Home Blog Page 3745

‘तमीज नहीं है क्या… क्यों नहीं दे रही तू’: महिला अधिकारी के साथ कॉन्ग्रेस विधायक ने की फोन पर अभद्रता, Video वायरल

राजस्थान के पूर्व मंत्री व मांडल से कॉन्ग्रेस विधायक रामलाल जाट की हुरड़ा तहसीलदार स्वाति झा के साथ बातचीच की ऑडियो सामने आई है। ऑडियो में रामलाल जाट महिला तहसीलदार से तू-तड़ाक करते सुनाई पड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि पहले कॉन्ग्रेस विधायक ने तहसीलदार से फोन पर अभद्रता से बात की और फिर उन्हें एपीओ कर दिया गया।

घटना के बाद राजस्थान तहसीलदार सेवा परिषद में नाराजगी है। इस संबंध में तहसीलदार सेवा परिषद ने राम लाल जाट के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित कर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखा है। इसमें उन्हें मामले की जानकारी दी गई है। साथ ही परिषद ने माँग की है कि अगर मामले में सही कार्रवाई नहीं की गई तो उन्हें राज्यव्यापी आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

RTS ने लिखा मुख्यमंत्री को पत्र

परिषद का कहना है कि फोन पर विधायक रामलाल ने तहसीलदार स्वाति झा से अमर्यादित और अभद्र तरीके से बातचीत कर धमकाया। उसके कुछ ही घंटों के बाद राजस्व मंडल ने स्वाती झा को पोस्टिंग की प्रतीक्षा में रखते हुए एपीओ करने के आदेश जारी कर दिए। इतना ही नहीं, कुछ समय बाद विधायक के व्यक्ति तहसीलदार के घर पहुँचे और वहाँ काम करने वाले एक दलित के साथ मारपीट भी की गई। इस संबंध में गुलाबपुरा थाने में केस दर्ज है।।

परिषद की माँग है कि दोषियों के खिलाफ़ जाँच करके मामले में कार्रवाई हो और रामलाल जाट के ख़िलाफ विधानसभा सत्र में निंदा प्रस्ताव लाया जाए। इस बीच रामलाल जाट ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि तहसीलदार जनता के काम नहीं करती हैं। उनका कहना है कि तहसीलदार को जनता के काम तो बताने ही होंगे न। इसमें अभद्रता वाली क्या बात है।

वायरल ऑडियो में क्या बोले कॉन्ग्रेस नेता

वायरल वीडियो में सुन सकते हैं कि रामलाल जाट लगातार अपने पद की धौंस महिला अधिकारी को देते सुनाई पड़ रहे हैं। वह पूछते हैं, “तूझे बोलने की तमीज नहीं है क्या… इतना भी नहीं लगता कोई जनप्रतिनिधि तुझे फोन कर रहा है।” वहीं महिला कहती हैं, “सर आप मुझसे तू तड़ाक करके बात कर रहे हैं। आपने मुझे कभी फोन नहीं किया और आप मुझसे तमीज से भी बात नहीं कर रहे।” इतने में कॉन्ग्रेस नेता तेज आवाज में कहते हैं, “इसको नकल दे तू। क्यों नहीं दे रही है तू।”

पूरी बातचीत के दौरान महिला अधिकारी बताती हैं कि अभी ऑफिस में लोग नहीं है और उन्होंने न तो किसी से बदसलूकी की है और न उन्हें कोई फोन आया है।

इस वीडियो में महिला अधिकारी अपने दफ्तर आए युवक को लेकर बताती हैं कि उसने उन्हें रामलाल जाट का नाम लेकर धमकी दी कि वह उनका ट्रांसफर करवा देगा। इसके अलावा युवक को भी महिला अधिकारी से बदसलूकी से बात करते हुए एक अन्य वीडियो में सुना जा सकता है। वह लगातार कहती हैं कि जब लोग होंगे, तभी दस्तावेज की नकल मिलेगी।

दैनिक भास्कर से बातचीत में रामलाल जाट ने कहा कि वे एक महिला का जमीन नामांतरण का काम कराने के लिए फोन कर रहे थे और फोन पर तहसीलदार से उन्होंने कोई अभद्रता नहीं की। रामलाल जाट का ये भी कहना है कि स्वाति झा जहाँ भी रही हैं, वहाँ उनका ट्रैक रिकॉर्ड विवादित ही रहा है और वे जनता के कामों में रोड़े अटकाती हैं।

घटना वाले दिन महिला तहसीलदार के साथ क्या हुआ

पूरी घटना बात 21 मई 2021 की है। हुरड़ा तहसील कार्यालय कोविड काल में आई गाइडलाइन के मुताबिक खुला था। इस दौरान कुछ युवक आए और लैंड रिकॉर्ड विभाग से किसी डॉक्यूमेंट की कॉपी माँगने लगे। स्वाति झा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि अमूमन 3 दिन में कॉपी देने का प्रावधान है, इसलिए उन्होंने युवकों से कहा कि अगले वर्किंग डे पर यानी 24 मई को आएँ। इसी बात पर युवक बदसलूकी करने लगे। इसके बाद उन्होंने विधायक रामलाल जाट से बात करवाई। बाद में जो बात आई, उसकी ऑडियो-वीडियो ही सोशल मीडिया पर सामने आई है।

स्वाति झा ने अपने साथ हुई घटना पर CI सतीश मीणा से कहा था कि वे इस मामले में पुलिस शिकायत दर्ज करें। जब उनके लोग रिकॉर्डिंग समेत सब सबूत पेनड्राइव लेकर थाने निकले तो उनके साथ मारपीट हुई। इसके कुछ देर बाद उन्हें एपीओ कर दिया गया। उन्होंने इस फैसले के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में अपील की, जिस पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने तहसीलदार स्वाति झा के APO पर स्टे लगा दिया। फिलहाल उन्होंने वापस हुरडा तहसीलदार के तौर पर जॉइन कर लिया है। लेकिन इन सबके बीच RTS में आक्रोश बढ़ गया है।

IMA चीफ जयलाल करते हैं ईसाई धर्म का प्रचार, लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाते हैं: दिल्ली के वकील ने की शिकायत दर्ज

दिल्ली के एक वकील ने शुक्रवार (28 मई 2021) को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के प्रमुख डॉ जेए जयलाल के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस का कहना है​ कि वकील विष्णु शर्मा ने जयलाल के खिलाफ ईसाई धर्म का प्रचार करने और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाने की शिकायत दर्ज कराई है।

शर्मा ने अपनी शिकायत में कहा कि जयलाल सोशल मीडिया पर ईसाई धर्म का जिस तरह से प्रचार कर रहे हैं, उससे धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने कहा कि वो टेलीविजन पर एक डिबेट देखे, जिसमें जयलाल बाबा रामदेव को गाली दे रहे थे, उन पर आरोप लगा रहे थे और उन्हें धमका रहे थे। शर्मा ने जयलाल पर आरोप लगाया ​है कि वह मीडिया में अपने इंटरव्यू के जरिए ईसाई धर्म को बढ़ावा दे रहे थे।

मालूम हो कि आईएमए महासचिव डॉ. जयेश लेले ने गुरुवार (27 मई 2021) को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि रामदेव अपने वीडियो के जरिए कोविड-19 के इलाज और डॉक्टरों के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं। वहीं, इससे पहले जयलाल ने भी कहा था कि यदि रामदेव कोरोना टीकाकरण और आधुनिक चिकित्‍सा के खिलाफ अपने बयान वापस ले लेते हैं तो उनके खिलाफ भेजे गए नोटिसों को वापस लेने पर विचार किया जा सकता है।

गौरतलब है कि डॉ. जयलाल ने कहा था, “हमें धर्मनिरपेक्ष संस्थानों, मिशनरी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में काम करने के लिए और अधिक ईसाई डॉक्टरों की आवश्यकता है। मैं एक मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में काम कर रहा हूँ, इसलिए मेरे लिए यह एक अच्छा अवसर है कि मैं वहाँ समग्र चिकित्सा के सिद्धांतों को आगे बढ़ा सकूँ। मुझे ग्रेजुएट और इंटर्न को सलाह देने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है।” डॉ. जयलाल अपनी वेबसाइट के अनुसार क्रिश्चियन मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया, गुड सेमेरिटन क्लब और रेड क्रॉस सोसाइटी ऑफ इंडिया के भी सदस्य हैं।

बता दें कि डॉ जयलाल ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उन्होंने कहा था कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

उन्होंने ईसाई संस्थाओं में भी गॉस्पेल (ईसाई सन्देश) को साझा करने की ज़रूरत पर बल दिया था। उन्होंने IMA में अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कहा था कि आज जो भी हैं वह ‘सर्वशक्तिमान ईश्वर जीसस क्राइस्ट’ का गिफ्ट है और कल जो होंगे, वे भी उनका ही गिफ्ट होगा। उन्होंने इस दौरान मदर टेरेसा के उद्धरण का जिक्र किया था, जिन पर पहले से ही ईसाई धर्मांतरण के आरोप लगते रहे हैं। ‘क्रिस्चियन टुडे’ के इंटरव्यू में भी उन्होंने बताया कि कैसे महामारी के बावजूद ईसाई मजहब आगे बढ़ रहा है।

इसके अलावा, डॉक्टर JA जयलाल यहीं पीछे नहीं रहे। उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी सरकार इसलिए आयुर्वेद में विश्वास करती है, क्योंकि उनके सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक आस्था हिंदुत्व में है। उन्होंने दावा किया कि पिछले 3-4 वर्षों से आधुनिक मेडिसिन की जगह आयुर्वेद को लाने की कोशिश हो रही है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी और योग इत्यादि की जड़ें संस्कृत में हैं, जो हिंदुत्व की भाषा है।

बीवी को 46 बार चाकू घोंप कर मार डाला, ‘अच्छे व्यवहार’ के लिए मुस्लिम युवक की सजा तुर्की की अदालत ने घटाई

तुर्की की एक अदालत ने अपनी पत्नी की 46 बार चाकू से गोदकर हत्या करने के मामले में एक मुस्लिम युवक बेरिक एर्कोल की आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 18 साल 4 महीने कर दिया है।

डोगन समाचार एजेंसी के मुताबिक, मंगलवार (25 मई 2021) को इस मामले में टर्किश कोर्ट ने दोषी को “अन्यायपूर्ण उकसावे” और “अच्छे व्यवहार” के आधार पर अपना फैसला सुनाया है।

बता दें कि यह घटना कोन्या के सेंट्रल अनातोलियन प्राँत की है, जहाँ 18 अगस्त, 2019 को दोषी बेकिर एर्कोल ने अपनी 37 वर्षीय पत्नी टुबा एर्कोल की हत्या कर दी थी।

हत्या से पहले कई बार टुबा एर्कोल ने बेकिर एर्कोल के खिलाफ हिंसा करने की शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद बेकिर एर्कोल के खिलाफ प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किया गया था, लेकिन आदेश जारी होने के चार दिन बाद ही उसने बड़ी ही बेरहमी से अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी।

3 बच्चों का पिता है बेरिक एर्कोल

पत्नी की हत्या का दोषी बेकिर एर्कोल ने घर में झगड़ा होने के बाद अपनी पत्नी के साथ मारपीट की। इस दौरान टुबा एर्कोल ने अपनी जान बचाने के लिए भागकर गेट खोलने की कोशिश की, लेकिन घर के गलियारे में बेरिक ने 46 बार चाकू से गोदकर हत्या कर दिया। इसके बाद वह अपनी बेटी को घर में छोड़कर 2 बेटों के साथ अपनी माँ के घर चला गया और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया।

वारदात के बाद अभियोजकों ने एक प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें राक्षसी भावनाओं के साथ पत्नी की हत्या करने वाले बेरिक एर्कोल को उम्रकैद की सजा देने की माँग की गई थी। कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियोजकों ने यह भी दावा किया था कि दोषी किसी भी रूप में सजा कम किए जाने का पात्र नहीं है।

25 मई, 2021 को मामले की आखिरी सुनवाई के दौरान जजों ने शुरू में एर्कोल को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालाँकि, बाद में “अन्यायपूर्ण उकसावे” के आधार पर कोर्ट ने उसकी सजा की अवधि को घटाकर 18 साल और 4 महीने कर दिया। इसमें दोषी के तथाकथित “अच्छे व्यवहार” को भी आधार बनाया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्की आपराधिक संहिता के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि अगर अपराध “एक अन्यायपूर्ण कार्य के कारण क्रोध या गंभीर संकट की स्थिति में” किया गया हो तो आरोपित की सजा को कम किया जा सकता है।

हालाँकि, अनुच्छेद 29 (अन्यायपूर्ण उकसावे) को प्रभावित करने के लिए अपराधी जजों के फैसलों को प्रभावित करने के लिए कई तरह के बहाने बनाने की कोशिश करते हैं।

पत्नी पर लगाया धोखा देने का आरोप

अदालत में सुनवाई के दौरान अपना अंतिम बचाव करते हुए हत्यारोपी बेरिक एर्कोल ने दावा किया कि था उसकी पत्नी ने उसे धोखा दिया। एर्कोल ने कहा, “मुझे इस बात का बेहद अफसोस है। टुबा के धोखे के बारे में घर के सभी लोगों को पता था। वह पिछले दो वर्षों से मेरे करीब तक नहीं आई थी। वह हमेशा मुझसे कचरे की बदबू आने की बात कहकर दूर रहती थी। मुझे इस घटना के लिए खेद है।” बता दें कि बेरिक एर्कोल कचरा ढोने का काम करता है।

मुस्लिमों को 80% छात्रवृत्ति, ईसाइयों को सिर्फ 20%: केरल सरकार को HC ने कहा – ‘रद्द करो, असंवैधानिक है’

केरल हाईकोर्ट ने शुक्रवार (मई 28, 2021) को राज्य के मुस्लिम और लैटिन कैथोलिक/धर्मांतरित ईसाइयों को 80:20 के अनुपात में छात्रवृत्ति देने की घोषणा वाले आदेश को रद्द कर दिया। जस्टिस शाजी पी चाली और चीफ जस्टिस मणिकुमार की पीठ ने कहा कि यह आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। इसलिए राज्य में अधिसूचित सभी अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों को योग्यता-सह-साधन (Merit-cum-Means) स्कॉलरशिप मिले।

कोर्ट ने फैसले में कहा, “हम राज्य सरकार को राज्य अल्पसंख्यक आयोग के पास उपलब्ध नवीनतम जनसंख्या जनगणना के अनुसार राज्य के भीतर अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों को समान रूप से योग्यता-सह-साधन छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए आवश्यक और उचित सरकारी आदेश पारित करने का निर्देश देते हैं।”

केरल सरकार दे रही मुस्लिम अल्पसंख्यकों को वरीयता

बता दें कि इस संबंध में वकील जस्टिन पल्लीवाथुकल की ओर से याचिका दायर की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य सरकार राज्य में अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों के मुकाबले मुस्लिम समुदाय को अनुचित वरीयता दे रही है। इस मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि राज्य सरकार द्वारा समुदाय के कमजोर वर्गों को सुविधाएँ प्रदान करने में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन जब अधिसूचित अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार करने की बात आती है, तो उन्हें उनके साथ समान बर्ताव करना होगा।

फैसले में कहा गया है कि सरकार को अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करने का कोई अधिकार नहीं था। लेकिन यह एक ऐसा मामला है, जिसमें राज्य के भीतर ईसाई अल्पसंख्यक समुदाय के जनसंख्या अनुपात से उपलब्ध अधिकार को ध्यान में रखे बिना, राज्य मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय को 80% छात्रवृत्ति प्रदान कर रहा है। कोर्ट के अनुसार, यह असंवैधानिक है और किसी भी कानून द्वारा समर्थित नहीं है।

अदालत ने कहा कि तथ्यों, परिस्थितियों और कानूनों के आधार पर, मुस्लिम समुदाय को 80% और लैटिन कैथोलिक ईसाइयों और धर्मांतरित ईसाइयों को 20% योग्यता-सह-साधन छात्रवृत्ति प्रदान करके अल्पसंख्यकों को उप-वर्गीकृत करने में राज्य सरकार की कार्रवाई कानूनी रूप से नहीं टिक सकती। इसलिए कोर्ट सभी अधिसूचित अल्पसंख्यकों को समान रूप से योग्यता-सह-साधन छात्रवृत्ति प्रदान करने का आग्रह करते हुए याचिका को अनुमति देता है।

क्या है स्कॉलरशिप से जुड़ा पूरा विवाद?

उल्लेखनीय है कि पूरा विवाद राज्य सरकार द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के लिए छात्रवृत्ति योजना घोषणा करने के संबंध में है। योजना की घोषणा 11 सदस्यीय समिति द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों के अनुसार की गई थी। इस समिति को केरल में जस्टिस राजिंदर सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू करने का काम सौंपा गया था। यह सच्चर समिति भारत में मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक स्थिति पर रिपोर्ट करने के लिए गठित एक उच्च स्तरीय समिति थी।

योजना में राज्य सरकार ने डिग्री और स्नातकोत्तर करने वाले मुस्लिम छात्राओं को 5000 छात्रवृत्तियाँ प्रदान की थीं। फिर साल 2011 के फरवरी में इसे लैटिन कैथोलिक और परिवर्तित ईसाई समुदायों के छात्रों तक बढ़ा दिया गया। मगर 2015 में एक सरकारी आदेश में, कहा गया कि मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के बीच आरक्षण 80:20 के अनुपात में होगा। यानी मुसलमानों के लिए 80%, लैटिन कैथोलिक ईसाइयों और अन्य समुदायों के लिए सिर्फ 20 फीसदी।

इस बाबत याचिका दायर करके इस बात को उठाया गया कि राज्य सरकार की योजना केंद्र सरकार द्वारा साल 2006 में घोषित योजना से अलग है। याचिकाकर्ता ने बताया कि इस योजना में कहीं भी ये बात नहीं कही गई कि किसी एक अल्पसंख्यक को दूसरे अल्पसंख्यक से ज्यादा तवज्जो दी जाए। इसलिए उनकी ये माँग थी कि सभी समुदायों को बिन भेदभाव के स्कॉलरशिप दी जाए।

9 देश, घर में 700+300: क्या है मोदी सरकार का ‘वन स्टॉप सेंटर’, महिलाओं के लिए कैसे है यह एक वरदान

केंद्र सरकार ने हाल ही में (26 मई 2021) विदेशों में काम करने वाली भारतीय महिलाओं को मदद पहुँचाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत सरकार आगामी दिनों में कामकाजी महिलाओं के लिए 9 देशों में वन स्टॉप सेंटर खोलने जा रही है, जिसका उद्देश्य महिला विरोधी हिंसा से निपटना है।

इसके अन्तर्गत बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, यूएई, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और सिंगापुर में एक-एक वन स्टॉप सेंटर खेले जाएँगे। वहीं, सऊदी अरब में ऐसे 2 वन स्टॉप सेंटर खोले जाएँगे। इसके अलावा, पूरे भारत में 300 वन स्टॉप सेंटर खोले जाएँगे। विदेशों में खोले जा रहे वन स्टॉप सेंटर को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की ओर से सहयोग दिया जाएगा।

वन स्टॉप सेंटर का अर्थ एक ऐसी व्यवस्था से है, जहाँ हिंसा प्रभावित किसी भी महिला को सभी तरह की मदद एक ही छत के नीचे दी जाती है। यहाँ महिलाओं को घर जैसा माहौल दिया जाता है, ताकि वह अपनी समस्याओं को अच्छे से बता सके और जिससे उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके।

भारत सरकार ने वन स्टॉप सेंटर योजना, 1 अप्रैल 2015 में हिंसा से पीड़ित महिलाओं को मदद पहुँचाने के लिए लागू की थी, जिसे मुख्यत: ‘सखी’ के नाम से जाना जाता है। देश के कई राज्यों में इस योजना से महिलाओं को लाभ पहुँचा है। इसके तहत हर राज्य और जिले में महिलाओं की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं, जिससे उन्हें किसी भी प्रकार की हिंसा से बचाया जा सके।

हरियाणा के पंचकूला में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित ‘सखी वन स्टॉप सेंटर’ मार्च 2019 में शुरू किया गया। तब से लेकर साल 2020 तक इस सेंटर में 161 शिकायतें दर्ज हुई हैं। सेंटर में त्वरित कार्रवाई करते हुए घरेलू हिंसा से पीड़ित 90 शिकायतों का निपटारा करते हुए महिलाओं को न्याय दिलवाया गया है।

वहीं, गुरुवार (27 मई, 2021) की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में पाँच मई से जारी लॉकडाउन से अब तक सिवान जिले में संचालित ‘सखी वन स्टॉप’ सेंटर सह महिला हेल्पलाइन में करीब दो दर्जन से ज्यादा घरेलू हिंसा के मामले ऑनलाइन और ऑफलाइन दर्ज किए गए हैं। हालाँकि, उन शिकायतों के बाद उसका समाधान भी किया गया।

लॉकडाउन के दौरान में घरेलू हिंसा के जो आँकड़े सामने आए हैं वे भी वास्तविकता से परे हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्ष घरेलू हिंसा के 69 मामले, गरिमा के साथ जीने के 77 मामले,​ विवाहित महिलाओं की प्रताड़ना के 15 मामले और इसके अलावा बलात्कार और बलात्कार के प्रयास के 13 मामले दर्ज किए हैं।

वहीं, नेशनल क्राइम ब्यूरो (NCRB) के अनुसार साल 2019 में महिलाओं के खिलाफ 4.05 लाख अपराध दर्ज किए गए थे। इनमें से 1.26 लाख (30% से ज्यादा) घरेलू हिंसा के मामले थे। सबसे ज्यादा केस राजस्थान (18,432) से दर्ज किए गए थे।

इसके अलावा, एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक, दूसरे नंबर पर यौन उत्पीड़न के मामले थे। 4 लाख दर्ज अपराधों में 8 फीसदी मामले रेप से जुड़े थे। जहाँ तक प्रति लाख महिला आबादी पर अपराध दर का सवाल है तो 2019 में यह 62.4 था, जबकि 2018 में इसका औसत 58.8 ही था। ऐसे में भारत में पहले से खुले वन स्टॉप सेंटर के तहत कई महिलाओं को मदद मिली।

गौरतलब है कि वन-स्टॉप सेंटर राष्ट्रीय महिला सशक्तिकरण को बल देने के लिए एक योजना है। महिलाओं के हितों को ध्यान में रखते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इसे तैयार किया है। इसके जरिए पूरे देश में सिलसिलेवार तरीके से सार्वजनिक और निजी दोनों जगहों पर हिंसा से प्रभावित महिलाओं को एक ही जगह पर लाकर उनकी मदद की जाती है। इस सेंटर में किसी भी तरह की हिंसा झेल रही कोई भी महिला बलात्कार, लैंगिक हिंसा, घरेलू हिंसा, छेड़छाड़, एसिड अटैक पीड़िता, कार्यस्थल पर यौन शोषण जैसे मामलों में सीधा यहाँ जा सकती है। इस केंद्र में महिलाओं को बहुत सारी सुविधाएँ एक जगह पर मुहैया कराई जाती हैं। भारत में अभी करीब 700 वन स्टॉप सेंटर काम कर रहे हैं।

दरअसल, एक महिला को किसी भी तरह की हिंसा झेलने पर तुरंत उसे कई तरह की मदद की जरूरत पड़ सकती है, जैसे मेडिकल सपोर्ट, कानूनी सहायता, कई बार अस्थायी रूप से रहने के लिए स्थान, मानसिक और भावनात्मक सहयोग इत्यादि। दिसंबर 2012 में निर्भया गैंगरेप के बाद उषा मेहरा कमीशन ने फरवरी 2013 में ‘वन स्टॉप सेंटर’ की सिफारिश की थी, ताकि महिलाओं को सभी मदद एक ही स्थान पर मिल जाए और उसे अलग-अलग जगहों पर भटकने की जरूरत न पड़े। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने भारत में वन स्टॉप सेंटर योजना की शुरुआत की थी।

वन स्टॉप सेंटर में हिंसा से पीड़ित महिला अपने बच्चों के साथ अस्थायी रूप से रह सकती हैं, जहाँ उन्हें सभी मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने की व्यवस्था का प्रावधान होगा। यदि उसे लंबे समय के लिए यहाँ आश्रय की जरूरत होगी, तो इसके लिए भी पूरी व्यवस्था की जाएगी। इसके साथ ही यहाँ महिलाओं को कानूनी सहायता भी प्रदान की जाएगी।

विदेशों में भारतीय प्रवासियों की संख्या को देखते हुए भारत सरकार की तरफ से इन देशों की पहचान की गई है, जहाँ वन स्टॉप सेंटर खोले जाएँगे। इन्हें खोलने का उद्देश्य इन देशों में काम करने वाली भारतीय महिलाओं को हिंसा से बचाना और उन तक सभी सहायता पहुँचाना है। 9 देशों के अलावा आगे इन केंद्रों को अन्य देशों में भी शुरू किया जाएगा।

यह सर्वविदित है कि विदेशों में काफी भारतीय महिलाएँ काम करती हैं। इस दौरान उनके साथ कार्यस्थल पर होने वाले उत्पीड़न और हिंसा की खबरों को दबा दिया जाता है। बेहद कम ही रिपोर्ट हम सभी के सामने आ पाती हैं। कुछ महिलाएँ विदेश में काम करने के लिए जाती हैं और वहीं बस जाती हैं। इस दौरान वह कार्यस्थल पर हिंसा का शिकार, अन्य तरह की हिंसा का शिकार हो जाती हैं। विदेश में होने के कारण ये महिलाएँ अपने साथ हो रहे अत्याचारों को बर्दाश्त करती रहती हैं। कई बार तो वे किसी विचित्र स्थिति में भी फँस जाती हैं। ऐसे में विदेशों में काम करने वाली भारतीय महिलाओं को उच्चायोग/दूतावास में खोले जा रहे वन स्टॉप सेंटर से बेहद मदद मिलेगी। वे इन केंद्रों पर सीधे मदद के लिए पहुँच सकती हैं और न्याय की गुहार लगा सकती हैं।

गैर-मुस्लिम हैं, पड़ोसी देश से जान बचाकर भागे हैं… तो लीजिए भारत की नागरिकता, गृह मंत्रालय को भेजिए आवेदन

केंद्र सरकार ने शुक्रवार (मई 29, 2021) को भारत के 13 जिलों में रह रहे अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया है। गृह मंत्रालय ने नागरिकता कानून 1955 और 2009 में कानून के अंतर्गत बनाए गए नियमों के तहत आदेश के तत्काल कार्यान्वयन के लिए अधिसूचना जारी करते हुए शरणार्थियों से आवेदन भी मँगाए हैं। 

जानकारी के मुताबिक ये शरणार्थी गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब समेत 13 जिलों में रह रहे हैं। गृह मंत्रालय ने अपनी अधिसूचना में कहा है, 

“नागरिकता कानून 1955 की धारा 16 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए केंद्र सरकार ने कानून की धारा 5 के तहत यह कदम उठाया है। इसके अंतर्गत उपरोक्त राज्यों और जिलों में रह रहे अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के अल्पसंख्यक समुदाय हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई लोगों को भारतीय नागरिक के तौर पर पंजीकृत करने के लिए निर्देश दिया गया है।”

बता दें कि 2019 में लागू नागरिकता संशोधिन कानून (CAA) के तहत नियमों को अभी तक तैयार नहीं किया गया है। इसमें बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उत्पीड़न के शिकार ऐसे अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है, जो 31 दिसंबर 2014 तक भारत आ गए। इन्हीं धार्मिक समूहों से संबंध रखने वाले लोगों को भारत की नागरिकता का पात्र बनाने के लिए नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 संसद में पेश किया गया था।

गौरतलब है कि साल 2019 में जब केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून बनाया था तो इस कानून में तीन पड़ोसी देशों से भारत आई अल्पसंख्यक आबादी (हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) को नागरिकता देने का प्रावधान था। लेकिन भारत में इसका भारी विरोध हुआ। कई बुद्धिजीवियों ने इस कानून को भारतीय मुस्लिमों के ख़िलाफ़ बताया और एनआरसी से जोड़ते हुए ये कहा कि भारत सरकार का ये कदम मुस्लिमों से उनकी नागरिकता छीन लेगा जबकि इस संशोधन का मूल उद्देश्य भारत के नागरिकों से उनकी नागरिकता छीनना नहीं, उन्हें नागरिकता देना है जिन्हें पड़ोसी मुल्कों में उनके अल्पसंख्यक होने के नाते सताया गया।

इसके अलावा मालूम हो कि इस सूची में मुस्लिमों का नाम न होने से कुछ लोगों ने आपत्ति जाहिर की थी। लेकिन हकीकत यह है कि जिन तीन मुल्कों से आई अल्पसंख्यक आबादी को कानून में नागरिकता देने की बात है, वह मुस्लिम बहुल हैं और वहाँ मुसलमान अल्पसंख्यक आबादी में नहीं रहता, न ही धर्म के कारण उत्पीड़न झेलना पड़ता है।

भविष्य बद्री ही होगा कलियुग का भविष्य तीर्थ: जब बद्रीनाथ का बंद होगा मार्ग… तो भविष्य बद्री होगा भगवान विष्णु का निवास स्थान

देवभूमि उत्तराखंड की महानता किसी से छुपी हुई नहीं है। हिमालय की तलहटी में बसा हुआ उत्तराखंड अनेकों दिव्य एवं महान मंदिरों का मूल स्थान है। उत्तराखंड में हिंदुओं के परम पावन तीर्थ गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से चारधाम कहा जाता है। इनके अलावा भी उत्तराखंड में कई प्रमुख नगर, मंदिर, नदियाँ और देवस्थल हैं जिनका हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है। हालाँकि देश-विदेश के हिन्दू इन धार्मिक स्थलों की यात्रा करने के लिए उत्तराखंड आते रहते हैं लेकिन कई ऐसे भी धर्मस्थल हैं जो आज भी दुर्गम हैं और जिनके बारे में भक्तों को बहुत ज्यादा जानकारी नहीं है। इनमें से एक है, भविष्य बद्री जो उत्तराखंड में पंच बद्री कहे जाने वाले तीर्थ क्षेत्रों में से एक है।

पंच बद्री :

बद्रीनाथ (विशाल बद्री) के उत्तर-पश्चिमी भाग में 24 किमी दूर स्थित सतोपंथ से दक्षिण में नंदप्रयाग तक का क्षेत्र ‘बद्रीक्षेत्र’ कहलाता है। इस क्षेत्र में भगवान विष्णु को समर्पित पाँच मंदिर हैं जो सामूहिक रूप से पंच बद्री कहे जाते हैं। बद्रीनाथ या विशाल बद्री प्रमुख मंदिर है। इसके अलावा चार अन्य मंदिर हैं, योगध्यान बद्री, भविष्य बद्री, वृद्ध बद्री और आदि बद्री।

भविष्य बद्री ही होगा कलियुग का भविष्य तीर्थ

जोशीमठ से लगभग 25 किमी और बद्रीनाथ से लगभग 56 किमी की दूरी पर स्थित है, भविष्य बद्री। यह स्थान भविष्य के बद्री तीर्थ के रूप में जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब सम्पूर्ण संसार में अधर्म फैल जाएगा, नर और नारायण पर्वत अवरोध से घिर जाएँगे और बद्रीनाथ जाने का रास्ता बंद हो जाएगा तब भगवान विष्णु इसी भविष्य बद्री मंदिर में निवास करेंगे और नरसिंह के रूप में पूजे जाएँगे।

उत्तराखंड का भविष्य बद्री (फोटो साभार : उत्तराखंड पर्यटन)

ऐसी मान्यता है कि जोशीमठ स्थित नरसिंह मंदिर में भगवान नरसिंह की मूर्ति के हाथ लगातार पतले हो रहे हैं और एक दिन ऐसा आएगा जिस दिन ये हाथ मूर्ति से अलग हो जाएँगे और उसी दिन बद्रीनाथ जाने का रास्ता भी बंद हो जाएगा। तब भविष्य बद्री अपने पूरे प्रभाव से सबके सामने आएगा। जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में ही बद्रीनाथ के पट बंद हो जाने के बाद भगवान विष्णु निवास करते हैं।

पत्थर पर उभर रही है भगवान विष्णु की मूर्ति

भविष्य में जिस स्थान पर भगवान विष्णु के दर्शन होंगे, वह भविष्य बद्री घने देवदार के जंगलों के बीच स्थित है। भविष्य बद्री के पुजारी सुनील डिमरी बताते हैं कि धीरे-धीरे मंदिर के एक पत्थर पर भगवान विष्णु और बद्रोश पंचायतन के सभी देवी-देवताओं की आकृति उभर रही है। हालाँकि यह प्रक्रिया इतनी धीमी है कि इसे शायद ही कोई प्रत्यक्ष देख पाए लेकिन भविष्य बद्री क्षेत्र के निवासी और सनातन धर्म के जानकार इस बात पर पूरा भरोसा करते हैं। मान्यता है कि जिस दिन कलियुग चरम पर होगा, भगवान पूरी तरह से सामने आ जाएँगे। वर्तमान में सुभाई गाँव में भविष्य बद्री का संकेत मंदिर है, जहाँ पूजा होती है।

कैसे पहुँचे?

हालाँकि उत्तराखंड की भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है कि यहाँ परिवहन के साधन बहुत सीमित हैं। जोशीमठ के सबसे नजदीक स्थित हवाई अड्डा देहरादून स्थित जॉली ग्रांट हवाई अड्डा है जो लगभग 268 किमी की दूरी पर है। ऋषिकेश, जोशीमठ का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है जो लगभग 250 किमी की दूरी पर है।

हालाँकि जोशीमठ के बाद भविष्य बद्री की दूरी लगभग 25 किमी ही रह जाती है लेकिन यही मार्ग अत्यंत दुर्गम है। जोशीमठ से 19 किमी दूर स्थित सलधार तक सड़क मार्ग द्वारा किसी वाहन से पहुँचा जा सकता है लेकिन सलधार से भविष्य बद्री तक 6 किमी का पैदल सफर करना होता है। इस पैदल सफर में घने जंगलों और धौली गंगा के किनारे कठिन रास्ते पर लगभग 3 किमी का सफर तय करना होता है।

Twitter को छोड़ ज्यादातर सोशल मीडिया कंपनियों को नए IT नियम कबूल: चौधरी बनने पर पहले ही फटाकर लगा चुकी है सरकार

ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 का पालन करना शुरू कर दिया है। केवल ट्विटर ने सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों पर मंत्रालय को पूरी जानकारी नहीं भेजी है। अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, नियमों के मुताबिक जरूरी नियुक्तियों की जानकारी साझा कर चुके हैं।

मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक आईटी एक्ट के नए नियमों का पालन करते हुए अधिकांश प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों ने भारत में अपने मुख्य अनुपालन अधिकारी (Chief Compliance Officer), नोडल संपर्क व्यक्ति (Nodal Contact Person) और शिकायत अधिकारी (Grievance Officer) का विवरण इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के साथ साझा किया है। नए नियमों के अनुसार इन महत्वपूर्ण सोशल मीडिया कंपनियों में नामित अधिकारी कंपनी के कर्मचारी और भारत में निवासी होने चाहिए। 

इन अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स में कू, शेयरचैट, टेलीग्राम, लिंकडिन, गूगल, फेसबुक व्हॉट्सएप और अन्य शामिल हैं। वहीं ट्विटर ने सरकार की फटकार के बाद देर रात अपने अपनी फर्म में काम करने वाले वकील की जानकारी साझा की है जो भारत में उनके नोडल कॉन्टैक्ट पर्सन और शिकायत अधिकारी के तौर पर काम करेगा। लेकिन उन्होंने अपने अनुपालन अधिकारी को लेकर अब तक कोई सूचना मंत्रालय को नहीं भेजी।

बता दें कि ट्विटर द्वारा आईटी एक्ट के नए नियमों का पालन न किए जाने पर इससे पहले भारत सरकार ने कंपनी को फटकार लगाई थी। ट्विटर की ओर से जारी बयान में अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देकर चिंता जाहिर करने पर सरकार ने कंपनी को कहा था कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है न कि ट्विटर जैसी किसी निजी लाभकारी, विदेशी संस्था की।

मंत्रालय के बयान में कहा था कि ट्विटर को इधर-उधर सिर मारना बंद करना चाहिए और भारतीय कानून का पालन करना चाहिए। कानून बनाना और नीति बनाना संप्रभु राष्ट्र का विशेषाधिकार है और ट्विटर सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। भारत की कानूनी नीति की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, यह तय करने में इसका कोई अधिकार नहीं होगा।

बता दें कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 25 फरवरी को ‘मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम, 2021’ के तहत डिजिटल प्लेफॉर्म्स के लिए नई गाइडलाइन जारी की थी। इसे लागू करने की अंतिम तिथि 26 मई थी। अधिकतर प्लेटफॉर्म इन दिशा-निर्देशों का पालन करने में विफल रहे थे, जिसके बाद ऑनलाइन न्यूज पब्लिशर्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को 15 दिन का समय देकर गाइडलाइन के अनुपालन का ब्योरा माँगा गया था।

ये शिक्षक हैं या वहशी दरिंदे: चेन्नई के कई और स्कूलों से सामने आ रहे यौन शोषण के मामले, एक तो गोद में बिठाकर किस करता था

पिछले दिनों चेन्नई के पद्म शेषाद्री बाला भवन (PSBB) के पूर्व और वर्तमान छात्रों ने एक शिक्षक पर छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में आपबीती शेयर की थी। इसके बाद से चेन्नई के कई और स्कूलों से इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। स्पोर्ट्स एकेडमी, यूनिवर्सिटी समेत अन्य स्कूल के बच्चे खुलकर संस्थानों में हुई बदसलूकियों की शिकायत कर रहे हैं।

इसी क्रम में चेन्नई के एक और स्कूल के पूर्व छात्रों ने अपने कॉमर्स के टीचर पर यौन उत्पीड़न का इल्जाम लगाते हुए उसके कुकर्मों को उजागर किया है। स्कूल के एलुमनी एसोसिएशन को इस संबंध में अलग-अलग सत्र के छात्रों से 500 संदेश आने के बाद टीचर को सस्पेंड कर दिया गया है।

स्कूल प्रशासन ने कहा है, “हमने इन पर (आरोपों) संज्ञान लिया है। हम आंतरिक समिति को इसकी जाँच की जिम्मेदारी दे रहे हैं। जाँच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। प्राप्त हुई सभी शिकायतों और आगे प्राप्त होने वाली सभी शिकायतें जाँच और रिपोर्ट के लिए समिति को भेजा जाएगी। हम सबकी भावनाओं को समझते हैं। हमारे छात्र निश्चिंत हो सकते हैं कि जाँच रिपोर्ट प्राप्त होने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।”

स्कूल प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जब तक जाँच रिपोर्ट नहीं आती तब तक टीचर को निलंबित रखा जाएगा। इसके अलावा टीचर को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वह किसी पूर्व या वर्तमान छात्र से संपर्क न करे। स्कूल ने कहा है, “हमारे छात्रों की भलाई और कल्याण, जिन्हें हम अपने बच्चे के रूप में मानते हैं, हमेशा हमारे लिए सर्वोपरि और चिंता का विषय रहे हैं और रहेंगे। हम अपने छात्रों के खिलाफ किसी भी दुर्व्यवहार, दुराचार या उत्पीड़न को कभी भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

बता दें कि चेन्नई में इससे पहले भी एक टीचर को लेकर ऐसा विवाद हुआ था। इस बार की घटना में टीचर पर छात्रों ने आरोप लगाया है कि वह छात्राओं को गोद में बिठा किस करता था। इतना ही नहीं टीचर लड़कियों को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक तौर पर प्रताड़ित करता था। बच्चे अगर आवाज उठाने का प्रयास करते थे तो उन्हें फेल करने के नाम पर धमकाया जाता था। वह लड़कियों को शारीरिक तौर पर प्रताड़ित और लड़कों को बर्बारतापूर्वक मारपीट करता और उन्हें पूरी कक्षा के सामने अभद्र शब्दों कहता था।

ईमेल में कहा गया है कि आरोपित टीचर बच्चों की पर्सनल जानकारी निकालकर उनका गलत इस्तेमाल करता और कई लड़कियों को गलत मैसेज करता। जब वह उसका जवाब नहीं देतीं तो उनसे बदला लेने की धमकी देता था। एक लड़की ने अपना अनुभव बताया कि एक बार उसे 7 बजे सुबह क्लास में बुलाया गया। जब वह गई तो पता चला कि बस वही अकेली बुलाई गई है। इस दौरान टीचर ने उसको बिन मर्जी के किस करने का प्रयास किया और उसका उत्पीड़न भी किया। बाद में उसके आरोप झूठे बताकर खारिज कर दिए गए और उसे 11वीं में फेल होना पड़ा। बाद में कई बार उसे मारा गया और उसका शारीरिक शोषण हुआ।

टीचर लड़कियों पर निगरानी रखने के बहाने उनके जकड़ लेता था और कई बार उनके लुक्स पर बॉडी शेमिंग भी करता था। एलुमिनी छात्रों ने बताया कि जो पढ़ने में कमजोर थे उन्हें जबरन कोचिंग क्लास मिलती थी। इस दौरान टीचर उनका फायदा उठाता। इसके बाद वह बच्चों को प्राइवेट कोचिंग के नाम पर अपने आवास पर बुलाता और फिर पिता जैसा होने के नाम पर गोदी में बिठाकर दुर्व्यवहार करता। वह 3 छात्राओं को एक साथ बिठाकर अपनी बाइक पर मंदिर ले जाने को कहता और जब बच्चे मना करते तो उन्हें असभ्य शब्द बोलकर उन्हें चरित्रहीन घोषित करने का प्रयास करता।

टीचर के कुकर्मों को उजागर करने वाले मेल में माँग की गई है कि आरोपित के विरुद्ध के रेप और यौन उत्पीड़न के मामले में मुकदमा दर्ज हो। इसके अलावा पूर्व छात्रों ने यह भी कहा है कि स्कूल में ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती अगर प्रशासन टीचर का बैकग्राउंड देखकर उन्हें रखता।

कोच के ख़िलाफ़ शिकायत

पिछले कुछ दिनों में चेन्नई से ऐसे कई मामले प्रकाश में आए हैं जहाँ बच्चों ने अपने टीचर के व्यवहार पर शिकायत की। तमिलनाडु एथलेटिक एसोसिएशन के कुछ खिलाड़ियों ने अपने कोच के विरुद्ध शिकायत करवाई थी। चश्मदीदों का कहना था कि वह लड़कियों को प्रताड़ित करने की कोशिश करता था। इसके लिए बच्चों ने लड़ाई भी लड़ी, लेकिन जीत न मिलने पर उन्हें एकेडमी छोड़नी पड़ी।

यूनिवर्सिटी स्टाफ के ख़िलाफ़ भी मिले मेल

तमिलनाडु में SASTRA यूनिवर्सिटी के एलुमिनी को भी 1000 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों में SASTRA के पूर्व छात्रों और वर्तमान छात्रों ने यूनवर्सिटी के कुछ सदस्यों पर यौन उत्पीड़न के इल्जाम लगाए हैं। इसके अलावा कुछ स्टाफ को लेकर कहा है कि वह जानबूझकर ऐसे मामलों को नजरअंदाज करते रहे और कोई एक्शन नहीं लिया। 

यूनिवर्सिटी के वर्तमान और पूर्व छात्रों ने यह मुद्दा ऑनलाइन उठाया है। बताया गया है कि कैसे छात्रों को घटिया तरीके से छूने और उनके साथ शारीरिक, भावनात्मक और सेक्सुअल सीमा लाँघने का प्रयास होता था। ऑनलाइन पिटिशन पर 1300 लोगों ने साइन किए हैं और एक साथ ऐसे यूनिवर्सिटी स्टाफ को हटाने की माँग की है। इसके अतिरिक्त एक इंटरनल कमेटी बनाने की माँग है जो ऐसे संस्थानों में यौन शोषण के मुद्दों से डील करे। साथ ही ये बताए कि ऐसी स्थिति में छात्र क्या करें।

न तेल, न तेल की धार, फिर यूपी की सियासी खेत में कितना दौड़ेगा ‘किसान आंदोलन’ का ट्रैक्टर

किसान आंदोलन के नेताओं ने एक बार फिर से गोल पोस्ट उठाकर दूसरी जगह रख दिया है। उनका कहना है कि छह महीने तक दिल्ली में आंदोलन करने के बाद अब वे 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को हराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में आंदोलन करेंगे।

कथित कृषि सुधारों के उद्देश्य से खड़ा किया गया आंदोलन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की माँग होते हुए बीजेपी को चुनावों में हराने की ओर मुड़ गया है। वे केवल उत्तर प्रदेश तक ही नहीं रुके। उनका कहना है कि वे अब आने वाले हर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हराने के उद्देश्य से पार्टी के खिलाफ प्रचार करेंगे। ऐसा शायद वे इसलिए कह रहे हैं कि उन्हें इस बात का विश्वास है कि उनके आंदोलन की वजह से ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी वापस सत्ता में आ सकी और किसान नेता अपने करिश्मा का इस्तेमाल अब और राज्यों में भी करना चाहते हैं।
  
मुझे नहीं लगता कि इन नेताओं की यह घोषणा किसी को आश्चर्यचकित करेगी। जबसे यह आंदोलन शुरू किया गया है, इसके उद्देश्य बदलते रहे हैं। इस तरीके का इस्तेमाल अक्सर वे कंपनियाँ करती हैं जिनकी शुरुआत एक छोटे से उद्देश्य को लेकर होती है, पर जैसे-जैसे वे बड़ी होती जाती हैं उनके उद्देश्य बदलते रहते हैं। आंदोलन के शुरुआती दौर में पहले यह बात फैलाई गई कि सरकार एमएसपी हटाने वाली है। जब सरकार ने कहा कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है तो कहा गया कि यदि ऐसा है तो सरकार लिख कर दे कि वह एमएसपी नहीं हटाएगी। जब सरकार लिखकर देने के लिए राजी हुई तब उसकी बात की अनदेखी कर कहा गया कि सरकार ने कानूनों में ऐसा प्रावधान कर दिया है कि किसानों की जमीन चली जाएगी।

जब उनसे पूछा गया कि कानून में ऐसा प्रावधान कहाँ है तो उसके जवाब में कहा गया कि कानून रद्द करना पड़ेगा। जब उनसे यह पूछा गया कि कानून की जिन धाराओं या अनुच्छेदों को लेकर उन्हें शिकायत है, सरकार उस पर बातचीत करने के लिए तैयार है तो कहा गया कि कोई बातचीत नहीं होगी। सरकार के पास एक ही रास्ता है और वह है कानूनों को वापस लेना।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनों को 18 महीनों के लिए रोक देना भी किसी काम न आया और आंदोलन जस का तस चलता रहा। बिना यह परवाह किए कि अपने इस आंदोलन से किसान बाकी लोगों का कितना नुकसान कर रहे हैं। बिना यह सोचे कि किसी कानून के संबंध में बहस हो सकती है, किसी एक तरफ से फैसला नहीं सुनाया जा सकता। बिना यह सोचे कि देश भर की कृषि का अर्थ मात्र पंजाब और हरियाणा की कृषि नहीं है। पर यह बातें कोई पक्ष तब सोचेगा जब आंदोलन का उद्देश्य कृषि कानूनों पर एक आम राय बनाना हो। जब उद्देश्य कुछ और हो तब न तो किसानों का भला होगा और न ही आंदोलन का।

सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों को भी तवज्जो न देने में इस आंदोलन का असली चेहरा दिखाई देता है। किसानों की यह सोच उनके और सरकार के बीच किसी तरह के विमर्श या बहस का रास्ता बंद कर देती है। यही कारण है कि पिछले चार महीने में आंदोलन को जीवित रखना किसानों के लिए ख़ासा मेहनत भरा रहा। यही कारण है कि किसान कभी किसी बात की घोषणा करते हैं तो कभी किसी बात की। ऊपर से जब से सरकार ने फसल का मूल्य सीधे किसानों के खाते में ट्रांसफर करना शुरू किया है, नेताओं के लिए इस आंदोलन को बाँधे रखना मुश्किल हो गया है। 

किसान आंदोलन और कृषि कानूनों को लेकर अब तक सार्वजनिक बहस तकनीकी और कानूनी रही है। सरकार की नीतियों और कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली नई सुविधाओं का सरकार के घोषित उद्देश्य, अर्थात किसानों की आय बढ़ाने की योजना पर क्या असर पड़ रहा है या पड़ने वाला है,इन विषयों पर अभी तक सार्वजनिक विमर्श नहीं देखा गया है। आंदोलन भी अभी तक दिल्ली, पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा है।

जिस पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का गुमान किसान नेताओं को है, वहाँ भी उन्हें किसानों का कोई समर्थन नहीं है। ऐसे में जब सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का असर किसानों की आय पर दिखाई देगा, इस आंदोलन को और राज्यों में समर्थन मिलना आसान न होगा। लिहाजा किसान नेता अपने आंदोलन के उद्देश्य बार-बार बदलते रहना कब तक अफोर्ड सकेंगे यह देखना दिलचस्प रहेगा। अभी तक किसानों के लिए इस आंदोलन को जारी रखना आसान काम नहीं रहा है। बनावटी उद्देश्यों के साथ किसी भी आंदोलन को लम्बे समय तक जारी रखना वैसे भी आसान नहीं रहता। ऐसे में टिकैत या और नेताओं का बार-बार यह कहना कि वे 2024 आंदोलन जारी रखने की क्षमता रखते हैं, उनकी दृढ़ता को नहीं बल्कि उनकी कमज़ोरी को दर्शाता है। 

किसान नेताओं की मानें तो उनके उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के फैसले के पीछे शायद हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के परिणाम हैं। पर यही एक मात्र कारण है, यह कहना सही न होगा। राकेश टिकैत बीच-बीच में जिस तरह से निराश दिखते हैं, उससे लगता है कि वे जैसा चाहते हैं वैसा हो नहीं रहा है। वे पहले भी आंदोलन खत्म करने की बात कर चुके थे पर जाने किस दबाव में ऐसा कर नहीं पाए।

टिकैत खुद भी चुनावी राजनीति में कूदने की मंशा रखते दिखाई देते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में आंदोलन को ले जाना पूरी तरह से आकस्मिक दिखाई नहीं देता। किसान नेता आज चाहे जो सोचें पर उन्हें देखना पड़ेगा कि उनके सामने योगी आदित्यनाथ हैं जिनकी लोकप्रियता और काम पर अभी तक किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं लगा है। यह बात और है कि हाल के महीनों में वे विपक्षी इकोसिस्टम के निशाने पर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति को किसान नेता किस तरह से प्रभावित कर पाएँगे, यह प्रदेश में उनकी प्रस्तावित पंचायतों में दिखाई देगा। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका प्रभावशाली होना आसान न होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून के इस्तेमाल को लेकर सतर्क रहते हैं। ऐसे में किसानों की राजनीति उनके धैर्य की परीक्षा भी लेगी।