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‘…अब नोएडा नहीं आएँगे, माफ कर दो’: UP पुलिस की गोली से घायल बदमाश, RSS पदाधिकारी के घर की थी डकैती

उत्तर प्रदेश के नोएडा में आरएसएस के पदाधिकारी के घर में डकैती करने वाले बदमाशों और पुलिस के बीच मुठभेड़ हुई है। इस दौरान पुलिस की गोली लगने से तीन बदमाश घायल हो गए। तीनों को बाद में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। रिपोर्ट के मुताबिक, एनकाउंटर 26 जुलाई की रात को नोएडा के सेक्टर-24 थाना इलाके में स्पाइस मॉल के पीछे सर्विस रोड पर हुआ था।

मुठभेड़ के दौरान बदमाशों के पैर में गोली लगी है। गोली लगने के बाद जब पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार किया तो इन्होंने रोते हुए हाथ जोड़कर पुलिस से छोड़ने की गुहार लगाई और कहा कि वो दोबारा नोएडा नहीं आएँगे।

जिन तीन बदमाशों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें विष्णु, मोनू उर्फ आमिर हुसैन और गौतम शामिल है, जबकि हर्षित नाम का बदमाश वहाँ से भागने में कामयाब रहा है। फिलहाल घायलों को इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। वहीं फरार हुए आरोपित की तलाश की जा रही है।

नोएडा पुलिस के ट्वीट के मुताबिक, ये सभी थाना सेक्टर-58 पुलिस व सेक्टर-55 स्थित मकान में हुई लूट की घटना में शामिल थे। इन आऱोपितों के कब्जे से 1 लाख 80 हजार रुपए नकद व अवैध हथियार बरामद किए गए हैं।

इससे पहले शनिवार (31 जुलाई 2021) को आरएसएस पदाधिकारी के घर में लूट के मामले में नोएडा पुलिस ने 6 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। इसी के साथ इस मामले 9 आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है।

इस मामले में नोएडा के एडिशनल डीसीपी ने बताया, “आरोपित ज्वेलरी या कुछ सामानों को कहीं शिफ्ट करने की कोशिश में थे। इसकी सूचना मिलने पर चारों तरफ से इनकी घेराबंदी की गई। दो बाइक पर दो-दो बदमाश थे, लेकिन जब इन्हें लगा कि ये घिर चुके हैं तो इन्होंने पुलिस पर फायरिंग कर दी। पुलिस की ओर से जवाबी कार्रवाई में करीब 4-5 राउंड फायर किया गया। इस दौरान तीन घायल हो गए और एक बदमाश बाइक लेकर वहाँ से फरार हो गया।”

पुलिस अधिकारी ने आगे कहा, “पुलिस की गोली से तीनों बदमाश घायल हो गए थे। इन तीनों बदमाशों के पास से लगभग 1,80,000 रुपए बरामद किए गए हैं। इसके अलावा इतने ही पैसे पहले गिरफ्तार किए गए 6 लोगों के पास से भी बरामद हुए थे।” कुल मिलाकर आरोपितों के पास से करीब 3,63,000 बरामद किए गए हैं।

इस पुलिस एनकाउंटर पर उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने ट्वीट किया, “दर्द से कलपते हुए चीख-चीख कर गुहार लगे रहे ये तीनों छँटे हुए बदमाश हैं, इन्होंने नोएडा में लूटपाट करने की गलती कर डाली, तत्काल माक़ूल इलाज हुआ। कहते हैं भागते वक़्त फ़ायर झोंक रहे थे, नतीजा पुलिस की गोली से विकलाँग हो गए।”

मानव मल खाने को मजबूर किया, वीडियो भी बनाया: फहीम गिरफ्तार, खालिद फरार – मुंबई की घटना

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में एक व्यक्ति को दो लोगों ने मिल कर मानव मल और कूड़ा-कचरा खाने को मजबूर किया। उसे बलपूर्वक ये चीजें खिलाई गईं। ये घटना 21 जुलाई, 2021 को मुंबई के ईस्ट जोगेश्वरी इलाके में हुई है। आरोपितों ने इस वारदात का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर भी डाल दिया, जो वायरल हो गया। इसके बाद कार्रवाई करते हुए पुलिस ने एक आरोपित को गुरफ्तार कर लिया है।

उनके नाम हैं – फहीम शेख और खालिद शेख उर्फ़ खालिद बेचन। पुलिस ने जहाँ फहीम को गिरफ्तार कर लिया है, वहीं खालिद अभी भी फरार है। पुलिस थाने में मामला संज्ञान में आने के एक दिन बाद फहीम को दबोचा गया था। सोशल मीडिया एक्टिविस्ट मोहसिन शेख ने इस वीडियो को ट्वीट किया था और मुंबई पुलिस को टैग करते हुए अपराधियों की जल्द गिरफ़्तारी की माँग की थी।मेघावड़ी पुलिस थाने ने मामला दर्ज किया।

ये भी पता चला है कि इस मामले के पीड़ित और दोनों आरोपित, ये सभी ड्रग्स की सप्लाई में लिप्त हैं। पीड़ित तनवीर शेख और दोनों आरोपित पहले एक साथ काम करते थे, लेकिन बाद में तनवीर ने एक अन्य गिरोह ज्वाइन कर लिया था। इस घटना से कुछ सप्ताह पहले तनवीर ने खालिद के साथ मारपीट की थी और साथ ही इसका वीडियो भी शूट कर लिया था। तनवीर के कुछ दोस्तों ने इस वीडियो को भी वायरल कर दिया था।

वहीं अब उन दोनों ने तनवीर से इसका बदला लिया है। उसे मानव मल व कचरा खिलाते हुए वीडियो बना लिया गया। हाल ही में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने अबरार खान नाम के ड्रग कारोबारी को दबोचा था। खालिद उसके लिए ही काम करता था। अब इस मामले में केस दर्ज कर के एक अन्य आरोपित की तलाश की जा रही है। खालिद का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है। उसके खिलाफ 16 मामले दर्ज हैं।

13 साल के लड़के से रेप और अप्राकृतिक सेक्स: UP के मदरसा शिक्षक मुफ्ती मुशर्रफ को 11 साल की जेल, बेंगलुरु में सजा

कर्नाटक के तुमकुरु जिले में 6 साल पहले नाबालिग लड़के से अप्राकृतिक यौनाचार करने के दोषी पाए गए मुफ्ती मुशर्रफ को बेंगलुरु की स्पेशल कोर्ट ने 11 साल जेल की सजा सुनाई है। इसके अलावा, कोर्ट ने 42 वर्षीय मदरसा शिक्षक पर 30,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश का रहने वाला मुशर्रफ तुमकुरु में अमलापुर के पास एक मदरसे में शिक्षक था। उसने 17 अप्रैल, 2015 को मदरसे में एक नाबालिग बच्चे के साथ कुकर्म किया था। यह घटना तब सबके सामने आई, जब नाबालिग की माँ मदरसे में उससे मिलने गई। 13 वर्षीय बच्चे ने उस समय अपनी माँ को मुशर्रफ की करतूत के बारे में बताया और उसे मदरसे से वापस ले जाने के लिए कहा।

इसके बाद भारतीय दंड संहिता की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध) और 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया गया और मुशर्रफ को गिरफ्तार कर लिया गया। उसके खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज किया गया था। अदालत में सुनवाई के दौरान 11 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए थे। द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्पेशल पब्लिक प्रोसेक्यूटर (special public prosecutor ) जीवी गायत्री ने कहा कि नाबालिग लड़के और उसकी माँ का बयान मदरसा के शिक्षक को दोषी साबित करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

बताया जा रहा है कि 17 अप्रैल 2015 को मुशर्रफ ने नाबालिग लड़के से यूपी के लिए ट्रेन का टिकट बुक कराने में मदद माँगी थी। उसने लड़के से कहा था कि तुम्हे कन्नड़ भाषा समझ में आती है, लेकिन मुझे नहीं आती। इसलिए तुम मेरे साथ तुमकुरु रेलवे स्टेशन पर चलो, ताकि मैं आसानी से अपना टिकट करवा सकूँ। रेलवे स्टेशन पहुँचने पर मुशर्रफ ने बच्चे से कहा कि उसकी बाइक में पेट्रोल खत्म हो गया है और उन्हें पास के ही किसी एक होटल में रहना होगा।

टीओआई की रिपोर्ट में स्पेशल पब्लिक प्रोसेक्यूटर के हवाले से कहा गया है। होटल के रजिस्टर में मुशर्रफ ने अपने नाम के साथ-साथ लड़के का भी उल्लेख किया था। वारदात को अंजाम देने के बाद मुशर्रफ अगली सुबह लड़के को अपनी बाइक से वापस मदरसे में छोड़ आया। इसके बाद वह होटल आया और कमरा खाली कर दिया। होटल के रजिस्टर में दो व्यक्तियों का नाम लिखा गया था। होटल के कमरे में एक आदमी और एक लड़का आया था, लेकिन चेक आउट करते समय केवल ​ही शख्स मौजूद था।

गायत्री ने आगे कहा कि पुलिस में इस मामले की शिकायत दर्ज होने के बाद, नाबालिग लड़के और मदरसा शिक्षक की मेडिकल जाँच कराई गई। मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि बच्चे का यौन शोषण किया गया था।

इसके बाद अदालत ने सबूतों के आधार पर मुशर्रफ को दोषी करार देते हुए उसे 11 साल के कठोर कारावास और 30 हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई है। वहीं, अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (district legal services authority) को लड़के को मुआवजे के रूप में 5 लाख रुपए का भुगतान करने का आदेश दिया है।

2015 से सालाना ₹1,000 करोड़ से अधिक के घाटे में चल रही है DTC, केजरीवाल सरकार ने नहीं खरीदी एक भी बस

दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) 2015 से सालाना 1000 करोड़ रुपए से अधिक के घाटे में चल रहा है। दिल्ली विधानसभा में भाजपा विधायक अजय महावर के प्रश्नों का उत्तर देते हुए दिल्ली परिवहन विभाग ने बताया कि उसकी हालत ऐसी है कि अपने मौजूदा बेड़े में वह एक भी बस बढ़ाने में असमर्थ रहा है। भाजपा विधायक अजय महावर के एक अन्य सवाल के जवाब में परिवहन विभाग ने कहा कि डीटीसी ने 2015 के बाद से कोई बस नहीं खरीदी है।

हालाँकि, आम आदमी पार्टी (AAP) के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने उन खबरों का भी खंडन किया कि व्यापक वार्षिक रखरखाव अनुबंध के लिए डीटीसी द्वारा खरीदी जा रहीं 1,000 लो फ्लोर बसों के विनिर्माताओं को 1,000 करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि का भुगतान किया जाना है।

विभाग ने कहा कि हालाँकि ‘दिल्ली इंटीग्रेटेड मल्टी-मोडल ट्रांजिट सिस्टम’ (DIMTS) संचालित क्लस्टर योजना के तहत, 2015 के बाद 1,387 बसों की खरीद की गई है। जानकारी के मुताबिक पिछले 6 वर्षों में, डीटीसी को 2014-15 में 1,019.36 करोड़ रुपए, 2015-16 में 1,250.15 करोड़ रुपए, 2016-17 में 1,381.78 करोड़ रुपए 2017-18 में 1,730.02 करोड़ रुपए और 2018-19 में 1,664.56 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। वहीं 2019-20 में 1,834.67 करोड़ रुपए का घाटा लगा है। डीटीसी द्वारा 1000 लो फ्लोर बसों की खरीद का आदेश दो विनिर्माताओं को जारी किया गया था, लेकिन परिवहन विभाग द्वारा प्रक्रिया को रोक दिया गया है।

एलजी अनिल बैजल द्वारा गठित एक समिति ने कॉन्ट्रैक्ट में “प्रक्रियात्मक खामियाँ” पाई थी। इस मामले को अब आगे की कार्रवाई के लिए एलजी द्वारा गृह मंत्रालय को भेजा गया है। परिवहन विभाग ने आगे कहा कि बसों की वारंटी और उनकी सीएएमसी अलग-अलग चीजें हैं। विभाग ने कहा, “वारंटी में विनिर्माण दोष शामिल हैं, जबकि रखरखाव से संबंधित गतिविधियाँ इसका हिस्सा नहीं हैं, यह सीएएमसी में शामिल है।” 

बता दें कि भाजपा विधायक विजेंद्र गुप्ता ने सवाल किया था कि बसों पर तीन साल की वारंटी के बावजूद रखरखाव शुल्क के नाम पर 1,000 करोड़ रुपए अतिरिक्त क्यों दिए जा रहे हैं। परिवहन विभाग ने कहा, “डीटीसी द्वारा जारी निविदाओं के सीएएमसी के नियम और शर्तें समान हैं। ये नियम और शर्तें 2006 और 2008 में डीटीसी द्वारा जारी किए गए निविदाओं के समान हैं।” इसमें कहा गया है कि 1,000 लो फ्लोर बसों के सीएएमसी के लिए अनुबंध की सामान्य शर्तें स्पष्ट रूप से कहती हैं कि ठेकेदार को रखरखाव से संबंधित सभी काम करने होंगे।

CAMC में रखरखाव, सामान्य टूट-फूट, बड़ी-छोटी मरम्मत, असेंबली और सब-असेंबली की ओवरहालिंग, ब्रेकडाउन, आग के कारण क्षति, खराब हो चुके टायरों को बदलना, बस बॉडी की मरम्मत, फिटनेस और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाण पत्र प्राप्त करना शामिल है।

‘नाबालिग लड़की का हाथ पकड़ना, प्यार का इजहार करना… यौन उत्पीड़न नहीं’: POCSO कोर्ट का फैसला, आरोपित 28 साल का

एक विशेष POCSO (यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण अधिनियम) अदालत ने फैसला दिया है कि किसी नाबालिग का हाथ पकड़ के प्यार का इजहार करना यौन शोषण के अंतर्गत नहीं आता है। साथ ही अदालत ने 28 वर्षीय आरोपित को भी बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि ये ‘यौन प्रताड़ना’ के अंतर्गत नहीं आता है। आरोपित ने 2017 में एक 17 साल की लड़की का हाथ पकड़ के प्यार का इजहार किया था।

विशेष POCSO अदालत ने कहा कि ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं, जिससे पता चलता हो कि आरोपित की कोई गलत मंशा थी। अदालत ने पाया कि इस मामले में यौन अपराध की कोई मंशा नहीं थी, इसीलिए ये यौन अपराध नहीं है। आरोपित ने न तो पीड़िता का पीछा किया था और न ही उसे किसी सुनसान इलाके में ले जाने की कोशिश की थी। साथ ही आपराधिक बल का इस्तेमाल भी नहीं किया था।

विशेष POCSO अदालत ने कहा कि आरोपित ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था, जिससे 17 वर्षीय नाबालिग के सम्मान को ठेस पहुँचे। अदालत ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन पक्ष ये साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपित ने वो अपराध किए हैं जैसा उनके द्वारा कहा जा रहा है। अदालत ने आरोपित को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया। बता दें कि 2012 में बने इस कानून में 2018 में बदलाव किए गए थे और बच्चों के यौन शोषण के मामले में सख्त सज़ा व विशेष अदालत का प्रावधान किया गया था।

कुछ ही दिनों पहले जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के एक फैसले को लेकर विवाद हुआ था। अदालत ने कहा था कि अदालत ने कहा कि बगैर पेनिट्रेशन के आरोपित द्वारा अपने और पीड़िता के कपड़े उतारने को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। आरोपित फैयाज अहमद डार पर अपनी ही नाबालिग भतीजी से रेप की कोशिश के आरोप थे। नाबालिग पीड़िता के मुताबिक, आरोपित ने टेप से उसका मुँह बंद कर दिया था और उसने उसकी और अपनी पैंट उतार दी थी।

केरल मॉडल: बकरीद पर जश्न मनाने के लिए खुली छूट, हिंदुओं के पर्व ओणम पर प्रतिबंध

केरल में पिछले कुछ दिनों से 20,000 से अधिक नए कोरोना मामले दर्ज किए जा रहे हैं। यह आँकड़ा देश के अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है। इसी बीच केरल की स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज ने शनिवार (31 जुलाई) को लोगों से आग्रह किया ​कि वे ओणम त्यौहार के दौरान भीड़, कार्यक्रमों और समारोह में जाने से बचें। जॉर्ज ने आगे कहा कि जितना हो सके रिश्तेदारों और परिवार से मिलने से बचना चाहिए, खासकर अगर परिवार में छोटे बच्चे हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि केरल अभी कोविड-19 की दूसरी लहर से मुक्त नहीं हुआ है, ऐसे में लोगों को संक्रमण फैलने से रोकने और तीसरी लहर से बचाव के लिए अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

बकरीद पर लॉकडाउन में ढील देने के कुछ ही दिनों बाद स्वास्थ्य मंत्री वीना जॉर्ज का कोरोना के बढ़ते मामलों पर चिंता व्यक्त करना बेहद हास्यास्पद है। ताजा फरमान ऐसे समय में आया है, जब केरल में लगातार पाँच दिनों से 20,000 से अधिक नए मामले सामने आ रहे हैं। राज्य में 27 जुलाई को कोरोना के 22,000 से अधिक नए केस दर्ज किए गए थे। यह पूरे देश में दर्ज हुए संक्रमण के नए मामलों का लगभग 53 प्रतिशत था। बताया जा रहा है कि बकरीद पर राज्य सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू प्रतिबंध को हटाने के बाद से संक्रमण के नए मामले बढ़ने लगे थे। ईद के बाद यह संख्या 22,000 से भी अधिक हो गई है।

केरल ईद के लिए खुला, ओणम के लिए बंद

केरल की स्वास्थ्य मंत्री का ताजा आदेश हिंदुओं के त्यौहार ओणम से ठीक पहले आता है। मालूम हो कि केरल में बढ़ते कोरोना संक्रमण से निपटने में असमर्थ होने के बावूजद पिनराई विजयन सरकार ने मुस्लिम समुदाय को बकरीद का जश्न मनाने की इजाजत दी थी। उन्होंने 18 जुलाई से 21 जुलाई यानी तीन दिनों के लिए लॉकडाउन हटा दिया था।

केरल सरकार ने 17 जुलाई को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बकरीद का जश्न मनाने के लिए छूट देने की घोषणा की थी। जबकि वे जानते थे कि उस समय भी केरल में सबसे अधिक COVID-19 के रिकॉर्ड नए मामले सामने आ रहे हैं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी केरल सरकार पर बकरीद के लिए ढील देने पर कड़ा रुख नहीं अपनाया था।

ईद उल-अजहा पर राज्य में कोविड-19 प्रतिबंधों में ढील देने के कारण केरल कोराना महामारी की एक और लहर का सामना कर रहा है, क्योंकि बीते कुछ सप्ताह की तुलना में संक्रमण और अधिक बढ़ गया है। बकरीद से पहले प्रतिबंध हटाने के कारण केरल ने दो महीने के औसत आँकड़े को पार करते हुए सबसे अधिक ताजा मामले दर्ज किए हैं।

लगातार पाँचवे दिन केरल ने शनिवार को 20,000 से अधिक कोविड-19 के नए मामले दर्ज किए हैं। हालाँकि, टेस्ट पॉजिटिविटी रेट में गिरावट आने के बाद यह 12.31 हो गई है, लेकिन राज्य में कोरोना से होने वाली मौतों की संख्या अभी भी चिंता का विषय है। इसके अलावा, केरल में बकरीद का त्योहार अब राज्य में सुपरस्प्रेडर कार्यक्रम बन गया है। इससे कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे पड़ोसी राज्यों को भी महामारी की तीसरी लहर से खतरा बताया जा रहा है।

शनिवार (31 जुलाई) को केरल ने 20,624 नए मामले दर्ज किए, जिससे कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़कर कुल 33,90,761 हो गई है। वहीं, कोरोना से 80 और लोगों की मौत होने से यह आँकड़ा बढ़कर कुल 16,781 हो गया है।

photo: Covid19.org

ये सब जानते हैं कि केरल सरकार बकरीद से पहले और उसके बाद किसी भी प्रकार का प्रतिबंध लगाने में विफल रही है। इसकी वजह से राज्य कोरोना महामारी की एक नई लहर से जूझ रहा है। हालाँकि, अब ऐसा लगता है कि हिंदुओं के त्यौहार ओणम को प्रतिबंधित करने में सरकार बेहद जल्दी दिखा रही है।

‘ममता बनर्जी महान महिला’ – CPI(M) के दिवंगत नेता की बेटी ने लिखा लेख, ‘शर्मिंदा’ पार्टी करेगी कार्रवाई

महिलाओं के सशक्तिकरण में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका बताते हुए लेख लिखने वाली अजंता बिस्वास के खिलाफ माकपा ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। दरअसल, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम), पश्चिम बंगाल इकाई के पूर्व राज्य सचिव अनिल विश्वास की बेटी अजंता बिस्वास द्वारा ममता बनर्जी का महिमामंडन करने से बेहद नाराज है।

सीपीआई (एम) अजंता बिस्वास के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह तैयार है। बताया जा रहा है कि उनका यह लेख सत्तारूढ़ तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के दैनिक मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ में प्रकाशित हुआ था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लेख में बंगाल की सीएम को महान महिला के रूप में पेश किया गया है। साथ ही यह तर्क दिया गया है कि फायरब्रांड नेता ने राज्य की राजनीति में एक ऐतिहासिक भूमिका निभाई और जमीनी स्तर पर महिलाओं और आंदोलन के सशक्तिकरण को सुनिश्चित किया। ये लेख शनिवार (31 जुलाई 2021) को सामने आया, तभी से चर्चा में बना हुआ है।

माकपा नेताओं ने हिन्दुस्तान टाइम्स को बताया कि पार्टी की सदस्य होने के बावजूद अजंता ने ममता पर इस तरह का ​लेख लिखा। इसको लेकर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उनके जवाब की जाँच के बाद पार्टी अपनी कार्रवाई तय करेगी।

तृणमूल कॉन्ग्रेस के मुखपत्र ‘जागो बांग्ला’ में बंगाल की राजनीति में महिला सशक्तिकरण पर कोलकाता के रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर अजंता बिस्वास के आलेख के दो खंड बुधवार और गुरुवार को प्रकाशित हुए। ये लेख संपादकीय पृष्ठ पर प्रमुखता से छापे गए थे।

दोनों लेख को लेकर माकपा नेता और पार्टी के कई लोग उनसे सवाल कर रहे हैं कि क्या उन्होंने (अजंता बिस्वास ने) प्रतिद्वंद्वी दल के मुखपत्र में प्रकाशन के लिए अपना आलेख देने से पहले पार्टी नेतृत्व से अनुमति ली थी? माकपा नेताओं ने कहा ​कि वे तब से बेहद शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं।

गौरतलब है कि ‘बांगो राजनीतिते नारिर भूमिका’ विषयक आलेख के पहले खंड में अजंता बिस्वास ने देशभक्त सरोजनी देवी, सुनीति देवी और बसंती देवी की चर्चा की है। इसके बाद दूसरे खंड में उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की कार्यकर्ता प्रतिलता वाड्डेदार और कल्पना दत्ता समेत उन महिलाओं के बारे में लिखा, जिन्होंने क्रांतिकारियों को अपने घरों में शरण देकर उनकी परोक्ष रूप से मदद की थी।

लेख में कहा गया है कि ममता बनर्जी ने हुगली जिले के सिंगूर में टाटा की छोटी कार संयंत्र के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था, जिसने 2011 में वामपंथियों के खिलाफ उनकी ऐतिहासिक जीत में काफी योगदान दिया। इसी के कारण वाममोर्चा का 34 साल पुराना शासन खत्म हो पाया था।

बता दें कि सीपीआई (एम) के नेता रहे अनिल विश्वास टीएमसी के खिलाफ सबसे सफल रणनीतिकारों में से एक थे। साल 2006 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद से अजंता बिस्वास राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। इससे पहले, वह प्रेसीडेंसी कॉलेज (अब एक विश्वविद्यालय) में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) इकाई का एक प्रमुख चेहरा थीं, जहाँ से उन्होंने पढ़ाई की थी। SFI माकपा का छात्र मोर्चा है।

पाकिस्तान वाले कश्मीर प्रीमियर लीग में खेलोगे तो भारत में दाना-पानी बंद: BCCI की सख्ती से Pak में रुदन चालू

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व सलामी बल्लेबाज हर्शल गिब्स ने एक ट्वीट कर के दावा किया था कि ‘भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI)’ कश्मीर प्रीमियर लीग में खेलने पर ‘गैर-ज़रूरी रूप से’ पाकिस्तान के साथ राजनीतिक एजेंडे को आगे रखते हुए खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा रहा है। उन्होंने दावा किया कि BCCI ने उसने कहा है कि अगर वो कश्मीर प्रीमियर लीग में खेलते हैं तो उन्हें क्रिकेट सम्बन्धी कार्यों के लिए भारत नहीं आने दिया जाएगा।

इसके बाद BCCI ने भी स्पष्ट किया है कि वो इस मामले में सख्त है। बता दें कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ दुनिया के नैरेटिव को अपने हिसाब से चलाने की मंशा से अपने कब्जे वाले कश्मीर में क्रिकेट टूर्नामेंट की घोषणा की है। POK (पाक अधिकृत कश्मीर) भारत का हिस्सा है और पाकिस्तान ने जबरन उस पर कब्ज़ा कर रखा है, इसीलिए भारत इस मामले में सख्त है। BCCI ने दुनिया के सभी क्रिकेट बोर्ड्स को कह दिया है कि उनके जो खिलाड़ी KPL में जाएँगे, वो भारत में किसी क्रिकेट सम्बंधित गतिविधि में कभी हिस्सा नहीं ले पाएँगे।

BCCI ने कहा है कि देशहित को ध्यान में रखते हुए ये फैसला लिया गया है। BCCI के एक अधिकारी ने कहा कि आज तक बोर्ड ने ‘पाकिस्तान प्रीमियर लीग (PSL)’ में किसी खिलाड़ी के खेलने पर आपत्ति नहीं जताई, लेकिन कश्मीर प्रीमियर लीग को POK में आयोजित किया जा रहा है। बोर्ड ने कहा कि वो इस मामले में भारत सरकार के नीतियों के अनुसार ही चल रहा है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड इसे क्रिकेट के खेल का अपमान बता रहा है।

उसने इसे खतरनाक चलन करार देते हुए कहा कि ये खेल की आत्मा के खिलाफ है। BCCI के अधिकारी ने कहा कि वो PCB के बयानों को लेकर चिंतित नहीं है, बल्कि उसे सिर्फ भारत और भारतीय खिलाड़ियों के बारे में सोचता है। पाकिस्तान के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी ने भी भारत पर क्रिकेट और राजनीति को मिक्स करने का आरोप लगाया है। वहाँ के मंत्री फवाद चौधरी ने मोदी सरकार पर राजनीति के लिए क्रिकेट का बलिदान देने का आरोप लगाया।

BJP सांसद ने आमागढ़ किले पर फहराया ध्वज, राजस्थान पुलिस ने किया गिरफ्तार: कॉन्ग्रेस MLA ने फाड़ा था भगवा झंडा

राजस्थान में भाजपा सांसद डॉक्टर किरोड़ी लाल मीणा को हिरासत में ले लिया गया है। प्रशासन द्वारा रोके जाने के बावजूद उन्होंने आमागढ़ किले में जाकर झंडा फहरा दिया। आरोप है कि उन्होंने प्रशासन के आदेश का उल्लंघन करते हुए जयपुर के ऐतिहासिक आमागढ़ किले में झंडा फहरा दिया। इस दौरान उनके कई समर्थक भी उनके साथ थे। किरोड़ी लाल मीणा आमागढ़ किले में झंडा फहराने के बाद पूजा करना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने उनकी एंट्री पर रोक लगा दी थी।

पुलिस ने उन्हें रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन वो नहीं रुके। इसके बाद पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। हालाँकि, सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने दावा किया है कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी इस मामले में सक्रिय हो गई हैं। उन्होंने बयान जारी किया है कि आमागढ़ किले के मामले में धर्म के नाम पर राजनीति कर रही कॉन्ग्रेस को करारा जवाब देने वाले डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की गिरफ़्तारी निंदनीय है। उन्होंने माँग की कि मीणा को तुरंत रिहा किया जाए।

आदिवासी संगठन व हिंदू संगठनों ने 1 अगस्त को सोशल मीडिया के जरिए आमागढ़ पहुँचने की अपील की थी। अब सांसद किरोड़ी लाल मीणा भगवान का ध्वज लगाने के ऐलान के बाद अपने समर्थकों के साथ किले के अंदर घुसे और यहाँ मीणा समाज का ध्वज लगाया किले में ताला लगा कर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। इस दौरान ‘मीन भगवान’ के जयकारे का नारा भी लगा। उन्हें विद्याधर नगर थाना ले जाया गया है।

गौरतलब हो कि सोशल मीडिया पर 22 जुलाई को हुई उस घटना के वीडियो मौजूद हैं, जिनमें निर्दलीय विधायक रामकेश मीणा के साथ भीड़ ने पहले जयपुर के अमरगढ़ किले के ऊपर फहराए गए झंडे को नीचे उतारा और फिर उसे फाड़ दिया था। उनकी अगुआई में मीणा समुदाय के कुछ लोग खुद को हिन्दुओं से अलग बता रहे हैं। इसके विरोध में बयान देने के बाद ‘सुदर्शन टीवी’ के सुरेश चव्हाणके के खिलाफ FIR दर्ज हुई थी।

‘मस्जिद के सामने जुलूस निकलेगा, बाजा भी बजेगा’: जानिए कैसे बाल गंगाधर तिलक ने मुस्लिम दंगाइयों को सिखाया था सबक

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अगर कोई पहला सबसे बड़ा नेता था जिसे पूरे देश ने स्वीकार किया हो, तो वो लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक थे। ‘लोकमान्य’ का अर्थ ही है कि जो जनता का प्यारा हो। जिसके पीछे जनता चलती हो। 1 अगस्त, 1920 को अपने निधन तक वो देश के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े नेता रहे। उन्होंने हिन्दू धर्म के लिए भी बड़ा योगदान दिया और मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ आवाज़ उठाई।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को यूँ तो लखनऊ में 1916 में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने के लिए जाना जाता है, लेकिन उनका योगदान इससे कहीं बढ़ कर है। एक समय था जब बॉम्बे में दो ही पॉवर सेंटर हुआ करते थे – एक बाल गंगाधर तिलक और एक मुहम्मद अली जिन्ना। दोनों के बीच नजदीकियाँ भी थीं। लेकिन, जिन्ना की मंशा कुछ और ही थी और उन्होंने देश के विभाजन की साजिश रची।

यहाँ हम बात करेंगे उन हिन्दू-मुस्लिम दंगों की, जो 19वीं शताब्दी के अंत तक महाराष्ट्र में एकदम आम हो गए थे। आए दिन दोनों समुदायों के बीच हिंसा होती थी। अंग्रेज भी मुस्लिम तुष्टिकरण करते थे, इसीलिए दंगाइयों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। 1893-94 में बॉम्बे और पूना (मुंबई एवं पुणे) में हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए। दंगाई हिन्दुओं के मंदिर तोड़ते थे और पर्व-त्योहारों के जुलूस में विघ्न डालते थे।

अधिवक्ता व दिवंगत सांसद दत्तात्रेय परशुराम करमारकर ने अपनी पुस्तक ‘बाल गंगाधर तिलक‘ में जिक्र किया है कि कैसे 11 अगस्त, 1893 को मुस्लिम लोग जब नमाज पढ़ने मुंबई के जुम्मा मस्जिद में खली हाथ गए थे लेकिन जब वापस आए तो उनके पास हथियार थे। छुरे लेकर वो लोग हिन्दू मंदिर में घुस गए। भिंडी बाजार, कमाठीपुरा और ग्रांट रोड तक दंगे फ़ैल गए। पुणे तक दंगा फैलने के बाद पुलिस ने दोनों पक्षों के कई लोगों को गिरफ्तार किया।

इसी क्रम में अंग्रेजी पुलिस ने बाल गंगाधर तिलक के मित्र सरदार तात्या साहब नाटू को भी गिरफ्तार कर लिया, जो गणपति जुलूस निकाल रहे थे। दारूवाला पुल पर मुस्लिम दंगाइयों ने उन पर हमला भी किया था। वो कोर्ट से बरी होने में कामयाब रहे। तब बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के मुस्लिम तुष्टिकरण पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिमों को संतुष्ट करने के लिए अंग्रेज हिन्दुओं की पारंपरिक अधिकारों को कुचल रहे हैं।

उन्होंने अंग्रेजों की ‘बाँटो और राज करो’ की नीति पर सवाल खड़े किए। येउला में हर साल बालाजी की यात्रा निकलती थी, लेकिन अब मुस्लिम कट्टरपंथी उस पर भी हमला करने लगे थे। हिन्दुओं को अंग्रेजों ने जुलूस वगैरह निकालने से मना कर दिया। तब बाल गंगाधर तिलक ने हिन्दुओं को सलाह दी कि वो अपनी रक्षा के लिए स्वयं कमर कसें। उन्होंने हिन्दुओं को संगठित करने का फैसला लिया। उनका मानना था कि सभी धर्म/समुदाय अपने-अपने धार्मिक उत्सव बिना किसी अड़चन के मनाएँ।

उनका कहना था कि हिन्दुओं के पर्व-त्योहारों व उत्सव में जो अड़ंगा डालता है, उसे सज़ा मिलनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार के संरक्षण के कारण ही मुस्लिम हिंसक हो गए हैं। उन्होंने लिखा, “अगर मुस्लिम नमाज के वक़्त हिन्दुओं का भजन नहीं बर्दाश्त कर सकते तो वो ट्रेन, जहाज और दुकानों में क्यों नमाज पढ़ते हैं? यह कहना गलत है कि नमाज के वक़्त मस्जिद के सामने से कोई हिन्दू जुलूस निकल गया तो ये गलत है।”

हिन्दुओं के अधिकारों की बात करने पर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को अंग्रेज अधिकारियों ने ‘मुस्लिम विरोधी’ की संज्ञा दे दी और उन पर मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काने का आरोप मढ़ दिया। उन पर एक बैठक में मुस्लिमों को हिन्दुओं का कट्टर शत्रु कहने के आरोप लगाए गए। साथ ही गौ हत्या विरोधी सोसाइटी बनाने का आरोप लगाया गया। ये वो समय था, जब साहब लोगों’ की लाइफस्टाइल देख कर कई लोग ईसाई मजहब के प्रति भी आकर्षित हो रहे थे।

बाल गंगाधर तिलक को पश्चिमी सभ्यता के इस अनुकरण से नफरत थी। इसीलिए, उन्होंने छत्रपति शिवाजी की गाथा को जन-जन तक पहुँचाया और गणेश उत्सव को और धूम-धाम से मनाने की परंपरा शुरू की। आज छत्रपति शिवाजी महाराज और भगवान गणपति महाराष्ट्र के प्राण हैं। इन दोनों के प्रति लोगों में आस्था जगाने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को ही जाता है। ‘गणेश उत्सव’ और ‘शिवाजी जयंती’ अब स्वराज्य का माध्यम बन चुका था।

उनका मानना था कि प्राचीन भारत में ऐसे कई सामाजिक व धार्मिक उत्सव होते थे, जिनसे लोगों में एकता की भावना आती थी। ये देश की संस्कृति के पहचान हुआ करते थे। उनका कहना था कि जो कार्य कॉन्ग्रेस के माध्यम से नहीं किया जा सकता, उसके लिए शिक्षित लोगों व इन उत्सवों का सहारा लिया जाए। इससे पहले लोग गणेश उत्सव घरों में ही मनाते थे और मिठाइयों के आदान-प्रदान तक ही ये सीमित हो चला था।

इसी उत्सव के दौरान दारूवाला पुल और हिन्दू जुलूस पर हमला हुआ था। तिलक उस पुल से गुजरे थे, पर हिंसा के समय वहाँ नहीं थे। लॉर्ड हैरिस ने ऐसे उत्सवों से ब्राह्मणों पर घृणा फैलाने का आरोप लगा डाला। वो बॉम्बे का गवर्नर था। तिलक ने उससे तत्काल क्षमा माँगने को कहा। बाल गंगाधर तिलक ने मुस्लिमों को सलाह दी कि ‘मस्जिद के आगे बजा नहीं बजेगा’ वाली जिद वो छोड़ें। उनका मानना था कि महापुरुषों की समृतियों को भी संरक्षित रखना ज़रूरी है। इसी क्रम में अपने हर भाषण में उन्होंने छत्रपति शिवाजी के बारे में लोगों को समझाया।

1893-94 में जो दंगा हुआ था, उसका कारण बताते हुए अंग्रेजों ने कहा था कि ये गोहत्या विरोधी आंदोलन के कारण हो रहा है। इस हिंसा में हिन्दुओं को ही अधिक हानि हुई थी। इसीलिए गवर्नर डफरिन ने जब दोनों समुदायों को शांत रहने को कहा तो मुस्लिमों की हिंसा पर पर्दा डालने के लिए तिलक ने उसे लताड़ लगाई। अंग्रेज बार-बार कहते थे कि हिन्दुओं को मुस्लिमों से वही बचा रहे। बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ पत्रिका के माध्यम से कहा कि इससे हिन्दुओं की सोच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

डॉक्टर मीना अग्रवाल अपनी पुस्तक में लिखती हैं कि अंग्रेजों ने बम्बई की जनता से पुलिस का खर्च वसूला, जबकि बाल गंगाधर तिलक चाहते थे कि इसे उस मस्जिद से लिया जाए, जहाँ से हिंसा भड़की। उनका कहना था कि ये दंगे त्रिकोणीय हैं, जिनमें हिन्दुओं व मुस्लिमों के अलावा सरकार भी एक पक्ष है। ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का नारा देने वाले इस महानायक ने अंग्रेजों के इस नैरेटिव को हराया कि वो हिन्दुओं के रक्षक हैं।