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‘किताब खरीद घोटाला, 1 दिन में 36 संदिग्ध नियुक्तियाँ’: MGCUB कुलपति की रेस में नया नाम, शिक्षा मंत्रालय तक पहुँची शिकायत

मोतिहारी के ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB)’ के कुलपति की रेस में जो 5 लोग शामिल हैं और जिनका केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने साक्षात्कार लिया है, उसमें एक नाम प्रोफेसर शील सिंधु पांडे का भी है। उन्हें लेकर यहाँ के छात्र विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन पर पहले भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं और मोतिहारी का MGCUB काफी पहले से ही भ्रष्टाचार से पीड़ित रहा है। इसी कारण पिछले कुलपति को इस्तीफा देना पड़ा था।

सामाजिक कार्यकर्ता आलोक राज ने इस बाबत केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र भी लिखा है। इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि विश्वविद्यालय के नए कुलपति की नियुक्ति हेतु दिनांक 24 और 25 जून को शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा गठित कुलपति चयन समिति के द्वारा विभिन्न उम्मीदवारों का साक्षात्कार लिया। पत्र के अनुसार, इसमें प्रोफेसर शील सिंधु पांडे का नाम कुलपति चयन समिति के द्वारा अंतिम 5 सफल अभ्यर्थियों में शामिल किया गया है।

पत्र में लिखा है, “विदित हो कि प्रोफेसर शील सिंधु पांडे विक्रम विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश में कुलपति रह चुके हैं जहाँ पर वे किताब खरीदने तथा अवैध नियुक्ति करने के मामले में हुए घोटाले के मुख्य आरोपित हैं। मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय में उन पर मुकदमा भी हुआ था। इस बाबत हाईकोर्ट ने उनसे जवाब भी माँगा था, लेकिन तब वो पकड़े जाने के कारण पहले ही इस्तीफा देकर निकल गए थे। वो अक्खड़, शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले और घोटालेबाज किस्म के व्यक्ति हैं।’

समाजसेवी ने केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से निवेदन किया है कि प्रोफेसर शील सिंधु के नाम पर विचार न किया जाए और शीर्ष-5 में शामिल करने के फैसले को निरस्त किया जाए। साथ ही उनकी जगह किसी स्वच्छ छवि वाले प्रोफेसर को कुलपति बनाने की माँग की गई है। कहा गया है कि पहले से ही विवादों में रहे विश्वविद्यालय को बचाने के लिए ये ज़रूरी है कि पठन-पाठन का कार्य सुचारु रूप से करवाने वाले बेदाग़ छवि के व्यक्ति को जिम्मेदारी दी जाए।

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इस शिकायत का संज्ञान लिया है और इसे आगे भेजा है। अब छात्रों को इस मामले में आगे कार्रवाई का इंतज़ार है। इस सम्बन्ध में निखिल कुमार नामक छात्र ने RTI भी दायर की है और पूछा है कि अब तक इस शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। MGCUB के मौजूदा कुलपति का कार्यकाल पूरा हो चुका है और अगले कुलपति का छात्रों व शिक्षकों को इंतजार है। MGCUB अभी भी मोतिहारी के अस्थायी कैंपस में ही चल रहा है। जमीन अधिग्रहण के बावजूद निर्माण कार्य रुका हुआ है।

इससे पहले भी दो अन्य प्रोफेसरों को लेकर विवाद हुआ था। कहा जा रहा था कि उनमें से एक जहाँ वामपंथी विचारधारा के हैं, वहीं दूसरे ने नक्सलियों के प्रति सहानुभूति जताई है। दोनों ही प्रोफेसरों ने इन आरोपों को नकार दिया था। ऑपइंडिया से बात करते हुए उन दोनों ने आरोप लगाए थे कि एक साजिश के तहत ये दुष्प्रचार चलाया जा रहा है। अब सभी को शिक्षा मंत्रालय के अंतिम निर्णय का इंतजार है।

जहाँ तक प्रोफेसर शील सिंधु पांडे की बात है, उन पर 2016 में ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ में किताब खरीद में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। RTI कार्यकर्ता डॉक्टर मोहन बैरागी ने इस सम्बन्ध में RTI दायर की थी, जिसके बाद जाँच शुरू हुई थी। इसी बीच हाईकोर्ट में भी याचिका दायर हुई थी। अंततः प्रोफेसर शील सिंधु पांडे को इस्तीफा देना पड़ा था। आरोप लगे थे कि उन्हें विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कार्यों से कोई मतलब नहीं रहता था।

प्रोफेसर शील सिंधु पांडे के खिलाफ शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई – RTI में माँगा गया जवाब

उनके खिलाफ उच्च-न्यायालय में याचिका ‘भारतीय युवा संघ’ ने दायर की थी। फरवरी 2019 में उनके इस्तीफे के बाद मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित विक्रम यूनिवर्सिटी के कुछ छात्रों ने नारेबाजी कर के ख़ुशी भी मनाई थी। इसके बाद बीके शर्मा को वहाँ का अगला कुलपति नियुक्त किया गया था। साथ ही उन पर ‘RD गार्डी मेडिकल कॉलेज में 1 दिन में 36 लोगों की नियुक्ति करने का आरोप है, जिसे संदिग्ध बताया गया था।

आरोपों पर क्या कहते हैं प्रोफेसर शील सिंधु पांडे

प्रोफेसर शील सिंधु पांडे ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। ऑपइंडिया ने जब उनसे इस बाबत सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि जब टेंडर रद्द हो गया था और किताब की खरीद ही नहीं हुई थी तो घोटाले की बात कहाँ से आ गई? साथ ही एक दिन में 36 संदिग्ध नियुक्तियों पर उन्होंने सफाई दी कि एक प्राइवेट कॉलेज में इस तरह के निर्णय कुलपति द्वारा सीधे नहीं लिए जाते हैं और वो एक कमिटी भेजता है।

उन्होंने कहा कि इसी तरह उक्त कॉलेज में नियुक्तियों के लिए एक कमिटी बना कर भेजी गई थी, क्योंकि वहाँ कई पद खाली होने के कारण पठन-पाठन का कार्य प्रभावित हो रहा था। उन्होंने कहा कि इस निर्णय में उनकी कोई भागीदारी नहीं थी।

ममता बनर्जी को झटका: कलकत्ता HC ने कहा- शुभेंदु अधिकारी के करीबी को तुरंत रिहा करे सरकार, दोबारा FIR से पहले ले इजाजत

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सोमवार (अगस्त 2, 2021) को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब फर्जी सरकारी नौकरी घोटाले के आरोप में गिरफ्तार भाजपा विधायक शुभेंदु अधिकारी के करीबी राखल बेरा को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने तुरंत रिहा करने का आदेश सुनाया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार से कहा है कि इस मामले में राखल बेरा के खिलाफ आगे कोई भी एफआईआर दाखिल नहीं होनी चाहिए और अगर ऐसा करना है तो फिर उसके लिए पहले अदालत से इजाजत लेनी होगी।

बता दें कि सरकारी नौकरी घोटाला मामले में कथित संलिप्तता के संबंध में राखल बेरा को बीते 5 जून को गिरफ्तार किया गया था। कल्याण गढ़ के एक निवासी द्वारा मानिकताला पुलिस थाने में दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपित राखल बेरा को कोलकाता स्थित उनके आवास के बाहर से गिरफ्तार किया था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बेरा और उनके सहयोगियों ने राज्य के सिंचाई विभाग में समूह-डी श्रेणी की नौकरी दिलाने का झाँसा देकर लोगों से मोटी रकम एकत्र की। पुलिस को दिए अपने बयान में शिकायतकर्ता ने कहा कि आरोपित राखल बेरा ने जुलाई 2019 से सितंबर 2019 के बीच कोलकाता के मानिकटोला रोड पर साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के एक फ्लैट के अंदर एक शिविर का आयोजन किया।

शिकायत में कहा गया कि आरोपितों ने पश्चिम बंगाल सिंचाई और जलमार्ग विभाग के ग्रुप डी (फील्ड स्टाफ) में नौकरी देने का झाँसा देकर जनता से ‘भारी मात्रा में धन इकट्ठा’ किया। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपित ने उससे 2 लाख रुपए लिए, लेकिन 2019 में आयोजित उक्त शिविर के दौरान वादा किए गए सरकारी नौकरी नहीं दी गई। 

गौरतलब है कि शुभेंदु अधिकारी एक समय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री थे, लेकिन हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले वह तृणमूल कॉग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। इतना ही नहीं, नंदीग्राम विधानसभा सीट से शुभेंदु ने चुनाव लड़ा और अपनी प्रतिद्वंद्वी व प्रदेश की सीएम ममता बनर्जी को शिकस्त दी। वे विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता भी हैं।

‘दविंदर सिंह के विरुद्ध जाँच की जरूरत नहीं…मोदी सरकार क्या छिपा रही’: सोशल मीडिया में किए जा रहे दावों में कितनी सच्चाई

जम्मू-कश्मीर के सामान्य प्रशासन विभाग (Jammu and Kashmir’s General Administration Department) द्वारा 20 मई 2021 को जारी किए गए एक आदेश को लेकर 2 अगस्त को कई पत्रकारों, कई कॉन्ग्रेसी नेताओं व कई बुद्धिजीवियों ने केंद्रीय सरकार पर तंज कसे। ये आदेश निलंबित पुलिस अधिकारी दविंदर सिंह के सस्पेंशन से संबंधित था जिसके लिंक कुछ समय पहले आतंकी संगठनों से पाए गए थे।

आदेश के दूसरे पैराग्राफ में बताया गया था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(सी) के तहत उपराज्यपाल इस बात से संतुष्ट थे कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में दविंदर सिंह के मामले और तत्काल प्रभाव से उसकी बर्खास्तगी केस में आगे की जाँच की कोई आवश्यकता नहीं। इसी पैरा को पढ़ कर पत्रकारों, कॉन्ग्रेसियों और अन्य विपक्ष दल के नेताओं समेत बुद्धिजीवियों ने बिन सोचे समझे केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह पर तमाम सवाल उठाए।

ट्विटर पर इस संबंध में 1 अगस्त को किसी आनंद नाम के यूजर ने अपना थ्रेड शेयर किया था। इसमें दावा था कि केंद्र सरकार के उपराज्यपाल नहीं चाहते कि आतंकी दविंदर सिंह के विरुद्ध कार्रवाई हो। अपने अगले ट्वीट में आनंद ने लिखा, “आप जानते हैं कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में’ क्या मतलब है!! क्या यह आतंकवादी गतिविधियों में राज्य की मिलीभगत जैसा नहीं है? या फिर अब आतंकवाद की जाँच जरूरी ही नहीं रह गई?”

इसी तरह कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला भी सामने आए और इस मामले पर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा, “दविंदर सिंह कौन है? क्यों सरकार उसके विरुद्ध जाँच नहीं करवाना चाहती? क्या जाँच से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा होगा? उसका पुलवामा में रोल क्या था? उसके साथ गिरफ्तार कौन हुए थे? उसके साथियों का क्या नाम है? मोदी सरकार क्या छिपा रही है? देश को सब जानने का हक है।”

द हिंदू की राष्ट्रीय संपादक सुहासिनी हैदर ने इस मामले पर हैरानी जताई और लिखा, “वास्तव में चौंकाने वाला … उस समय जब आतंकवाद के झूठे आरोपों में सैंकड़ों जेल में बंद हैं, तब राज्य एक पुलिस अधिकारी को बचाना चाहता है जिसे कथिततौर पर आतंकियों को साथ बैठाकर ले जाते पकड़ा गया था, उसको जाँच से मुक्ति दे दी गई है?”

आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया टीम सदस्य ने लिखा, ”दिल्ली चुनाव से कुछ दिन पहले जनवरी 2020 में आतंकियों को दिल्ली ले जाना, वो भी जब शाहीन बाग के विरोध के कारण हालात बेहद अस्थिर थे। यह समझने के लिए आपको आइंस्टीन होने की आवश्यकता नहीं है कि यह किसकी योजना थी! अब भारत सरकार उसके खिलाफ जाँच नहीं चाहती है।”

पत्रकार आदित्य मेनन ने आरोप लगाया कि इस बात की हमेशा संभावना थी कि सिंह को हल्के में छोड़ दिया जाएगा। वह कहते हैं कि इस बात की पूरी जाँच होनी चाहिए कि आखिर दविंदर सिंह किसके आदेश पर काम कर रहा था और क्या हमारे सुरक्षा प्रतिष्ठान आतंकियों से जुड़े हैं।

इसी प्रकार द वायर, न्यूजक्लिक, और जनता का रिपोर्टर में स्तंभकार रवि नय्यर, कॉन्ग्रेस समर्थक संजुक्ता बासु, पत्रकार औरंगजेब भी इस मामले में सवाल खड़े किए।

किसी ने अनुच्छेद 311 समझने की कोशिश नहीं की

दिलचस्प बात ये है इतने सारे लोगों में कोई भी आर्टिकल 311 के दूसरे पैराग्राफ को ढंग से नहीं समझ पाया। उन्होंने बस बिना संदर्भ के इस लाइन को पढ़ा कि ‘आगे जाँच की जरूरत नहीं है’ और लगे ट्वीट पर ट्वीट करने। किसी ने नहीं सोचा ये अनुच्छेद है क्या।

इस अनुच्छेद 311 के तहत संघ या राज्य के अधीन कार्यरत सरकारी कर्मचारी को उनके पद से बर्खास्त करने‚ हटाने अथवा रैंक कम करने से संबंधित प्रावधान शामिल हैं‚ यद्यपि ऐसा केवल उपयुक्त जाँच के बाद ही किया जा सकता है। अनुच्छेद 311 उन कर्मचारियों को सुनवाई का स्पष्ट अधिकार प्रदान करता है‚ जिनके विरुद्ध इस अनुच्छेद को लागू किया गया है।

वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में, कुछ खंड सरकार को कोई पूछताछ न करने की अनुमति प्रदान करते हैं। उक्त अधिनियम के खंड (2) के उपखंड (सी) के तहत, ये कहा गया है कि अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल संतुष्ट हैं तो राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में, व्यक्ति को बिना किसी जाँच के बर्खास्त या हटाया जा सकता है।

NIA ने फाइल की हुई है चार्जशीट

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने जुलाई 2020 में दविंदर सिंह के खिलाफ पहले ही चार्जशीट जमा कर दी थी। उसका नाम हिजबुल-मुजाहिद्दीन के आतंकवादी सैयद नवीद सहित छह लोगों के खिलाफ चार्जशीट में शामिल था। जून 2020 में एनआईए ने पुष्टि की थी कि उनके पास निलंबित पुलिस अधिकारी के खिलाफ ‘पर्याप्त सबूत’ हैं और वह समय आने पर उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल करेगी। दविंदर को आतंकवाद विरोधी यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था।

दविंदर सिंह का आतंकी कनेक्शन

बता दें कि डीएसपी दविंदर सिंह इस्लामिक आतंकी संगठन से जुड़ा था। वह न केवल नवीद को ले जाने और पनाह देने के लिए पैसे ले रहा था, बल्कि साल भर उनको सहायता देने के लिए भी पैसे ले रहा था। सिंह आतंकवादियों को फँसाने, उनको मारने, उनकी गिरफ्तारी, उन्हें आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करने के कई अभियानों में शामिल था।

इस मामले के अन्य आरोपित हिजबुल के दो आतंकवादी नवीद मुश्ताक उर्फ ​​बाबू, रफी अहमद राथर और वकील इरफान शफी मीर हैं। तीनों को दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के वानपोह इलाके में राजमार्ग पर एक चौकी से डीएसपी के साथ गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार होने वाला 5वाँ व्यक्ति नवीद का भाई इरफान मुश्ताक था। कथित तौर पर साजिश में शामिल होने के आरोप में उसे 23 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद छठा आरोपित तनवीर अहमद वानी था।

11 सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी

जुलाई 2021 में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन के प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन के बेटों सहित 11 सरकारी कर्मचारियों को टेरर फंडिंग मामले में निकाल दिया गया था। संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत प्रदान किए गए प्रावधानों के अनुसार ही सभी ग्यारह को बर्खास्त किया गया था।

निष्कर्ष: केंद्र सरकार ने यह बिलकुल नहीं कहा कि दविंदर सिंह मामले में किसी जाँच की जरूरत नहीं है। पत्रकारों, नेताओं और बुद्धिजीवियों द्वारा साझा की गई जानकारी गलत है।

ममता से मिले राजदीप तो आया मौसम रसगुल्ला का, राजनीति में अब लड्डू का हाल भी राहुल गाँधी जैसा

“कठिन सवाल पूछने पर रसगुल्ले नहीं मिलते”

इससे पहले सोशल मीडिया प्रधान इस युग में कुछ अति उत्साहित ट्विटर हैंडल इसे महान दार्शनिक रूमी की सूक्ति बताकर रीट्वीट लूट लें, मैं बता देता हूँ कि यह रूमी की सूक्ति नहीं, बल्कि राजदीप सरदेसाई की स्वीकारोक्ति है। पढ़कर आप भले निराश हों कि सूक्ति टाइप दिखाई देने वाला वाक्य स्वीकारोक्ति निकला, पर मेरा काम है कि जो जैसा है उसे वही बता कर कहीं से अपने लिए भी रसगुल्ले का जुगाड़ कर लूँ। वैसे भी जो जैसा है उसे कुछ और बताया जाए तो नैतिकता का इंडेक्स ऊपर चला जाएगा और निष्पक्ष पत्रकारिता का नीचे।

जब ज़माना अच्छा था तब कठिन सवाल पूछे जाने पर पद्म पुरस्कार मिलते थे। तमाम पत्रकारों ने ‘इंदिरा जी को पूड़ी पसंद थी या पराठा?’ जैसे कठिन सवाल पूछकर पद्मश्री हथिया लिया। कइयों ने राहुल गाँधी का इंटरव्यू लेकर निष्पक्ष पत्रकारिता के गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा कर लिया। अब जमाना खराब है इसलिए कठिन सवाल पूछे जाने पर रसगुल्ला तक न मिलने की संभावना बन जाती है। ऐसे में कौन पत्रकार रसगुल्ले जैसी मिठाई को छोड़ेने का रिस्क लेगा? वैसे भी जिस रसगुल्ला पर दो राज्य भिड़ लेते हैं उसे पाने के लिए अगर कोई पत्रकार कठिन प्रश्न नहीं पूछने जैसी मेहनत कर रहा है तो उसे निष्पक्षता की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा।  

पिछले लगभग डेढ़ दशक में निष्पक्ष पत्रकारिता पद्मश्री से रसगुल्ले तक पहुँच गई। यही उसकी युगयात्रा है।

राजदीप ने एक प्रश्न के उत्तर में स्वीकार किया कि अगर वे ममता बनर्जी से उनके राज्य में हो रही हिंसा पर कठिन प्रश्न पूछते तो उन्हें रसगुल्ले नहीं मिलते। यह भी कोई बात है? इतना भी क्या डरना? मैं कहता हूँ रसगुल्ला मुँह में रखकर भी तो कठिन प्रश्न पूछे जा सकते हैं। भाई, रसगुल्ला ऐसी मिठाई है जिसे तोड़कर खाने में वैसा मज़ा नहीं है जैसा उसे साबुत खाने में है। राजदीप को चाहिए था कि पहले रसगुल्ला मुँह में रख लेते और फिर ममता बनर्जी से प्रश्न पूछते। कुछ ऐसी आवाज़ निकलती जिससे पता ही नहीं चलता है कि प्रश्न कठिन है या सरल। मुँह में रसगुल्ला रखने के बाद क्या कहा जा रहा है, इसे डिकोड करने में लोगों की जान निकल जाती। इधर राजदीप बड़े आराम से बता सकते थे कि मैने तो बड़े टफ क्वेशचन पूछे। अगर आपकी समझ में नहीं आया तो मेरी क्या गलती?

वैसे मेरे मन में यह भी आया कि राजदीप या उनके जैसे निष्पक्ष पत्रकार जिन्हें टफ क्वेश्चन कहते हैं, उन्हें क्या ममता बनर्जी से पूछा जा सकता था? जैसे सोनिया गाँधी का इंटरव्यू लेते हुए राजदीप ने कठिन प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी- एक सास के रूप में इंदिरा जी कैसी थीं? क्या आप दोनों के बीच ट्रेडिशनल सास-बहू रिलेशनशिप थी? उन्हें किस तरह का खाना पसंद था? इंदिरा जी ने आपको साड़ियाँ गिफ्ट की थीं? आपको किस रंग की साड़ी पसंद है? राहुल बचपन में भी ऐसे ही थे जैसे आज हैं? 

अब आप जरा सोचिए और खुद से पूछिए कि ऐसे कठिन सवाल क्या ममता बनर्जी से पूछे जा सकते हैं? ममता बनर्जी की सास ही नहीं है। नहीं हैं तो उनका नाम भी नहीं है। अब नाम नहीं है तो राजदीप कैसे पूछ लेते कि फलानी देवी एक सास के रूप में कोमल थी या कठोर? अच्छा ये बताइए कि उन्हें कौन सा पकवान पसंद था? इस तरह के प्रश्न पूछे नहीं जा सकते थे। ऐसे में तमाम कठिन प्रश्नों में से दो कठिन प्रश्न वैसे ही निकल गए। उसके बाद आते हैं कि साड़ी वाले कठिन प्रश्न पर। ममता बनर्जी एक ही रंग की साड़ी पहनती हैं। ऐसे में यह प्रश्न बेमानी हो जाता कि आपको किस रंग की साड़ी पसंद है? इस तरह से एक-एक करके सारे कठिन प्रश्न इंटरव्यू से निकलते रहते। जब ऐसे कठिन प्रश्न निकल ही जाते तो फिर राजदीप नए प्रश्न कहाँ से लाते? 

राजदीप ने यह भी बताया कि ममता बनर्जी से केवल एक रसगुल्ला मिलता है। प्रश्न न पूछने के लिए केवल एक रसगुल्ला! मैं तो कहता हूँ कि पद्मश्री गति प्राप्त निष्पक्ष पत्रकार को कम से कम दो रसगुल्ले तो मिलने ही चाहिए। ये क्या बात हुई कि राष्ट्रीय राजनीति में घुसने की तैयारी कर ली और दिल्ली के पत्रकार को केवल एक रसगुल्ला देकर पल्ला झाड़ ले रही हैं? और राजदीप की तो पत्नी भी पत्रकार हैं। ऐसे में वे डबल रसगुल्ले के हकदार हैं।  

वैसे भी किसी को केवल एक रसगुल्ला देना सही है क्या? दो रहे तो साथ बैठे-बैठे बोर भी नहीं होंगे। जरा सोचिए कि प्लेट में रखा एक रसगुल्ला राजदीप के सामने बैठे-बैठे कितना बोर हो रहा होगा! अकेला रसगुल्ला राजदीप को देखेगा और राजदीप उसे। दोनों एक-दूसरे की ओर बढ़ना चाहेंगे। पर शिष्टता का तकाज़ा है कि एक निष्पक्ष पत्रकार होने के नाते राजदीप के पास ममता बनर्जी को केवल बधाई ही नहीं देनी है, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर खुद को प्रोजेक्ट करने के रास्ते भी बताने हैं। ऐसी में वे बातें करते जा रहे होंगे और इधर रसगुल्ला बेचारा इंतज़ार में बासी हो रहा होगा। साथ ही मन ही सोच रहा होगा- क्या दुर्गति है बेचारे की। एक अदद मैं मिला हूँ और ये मुझे भी तुरंत मुँह नहीं लगा सकता।

पर जो भी हो, राजदीप ने पत्रकारिता में रसगुल्ले का महत्व उजागर कर दिया है। रसगुल्ला बंगाल से चलकर दिल्ली न केवल पहुँचा है, बल्कि इतनी ताक़त लेकर पहुँचा है कि पत्रकारिता का स्वर्णयुग वापस ला सके। उधर और नेता भी इस नए रहस्योद्घाटन के बाद राजनीति में रसगुल्ले के महत्व पर नए ‘शीरे’ से विचार करते हुए सोच रहे होंगे कि रसगुल्ला इतना ताकतवर है, यह पता ही नहीं था। फालतू में इतने वर्षों तक लड्डू को इज्जत देते रहे। पहले पता चलता तो हम भी दिल्ली यात्रा पर इसे लेकर जाते और पत्रकारों का मुँह रसगुल्ले से भर देते। 

राजदीप सरदेसाई ने रसगुल्ले को भारतीय राजनीति और पत्रकारिता के मध्य में रख दिया है। राजनीति इसे खिलाकर कठिन सवालों को रोकेगी और पत्रकारिता इसे खाकर।

ओडिशा कनेक्शन से क्रिकेट के दीवाने देश में हॉकी का शोर: ओलंपिक जीत में कॉन्ग्रेस खोज रही पंजाब, ध्रुव राठी के लिए SRK नायक

टोक्यो ओलंपिक में भारतीय खिलाड़ियों के अच्छे प्रदर्शन के बाद देश भर के नेताओं में होड़ लगी है कि इसके श्रेय लेकर क्षेत्रवाद को बढ़ावा दिया जाए और अपनी राजनीति चमकाई जाए। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह को भारतीय हॉकी टीम में नहीं ‘भारत’ दिख ही नहीं रहा है। वहीं जब खेल और खिलाड़ियों को प्रोत्साहन की बात आती है तो ये नेता जमीन पर कहीं नहीं दिखते। साथ ही खेल को लेकर भारत सरकार के प्रयासों की प्रशंसा भी नहीं करते।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब योग को बढ़ावा देते हैं, फिट करने की बात करते हैं और बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खेलने-कूदने की भी सलाह देते हैं तो विरोधी उनका मजाक बनाते हैं। जब इन्हीं कारणों से भारत का मस्तक ऊँचा होता है तो श्रेय लेने के लिए दौड़े चले आते हैं। आइए, भारतीय पुरुष एवं महिला हॉकी टीम की जीत के बहाने आज खेल को लेकर मोदी सरकार के प्रयासों और क्षेत्रवाद वाली राजनीति पर चर्चा करते हैं।

ओलंपिक में कैसा रहा है भारतीय हॉकी टीम का प्रदर्शन?

सबसे पहले बात महिला ओलंपिक टीम की, जिनकी उपलब्धि ऐसी है कि किसी का भी मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाए। भारतीय महिला हॉकी टीम पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुँची है। जी हाँ, पहली बार। ऑस्ट्रेलिया को 1-0 से हरा कर हमारी बेटियों ने ये उपलब्धि हासिल की। भारतीय हॉकी की जब बात होती है तो आज तक सिर्फ पुरुष हॉकी टीम की ही बात होती थी। वो टीम, जिसने 1930-60 की अवधि में विश्व हॉकी पर राज किया था।

भारतीय महिला हॉकी टीम ने ऑस्ट्रेलिया को हराया है, जिसे कई लोग सेमीफइनल में जाने के लिए फेवरिट टीम मान रहे थे। लेकिन, भारत ने सारे आकलन को धता बता दिया। इससे भारतीय खेल प्रशासकों के लिए भी सबक है कि वो महिला हॉकी टीम पर भी बराबर का ध्यान दें। भारतीय टीम का डिफेंस काफी तगड़ा था। इसके लिए गोलकीपर के रूप में अपना शत-प्रतिशत देने वाली सविता पुनिया की भी तारीफ़ होनी चाहिए।

गुरजीत कौर के एक ऐतिहासिक गोल की बदौलत भारत ने ये उपलब्धि हासिल की। मैच के बाद मिडफ़ील्ड में जलवा दिखाने वाली खिलाड़ी मोनिका मलिक ने कहा कि टीम को पता था कि उन्हें आगे बढ़ कर प्रदर्शन करना होगा और ये एक बड़ी जीत है। ये टीम कहाँ से उठी है, ये भी जानिए। पिछले रियो ओलंपिक में हम एक भी गेम जीतने में कामयाब नहीं रहे थे। इस बार भी पूल-ए के तीनों शुरुआती मैचों में हार के बाद वही यादे ताज़ा हो गई थीं।

लेकिन, अंतिम दो मैच जीत कर भारत ने क्वार्टरफाइनल में जगह बनाई। टीम के खिलाड़ियों का कहना है कि वो ज्यादा आगे की न सोच कर एक बार में एक मैच को ले रहे हैं और इसके लिए तैयारी कर रहे हैं। कोच सोर्ड मारजेन की तस्वीर वायरल हो रही है, जिसमें उनकी आँखों में आँसू हैं। सोर्ड एक डच हॉकी खिलाड़ी रहे हैं, जिनके पास लंबा अनुभव है। 47 वर्षीय मारजेन अब तक 9 टीमों की कोचिंग कर चुके हैं, जिनमें भारतीय पुरुष हॉकी टीम भी शामिल है।

अब बात भारतीय पुरुष हॉकी टीम की करते हैं, जो जिसने ग्रेट ब्रिटेन को 3-1 से हरा कर टोक्यो ओलंपिक सेमीफाइनल में जगह बनाई। दिलप्रीत सिंह, गुरजंत सिंह और हार्दिक सिंह ने ये तीनों गोल किए। पिछले 41 वर्षों में देश को इस तरह का मौका देखने को नहीं मिला। फाइनल में जगह बनाने के लिए हमें बेल्जियम को हराना होगा। 1972 के बाद हम पहली बार ओलंपिक के सेमीफाइनल में पहुँचे हैं।

यहाँ एक बात नोट करने लायक है कि 1980 में सेमीफाइनल नहीं, सीधे फाइनल हुआ था। तब भारतीय टीम ने स्वर्ण पदक जीता था। इसीलिए, गोल्ड का इंतजार 41 वर्षों का है और सेमीफाइनल हम 49 साल बाद खेल रहे। ये वही टीम है, जिसे पूल मैच में ऑस्ट्रेलिया ने 7-1 से हराया था, लेकिन ये उबरी और पूल में दूसरे स्थान पर रही। यहाँ भी गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने एक बड़ा गोल बचा कर भारत की उम्मीदें ज़िंदा रखीं।

पंजाब के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ने कुछ यूँ घुसाया क्षेत्रवाद

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के नाम के साथ ‘कैप्टेन’ जुड़ा है, क्योंकि वो सेना में इसी पद पर थे। सैन्य मामलों व इतिहास पर पुस्तकें लिख चुके हैं। लेकिन, इसके बावजूद जब वो भारतीय हॉकी टीम को बधाई देने वाले ट्वीट में ‘पंजाब’ का जिक्र करते हुए तीन खिलाड़ियों का नाम लेते हैं और उनके गोल मारने पर खुद के खुश होने की बात करते हैं तो इसमें क्षेत्रवाद की बू तो आती ही है। क्या ये टीम किसी राज्य विशेष की है? नहीं।

भारतीय हॉकी टीम के कई खिलाड़ियों के गुरु रहे और 1980 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय टीम के कप्तान रहे वी भास्करन ने कहा है कि पीआर श्रीजेश उनके हीरो हैं। जब भारत 1-0 से पीछे था, तब उन्होंने ग्रेट ब्रिटेन के 4-5 शॉट्स रोके। पीआर श्रीजेश केरल के हैं। वो हॉकी इंडिया लीग में उत्तर प्रदेश के लिए खेलते हैं। यही भारत है। ये एक टीम है। यहाँ क्षेत्रवाद नहीं घुसाया जा सकता।

वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन ने उन्हें बड़ा बढ़िया जवाब दिया है। एक नजर देखिए, “हाँ, हमें ओडिशा के रोहिदास पर गर्व है जिन्होंने उत्तर प्रदेश के ललित की तरफ बॉल ढकेला और मणिपुर के संगलापकम की तरफ ड्रैग-फ्लिक किया। हमें उन पर भी गर्व है, जिन्होंने मध्य प्रदेश के प्रसाद की तरफ बॉल ड्रिबल किया और प्रसाद ने केरल के श्रीजेश की तरफ। श्रीजेश ने पंजाब के दिलप्रीत, गुरजंत और हार्दिक को बॉल दिया, जिन्होंने तीन गोल किए। “

इसी तरह महिला हॉकी टीम को लेकर भी कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने इसी तरह का ट्वीट किया। उन्होंने ‘अमृतसर की गुरजीत कौर’ को बधाई देते हुए लिखा कि उन्होंने इस गेम का एकमात्र गोल स्कोर किया। यहाँ भी हम यही कहेंगे कि ये खिलाड़ी देश के लिए खेल रहे हैं। हरियाणा के एक छोटे से गाँव से संघर्ष कर के निकली सविता पुनिया क्या आज अपने राज्य की तरफ से खेल रही हैं? नहीं। पंजाब की गुरजीत और हरियाणा की सविता, दोनों देश भर के लिए खेल रही हैं।

एक रोचक फैक्ट: ओडिशा सरकार और भारतीय हॉकी टीम

हाल ही में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की भी एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें वो अपने कमरे में बैठ कर भारतीय महिला हॉकी टीम का मैच देख रहे थे। लोगों को उत्सुकता हुई कि आखिर इस हॉकी में उनका इतना इंटरेस्ट कैसे? वैसे भी सीएम का काम काफी व्यस्तता भरा होता है। असल में भारतीय हॉकी की दोनों टीमों की स्पॉन्सर ओडिशा की ही सरकार है। ऊपर से ओडिशा में हॉकी को लेकर एक दीवानगी भी है।

फरवरी 2018 में सहारा को रिप्लेस कर के ओडिशा ही भारतीय हॉकी का स्पॉन्सर बना। सीनियर के साथ-साथ महिला एवं पुरुष के जूनियर टीमों की भी। 5 वर्षों के लिए ये करार हुआ था। अभी ढाई वर्ष हो गए हैं। एक अनुमान है कि इसके लिए ओडिशा की सरकार ने 150 करोड़ रुपए खर्च किए गए, जो सहारा द्वारा खर्च किए गए रुपयों से साढ़े 3 गुना अधिक है। 2018 में हॉकी का वर्ल्ड कप भी ओडिशा में ही हुआ था।

दिलीप तिर्की, इग्नस तिर्की और लेज़ारस बरला जैसे बड़े हॉकी खिलाड़ी इस राज्य ने दिए हैं। मौजूदा हॉकी टीम में भी बीरेंद्र लकरा और अमित रोहिदास जैसे खिलाड़ी ओडिशा से हैं, लेकिन वहाँ के मुख्यमंत्री ने इनके राज्य का जिक्र करते हुए अलग से बधाई नहीं दी, सब को बधाई दी। कुछ महीने पहले तक दिप्सन तिर्की भी राष्ट्रीय टीम में थे। हॉकी इंडिया लीग में ‘कलिंगा लैंसर्स’ टीम का स्वामित्व भी ओडिशा की सरकार के पास है।

2014 का चैंपियंस ट्रॉफी और 2017 का हॉकी वर्ल्ड लीग फाइनल भी भुवनेश्वर में ही हुआ था। अंतररष्ट्रीय हॉकी फेडरेशन के अध्यक्ष नरिंदर बत्रा ने तब कहा था कि ओडिशा सरकार के इस फैसले से अन्य राज्य भी प्रेरित होंगे और वो अलग-अलग खेलों को स्पॉन्सर करेंगे। ऐसे में नवीन पटनायक की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने इस तरह का निर्णय लिया। अन्य राज्यों को भी इसका अनुसरण करना चाहिए, क्षेत्रवाद की बजाए।

भारत सरकार के प्रयासों को नज़रअंदाज़ करते हैं विपक्षी नेता

भारत सरकार ने देश में खेल को बढ़ावा देने और अंतररष्ट्रीय टूर्नामेंट्स में अच्छा प्रदर्शन कराने के लिए ‘खेलो इंडिया’ शुरू किया। इससे पहले हमने देखा था कि किस तरह जब बॉक्सर लवलीना बोर्गोहेन को कोरोना हुआ था और वो प्रशिक्षण के लिए विदेश नहीं जा पाई थीं तो भारत सरकार ने उनके लिए व्यक्तिगत सेंटर स्थापित किया। इस तरह कई युवा खिलाड़ियों को भारत सरकार ने आगे बढ़ने में साथ दिया।

जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इन खिलाड़ियों से मिलते-जुलते रहते हैं, इनकी बात सुनते हैं और इन्हें बधाई देते हैं, इसी से समझा जा सकता है कि खेल को लेकर ये सरकार कितनी गंभीर है। ‘खेलो इंडिया’ के तहत 21 वर्ष तक की उम्र वाले खिलाड़ियों को तराशा जाता है, ताकि भविष्य में वो देश का मस्तक गर्व से ऊँचा करें। अभी भले ही टोक्यो ओलंपिक की ही चर्चा हो चारों तरफ, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत सरकार की तैयारी क्या है?

भारत सरकार ने ‘खेलो इंडिया’ के तहत अगले दो ओलंपिक खेलों की तैयारी में लगी है। इसके लिए अब तक 150 युवा प्रतिभाओं की पहचान की जा चुकी है। इस योजना के तहत प्रतिभाओं की पहचान होती है, उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था की जाती है और 3000 खिलाड़ियों को 10,000 रुपए का मासिक खर्च भी दिया जाता है। तैराक श्रीहरि नटराज, जेवलिन थ्रोअर नवदीप सिंह और शटलर पलक कोहली जैसे खिलाड़ी इस प्लेटफॉर्म से आए हैं।

भारतीय महिला हॉकी टीम के प्रदर्शन का श्रेय SRK को?

‘हाल ही में सीमा पर हुए विवाद में भारतीय सेना ने चीन को पीछे हटने को मजबूर कर दिया, जिसका श्रेय अजय देवगन और शनि देवल को जाता है’ – कोई अगर ऐसा कहे तो आप क्या सोचेंगे? क्या ‘LOC कारगिल’ और ‘बॉर्डर’ से सेना के जवान लड़ना सीखते हैं? इसी तरह का काम यूट्यूबर ध्रुव राठी ने किया है। उनका कहना है कि भारतीय टीम के अच्छे प्रदर्शन का श्रेय शाहरुख़ खान को जाता है।

ध्रुव राठी का कहना है कि हमारी पूरी जनरेशन शाहरुख़ खान की फिल्म ‘चक से इंडिया’ देखती हुई बड़ी हुई है। उनका यहाँ तक कहना है कि भारतीय महिला हॉकी टीम के अच्छे प्रदर्शन के लिए किसी से भी ज्यादा श्रेय इसी फिल्म को जाता है। उनका मानना है कि इस फिल्म ने महिलाओं को हॉकी खेलने के लिए प्रेरित किया। तो क्या पीवी सिंधु ने ‘ओम शांति ओम’ फिल्म में दीपिका पादुकोण को देख कर बैडमिंटन खेलना सीखा?

कोई भी इस तरह के प्रदर्शन का श्रेय खिलाड़ियों को देगा, टीम मैनेजमेंट को देगा, खिलाड़ियों के परिवार और कोच को देगा। लेकिन, ध्रुव राठी जैसे लोगों के लिए शाहरुख़ खान ही सब कुछ हैं। कल को ये लोग मेरी कौम की सफलता के लिए प्रियंका चोपड़ा और मिल्खा सिंह की लोकप्रियता के लिए फरहान अख्तर को क्रेडिट न दे दें। ये कहना वैसा ही है जैसे ‘ग़दर’ देख कर भारतीय सेना ने पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक की।

बलात्कार के दोषी कैथोलिक पादरी की याचिका को SC ने किया खारिज, पीड़िता से शादी के लिए कोर्ट से माँगी थी अंतरिम जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (2 अगस्त 2021) को केरल के पूर्व कैथोलिक पादरी रॉबिन वडक्कमचेरी की याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। याचिका में पूर्व कैथोलिक पादरी ने उस लड़की से शादी करने के लिए अंतरिम जमानत की माँग की थी, जिसके साथ उसने दुष्कर्म किया और उसे गर्भवती कर दिया था। वहीं, पीड़िता ने भी वडक्कुमचेरी की जमानत की याचिका का समर्थन किया था, ताकि दोनों की शादी हो सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अदालत ने केरल के कोट्टियूर बलात्कार मामले की पीड़िता द्वारा दायर उस आवेदन पर भी विचार करने से इनकार किया है, जिसमें उसने रॉबिन वडक्कमचेरी से शादी करने की इच्छा व्यक्त की थी। बताया जा रहा है कि पीड़िता ने पादरी की याचिका का समर्थन करते हुए कहा था कि वह सामाजिक कलंक से बचने और अपने बच्चे को वैधता देने के लिए यह शादी करना चाहती है।

Livelaw के मुताबिक, कोर्ट ने कहा कि बलात्कार पीड़िता से शादी करने के लिए रॉबिन की सजा को कम करने से इनकार करने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं दिखता है। जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की पीठ ने अभियोजक से हाईकोर्ट के समक्ष अपनी बात रखने को कहा।

वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता किरण सूरी ने कहा कि पीड़िता बच्चे की वैधता के लिए आरोपित से शादी करना चाहती है। याचिका में पीड़िता ने कहा है कि उसका बच्चा स्कूल जाने की उम्र का है। ऐसे में उसे बच्चे के एडमिशन के लिए पिता के नाम का उल्लेख करना जरूरी है।

बताया जा रहा है कि 45 वर्षीय आरोपित रॉबिन ने पीड़िता से शादी करने की माँग वाली एक याचिका के साथ केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने रॉबिन की इस याचिका को ठुकरा दिया था।

गौरतलब है कि पादरी रॉबिन को फरवरी 2019 में एक अदालत ने पीड़िता से बलात्कार और उसे गर्भवती करने का दोषी पाते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। उसे वेटिकन की तरफ से पादरी के पद से भी बर्खास्त कर दिया गया था।

बता दें कि पादरी को 27 फरवरी, 2017 को कोच्चि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास से गिरफ्तार किया गया था, जब वह देश से बाहर जाने की तैयारी कर रहा था। यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने के बाद पादरी को 17 फरवरी, 2019 को थालास्सेरी की एक अदालत ने 20 साल कैद की सजा सुनाई थी। सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी माँ अपने बयान से मुकर गई थी। इसके बावजूद, अदालत पहले से एकत्र किए गए सबूतों के आधार पर आगे बढ़ी और अपना फैसला सुनाया।

…तो यूपी का फिरोजाबाद हो जाएगा चंद्रनगर, जिला पंचायत से नाम बदलने का प्रस्ताव पास

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद का नाम बदला जा सकता है। नाम बदलकर चंद्रनगर रखने की तैयारी है। जिला पंचायत की बैठक में नाम बदलने के प्रस्ताव पर मुहर लग गई है। जिले का नाम बदलने की सुगबुगाहट काफी दिनों से चल रही थी। इसे देखते हुए फिरोजाबाद का प्राचीन नाम चंद्रनगर रखे जाने का प्रस्ताव जिला पंचायत अध्यक्ष हर्षिता सिंह की अध्यक्षता में पारित कर दिया गया।

फिरोजाबाद जिला पंचायत बोर्ड की पहली बैठक आयोजित की गई थी। इस बैठक में विकास और जनहित के कई प्रस्तावों पर मुहर लगी। साथ ही फिरोजाबाद सदर के ब्लॉक प्रमुख लक्ष्मी नारायण यादव ने जिले का नाम चंद्रनगर रखने का प्रस्ताव रखा, जिसे बोर्ड ने सर्वसम्मति से पारित कर शासन को भेज दिया है।

द इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए जिला पंचायत की अध्यक्ष हर्षिता सिंह ने कहा, “प्रस्ताव को शनिवार (जुलाई 31, 2021) को एक सत्र में मौखिक रूप से पेश किया गया था जब अधिकांश सदस्य मौजूद थे। यह प्रस्ताव प्रखंड प्रमुख लक्ष्मी नारायण द्वारा लाया गया था। सदन ने इस प्रस्ताव को पारित कर दिया क्योंकि किसी ने कोई विरोध नहीं दिखाया। सदन में एक भी व्यक्ति ने इसका विरोध नहीं किया। अगले हफ्ते तक हम जिला मजिस्ट्रेट को प्रस्ताव के बारे में सूचित करते हुए एक पत्र लिखेंगे। फिर वह आगे की कार्रवाई करेंगे और सरकार को लिखेंगे। अंततः सरकार नाम परिवर्तन के बारे में अंतिम निर्णय लेगी।”

फिरोजाबाद का नाम बदलने की वजह के बारे में पूछे जाने पर सिंह ने कहा, “हम नाम नहीं बदल रहे हैं। हम बस पुराने नाम पर वापस जा रहे हैं, जो मुगलों के भारत आने से पहले था। बादशाह अकबर के प्रतिनिधि फिरोज शाह ने इस जगह का नाम बदलकर फिरोजाबाद कर दिया था। 1560 के दशक से पहले इस जगह का नाम राजा चंद्रसेन के नाम पर था।” वहीं बीजेपी नेता और प्रखंड प्रमुख लक्ष्मी नारायण यादव ने कहा, “पूरा जिला यह बदलाव चाहता था। मैंने इस प्रस्ताव को नए सत्र में पहले आदेश के रूप में पढ़ा। इसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।” 

भाजपा नेता कन्हैयालाल ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो पहले ही फिरोजाबाद का प्राचीन नाम चंद्रनगर का प्रयोग करता रहा है। प्राचीन समय में जैन राजा चंद्रसेन की नगरी थी, जिसका नाम चंद्रवाड़ था। कालांतर में मुस्लिम शासकों ने चंद्रवाड़ पर हमला कर इसे तहस-नहस कर दिया था। चंद्रवाड़ नगरी के अवशेष अभी भी यमुना किनारे मौजूद हैं। 1566 में अकबर ने सिपहसालार फिरोजशाह को भेजा था, जिसके बाद बसाए गए नगर का नाम फिरोजाबाद रखा गया था।

अफगान सेना की कार्रवाई में 455 तालिबान आतंकी ढेर, आतंकियों के कैंप को तबाह करने का वीडियो भी आया सामने

युद्धग्रस्त अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों के स्वदेश वापसी के बीच तालिबान आतंकियों ने बर्बर हमलों के साथ ही नरसंहार की शुरुआत की। अफगान सुरक्षा बल भी लगातार तालिबान से लोहा ले रहे हैं। अब अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा बलों (ANDSF) ने अफगान वायुसेना (AAF) के साथ एक संयुक्त अभियान चलाया, जिसमें पिछले 24 घंटों में 400 से अधिक तालिबान आतंकवादियों का सफाया हुआ। बता दें कि मध्य एशियाई देश अफगानिस्तान की सेना शनिवार (जुलाई 31, 2021) से तालिबान के ठिकानों पर लगातार हमले कर रही है, जिससे दर्जनों आतंकी मारे गए हैं। इसके साथ ही बड़े पैमाने पर गोला-बारूद को नष्ट किया गया है।

ताजा जानकारी के मुताबिक, अफगान रक्षा मंत्रालय (MoD) ने पुष्टि की है कि इस ऑपरेशन में कुल 455 आतंकवादी मारे गए, जबकि 232 अन्य घायल हुए हैं। मंत्रालय के अनुसार, सैनिकों ने नंगरहार, पक्तिया, पक्तिका, लोगर, कंधार, हेरात, फरयाब, जोवजान, बल्ख, समांगन, हेलमंद, तखर, कुंदुज, और बगलान और कपिसा प्रांतों में आतंकी शिविरों को निशाना बनाया गया। इससे पहले, मंत्रालय ने ज़ेराई में किए गए हवाई हमले का एक वीडियो साझा किया था। 6 सेकंड के इस वीडियो में मिसाइल से आतंकवादी शिविरों को उड़ते हुए देखा जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि एक वर्चुअल कैबिनेट बैठक को संबोधित करते हुए अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार (अगस्त 1, 2021) को कहा कि हिंसा से जूझ रहे देश की स्थिति में अगले 6 महीनों के भीतर बदलाव दिखाई देगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि शहरों की सुरक्षा उनकी सरकार की प्राथमिकता है। तालिबान पिछले दो दशकों में ‘अधिक क्रूर और अधिक दमनकारी’ हो गया है।

गनी ने कहा, “उन्हें शांति, समृद्धि या प्रगति की कोई ख्वाहिश नहीं है। हम शांति चाहते हैं लेकिन वे आत्मसमर्पण चाहते हैं। वे तब तक सार्थक बातचीत नहीं करेंगे जब तक कि युद्ध के मैदान में स्थिति नहीं बदल जाती। इसलिए, हमें एक साफ रूख अपनाना होगा । इसके लिए तालिबान के खिलाफ पूरे देश को एक साथ आना होगा।”

गौरतलब है कि हाल ही में अफगानिस्तान के मध्य प्रांत गजनी में मलिस्तान जिले पर हमले के बाद तालिबान ने 43 नागरिकों और सुरक्षा बल के सदस्यों की गोली मारकर हत्या कर दी थी। गजनी की एक नागरिक समाज कार्यकर्ता मीना नादेरी ने रविवार (जुलाई 25, 2021) को काबुल में एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि तालिबान आतंकियों ने मलिस्तान जिले में प्रवेश करने के बाद युद्ध अपराध किए और उन नागरिकों को मार डाला, जो लड़ाई में शामिल नहीं थे। 

‘तालिबान पाकिस्तानी समर्थन के बिना एक भी दिन नहीं टिक सकता’: पश्तूनों ने पाकिस्तान के खिलाफ न्यूयॉर्क में किया विरोध प्रदर्शन

अमेरिका के न्यूयॉर्क में पश्तून तहफुज मूवमेंट (पीटीएम) ने अली वजीर की अवैध नजरबंदी और अफगानिस्तान में पाकिस्तान के छद्म युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि अली वजीर पाकिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन और सैन्य उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं।

पीटीएम (Pashtun Tahafuz Movement) ने अपने बयान में कहा कि न्यूयॉर्क और कनेक्टिकट में पार्टी के सदस्यों ने शनिवार (31 जुलाई 2021) को हुई कार रैली में बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। उन्होंने अली वजीर की तत्काल रिहाई और अफगानिस्तान में पाकिस्तानी छद्म युद्ध की समाप्ति की माँग की है। उन्होंने कहा कि पश्तूनों द्वारा शांतिपूर्ण जीवन के लिए आवाज उठाने पर वजीर को अवैध हिरासत में रखा गया है।

पीटीएम यूएसए के नेता हिम्मत ने कहा, ”अली वजीर की लगातार नजरबंदी अवैध है, क्योंकि इसका आदेश जनरल बाजवा ने दिया है।” उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि पाकिस्तान में अदालतें स्वतंत्र नहीं हैं और हम सेना द्वारा नियंत्रित न्यायाधीशों से न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते।

उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तानी नेशनल असेंबली एक रबर स्टैंप है और देश की शक्तिशाली सेना महत्वपूर्ण मुद्दों पर विधानसभा को आदेश देती है। अली वजीर को लेकर हाल ही में संसद में ऑफ-कैमरा ब्रीफिंग में थल सेना प्रमुख जनरल कमर बाजवा ने कहा था, “अली के माफी माँगने के बाद ही हम उन्हें रिहा कर सकते हैं।”

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक कनेक्टिकट में पीटीएम के उपाध्यक्ष अमीन जान इब्राहिमी ने कहा कि अफगानिस्तान में पाकिस्तानी हस्तक्षेप बिल्कुल स्पष्ट है। तालिबान नेतृत्व क्वेटा, पेशावर और मिरानशाह में रह कर योजना बना रहा है। तालिबान पाकिस्तानी समर्थन के बिना एक भी दिन नहीं टिक सकता है। अफगानिस्तान में युद्ध को समाप्त करने के लिए पाकिस्तान पर तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों का समर्थन समाप्त करने के लिए दबाव बनाना होगा।

बता दें कि कार रैली संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में समाप्त हुई थी। इसमें दुनियाभर के लोगों से अहम भूमिका निभाने व अफगानिस्तान में निर्वाचित सरकार का समर्थन करने की माँग की गई थी।

8 नए टेरर रूट, 27 लॉन्च पैड, 146 आतंकी: 15 अगस्त से पहले आतंकी हमले की पाकिस्तानी साजिश

पाकिस्तान और दुनिया भर में कुख्यात उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने 15 अगस्त से पहले भारत में आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने और हमलों के लिए अपने कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में नए आतंकी नियंत्रण कक्ष स्थापित करना शुरू कर दिया है। भारत के स्वतंत्रता दिवस से पहले जम्मू-कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने और आतंकियों से तालमेल बनाए रखने के लिए यह मॉनिटरिंग सेंटर के तौर पर काम करेगा।

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि आईएसआई ने स्वतंत्रता दिवस से पहले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की नई योजनाएँ बनाई हैं, ताकि अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद शांत कश्मीर को फिर से हिंसा की आग में झोंका जा सके। इसके लिए आईएसआई पीओके के कई आतंकी समूहों से लगातार संपर्क में है। आईएसआई 15 अगस्त से पहले कश्मीर में पदस्थापित सुरक्षा बलों पर हमले शुरू करने के लिए उनके साथ तालमेल बनाने की कोशिश कर रहा है।

इसके बारे में भारत की खुफिया एजेंसियों ने अलर्ट जारी किया है। अलर्ट जारी होने के बाद भारतीय सुरक्षा बल खतरे को देखते हुए जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों के साथ-साथ भीतरी इलाकों में बेहद सतर्कता बरत रहे हैं। आतंकियों हमलों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा बलों ने तलाशी अभियान भी शुरू किया है।

खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को खुफिया इनपुट के अनुसार, पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, पीओके में अल-बद्र और ‘चेलाबंदी’ मुजफ्फराबाद सहित कई प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों के वरिष्ठ आतंकियों के बीच कई बैठकें हो चुकी हैं।

सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों में जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों की रुपरेखा तैयार की गई है। साथ ही, घाटी में आतंकवादी घुसपैठ के लिए नए रास्तों की तलाश और उनके उपयोग से संबंधित योजना तैयार की गई है।

सूत्रों ने बताया कि इन्हीं रास्तों की तलाश और आतंकियों के बीच समन्वय के लिए आईएसआई ने पीओके में नए कंट्रोल रूम भी स्थापित कर रही है। आईएसआई के इशारे पर पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन नियंत्रण रेखा के जरिए जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करने की योजना बना रहे हैं, जिनकी पहचान सुरक्षा एजेंसियों ने की है।

खुफिया इनपुट बताया गया है कि पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे 27 नए आतंकी लॉन्च पैड सक्रिय किए हैं, ताकि जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ को बढ़ाने में मदद मिल सके। इनपुट में बताया गया है कि जून से लगभग 146 आतंकवादियों को अलग-अलग लॉन्च पैड पर घुसपैठ के लिए तैयार रखा गया है।

भारत में घुसपैठ के लिए जिन रास्तों की खबर खुफिया एजेंसियों को मिली हैं, वे निम्नलिखित हैं:

रूट 1: नाली (पीओके) से महादेव गैप होते हुए मजोत। उसके बाद डुंडेसर वन से कलाकोट और फिर जम्मू-कश्मीर।

रूट 2: कोटकोटेरा (पीओके) से ब्राल गली होते हुए बागला और फिर बागला से कलाकोट होकर जम्मू-कश्मीर।

रूट 3: निकेल (पीओके) से कोंगा गली होते हुए दादोट, फिर मनजोत और जम्मू-कश्मीर।

रूट 4: कश्मीर के रास्ते बंताल गांव (पीओके) से कास नाला तक।

रूट 5: गोई (पीओके) से सोन गली होते हुए नंदेरी और नंदेरी से गुरसैन सूरनकोट होते हुए जम्मू-कश्मीर।

रूट 6: तारकुंडी (पीओके) कंडी होते हुए बुडाहल से जम्मू-कश्मीर।

रूट 7: डबासी (पीओके) झीका गली से हरनी जंगल और फिर सूरनकोट होते हुए जम्मू-कश्मीर।

रूट 8: कुइरेटा (पीओके) मोहरा गैप से जम्मू-कश्मीर तक।