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FIR-गिरफ्तारी-मुकदमा-जेल… लम्बी प्रक्रिया के लद गए दिन, घुसपैठियों को सीधे वापस भेज रही मोदी सरकार: जानिए क्या है ‘ऑपरेशन पुश-बैक’, क्यों घबराया बांग्लादेश

भारत ने बांग्लादेशी घुसपैठियों पर कार्रवाई तेज कर दी है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश से कहा है कि वह अपने अवैध नागरिकों को वापस लेने में तेजी लाए। इस बीच भारत ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करने के लिए एक नई तरकीब निकाली है। अनाधिकारिक रूप से इसे ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ का नाम दिया गया है।

विदेश मंत्रालय ने 22 मई, 2025 को एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि भारत में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी नागरिक मौजूद हैं, जिन्हें वापस भेजना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत ने बांग्लादेश से इन लोगों की राष्ट्रीयता की पुष्टि करने का अनुरोध किया है।

उन्होंने बताया है कि वर्तमान में 2360 से अधिक ऐसे मामलों की सूची लंबित है। जायसवाल ने यह भी बताया कि इनमें से कई लोग जेल की सजा पूरी कर चुके हैं, लेकिन राष्ट्रीयता की पुष्टि की प्रक्रिया कई मामलों में 2020 से लंबित है।

भारत ने लगातार बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या को उनके देश वापस भेजने के लिए पहले से बने  प्रोटोकॉल का पालन किया है, लेकिन यह प्रक्रिया काफी धीमी और जटिल रही है। अदालतों में मामले लटकने, बांग्लादेश के कई बार अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार किए जाने के कारण इसे यह प्रक्रिया तेजी से नहीं चल पाई है।

अपने देश वापस भेजे गए बांग्लादेशी नागरिकों के आंकड़ों का स्क्रीनशॉट

इस बीच एजेंटों और दलालों की मदद से भारत-बांग्लादेश की खुली सीमा से अवैध घुसपैठ लगातार जारी है, इससे स्थिति और भी गंभीर हो गई है। इसके उलट, बांग्लादेशी घुसपैठिए बाहर नहीं निकाले जा रहे। 2016  के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2 करोड़ से अधिक बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं।

बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार को अलोकतांत्रिक तरीके से हटाने और मोहम्मद यूनुस के सत्ता में आने के बाद से यह स्थिति और भी बिगड़ गई है। युनुस सरकार के भारत-विरोधी रवैये के चलते बांग्लादेश ने निर्वासन प्रोटोकॉल को एकदम निष्प्रयोज्य बना दिया है।

इन सब चुनौतियों के बीच भारत सरकार ने अब एक कड़ा कदम उठाया है, जिसे अनौपचारिक रूप से ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ कहा जा रहा है।

ऑपरेशन पुश-बैक क्या है?

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ भारत सरकार की एक नई रणनीति है, जिसका उद्देश्य पूर्वी सीमा पर पकड़े जाने वाले बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं से त्वरित रूप से निपटना है। ये वे लोग हैं जो कई वर्षों से अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं।

इस ऑपरेशन के तहत अब उस पारंपरिक प्रक्रिया जैसे पुलिस को सौंपना, FIR दर्ज करना, अदालत में पेश करना, मुकदमा चलाना और फिर निर्वासन प्रोटोकॉल के तहत वापस भेजना को किनारे कर दिया गया है। अब भारतीय सुरक्षाबल घुसपैठियों को तुरंत सीमा पार बांग्लादेश की ओर धकेल रहे हैं। यह इसलिए हो रहा है ताकि समय और संसाधनों की बचत हो और अवैध घुसपैठ पर तुरंत प्रभाव डाला जा सके।

‘ऑपरेशन पुश-बैक’ अप्रैल 2025 से चल रहा है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा है। हमने अब तय किया है कि हम कानूनी प्रक्रिया से नहीं गुजरेंगे। पहले, निर्णय यह था कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए और फिर उसे भारतीय कानूनी व्यवस्था में लाया जाए… पहले भी हम 1,000-1,500 विदेशियों को गिरफ्तार करते थे…उन्हें जेल भेजा जाता था और फिर उन्हें अदालत में पेश किया जाता था।”

उन्होंने आगे कहा, “अब, हमने तय किया है कि हम उन्हें देश के अंदर नहीं लाएँगे, हम उन्हें धकेलेंगे। यह पुश-बैक एक नई घटना है। हर साल करीब 5,000 लोग देश में प्रवेश करते हैं और पुश-बैक की वजह से यह संख्या अब कम हो जाएगी।”

इस नई प्रक्रिया में बांग्लादेशी नागरिकों को भारत के दिल्ली-मुंबई या सूरत जैसे शहरों से पकड़ा जाता है। इसके बाद उन्हें पहले त्रिपुरा, असम या पश्चिम बंगाल लाया जाता है और फिर वहाँ से बांग्लादेश भेजा जाता है।

इस तरह की एक कार्रवाई 4 मई 2025 को हुई। इस दिन एयर इंडिया की दो उड़ानों के ज़रिए गुजरात से 300 बांग्लादेशी नागरिकों को अगरतला लाया गया और उन्हें ज़मीनी सीमा के रास्ते वापस भेजा गया।

इसी तरह, 14 मई 2025 को राजस्थान के मंत्री जोगाराम पटेल ने जानकारी दी कि जोधपुर से 148 बांग्लादेशी नागरिकों को कोलकाता भेजा गया, जहाँ उन्हें एक अस्थायी हिरासत केंद्र में रखने के बाद बांग्लादेश भेज दिया गया।

भारत में भी कई राज्यों ने अवैध अप्रवासियों की पहचान की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया है। ओडिशा के कानून मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन ने बताया कि राज्य में रह रहे अवैध बांग्लादेशी नागरिकों को पकड़ने के लिए STF का गठन किया गया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना वैध कानूनी दस्तावेजों के किसी भी विदेशी नागरिक को ओडिशा में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पहचान की प्रक्रिया सभी जिलों में पहले ही शुरू हो चुकी है, और राज्य सरकार ने अपने इंजीनियरिंग विभागों को ऐसे नागरिकों को काम पर न रखने का निर्देश दिया है।

त्रिपुरा पुलिस के आँकड़ों के अनुसार, 1 जनवरी 2024 से 28 फरवरी 2025 के बीच राज्य में 816 बांग्लादेशी और 79 रोहिंग्या नागरिकों को अवैध रूप से भारत में प्रवेश करते समय पकड़ा गया। वहीं, 2022 से 31 अक्टूबर 2024 तक त्रिपुरा ने 1,746 बांग्लादेशी नागरिकों को निर्वासित किया है।

त्रिपुरा की बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसके कुछ हिस्सों में अभी भी बाड़ नहीं लगी है। इन कार्रवाइयों का असर इतना स्पष्ट है कि अब कुछ बांग्लादेशी नागरिक ‘स्वेच्छा से’ भारत छोड़कर अपने देश लौटने लगे हैं।

घुसपैठियों पर कार्रवाई से यूनुस सरकार सकते में

मोहम्मद युनुस की अगुवाई वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार भारत की घुसपैठियों से निपटने की नई रणनीति, और विशेष कर ‘ऑपरेशन पुश-बैक’ से चिंतित है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने 8 मई, 2025 को भारत को पत्र लिखकर देश में अवैध रूप से प्रवेश कर रहे लोगों को वापस धकेलने पर आपत्ति जताई थी।

उन्होंने भारत से यह से आग्रह किया था कि वह पहले से स्थापित प्रक्रिया का पालन करे। इस पत्र में उन्होंने कहा था कि बांग्लादेश-भारत सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए इस तरह की घुसपैठ अस्वीकार्य है और इससे बचा जाना चाहिए।

इस बीच, भारत के गृह मंत्रालय (MHA)  ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की पहचान और राष्ट्रीयता की पुष्टि के लिए 30 दिन की समय सीमा तय की है। इसके बाद उन्हें, मुख्यतः ऑपरेशन पुश-बैक के तहत, निर्वासित किया जाएगा।

पीड़ित पर ही ‘गंगा जमुनी तहजीब’ ढोने का भार, ‘द वायर’ के पत्रकार उमर राशिद और उसके ‘लव जिहाद’ का एक सबक यह भी: वामपंथी चोंचलों के आगे धरी रह जाती है ‘फेमिनिज्म की क्रांति’

द वायर के पत्रकार उमर राशिद पर लगे गंभीर आरोपों ने एक डरावना पैटर्न उजागर किया है। खासकर लेफ्ट-लिबरल विचारधारा से जुड़ी महिलाओं के मामले में, जिसमें उन्होंने अपने साथ हुए अत्याचारों पर चुप्पी साधे रखी। ये चुप्पी इसलिए नहीं कि वो अत्याचारी से डरती हैं, बल्कि इसलिए, क्योंकि इससे ‘इस्लामोफोबिया’ को हवा मिल जाती और ‘माहौल’ खराब हो जाता। इसके नतीजे में क्या? ऐसे मामले धीरे-धीरे दब जाते हैं और अत्याचारी आजाद घूमते हैं और फिर नया शिकार करते हैं।

ऐसे मामलों में अपराधी पीड़ित पर ऐसी नैतिक जिम्मेदारी का बोझ डाल चुके होते हैं, जिसमें पीड़ित को ही ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को आगे बढ़ाने वाले ‘फाइटर’ का ‘मानसिक बोझा’ ढोने वाला ‘फील’ आता हो और वो सबकुछ सह कर भी खामोश रहती हैं। क्योंकि ऐसी लेफ्ट लिबरलों पर ऐसे ‘नरेटिव’ को ‘हवा’ न देने की जिम्मेदारी थमा चुके होते हैं, जिसमें ‘माहौल खराब’ होने का ‘डर’ छिपा रहता है। इस ‘माहौल’ को बचाने के लिए वो सबकुछ सहती जाती हैं।

बहरहाल, ऐसे ही एक अन्य मामले में रुचिका शर्मा नाम की महिला की भी ‘कहानी’ सामने आई है। रुचिका यूट्यूब पर इतिहास की बातें और मेकअप ट्यूटोरियल के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने विचारधारा के बोझ तले ऐसी आपबीती साझा की, जो ‘हास्यास्पद’ ही होती, अगर इतनी गंभीर और दुखद न होती।

रुचिका शर्मा ने X पर लिखा, “यह देखकर दुख होता है, लेकिन यह इसका अंदाजा था कि एक महिला के भयानक अनुभव को इस्लामोफोबिया भड़काने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।” फिर बिना किसी आत्म-जागरूकता के रुचिका ने खुलासा किया कि उन्होंने भी अपने साथ हुए अत्याचार को उजागर नहीं किया। क्यों? क्योंकि उनके शब्दों में “संघी लोग इसका इस्तेमाल अपने घटिया सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ाने के लिए करेंगे।”

रुचिका शर्मा ने ये स्वीकार किया कि उनके साथ गलत हुआ। उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ और उन्होंने मुस्लिम अत्याचारी के मामले में चुप रहना चुना, क्योंकि इससे माहौल ‘खराब’ होता। ये तो उनकी खामोशी से भी कहीं ज्यादा बुरी बात हुई।

अब जब इस बात का उन्होंने खुलासा कर दिया, तो इंटरनेट पर हंगामा मच गया।

हर तरफ से आलोचकों ने इस नैतिक उलटबांसी की निंदा की: रुचिका और पीड़िता दोनों को अपने साथ हुए अत्याचार से ज्यादा इस बात का डर था कि इसका इस्तेमाल दक्षिणपंथी लोग कर सकते हैं। एक हैरान करने वाले अपराध को उसकी गंभीरता के हिसाब से नहीं, बल्कि किसी को राजनीतिक फायदा हो सकता है, इसलिए दबाए रखा गया। दोनों ही मामलों में ये एक जैसा ही निकला।

ये फर्जी नैतिकतावादी संतुलन दोनों ही मामलों में दिखा, रुचिका शर्मा के भी और उमर राशिद ने जिस लड़की के साथ बर्बरता की, उसके मामले में भी।

बता दें कि एक हिंदू महिला (जो सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आई) ने लिबरल सर्किल के चर्चित ‘पत्रकार’ उमर राशिद पर बार-बार रेप करने, शारीरिक शोषण करने, उसकी मर्जी के खिलाफ गोमाँस खिलाने का आरोप लगाया था। वो अब तक चुप क्यों रही? क्योंकि उसे लगता था कि अगर वो कुछ बोलेगी, तो कथित रूप से ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ को चोट पहुँचती। मामला का सांप्रदायिक एंगल एक दम से माहौल खराब कर देता।

उसने अपनी शिकायत में लिखा, “वो बार-बार मेरी ‘हिंदू राष्ट्र’ में ‘मेरी औकात’ और पहचान याद दिलाता था।” और इस तरह से “इस रिश्ते की हकीकत को छिपाए रखना पड़ा, ताकि मुस्लिम पुरुषों पर आँच न आए।” उसने डर की वजह से चुप्पी नहीं साधी, बल्कि ‘सांप्रदायिक एकता’ न खराब हो जाए, इसलिए वो अत्याचार सहती रही।

शिकायत का स्क्रीनशॉट

इसके साथ ही उसने अपने पोस्ट में ये भी साफ किया कि उसका ये पोस्ट किसी ‘धर्म’ के खिलाफ नहीं, बल्कि पुरुषवादी व्यवस्था यानी पैट्रियार्की के खिलाफ था। उसने लिखा कि “उसके मजहब ने ये अपराध नहीं कराया, बल्कि उसके ‘स्वभाव’ ने ऐसा कराया।” यही नहीं, उसने लिखा, “वो किसी भी धर्म का हो सकता था। क्या हुआ, इसका खाने या मजहब से कोई लेना देना नहीं, ये सिर्फ कंट्रोलिंग नेचर की वजह से था।”

वैसे, ये सब बताने के बाद भी उनके पोस्ट में जो साफ था कि वो (उमर) बार-बार उक्त महिला की ‘औकात’ बताता रहता था, साथ ही ये भी बताता था कि वो ‘कश्मीरी मुस्लिम’ है। वो ऊपर है। लेकिन अगर ये बात सामने आई, तो हो सकता है कि उसकी ‘कौम’ से लोग नफरत करने लगें। ऐसे में ‘चुप’ रहना ही सही रास्ता है।

उसकी ये सफाई शायद लेफ्ट-लिबरलों को संतुष्ट कर गई हो, लेकिन लोगों का गुस्सा भड़क उठा। लोगों ने कहा भी कि उसने ‘धर्म’ की वजह से चुप्पी साधे रखी, जिसकी वजह से उसका शोषण बढ़ता गया। यानी उमर को ऐसा सब करने की छूट मिलती गई, क्योंकि उसके ‘कामों’ के बारे में किसी को पता नहीं चलता था। बहरहाल, इस मामले ने बता दिया कि ‘विचारधारा’ की वजह से कैसे ‘न्याय’ की हत्या कर दी गई, यानी न्याय को ‘मौका’ ही नहीं मिला और अत्याचार लंबे समय तक जारी रहे।

ये बात सिर्फ रुचिका शर्मा और उमर राशिद की सताई ‘पीड़िता’ तक ही शामिल नहीं है, जिसमें ‘कथित नैतिकता’ और ‘सांप्रदायिक एजेंडे’ को हवा न मिले कि नैतिक जिम्मेदारी की वजह से अपराधियों के अपराधों को छिपाना पड़ा हो। एक महिला ने स्वीकार किया कि वो भी ऐसे ही मामले से गुजर चुकी है, जिसमें उसने अपने साथ छेड़छाड़ करने वाले एक अपराधी को सिर्फ इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वो मुस्लिम था। महिला को लगा कि अगर वो ‘मुस्लिम शोहदे’ की शिकायत करेगी, तो उसके राज्य में ‘गंगा जमुनी तहजीब’ कमजोर पड़ सकती है और राज्य में ‘अल्पसंख्यकों’ के खिलाफ माहौल बिगड़ जाएगा।

वैसे, उमर राशिद के मामले में ‘द वायर’ ने बेहद ‘हल्का’ सा कदम उठाया और ‘इंटरनल इन्क्वॉयरी’ की बात कही। हालाँकि ऑनलाइन दुनिया के लोग ये बात जोर देकर कह रहे हैं कि ‘द वायर’ ने उमर राशिद पर कार्रवाई की जगह, इस मामले को दबाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ के तहत इन्क्वॉयरी की बात कही है।

ये पूरा मामला न सिर्फ उमर राशिद के घटिया कुकर्मों को सामने लाया, बल्कि उस कथित ‘लिबरल नारीवाद’ को भी सामने लाने में सफल रहा, जो माहौल के हिसाब से ‘मुँह’ खोलता है। एक ऐसा नारीवाज, जो अपराध को अपराध के स्तर पर नहीं तौलता, बल्कि मजहबी पहचान की वजह से ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ और ‘राजनीतिक नफा-नुकसान’ भी देखता है। वैसे, इसे नारीवाद कब से कहा जाने लगा है, ये तो वही जानें। क्योंकि मेरी नजर में तो ये नारीवाद नहीं, बल्कि ये उस ‘डिजाइनर नारीवाद’ की तरह है, जो बाहर से सुरक्षित लगने ‘जैसा’ होता है, और उसमें ‘पीड़ित’ को ‘कथित सुरक्षा’ ‘फील’ होने लगती है।

ऐसे मामलों में जब न्याय से ज्यादा राजनीतिक सुविधा को वरीयता दी जाती है, तो नुकसान सिर्फ पीड़िताओं का नहीं होता। बल्कि ऐसे मामलों में जवाबदेही, कानून, सोच, समझ और विचारधारा को भी तिलांजलि दी जा चुकी है, बल्कि ‘न्याय’ जैसी चीज बहुत हल्की लगने लगती है।

और फिर शिकारियों का क्या? वो तो फिर से ‘पुराने ढर्रे’ पर नए शिकार के पीछे चल देता है, क्योंकि उसे पता होता है कि उसके कुकृत्यों को छिपाने के लिए ‘उसकी विचारधारा, उसका गैंग, उसका मजहब’ उसके साथ तो है ही, वो किसी न किसी आड़ में छिप ही जाएगा और अपने ‘कारनामों’ को अंजाम देते रहने में सफल होता रहेगा।

मूल लेख अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित है। इसका हिंदी भावानुवाद किया है श्रवण शुक्ल ने।

नाबालिग लड़की से सेक्स करने पर कोर्ट ने सुनाई 20 साल की सजा, पर सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया बरी: कहा- पीड़िता ने इसे नहीं माना अपराध… जानिए क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (23 मई 2025) को अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए एक ऐसे व्यक्ति की सजा खत्म कर दी, जिसे नाबालिग लड़की के साथ यौन संबंध बनाने के लिए दोषी ठहराया गया था। वो मौजूदा समय में अपनी उसी पत्नी और बच्चे के साथ बंगाल में रह रहा है, जिस लड़की से तब नाबालिग रहते उसने संबंध बनाए थे। हालाँकि दोनों ने शादी कर ली थी। अब इस मामले में कोर्ट ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उसकी सजा को माफ कर दी है। कोर्ट ने लड़की के संघर्ष को भी देखा, जो उसे बरी कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ती रही।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला 2018 का है, जब पश्चिम बंगाल में एक 14 साल की लड़की के लापता होने की शिकायत उसके परिवार ने दर्ज की थी। बाद में पता चला कि लड़की ने 25 साल के एक युवक से शादी कर ली थी। लड़की के परिवार ने इस मामले में शिकायत दर्ज की और स्थानीय अदालत ने युवक को पॉक्सो एक्ट के तहत 20 साल की सजा सुनाई थी।

साल 2023 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस व्यक्ति को बरी कर दिया था, लेकिन इसके साथ ही कोर्ट ने किशोरियों की यौन इच्छाओं और नैतिक जिम्मेदारियों पर विवादास्पद टिप्पणियाँ की थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि किशोर लड़कियों को अपनी ‘यौन इच्छाओं पर नियंत्रण‘ रखना चाहिए और समाज उन्हें ऐसे मामलों में ‘हारा हुआ’ मानता है। इन टिप्पणियों की व्यापक आलोचना हुई और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया। बीते साल यानी अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए व्यक्ति की सजा को बहाल रखा था, लेकिन सजा पर अमल को रोक दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल कमेटी का गठन किया, फिर सुनाया फैसला

इसके बाद कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को एक विशेषज्ञ समिति गठन करने का आदेश दिया, जिसमें मनोवैज्ञानिक और बाल कल्याण अधिकारी शामिल थे। इस समिति को पीड़िता की वर्तमान भावनात्मक स्थिति और सामाजिक कल्याण का आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई। समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि पीड़िता, जो अब उस व्यक्ति की पत्नी है, वो उससे भावनात्मक रूप से जुड़ी हुई है और अपने परिवार के प्रति बहुत संवेदनशील है। दोनों अब पश्चिम बंगाल में अपने बच्चे के साथ एक साथ रहते हैं।

पीड़ित लड़की के संघर्षों का भी रखा ध्यान

सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट के आधार पर कहा कि पीड़िता इस घटना को जघन्य अपराध नहीं मानती। कोर्ट ने कहा, “पीड़िता ने इसे जघन्य अपराध नहीं माना। समाज ने उसका मजाक उड़ाया, कानूनी व्यवस्था ने उसे निराश किया, और परिवार ने उसे छोड़ दिया। उसे पुलिस, कानूनी प्रक्रिया और आरोपित को सजा से बचाने की लगातार लड़ाई पड़ी।”

जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्जल भुइयाँ की बेंच ने कहा कि यह मामला ‘सभी के लिए आँखें खोलने वाला’ है और यह कानूनी व्यवस्था में खामियों को दर्शाता है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता को पहले सूचित निर्णय लेने का मौका नहीं मिला और व्यवस्था ने उसे कई स्तरों पर निराश किया। सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल 142 का उपयोग करते हुए ‘पूर्ण न्याय’ के लिए फैसला लिया कि व्यक्ति को सजा देना न्याय के हित में नहीं होगा, क्योंकि इससे परिवार टूट सकता है।

शादी का झाँसा दे हिंदू लड़की का रेप, विरोध करने पर सोहेल ने सिगरेट से दाग दिया बदन: इस्लाम कबूलने का डाल रहा था दबाव, वडोदरा में 3 गिरफ्तार

वडोदरा में हिंदू लड़की को रिक्शा चलाने वाले सोहेल नाम के मुस्लिम लड़के ने शादी का झांसा दिया। इसके बाद उसका रेप किया। उस पर धर्मांतरण का दबाव भी बनाया। जब उसने इसका विरोध किया तो उसके शरीर को सिगरेट से दाग दिया।

पूरा मामला वडोदरा के कपूराई थाना क्षेत्र का है। अजवा रोड पर रहने वाली हिंदू पीड़ित लड़की 2023 में रिक्शा चलाने वाले सोहेल नाजिम खान पठान से मिली। मोबाइल नंबर अदला-बदली के साथ दोनों में बातचीत शुरू हुई। उस समय लड़की की उम्र सिर्फ 17 वर्ष के आसपास ही थी।

बात आगे बढ़ी तो सोहेल ने लड़की से शादी करने की बात कही और उसे घुमाने लेकर जाने लगा। लड़की ने जब शादी के बारे में अपनी माँ और दादी से पूछा तो उन्होंने ये कहकर बात टाल दी कि वह और बड़ी हो जाए तब शादी के बारे में सोचेंगे।

इसके बाद 2023 में ही सोहेल उसे अपने घर ले गया और जबरदस्ती उसके साथ यौन संबंध बनाए। मीडिया रिपोर्ट्स अनुसार, पुलिस को मिली शिकायत में कहा गया है कि सोहेल ने लड़की को धर्म परिवर्तन करने के लिए भी कहा और ऐसा न करने पर जान से मारने की धमकी दी। अपने बयान में पीड़िता ने कहा है कि सोहेल ने उसे घर भी नहीं जाने दिया।

शिकायत में आगे कहा गया है कि 17 मई 2025 को सोहेल के दो दोस्त फईम और जुनैद लड़की के पास आए और उसे जान से मारने की धमकी देकर सोहेल के घर लेकर गए।

लड़की जब सोहेल के घर पहुँची तो उसने लड़की के साथ मारपीट शुरू कर दी। यहाँ तक कि उसके हाथों को भी सिगरेट से जलाया। इसके अगले दिन लड़की सोहेल के घर से भाग निकली और परिवार को इसकी जानकारी दी।

इसके बाद घरवालों ने कपूराई पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने पोक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर तीनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। साथ ही आगे की जाँच शुरू कर दी है।

पहलगाम से पहले दिल्ली में होना था अटैक, ISI ने अंसारुल अंसारी को सौंपा था टास्क: नेपाल से कैब चलाने गया था कतर, रावलपिंडी में ट्रेनिंग लेकर आया था दिल्ली की रेकी करने

पहलगाम आतंकी हमले से पहले दिल्ली को टारगेट करने की पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने साजिश रची थी। केन्द्रीय जाँच एजेंसियों ने दिल्ली से अंसारुल मियां अंसारी को और उसके सहयोगी अखलाक आजम को राँची से तीन मार्च को गिरफ्तार किया था। पहलगाम हमले से पहले दोनों की गिरफ्तारी हुई थी। इनसे पूछताछ में पता चला है कि इनलोगों ने दिल्ली को दहलाने की योजना बनाई थी।

दिल्ली पुलिस के सूत्रों के मुताबिक अंसारुल अंसारी ने दिल्ली के कई जगहों की रेकी की थी। वह भारतीय सेना के दस्तावेज भी आईएसआई तक पहुँचा रहा था। उससे पूछताछ में आईएसआई के नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है। वह दस्तावेजों की सीडी बनाकर पाकिस्तान भेजा करता था। जब उसे गिरफ्तार किया गया तो वह पाकिस्तान भागने की फिराक में लगा था। पूछताछ में पता चला है कि आईएसआई के कई एजेंट अभी भी भारत के अलग- अलग हिस्सों में छिपे हुए हैं। भारतीय एजेंसियाँ अब उनकी तलाश कर रही हैं।

अंसारुल अंसारी ने पूछताछ में बताया कि वो नेपाल का रहने वाला है। वह नौकरी की तलाश में कतर पहुँचा था और कैब चालक के रूप में काम करने लगा। कतर में उसकी मुलाकात एक आईएसआई हैंडलर से हुई। उसे पाकिस्तान ले जाया गया और आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की खास ट्रेनिंग दी गई। अंसारुल को भारत भेजा गया और आईएसआई के अधिकारी उसके संपर्क में लगातार रहने लगे।

अंसारुल का काम आईएसआई को भारतीय सेना के गोपनीय दस्तावेज भेजने का था। वह लगातार पाकिस्तानी नागरिक के संपर्क में था। उसे नेपाल के रास्ते भारत भेजा गया था।

अंसारुल को भारत में मदद करने वाला राँची का रहने वाला अखलाक आजम था, जिसे मार्च 2025 में गिरफ्तार किया गया। अखलाक ने अंसारुल को लॉजिस्टिक सपोर्ट और दस्तावेज इकट्ठा करने में मदद की। दोनों के मोबाइल फोन की जाँच में पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संदिग्ध बातचीत के सबूत मिले, जो एक बड़े षड्यंत्र की ओर इशारा करते हैं। दिल्ली पुलिस ने दोनों के खिलाफ आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया और मई 2025 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।

अंसारुल और अखलाक को दिल्ली की तिहाड़ जेल के हाई-सिक्योरिटी वार्ड में रखा गया है। अधिकारियों ने उनकी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी है, ताकि वे जेल में अन्य कैदियों को प्रभावित न कर सकें। जाँच एजेंसियाँ अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेजन के जंगल में रहने वाले लोगों को बताया ‘पोर्न एडिक्ट’, इंटरनेट यूज देखने गया था पत्रकार: जनजाति समाज ने ठोका मुकदमा, कहा- हमारी छवि बिगाड़ी

ब्राज़ील की अमेज़न क्षेत्र की एक स्वदेशी जनजाति ने अमेरिकी समाचार पत्र द न्यूयॉर्क टाइम्स पर मुकदमा ठोंक दिया है। इस जनजाति का आरोप है कि NYT की एक रिपोर्ट में उन्हें तकनीक से प्रभावित और पोर्न देखने के आदी के रूप में गलत तरीके से दिखाया गया। इस जनजातीय समूह ने आरोप लगाया है कि इस रिपोर्ट से उनकी छवि को नुकसान पहुँचा है।

NYT की रिपोर्ट में किए गए चित्रण और उस पर आई प्रतिक्रियाओं से जनजाति के लोगों में गहरा आक्रोश है। NYT के खिलाफ यह मुकदमा अमेजन के जंगलों की जावरी घाटी में रहने वाली मारुबो जनजाति ने ठोंका है। यह जनजाति लगभग 2,000 लोगों का समुदाय है।

यह मुकदमा लॉस एंजिल्स की एक अदालत में दाखिल किया गया है। इसके अलावा, मुकदमे में TMZ और Yahoo को भी प्रतिवादी बनाया गया है। जनजाति के लोगों का आरोप है कि इन मीडिया संस्थानों ने NYT की रिपोर्ट को बढ़ा-चढ़ाकर और सनसनीखेज तरीके से दिखाया है, इससे उनकी छवि खराब हुई है।

मारुबो जनजाति ब्राज़ील के अमेज़न जंगल के सबसे दुर्गम क्षेत्रों में से एक में रहती है। यह जनजाति इटुई नदी के किनारे सैकड़ों मील तक फैले 20 अलग-अलग गाँवों में सामुदायिक झोपड़ियों में निवास करती है, और इनका अधिकांश इलाका ऐसा है जहाँ पहुँचना बहुत कठिन होता है।

एलन मस्क की स्टारलिंक सेवा के आने के बाद अमेज़न की अलग-थलग मारुबो जनजाति की दुनिया बदल गई है। मारुबो लोगों को लगभग 15,000 डॉलर प्रति यूनिट कीमत वाले 20 स्टारलिंक एंटेना मिले, जिनसे उन्हें बाहरी दुनिया से हाई-स्पीड इंटरनेट कनेक्शन प्राप्त हुआ।

इसके दो साल बाद NYT के पत्रकार जैक निकास वहाँ रिपोर्टिंग के लिए पहुँचे और इस बदलाव को एक दिलचस्प कहानी मानते हुए इसे कवर किया। हालाँकि, मारुबो लोगों द्वारा दायर मानहानि मुकदमे के अनुसार, NYT रिपोर्ट में उन्हें पोर्न का लती बताया गया।

जनजातियों के अनुसार, NYT की रिपोर्ट में मारुबो समुदाय को इस तरह दिखाया गया है जैसे वे इंटरनेट जैसी आधुनिक तकनीक को संभाल नहीं पा रहे हों। रिपोर्ट में विशेष रूप से इस आरोप को उजागर किया गया है कि उनके युवा पोर्नोग्राफी के आदी हो गए हैं, जिससे जनजातियों की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है।

मुकदमे में कहा गया, “ये बातें न केवल भड़काऊ थीं बल्कि आम पाठक को यह संदेश देती थीं कि इंटरनेट एक्सेस के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में मारुबो लोग नैतिक और सामाजिक पतन की ओर बढ़ गए हैं। इस तरह के चित्रण सांस्कृतिक टिप्पणी से कहीं आगे जाते हैं, वे सीधे तौर पर पूरे लोगों के चरित्र, नैतिकता और सामाजिक प्रतिष्ठा पर हमला करते हैं और यह दिखाते हैं कि जनजातीय लोगों के पास आधुनिक दुनिया में काम करने के लिए अनुशासन या मूल्यों की कमी है।”

NYT ने कहा है कि वह इस मुकदमे से अपना जोरदार बचाव करेगा। NYT के प्रवक्ता ने कहा, “इस लेख को निष्पक्ष रूप से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यह एक दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले स्थानीय लोग में नई तकनीक के फायदे और उसकी जटिलताओं की एक संवेदनशील और सूक्ष्म पड़ताल है, जिसकी अपनी गौरवशाली इतिहास और संरक्षित संस्कृति है।”

सिंध, बलूचिस्तान, गिलगित… पाकिस्तान से अलग होना चाहता है हर राज्य: क्या रिपीट होगा ‘बांग्लादेश’ वाला चैप्टर, जानिए इस्लामी मुल्क में चल रहीं आजादी की कितनी लड़ाई

भारत में आतंकी भेजने और पहलगाम में निर्दोषों की हत्या के लिए खाद पानी देने वाला पाकिस्तान खुद विभाजन की तरफ बढ़ रहा है। भारत से युद्ध की गीदड़भभकी देने वाले पाकिस्तान में लगातार कई समूह आजादी की लड़ाई तेज कर रहे हैं। खराब आर्थिक हालातों से जूझता पाकिस्तान इन आवाजों को दबाने में भी विफल है।

पाकिस्तान में सिंधी, बलूच और पश्तून समुदाय लंबे समय से आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं। वह अपना अलग देश बनाना चाहते हैं। इन समुदायों का पाकिस्तान और उसकी फ़ौज लगातार शोषण करती आई है। इनसे लगातार भेदभाव किया जाता है।

भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए सैन्य तनाव के बीच, बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने पाकिस्तान से आजादी के लिए अपने आंदोलन को दोबारा चालू कर दिया है। उन्होंने अपनी आजादी की घोषणा भी कर दी है। बलूचों के अलावा अब पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भी आजादी की माँग उठी है।

सिंध प्रांत को पाकिस्तान से आजाद करके सिंधु देश के अलग देश के निर्माण की माँग करने वाले संगठन ‘जय सिंधु स्वतंत्रता आंदोलन’ (JSFM) ने भी पाकिस्तान सरकार के खिलाफ अपने आजादी के अभियान को तेज कर दिया है।

इसके अलावा पश्तूनिस्तान नामक अलग देश की माँग करने वाली आवाजें भी उठी हैं। पश्तूनिश्तान की माँग करने वाले खैबर पख्तूनख्वा और उत्तरी बलूचिस्तान के हिस्सों को पाकिस्तान से अलग करके अपना देश बनाना चाहते हैं।

बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई

भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के दौरान BLA ने पाकिस्तान से आजादी की घोषणा की और संयुक्त राष्ट्र से बलूचिस्तान के लोकतांत्रिक गणराज्य को मान्यता देने का आग्रह किया। काफी कम आबादी वाले और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर बलूचिस्तान लम्बे समय से उग्रवाद से जूझ रहा है।

ऐतिहासिक रूप से, बलूचिस्तान ‘खान ऑफ कलात’ के अधीन एक स्वतंत्र देश था। हालाँकि, भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद यह मार्च 1948 में यह पाकिस्तान में शामिल हो गया। खान ऑफ कलात ने दबाव में आकर अपनी और बलूच समुदाय की इच्छा के विरुद्ध विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए थे।

इससे पहले 11 अगस्त, 1947 को अंग्रेजों की निगरानी में कलात और पाकिस्तान के बीच एक स्टैंडस्टिल समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते में कलात को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी गई थी। कलात को ही अब बलूचिस्तान के नाम से जाना जाता है।

1948 में समझौते के बावजूद पाकिस्तान ने खान ऑफ कलात को बलूचिस्तान को पाकिस्तान में विलय करने के लिए मजबूर किया। पाकिस्तान चाहता था कि बलूचिस्तान उसमे शामिल हो जाए। इस विलय के बाद से बलूचिस्तान में पाँच बार विद्रोह हो चुके हैं।

यह विद्रोह 1948, 1958, 1962, 1973-77 में हुए हैं। इसके बाद 2000 से चालू हुई लड़ाई आज तक जारी है। बलूच खुद को राजनीतिक हाशिए पर धकेले जाने, हिंसक और यातनापूर्ण दमन और संसाधनों के दोहन के चलते हथियार उठाने पर मजबूर हैं।

बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई का नेतृत्व अब BLA कर रही है। हाँलाकि, पाकिस्तान की 2009 में शुरू की गई नीति ‘मारो और फेंको’ के चलते इसके सदस्य लगातार मारे जा रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग गायब भी किए गए हैं। हजारों की संख्या में लोगों को पाकिस्तान की फ़ौज ने उठाया और वह फिर कभी वापस नहीं लौटे।

सिंध भी चाहता है स्वतंत्रता

पाकिस्तान के सिंध प्रांत की आजादी की माँग ‘जय सिंधु स्वतंत्रता आंदोलन’ (JSFM) द्वारा की जा रही है। जो सिंधु देश के एक अलग देश के गठन की वकालत करता रहा है। सिंध के लोगों की लंबे समय से माँग रही है कि सिंध का एक अलग स्वतंत्र देश हो।

अल्पसंख्यक सिंधी समुदाय ने इस्लामी मुल्क पाकिस्तान पर उर्दू थोपने और जमीन हड़पने के आरोप लगाए हैं। सिंधियों का कहना है कि पाकिस्तान उनकी स्थानीय संस्कृति को मिटा रहा है। पिछले कुछ सालों में पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा कई स्वतंत्रता समर्थक कार्यकर्ताओं को न सिर्फ मारा और प्रताड़ित किया गया है बल्कि जबरन गायब भी कर दिया गया है।

पश्तूनिश्तान की लड़ाई भी हुई तेज

पंजाबियों के बाद पश्तून पाकिस्तान में दूसरा सबसे बड़ा जातीय समूह है। ये पाकिस्तान की कुल आबादी का 15% हिस्सा हैं। यह समुदाय भी भेदभाव और उत्पीड़न के कारण एक स्वतंत्र देश की माँग कर रहा है।

पश्तूनों की बड़ी आबादी पाकिस्तान के पश्चिमी इलाके में रहती है। यह इलाका पश्तूनिस्तान अख्लाता है। इसका कुछ हिस्सा पाकिस्तान और कुछ हिस्सा अफगानिस्तान में आता है। पाकिस्तान और अफगान पश्तूनों ने 1893 में बनाई गई डूरंड लाइन के सीमांकन को खारिज किया है। यह सीमा अब अफगानिस्तान और पाकिस्तान को विभाजित करती है।

पश्तूनों का कहना है दोनों तरफ उनके लोग रहते हैं, ऐसे में वह इस सीमा को नहीं मान सकते। हाल के दिनों में पश्तून समुदाय के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व पश्तून तहफुज मूवमेंट (PTM) ने किया है। इसके मुखिया मंजूर पश्तीन हैं। मंजूर पश्तीन की आवाज भी लगातार पाकिस्तान दबाता रहा है।

लोगों की माँगों को उठाने के लिए बनाया गया PTM एक सामाजिक आंदोलन है। यह पाकिस्तान सरकार और पाकिस्तानी फ़ौज की मनमानी और हर तरह के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता है। इसके भी कई कार्यकर्ताओं को पाकिस्तान की फ़ौज ने यातनाएँ दी हैं।

गिलगित और बाल्टिस्तान में भी उठी आवाज

पाकिस्तानी फौज को गिलगित-बाल्टिस्तान में रहने वाले लोगों से भी प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। गिलगित-बाल्टिस्तान उस पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर का हिस्सा है, जिसे पाकिस्तान ने अवैध रूप से कब्जा रखा है।

प्राकृतिक और भौगोलिक रुप से सुंदर इस क्षेत्र को पाकिस्तानी सरकार द्वारा नजरअंदाज किया गया है। गिलगित-बाल्टिस्तान रणनीतिक रूप से भी काफी महत्वपूर्ण क्षेत्र है, क्योंकि यह उत्तर में अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर, उत्तर-पश्चिम में चीन के शिनजियांग प्रांत, पूर्व में लद्दाख और दक्षिण में कश्मीर से घिरा हुआ है।

पाकिस्तानी सरकार की लापरवाही के कारण इस क्षेत्र में रहने वाले लोग मुश्किलों से भरी जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं। इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ विकास का भी अभाव है। यहाँ के स्थानीय लोगों ने पाकिस्तानी फ़ौज पर उनकी जमीनों पर अवैध कब्जा करने का आरोप लगाया है।

धार्मिक आधार पर भारत को विभाजित करके बनाए गए इस्लामी देश पाकिस्तान में कई अलगाव की आवाजें उठती आई हैं। इसका कारण पाकिस्तान की अपनी कोई पहचान नहीं होना है। पाकिस्तान के चार प्रदेशों में रहने वाले लोगों को लगातार प्रताड़ित किया जाता है।

इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यह है कि पाकिस्तान को उसकी जनता द्वारा चुनी गई सरकार नहीं बल्कि फ़ौज चलाती है। यह फ़ौज इस्लाम के आधार पर चलती है। पाकिस्तानी फ़ौज के हाथों मारे जाने के डर के चलते सिंधी हो या बलूच, सभी आजादी चाहते हैं।

आजादी की यह चिंगारी उत्तर में गिलगित बाल्टिस्तान से लेकर अफगान सीमा पर FATA और सिंध तथा बलूचिस्तान तक लग चुकी है। यह कोई पहली बार नहीं है कि पाकिस्तान की फ़ौज किसी जातीय समूह पर अपनी इस्लामी थोप रही हो।

इससे पहले पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले बंगाली लोगों के खिलाफ पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा इसी तरह की दमनकारी नीतियाँ लागू की गई थी। इसकी वजह से 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम हुआ और बांग्लादेश के रूप में एक स्वतंत्र देश का गठन हुआ। इस बार लगी चिंगारी का अंत भी पाकिस्तान के नए विभाजनों के रूप में नजर आ रहा है।



बंगाल में कुल्हाड़ी से काट डाले गए हिंदुओं पर ‘चाय की चुस्की’, पाकिस्तानी गोलाबारी के पीड़ितों का दर्द बाँटने कश्मीर पहुँच गए TMC सांसद: ये पाखंड नहीं तो और क्या?

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) का पाँच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल जम्मू-कश्मीर गया। दावा है कि वो पाकिस्तानी गोलीबारी से पीड़ित लोगों का दर्द बाँट रहे हैं। यह राजनीतिक पाखंड से अधिक कुछ नहीं है, क्योंकि जिस राज्य के लोगों ने टीएमसी को चुना है, वहाँ संदेशखाली से लेकर मुर्शिदाबाद तक हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को लेकर न सिर्फ टीएमसी चुप रही, बल्कि उसके नेताओं का हिंसा की इन घटनाओं में हाथ भी सामने आया।

बंगाल के हिंदुओं का दर्द बाँटने को लेकर टीएमसी की ‘गंभीरता’ इस बात से भी समझी जा सकती है, जब मुर्शिदाबाद में हिंदुओं में कत्लेआम हो रहा था, तब उसके सांसद चाय की चुस्की लेते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे थे।

कश्मीर में टीएमसी की दिखावटी सहानुभूति

टीएमसी का पाँच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 21 मई से 23 मई 2025 तक जम्मू-कश्मीर के दौरे पर रहा। इस प्रतिनिधिमंडल में डेरेक ओ’ब्रायन, सागरिका घोष, नदीमुल हक, ममता ठाकुर और पश्चिम बंगाल के मंत्री मनस रंजन भुनिया शामिल थे। कथित तौर पर ये लोग ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान की तरफ से हुई गोलीबारी से प्रभावित लोगों का दर्द बाँटने गए। डेरेक ओ’ब्रायन ने पुंछ में कहा, “हम यहाँ इन परिवारों को यह बताने आए हैं कि हम उनके साथ हैं।”

सागरिका घोष ने भी कहा कि जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गाँवों ने सबसे ज्यादा दुख झेला है और वे यह बताने आए हैं कि वे अकेले नहीं हैं। यह सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या टीएमसी वाकई में इतनी संवेदनशील है, जितना वह दिखाने की कोशिश कर रही है?

मुर्शिदाबाद और संदेशखाली को लेकर चुप्पी

अब जरा पश्चिम बंगाल की तरफ नजर डालें। मुर्शिदाबाद में हाल ही में वक्फ (संशोधन) बिल के विरोध की आड़ में जो हिंसा हुई, उसने हिंदुओं को निशाना बनाया। कलकत्ता हाई कोर्ट द्वारा गठित एक जाँच समिति की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि यह हिंसा टीएमसी नेताओं की शह पर हुई। धुलियन शहर में टीएमसी के स्थानीय पार्षद मेहबूब आलम ने हमलों का नेतृत्व किया।

मेहबूब आलम हमलावरों के साथ समसेरगंज, हिजलतला, शिउलीतला और डिगरी से आए नकाबपोश मुस्लिमों के साथ मौके पर मौजूद था। हमलावरों ने हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाया। इसके बाद स्थानीय विधायक अमीरुल इस्लाम भी वहाँ पहुँचा। उसने उन घरों की पहचान की जो अभी तक नहीं जले थे, और हमलावरों ने उन घरों में भी आग लगा दी। अमीरुल इस्लाम ने हिंसा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि चुपचाप वहाँ से खिसक गया। यही नहीं, उसने मीडिया में बयान में कहा कि हिंसा में बाहरी लोग शामिल थे, जबकि वो खुद हिंसा में शामिल था।

जाँच समिति ने यह भी बताया कि स्थानीय पुलिस पूरी तरह निष्क्रिय रही। जब पीड़ितों ने मदद के लिए पुलिस को फोन किया, तो कोई जवाब नहीं मिला। यह सब स्थानीय पुलिस स्टेशन से महज 300 मीटर की दूरी पर हुआ। पुलिस पूरी तरह से ‘निष्क्रिय और अनुपस्थित’ रही। इस मामले में बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा भी कि, “हिंदुओं के खिलाफ हिंसा सुनियोजित तरीके से की गई। ममता बनर्जी इन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कब करेंगी? क्या वे मृतकों के बारे में अपनी पार्टी के नेताओं की अपमानजनक टिप्पणियों के लिए माफी माँगेंगी?”

मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के घर जलाए गए, उनकी पानी की पाइपलाइन काट दी गई ताकि आग बुझाई न जा सके, महिलाओं के कपड़े जला दिए गए ताकि वे अपने तन को न ढक सकें। कई लोगों को कुल्हाड़ी से काट डाला गया। कलकत्ता हाई कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट साफ लिखा है कि मुर्शिदाबाद हिंसा में हिंदुओं को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। ऐसे में सवाल तो पूछा ही जाएगा कि क्या टीएमसी का कोई प्रतिनिधिमंडल वहाँ गया? क्या ममता बनर्जी ने इस हिंसा की निंदा की? नहीं, बल्कि उनकी पार्टी के ही सांसद ने यह कहकर मामले को हल्का करने की कोशिश की कि इसमें बाहरी लोग शामिल थे।

संदेशखाली का मामला भी इससे अलग नहीं है। वहाँ टीएमसी के स्थानीय नेता शेख शाहजहाँ और उसके गुर्गों ने स्थानीय हिंदुओं, खासकर महिलाओं के साथ जो अत्याचार किए, वो किसी से छिपे नहीं हैं। जमीन हड़पने से लेकर यौन शोषण तक के आरोप लगे, लेकिन ममता बनर्जी ने शुरू में इसे ‘बीजेपी की साजिश’ करार दे दिया। बाद में जब जाँच हुई तो शाहजहाँ को गिरफ्तार करना पड़ा, लेकिन टीएमसी ने इस मामले में भी कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। फिर आरजे कर अस्पताल में महिला डॉक्टर की रेप-हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तक हैरानी जताई, लेकिन ममला सरकार को इससे भी फर्क नहीं पड़ा।

ऑपरेशन सिंदूर पर टीएमसी का दोहरा रवैया

ऑपरेशन सिंदूर भारत की तरफ से 7 मई 2025 को शुरू किया गया एक सैन्य अभियान है, जो 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले का जवाब था। इस हमले में सैलानी बन कर पहुँचे हिंदुओं को मारा गया। भारत ने इसके जवाब में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसमें 100 से ज्यादा आतंकी मारे गए। इसके बाद पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की और सीमा पर गोलीबारी शुरू कर दी, जिसमें पुंछ, राजौरी और बारामूला जैसे इलाकों में 15 से ज्यादा नागरिक मारे गए और दर्जनों घायल हुए।

इसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर को लेकर दुनिया भर में अपनी बात रखने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया। इसमें टीएमसी के सांसद यूसुफ पठान का नाम भी शामिल था। लेकिन टीएमसी ने इसे लेकर हंगामा खड़ा कर दिया। ममता बनर्जी ने कहा कि केंद्र सरकार यह तय नहीं कर सकती कि टीएमसी की तरफ से कौन प्रतिनिधि जाएगा। यूसुफ पठान ने प्रतिनिधिमंडल में जाने से इनकार कर दिया। बाद में जब विवाद बढ़ा तो अभिषेक बनर्जी को भेजा गया, जिसपर बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने सवाल भी उठाए। इन सबके बीच अब उसी ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रभावित इलाकों में जाकर टीएमसी सहानुभूति दिखाने की कोशिश कर रही है। यह साफ तौर पर दोहरा चरित्र है।

ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति

ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की राजनीति हमेशा से तुष्टिकरण पर आधारित रही है। पश्चिम बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के कई मामले सामने आए हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने कभी भी इसकी खुलकर निंदा नहीं की। मुर्शिदाबाद में हिंदुओं पर हमले के बाद ममता बनर्जी से कार्रवाई की माँग की गई, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उलटे टीएमसी के कुछ नेताओं ने इसे बाहरी लोगों की साजिश बताकर पल्ला झाड़ लिया।

संदेशखाली में भी ममता बनर्जी ने शुरू में पीड़ितों की बजाय अपने नेताओं का बचाव किया। यहाँ शेख शाहजहाँ के गुंडे खुलेआम हथियार लेकर घूम रहे हैं और अब भी हिंदुओं को आतंकित कर रहे हैं। यही नहीं, टीएमसी ने जिस महिला को लोकसभा चुनाव का टिकट दिया, उसने तो यहाँ तक कह दिया कि संदेशखाली की महिलाएँ पीड़ित ही हैं, ये हम कैसे मान लें।

पश्चिम बंगाल में इतना सब कुछ होने के बाद भी टीएमसी ने ‘प्रतिनिधिमंडल’ भेजना जैसा कदम नहीं उठाया, बल्कि महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, एससी आयोग तक को पीड़ितों तक पहुँचने से रोका। दूसरी तरफ ‘युद्ध’ के समय पाकिस्तानी गोलाबारी में घायल हुए लोगों से ‘मुलाकात’ के लिए अपना प्रतिनिधिमंडल भेज दिया।

ऐसे में बीजेपी नेता सुवेंदु अधकारी ने इस दौरे को ‘निजी यात्रा’ करार दिया और कहा, “पश्चिम बंगाल में गर्मी ज्यादा है, इसलिए ये लोग कश्मीर चले गए, जहाँ मौसम सुहाना है। ये लोग पश्चिम बंगाल और हिंदू विरोधी हैं। इन्हें अपने राज्य में कोई दिलचस्पी नहीं है।” सुवेंदु का यह बयान भले ही तीखा लगे, लेकिन इसमें सच्चाई है। टीएमसी ने अपने राज्य के मुर्शिदाबाद और संदेशखाली जैसे इलाकों में पीड़ितों की सुध लेने की बजाय कश्मीर में जाकर सहानुभूति दिखाने का नाटक किया।

आखिर ये नौटंकी क्यों कर रही है टीएमसी?

टीएमसी का यह कश्मीर दौरा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश है। ममता बनर्जी हमेशा से खुद को एक राष्ट्रीय नेता के तौर पर पेश करने की कोशिश करती रही हैं। लेकिन उनकी यह कोशिश तब हास्यास्पद लगती है, जब उनके अपने राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा और संदेशखाली में महिलाओं के साथ अत्याचार के बाद भी टीएमसी ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। लेकिन कश्मीर में जाकर वे सहानुभूति का ढोंग कर रहे हैं।

सागरिका घोष ने कहा कि वे अपने अनुभव को पार्टी नेतृत्व के सामने रखेंगी ताकि सीमा क्षेत्रों की समस्याएँ राष्ट्रीय स्तर पर उजागर हो सकें। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे मुर्शिदाबाद और संदेशखाली की समस्याओं को भी राष्ट्रीय स्तर पर उठाएँगी? क्या वे अपनी ही पार्टी के उन नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करेंगी, जिनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने के सबूत हैं? जवाब है- नहीं। क्योंकि ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की राजनीति वोटबैंक पर टिकी है, और वे अपने इस वोटबैंक को नाराज नहीं करना चाहतीं।

बतौर पत्रकार के तौर पर मैं यह कह सकता हूँ कि टीएमसी की यह कश्मीर यात्रा महज एक दिखावा है। अगर वाकई में ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को पीड़ितों की फिक्र होती, तो वे सबसे पहले अपने राज्य के मुर्शिदाबाद और संदेशखाली में पीड़ितों से मिलने जाते। लेकिन वहाँ जाने की बजाय वे कश्मीर में जाकर सहानुभूति दिखाने का नाटक कर रहे हैं। यह साफ तौर पर उनकी तुष्टिकरण की राजनीति और दोहरे चरित्र को दिखाता है।

बहरहाल, अब ममता बनर्जी को चाहिए कि वे पहले अपने राज्य में कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करें। मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें। संदेशखाली में पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाएँ। अगर वे ऐसा नहीं करतीं, तो कश्मीर में उनकी यह सहानुभूति यात्रा सिर्फ एक नौटंकी ही कहलाएगी। पश्चिम बंगाल की जनता यह सब देख रही है और आने वाले दिनों में वह इसका जवाब जरूर देगी।

सरकारी जमीन पर दुकानें, ₹50 लाख का ट्रांजेक्शन: भोपाल ‘मुस्लिम गैंग’ का सरगना फरहान अवैध कब्जे से करता था ‘कमाई’, फिर उसी पैसों से हिंदू लड़कियों का करता था शिकार

मध्य प्रदेश के भोपाल में कॉलेज छात्राओं के साथ ब्लैकमेल और रेप करने वाले ‘मुस्लिम गैंग’ के मास्टरमाइंड फरहान के बारे में नित नए खुलासे हो रहे हैं। जाँच में पुलिस को पता चला है कि फरहान सरकारी जमीन और नाले पर दुकानें बनाकर उससे हजारों रुपए कमा रहा था। इसके अलावा 2 बैंक अकाउंट्स से लगभग 50 लाख रुपए के लेनदेन की बात भी सामने आई है।

क्या था मामला

11 अप्रैल 2025 को भोपाल के बागसेवनिया थाना में कॉलेज जाने वाली कुछ छात्राओं ने शिकायत की कि उन्हें मुस्लिम लड़कों ने ब्लैकमेल किया, उनका वीडियो बनाया और धमकी देकर रेप किया गया।

FIR के बाद पुलिस ने ‘मुस्लिम गैंग’ के आरोपितों की गिरफ्तारी शुरू की गई। लव जिहाद के इस खेल में पुलिस ने फरहान, साद, साहिल, अली और नबी को गिरफ्तार किया। एक आरोपित अबरार अभी तक फरार है। जाँच में यह भी पता चला कि यह गैंग संगठित तरीके से हिंदू लड़कियों को टारगेट करती थी और धर्मांतरण के लिए भी मजबूर करती थी।

दुकानों से होती थी फरहान की ऐश

इस पूरे मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी अपनी जाँच रिपोर्ट मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और राज्यपाल मंगुभाई पटेल को सौंपी थी। इसमें उन्होंने ‘मुस्लिम गैंग’ के लिए हो रही फंडिंग और उनके लाइफस्टाइल के बारे में और गहन पड़ताल करने के सुझाव दिए थे।

पूरे मामले की जाँच के लिए SIT कमेटी गठित की गई। जाँच में सामने आया कि फरहान ने ऐशबाग इलाके में नाले के पास वॉशिंग सेंटर और नाश्ते की दुकान बना रखी थी। जाँच के दौरान प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर इन दुकानों को तोड़ दिया है।

फरहान के 2 बैंक अकाउंट हैं। यूनियन बैंक और एचडीएफसी बैंक में खुले खातों में कुल 50 लाख रुपए से भी अधिक का लेन देन हुआ है। पुलिस बैंक अकाउंट में हुए ट्रांजैक्शन की जाँच कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मामले की जाँच कर रही डीसीपी जोन-1 प्रियंका शुक्ला ने बताया कि फरहान के पिछले 9 साल के बैंक रिकॉर्ड जा रहे हैं। इसमें लगभग 50 लाख से भी अधिक के लेनदेन की पुष्टि हुई है। पुलिस को जाँच में ये भी सामने आया है कि सेकंड हैंड गाड़ियों की खरीद फरोख्त से फरहान को हर महीने 80,000 से ₹1 लाख तक की कमाई हो रही थी।

ट्रेडिंग के लिए लड़कियों के खाते का इस्तेमाल

मीडिया रिपोर्ट्स में ये बात भी सामने आई है कि फरहान शेयर बाजार में ट्रेडिंग करने के लिए कई पीड़ित लड़कियों के बैंक खातों का उपयोग करता था। इसके लिए उसके फेर में आई किसी छात्रा का बैंक खाता उपयोग करता था। पुलिस इस एंगल पर भी जाँच कर रही है कि फरहान मनी म्यूल एकाउंट की तरह इन खातों का इस्तेमाल कर रहा था।

फरहान लड़कियों को लुभाने के लिए हाई-फाई लाइफस्टाइल अपनाता था। अवैध दुकानों की कमाई से कई महँगे गैजेट्स और स्पोर्ट बाइक खरीदता था।

मुस्लिम गैंग के सरगना फरहान ने पुलिस पूछताछ में बताया कि उसे हिन्दू लड़कियों का रेप करने, उन्हें फँसाने और वीडियो के बहाने धमकाने का कोई भी पछतावा नहीं है। उसने पुलिस को बताया है कि यह इस्लाम के हिसाब से सवाब का काम है।

बहस वक्फ पर, दलीलों में खूब हुआ हिंदू-मुस्लिम: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, CJI ने की ‘मोक्ष’ की बात; कपिल सिब्बल ने बताया ‘अल्लाह को समर्पण’

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना अंतरिम आदेश सुरक्षित रखा है। इसमें ‘अदालतों द्वारा वक्फ, वक्फ बाई यूजर या वक्फ बाई डीड’ घोषित संपत्तियों को गैर-अधिसूचित करने की शक्ति भी शामिल है।

तीन दिनों तक इस मुद्दे पर सुनवाई हुई और कोर्ट ने आदेश सुरक्षित रख लिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता और सरकार का पक्ष जाना। इस दौरान सीजेआई गवई ने कहा कि रजिस्ट्रेशन की जरूरत 1923 और 1954 के कानूनों में भी रही है।

21 मई को सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजातियों की सुरक्षा के लिए प्रावधान बना है, जो अनुसूचित क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाली भूमि पर वक्फ के निर्माण पर रोक लगाती है।

सीजेआई गवई ने जब सॉलिसिटर से इस दलील के बारे में पूछा तो तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ का निर्माण अपरिवर्तनीय है। इससे आदिवासी समुदाय के लोगों के अधिकारों पर खराब असर पड़ सकता है। मेहता के मुताबिक “जेपीसी का कहना है कि आदिवासी इस्लाम का पालन कर सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान है।”

हालाँकि जस्टिस मसीह ने इससे असहमति जाहिर की। उन्होंने कहा “यह सही नहीं लगता। इस्लाम इस्लाम है! धर्म एक ही है।”

इसपर तुषार मेहता ने कहा कि कि अगर ऐसा है तो अधिनियम पर रोक लगाने का कोई आधार नहीं दिख रहा है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा, “वक्फ केवल दान है, और इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है।” इसका कपिल सिब्बल ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि वक्फ ईश्वर का समर्पण है परलोक के लिए। ये केवल समुदाय के लिए दान नहीं बल्कि ईश्वर के लिए समर्पण है। इसका मकसद अपनी खुशी है। इस पर सीजेआई गवई ने कहा कि हिन्दुओं में मोक्ष की अवधारणा है वहीं जस्टिस मसीह ने कहा कि ईसाई धर्म में भी स्वर्ग की आकांक्षा है।

इससे पहले दलील देते हुए राजीव धवन ने कहा कि वेदों के मुताबिक हिन्दू धर्म में मंदिर अनिवार्य अंग नहीं है बल्कि प्रकृति की पूजा करने का प्रावधान है जैसे पृथ्वी, जल, वायु, समुद्र, आकाश, सूर्य आदि।

गैर मुस्लिमों द्वारा वक्फ बनाने पर रोक को लेकर भी एसजी मेहता ने दलीलें दी। उन्होंने कहा कि केवल 2013 के संशोधन में गैर मुस्लिमों को ऐसे अधिकार दिए गये थे। 1923 के कानून में इसकी मंजूरी नहीं है क्योंकि इसका इस्तेमाल धोखा देने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने कहा, ” किसी भी मामले में गैर-मुस्लिम वक्फ को दान कर सकते हैं। अगर मैं हिंदू हूँ तो मैं वक्फ को दान कर सकता हूँ। अगर मैं हिंदू हूँ और वास्तव में वक्फ बनाना चाहता हूं तो मैं ट्रस्ट बना सकता हूँ।”

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पहले जब वक्फ अधिनियम 1995 को चुनौती देनेवाली याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में दायर की जाती थी तो उन्हें हाईकोर्ट भेजा जाता था। 2025 के संशोधन अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को लेकर भी ऐसा ही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रावधान ‘अत्यधिक असंवैधानिक’ नहीं है, जिसे अंतिम चरण में रोक लगाई जा सके।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलीलें रखीं। कपिल सिब्बल ने कहा कि अधिनियम की धारा 3सी का प्रावधान सरकार को केवल राजस्व प्रविष्टियों को बदलने का अधिकार देता है और इससे वक्फ संपत्ति का मालिकाना हक या कब्जा पर असर नहीं पड़ेगा।

सिब्बल ने कहा कि प्रावधानों की भाषा साफ है कि संपत्ति को तब तक वक्फ नहीं माना जा सकता जब तक कि सरकारी अधिकारी इस बात की पुष्टि नहीं करता कि सरकारी संपत्ति पर अतिक्रमण हुआ है या नहीं। उन्होंने कहा कि जब कानून की भाषा ऐसी है तो न तो सरकार के हलफनामे से और न ही सॉलिसिटर के समझाने से इसका अर्थ बदलेगा। उन्होने कहा कि प्रावधान का असर ये है कि विवाद की स्थिति में वक्फ बाय यूजर संपत्तियों की मान्यता रद्द की जा सकती है।

अपना तर्क देते हुए सीनियर एडवोकेट राजीव धवन के कहा कि वक्फ जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है। ये जेपीसी की रिपोर्ट के विपरीत है। उन्होने कहा कि दान इस्लामी आस्था का अहम हिस्सा है।

वहीं सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि संशोधित धारा 36 (1) के मुताबिक अधिनियम वक्फ बाय यूजर को अब समाप्त कर दिया गया है ऐसे में इसको रजिस्टर्ड कैसे किया जा सकता है? सिंघवी ने कहा कि ऐसा कोई अधिनियम नहीं है जिसमें ये शर्त रखा गया हो कि मुस्लिम को 5 साल तक धर्म का पालन करना ही चाहिए