ट्री द्वारा पूर्व में झेले गए लालफीताशाही व्यवस्था और ड्रग कंट्रोलर के उत्पीड़न को याद करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के चेयरमैन डॉ. साइरस पूनावाला ने मोदी सरकार की प्रशंसा की है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियाँ बदल गई हैं और अफसरशाही अब वर्तमान सरकार के कानूनों के मुताबिक काम कर रही है।

शुक्रवार (13 अगस्त 2021) को पूनावाला, पुणे के तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ में आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम में उन्हें लोकमान्य तिलक ट्रस्ट द्वारा लोकमान्य तिलक नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में अपने विचार रखते हुए पूनावाला ने कहा कि आज से 50 साल पहले वैक्सीन इंडस्ट्री को बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने बताया कि लालफीताशाही इस सीमा तक हावी थी कि अनुमति लेने के लिए अफसरों और ड्रग कंट्रोलर के पैरों में गिरना पड़ता था।

अपनी स्वर्गवासी पत्नी को अपना अवॉर्ड समर्पित करते हुए पूनावाला ने कहा कि 1966 में जब SII की स्थापना हुई थी तब अफसरों की अनुमति के साथ, बिजली और पानी जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। हालाँकि, उन्होंने बताया कि आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं और सरकार के द्वारा समय पर अनुमति के साथ पर्याप्त सहयोग भी मिल रहा है।

मोदी सरकार की प्रशंसा करते हुए पूनावाला ने कि लालफीताशाही और लाइसेंसराज अब मोदी सरकार के कानूनों के अंदर आ चुके हैं और इसी बदलाव का परिणाम है कि SII की Covid-19 वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ शीघ्रता से लॉन्च हो सकी। उन्होंने कहा कि परिवहन और संचार भी बड़ी चुनौती हुआ करते थे और उन्हें खुद अफसरों और ड्रग कंट्रोलर्स के पैरों में गिरना पड़ा था, लेकिन अब एक ऐसा ड्रग कंट्रोलर है जो ऑफिस खत्म होने के बाद भी काम करने के लिए तैयार रहता है और तुरंत प्रतिक्रिया भी देता है। पूनावाला ने कहा कि अब ‘मस्का पॉलिश’ का जमाना नहीं रहा।

ज्ञात हो कि SII की स्थापना साइरस पूनावाला ने ही की थी। यह दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी है, जो वर्तमान में एस्ट्राजेनेका की Covid-19 वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ का निर्माण कर रही है। SII के द्वारा बनाई जाने वाली यह डबल डोज वैक्सीन भारत में 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को लगाई जा रही है।

तालिबान को NDTV पर जगह, ऐसे कर रहा बचाव: हत्या, भारत (दोस्त या दुश्मन), बच्चियों से शादी… दिखा रहा आतंकी के तर्क

आतंकियों के तर्कों से पाठकों/दर्शकों को अवगत कराना अब NDTV, पत्रकारिता करने का तरीका मान चुका है। यही कारण है कि इस बार उसने तालिबान को अपने प्लेटफॉर्म पर जगह दी है। हाल में खबर आई थी कि तालिबान ने अफगान के 22 सुरक्षाकर्मियों को मारा है। ये खबर हर जगह थी, लेकिन एनडीटीवी आपके लिए इसका फैक्टचेक लेकर आया है। उसने संपर्क सीधा तालिबान के प्रवक्ता से किया और दिखाया कि जैसी खबर अफगान से आ रही हैं, वो तो सच ही नहीं है। सच वो है जो तालिबान का प्रवक्ता बताएगा, वो भी एनडीटीवी के माध्यम से।

नीचे लगाए गए स्क्रीनशॉट्स में देख सकते हैं कि एनडीटीवी ने कुछ ही देर पहले 5 ट्वीट किए है। सबमें अलग-अलग सवालों पर आतंकी तालिबान की राय है। इसमें उसने मोहम्मद सोहेल शाहीन, जो तालिबान का प्रवक्ता है, उसके बयानों को रिएलिटी चेक का नाम दिया है। इसमें शाहीन ने कहा है, “हमारे यहाँ ऐसा कोई मामला नहीं है, जब हमने सरेंडर हुए लोगों को मारा हो।”

फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दकी की निर्मम हत्या पर एनडीटीवी से तालिबानी प्रवक्ता ने कहा, “आप ऐसा नहीं कह सकते कि दानिश को हमारे लड़ाकों ने मारा। वो क्रॉस फायरिंग में मरा है।”

भारत, तालिबानियों का दोस्त है या दुश्मन? इस सवाल तक पर एनडीटीवी द्वारा सोहेल से जवाब लिया गया है और उसने बताया है कि ये तो भारत पर निर्भर होता है कि वो दोस्त हैं या दुश्मन।

15 साल की लड़कियों के तालिबानियों से निकाह पर सोहेल के बयान को रिएलिटी चेक का हिस्सा बताकर पेश किया गया। बयान में सोहेल ने कहा, “ये इस्लाम के नियम के विरुद्ध है कि किसी आदमी को उसकी बेटी देने के लिए दबाव बनाएँ। ये हो ही नहीं सकता। ये फेक न्यूज है।”

तालिबान को पाकिस्तान का साथ है या नहीं? इसके जवाब में सोहल ने एनडीटीवी को कहा है, “आप कहते हैं कि तालिबान के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, लेकिन मुझे लगता है कि पाकिस्तान से दुश्मनी के कारण आप ऐसा कहते हैं, न कि अफगानिस्तान की हकीकत के आधार पर।”

कॉलेज गई छात्रा गायब: परिवार ने कहा- मुहल्ले का मुस्लिम लड़का झाँसे में लेकर हुआ फरार, घर से 3 लाख रुपए भी गायब

मध्य प्रदेश के दमोह में लव जिहाद का एक मामला सामने आया है। कोतवाली थाना क्षेत्र की एक महिला ने आरोप लगाया कि मोहल्ला का ही एक मुस्लिम लड़का उनकी बेटी को झांसे में लेकर फरार हो गया है। महिला ने आरोप लगाया कि उनकी बेटी घर से तीन लाख रुपये भी लेकर गई है। घटना की जानकारी होने पर लोगों ने घंटाघर पर जमकर प्रदर्शन किया और पुलिस से तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।

छात्रा के परिजनों का कहना है कि गुरुवार (12 अगस्त) को उनकी बेटी पढ़ने के लिए कॉलेज गई थी, लेकिन वह वापस नहीं लौटी। चिंतित परिजनों कॉलेज में पता किया तो वहाँ भी लड़की नहीं मिली। हालाँकि, जिस बाइक को लेकर लड़की घर से निकली थी, वह बाइक कॉलेज में ही खड़ी पाई गई।  

छात्रा के परिजनों का कहना है कि उनकी बेटी लव जिहाद का शिकार हुई है। घर से 3 लाख रुपए भी गायब हैं। उन्होंने बताया कि उन्हें जानकारी मिली है कि उनकी बेटी को मोहल्ले में ही रहने वाले समुदाय विशेष का युवक अपने साथ लेकर गया है। परिजनों का आरोप है कि मुस्लिम युवक ने पहले उनकी बेटी को अपने झाँसे में लिया और फिर उसे अपने साथ ले गया। इस घटना से वे सभी काफी डरे हुए हैं।

उन्होंने कोतवाली थाने पहुँचकर शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है, लेकिन अभी तक आरोपित को गिरफ्तारी नहीं कर पाई है। परिवार के लोगों ने करीब दो घंटे तक थाने में आरोपित को पकड़ने की माँग की और विरोध प्रदर्शन किया।

बताया जा रहा है कि युवती के अपहरण और लव जिहाद मामले को लेकर 12 अगस्त को घंटाघर पर भीड़ जमा हो गई। इसमें अधिकतर महिलाएँ थीं। अभी तक आरोपित को पकड़ने में नाकाम रहने पर महिलाओं ने पुलिसवालों को जबरन चूड़ियाँ पहनाने का असफल प्रयास किया। उन्होंने कुछ ही देर में 5 रास्ते जाम कर दिए।

पुलिस के खिलाफ नारेबाजी और प्रदर्शन करने के बाद महिलाओं के हाथों में चूड़ियों के डिब्बे नजर आए। घंटाघर पर एक महिला पुलिसकर्मी का हाथ पकड़कर उसे जबरन चूड़ियाँ पहनाने लगी। इसी बीच एक महिला पुलिसकर्मी ने उसे ऐसा करने से रोका।

हिंदू संगठनों ने भी लव जिहाद का आरोप लगाया है। बजरंग दल के पवन रजक का कहना है कि लड़की का अपहरण लव जिहाद के तहत किया गया है। पुलिस ने सूचना मिलने और एफआईआर दर्ज करने के बाद भी कार्रवाई नहीं की है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने हमें बताया है कि वह लड़की को 24 घंटे में बरामद कर लेंगे। रजक ने कहा कि यदि वह ऐसा नहीं कर पाए तो हम रविवार को पूरा जिला बंद रखेंगे।

अकलीम द्वारा अगवा छात्रा का दरगाह में धर्मांतरण, परिजनों पर भी इस्लाम कबूल करने का दबाव: परिवार ने दी पलायन की धमकी

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के शाही कस्बे में बीए सेकेंड ईयर में पढ़ने वाली हिंदू छात्रा को ब्लैकमेल करने और फिर उसका अपहरण करने के मामले में छात्रा के परिजनों ने कहा है कि उन पर भी धर्मांतरण कर मुस्लिम बनने का दबाव बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि उनकी अगवा बेटी का दरगाह आला हजरत में धर्मांतरण कर दिया गया है। कार्रवाई नहीं होने पर परिवार ने पलायन की धमकी दी है।

दरअसल, आरोपित अकलीम कुरैशी नाम के आरोपित ने खुद को हिंदू बताते हुए विशाल नाम से लड़की के साथ नजदीकियाँ बढ़ाई थीं। उसके बाद अकलीम कुरैशी पीड़िता का अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने लगा और बात नहीं मानने पर बाद में उसका अपहरण कर लिया था।

छात्रा के परिजनों ने SSP से गुहार लगाते हुए कहा कि 05 अगस्त को घर से सामान लेने निकली उनकी बेटी का मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा अपहरण कर लिया गया। परिजनों ने बताया कि अब एक रजिस्ट्री चिट्ठी आई है, जिसमें बताया गया है कि उनकी बेटी का दरगाह आला हजरत में धर्मांतरण कर दिया गया है। परिजनों का यह भी कहना है कि उन पर भी धर्मांतरण का दबाव बनाया जा रहा है और इस्लाम कबूल करने के लिए कहा जा रहा है। धर्मांतरण न करने पर गाँव से बाहर किए जाने की धमकी भी दी जा रही है।

आरोपित अकलीम कुरैशी ने सबसे पहले खुद को विशाल बताकर छात्रा के साथ नजदीकी बढ़ाकर अश्लील वीडियो बनाया और उसे ब्लैकमेल करने लगा। हालाँकि, जब छात्रा उसके ब्लैकमेलिंग और धमकियों के आगे नहीं झुकी तो एक दिन जब छात्रा दुकान में सामान लेने के लिए गई थी तो वहाँ से उसका अपहरण कर लिया। अपहरण के बाद इन आरोपों से खुद को बचाने के लिए आरोपित ने पोस्ट ऑफिस के जरिए शाही थाने को एक पत्र भेजा। इसमें छात्रा के नाम से लिखा कि उसने (छात्रा) अपना धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लिया है और आरोपित अकलीम के साथ निकाह कर लिया है। हालाँकि, जब इसकी जानकारी को खंगाला गया तो निकाह की बात झूठी निकली।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में इलाके के सभासद खलीबुल हसन खान पर आरोप है कि उसी ने वारदात को अंजाम देने में अकलीम कुरैशी की मदद की थी। दोनों के ही खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखी गई है और पुलिस उनके करीबियों से पूछताछ कर रही है। आरोपित की धमकियों से डरे छात्रा के परिजनों ने जिले के एसएसपी से मिलकर सहायता की गुहार लगाई। एसएसपी ने पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द न्याय का आश्वासन दिया है। साथ ही कहा है कि जल्द ही आरोपित को भी पकड़ लिया जाएगा।