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आज हुए कर्नाटक में चुनाव, तो BJP बना लेगी अपनी सरकार: सर्वे ने बताया- भाजपा को मिलेगी 150+ सीटें, कॉन्ग्रेस सिमट जाएगी 60-80 के बीच

कर्नाटक सरकार ने हाल ही में अपने दो साल पूरे किए और ‘भू गारंटी’ योजना शुरू की। लेकिन ‘पीपुल्स पल्स’ के सर्वे में पता चला है कि महंगाई और सरकारी योजनाओं में देरी के कारण कॉन्ग्रेस सरकार से लोगों की नाराज़गी बढ़ रही है।

हैदराबाद की ‘पीपुल्स पल्स पॉलिटिकल रिसर्च ऑर्गनाइजेशन’ और ‘कोडेमो टेक्नोलॉजीज’ ने मिलकर ‘पल्स ऑफ कर्नाटक’ सर्वे किया। 17 अप्रैल से 18 मई तक चले इस सर्वे में गाँव और शहर के 10,481 लोगों से बात की गई।

सर्वे में पता चला कि अगर आज चुनाव होते हैं, तो बीजेपी को 136-159 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कॉन्ग्रेस को सिर्फ 62-82 सीटें मिलेंगी। जेडी(एस) को 3-6 सीटें मिलने का अनुमान है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा की घटनाओं के बाद बीजेपी को और भी ज़्यादा समर्थन मिला है।

हालाँकि, 48.4 प्रतिशत लोगों ने कॉन्ग्रेस सरकार के काम को ‘अच्छा’ या ‘बहुत अच्छा’ बताया, जबकि 32 प्रतिशत ने ‘खराब’ या ‘बहुत खराब’ कहा। 20 प्रतिशत लोगों ने इसे ‘औसत’ बताया।

सर्वे में यह भी पता चला कि 55 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि अगली सरकार बीजेपी बनाए, जबकि 39.1 प्रतिशत कॉन्ग्रेस के साथ हैं।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अभी भी लोगों की पहली पसंद हैं, लेकिन उनकी पार्टी में अंदरूनी झगड़े और भ्रष्टाचार के आरोपों से कॉन्ग्रेस की छवि खराब हुई है।

सर्वे में यह भी पता चला कि कॉन्ग्रेस की ‘गृह लक्ष्मी‘ योजना सबसे ज़्यादा पसंद की जा रही है, जबकि ‘युवा निधि’ को बहुत कम लोग पसंद कर रहे हैं। जाति जनगणना को लेकर भी लोगों की अलग-अलग राय है।

सर्वे के अनुसार, सरकारी योजनाओं में देरी, कर्ज माफी में दिक्कतें, महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों से कॉन्ग्रेस सरकार की छवि खराब हुई है। सर्वे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं, जबकि राहुल गांधी उनसे पीछे हैं।

कुल मिलाकर, सर्वे में पता चला है कि कॉन्ग्रेस सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, और बीजेपी को इसका फायदा मिल रहा है। हालाँकि, सिद्धारमैया की लोकप्रियता कॉन्ग्रेस के लिए एक उम्मीद की किरण है।

‘महापाखंडी मुल्क है पाकिस्तान… लोगों की सुरक्षा पर न करे बात’: भारत ने UNSC में आतंकी मुल्क को धोया; US जाने से पहले थरूर बोले- अब नहीं बैठेंगे शांत, Pak को करेंगे बेनकाब

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसारन घाटी में 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमलों के बाद भारत पाकिस्तान को चौतरफा झटके दे रहा है। भारत ने अब इस आंतकी मुल्क के लिए किसी भी तरह से नरमी न लाने मन बना लिया है। इसी के चलते संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की बैठक में भारतीय राजदूत हरीश पुरी ने पाकिस्तान को खूब खरी-खोटी सुनाई।

इसी के साथ कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर को भी मोदी सरकार अमेरिका, पनामा, गुयाना, ब्राजील और कोलंबिया के दौरे पर भेज रही है ताकि भारत के पक्ष को वे अधिक मजबूती से रख सकें और आतंकवाद के खिलाफ भारत की स्थिति साफ कर सकें।

UNSC की बैठक में ‘सशस्त्र संघर्ष में नागरिकों की सुरक्षा’ विषय पर खुली बहस हुई। इसमें भारत ने पाकिस्तान को जमकर लताड़ लगाई। भारत के स्थाई प्रतिनिधि और राजदूत हरीश पुरी ने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा पर चर्चा में पाकिस्तान का भाग लेना अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ही अपमान है। असल में भारत से पहले पाकिस्तान ने आतंकवाद पर अपना उपदेश दिया था।

पाकिस्तान के उपदेश पर उसकी पोल खोलते हुए हरीश ने कहा, “पाकिस्तान के प्रतिनिधि ने कई मुद्दों पर हम पर निराधार आरोप लगाए जिसका जवाब देने के लिए मुझे मजबूर होने पड़ा है। भारत ने दशकों से पाकिस्तान में पोषित आतंकवादी हमलों का सामना किया है, चाहे वो 26/11 के मुंबई हमले हों या फिर 2025 का पहलगाम हमला।'”

हरीश पुरी ने कहा कि पाकिस्तान अपना नागरिकों और आतंकवादियों के बीच कोई भेदभाव नहीं रखता। ऐसे में उसका नागरिकों की सुरक्षा वाली बहस में भाग लेने या बोलने का कोई औचित्य ही नहीं बनता। ये मुल्क नागरिकों की आड़ लेकर आतंकवाद को बढ़ावा देता है।

हरीश ने कहा कि इस महीने की शुरुआत में पाकिस्तान ने भारत के सीमा से लगे क्षेत्रों को अपना निशाना बनाया। मंदिर, कॉन्वेंट्स और गुरुद्वारों के साथ अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक को अपना निशाना बनाया। ऐसे में यहाँ पर ज्ञान की बात करके पाकिस्तान को अपना पाखंड बंद करना चाहिए।

हमने 40,000 लोगों को खोया

बैठक में जब पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के स्थगन का मुद्दा उठाया तो इसके जवाब के लिए भी हरीश ने पूरी तैयारी रखी थी। हरीश ने UNSC में आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने भारत पर 3 युद्ध और हजारों आतंकी हमले किए। ऐसा करके उसने संधि भावना को तार-तार कर दिया। पिछले 40 वर्षों में हुए आतंकी हमलों में 20,000 से भी अधिक भारतीय मारे गए। इश दौरान भी हमने असाधारण धैर्य बनाए रखा। पर इसकी भी सीमा है।

इसके अलावा आतंकवाद पर भारत की स्थिति दुनिया के सामने मजबूती से रखने और पाकिस्तान की सच्चाई सबके सामने लानेके लिए भारत की ओर से सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विदेश दौरे पर जा रहा है। इसकी अध्यक्षता कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर कर रहे हैं। पाँच देशों की यात्रा पर जाने से पहले थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा किया है।

वीडियो में थरूर ने कहा, “मैं प्रतिनिधिमंडल की अध्यक्षता करते हुए पाँच देशों की यात्रा पर जा रहा हूँ। इनमें गुयाना, पनामा, कोलंबिया, ब्राजील और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं। हम वहाँ इसलिए जा रहे हैं ताकि देश की बात सबके सामने रख सकें। देश पर आए इस संकट पर बोल सकें, जिसमें हमारे देश पर आतंकवादियों ने क्रूरता के साथ हमला किया। हम आतंकवाद पर चुप नहीं रहेंगे। न ही हम चाहेंगे कि विश्व इस विषय पर हमें अनदेखा करे।”

अपनी बात बढ़ाते हुए थरूर ने कहा, “हमारा लक्ष्य उन मूल्यों को सामने लाना है जिसके भारत हमेशा से ही समर्थन करता आया है और जिन्हें आज के युग में सहेजे जाने की जरूरत है।ये एक मिशन है जो दुनिया को याद दिलाता रहेगा कि भारत शांति, लोकतंत्र, स्वतंत्रता जैसे मूल्यों के लिए खड़ा है, न कि नफरत, आतंक या लोगों की हत्या करने के लिए। जय हिंद।”

कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा नाम न दिए जाने के बाद भी सरकार ने उन पर भरोसा जताते हुए उनको इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया है। इस दौरे पर अमेरिका में 9/11 वाले हमले कराने वाले अलकायदा आतंकी संगठन के साथ पाकिस्तान के संबंधो पर भी बात की जा सकती है।

बहन को राजदूत बनाने के लिए माउंटबेटन और लियाकत अली पर चिल्लाए थे नेहरू, आज़ादी से पहले ही बनवा दिया था मंत्री: भारतीय राजनीति में ऐसे बोया गया वंशवाद का बीज

भारत में जब भी राजनीति में वंशवाद का जिक्र आता है, हमें नेहरू-गाँधी परिवार का स्मरण सबसे पहले आता है। एक ही परिवार से इतने लोग देश के उच्च पदों तक शायद ही किसी देश में गए हों। वर्तमान में देखा जाए तो सोनिया गाँधी राज्यसभा में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उनके पुत्र राहुल गाँधी अमेठी से सांसद हैं। राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी, अपने भाई द्वारा छोड़ी गई वायनाड सीट से सांसद हैं। प्रियंका गाँधी के पति रॉबर्ट वाड्रा भी प्रत्यक्ष राजनीति में आने की इच्छा कई बार जता चुके हैं। इसके अतिरिक्त कॉन्ग्रेस का एक बड़ा धड़ा प्रियंका गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा के पुत्र रेहान में भी अपना भविष्य देख रहा है।

वंशवाद के इस वटवृक्ष की जड़ों को जब हम खँगालते हैं, तो हमें जवाहर लाल नेहरू इसके केंद्र में दिखते हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व जिन नेताओं ने किया, उनमें जवाहरलाल नेहरू एक प्रमुख नाम हैं। वे न केवल महात्मा गाँधी के प्रिय शिष्य थे, बल्कि गाँधीजी द्वारा उन्हें स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में भी नियुक्त किया गया। कई वामपंथी इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता थे। 

यदि हम इतिहास को सिर्फ इन भावनाओं की दृष्टि से न देखकर, निष्पक्ष विवेक से देखें, तो नेहरू युग का एक ऐसा पक्ष भी उभर कर सामने आता है, जो भारतीय लोकतंत्र की जड़ों में वंशवाद का पहला बीज बोने वाला था। यह बीज केवल उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद नहीं, बल्कि उससे पहले 1930 के दशक में ही उनके द्वारा अंकुरित हो चुका था।

यह सर्वविदित है, कि जवाहरलाल नेहरू का राजनीतिक जीवन उनके पिता मोतीलाल नेहरू की विरासत से शुरू हुआ। मोतीलाल स्वयं भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे और अपने पुत्र को राजनीति में स्थापित करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मोतीलाल नेहरू ने कॉन्ग्रेस को नेहरू परिवार का राजनीतिक मंच बना दिया था। राजनीति में वंशवाद कोई रातों-रात उत्पन्न हुआ विकार नहीं था, बल्कि यह एक सुविचारित प्रक्रिया के तहत पनपा, और इस प्रक्रिया के पहले उत्पाद जवाहरलाल नेहरू ही थे।

जवाहर लाल नेहरू जब कॉन्ग्रेस की मुख्यधारा की राजनीति में आए तो धीरे-धीरे उनका कद बढ़ने लगा। स्वतन्त्रता से पूर्व ही वह इतने प्रभावशाली हो गए थे कि कॉन्ग्रेस की नीतियाँ और उन नीतियों का क्रियान्वयन उनके इर्द-गिर्द घूमने लगा था। इसकी बानगी हमें 1930 के दशक से ही दिखनी शुरू हो गई थी।

1937 में देश में प्रांतीय चुनाव हुए। कॉन्ग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में अपनी सरकार बनाई। उत्तर प्रदेश में भी गोविंद बल्लभ पंत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने सरकार बनाई। इस सरकार में जवाहर लाल नेहरू की बहन, विजयलक्ष्मी पंडित को मंत्री पद दिया गया। ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ (PCI) के संस्थापक अध्यक्ष व पत्रकार दुर्गा दास अपनी पुस्तक, ‘इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर’ में लिखते हैं कि नेहरू के पास विजयलक्ष्मी पंडित को मंत्री बनाने की सिफारिश लेकर खुद गोविंद बल्लभ पंत और रफी अहमद किदवई गए थे, लेकिन इसके पीछे का वास्तविक उद्देश्य यह था, ‘यदि हम नेहरू के परिवार के किसी सदस्य को मंत्री बना देते हैं, तो इससे हमें नेहरू का आशीर्वाद मिलेगा और नेहरू अकारण हमें किसी बात पर परेशान भी नहीं करेंगे।’

इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर, दुर्गा दास: पृष्ठ संख्या 184

यह तथ्य इस बात को प्रमाणित करता है कि उस दौर में भी नेहरू के राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने के लिए लोग उनके पारिवारिक संबंधों को महत्व देने लगे थे। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं था, बल्कि यह दर्शाता था कि नेहरू का प्रभाव किसी भी तर्क, योग्यता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ऊपर था।

आज़ादी के बाद तो नेहरू ने स्थापित रूप से वंशवाद का बीज भारत की राजनीति में बो दिया। इससे संबंधित एक किस्सा है, जिसे जानना उन लोगों के लिए आवश्यक है, जो नेहरू को लोकतंत्र और समावेशिता का ध्वजवाहक मानते हैं। इस किस्से का जिक्र अमेरिकी इतिहासकार स्टैनली वॉलपर्ट की किताब, ‘नेहरू: ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ में मिलता है। 

किस्सा कुछ यूँ है कि जब देश स्वतंत्र हुआ, तो जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन हुआ। उस अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री नेहरू थे, वित्त मंत्री लियाकत अली खान थे और गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन थे। माउंटबेटन और लियाकत अली खान के सामने नेहरू ने अपनी बहन विजयलक्ष्मी पंडित को सोवियत संघ में भारत की प्रथम राजदूत नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा। लियाकत अली खाँ ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे निरंकुश वंशवाद की संज्ञा दी।

लियाकत अली खान के अनुसार, यह केवल एक राजनयिक नियुक्ति का मामला नहीं था, बल्कि यह उस समय भारत की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया द्वारा सत्ता का निजीकरण करने का प्रारंभिक संकेत था। नेहरू ने लियाकत के विरोध को नजरअंदाज करते हुए अपने प्रस्ताव पर अड़े रहने का न केवल दुस्साहस दिखाया, बल्कि चिल्लाते हुए माउंटबेटन को यह धमकी भी दे डाली, कि यदि माउंटबेटन ने इस मुद्दे पर लियाकत का पक्ष लिया तो वह इस्तीफा दे देंगे।

नेहरू: ए ट्रिस्ट विद डेस्टिनी, स्टैनली वॉलपर्ट पृष्ठ संख्या 398

यह एक लोकतांत्रिक नेता का नहीं, बल्कि एक सामंती मानस का संकेत था, जो यह मान बैठा था कि राज्य की सम्पूर्ण सत्ता उसके निर्णयों में निहित है। राजनीति में परिवारवाद उस समय और भी चिंताजनक हो जाता है जब वह लोकतंत्र की आड़ लेकर उसकी आत्मा का गला घोंटने लगे। नेहरू के उदाहरण में यह स्थिति स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से वंशवाद का समर्थन नहीं किया, लेकिन व्यवहार में वह ठीक उसी दिशा में काम करते रहे।

यह तर्क दिया जा सकता है कि भारतीय राजनीति में परिवारवाद बाद में एक आम चलन बन गया – गाँधी परिवार, यादव परिवार, अब्दुल्ला परिवार, करुणानिधि परिवार, पवार परिवार, आदि। लेकिन यह प्रवृत्ति आरंभ कहाँ से हुई, यह जानना आवश्यक है। जब देश के पहले प्रधानमंत्री स्वयं वंशवादी नीति को व्यवहार में अपनाएँ, तो नीचे के स्तर पर उसका अनुकरण होना अवश्यंभावी था। कॉन्ग्रेस पार्टी स्वयं को लोकतंत्र, समाजवाद और पंथनिरपेक्षता की पोषक बताती रही, लेकिन वास्तविकता यह थी कि नेहरू युग में इन मूल्यों के स्थान पर एक छिपी हुई कुलीनता और वंशवाद का विस्तार हुआ।

विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों में जब परिवारवाद बढ़ा, तो स्वयं वहाँ की जनता ने इसका विरोध किया। अमेरिका में, भले ही बुश और क्लिंटन परिवार राजनीति में रहे हों, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल उन्हें ‘राजवंश’ नहीं बना सका। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, हर जगह संस्थाएं व्यक्ति से बड़ी रहीं। लेकिन भारत में संस्थाएँ व्यक्ति और परिवार के आगे बौनी साबित होती रहीं, और यह परंपरा जवाहर लाल नेहरू से ही शुरू हुई।

पीलीभीत में 500 ने की घर वापसी, नेपाल से आकर पादरियों ने बना दिया था ईसाई: VHP ने बॉर्डर पर डाला डेरा, DM ने 3000+ सिखों के धर्मांतरण के जाँच के दिए आदेश

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में भारत-नेपाल सीमा से सटे गाँवों में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के एक कार्यक्रम में करीब 500 सिखों की घर वापसी हुई है। ये लोग पहले सिख धर्म छोड़कर ईसाई बन गए थे। शुक्रवार (23 मई 2025) को बेल्हा और टाटरगंज गाँवों में आयोजित इस समारोह में सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में शामिल हुए।

रिपोर्ट के मुताबिक, विहिप ने इन गाँवों में दो दिन तक कैंप लगाकर लोगों को सिख धर्म में वापस लाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया। इस दौरान पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया।

विहिप के संगठन मंत्री प्रिंस गौड़ ने बताया कि नेपाल सीमा से सटे गाँवों में जाकर लोगों से मुलाकात की गई और उन्हें सिख धर्म की महत्ता समझाई गई। कई परिवारों ने स्वेच्छा से घर वापसी का फैसला लिया। गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी भी अमृतपान जैसे धार्मिक कार्यक्रमों के जरिए 160 परिवारों को सिख धर्म में वापस ला चुकी है। वहीं, कुछ लोगों का सामाजिक बहिष्कार भी किया गया, जो दूसरों को धर्मांतरण के लिए उकसा रहे थे।

घर वापसी कार्यक्रम में शामिल हुए लोग

बता दें कि पीलीभीत के हजारा थाना क्षेत्र के गाँवों जैसे बेल्हा, टाटरगंज, बमनपुरी और सिंघाड़ा में लंबे समय से धर्मांतरण की शिकायतें सामने आ रही थीं। स्थानीय सिख संगठनों का दावा है कि नेपाल से आए पादरियों और कुछ स्थानीय पास्टरों ने आर्थिक लालच और चंगाई सभाओं के जरिए सिखों को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया। ऑल इंडिया सिख पंजाबी वेलफेयर काउंसिल के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में 3,000 से ज्यादा सिखों का धर्म परिवर्तन हुआ। इनमें से 160 परिवारों की सूची प्रशासन को सौंपी गई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए नवनियुक्त डीएम ज्ञानेंद्र कुमार सिंह ने धर्मांतरण के आरोपों की जाँच के लिए विशेष जाँच टीम (एसआईटी) गठित की है। पुलिस ने एक सिख महिला मंजीत कौर की शिकायत पर आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया, जिन पर धर्मांतरण के लिए दबाव डालने और खेतों को नुकसान पहुँचाने का आरोप है। मंजीत ने बताया कि उनके पति को पहले ही ईसाई बनाया गया था और अब उन पर और उनके बच्चों पर भी दबाव बनाया जा रहा था।

तुफैल को नचा रही थी पाकिस्तानी अफसर की बीवी, कबाड़ी हारून ने पाकिस्तान में रख रखी थी दूसरी बीवी: ज्ञानवापी से नमो घाट तक की डिटेल ले रहा था पाकिस्तान

दिल्ली से पकड़े गए ISI जासूस हारून ने पाकिस्तान में भी एक निकाह कर रखा है। उसने वहाँ अपनी फूफी की बेटी से निकाह किया था। इस बीवी से मिलने वह लगातार पाकिस्तान जाता रहता था। हारून को UPATS ने गिरफ्तार किया है। UPATS ने शहजाद को भी गिरफ्तार किया है जो कई बार पाकिस्तान के चक्कर काट चुका है।

कबाड़ी हारून की पाकिस्तान में बीवी

दिल्ली के सीलमपुर इलाके में कबाड़ी के रूप में काम करने वाला मोहम्मद हारून पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार हुआ है। पूछताछ में हारून ने बताया है कि वह हाल ही में 5 अप्रैल से 25 अप्रैल तक पाकिस्तान में था।

उसने बताया कि पाकिस्तान में उसका दूसरा निकाह हुआ है और वह अपनी बीवी से मिलने के लिए वहाँ जाता रहा है। बताया जा रहा है कि उसकी बुआ पाकिस्तान में रहती है और उसी के जरिए यह रिश्ता जुड़ा। जाँच में यह भी सामने आया है कि हारून पाकिस्तान उच्चायोग के निष्कासित अधिकारी मोहम्मद मुजम्मिल हुसैन का करीबी सहयोगी था।

हारून ने मुजम्मिल की मदद से वीजा आवेदकों से पैसे लेकर पाकिस्तान भेजने का काम किया। संदेह है कि ये पैसे ISI  की गतिविधियों में इस्तेमाल हो रहे थे। हारून का संपर्क पाकिस्तान उच्चायोग में वीजा डेस्क पर तैनात ISI एजेंट दानिश उर्फ एहसान-उर-रहमान से भी था। इस मामले की कड़ियाँ यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की गिरफ्तारी से जुड़ती दिख रही हैं।

साथ ही हारून का लिंक वाराणसी के तुफैल से भी है। जाँच एजेंसियाँ अब हारून से पाकिस्तान उच्चायोग के कर्मचारियों के साथ उसके संबंध, पाकिस्तान यात्राओं के उद्देश्य और वित्तीय लेन-देन के बारे में पूछताछ कर रही हैं। हारून के कबूलनामे से पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले एक संगठित नेटवर्क का बड़ा खुलासा हुआ है।

तुफैल का पाकिस्तानी लिंक

उत्तर प्रदेश एटीएस ने वाराणसी से तुफैल को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गुरुवार (22 मई 2025) को गिरफ्तार किया। तुफैल पाकिस्तान के कई लोगों के संपर्क में था और देश विरोधी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल था।

तुफैल का संबंध पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक से था। वह संगठन के नेता मौलाना शाद रिजवी का समर्थक था और उसके वीडियो व्हाट्सएप ग्रुपों में भेजा करता था। वह ‘गजवा -ए – हिन्द’, शरीयत लागू करने और बाबरी मस्जिद का बदला लेने जैसे उत्तेजक और भड़काऊ मैसेज शेयर करता था।

वह फेसबुक के माध्यम से फैसलाबाद (पाकिस्तान) निवासी नफीसा नाम की महिला के संपर्क में था, जिसका पति पाकिस्तानी फ़ौज में कार्यरत है। तुफैल 600 से अधिक पाकिस्तानी नंबरों के संपर्क में था। UPATS तुफैल से गहन पूछताछ कर रही है। उसकी डिजिटल गतिविधियों, संपर्कों और नेटवर्क भी जाँच की जा रही है।

तुफैल ने राजघाट, नमो घाट, ज्ञानवापी, वाराणसी रेलवे स्टेशन, जामा मस्जिद, लाल किला, निजामुद्दीन औलिया जैसे महत्वपूर्ण स्थलों की तस्वीरें और जानकारियाँ पाकिस्तान भेजीं। उसने पाकिस्तान द्वारा संचालित एक ग्रुप का लिंक वाराणसी के अन्य लोगों को भी भेजा, जिससे स्थानीय लोगों को भी नेटवर्क में शामिल करने की कोशिश की गई।

शहजाद बीवी को लेकर गया पाकिस्तान

टांडा निवासी शहजाद को रविवार (18 मई 2025) को ATS ने रामपुर से गिरफ्तार किया गया है, वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी कर रहा था। जाँच में सामने आया कि शहजाद अब तक 3 बार पाकिस्तान और 10 बार सऊदी अरब जा चुका है।

एक बार वह अपनी पत्नी को भी पाकिस्तान लेकर गया था। शहजाद पहले ड्राइवर था, लेकिन बाद में कॉस्मेटिक्स, मसाले और कपड़ों की तस्करी में लग गया। इसी दौरान उसका पाकिस्तान आना-जाना शुरू हुआ और वह ISI एजेंटों के संपर्क में आया। इसके बाद उसने भारत में ISI के लिए काम करना शुरू कर दिया।

शहजाद ने ISI एजेंटों को फर्जी नाम और पते पर सिम कार्ड मुहैया कराए और उनके लिए पैसों की व्यवस्था भी की। ये सिम कार्ड पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स से संपर्क में रहने के लिए इस्तेमाल किए जाते थे। इस पूरे नेटवर्क में पाकिस्तानी दूतावास का अधिकारी अहसान उर रहमान उर्फ दानिश भी शामिल रहा है।

शहजाद की गिरफ्तारी के बाद से टांडा और रामपुर जिले पर खुफिया एजेंसियों की निगरानी बढ़ गई है। पुलिस ने शहजाद के परिवार और संपर्क में आए कई लोगों से पूछताछ की है। शक है कि उसने कुछ स्थानीय लोगों को भी जासूसी नेटवर्क में शामिल किया होगा

FIR-गिरफ्तारी-मुकदमा-जेल… लम्बी प्रक्रिया के लद गए दिन, घुसपैठियों को सीधे वापस भेज रही मोदी सरकार: जानिए क्या है ‘ऑपरेशन पुश-बैक’, क्यों घबराया बांग्लादेश

भारत ने बांग्लादेशी घुसपैठियों पर कार्रवाई तेज कर दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश से कहा है कि वह अपने अवैध नागरिकों को वापस लेने में तेजी लाए। इस बीच भारत ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए एक नई तरकीब निकाली है। अनाधिकारिक रूप से इसे ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ का नाम दिया गया है।

विदेश मंत्रालय ने 22 मई, 2025 को एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि भारत में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक मौजूद हैं, जिन्हें वापस भेजना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत ने बांग्लादेश से इन लोगों की राष्ट्रीयता की पुष्टि करने का अनुरोध किया है।

उन्होंने बताया है कि वर्तमान में 2360 से अधिक ऐसे मामलों की सूची लंबित है। जायसवाल ने यह भी बताया कि इनमें से कई लोग जेल की सजा पूरी कर चुके हैं, लेकिन राष्ट्रीयता की पुष्टि की प्रक्रिया कई मामलों में 2020 से लंबित है।

भारत ने लगातार बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या को उनके देश वापस भेजने के लिए पहले से बने  प्रोटोकॉल का पालन किया है, लेकिन यह प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल रही है। अदालतों में मामले लटकने, बांग्लादेश के कई बार अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार किए जाने के कारण इसे यह प्रक्रिया तेजी से नहीं चल पाई है।

अपने देश वापस भेजे गए बांग्लादेशी नागरिकों के आंकड़ों का स्क्रीनशॉट

इस बीच एजेंटों और दलालों की मदद से भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से अवैध घुसपैठ लगातार जारी है, इससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है। इसके उलट, बांग्लादेशी घुसपैठिए बाहर नहीं निकाले जा रहे। 2016  के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2 करोड़ से अधिक बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं।

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को अलोकतांत्रिक तरीके से हटाने और मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से यह स्थिति और भी बिगड़ गई है। युनुस सरकार के भारत-विरोधी रवैये के चलते बांग्लादेश ने निर्वासन प्रोटोकॉल को एकदम निष्प्रयोज्य बना दिया है।

इन सब चुनौतियों के बीच भारत सरकार ने अब एक कड़ा कदम उठाया है, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ कहा जा रहा है।

ऑपरेशन पुश-बैक क्या है?

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ भारत सरकार की एक नई रणनीति है, जिसका उद्देश्य पूर्वी सीमा पर पकड़े जाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं से त्वरित रूप से निपटना है। ये वे लोग हैं जो कई वर्षों से अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं।

इस ऑपरेशन के तहत अब उस पारंपरिक प्रक्रिया जैसे पुलिस को सौंपना, FIR दर्ज करना, अदालत में पेश करना, मुकदमा चलाना और फिर निर्वासन प्रोटोकॉल के तहत वापस भेजना को किनारे कर दिया गया है। अब भारतीय सुरक्षाबल घुसपैठियों को तुरंत सीमा पार बांग्लादेश की ओर धकेल रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है ताकि समय और संसाधनों की बचत हो और अवैध घुसपैठ पर तुरंत प्रभाव डाला जा सके।

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ अप्रैल 2025 से चल रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा है। हमने अब तय किया है कि हम कानूनी प्रक्रिया से नहीं गुजरेंगे। पहले, निर्णय यह था कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए और फिर उसे भारतीय कानूनी व्यवस्था में लाया जाए… पहले भी हम 1,000-1,500 विदेशियों को गिरफ्तार करते थे…उन्हें जेल भेजा जाता था और फिर उन्हें अदालत में पेश किया जाता था।”

उन्होंने आगे कहा, “अब, हमने तय किया है कि हम उन्हें देश के अंदर नहीं लाएँगे, हम उन्हें धकेलेंगे। यह पुश-बैक एक नई घटना है। हर साल करीब 5,000 लोग देश में प्रवेश करते हैं और पुश-बैक की वजह से यह संख्या अब कम हो जाएगी।”

इस नई प्रक्रिया में बांग्लादेशी नागरिकों को भारत के दिल्ली-मुंबई या सूरत जैसे शहरों से पकड़ा जाता है। इसके बाद उन्हें पहले त्रिपुरा, असम या पश्चिम बंगाल लाया जाता है और फिर वहाँ से बांग्लादेश भेजा जाता है।

इस तरह की एक कार्रवाई 4 मई 2025 को हुई। इस दिन एयर इंडिया की दो उड़ानों के ज़रिए गुजरात से 300 बांग्लादेशी नागरिकों को अगरतला लाया गया और उन्हें ज़मीनी सीमा के रास्ते वापस भेजा गया।

इसी तरह, 14 मई 2025 को राजस्थान के मंत्री जोगाराम पटेल ने जानकारी दी कि जोधपुर से 148 बांग्लादेशी नागरिकों को कोलकाता भेजा गया, जहाँ उन्हें एक अस्थायी हिरासत केंद्र में रखने के बाद बांग्लादेश भेज दिया गया।

भारत में भी कई राज्यों ने अवैध अप्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया है। ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने बताया कि राज्य में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ने के लिए STF का गठन किया गया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना वैध कानूनी दस्तावेजों के किसी भी विदेशी नागरिक को ओडिशा में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पहचान की प्रक्रिया सभी जिलों में पहले ही शुरू हो चुकी है, और राज्य सरकार ने अपने इंजीनियरिंग विभागों को ऐसे नागरिकों को काम पर न रखने का निर्देश दिया है।

त्रिपुरा पुलिस के आँकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 28 फरवरी 2025 के बीच राज्य में 816 बांग्लादेशी और 79 रोहिंग्या नागरिकों को अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते समय पकड़ा गया। वहीं, 2022 से 31 अक्टूबर 2024 तक त्रिपुरा ने 1,746 बांग्लादेशी नागरिकों को निर्वासित किया है।

त्रिपुरा की बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसके कुछ हिस्सों में अभी भी बाड़ नहीं लगी है। इन कार्रवाइयों का असर इतना स्पष्ट है कि अब कुछ बांग्लादेशी नागरिक ‘स्वेच्छा से’ भारत छोड़कर अपने देश लौटने लगे हैं।

घुसपैठियों पर कार्रवाई से यूनुस सरकार सकते में

मोहम्मद युनुस की अगुवाई वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत की घुसपैठियों से निपटने की नई रणनीति, और विशेष कर ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ से चिंतित है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने 8 मई, 2025 को भारत को पत्र लिखकर देश में अवैध रूप से प्रवेश कर रहे लोगों को वापस धकेलने पर आपत्ति जताई थी।

उन्होंने भारत से यह से आग्रह किया था कि वह पहले से स्थापित प्रक्रिया का पालन करे। इस पत्र में उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश-भारत सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए इस तरह की घुसपैठ अस्वीकार्य है और इससे बचा जाना चाहिए।

इस बीच, भारत के गृह मंत्रालय (MHA)  ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की पहचान और राष्ट्रीयता की पुष्टि के लिए 30 दिन की समय सीमा तय की है। इसके बाद उन्हें, मुख्यतः ऑपरेशन पुश-बैक के तहत, निर्वासित किया जाएगा।

पीड़ित पर ही ‘गंगा जमुनी तहजीब’ ढोने का भार, ‘द वायर’ के पत्रकार उमर राशिद और उसके ‘लव जिहाद’ का एक सबक यह भी: वामपंथी चोंचलों के आगे धरी रह जाती है ‘फेमिनिज्म की क्रांति’

द वायर के पत्रकार उमर राशिद पर लगे गंभीर आरोपों ने एक डरावना पैटर्न उजागर किया है। खासकर लेफ्ट-लिबरल विचारधारा से जुड़ी महिलाओं के मामले में, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए अत्याचारों पर चुप्पी साधे रखी। ये चुप्पी इसलिए नहीं कि वो अत्याचारी से डरती हैं, बल्कि इसलिए, क्योंकि इससे ‘इस्लामोफोबिया’ को हवा मिल जाती और ‘माहौल’ खराब हो जाता। इसके नतीजे में क्या? ऐसे मामले धीरे-धीरे दब जाते हैं और अत्याचारी आजाद घूमते हैं और फिर नया शिकार करते हैं।

ऐसे मामलों में अपराधी पीड़ित पर ऐसी नैतिक जिम्मेदारी का बोझ डाल चुके होते हैं, जिसमें पीड़ित को ही ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को आगे बढ़ाने वाले ‘फाइटर’ का ‘मानसिक बोझा’ ढोने वाला ‘फील’ आता हो और वो सबकुछ सह कर भी खामोश रहती हैं। क्योंकि ऐसी लेफ्ट लिबरलों पर ऐसे ‘नरेटिव’ को ‘हवा’ न देने की जिम्मेदारी थमा चुके होते हैं, जिसमें ‘माहौल खराब’ होने का ‘डर’ छिपा रहता है। इस ‘माहौल’ को बचाने के लिए वो सबकुछ सहती जाती हैं।

बहरहाल, ऐसे ही एक अन्य मामले में रुचिका शर्मा नाम की महिला की भी ‘कहानी’ सामने आई है। रुचिका यूट्यूब पर इतिहास की बातें और मेकअप ट्यूटोरियल के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने विचारधारा के बोझ तले ऐसी आपबीती साझा की, जो ‘हास्यास्पद’ ही होती, अगर इतनी गंभीर और दुखद न होती।

रुचिका शर्मा ने X पर लिखा, “यह देखकर दुख होता है, लेकिन यह इसका अंदाजा था कि एक महिला के भयानक अनुभव को इस्लामोफोबिया भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।” फिर बिना किसी आत्म-जागरूकता के रुचिका ने खुलासा किया कि उन्होंने भी अपने साथ हुए अत्याचार को उजागर नहीं किया। क्यों? क्योंकि उनके शब्दों में “संघी लोग इसका इस्तेमाल अपने घटिया सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने के लिए करेंगे।”

रुचिका शर्मा ने ये स्वीकार किया कि उनके साथ गलत हुआ। उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ और उन्होंने मुस्लिम अत्याचारी के मामले में चुप रहना चुना, क्योंकि इससे माहौल ‘खराब’ होता। ये तो उनकी खामोशी से भी कहीं ज्यादा बुरी बात हुई।

अब जब इस बात का उन्होंने खुलासा कर दिया, तो इंटरनेट पर हंगामा मच गया।

हर तरफ से आलोचकों ने इस नैतिक उलटबांसी की निंदा की: रुचिका और पीड़िता दोनों को अपने साथ हुए अत्याचार से ज्यादा इस बात का डर था कि इसका इस्तेमाल दक्षिणपंथी लोग कर सकते हैं। एक हैरान करने वाले अपराध को उसकी गंभीरता के हिसाब से नहीं, बल्कि किसी को राजनीतिक फायदा हो सकता है, इसलिए दबाए रखा गया। दोनों ही मामलों में ये एक जैसा ही निकला।

ये फर्जी नैतिकतावादी संतुलन दोनों ही मामलों में दिखा, रुचिका शर्मा के भी और उमर राशिद ने जिस लड़की के साथ बर्बरता की, उसके मामले में भी।

बता दें कि एक हिंदू महिला (जो सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई) ने लिबरल सर्किल के चर्चित ‘पत्रकार’ उमर राशिद पर बार-बार रेप करने, शारीरिक शोषण करने, उसकी मर्जी के खिलाफ गोमाँस खिलाने का आरोप लगाया था। वो अब तक चुप क्यों रही? क्योंकि उसे लगता था कि अगर वो कुछ बोलेगी, तो कथित रूप से ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को चोट पहुँचती। मामला का सांप्रदायिक एंगल एक दम से माहौल खराब कर देता।

उसने अपनी शिकायत में लिखा, “वो बार-बार मेरी ‘हिंदू राष्ट्र’ में ‘मेरी औकात’ और पहचान याद दिलाता था।” और इस तरह से “इस रिश्ते की हकीकत को छिपाए रखना पड़ा, ताकि मुस्लिम पुरुषों पर आँच न आए।” उसने डर की वजह से चुप्पी नहीं साधी, बल्कि ‘सांप्रदायिक एकता’ न खराब हो जाए, इसलिए वो अत्याचार सहती रही।

शिकायत का स्क्रीनशॉट

इसके साथ ही उसने अपने पोस्ट में ये भी साफ किया कि उसका ये पोस्ट किसी ‘धर्म’ के खिलाफ नहीं, बल्कि पुरुषवादी व्यवस्था यानी पैट्रियार्की के खिलाफ था। उसने लिखा कि “उसके मजहब ने ये अपराध नहीं कराया, बल्कि उसके ‘स्वभाव’ ने ऐसा कराया।” यही नहीं, उसने लिखा, “वो किसी भी धर्म का हो सकता था। क्या हुआ, इसका खाने या मजहब से कोई लेना देना नहीं, ये सिर्फ कंट्रोलिंग नेचर की वजह से था।”

वैसे, ये सब बताने के बाद भी उनके पोस्ट में जो साफ था कि वो (उमर) बार-बार उक्त महिला की ‘औकात’ बताता रहता था, साथ ही ये भी बताता था कि वो ‘कश्मीरी मुस्लिम’ है। वो ऊपर है। लेकिन अगर ये बात सामने आई, तो हो सकता है कि उसकी ‘कौम’ से लोग नफरत करने लगें। ऐसे में ‘चुप’ रहना ही सही रास्ता है।

उसकी ये सफाई शायद लेफ्ट-लिबरलों को संतुष्ट कर गई हो, लेकिन लोगों का गुस्सा भड़क उठा। लोगों ने कहा भी कि उसने ‘धर्म’ की वजह से चुप्पी साधे रखी, जिसकी वजह से उसका शोषण बढ़ता गया। यानी उमर को ऐसा सब करने की छूट मिलती गई, क्योंकि उसके ‘कामों’ के बारे में किसी को पता नहीं चलता था। बहरहाल, इस मामले ने बता दिया कि ‘विचारधारा’ की वजह से कैसे ‘न्याय’ की हत्या कर दी गई, यानी न्याय को ‘मौका’ ही नहीं मिला और अत्याचार लंबे समय तक जारी रहे।

ये बात सिर्फ रुचिका शर्मा और उमर राशिद की सताई ‘पीड़िता’ तक ही शामिल नहीं है, जिसमें ‘कथित नैतिकता’ और ‘सांप्रदायिक एजेंडे’ को हवा न मिले कि नैतिक जिम्मेदारी की वजह से अपराधियों के अपराधों को छिपाना पड़ा हो। एक महिला ने स्वीकार किया कि वो भी ऐसे ही मामले से गुजर चुकी है, जिसमें उसने अपने साथ छेड़छाड़ करने वाले एक अपराधी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वो मुस्लिम था। महिला को लगा कि अगर वो ‘मुस्लिम शोहदे’ की शिकायत करेगी, तो उसके राज्य में ‘गंगा जमुनी तहजीब’ कमजोर पड़ सकती है और राज्य में ‘अल्पसंख्यकों’ के खिलाफ माहौल बिगड़ जाएगा।

वैसे, उमर राशिद के मामले में ‘द वायर’ ने बेहद ‘हल्का’ सा कदम उठाया और ‘इंटरनल इन्क्वॉयरी’ की बात कही। हालाँकि ऑनलाइन दुनिया के लोग ये बात जोर देकर कह रहे हैं कि ‘द वायर’ ने उमर राशिद पर कार्रवाई की जगह, इस मामले को दबाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ के तहत इन्क्वॉयरी की बात कही है।

ये पूरा मामला न सिर्फ उमर राशिद के घटिया कुकर्मों को सामने लाया, बल्कि उस कथित ‘लिबरल नारीवाद’ को भी सामने लाने में सफल रहा, जो माहौल के हिसाब से ‘मुँह’ खोलता है। एक ऐसा नारीवाज, जो अपराध को अपराध के स्तर पर नहीं तौलता, बल्कि मजहबी पहचान की वजह से ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ और ‘राजनीतिक नफा-नुकसान’ भी देखता है। वैसे, इसे नारीवाद कब से कहा जाने लगा है, ये तो वही जानें। क्योंकि मेरी नजर में तो ये नारीवाद नहीं, बल्कि ये उस ‘डिजाइनर नारीवाद’ की तरह है, जो बाहर से सुरक्षित लगने ‘जैसा’ होता है, और उसमें ‘पीड़ित’ को ‘कथित सुरक्षा’ ‘फील’ होने लगती है।

ऐसे मामलों में जब न्याय से ज्यादा राजनीतिक सुविधा को वरीयता दी जाती है, तो नुकसान सिर्फ पीड़िताओं का नहीं होता। बल्कि ऐसे मामलों में जवाबदेही, कानून, सोच, समझ और विचारधारा को भी तिलांजलि दी जा चुकी है, बल्कि ‘न्याय’ जैसी चीज बहुत हल्की लगने लगती है।

और फिर शिकारियों का क्या? वो तो फिर से ‘पुराने ढर्रे’ पर नए शिकार के पीछे चल देता है, क्योंकि उसे पता होता है कि उसके कुकृत्यों को छिपाने के लिए ‘उसकी विचारधारा, उसका गैंग, उसका मजहब’ उसके साथ तो है ही, वो किसी न किसी आड़ में छिप ही जाएगा और अपने ‘कारनामों’ को अंजाम देते रहने में सफल होता रहेगा।

मूल लेख अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। इसका हिंदी भावानुवाद किया है श्रवण शुक्ल ने।

नाबालिग लड़की से सेक्स करने पर कोर्ट ने सुनाई 20 साल की सजा, पर सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया बरी: कहा- पीड़िता ने इसे नहीं माना अपराध… जानिए क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (23 मई 2025) को अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक ऐसे व्यक्ति की सजा खत्म कर दी, जिसे नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध बनाने के लिए दोषी ठहराया गया था। वो मौजूदा समय में अपनी उसी पत्नी और बच्चे के साथ बंगाल में रह रहा है, जिस लड़की से तब नाबालिग रहते उसने संबंध बनाए थे। हालाँकि दोनों ने शादी कर ली थी। अब इस मामले में कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उसकी सजा को माफ कर दी है। कोर्ट ने लड़की के संघर्ष को भी देखा, जो उसे बरी कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ती रही।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला 2018 का है, जब पश्चिम बंगाल में एक 14 साल की लड़की के लापता होने की शिकायत उसके परिवार ने दर्ज की थी। बाद में पता चला कि लड़की ने 25 साल के एक युवक से शादी कर ली थी। लड़की के परिवार ने इस मामले में शिकायत दर्ज की और स्थानीय अदालत ने युवक को पॉक्सो एक्ट के तहत 20 साल की सजा सुनाई थी।

साल 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस व्यक्ति को बरी कर दिया था, लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने किशोरियों की यौन इच्छाओं और नैतिक जिम्मेदारियों पर विवादास्पद टिप्पणियाँ की थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि किशोर लड़कियों को अपनी ‘यौन इच्छाओं पर नियंत्रण‘ रखना चाहिए और समाज उन्हें ऐसे मामलों में ‘हारा हुआ’ मानता है। इन टिप्पणियों की व्यापक आलोचना हुई और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया। बीते साल यानी अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए व्यक्ति की सजा को बहाल रखा था, लेकिन सजा पर अमल को रोक दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कमेटी का गठन किया, फिर सुनाया फैसला

इसके बाद कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठन करने का आदेश दिया, जिसमें मनोवैज्ञानिक और बाल कल्याण अधिकारी शामिल थे। इस समिति को पीड़िता की वर्तमान भावनात्मक स्थिति और सामाजिक कल्याण का आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई। समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पीड़िता, जो अब उस व्यक्ति की पत्नी है, वो उससे भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है और अपने परिवार के प्रति बहुत संवेदनशील है। दोनों अब पश्चिम बंगाल में अपने बच्चे के साथ एक साथ रहते हैं।

पीड़ित लड़की के संघर्षों का भी रखा ध्यान

सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट के आधार पर कहा कि पीड़िता इस घटना को जघन्य अपराध नहीं मानती। कोर्ट ने कहा, “पीड़िता ने इसे जघन्य अपराध नहीं माना। समाज ने उसका मजाक उड़ाया, कानूनी व्यवस्था ने उसे निराश किया, और परिवार ने उसे छोड़ दिया। उसे पुलिस, कानूनी प्रक्रिया और आरोपित को सजा से बचाने की लगातार लड़ाई पड़ी।”

जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जल भुइयाँ की बेंच ने कहा कि यह मामला ‘सभी के लिए आँखें खोलने वाला’ है और यह कानूनी व्यवस्था में खामियों को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को पहले सूचित निर्णय लेने का मौका नहीं मिला और व्यवस्था ने उसे कई स्तरों पर निराश किया। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का उपयोग करते हुए ‘पूर्ण न्याय’ के लिए फैसला लिया कि व्यक्ति को सजा देना न्याय के हित में नहीं होगा, क्योंकि इससे परिवार टूट सकता है।

शादी का झाँसा दे हिंदू लड़की का रेप, विरोध करने पर सोहेल ने सिगरेट से दाग दिया बदन: इस्लाम कबूलने का डाल रहा था दबाव, वडोदरा में 3 गिरफ्तार

वडोदरा में हिंदू लड़की को रिक्शा चलाने वाले सोहेल नाम के मुस्लिम लड़के ने शादी का झांसा दिया। इसके बाद उसका रेप किया। उस पर धर्मांतरण का दबाव भी बनाया। जब उसने इसका विरोध किया तो उसके शरीर को सिगरेट से दाग दिया।

पूरा मामला वडोदरा के कपूराई थाना क्षेत्र का है। अजवा रोड पर रहने वाली हिंदू पीड़ित लड़की 2023 में रिक्शा चलाने वाले सोहेल नाजिम खान पठान से मिली। मोबाइल नंबर अदला-बदली के साथ दोनों में बातचीत शुरू हुई। उस समय लड़की की उम्र सिर्फ 17 वर्ष के आसपास ही थी।

बात आगे बढ़ी तो सोहेल ने लड़की से शादी करने की बात कही और उसे घुमाने लेकर जाने लगा। लड़की ने जब शादी के बारे में अपनी माँ और दादी से पूछा तो उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि वह और बड़ी हो जाए तब शादी के बारे में सोचेंगे।

इसके बाद 2023 में ही सोहेल उसे अपने घर ले गया और जबरदस्ती उसके साथ यौन संबंध बनाए। मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार, पुलिस को मिली शिकायत में कहा गया है कि सोहेल ने लड़की को धर्म परिवर्तन करने के लिए भी कहा और ऐसा न करने पर जान से मारने की धमकी दी। अपने बयान में पीड़िता ने कहा है कि सोहेल ने उसे घर भी नहीं जाने दिया।

शिकायत में आगे कहा गया है कि 17 मई 2025 को सोहेल के दो दोस्त फईम और जुनैद लड़की के पास आए और उसे जान से मारने की धमकी देकर सोहेल के घर लेकर गए।

लड़की जब सोहेल के घर पहुँची तो उसने लड़की के साथ मारपीट शुरू कर दी। यहाँ तक कि उसके हाथों को भी सिगरेट से जलाया। इसके अगले दिन लड़की सोहेल के घर से भाग निकली और परिवार को इसकी जानकारी दी।

इसके बाद घरवालों ने कपूराई पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने पोक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही आगे की जाँच शुरू कर दी है।

पहलगाम से पहले दिल्ली में होना था अटैक, ISI ने अंसारुल अंसारी को सौंपा था टास्क: नेपाल से कैब चलाने गया था कतर, रावलपिंडी में ट्रेनिंग लेकर आया था दिल्ली की रेकी करने

पहलगाम आतंकी हमले से पहले दिल्ली को टारगेट करने की पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने साजिश रची थी। केन्द्रीय जाँच एजेंसियों ने दिल्ली से अंसारुल मियां अंसारी को और उसके सहयोगी अखलाक आजम को राँची से तीन मार्च को गिरफ्तार किया था। पहलगाम हमले से पहले दोनों की गिरफ्तारी हुई थी। इनसे पूछताछ में पता चला है कि इनलोगों ने दिल्ली को दहलाने की योजना बनाई थी।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक अंसारुल अंसारी ने दिल्ली के कई जगहों की रेकी की थी। वह भारतीय सेना के दस्तावेज भी आईएसआई तक पहुँचा रहा था। उससे पूछताछ में आईएसआई के नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। वह दस्तावेजों की सीडी बनाकर पाकिस्तान भेजा करता था। जब उसे गिरफ्तार किया गया तो वह पाकिस्तान भागने की फिराक में लगा था। पूछताछ में पता चला है कि आईएसआई के कई एजेंट अभी भी भारत के अलग- अलग हिस्सों में छिपे हुए हैं। भारतीय एजेंसियाँ अब उनकी तलाश कर रही हैं।

अंसारुल अंसारी ने पूछताछ में बताया कि वो नेपाल का रहने वाला है। वह नौकरी की तलाश में कतर पहुँचा था और कैब चालक के रूप में काम करने लगा। कतर में उसकी मुलाकात एक आईएसआई हैंडलर से हुई। उसे पाकिस्तान ले जाया गया और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की खास ट्रेनिंग दी गई। अंसारुल को भारत भेजा गया और आईएसआई के अधिकारी उसके संपर्क में लगातार रहने लगे।

अंसारुल का काम आईएसआई को भारतीय सेना के गोपनीय दस्तावेज भेजने का था। वह लगातार पाकिस्तानी नागरिक के संपर्क में था। उसे नेपाल के रास्ते भारत भेजा गया था।

अंसारुल को भारत में मदद करने वाला राँची का रहने वाला अखलाक आजम था, जिसे मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया। अखलाक ने अंसारुल को लॉजिस्टिक सपोर्ट और दस्तावेज इकट्ठा करने में मदद की। दोनों के मोबाइल फोन की जाँच में पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संदिग्ध बातचीत के सबूत मिले, जो एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने दोनों के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया और मई 2025 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।

अंसारुल और अखलाक को दिल्ली की तिहाड़ जेल के हाई-सिक्योरिटी वार्ड में रखा गया है। अधिकारियों ने उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी है, ताकि वे जेल में अन्य कैदियों को प्रभावित न कर सकें। जाँच एजेंसियाँ अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी हैं।