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ये शिक्षक हैं या वहशी दरिंदे: चेन्नई के कई और स्कूलों से सामने आ रहे यौन शोषण के मामले, एक तो गोद में बिठाकर किस करता था

पिछले दिनों चेन्नई के पद्म शेषाद्री बाला भवन (PSBB) के पूर्व और वर्तमान छात्रों ने एक शिक्षक पर छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में आपबीती शेयर की थी। इसके बाद से चेन्नई के कई और स्कूलों से इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं। स्पोर्ट्स एकेडमी, यूनिवर्सिटी समेत अन्य स्कूल के बच्चे खुलकर संस्थानों में हुई बदसलूकियों की शिकायत कर रहे हैं।

इसी क्रम में चेन्नई के एक और स्कूल के पूर्व छात्रों ने अपने कॉमर्स के टीचर पर यौन उत्पीड़न का इल्जाम लगाते हुए उसके कुकर्मों को उजागर किया है। स्कूल के एलुमनी एसोसिएशन को इस संबंध में अलग-अलग सत्र के छात्रों से 500 संदेश आने के बाद टीचर को सस्पेंड कर दिया गया है।

स्कूल प्रशासन ने कहा है, “हमने इन पर (आरोपों) संज्ञान लिया है। हम आंतरिक समिति को इसकी जाँच की जिम्मेदारी दे रहे हैं। जाँच निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। प्राप्त हुई सभी शिकायतों और आगे प्राप्त होने वाली सभी शिकायतें जाँच और रिपोर्ट के लिए समिति को भेजा जाएगी। हम सबकी भावनाओं को समझते हैं। हमारे छात्र निश्चिंत हो सकते हैं कि जाँच रिपोर्ट प्राप्त होने पर उचित कार्रवाई की जाएगी।”

स्कूल प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जब तक जाँच रिपोर्ट नहीं आती तब तक टीचर को निलंबित रखा जाएगा। इसके अलावा टीचर को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वह किसी पूर्व या वर्तमान छात्र से संपर्क न करे। स्कूल ने कहा है, “हमारे छात्रों की भलाई और कल्याण, जिन्हें हम अपने बच्चे के रूप में मानते हैं, हमेशा हमारे लिए सर्वोपरि और चिंता का विषय रहे हैं और रहेंगे। हम अपने छात्रों के खिलाफ किसी भी दुर्व्यवहार, दुराचार या उत्पीड़न को कभी भी बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

बता दें कि चेन्नई में इससे पहले भी एक टीचर को लेकर ऐसा विवाद हुआ था। इस बार की घटना में टीचर पर छात्रों ने आरोप लगाया है कि वह छात्राओं को गोद में बिठा किस करता था। इतना ही नहीं टीचर लड़कियों को मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक तौर पर प्रताड़ित करता था। बच्चे अगर आवाज उठाने का प्रयास करते थे तो उन्हें फेल करने के नाम पर धमकाया जाता था। वह लड़कियों को शारीरिक तौर पर प्रताड़ित और लड़कों को बर्बारतापूर्वक मारपीट करता और उन्हें पूरी कक्षा के सामने अभद्र शब्दों कहता था।

ईमेल में कहा गया है कि आरोपित टीचर बच्चों की पर्सनल जानकारी निकालकर उनका गलत इस्तेमाल करता और कई लड़कियों को गलत मैसेज करता। जब वह उसका जवाब नहीं देतीं तो उनसे बदला लेने की धमकी देता था। एक लड़की ने अपना अनुभव बताया कि एक बार उसे 7 बजे सुबह क्लास में बुलाया गया। जब वह गई तो पता चला कि बस वही अकेली बुलाई गई है। इस दौरान टीचर ने उसको बिन मर्जी के किस करने का प्रयास किया और उसका उत्पीड़न भी किया। बाद में उसके आरोप झूठे बताकर खारिज कर दिए गए और उसे 11वीं में फेल होना पड़ा। बाद में कई बार उसे मारा गया और उसका शारीरिक शोषण हुआ।

टीचर लड़कियों पर निगरानी रखने के बहाने उनके जकड़ लेता था और कई बार उनके लुक्स पर बॉडी शेमिंग भी करता था। एलुमिनी छात्रों ने बताया कि जो पढ़ने में कमजोर थे उन्हें जबरन कोचिंग क्लास मिलती थी। इस दौरान टीचर उनका फायदा उठाता। इसके बाद वह बच्चों को प्राइवेट कोचिंग के नाम पर अपने आवास पर बुलाता और फिर पिता जैसा होने के नाम पर गोदी में बिठाकर दुर्व्यवहार करता। वह 3 छात्राओं को एक साथ बिठाकर अपनी बाइक पर मंदिर ले जाने को कहता और जब बच्चे मना करते तो उन्हें असभ्य शब्द बोलकर उन्हें चरित्रहीन घोषित करने का प्रयास करता।

टीचर के कुकर्मों को उजागर करने वाले मेल में माँग की गई है कि आरोपित के विरुद्ध के रेप और यौन उत्पीड़न के मामले में मुकदमा दर्ज हो। इसके अलावा पूर्व छात्रों ने यह भी कहा है कि स्कूल में ऐसी स्थिति पैदा ही नहीं होती अगर प्रशासन टीचर का बैकग्राउंड देखकर उन्हें रखता।

कोच के ख़िलाफ़ शिकायत

पिछले कुछ दिनों में चेन्नई से ऐसे कई मामले प्रकाश में आए हैं जहाँ बच्चों ने अपने टीचर के व्यवहार पर शिकायत की। तमिलनाडु एथलेटिक एसोसिएशन के कुछ खिलाड़ियों ने अपने कोच के विरुद्ध शिकायत करवाई थी। चश्मदीदों का कहना था कि वह लड़कियों को प्रताड़ित करने की कोशिश करता था। इसके लिए बच्चों ने लड़ाई भी लड़ी, लेकिन जीत न मिलने पर उन्हें एकेडमी छोड़नी पड़ी।

यूनिवर्सिटी स्टाफ के ख़िलाफ़ भी मिले मेल

तमिलनाडु में SASTRA यूनिवर्सिटी के एलुमिनी को भी 1000 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं। इन शिकायतों में SASTRA के पूर्व छात्रों और वर्तमान छात्रों ने यूनवर्सिटी के कुछ सदस्यों पर यौन उत्पीड़न के इल्जाम लगाए हैं। इसके अलावा कुछ स्टाफ को लेकर कहा है कि वह जानबूझकर ऐसे मामलों को नजरअंदाज करते रहे और कोई एक्शन नहीं लिया। 

यूनिवर्सिटी के वर्तमान और पूर्व छात्रों ने यह मुद्दा ऑनलाइन उठाया है। बताया गया है कि कैसे छात्रों को घटिया तरीके से छूने और उनके साथ शारीरिक, भावनात्मक और सेक्सुअल सीमा लाँघने का प्रयास होता था। ऑनलाइन पिटिशन पर 1300 लोगों ने साइन किए हैं और एक साथ ऐसे यूनिवर्सिटी स्टाफ को हटाने की माँग की है। इसके अतिरिक्त एक इंटरनल कमेटी बनाने की माँग है जो ऐसे संस्थानों में यौन शोषण के मुद्दों से डील करे। साथ ही ये बताए कि ऐसी स्थिति में छात्र क्या करें।

न तेल, न तेल की धार, फिर यूपी की सियासी खेत में कितना दौड़ेगा ‘किसान आंदोलन’ का ट्रैक्टर

किसान आंदोलन के नेताओं ने एक बार फिर से गोल पोस्ट उठाकर दूसरी जगह रख दिया है। उनका कहना है कि छह महीने तक दिल्ली में आंदोलन करने के बाद अब वे 2022 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को हराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में आंदोलन करेंगे।

कथित कृषि सुधारों के उद्देश्य से खड़ा किया गया आंदोलन नए कृषि कानूनों को रद्द करने की माँग होते हुए बीजेपी को चुनावों में हराने की ओर मुड़ गया है। वे केवल उत्तर प्रदेश तक ही नहीं रुके। उनका कहना है कि वे अब आने वाले हर चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को हराने के उद्देश्य से पार्टी के खिलाफ प्रचार करेंगे। ऐसा शायद वे इसलिए कह रहे हैं कि उन्हें इस बात का विश्वास है कि उनके आंदोलन की वजह से ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी वापस सत्ता में आ सकी और किसान नेता अपने करिश्मा का इस्तेमाल अब और राज्यों में भी करना चाहते हैं।
  
मुझे नहीं लगता कि इन नेताओं की यह घोषणा किसी को आश्चर्यचकित करेगी। जबसे यह आंदोलन शुरू किया गया है, इसके उद्देश्य बदलते रहे हैं। इस तरीके का इस्तेमाल अक्सर वे कंपनियाँ करती हैं जिनकी शुरुआत एक छोटे से उद्देश्य को लेकर होती है, पर जैसे-जैसे वे बड़ी होती जाती हैं उनके उद्देश्य बदलते रहते हैं। आंदोलन के शुरुआती दौर में पहले यह बात फैलाई गई कि सरकार एमएसपी हटाने वाली है। जब सरकार ने कहा कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है तो कहा गया कि यदि ऐसा है तो सरकार लिख कर दे कि वह एमएसपी नहीं हटाएगी। जब सरकार लिखकर देने के लिए राजी हुई तब उसकी बात की अनदेखी कर कहा गया कि सरकार ने कानूनों में ऐसा प्रावधान कर दिया है कि किसानों की जमीन चली जाएगी।

जब उनसे पूछा गया कि कानून में ऐसा प्रावधान कहाँ है तो उसके जवाब में कहा गया कि कानून रद्द करना पड़ेगा। जब उनसे यह पूछा गया कि कानून की जिन धाराओं या अनुच्छेदों को लेकर उन्हें शिकायत है, सरकार उस पर बातचीत करने के लिए तैयार है तो कहा गया कि कोई बातचीत नहीं होगी। सरकार के पास एक ही रास्ता है और वह है कानूनों को वापस लेना।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा कानूनों को 18 महीनों के लिए रोक देना भी किसी काम न आया और आंदोलन जस का तस चलता रहा। बिना यह परवाह किए कि अपने इस आंदोलन से किसान बाकी लोगों का कितना नुकसान कर रहे हैं। बिना यह सोचे कि किसी कानून के संबंध में बहस हो सकती है, किसी एक तरफ से फैसला नहीं सुनाया जा सकता। बिना यह सोचे कि देश भर की कृषि का अर्थ मात्र पंजाब और हरियाणा की कृषि नहीं है। पर यह बातें कोई पक्ष तब सोचेगा जब आंदोलन का उद्देश्य कृषि कानूनों पर एक आम राय बनाना हो। जब उद्देश्य कुछ और हो तब न तो किसानों का भला होगा और न ही आंदोलन का।

सुप्रीम कोर्ट की कोशिशों को भी तवज्जो न देने में इस आंदोलन का असली चेहरा दिखाई देता है। किसानों की यह सोच उनके और सरकार के बीच किसी तरह के विमर्श या बहस का रास्ता बंद कर देती है। यही कारण है कि पिछले चार महीने में आंदोलन को जीवित रखना किसानों के लिए ख़ासा मेहनत भरा रहा। यही कारण है कि किसान कभी किसी बात की घोषणा करते हैं तो कभी किसी बात की। ऊपर से जब से सरकार ने फसल का मूल्य सीधे किसानों के खाते में ट्रांसफर करना शुरू किया है, नेताओं के लिए इस आंदोलन को बाँधे रखना मुश्किल हो गया है। 

किसान आंदोलन और कृषि कानूनों को लेकर अब तक सार्वजनिक बहस तकनीकी और कानूनी रही है। सरकार की नीतियों और कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली नई सुविधाओं का सरकार के घोषित उद्देश्य, अर्थात किसानों की आय बढ़ाने की योजना पर क्या असर पड़ रहा है या पड़ने वाला है,इन विषयों पर अभी तक सार्वजनिक विमर्श नहीं देखा गया है। आंदोलन भी अभी तक दिल्ली, पंजाब और हरियाणा तक ही सीमित रहा है।

जिस पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का गुमान किसान नेताओं को है, वहाँ भी उन्हें किसानों का कोई समर्थन नहीं है। ऐसे में जब सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का असर किसानों की आय पर दिखाई देगा, इस आंदोलन को और राज्यों में समर्थन मिलना आसान न होगा। लिहाजा किसान नेता अपने आंदोलन के उद्देश्य बार-बार बदलते रहना कब तक अफोर्ड सकेंगे यह देखना दिलचस्प रहेगा। अभी तक किसानों के लिए इस आंदोलन को जारी रखना आसान काम नहीं रहा है। बनावटी उद्देश्यों के साथ किसी भी आंदोलन को लम्बे समय तक जारी रखना वैसे भी आसान नहीं रहता। ऐसे में टिकैत या और नेताओं का बार-बार यह कहना कि वे 2024 आंदोलन जारी रखने की क्षमता रखते हैं, उनकी दृढ़ता को नहीं बल्कि उनकी कमज़ोरी को दर्शाता है। 

किसान नेताओं की मानें तो उनके उत्तर प्रदेश में राजनीति करने के फैसले के पीछे शायद हाल ही में संपन्न हुए पंचायत चुनावों के परिणाम हैं। पर यही एक मात्र कारण है, यह कहना सही न होगा। राकेश टिकैत बीच-बीच में जिस तरह से निराश दिखते हैं, उससे लगता है कि वे जैसा चाहते हैं वैसा हो नहीं रहा है। वे पहले भी आंदोलन खत्म करने की बात कर चुके थे पर जाने किस दबाव में ऐसा कर नहीं पाए।

टिकैत खुद भी चुनावी राजनीति में कूदने की मंशा रखते दिखाई देते हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश में आंदोलन को ले जाना पूरी तरह से आकस्मिक दिखाई नहीं देता। किसान नेता आज चाहे जो सोचें पर उन्हें देखना पड़ेगा कि उनके सामने योगी आदित्यनाथ हैं जिनकी लोकप्रियता और काम पर अभी तक किसी तरह का प्रश्नचिन्ह नहीं लगा है। यह बात और है कि हाल के महीनों में वे विपक्षी इकोसिस्टम के निशाने पर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति को किसान नेता किस तरह से प्रभावित कर पाएँगे, यह प्रदेश में उनकी प्रस्तावित पंचायतों में दिखाई देगा। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में उनका प्रभावशाली होना आसान न होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून के इस्तेमाल को लेकर सतर्क रहते हैं। ऐसे में किसानों की राजनीति उनके धैर्य की परीक्षा भी लेगी।

भारत ने माना मोदी ही खेवनहार, वायरस से भी नहीं बनी राहुल गाँधी की विश्वसनीयता: कोरोना काल में जनता का मूड बताते आया सर्वे

नरेंद्र मोदी ने बतौर प्रधानमंत्री बीते 26 मई को सात साल पूरे किए थे। 30 मई को उनकी दूसरी सरकार (मोदी 2.0) के दो साल पूरे होंगे। उससे पहले एक सर्वे आया है जो कोरोना वैश्विक महामारी के कारण पैदा हुए हालात के बीच देश के मिजाज पर रोशनी डालता है। इस सर्वे से यह बात सामने आई है कि आज भी मोदी देश के सर्वमान्य नेता हैं और विश्वसनीयता के लिहाज से कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी उनके सामने कहीं नहीं टिकते।

एबीपी न्यूज-सी वोटर के इस सर्वे के नतीजे ऐसे वक्त में आए हैं जब कोरोना की आड़ में मोदी सरकार के खिलाफ तमाम तरह के प्रोपेगेंडा चलाए जा रहे हैं। खुद राहुल गाँधी भी लगातार इसे हवा दे रहे हैं। पिछले दिनों कॉन्ग्रेस का एक कथित टूलकिट भी सामने आया था जिसमें बताया गया था कि कैसे सरकार को बदनाम करना है।

बावजूद इसके सर्वे बताता है कि शहरी क्षेत्र के 66 और ग्रामीण क्षेत्र के 22 फीसदी लोगों का मानना है कि कोरोना के संकट से ज्यादा बेहतर तरीके से निपटने में प्रधानमंत्री मोदी ही सक्षम हैं। शहरी इलाके के केवल 20 और ग्रामीण क्षेत्र के 23 फीसदी लोगों को ही राहुल पर भरोसा है। शहरी क्षेत्र के 14 और ग्रामीण इलाकों के 15 फीसदी लोग इस सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे पाए। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लोकप्रियता और विश्वसनीयता के मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष के चेहरे से कितने आगे हैं।

सर्वे में शामिल 44 फीसदी और ग्रामीण इलाकों के 40 फीसदी लोग कोरोना संकट को मोदी सरकार की सबसे बड़ी नाकामी मानते हैं। किसानों के आंदोलन को लेकर शहरी क्षेत्र के हर पाँच में से एक यानी 20 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्र के हर चार में से एक यानी 25 प्रतिशत लोगों को ही लगता है कि मोदी सरकार इस मोर्चे पर नाकाम रही है। शहरी लोगों में से 9 प्रतिशत दिल्ली दंगे को नाकामी मानते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के भी 9 फीसदी लोगों ने ही इसे नाकामी माना है। चीन के साथ सीमा विवाद को लेकर 7 प्रतिशत शहरी और 10 प्रतिशत ग्रामीण लोग सरकार को नाकाम मानते हैं।

इस वर्ष देशव्यापी लॉकडाउन न लगने का सवाल किए जाने पर 57% शहरी और 52% ग्रामीणों ने इसे सही बताया, जबकि 31% शहरी और 34% ग्रामीणों ने गलत कहा। 12% शहरी और 14 % ग्रामीणों का कहना है कि वे इस बारे में कुछ नहीं कह सकते हैं।

इसी तरह मोदी सरकार ने वैक्सीन के इंतजाम ठीक किए हैं या नहीं, इस पर 51% शहरी और 42 फीसदी ग्रामीणों ने इस सवाल का हाँ में इसका जवाब दिया है। 38 % शहरी और 46% ग्रामीणों ने माना कि सरकार ने वैक्सीन का इंतजाम ठीक से नहीं किया। इस तरह शहर के 11% और 12% ग्रामीणों ने कहा कि उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है।

आज की तारीख में सबसे बड़े परेशानी पूछे जाने पर भ्रष्टाचार को वजह 7% ने माना। वहीं बेरोजगारी को 18%, गरीबी को 5%, महँगाई को 10%, कृषि को 4%, कोरोना को 36%, और अन्य दिक्कतों पर 20% ने अपनी सहमति दी।

प्राचीन शिव मंदिर के चबूतरे पर बिरयानी का धंधा, परिसर में ही पकाई जा रही थी: सिराज, नूर आलम और फरीद पर FIR

उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक मंदिर के चबूतरे पर बैठकर बिरयानी बेचने के मामले में पुलिस ने 3 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर की है। मामला चमनगंज स्थित प्राचीन शिव मंदिर का है। यहाँ समुदाय विशेष के लोगों ने कथित तौर पर मंदिर पर कब्जा कर रखा था और कुछ समय से वहाँ माँसाहारी बिरयानी बेचने का धंधा करते थे।

मामले की जानकारी होने पर महापौर प्रमिला पांडे ने इस पर अपनी आपत्ति जताई थी और कार्रवाई की माँग करते हुए बिरयानी की दुकान हटाने के निर्देश दिए थे। कानपुर के पुलिस कमिश्नर ने इस मामले में 27 मई को बताया कि थाना बजरिया मोहल्ला बेकनगंज सोनार वाली गली में एक प्राचीन शिव मंदिर के चबूतरे पर माँसाहारी बिरयानी बेचने के संबंध में एक अभियोग थाना बजरिया में पंजीकृत करवाया गया है। इसमें तीन लोगों को नामजद किया गया है। मौके पर पड़े बर्तन हटवा दिए गए हैं। अब आगे वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि मुस्लिम बाहुल्य इलाके चमनगंज में दौरे के दौरान प्रमिला पांडे के संज्ञान में ये मामला आया था। वह बेकनगंज बाबा स्वीट के पास एक प्राचीन मंदिर गिरने की सूचना पर बुधवार (मई 26, 2021) को नगर निगम की टीम और पुलिस ने साथ मौका-मुआयना करने गईं थी। इसी दौरान उन्होंने पाया कि बाबा स्वीट के साइड सुनार वाली गली में मौजूद प्राचीन शिव मंदिर के चबूतरे पर बिरयानी बेची जा रही थी और मंदिर परिसर में ही बिरयानी पकाई जा रही थी।

यह नजारा देख मेयर ने इसका विरोध करते हुए आरोपितों के विरुद्ध एफआईआर की माँग की। इसके बाद नजीराबाद निवासी सौरभ तिवारी ने मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए बजरिया थाने में तहरीर दी। बाद में मामले को संज्ञान में लेते हुए बजरिया पुलिस ने बेकनगंज निवासी मोहम्मद सिराज, मोहम्मद नूर आलम और मोहम्मद फरीद के खिलाफ धार्मिक भावनाएँ आहत करने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले इस इलाके में कई प्राचीन मंदिर थे। लेकिन समुदाय विशेष के लोगों ने कब्जा कर मंदिरों को गायब कर दिया है। मेयर ने भी अपने दौरे के दौरान कई मंदिरों को जर्जर हालत में पाया। कहीं-कहीं तो मंदिर में ताला मारकर अंदर कूड़ा भी भरा गया है और बाकी जगह को ध्वस्त कर उसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

बांग्लादेशी अब मजदूरी नहीं रेप करते हैं: असम-बंगाल से निकल ये पूरे देश में फैल गए… लोग NRC पर चर्चा कर रहे

बेंगलुरु पुलिस ने एक महिला सहित बलात्कार के पाँच आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के अनुसार सारे आरोपी बांग्लादेशी हैं। इस अपराध की फिल्म इंटरनेट पर वायरल होने की वजह से इसकी चर्चा सोशल मीडिया पर बहुत रही। गिरफ्तारी से पहले तक अपराध की जगह और पीड़िता की पहचान को लेकर भी कायस लगे।

कई लोगों ने अनुमान लगाने की कोशिश की कि वो कौन हैं और कहाँ की हैं। चूँकि कुछ लोगों ने यह कयास भी लगाए कि पीड़िता शायद उत्तर-पूर्व से थी इसलिए असम पुलिस के साथ केंद्रीय मंत्री किरण रिजुजू ने भी ट्वीट किया। पर इसमें जो सबसे चिंताजनक बात लगी वह थी बलात्कार को फिल्माना और उसका इंटरनेट पर वायरल होना।

वैसे तो गुनी लोग अपराध के क्लिप के वायरल होने का बचाव यह कहकर भी कर सकते हैं कि उसी की वजह से अपराधियों की पहचान हो पाई हो, पर अपराधियों का यह विश्वास कि खुद के द्वारा किए जा रहे अपराध को न केवल फिल्म किया जा सकता है पर उसे औरों को दिखाया जा सकता है, वर्तमान सामाजिक सोच और कानून व्यवस्था पर बहुत बड़ा सवाल है।

ऐसा नहीं कि बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को खुद अपराधियों ने पहली बार फिल्माया हो, चिंताजनक बात यह है कि भारत में अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी किस निडरता से ऐसे अपराध को अंजाम दे रहे हैं। मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री और बुद्धिजीवी अपने स्तर पर यह तर्क दे सकते हैं कि बलात्कार जैसा अपराध तो भारतीय नागरिक भी करते हैं पर यह भी सच है कि आधुनिक वैश्विक समाज में किसी देश में अवैध तरीके से रहने वाले बाहरी लोग अधिकतर अपराध करते पाए जाते हैं।

कोई इस बात को नकार नहीं सकता कि किसी देश में अवैध तरीके से रहने की शुरुआत ही अवैध तरीके से घुसने से होती है और ऐसा करना अपराध है।

किसी बुद्धिजीवी, समाजशास्त्री या मनोवैज्ञानिक के इस तर्क की एक एक सीमा है कि अपराध तो कोई भी कर सकता है। यह स्वीकार्य है कि अपराध तो कोई भी सकता है पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि समाज और सामाजिक संरचना का ज्ञान भी व्यक्तियों को अपराध करने से रोकता है।

किसी समाज से लम्बे समय तक जुड़े रहना और उस समाज की समझ यह बात तय करती है कि अपराध जैसे विषय को लेकर उस समाज के किसी व्यक्ति की सोच कैसी है? यदि वह अपराध करेगा तो किस सीमा तक जा सकता है। उसे यदि स्थानीय सामाजिक संरचना और सभ्यता की जानकारी है तो उसे पता रहेगा कि वह क्या-क्या नहीं कर सकता। यह बात भारतीय नागरिक पर तो लागू हो सकती पर उस व्यक्ति पर कैसे लागू होगी, जिसे स्थानीय समाज की समझ ही नहीं है?

बंगलुरु में हुए बलात्कार के इस अपराध को ही देख लें। पीड़िता को जिस तरह से प्रताड़ित किया गया, वह क्या बलात्कार के हर अपराध में होता है? उसके ऊपर इन अपराधियों का यह मानना कि उन्होंने जो भी किया वे वैसा कर सकते हैं, हमारी सरकारों, समाज और सामाजिक व्यवस्था के लिए अपने आप में खतरे की घंटी है। 

यह तथ्य कि गिरफ्तार किए गए सारे अपराधी बांग्लादेशी हैं, अपने आप में बहुत बड़ा सबूत है कि देश में अवैध तरीके से घुसे बांग्लादेशी अब केवल असम और पश्चिम बंगाल की सीमा में नहीं रहते। वे भारत भर में फैले हैं और किसी न किसी रूप में हमारी अर्थ्यव्यवस्था से लेकर सामाजिक संतुलन तक बिगाड़ रहे हैं।

यदि जल्द ही कुछ नहीं किया गया तो जो लोग कल तक केवल बंगाल की राजनीति प्रभावित करते थे, आज बिहार और झारखंड की राजनीति प्रभावित करते हैं, वही लोग कल उत्तर प्रदेश और हरियाणा की तथा परसों कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की राजनीति प्रभावित करेंगे।

कई राज्यों के तमाम जिलों ने पिछले चार दशकों में डेमोग्राफी को केवल बदलते ही नहीं देखा, किसी न किसी तरीके से महसूस भी किया है। इसी का परिणाम है कि कुछ राज्यों में राजनीति और राजनीतिक संघर्ष अब केवल सत्ता की लड़ाई के बारे में नहीं रहा बल्कि यह अब सभ्यता, संस्कृति और उसकी रक्षा की लड़ाई के बारे में है। 

हम अब यह अफोर्ड नहीं कर सकते कि एनआरसी या सम्बंधित कानूनों पर चर्चा केवल नारों और वादों तक सीमित रहे। हम यह भी अफोर्ड नहीं कर सकते कि ऐसे कानूनों पर चर्चा केवल चुनाव के समय हों।

राज्य सरकारों में बैठे राजनीतिक दल यदि अड़चन डालते हैं तो उस पर बहस और सम्बंधित कार्यवाई की जिम्मेदारी उन पर है, जो सभ्यता की लड़ाई लड़ना चाहते हैं या जिन्हें यह लगता है कि कुछ राजनीतिक लड़ाइयाँ मात्र सत्ता के बारे में नहीं हैं।

इतिहास से सीखने का दावा करने वालों के लिए आवश्यक है कि वे अपनी जिम्मेदारियों को केवल समझें ही नहीं, उन्हें भी समझाएँ जिनके लिए वे लड़ना चाहते हैं। केवल अच्छा ध्येय किसी लड़ाई की शुरुआत करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह राजनीतिक दलों या उनकी विचारधारा से अधिक भारतवर्ष के बारे में है।

हाथ पर फिलिस्तीनी झंडा बना स्कूल पहुँची छात्राएँ, टीचर ने टोका तो हुआ बवाल: शिक्षक को स्कूल से निकालने की माँग

ब्रिटेन के स्टैफोर्डशायर स्थित बर्टन के एक स्कूल में टीचर ने छात्राओं से हाथ पर बनाया फिलिस्तीन का झंडा मिटाने को कहा। इसके बाद से उस शिक्षक को स्कूल से निकाल बाहर करने की माँग हो रही। डेलीमेल की रिपोर्ट के अनुसार दो छात्रा हाथ पर फिलिस्तीन का झंडा रंगकर स्कूल पहुँचीं थी। शिक्षक द्वारा टोके जाने के बाद उनके अभिभावक बर्टन की द डे फेरर्स अकादमी के बाहर आकर प्रदर्शन करने लगे।

जानकारी के मुताबिक, स्कूल के हेडमास्टर से टीचर को निकालने के लिए 1000 अभिभावकों ने ऑनलाइन एक पीटिशन साइन की। इसमें लिखा गया कि कुछ छात्रों ने अपने हाथों को फिलिस्तीनी झंडे से रंगने का फैसला किया। उनसे कहा गया कि वे आतंकवादी समूह का समर्थन कर रहे हैं। इसमें आगे कहा गया है, “फिलिस्तीन कैसे आतंकवादी हो जाता है, जिस पर बमबारी की गई, घायल किया गया और मारा गया।”

डी फेरर्स ट्रस्ट ने बताया कि घटना के बाद से समुदाय के कुछ लोगों में तनाव है। ट्रस्ट मुख्य कार्यकारी इयान मैकनेली ने कहा कि बीच में ऐसी बातें हो रही थी कि इस संबंध में विरोध-प्रदर्शन होगा। लेकिन उन्होंने स्कूल के बाहर की व्यस्त सड़क को देखते हुए आग्रह किया कि ऐसा न किया जाए। उन्होंने कहा, “समुदाय के कुछ लोगों में तनाव है, लेकिन पुलिस अपनी ड्यूटी करते हुए हमारा समर्थन कर रही है और सलाह भी दे रही है कि स्थिति को कैसे सँभाला जाए।”

इयान के अनुसार, “हमारी सबसे बड़ी चिंता हमारे छात्रों की सुरक्षा और उनका भला है। इसलिए हम सलाह दे रहे हैं कि वे किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल न हों।” वह कहते हैं, “ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि हम ऐसे विरोध की प्रकृति के खिलाफ हैं जो मानव संकट की ओर ध्यान आकर्षित करवाता हो। बल्कि इसलिए क्योंकि हमें लगता है कि पहले से एक व्यस्त जगह पर चल रहे स्कूल में भीड़ बढ़ाना कोई अच्छी बात नहीं है।”

स्कूल की प्रिंसिपल कैथी हार्डी ने अभिभावकों को पत्र लिखकर कहा कि वह अपनी सुरक्षा को देखते हुए किसी प्रदर्शन में भाग न लें। साथ ही स्कूल के नियमों और अपेक्षाओं का पालन नहीं करने वाले छात्रों पर बिहेवियर पॉलिसी के तहत कार्रवाई की बात कही है।

बता दें कि हाल ही में इजरायल और फिलिस्तीन के बीच 11 दिनों का संघर्ष चला था। इसमें 200 से ज्यादा फिलिस्तीनियों और इजरायल के 12 लोगों की मौत हो गई थी। बाद में इजरायल ने संघर्ष विराम का ऐलान करते हुए चेतावनी दी थी कि इसका सम्मान नहीं करने पर लड़ाई को फिर से शुरू करने के लिए उसके दरवाजे खुले हैं।

MP: पुलिस ने सड़क पर ठेला लगा सब्जी बेचने से मना किया, सीने में चाकू घोंप उस्मानी फरार

मध्य प्रदेश के जबलपुर में गुरुवार (27 मई 2021) को सड़क पर ठेला लगाकर सब्जी बेचने से मना करने पर एक शख्स ने पुलिसकर्मी पर चाकू से हमला कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गढ़ा थाना इलाके के आनंदकुंज के पास लॉकडाउन में सड़क पर ठेला लगाकर सब्जी बेचने वाले उस्मानी को जब पुलिस आरक्षक अजय श्रीवास्तव ने मना किया तो उसने उन पर चाकू से हमला कर दिया।

गढ़ा थाना प्रभारी राकेश तिवारी ने बताया कि कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन का पालन कराने के लिए 43 वर्षीय आरक्षक अजय श्रीवास्तव की ड्यूटी गुरुवार (27 मई 2021) को आनंद कुंज में लगाई गई थी। जब अजय ड्यूटी पर पहुँचे तो वहाँ उन्हें उस्मानी निवासी आनंद कुंज गढ़ा ठेले पर सब्जी बेचते मिला। ठेले के चारों ओर ग्राहकों की भीड़ लगी हुई थी। आरक्षक ने उसे समझाया कि वह ऐसे रास्ते पर खड़े होकर नहीं, बल्कि मोहल्ले और कॉलोनी में घूमकर सब्जी बेचे। उस्मानी इस बात से नाराज हो गया। उसने कहा कि वह कहीं नहीं जाएगा, जहाँ मन चाहेगा वहाँ खड़े होकर सब्जी बेचेगा।

इसको लेकर आरक्षक और सब्जी विक्रेता में विवाद हो गया। आरक्षक कुछ समझ पाते, तब तक उसने (उस्मानी) ठेले पर रखी चाकू से उन पर जानलेवा हमला कर दिया। सीने में चाकू लगने की वजह से अधिक खून निकल गया, जिससे अजय वहीं गिर पड़े और उस्मानी ठेला छोड़कर भाग निकला।

बताया जा रहा है कि वारदात की सूचना मिलते ही तमाम पुलिस अधिकारी मौके पर घटनास्थल पर पहुँचे और घायल आरक्षक को उपचार के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया। वहीं, हमलावर मौका पाकर वहाँ से भागने में कामयाब रहा।

पुलिस ने आरोपित उस्मानी के खिलाफ हत्या के प्रयास, धारा 188, कोविड गाइडलाइन के उल्लंघन, महामारी एक्ट और शासकीय कार्य में बाधा पहुँचाने सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। आरोपित की तलाश में पुलिस जगह-जगह छापेमारी कर रही है।

अजान इस्लाम का अटूट अंग… लेकिन लाउडस्पीकर नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका, पुराने फैसलों की दलील

इलाहाबाद हाईकोर्ट मस्जिद सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों में लाउडस्पीकर पर रोक लगाने की माँग को लेकर जनहित याचिका पर शुक्रवार (28 मई 2021) को सुनवाई करेगा। वकील आशुतोष कुमार शुक्ल ने यह जनहित याचिका दाखिल की है।

उन्होंने कहा, ”कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से कई राज्यों में लगाए गए लॉकडाउन के कारण प्रत्येक नागरिक अपने घर पर है। लोग घर से ऑफिस का काम कर रहे हैं। घर से बच्चों की ऑनलाइन क्लास चल रही हैं। वकील भी घर से ही वर्चुअल सुनवाई के जरिए मुकदमों पर बहस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में दिन में कई बार लाउडस्पीकर के प्रयोग से मानसिक तनाव हो रहा है। शोर के कारण पास में रहने वालों की नींद में खलल पड़ती है। यह शोर टॉर्चर जैसा है।”

शुक्ल ने आगे कहा कि हर व्यक्ति को उतनी ही आसानी से सोने का हक है, जितनी आसानी से वह साँस लेता है। अच्छी नींद अच्छे स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। अंतत: नींद ऐसी मौलिक, आधारभूत आवश्यकता है, जिसके बिना जिंदगी का वजूद खतरे में पड़ जाएगा। किसी की नींद में खलल डालना उसे यातना देने के समान है, जो कि मानव अधिकार के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।

याचिकाकर्ता ने कहा कि धार्मिक संगठनों को लाउडस्पीकर या एम्पलीफायर का उपयोग करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक स्वतंत्र अधिकार नहीं है। इसके साथ ही अनुच्छेद 25(1) में सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की शर्तें भी जुड़ी हुई हैं। उन्होंने धार्मिक पाठ व अजान के लिए लाउडस्पीकर के नियमित उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिए जाने की माँग की है।

याचिका में एक पुराने मामले को अदालत के संज्ञान में लाते हुए शुक्ल ने कहा अफजल अंसारी बनाम यूपी सरकार के इस केस में हाईकोर्ट ने फैसला दिया था कि अजान तो इस्लाम का आवश्यक एवं अटूट अंग है, लेकिन अजान का लाउडस्पीकर पर बोला जाना धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है। वकील ने कहा कि हाईकोर्ट के इस फैसले की भी अनदेखी की जा रही है।

इसके साथ ही उन्होंने याचिका में इसका भी जिक्र किया है कि अब तक लाउडस्पीकर के खिलाफ सात शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। इसमें छह अजान में लाउडस्पीकर के बेवजह इस्तेमाल के खिलाफ थीं।

याचिकाकर्ता ने क​हा कि मशहूर बॉलीवुड सिंगर सोनू निगम को भी लाउडस्पीकर पर अजान से दिक्कत थी, जिसको लेकर उन्होंने कुछ वर्ष पूर्व ट्वीट किया था। मालूम हो कि सोनू निगम अपने इस ट्वीट के कारण मुस्लिम समुदाय के निशाने पर आ गए थे।

बता दें कि याचिका में कोर्ट से माँग की गई है कि धार्मिक स्थल के आस-पास रहने वालों की आपत्ति को लेकर मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि से ध्वनि प्रदूषण मानक का पालन कराया जाए। साथ ही बिना अनुमति के स्पीकर बजाने पर कानून का पालन कराया जाए।

UP: ग्राम प्रधान शहनाज परवीन की शपथ पर आतिशबाजी, शौहर नजाकत अली सहित 40 पर FIR

उत्तर प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण को नियंत्रित करने के प्रयास लगातार चल रहे हैं। इन्हीं प्रयासों के चलते पंचायत चुनाव जीतने वाले ग्राम प्रधानों को वर्चुअल माध्यम से शपथ दिलाई गई। हालाँकि मुरादाबाद के पाकबड़ा में शपथ लेने के बाद कोविड प्रोटोकॉल का जमकर उल्लंघन किया गया। इसके बाद ग्राम प्रधान शहनाज परवीन के पति समेत 40 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है।

खबरों के मुताबिक घटना मुरादाबाद के पाकबड़ा थाना क्षेत्र के रतनपुर कलाँ गाँव की बताई जा रही है। रतनपुर कलाँ गाँव की प्रधान शहनाज परवीन के शपथ लेने के बाद उनके समर्थकों ने देर रात तक जमकर आतिशबाजी की और Covid-19 के प्रोटोकॉल्स का उल्लंघन किया। लॉकडाउन के उल्लंघन के मामले में पुलिस ने परवीन के पति नजाकत अली समेत 40 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

आपको बता दें की Covid-19 महामारी के चलते पहली बार उत्तर प्रदेश में नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों और पंचायत सदस्यों के लिए शपथ ग्रहण समारोह वर्चुअली आयोजित करने का निर्देश दिया गया था। इसके लिए ग्राम सभाओं में व्यवस्था भी की गई थी। साथ ही शुक्रवार (28 मई) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी वर्चुअल माध्यम से ही नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों से संवाद किया।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के प्रयासों के कारण आज प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण की रफ्तार थम रही है। पिछले 24 घंटों में राज्य में मात्र 2402 संक्रमण के नए मामले सामने आए। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में संक्रमण के सक्रिय मरीजों की संख्या लगभग 50,000 ही रह गई है। नए आँकड़ों के मुताबिक राज्य में 2 ऐसे जिले हैं जहाँ संक्रमण का कोई केस नहीं मिला, जबकि 16 जिलों में मामलों की संख्या 10 से कम और 53 जिलों में संक्रमण के मामलों की संख्या 100 से कम है। सिर्फ 4 जिले ही ऐसे हैं जहाँ संक्रमित मरीजों की संख्या 100 से अधिक रही।

‘किसान’ आंदोलन के नाम पर पहले फैलाया कोरोना का खतरनाक स्ट्रेन, अब कोविड-कुप्रबंधन के नाम पर फिर धरना-प्रदर्शन

अपने प्रदर्शनों के जरिए दिल्ली में कोरोना वायरस के यूके स्ट्रेन को फैलाने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार पंजाब के किसान अब पंजाब सरकार के खिलाफ कोरोना कुप्रबंधन को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) की पंजाब यूनिट ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार द्वारा कोरोना वायरस से निपटने में असफल रहने के विरोध में तीन दिवसीय विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। खास बात यह है कि किसानों ने यह एलान पंजाब में कोरोना प्रतिबंधों को 10 जून तक बढ़ाए जाने की राज्य सरकार की घोषणा के एक दिन बाद किया है।

किसान नेताओं ने दावा किया है कि राज्य सरकार द्वारा कोरोना वायरस से निपटने के कदमों के खिलाफ प्रदर्शन में 2000 से 3000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। किसानों ने आरोप लगाया है कि राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करने में पूरी तरह से विफल रही है। इसी कारण राज्य में कोरोना केस बढ़े हैं।

पंजाब में किसानों के कारण बढ़े कोरोना के केस: रिपोर्ट

पंजाब में कोरोना संक्रमण बढ़ने के लिए किसान राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के महामारी विज्ञानियों ने किसानों के विरोध प्रदर्शनों को पंजाब और दिल्ली में कोरोना के यूके वैरिएंट के फैलने के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

एनसीडीसी के निदेशक डॉ सुरजीत सिंह ने कहा, “पंजाब ने B.1.1.7 कोरोना वैरिएंट के मामलों के बढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कोरोना के प्रसार के लिए 4 मुख्य कारक हैं, जिनमें शादियाँ और 1 फरवरी से 28 फरवरी तक किसानों का विरोध प्रदर्शन इसके लिए जिम्मेदार हैं। इसी के चलते मार्च में ही दिल्ली को 15000 गंभीर मामलों की चेतावनी दे दी गई थी।”

यूके स्ट्रेन सबसे पहले उन एनआरआई में पाया गया जो यूके से लौटे थे। रिपोर्टों के अनुसार, मार्च में कपूरथला और शहीद भगत सिंह नगर में पंजाब के कुल कोविड मामलों का 26 प्रतिशत केस पाए गए थे। पंजाब के दोआब क्षेत्र में शामिल इन दो जिलों में 19 मार्च को राज्य में कोविड से संबंधित कुल मौतों में से 25.6% हुई थीं। 5 अप्रैल को, यह पंजाब में लगभग 28% कोविड मौतों के लिए जिम्मेदार था।

दोआब को ‘एनआरआई बेल्ट’ के नाम से भी जाना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, इस क्षेत्र के एनआरआई भी आम आदमी पार्टी के बहुत बड़े समर्थक हैं। 2017 के राज्य विधानसभा चुनावों से पहले, विदेशों से आप समर्थकों ने इस क्षेत्र में आप उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था। ऐसा माना जाता है कि कई एनआरआई रिश्तेदार जो दोआब में अपने पैतृक घरों में गए थे, अनजाने में अपने साथ यूके का वायरस लेकर आए थे। दोआब क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चार जिलों में आप के दो विधायक हैं। किसानों के विरोध के कारण यह वायरस तब पंजाब के अधिकांश हिस्सों और बाद में दिल्ली में फैल गया था।

पंजाब में कोरोना ही नहीं ब्लैक फंगस के केस भी तेजी से बढ़े

कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब की कॉन्ग्रेसी सरकार ने कोरोना से लड़ने की बजाय शुरुआत में किसानों के विरोध को अपना समर्थन दिया था, लेकिन कोरोना के केस बढ़े तो इन्हीं प्रदर्शनकारी किसानों ने अब इसी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राज्य में बीते कुछ हफ्तों के दौरान कोरोना के साथ ही ब्लैक फंगस के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। गुरुवार (27 मई, 2021) को पंजाब में कोरोना के 3,914 नए मामले सामने आए, जबकि 178 लोगों की मौत हुई थी। वहीं बीते 24 घंटों में, म्यूकोरमाइकोसिस (ब्लैक फंगस) से संक्रमित चार और मरीजों की मौत हो गई, जिससे राज्य में मरने वालों की संख्या 27 हो गई।