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कानून का पालन करो, हमे न हाँको: ट्विटर को मोदी सरकार की दो टूक, नए नियमों पर डिजिटल प्लेटफॉर्म/OTT को 15 दिन का वक्त

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए बनाई गई भारत सरकार की गाइडलाइन फॉलो नहीं करने और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देने पर भारत सरकार ने ट्विटर को फटकार लगाई है। सरकार ने कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है न कि ट्विटर जैसी किसी निजी लाभकारी, विदेशी संस्था की। इस बीच केंद्र सरकार ने नए नियमों के अनुपालन पर ब्यौरा देने के लिए डिजिटल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्मों 15 दिनों का समय दिया है।

इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री की ओर से ट्विटर को फटकार लगाते हुए कहा गया है कि ट्विटर ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने हिसाब से हांकने का प्रयास किया। मंत्रालय ने कहा कि अपने एक्शन्स और जानबूझकर आदेश न मानकर ट्विटर भारत की कानूनी-व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। मंत्रालय ने कहा कि ट्विटर ने रेग्युलेशंस को मानने से इनकार कर भारत में किसी आपराधिक गतिविधि के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनने जैसा काम किया है। 

मंत्रालय ने पूछा कि अगर ट्विटर इतना प्रतिबद्ध है तो आखिर उन्होंने खुद से ऐसा तंत्र क्यों नहीं स्थापित किया, जबकि उसके प्रतिनिधि नियमित रूप से यह दावा करके अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं कि उनके पास कोई अधिकार नहीं है और भारत के लोगों को यूएसए हेडक्वार्टर में बात करनी होगी। मंत्रालय ने ट्विटर की प्रतिबद्धता वाले दावों को खोखला और स्वार्थी करार दिया है।

ट्विटर को ये भी कहा गया कि वह भारत से भारी मात्रा में राजस्व इकट्ठा करने के बावजूद यहाँ निगरानी के लिए एक तंत्र नहीं बनाना चाहती। मंत्रालय के बयान के मुताबिक नए नियम कई तरह के पीड़ितों को एक तंत्र देते हैं। इन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से परामर्श और हर एक का सुझाव लेकर बनाया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के भी ऐसे आदेश हैं कि वो इस संबंध में सही कदम उठाएँ।

मंत्रालय ने आगे कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। भारत सरकार नागरिकों के ट्विटर सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सवाल पूछने और आलोचना करने के अधिकार का सम्मान करती है। सरकार निजता के अधिकार का भी सम्मान करती है।

ट्विटर को सरकार ने भारत की लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की परंपरा की भी याद दिलाई है। सरकार ने कहा, “भारत में सदियों से लोकतांत्रिक व्यवस्था रही है और अभिव्यक्ति की आजादी रही है। भारत में फ्री स्पीच का प्रोटेक्शन करने के लिए हमें किसी निजी, मुनाफे के लिए संचालित और विदेशी संस्थान की जरूरत नहीं है। यहाँ तक कि फ्री स्पीच को रोकने का काम खुद ट्विटर और उसकी गैर-पारदर्शी नीतियों ने किया है। इसी के चलते लोगों के अकाउंट्स को सस्पेंड किया जा रहा है और बिना किसी वाजिब कारण के ही ट्वीट्स भी डिलीट किए जा रहे हैं।”

भारत की कानूनी नीति क्या हो… यह अधिकार ट्विटर का नहीं

मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि ट्विटर को इधर-उधर सिर मारना बंद करना चाहिए और भारतीय कानून का पालन करना चाहिए। कानून बनाना और नीति बनाना संप्रभु राष्ट्र का विशेषाधिकार है और ट्विटर सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। भारत की कानूनी नीति की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, यह तय करने में इसका कोई अधिकार नहीं होगा।

मंत्रालय ने यह भी उदाहरण दिया कि कैसे ट्विटर ने भारतीय कानून का उल्लंघन किया है और भारत के लोगों के हितों को नकारा।

– ट्विटर ने भारतीय केंद्र शासित प्रदेश के कुछ हिस्सों को चीन के हिस्से के रूप में दिखाया था और याद दिलाने के बावजूद गलतियों को सुधारने में कई दिन लग गए थे।

-ट्विटर ने संयुक्त राज्य अमेरिका में कैपिटल हिल में हिंसा के अपराधियों के खिलाफ खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई की थी, लेकिन दिल्ली में लाल किले में इसी तरह की घटनाओं के दौरान भारत सरकार द्वारा ऐसे कंटेंट को रोकने के अनुरोध पर प्लेटफॉर्म ने त्वरित कार्रवाई से इनकार कर दिया था।

-ट्विटर की कार्रवाई न होने के कारण ने भारत और भारतीयों के खिलाफ फर्जी और हानिकारक कंटेंट बड़े पैमाने पर प्रसारित हुआ। टीके को लेकर उठे संदेह को सोशल मीडिया के माध्यम से बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया था और कंपनी ने कोई कार्रवाई नहीं की।

-WHO के निर्देशों के बावजूद B.1.617 कोविड वैरिएंट को ‘भारतीय वैरिएंट’ बताने वाले ट्वीट्स पर फर्जी का टैग नहीं लगाया गया।

इन सबको देखते हुए मंत्रालय ने कहा है कि ट्विटर केवल एक निजी कंपनी है और उसे झूठी शान से बचना और भारत के कानूनों का पालन करना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा कि ट्विटर सहित भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधि हमेशा सुरक्षित रहेंगे और भारत में उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा और सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। सरकार ने ट्विटर के बयान को पूरी तरह से निराधार, झूठा करार देते हुए कहा कि ट्विटर खुद अपनी मूर्खता को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

I&B मंत्रालय ने दिया 15 दिन का समय

बता दें कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 25 फरवरी को ‘मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम, 2021’ के तहत डिजिटल प्लेफॉर्म्स के लिए नई गाइडलाइन जारी की थी। इसे लागू करने की अंतिम तिथि 26 मई थी। हालाँकि, अधिकतर प्लेटफॉर्म इन दिशा-निर्देशों का पालन करने में विफल रहे हैं, जिसके बाद ऑनलाइन न्यूज पब्लिशर्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को 15 दिन का समय देकर गाइडलाइन के अनुपालन का ब्योरा माँगा गया है।

‘ट्विटर न जाँचकर्ता है और न जज, लेकिन कोशिश दोनों बनने की कर रहा’: टूलकिट पर दिल्ली पुलिस ने लताड़ा

कॉन्ग्रेस टूलकिट मामले में ट्विटर के बयान के बाद दिल्ली पुलिस ने इस प्लेटफॉर्म को जमकर लताड़ लगाई है। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि ट्विटर के सारे आरोप मिथ्या हैं। इनका उद्देश्य वैध जाँच को बाधित करना है। पुलिस के बयान में यह भी कहा गया कि ट्विटर जाँच और न्यायिक प्राधिकारी होने का प्रयास कर रहा है, जबकि उसे इसकी इजाजत नहीं है।

दिल्ली पुलिस ने कहा है कि ‘टर्म्स ऑफ सर्विस’ के नाम पर ट्विटर मौजूदा दस्तावेजों (कॉन्ग्रेस टूलकिट) की प्रमाणिकता जाँचने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा वह खुद जाँच अधिकारी और न्यायाधीश बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे इसकी मँजूरी नहीं है।

बयान में कहा गया कि इस मामले में जाँच के लिए अधिकृत एकमात्र कानूनी संस्था पुलिस है और दस्तावेजों की सत्यता का पता लगाने के लिए न्यायालय है। बयान में दिल्ली पुलिस ने ये भी कहा कि टूलकिट मामले में शिकायत को कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा दायर करवाया गया था। लेकिन ट्विटर ने यह दिखाने की कोशिश की कि इस शिकायत को भारत सरकार ने दर्ज करवाया है, जो बिलकुल झूठ है।

जानकारी है लेकिन पुलिस के साथ नहीं साझा करना चाहते

पुलिस ने बताया कि मामला जाँच के तहत था जब ट्विटर ने डॉक्यूमेंट को मैनिपुलेटि़ड मीडिया टैग के साथ जोड़ा। इसका मतलब है कि ट्विटर मामले से परिचित था और उसके पास ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी थी जिसकी एक कानून प्रवर्तन एजेंसी को आवश्यकता थी। इसलिए ट्विटर से दिल्ली पुलिस ने पूछताछ का हिस्सा होने को कहा। उन्होंने यह भी बताया कि कानूनी तौर पर ट्विटर इस तरह की जानकारी पुलिस के साथ साझा करने के लिए बाध्य है, इसे लेकर तो कोई कन्फ्यूजन होनी ही नहीं चाहिए। 

पुलिस के बयान में आगे कहा गया है कि ट्विटर इंडिया के एमडी ने दावा किया है कि वह केवल एक सेल्स प्रमुख है और कंटेंट में उनकी कोई भूमिका नहीं है। हालाँकि, ये दावे ट्विटर एमडी के अपने पहले की बातों (प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान की गई) से विरोधाभासी हैं, जहाँ उन्होंने अपमानजनक और मेनिपुलेटिव कंटेंट की पहचान करने के तरीकों को विकसित करने के लिए कंपनी की योजनाओं पर चर्चा की थी। पुलिस ने ट्विटर की इस पलटी को अंग्रेजी मुहावरे डियर कॉट इन हेडलाइट्स से जोड़ा है।

इसके आगे दिल्ली पुलिस ने ट्विटर के बयान को गलत और निराधार कहा। पुलिस के मुताबिक ट्विटर इंडिया के एमडी को केवल एक नोटिस दिया गया था। वह भी जाँच में भाग लेने के लिए। इसमें उन्हें ‘आरोपित’ नहीं बनाया गया था, क्योंकि ट्विटर (मैनिपुलेटिड मीडिया का टैग जोड़कर) ने मामले के बारे में जानकारी रखने का दावा किया था।

पुलिस का मानना है कि ट्विटर इंडिया के हालिया बयान सहानुभूति प्राप्त करने के लिए है, जबकि सच ये है कि वे खुद न केवल देश के कानून का पालन करने से इनकार करते हैं, बल्कि टूलकिट मामले चल रही पुलिस जाँच में सबूत होने के बावजूद उन्हें पुलिस से साझा नहीं करना चाहते।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस ने टूलकिट मामले में दिल्ली पुलिस के पास दर्ज शिकायत को हाल में वापस लेकर इसे छत्तीसगढ़ से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद पार्टी ने ट्विटर को भी पत्र लिख कर भाजपा नेताओं पर कार्रवाई करने की अपील की थी।

बयान में ट्विटर ने क्या कहा था

बता दें कि ट्विटर ने इससे पहले दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह पुलिस के डराने-धमकाने की रणनीति और अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा होने से चिंतित हैं। Twitter ने अपने बयान में दावा किया कि नए IT नियमों के मूल तत्वों का वो पालन कर रहा है और साथ-साथ वैश्विक ‘टर्म्स ऑफ सर्विस’ के हिसाब से भी कार्य कर रहा है। उसने भारत सरकार द्वारा लाए गए नए IT नियमों के बारे में कहा कि वो इसके कुछ हिस्से में बदलाव चाहता है, ताकि लोगों के बीच बातचीत या चर्चा खुली व स्वतंत्र रूप से हो सके। उसने भारत सरकार के साथ अपनी बातचीत को जारी रखने की भी बात कही थी।

IMA की दुकान में तेल से लेकर पेंट तक: पैसे लेकर देता है सर्टिफिकेट, धंधे में कितनी कमाई, कोई हिसाब नहीं

जहाँ एक तरफ ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ बाबा रामदेव के पीछे पड़ा हुआ है और उन पर कोरोना वैक्सीन के खिलाफ अफवाह फैलाने का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ये संगठन खुद अजीबोगरीब तौर-तरीकों से रुपए कमाने में लगा हुआ है। प्रोडक्ट्स को ‘सर्टिफिकेट’ देने का ठेका लेने वाले IMA को क्यों न एक कमर्शियल कंपनी माना जाए? IMA कोई सरकारी या सरकार पोषित संस्था तो है नहीं, लेकिन इसका व्यवहार ऐसा है जैसे ये देश में मेडिकल नियामक संस्था हो।

IMA का कहना है कि ‘पतंजलि आयुर्वेद’ के प्रमोटर बाबा रामदेव जनता को डर दिखा कर उससे एक तरह की फिरौती वसूल रहे हैं और वैज्ञानिकों दवाओं को बदनाम कर के अपना व्यापार बढ़ा रहे हैं, जो कि एक ‘अक्षम्य अपराध’ है। बाबा रामदेव तो खुद कहते रहे हैं कि वो व्यापारी हैं और व्यापार तो दुनिया के किसी भी कोने में एक कानून सम्मत कार्य है। ईसाई मिशनरी चंगुल में फँसे IMA को खुद के गिरेबान में झाँकना चाहिए।

दरअसल, खुद IMA ने पिछले दरवाजे से रुपए कमाने के लिए कुछ हथकंडे अपनाए हैं। वो प्राइवेट कंपनियों के प्रोडक्ट्स को ‘सर्टिफिकेट’ देकर उनका प्रचार करता है, लेकिन प्रत्यक्ष रूप से नहीं कहता कि वो फलाँ प्रोडक्ट का प्रचार कर रहा है। ये किसी भी प्रोडक्ट को ‘स्वास्थ्य के लिए ठीक’ होने का सर्टिफिकेट बाँटता है। इसके लिए उन कंपनियों के साथ गुप्त समझौते होते हैं। IMA ये तक नहीं बताता कि वो कितने रुपए लेकर ऐसा करता है।

यहाँ तक कि उसने एक ‘एंटी-माइक्रोबियल LED बल्ब’ को भी सर्टिफिकेट दिया। ये 85% कृमियों को मारने का दावा करता है। साथ ही उसने संक्रमण पैदा करने वाले 99% बैक्टेरिया को 2 घंटे में मार गिराने का दावा करने वाले एक पेंट को भी सर्टिफिकेट दिया। IMA प्रोडक्ट्स के साथ-साथ ‘तकनीक’ को भी सर्टिफिकेट देने लगा है। कोरोना से पहले ही ये सब शुरू हो गया था। कोरोना में तो ये कारोबार और फला-फूला है।

इसके लिए कंपनियों से ‘प्रोसेसिंग फी’ लिए जाते हैं, लेकिन इसकी रकम का खुलासा नहीं किया जाता। किस वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर IMA ये सर्टिफिकेट देता है? कौन सी जाँच की जाती है? विज्ञान-विज्ञान रटने वाला IMA अगर सिर्फ पैसे के लिए ये सब नहीं कर रहा है तो वो बताए कि किस जर्नल में प्रकाशित कौन से रिसर्च पेपर के आधार पर वो किसी भी प्रोडक्ट या तकनीक को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बता देता है?

इसके लिए कौन सी प्रक्रिया अपनाई जाती है, ये सार्वजनिक क्यों नहीं है? सब कुछ गुप्त क्यों? दरअसल, पहले IMA प्रत्यक्ष रूप से प्रोडक्ट्स का प्रचार किया करता था। 2010 में उसने फ्रूट जूस, ओट्स, साबुन और वॉटर प्यूरीफायर का प्रचार किया था, जिसके बाद ‘मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI)’ ने उसे नोटिस भी भेजी थी। इसके बाद उसने अप्रत्यक्ष तरीका आजमाया। ‘कोड ऑफ मेडिकल एथिक्स रेगुलेशन’ का उल्लंघन किया गया था।

2015 में उसने फिर वॉटर प्यूरीफायर का प्रचार किया और कहा कि इस तरह से रुपए जुटाना नियमों के विरुद्ध नहीं है। कई डॉक्टरों ने भी उसकी इस करतूतों का विरोध किया। IMA ‘हडसन केनोला आयल’ का प्रचार करता है। ‘रॉयल हेल्थ शील्ड’ नामक पेंट को उसके नाम पर बेचा जाता है। केंट वॉटर प्यूरीफायर से लेकर क्रॉम्पटन के बल्ब तक का उसके नाम पर प्रचार किया जाता रहा है। इसे एक व्यापारिक कंपनी क्यों न माना जाए?

वैज्ञानिक चोला ओढ़ कर IMA अध्यक्ष डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल जीसस से प्रार्थना करने पर कोरोना ठीक होने की बातें करते हैं। बाबा रामदेव पर एलोपैथी को ख़ारिज करने का आरोप लगाते हुए 1000 करोड़ रुपए का मानहानि के मुक़दमे की धमकी दी गई है। बाबा रामदेव ने 25 सवाल पूछे, जिनमें से एक का भी जवाब IMA नहीं दे पाया। आयुर्वेद और भाजपा से नफरत करने वाले जयलाल मोदी सरकार विरोधी प्रोपेगंडा का हिस्सा हैं।

अस्पताल के कमरे में बेल्ट और रॉड से बीजेपी नेता को महाराष्ट्र पुलिस ने पीटा: जानिए क्या है मामला

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें महाराष्ट्र के पुलिसकर्मी एक आदमी को बेरहमी से मारते हुए दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में दिख रहा आदमी हाथ जोड़कर दया की भीख माँग रहा है, लेकिन पुलिसकर्मी उसे पीटते रहे।

दिव्य मराठी की रिपोर्ट के अनुसार यह घटना 09 अप्रैल 2021 को महाराष्ट्र के जालना जिले के एक अस्पताल परिसर की है और जिस व्यक्ति को पीट जा रहा है वह स्थानीय भाजपा नेता शिवराज नरियालवाले हैं। स्थानीय अखबार में बताया गया कि घटना के दिन जालना के एक निजी अस्पताल में एक युवक की मौत हो गई। युवक के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाया था। इसके बाद से जालना में भाजपा के युवा मोर्चा के महासचिव शिवराज नरियालवाले अस्पताल पहुँच गए और अस्पताल प्रशासन से प्रश्न करने लगे।

अस्पताल की लापरवाही के बाद मृत युवक के परिजनों और अस्पताल प्रबंधन के बीच बहस हो गई और बात बढ़ने पर पुलिस को सूचना दी गई।  

अस्पताल की सूचना पर डीएसपी सुधीर खिराड़कर और कादिम जालना पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर प्रशांत महाजन घटनास्थल पर पहुँच गए। पहले तो पुलिसकर्मी मृत युवक के परिजनों को समझा रहे थे, लेकिन जब परिजन नहीं माने तो पुलिस अधिकारियों ने उनसे बदतमीजी शुरू कर दी। भाजपा नेता शिवराज नरियालवाले ने पुलिसकर्मियों की बदतमीजी को फोन में कैद करना चाहा। पुलिस अधिकारी इस बात से नाराज हो गए और उन्होंने नरियालवाले को एक दूसरे कमरे में ले जाकर बेल्ट और रॉड से उनकी बेरहमी से पिटाई कर दी। डर के कारण भाजपा नेता ने इस बात की कहीं शिकायत नहीं की।  

2 महीने बाद घटना के बारे में बताया

हाल ही में जब डीएसपी सुधीर खिराड़कर के घूस लेने के मामले में सस्पेंड होने की खबर आई तब भाजपा नेता नरियालवाले ने वीडियो रिलीज किया और अपनी आपबीती सुनाई। दिव्य मराठी से बात करते हुए नारियलवाले ने 09 अप्रैल 2021 को हुई घटना के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि तब मैं पुलिस अधिकारियों के डर से कुछ नहीं बोल सका, लेकिन अब कोई डर नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र पुलिस के अधिकारियों द्वारा की गई पिटाई के कारण न केवल शारीरिक चोट लगी बल्कि वे मानसिक रूप से भी आहत हुए। भाजपा नेता ने कहा कि अब वे चुप नहीं रहेंगे। जिन्होंने उनके साथ बेरहमी से मारपीट की है उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 307 के तहत मामला दर्ज करवाएँगे।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के शासनकाल में महाराष्ट्र पुलिस की मनमानी की कई खबरें आईं। पिछले साल ही शिवसेना के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी सरकार से फीस में छूट की माँग कर रहे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ भी महाराष्ट्र पुलिस ने बदतमीजी की थी। इसके अलावा नवंबर 2020 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर की जाने वाली अवैध कार्रवाईयों का विरोध कर रहे भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ताओं के साथ मुंबई पुलिस की बदतमीजी सामने आई थी।  

फोन कॉल, वॉट्सएप मैसेज, फेसबुक, ट्विटर सब पर सरकार रखेगी निगरानी: वायरल संदेश की सच्चाई क्या?

सोशल मीडिया कंपनियों को लेकर भारत सरकार के नए नियमों पर बहस चल रही है। इस बीच इन नियम की आड़ में कई तरह के दावे किए जा रहे हैं। इसी क्रम में इस बार वॉट्सएप के माध्यम से ये दावा किया गया है कि सरकार नए संचार नियम के चलते लोगों के सोशल मीडिया पर और फोन कॉल्स पर निगरानी बनाए हुए है।

इस दावे में कितनी सच्चाई है इसकी पोल पीआईबी ने खोली है। पीआईबी फैक्टचेक ने ट्विटर पर ऐसे संदेशों की तस्वीर के साथ कहा, “एक वायरल मैसेज में दावा किया जा रहा है कि भारत सरकार द्वारा अब ‘नए संचार नियम’ के तहत सोशल मीडिया और फोन कॉल की निगरानी रखी जाएगी। यह दावा बिलकुल फ़र्ज़ी है। भारत सरकार द्वारा ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया गया है। ऐसे किसी भी फ़र्ज़ी/अस्पष्ट सूचना को फॉरवर्ड ना करें।”

बता दें कि वॉट्सएप पर वायरल होते पोस्ट में कहा गया है कि भारत सरकार अब लोगों के कॉल रिकॉर्ड करेगी। हर रिकॉर्डिंग सेव करेगी। वॉट्सएप, ट्विटर, फेसबुर पर निगरानी रखी जाएगी। ऐसे में पीआईबी के फैक्टचेक में बताया गया कि भारत सरकार ऐसा कोई संचार नियम नहीं लेकर आई है। इसलिए ऐसे संदेशों के झांँसे में न आएँ। 

गौरतलब है कि इससे पहले भारत सरकार की छवि धूमिल करने के लिए कई ऐसे प्रयास हो चुके हैं। पिछले दिनों  एलपीजी सिलेंडर के दामों पर भी इसी तरह का एक झूठ फैलाया गया कि भारत सरकार एलपीजी सिलेंडरों के दामों पर बदलाव करने के विचार कर रही है। मगर फैक्ट ये था कि ये दावा पूरा गलत है। भारत सरकार ने एलपीजी सिलेंडर के दामों में परिवर्तन संबंधी कोई घोषणा नहीं की थी।

इससे पहले, मीडिया खबरों के जरिए UPI ट्रांजैक्शन के महँगे होने की खबर भी सामने आई थी। इनमें दावा किया गया था कि यदि थर्ड पार्टी एप्स से पेमेंट की गई तो अतिरिक्त चार्ज लगेगा। हालाँकि, सरकार ने इस दावे को खारिज करते हुए किसी प्रकार की यूपीआई ट्रांजैक्शन में बढ़ोतरी से इंकार किया था। फैक्टचेक से यह स्पष्ट किया गया था कि NPCI की ओर से ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया गया है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स बता रही थीं कि थर्ड पार्टी ऐप से ट्रांजैक्शन करने पर अतिरिक्त चार्ज लगेगा।

महात्मा गाँधी की हत्या के लिए सजा क्यों नहीं? गोडसे ने कोर्ट को क्या तर्क दिए? मुकदमे से संबंधित दस्तावेज पढ़ने पर रोक क्यों?

मानवता के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हत्या को समाज में सबसे घिनौना अपराध माना जाता रहा है। किसी की हत्या का अर्थ न केवल उसके जीवन का अंत होता है बल्कि वह समाज में औरों के जीवन को भी प्रभावित करती है। इतिहास में झाँके तो पाएँगे कि अपराध, न्याय, न्यायिक प्रक्रिया और न्यायालय के परिप्रेक्ष्य में तमाम मुकदमों में हत्या के मुकदमे सबसे अधिक चर्चित रहने के साथ-साथ कौतूहल भी जगाते रहे हैं। आम व्यक्तियों की हत्या के मामले में भी यह कौतूहल इस बात का मोहताज नहीं रहता कि जिसके मन में जगा है, उसका मारने या मरने वाले से सम्बन्ध है या नहीं। पर यदि बात किसी आम व्यक्ति के बारे में न होकर महात्मा गाँधी के बारे में हो तो स्वाभाविक है कि यह कौतूहल कई गुना बढ़ जाएगा। आखिर महात्मा गाँधी हमारे राष्ट्रपिता थे। 

आज 27 मई है। आज के ही दिन महात्मा गाँधी की हत्या का ट्रायल 1948 में शुरू हुआ था। 73 वर्ष बीत गए हैं पर महात्मा की हत्या के मुकदमे की प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच आज भी किसी न किसी तरह का कौतूहल बना हुआ है। प्रश्न उठते रहते हैं। कितने लोग हत्या के षड्यंत्र में शामिल थे? जितने लोग शामिल थे क्या सब को सजा मिली? क्या महात्मा की हत्या के पीछे किसी संस्था का भी हाथ था? जिन्हें फाँसी दी गई, क्या केवल उन्हीं को फाँसी दी जानी चाहिए थी? क्या अपराध के इस मामले में कुछ ऐसे लोग शामिल थे जिनके बारे में उतनी बात नहीं हुई जितनी गोडसे के बारे में हुई? गोडसे को यदि लगता था कि उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए तो उसे ऐसा क्यों लगता था? गोडसे ने अपने बचाव में क्या कहा होगा जिसे आज तक हम नहीं जान पाए? गोडसे को 15 नवम्बर, 1949 के दिन फाँसी पर चढ़ाया गया था। क्या ऐसी संभावना थी कि 26 जनवरी, 1950 को सुप्रीम कोर्ट के अस्तित्व में आने से उसकी फाँसी रुक जाती और उसकी अपील को सुप्रीम कोर्ट स्वीकार कर लेता? क्या महात्मा की हत्या का मुकदमा अपने अंतिम पड़ाव पर सुप्रीम कोर्ट में पहुँच सकता था?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो समय-समय पर पूछे जाते हैं और सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बनते हैं। समय-समय पर सरकार के पास आरटीआई के तहत आवेदन भी किए जाते रहे हैं जिनमें न्यायिक प्रक्रिया के दस्तावेजों से लेकर जाँच से संबंधित दस्तावेजों को जारी करने की माँग होती है। इस विषय पर केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा 2017 में दिया गया एक महत्वपूर्ण फैसला है, जिसमें केंद्र सरकार से कहा गया था कि वह महात्मा गाँधी की हत्या से मुक़दमे से सम्बंधित दस्तावेजों को डी-क्लासिफाई कर उन्हें सार्वजनिक करे ताकि आरटीआई के तहत समय-समय पर आने वाले आवेदन की आवश्यकता न पड़े और लोगों को भी ऐसे ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण मुक़दमे के सम्बन्ध में पता चले। यह और बात है कि सरकार की ओर से इसे लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है। हाल में महात्मा की हत्या से जुड़े बिंदुओं की चर्चा इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बंधित कुछ दस्तावेजों को प्रधानमंत्री मोदी ने डी-क्लासिफाई करवाया था। 

नेताओं और उनके जीवन या मृत्यु को लेकर हर देश और समाज के लोगों में उत्सुकता रहती है पर यदि बात महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन या जॉन कैनेडी के जीवन या मृत्यु/हत्या की हो यो यह उत्सुकता अलग ही स्तर पर पहुँच जाती है। यदि पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों, खासकर अमेरिका से तुलना करें तो पाएँगे कि अमेरिकी सरकार अपने बनाए प्रोटोकॉल के तहत समय-समय पर सरकारी दस्तावेजों को डी-क्लासिफाई करती रही है। ऐसे में यह माँग स्वाभाविक हो जाती है कि हमारी सरकार भी ऐसे राजनीतिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों को समय-समय पर डी-क्लासिफाई करे। यह आधुनिक लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए आवश्यक भी है और तर्क सम्मत भी। वैसे भी देखा जाए तो हमारे नेताओं के जीवन से संबंधित बहुत सारे तथ्य हैं जो हाल के वर्षों में सरकारी दस्तावेजों के रूप में नहीं तो किसी न किसी और रूप में देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन का हिस्सा बने हैं और उन पर एक बहस भी होने लगी है।      

पिछले सत्तर वर्षों के राजनीतिक और सामाजिक संवादों में नाथूराम गोडसे को भारत का सबसे घृणित व्यक्ति बताया जाता रहा है। इन संवादों का चरित्र ऐसा रहा है कि महात्मा का नाम आते ही गोडसे का नाम अपने आप आ जाता है। खुद गोडसे पर बहुत कुछ लिखा गया है। कुछ लोग उसके समर्थन में उतरने लगे हैं। ख़बरों की मानें तो कुछ अति उत्साही लोगों ने तो उसके लिए मंदिर भी बनवा रखा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उसके संबंधों की चर्चा तथ्यों को अलग रखकर की जाती रही है। सुविधानुसार हिन्दू महासभा से उसके संबंधों को पीछे फेंकते हुए उसे संघ से जानबूझकर बार-बार जोड़ा जाता रहा है। राहुल गाँधी जबसे नेता बने हैं, आए दिन तथ्यों को परे रख कर कहते रहते हैं कि महात्मा गाँधी की हत्या संघ के लोगों ने की है। यह बात अलग है कि ऐसा कहने के लिए उनके ऊपर मुकदमा चल रहा है, जिसकी तारीखों से वे भागते रहते हैं।

पिछले तीन-चार वर्षों में राजनीतिक बहस पर नजर डालें तो ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलते हैं जब गोडसे को तथाकथित हिन्दू आतंकवाद से जोड़ने की कोशिश भी की गई। उसे भारत का पहला आतंकवादी बताते हुए कहा गया कि भारत का पहला आतंकवादी हिन्दू था। गोडसे के नाम का इस्तेमाल लोग अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए बिना किसी हिचक के करते रहे हैं।

नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे को भी महात्मा की हत्या की साज़िश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था पर 1964 में उन्हें रिहा कर दिया गया। उन्होंने भी अपने भाई पर लिखा। देश के इतिहास और समाज में महात्मा गाँधी का जो स्थान रहा है उसके कारण गोडसे का पूरा परिवार अपने माथे पर एक कलंक लिए जीता होगा। ऐसे में क्या यह आवश्यक नहीं हो जाता कि हत्या के इस मुक़दमे से सम्बंधित दस्तावेज जनता के लिए उपलब्ध कराए जाएँ? लोग देखें तो कि अपने बचाव में गोडसे ने क्या कहा? किन कारणों से उसे लगता था कि उसे सजा नहीं मिलनी चाहिए? जब उसे और उसके साथियों को पूर्वी पंजाब हाईकोर्ट से सजा मिली तो फिर उसे अपने खिलाफ मुक़दमे और दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील का अधिकार क्यों नहीं दिया गया? हत्या के तीन और आरोपियों के विरुद्ध किसी तहकीकात के सबूत नेशनल आर्काइव में क्यों नहीं मिलते? महात्मा की हत्या के बाद देश में, खासकर महाराष्ट्र में उत्पन्न हुई परिस्थितियों के बारे में लोगों को पता चले। पता चले कि जो महात्मा गाँधी जीवन भर अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे उनकी हत्या के बाद महाराष्ट्र में क्यों ब्राह्मणों को क्या केवल इसलिए मारा गया क्योंकि गोडसे ब्राह्मण था?                 

केंद्रीय सूचना आयोग के 2017 के फैसले के बाद सरकार को चाहिए कि ऐसे दस्तावेजों को डी-क्लासिफाई करे ताकि पिछले सत्तर वर्षों से उठते रहने वाले ऐसे प्रश्नों का उत्तर मिले। ऐसे कदम हमारे लोकतंत्र को पारदर्शी ही बनाते हैं। वैसे ही हमारे इतिहास और इतिहासकारों की प्रामाणिकता को लेकर आए दिन प्रश्न और विवाद उठते रहते हैं जिसकी वजह से सामाजिक और राजनीतिक विवादों में तमाम स्थापित मान्यताओं को शंका की दृष्टि से देखा जाता है। इसका असर यह होता है कि सहज संवाद भी विवाद का कारण बनते हैं। ऐसे में ऐतिहासिक दस्तावेजों तथ्यों का डी-क्लासिफिकेशन संवादों से उत्पन्न होने वाले विवाद को रोकने में सहायक ही होगा। बस देखना यह है कि ऐसा हो पाता है क्या, और यदि हो पाता है तो कब? 

IMA ने दिल्ली पुलिस से की बाबा रामदेव की शिकायत: ₹1000 करोड़ की मानहानि का नोटिस, PM-CM को खत के बाद दबाव का नया मोर्चा

योगगुरु बाबा रामदेव और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) का विवाद अब पुलिस की चौखट तक पहुँच गया है। IMA ने एलोपैथी पर बाबा रामदेव के बयान को लेकर उनके खिलाफ दिल्ली के आईपी एस्टेट पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई है।

IMA के द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में महासचिव डॉ. जयेस लेले ने कहा है कि बाबा रामदेव ने अपने साथियों के साथ स्वास्थ्य समुदाय और सामान्य जनता का नुकसान किया है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि बाबा रामदेव ने गंभीर अपराध किया है जिसके लिए उन्हें महामारी अधिनियम 1897 और कानून की अन्य धाराओं के तहत सजा मिलनी चाहिए।

इस शिकायत में यह भी माँग की गई है कि पुलिस इस मामले की जाँच करे और पता लगाए कि बाबा रामदेव के साथ और कौन हैं जो सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देने और ‘अनप्रूव्ड’ और ‘अनअप्रूव्ड’ चिकित्सा पद्धति को प्रमोट करने के षड्यन्त्र में शामिल हैं।

IMA के द्वारा दिल्ली पुलिस के पास दर्ज शिकायत में योगगुरु बाबा रामदेव पर महामारी अधिनियम 1897, आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005, आईपीसी और अन्य संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की माँग की गई है।

इससे पहले बुधवार (26 मई) को IMA ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बाबा रामदेव के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा लगाकर कार्रवाई करने की माँग की थी। इसके पहले IMA उत्तराखंड ने बाबा रामदेव को 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा था। नोटिस में उनसे अपने बयान का खंडन कर लिखित और वीडियो के जरिए माफी की माँग की गई है। इसके लिए बाबा रामदेव को 15 दिनों का वक्त दिया गया है।

आपको बता दें कि एक वीडियो में एलोपैथी को लेकर बाबा रामदेव के दावे के बाद इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई थी। इसको लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने भी आपत्ति जताई थी। इसके बाद बाबा रामदेव ने अपने बयान के लिए माफी माँगी थी। हालाँकि बाबा रामदेव ने एलोपैथी को लेकर IMA और दवा कंपनियों से 25 सवाल भी पूछे थे।

दलित नाबालिग को रब्बान ने किया था अगवा, 100 दिन बाद भी सुराग नहीं: बेबस पिता की पुकार- कोई यह ही बता दे वह जिंदा है

बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी थाना क्षेत्र का एक गाँव है अंधरी। इसी थाना क्षेत्र के एक गाँव मुहम्मदपुर में पिछले दिनों सामूहिक हत्याकांड हुई थी, जिसकी चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर हुई थी। लेकिन, इसी थाना क्षेत्र के अंधरी के एक पिता की बेबसी यह है कि उसकी कोई सुन नहीं रहा। दरअसल, तीन महीने से ज्यादा हो गए जब इस पिता की नाबालिग बेटी को कथित तौर पर अगवा कर लिया गया था। उनका कहना है कि रोज पुलिस-प्रशासन से न्याय माँगने जाते हैं, लेकिन कोई सहयोग नहीं मिलता। निराशा के साथ वे घर लौटते हैं। कथित तौर पर पुलिस उनकी बेटी का पता लगाने की जगह उनसे कहती है कि जब उसकी कोई खबर मिले तो पुलिस को भी वे बता दें।

इस दलित नाबालिग लड़की को 17 फरवरी 2021 की शाम शौच जाते वक्त अगवा करने का आरोप गाँव के ही मोहम्मद रब्बान पर है। पीड़ित पिता के अनुसार उन्होंने अपने स्तर पर बहुत प्रयास किए कि किसी तरह रब्बान उनकी बेटी को घर छोड़ दे। लेकिन कोई कोशिश सफल नहीं हुई। आज तक उन्हें अपनी बेटी का कुछ पता नहीं चला है। गाँव वाले पीड़ित परिवार की हालत देख रब्बान के माता-पिता को वापस आने को कहते हैं, लेकिन वह भी वापस लौटकर कोई सहयोग नहीं करते और न बेटे के बारे में कुछ बताते हैं।

ऑपइंडिया से बात करते हुए नाबालिग के पिता कहते हैं, “मेहनत मजदूरी करके हमने अपनी बच्ची को पढ़ाया ताकि जहाँ जाए अच्छा जीवन जिए। हमें भी गर्व हो कि हमारी बेटी पढ़ी-लिखी है। लेकिन, अब हम सिर्फ दो छोटे लड़के हैं। घर में बिलकुल मातम छाया रहता है। सब मरे हालत में पड़े रहते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वह अपनी मर्जी से गई। अगर ऐसा हुआ भी है तो भी तो हमें हमारी बेटी के बारे में पता चलना चाहिए। उसका अपहरण हुआ। हमें तो यही नहीं पता कि वह जिंदा है कि उसे मार कर फेंक दिया गया। वह आकर कोर्ट में अपना खुद बयान दे। हम ये जानना चाहते हैं कि वह ठीक है या नहीं।”

लड़की के पिता के अनुसार पुलिस की निष्क्रियता देख वे कई जगहों का दरवाजा खटखटा चुके हैं। लेकिन, हर जगह उन्हें झूठी तसल्ली देकर लौटा दिया जाता है। उनका आरोप है कि दूसरे पक्ष की ओर से पैसा देकर मामले को दबाने का प्रयास हो रहा है। वहीं एक मस्तान नाम का युवक (झाड़-फूँक करने वाला) है जो गाँव में हो रही हर कार्रवाई के बारे में लड़के के परिजनों को बताता है और उन्हें गाँव आने से रोकता है।

पीड़िता पिता के अनुसार, “वे गरीब हैं इसलिए उनकी सुनवाई नहीं हो रही।” उनका कहना है कि पुलिस से भी जब छापेमारी की बात कहते हैं तो पुलिस गाड़ी का खर्चा उठाने को कहती है। व पूछते हैं, “मेहनत मजदूरी करने वाला आखिर इतनी दूर-दूर जाने के लिए पैसा कहाँ से लाएगा।”

पीड़ित पिता के अनुसार, हाल में पुलिस उनके साथ मुजफ्फरपुर छापेमारी के लिए गई थी। लेकिन वहाँ न तो रब्बान का सुराग मिला और न ही उसके माता-पिता का। इस बीच किसी ने उन्हें सलाह दी कि यदि वह आरोपित पक्ष की जमीन कैप्चर करेंगे तो शायद वह लोग जमीन छुड़ाने के डर से लौट आएँ। मगर जब उन्होंने ऐसा कुछ करने का प्रयास किया तो वहाँ के अन्य मुस्लिमों ने कहा कि अगर लड़का या उसके माँ-बाप नहीं लौटे तो इस पर उनका अधिकार होगा न कि उनका (दलित व्यक्ति का)। वह पूछते हैं, “हमारी इज्जत के साथ खिलवाड़ हो गया और दूसरा पक्ष इस तरह की बातें कर रहा है। पुलिस भी रोक रही है।”

बता दें कि इस मामले में ऑपइंडिया ने 12 मार्च को एक विस्तृत रिपोर्ट की थी। पिता ने उस समय हमें घटना वाले दिन से जुड़ी हर जानकारी देते हुए पुलिस की कार्रवाई पर असंतोष जताया था। आज 3 माह बाद भी स्थिति वही है। हमने इस संबंध में मामले के जाँच अधिकारी बीरेंद्र तिवारी से संपर्क किया।

उन्होंने बताया कि वह खोजबीन में जुटे हुए हैं। कोई सुराग नहीं मिल सका है। जब हमने पीड़ित पिता के आरोपों पर जवाब माँगा कि उनके छापेमारी में आने वाले गाड़ी के खर्चे को उठाने के लिए कहा जाता है तो उन्होंने इसे खारिज करते हुए कहा कि थाने में 1-2 गाड़ी हैं। अभी हाल में उन्हें लेकर मुजफ्फरपुर गए थे। लेकिन जब वहाँ भी कोई सुराग नहीं मिला तो क्या करें। पीड़ित पिता के आरोपों को खारिज करते हुए जाँच अधिकारी का कहना है कि उनकी ओर से प्रयास हो रहा है। कुछ पता चलेगा तो फौरन कार्रवाई होगी।

इस मामले में पीड़ित पिता ने अपने क्षेत्र के विधायक विनोद नारायण झा से भी मदद माँगी है। हमने जब उनसे इस बाबत संपर्क किया तो वह बोले कि ये मामला उनके संज्ञान में है और ये बात बिलकुल सच है कि पुलिस अभी तक लड़की की रिकवरी नहीं कर पाई है। कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है। इस बारे में एसपी से एक बार दोबारा बात की जाएगी। प्रयास किया जाएगा कि लड़की मिल जाए।

उल्लेखनीय है कि पूरे मामले में पिता ने अपनी शिकायत में बताया है कि उनके गाँव के ही 22 साल के मोहम्मद रब्बान ने अपने अब्बा मोहम्मद साकिम व अम्मी के साथ मिलकर उनकी लड़की का शादी की नीयत से अपहरण किया। वह पहले भी उनकी बेटी से छेड़छाड़ करता था।

अमेज़न ने ₹61000 करोड़ में खरीदा हॉलीवुड का 100 साल पुराना स्टूडियो: 4000 फिल्मों और 17000 सीरीज का बना मालिक

दुनिया की शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों में से एक Amazon ने बुधवार (मई 26, 2021) को घोषणा की है कि उसने ‘मेट्रो-गोल्डविन मेयर (Metro-Goldwyn-Mayer)’ को खरीदने के लिए डील पक्की कर ली है। इस डील के लिए ई-कॉमर्स कंपनी 8.45 बिलियन डॉलर (61.31 हज़ार करोड़ रुपए) खर्च करेगी। इससे उसे दुनिया के सबसे मशहूर स्टूडियो में से एक की व्यापक लाइब्रेरी का एक्सेस मिलेगा। ये वही स्टूडियो है, जिसने कई ऐतिहासिक फिल्मों व सीरीज का निर्माण किया।

इसमें सिल्वेस्टर स्टेलोन की ‘रॉकी (1976)’ से लेकर ‘जेम्स बॉन्ड’ जैसी फिल्म सीरीज शामिल है। ये भी ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया की चौथी सबसे बड़ी कंपनी अमेज़न के लिए ये डील 2017 के बाद सबसे महँगी है। उसने 2017 में ग्रोसरी चेन ‘Whole Food’ को 13.7 बिलियन डॉलर (99.46 हजार करोड़ रुपए) में खरीदा था। इससे वीडियो स्ट्रीमिंग की दुनिया में Amazon का दबदबा और प्लेटफॉर्म्स के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है।

इस क्षेत्र में Amazon की प्रतिस्पर्धा Apple, डिजनी, हुलु और नेटफ्लिक्स सहित कई अन्य कंपनियों से है। इस डील से दुनिया के दूसरे सबसे अमीर व्यक्ति जेफ़ बेजोस की कंपनी को कई प्रीमियम कंटेंट्स मिलेंगे, जिससे ये दुनिया का नंबर-1 स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म बन सकता है। फ़िलहाल 15 करोड़ सब्सक्राइबर्स के साथ ये नेटफ्लिक्स के बाद दूसरे स्थान पर है। Netflix के सब्सक्राइबर्स की संख्या 20 करोड़ है।

MGM स्टूडियो की स्थापना अप्रैल 1924 में हुई थी, ऐसे में इसे खरीदने का अर्थ है कि पिछले लगभग 100 वर्षों के अवॉर्ड विनिंग और बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाने वाली दर्जनों फिल्मों और टीवी सीरीज अब Amazon के मालिकाना हक़ में होंगी। इनमें लोकप्रिय सीरीज “The Handmaid’s Tale” से लेकर “Real Housewives” फ्रेंचाइज जैसे ऐतिहासिक रियलिटी शो भी शामिल हैं। इससे उसे नेटफ्लिक्स और डिजनी+ से आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।

MGM स्टूडियो के खाते में लगभग 4000 फ़िल्में और 17,000 टीवी सीरीज हैं। अमेज़न का मुख्य उद्देश्य ये है कि MGM की प्रतिभावान टीम के साथ मिल कर उच्च-गुणवत्ता वाली कहानियों के आधार पर मीडिया कंटेंट्स तैयार किए जाएँ। अमेज़न के पास अब तीनों हॉबिट फिल्मों के अलावा “Cabin in the Woods” और “No Time to Die” जैसी फ़िल्में व “Survivor” और
“Shark Tank” जैसी सीरीज के राइट्स भी आ जाएँगे

इससे पहले मई 2021 के मध्य में AT&T और Discovery ने घोषणा की थी कि उसने HGTV, CNN, Food Network और HBO जैसी मीडिया कंपनियों को मिला कर एक पॉवरहाउस बनाने का निर्णय लिया है। Amazon के प्राइम सब्सक्रिप्शन से न सिर्फ लोगों को मनोरंजन के लिए मीडिया कंटेंट्स मिलते हैं, बल्कि सामानों की तेज़ डिलीवरी सहित अन्य सुविधाएँ भी मिलती हैं। अमेज़न IMDb TV भी चलता है, जहाँ फिल्मों और शो के बीच में विज्ञापन के जरिए वो भारी कमाई करता है

Video: 6 साल की खुशबू ने CM योगी का फूलों और राधा-कृष्ण की मूर्ति से किया स्वागत, मिला आशीर्वाद

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप वायरल हो रही है। इसमें वह 6 साल की एक बच्ची के साथ बातचीत करते हुए दिखाई दे रहे हैं। बातचीत के दौरान बच्ची ने सीएम योगी को गुलाब, माला और राधा-कृष्ण की मूर्ति भेंट की।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ये वाकया बुधवार (26 मई 2021) को हुआ। सीएम योगी कुशीनगर जिले में पडरौना ब्लॉक के सुसवलिया गाँव के दौरे पर थे। योगी वहाँ कोरोना की समीक्षा करने के लिए गए थे, उसी दौरान उन्होंने 6 वर्षीय खुशबू से मुलाकात की।

इस दौरान बच्ची सीएम योगी को गुलाब का फूल देते हुए बोली, “दादा ये आपके लिए।” इसके बाद सीएम ने उससे उसका नाम और वो किस कक्षा में पढ़ती है, इसके बारे में पूछा।

मुख्यमंत्री ने बच्ची को महामारी के बारे में बताते हुए कहा कि कोरोना के कारण उसे अभी घर में पढ़ना होगा और स्कूल नहीं जाना है।

इसी दौरान बच्ची (खुशबू) ने मुख्यमंत्री राधा-कृष्ण की मूर्ति भेंट की, लेकिन उसे विनम्रता से वापस करते हुए CM योगी ने कहा, “ये मेरी तरफ से तुम्हारे लिए है।” इसके बाद वह बच्ची के साथ एक फोटो खिंचवाते हैं। इस बीच बच्ची ने सीएम को एक पत्र भी दिया, जिसे स्वीकार करते हुए वह उसके सिर पर हाथ रखकर उसे आशीर्वाद देते हैं और बच्ची भी उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेती है।

दिल को छू लेने वाली ये घटना सुसवलिया गाँव में होम आइसोलेट हुए कोविड परिवार से मिलकर उनका हालचल जानने के लिए गए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दौरे पर हुई।

देवरिया और कुशीनगर के दौरे पर थे सीएम योगी

अपने दौरे के दौरान सीएम योगी ने कुशीनगर जिले में इंटीग्रेटेड कोविड कमांड और कंट्रोल रूम का भी दौरा किया। इसके अलावा वह देवरिया जिले के कटारी गाँव भी गए और ग्राम प्रधान के साथ-साथ कोविड मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्यों से भी मुलाकात की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने राज्य में सभी पात्र लोगों को टीका लगाने की बात कही। उन्होंने ये भी कहा कि जल्द ही 12-18 आयु वर्ग के लोगों के लिए भी टीका आ रहा है।

देवरिया में सीएम योगी ने प्रदेश के सभी लोगों का टीकाकरण करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि राज्य ने दूसरी लहर के दौरान बढ़ती संक्रमण दरों को गलत साबित कर दिया है। उत्तर प्रदेश को ‘कोविड सुरक्षित क्षेत्र’ घोषित करते हुए CM योगी ने कहा कि राज्य ने ‘ट्रेस, टेस्ट और ट्रीट’ मेथड से दूसरी लहर को हरा दिया है।

इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के सीएम योगी ने यह भी पुष्टि की कि राज्य अब संक्रमण की संभावित तीसरी लहर की तैयारी कर रहा है।