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नेपाल पर चीन की वैक्सीन दादागिरी: दाम समेत कुछ भी न बताने की ‘शर्त’, पहले बॉर्डर पार कर हड़प चुका है कई गाँव

चीन ने बुधावर (26 मई) को नेपाल को अनुदान सहायता के तहत 10 लाख खुराक उपलब्ध कराने की घोषणा की। लेकिन स्थानीय अधिकारियों का मानना है कि चीन से वैक्सीन खरीदना उतना आसान भी नहीं हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन द्वारा सिनोफार्म नामक कंपनी के टीके नेपाल को दिए जाने की संभावना है। इससे पहले मार्च में भी चीन ने नेपाल को इसी कंपनी की वैक्सीन की 800,000 डोज मुहैया कराई थी।

अपनी वैक्सीन की खरीद के लिए चीन ने नेपाल के सामने रखी शर्त

लेकिन चीनी वैक्सीन को लेकर जिस बात ने नेपाली अधिकारियों को मुश्किल में डाला है वह है, चीनी फर्म की वह शर्त है जिसके तहत वैक्सीन की वाणिज्यिक खरीद के लिए नेपाल को एक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करना होगा।

नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट एक कानूनी रूप से बाध्यकारी कॉन्ट्रैक्ट है जिसका अर्थ है, एक गोपनीय संबंध स्थापित करना, इसके तहत कीमत सहित कोई भी विवरण सार्वजनिक नहीं किए जा सकते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने इस सप्ताह की शुरुआत में बताया कि प्रस्तावित नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट में कीमत और विशिष्टताओं सहित एक दर्जन से अधिक मुद्दे शामिल हैं।

एक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट में विशिष्टताओं में ट्रेड सिक्रेट्स, बौद्धिक संपदा, प्रॉडक्ट फॉर्मूला, विकास के तहत प्रॉडक्ट्स के बारे में जानकारी, कंप्यूटर कोड, वित्तीय जानकारी, अन्य कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्चुअल एग्रीमेंट और अन्य चीजों के साथ मालिकाना जानकारी शामिल हो सकती है। नेपाली अधिकारी ने कहा, ‘चीनी कंपनी एक नॉन-डिस्क्लोजर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने के बाद ही हमें मात्रा, कीमत और वितरण कार्यक्रम के बारे में सूचित करेगी।’

चीन ‘झूठ’ और ‘प्रोपेगेंडा’ के सहारे चलाता है वैक्सीन का धँधा!

अपनी वैक्सीनों को बेहतर बताकर उसे दूसरे देशों को बेचना और वैक्सीनों के बारे में सही जानकारी न देना ही चीन की रणनीति का हिस्सा रहा है। चीन नेपाल के साथ जिस नॉन डिस्क्लोजर एग्रीमेंट के जरिए वैक्सीन की कीमत समेत अन्य जानकारियाँ छिपा रहा है, वह भी उसके लिए नया नहीं है।

दरअसल, न तो चीनी कंपनी और न वहाँ की मीडिया, अपनी कोरोना वैक्सीन की विश्वसनीयता साबित करने का कोई प्रयास करती है और न ही उसके प्रभावकारी डेटा के बारे में कोई जानकारी देती है। बस दूसरों की बुराई करके तथ्यों से बरगलाने की कोशिश चलती रहती है।

इसी साल एक आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक शीर्ष चीनी अधिकारी ने माना था कि देश में विकसित वर्तमान टीके कोरोनावायरस के लिए पर्याप्त सुरक्षा दर प्रदान नहीं करते हैं और प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए चीन विभिन्न टीकों को मिलाने पर विचार कर रहा है।

चीनी कँपनियाँ सिनोवेक (Sinovac) और सिनोफार्म (Sinopharm) ज्यादातक कोरोना वैक्सीन का निर्माण कर रही हैं। सिनोवेट प्राइवेट जबकि सिनोफार्म सरकारी एक कंपनी है। चीन इन वैक्सीनों की सप्लाई दर्जनों देशों में कर रहा है, जिनमें मैक्सिको, तुर्की, इंडोनेशिया, हंगरी, ब्राजील, पाकिस्तान और तुर्की, नेपाल शामिल हैं।

लेकिन चीन द्वारा सप्लाई की गई ज्यादातर वैक्सीन की प्रभावशीलता में उसके दावे (78% प्रभावशीलता) के उलट अंतर पाया गया। ब्राजील ने सिनोवेक वैक्सीन के लास्ट स्टेज ट्रॉयल में पाया कि चीनी वैक्सीन का प्रभाव 50.38% है न कि 78%। यानी उनके हिसाब से वास्तविक प्रभावी क्षमता अब भी स्पष्ट नहीं है। इसी तरह तुर्की ने इसकी प्रभावी क्षमता को 91.25% रखा और इंडोनेशिया ने इसके प्रभावी दर को 65.3% रखा। इसके बाद ब्राजील ने अपने हालिया बयानों में कहा कि कुछ केसों में दूसरों की तुलना में इसकी प्रभावकारिता का स्तर अधिक है।

नेपाल के बड़े हिस्से पर कब्जा जमा चुका है चीन

एक हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल की जमीन पर चीन द्वारा 9 इमारतें खड़ी किए जाने की बात सामने आ रही है। चीनी कब्जे की शिकायतों के बाद शिकायत मिलने के बाद ‘चीफ डिस्ट्रिक्ट ऑफिसर (CDO)’ चिरंजीवी गिरी के नेतृत्व में नेपाली अधिकारियों की टीम ने घटनास्थल का दौरा किया।

इन अधिकारियों के मुताबिक, चीन ने नेपाल की सीमा में 2 किलोमीटर भीतर तक घुसपैठ की है, पिलर संख्या-12 से भी आगे बढ़ कर भूमि कब्जाई है। वहीं पिलर संख्या-11 का तो कोई अता-पता ही नहीं है कि वो कहाँ गायब हो गया। कहा जा रहा है कि वहाँ अवैध चीनी निर्माण 2010 में ही शुरू हो गया था।

वैश्विक महामारी के दौर में और मजबूती से सामने आया ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का भारतीय दर्शन

करीब एक साल से अधिक समय से पूरा विश्व कोरोना वायरस जैसी भीषण महामारी से जूझ रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। कोरोना वायरस के प्रकोप के अलग-अलग लहरों ने अलग-अलग देशों में अलग-अलग तरीकों से प्रभावित किया है। इस महामारी की दूसरी लहर ने भारत को पहली लहर की तुलना में बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। पहली लहर के दौरान भारत सफलतापूर्वक इस वायरस को अमेरिका, इटली, यूके जैसे विकसित देशों की तुलना में अत्यधिक प्रभावी तरीके से नियंत्रित करने में कामयाब रहा था।

पहली लहर के दौरान, भारत ने ना केवल उत्पन्न चुनौतियों का मजबूती से सामना किया, बल्कि 150 से भी अधिक देशों को चिकित्सा और अन्य सहायता भी प्रदान की। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और पैरासिटामोल के अलावा भारत ने दुनिया भर के लगभग 95 देशों को कोरोना वैक्सीन देकर इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में इन राष्ट्रों का सहयोग किया।

सहायता का यह भाव सच्ची मानवता और दूसरों की मदद के प्रति भारत के लोगों के इच्छाशक्ति को प्रदर्शित करता है। इससे यह साबित होता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भारत अपने हितों की रक्षा के साथ-साथ पूरी दुनिया की परवाह करता है। यही तो वसुधैव कुटुम्बकम का सार है, जिसमें सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार के रूप में देखा जाता है। यह दर्शन सदैव से भारतीय विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

कोरोना की पहली लहर के दौरान भारत द्वारा जरूरतमंद राष्ट्रों की मदद के प्रति अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया काफी सकारात्मक एवं उत्साहवर्धक थी। कई देशों ने भारत द्वारा दवाओं की आपूर्ति के साथ-साथ कोरोना की वैक्सीन भेजने की काफी तारीफ की। अपनी एक बड़ी जनसंख्या के साथ-साथ पूरी दुनिया में जरूरतमंद राष्ट्रों को कोरोना की वैक्सीन भेजकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय सहायता के क्षेत्र में एक अद्भुत उदाहरण स्थापित करने के साथ ही साथ अनेक राष्ट्रों को समग्र एवं सामूहिक सहायता हेतु प्रेरित भी किया।

कोविड महामारी की दूसरी लहर ने भारत को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है। इस दौरान न केवल चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई बल्कि संक्रमित व्यक्तियों की संख्या में भी अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई। चिकित्सा आवश्यकताओं की कमी से जूझ रहे भारत ने जिस तरीके से कम समय में इस कठिन परिस्थिति से उबरने का प्रयास किया, वह काबिले-तारीफ है। परंतु इस कठिन घड़ी में भी कुछ आलोचक भारतीय प्रयासों की आलोचना करने से पीछे नहीं हटे। इन्होंने यह भी नहीं सोचा कि जब कोरोना की पहली लहर आई थी तब अमेरिका सहित कई सम्पन्न राष्ट्र, जिनकी स्वास्थ्य व्यवस्था उत्तम स्तर की है, वह भी इस महामारी से बुरे तरीके से प्रभावित थे।

आलोचकों का यह भी कहना है कि वैक्सीन कूटनीति ने भारत के हितों को प्रभावित किया है। इन आलोचकों को यह समझने की जरूरत है कि आज जिस बड़ी संख्या में अनेकों राष्ट्र भारत की मदद के लिए आगे आए हैं, उसके पीछे भारत की वैक्सीन डिप्लोमेसी (वैक्सीन मैत्री) तथा अन्य चिकित्सा सहायता का महत्वपूर्ण योगदान है।

भारत जैसे ही दूसरी लहर से प्रभावित हुआ, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी, सऊदी अरब, फ्रांस, यूके, कजाकिस्तान, सिंगापुर सहित कई अन्य देशों ने भारत को चिकित्सा सहायता भेजी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि जब संयुक्त राज्य अमेरिका कोरोना से बुरी तरह प्रभावित था और कई परेशानियों का उन्हें सामना करना पड़ रहा था तब भारत के सहयोग के कारण उन्हें मदद मिली। और अब वो भी भारत को उसकी तरह जरूरत के समय में मदद करने के लिए दृढ़ एवं तैयार हैं।

वास्तव में, भारत की वैक्सीन कूटनीति इस बात को दर्शाती है कि कैसे भारत अपने नागरिकों की सुरक्षा के साथ-साथ मानवता की रक्षा के लिए सबसे पहले आगे आया। भारत ने GAVI गठबंधन (अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन गठबंधन) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पूरा किया। दवाओं, टीके और मेडिकल इक्विपमेंट्स को सस्ते दर से बनाकर देने की कोशिश की, जिससे दुनिया के गरीब देशों को भी राहत मिले।

विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने बिल्क़ुल ठीक ही कहा कि कोई तब तक सुरक्षित नहीं होगा, जब तक कि हर कोई सुरक्षित नहीं है। वैक्सीन कूटनीति का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद राष्ट्रों की माँग को मानवीय आधार पर पूरा करना है। यह वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन का ही तो प्रतिबिंब है।

भारत के वैक्सीन मैत्री ऑपरेशन ने एक परिवार के रूप में इस मुद्दे को सामूहिक रूप से संबोधित करने के लिए दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। यही वजह है कि आज जरूरत पड़ने पर विश्व के अनेकों राष्ट्र भारत की सहायता हेतु आगे आए। यह झलक वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन को विश्वव्यापी मान्यता प्राप्त होने की ओर इंगित करता है।

इसमें कोई शक नहीं कि इस वैश्विक महामारी ने पूरी मानवता को ना केवल झकझोर के रख दिया है बल्कि कई सबक दिए हैं। आज के दौर में चुनौतियाँ अधिक कठिन होती जा रही हैं और केवल किसी एक देश के द्वारा इसका समाधान कर पाना संभव नहीं है। इन चुनौतियों के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।

निस्संदेह, भारत ने दुनिया को करुणा का मार्ग दिखाया है और दुनिया को एक परिवार के रूप में खुले तौर पर गले लगाने के लिए प्रेरित किया है। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी को सामूहिक और समन्वित प्रयासों से ही पराजित किया जा सकता है और इसके लिए जरूरी है कि हर कोई वसुधैव कुटुम्बकम के दर्शन को आत्मसात करे।

दिल्ली में 6 महीने पूरे, अब UP की बारी: किसान नेताओं का लक्ष्य CM योगी को हराना, लगे 2022 चुनाव की तैयारी में

दिल्ली की सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन के 6 महीने पूरे होने के बाद अब ‘किसान आंदोलन’ ने उत्तर प्रदेश को अपना लक्ष्य बनाया है। किसान संगठनों का अगला लक्ष्य अब ‘मिशन उत्तर प्रदेश’ है। उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव भी होने हैं, ऐसे में इसके पीछे की राजनीति समझी जा सकती है। ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ ने उत्तर प्रदेश में केंद्र के तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज़ करने की तैयारी शुरू कर दी है।

किसान संगठनों ने कहा है कि वो उत्तर प्रदेश सहित जिन भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, वहाँ भाजपा के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। पश्चिम बंगाल में वो ऐसा कर भी चुके हैं, जहाँ योगेंद्र यादव और राकेश टिकैत जैसों ने जाकर ममता बनर्जी की पार्टी TMC के लिए चुनाव प्रचार किया था। ‘ऑल इंडिया किसान सभा’ के महासचिव हन्नान मोल्लाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केवल चुनावी हार की भाषा समझते हैं, इसलिए किसानों के सामने अब यही एक विकल्प है।

बता दें कि हन्नान मोल्लाह CPI (मार्क्सिस्ट) के नेता हैं और हावड़ा के उलूबेरिया से लगातार 8 बार सांसद रह चुके हैं। लगातार 29 साल सांसद रहने वाले मोल्लाह ‘किसान आंदोलन’ में खासे सक्रिय रहे हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) एक एक्शन प्लान भी बना रहा है। राज्य भर में कई ‘महापंचायत’ आयोजित कर के किसानों की भीड़ जुटाई जाएगी और भाजपा को हराने का नारा दिया जाएगा।

मोल्लाह ने गुरुवार (मई 27, 2021) को TOI से कहा, “हम किसानों को ये नहीं कह रहे कि उन्हें किस पार्टी को वोट देना है, क्योंकि ये उनका व्यक्तिगत निर्णय होगा। हमारा अभियान तो इन ‘कठोर’ कृषि कानूनों के खिलाफ है, ये पक्षपाती नहीं है।” वहीं SKM के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि अब ये अभियान सरकार को उखाड़ फेंकने का अभियान बन गया है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था और शासन को बदलना ही उसका मुख्य लक्ष्य है।

वहीं किसान नेता राकेश टिकैत ने केंद्र सरकार को धमकाते हुए कहा कि वो इस ग़लतफ़हमी में न रहे कि ‘किसान आंदोलन’ ख़त्म हो जाएगा, क्योंकि किसानों ने तीनों कृषि कानूनों को रद्द कराए जाने के लिए मन बना लिया है। उन्होंने दावा किया कि ये आंदोलन और मजबूत होता चला जाएगा। हालिया पंचायत चुनावों में भाजपा द्वारा अपेक्षित प्रदर्शन न करने से किसान नेता उत्साहित हैं। अब तक ये आंदोलन पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित था।

राकेश टिकैत ने पंचायत चुनाव के नतीजों पर भी ‘किसान आंदोलन’ का असर होने का दावा करते हुए कहा कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग भी अब MSP जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ हैं। इस साल पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ प्रचार करने वाले किसान नेताओं ने मई 26 को ‘काला दिवस‘ के रूप में मनाया। इसी दिन नरेंद्र मोदी ने 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है, जो अपने कामों का लेखा-जोखा लेकर अगले साल के विधानसभा चुनाव में उतरेगी। भाजपा सालों बाद यूपी में सीएम के चेहरे के साथ चुनाव लड़ने जा रही है, ऐसे में इ उसके लिए प्रतिष्ठा का विषय है। दिल्ली-यूपी सीमा पर पहले ही किसानों ने कब्ज़ा कर रखा था, जहाँ वो अब भी बैठे हुए हैं। हालाँकि, ‘किसान आंदोलन’ को मिलने वाला जनसमर्थन कम हो गया है।

दिल्ली: ऑक्सीन की कमी से जान गँवाने वालों के परिवारों को मिलेंगे 5 लाख रुपए, तीसरी लहर से निपटने के लिए भी समितियाँ गठित

दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी के कारण मरने वालों के परिवारों को अनुग्रह राशि के रूप में 5 लाख रुपए दिए जाएँगे। सरकार द्वारा नियुक्त छह सदस्यीय समिति द्वारा मामले-दर-मामले विचार-विमर्श के बाद राजधानी में यह मुआवजा दिया जाएगा।

यह मुआवजा दिल्ली सरकार द्वारा कोविड से मरने वाले प्रत्येक व्यक्ति के परिजनों के लिए पूर्व में घोषित 50,000 रुपए की अनुग्रह राशि से अलग होगा। सरकार ने उन परिवारों के लिए अतिरिक्त 2,500 रुपये मासिक पेंशन की भी घोषणा की थी, जिन्होंने अपना कमाने वाला खो दिया है।

इसके लिए नवगठित छह सदस्यीय पैनल में लोक नायक अस्पताल में निदेशक-प्रोफेसर (चिकित्सा), डॉ. अमित कोहली, उसी अस्पताल में वरिष्ठ एनेस्थेटिस्ट, डॉ. संजीव कुमार, लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में विशेषज्ञ (एनेस्थीसिया), सुरेंद्र कुमार, सहायक डीजीएचएस मुख्यालय में निदेशक योजना, जनकपुरी में माता चानन देवी अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसी शुक्ला और सिविल लाइंस में तीरथ राम अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. जेपी सिंह शामिल हैं।

कोविड की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से हुई थी कई मौतें

दिल्ली में कोविड की दूसरी लहर के चरम के दौरान ऑक्सीजन की सप्लाई खत्म होने के कारण अस्पतालों में भर्ती मरीजों के मरने के दो प्रमुख मामले सामने आए थे-इनमें जयपुर गोल्डन अस्पताल की कोविड क्रिटिकल केयर यूनिट में 21 मरीजों की मौत हो गई थी और बत्रा अस्पताल के आईसीयू में 12 ने दम तोड़ा था।

नवगठित समिति- जिसमें स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय के एक अधिकारी और विभिन्न अस्पतालों के वरिष्ठ डॉक्टर और प्रशासक शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, “मामले दर मामले आधार पर, ऑक्सीजन की कमी के कारण मृत्यु के संबंध में प्राप्त शिकायतों और / या प्राप्त अभ्यावेदन का आकलन करेगी। समिति द्वारा मुआवजे की मात्रा को अंतिम रूप “उद्देश्य मानदंड” तैयार करके दिया जाएगा, जिसकी प्रत्येक मामले में सीमा 5 लाख रुपए होगी।”

इसके संबंध में समिति के पास शिकायतें और अभ्यावेदन डीजीएचएस कार्यालय में नर्सिंग होम सेल में ऑनलाइन के साथ-साथ ऑफलाइन भी दर्ज किए जा सकते हैं। समिति की बैठक सप्ताह में कम से कम दो बार या तो सदस्यों की शारीरिक उपस्थिति से या वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से होगी। इसे संबंधित अस्पताल से ऑक्सीजन की सप्लाई, स्टोरेज और स्टॉक के रिकॉर्ड सहित कोई भी दस्तावेज माँगने का अधिकार होगा और यह भी जाँच करेगी कि क्या ऑक्सीजन का उपयोग मानदंडों के अनुसार ठीक से किया जा रहा था।

कोविड की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की कमी से हुई थी कई मौतें

सरकार ने कोविड मामलों की संभावित तीसरी लहर की तैयारी के लिए दो समितियों का भी गठन किया। जहाँ एक समिति स्वास्थ्य के बुनियादी ढाँचे को देखेगी, वहीं दूसरी प्रबंधन रणनीति तैयार करेगी। पहली समिति में दिल्ली सरकार के प्रशासनिक वर्गों के 13 सदस्य हैं, जो आइसोलेशन, ऑक्सीजन की आवश्यक मात्रा, और ऑक्सीजन और आईसीयू बेड आदि के लिए एक योजना तैयार करेगी।

समिति नागरिक सुरक्षा स्वयंसेवकों की तर्ज पर 10,000 प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्वयंसेवकों के एक कैडर के निर्माण पर विचार करेगी। वे अस्थायी सुविधाओं, कोविड देखभाल केंद्रों और क्षेत्र के अस्पतालों के लिए स्थान खोजेंगे जिन्हें जल्दी से स्थापित किया जा सकता है, सप्लाई चेन मैनेजमेंट सेवाओं और वस्तुओं, “विशेष रूप से ऑक्सीजन और महत्वपूर्ण दवाओं जैसे टोसीलिजुमैब (tocilizumab) और रेमेडिसविर (remdesivir)” पर गौर करेंगे और किसी भी अन्य रुकावटों की पहचान करेंगे।

उन्हें यह सुनिश्चित करने का भी काम सौंपा गया है कि सभी बड़े अस्पतालों में जहाँ भी संभव हो, अपने स्वयं के ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र हों। मई के पहले दो हफ्तों में दिल्ली को ऑक्सीजन की उपलब्धता के अभूतपूर्व संकट का सामना करना पड़ा क्योंकि अस्पताल में भर्ती मरीजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो गई थी।

वहीं दूसरी समिति को डेटा ट्रेंड्स और दुनिया भर के अन्य शहरों के अनुभवों का विश्लेषण करने और इस तरह की कोविड लहरों की शुरुआत और वायरस के बदलते / म्यूटेटिंग चरित्र की भविष्यवाणी करने और पूर्वानुमान लगाने के लिए मॉडलिंग अभ्यास करने का काम सौंपा गया है। यह “लॉकडाउन की घोषणा कब और किस हद तक की जाए, इस पर स्पष्ट दिशा-निर्देश भी तैयार करेगी।”

दिल्ली में गुरुवार (27 मई) को 1.53% की पॉजिटिविटी रेट पर 1,072 कोविड मामले दर्ज किए, जो बुधवार के 1.93% रेट से कम है।

महिला का गैंगरेप कर बनाया था वीडियो, रफीदुल समेत 4 बांग्लादेशी गिरफ्तार: प्राइवेट पार्ट में घुसा दी थी शराब की बोतल

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ लोग एक महिला को प्रताड़ित करते हुए उसका गैंगरेप करते दिख रहे थे। कहा जा रहा था कि पीड़िता नॉर्थ-ईस्ट की है, लेकिन बेंगलुरु पुलिस ने बताया है कि वो बांग्लादेशी है। उसकी ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) कर के उसे भारत लाया गया था। पुलिस ने इस मामले में 6 आरोपितों को चिह्नित कर के उनमें से 4 को गिरफ्तार करने में सफलता पाई है।

पुलिस पीड़िता को भी खोजने में लगी हुई है, ताकि वो भी जाँच प्रक्रिया का हिस्सा बन सके और अपना बयान दर्ज करा सके। बेंगलुरु सिटी के पुलिस कमिश्नर कमल कांत ने बताया कि शुरुआती जाँच के बाद बलात्कार और प्रताड़ना का मामला दर्ज कर लिया गया है। पीड़िता को खोजने के लिए पुलिस की एक अलग टीम बनाई गई है। अब तक मिली सूचनाओं के अनुसार, सभी आरोपित बांग्लादेशी माने जा रहे हैं और पुलिस ने आशंका जताई है कि ये किसी गैंग का हिस्सा हैं।

पीड़िता की वित्तीय समस्याओं के कारण उसे प्रताड़ित किया गया और और क्रूरता से उसका यौन शोषण किया गया। बेंगलुरु पुलिस ने आश्वासन दिया है कि पूरी तत्परता से वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में जाँच आगे बढ़ाई जा रही है। राममूर्ति पुलिस थाने में इस मामले की FIR दर्ज की गई है। शुक्रवार (मई 28, 2021) को आरोपितों को अदालत में पेश किया जाएगा। पुलिस ने बताया कि 6 आरोपितों में 2 महिलाएँ हैं।

बेंगलुरु सिटी पुलिस ने जारी किया बयान

ये घटना बेंगलुरु के ही एक NRI कॉलोनी में हुई है। आरोपितों में से एक रफीदुल इस्लाम TikTok पर भी सक्रिय है और वहाँ उसके अच्छे-खासे फॉलोवर्स हैं। ये घटना लगभग एक सप्ताह पूर्व की है। सभी आरोपित वेश्यावृत्ति के धंधे में लिप्त थे। पीड़िता को इस तरह से प्रताड़ित किए जाने के पीछे व्यक्तिगत दुश्मनी को भी कारण बताया जा रहा है। आरोपितों से पूछताछ के बाद मानव तस्करी के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश हो सकता है।

बता दें कि वायरल वीडियो में इस वीडियो में आरोपितों को अपनी करतूतों को वीडियो कॉल पर अन्य परिचितों को दिखाते हुए भी देखा जा सकता था। वीडियो रिकॉर्ड करते समय आरोपितों ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में एक शराब की बोतल भी घुसा दी थी। वीडियो में पीड़िता चिल्लाती है, “कृपया मेरे साथ ऐसा मत करो, वीडियो रिकॉर्ड मत करो।” इसके बाद आरोपितों में से एक ने पीड़िता के मुँह मर कपड़ा ठूँस कर इसे बंद कर दिया। असम पुलिस पाँचों आरोपितों की तस्वीरें जारी की थी।

कनक भवन: अयोध्या का वह मंदिर जो त्रेता में श्रीराम-जानकी का महल था, द्वापर में श्रीकृष्ण भी पहुँचे

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या को भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में बसे हिंदुओं के लिए पवित्रतम तीर्थ माना जाता है। पुण्यदायिनी सरयू नदी की गोद में स्थित अयोध्या में कई ऐसे मंदिर हैं जो भक्तों को भगवान राम और उनके रामराज्य की अनुभूति कराते हैं। अयोध्या के इन्हीं मंदिरों में से एक है ‘कनक भवन’ जो स्वर्णमयी सुंदरता से परिपूर्ण है। इस मंदिर की विशेषता है कि इसकी संरचना जो एक विशाल महल की तरह है। कहा जाता है कि यह मंदिर एक महल ही था जिसे महाराज दशरथ ने अपनी पत्नी रानी कैकेयी के कहने पर देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा जी से बनवाया था।

त्रेता और द्वापर, दोनों युगों में सुशोभित रहा

माता सीता के साथ विवाह के बाद भगवान राम के मन में विचार आया कि मिथिला से महाराज जनक के वैभव को छोड़कर आने वाली सीता के लिए अयोध्या में भी एक दिव्य महल होना चाहिए। भगवान राम के मन में यह विचार आते ही अयोध्या में रानी कैकेयी के स्वप्न में एक स्वर्णिम महल दिखाई दिया। इसके बाद रानी कैकेयी ने महाराज दशरथ से अपने स्वप्न के अनुसार एक सुंदर महल बनवाने की इच्छा जाहिर की। रानी कैकेयी की इच्छा के बाद महाराज दशरथ ने देवशिल्पी विश्वकर्मा जी को बुलाकर रानी कैकेयी के कहे अनुसार एक सुंदर महल का निर्माण करवाया। जब माता सीता अयोध्या आईं तब रानी कैकेयी ने उन्हें यह महल मुँह दिखाई में दे दिया था।

अयोध्या कनक भवन

द्वापरयुग में भी श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी के साथ अयोध्या आए थे। अयोध्या दर्शन के दौरान जब श्रीकृष्ण कनक भवन पहुँचे तब वहाँ उन्होंने इस भवन की जर्जर हालत देखी। अपनी दिव्य दृष्टि से श्रीकृष्ण ने यह क्षणभर में जान लिया कि यह स्थान कनक भवन है और उन्होंने अपने योगबल से श्रीसीताराम की मूर्तियों को प्रकट कर उसी स्थान पर स्थापित किया।

अनेकों बार हो चुका है जीर्णोद्धार

कनक भवन प्रांगण में स्थापित शिलालेख में समय-समय पर इसके जीर्णोद्धार की जानकारियाँ वर्णित हैं। सबसे पहले श्रीराम के पुत्र कुश ने इस महल का जीर्णोद्धार करवाया और श्रीराम-माता सीता की अनुपम मूर्तियाँ स्थापित करवाईं। इसके बाद श्रीकृष्ण ने इस महल का पुनर्निर्माण कराया।

आधुनिक भारत के इतिहास में 2000 साल पहले चक्रवर्ती सम्राट महाराजा विक्रमादित्य और समुद्रगुप्त द्वारा भी कनक महल के जीर्णोद्धार की जानकारी मिलती है। वर्तमान में महल का जो स्वरूप है वह 1891 में ओरछा के राजा सवाई महेंद्र प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु का निर्मित कराया हुआ है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान राम, माता सीता, अनुजों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न सहित विराजमान हैं। भगवान राम और माता सीता ने स्वर्ण मुकुट पहन रखे हैं। मंदिर की विशेषता है कि यह मंदिर आज भी एक विशाल और अति सुंदर महल के समान प्रतीत होता है। मंदिर का विशाल आँगन इसकी सुंदरता को और भी बढ़ा देता है। मंदिर का एक-एक कोना वैभव और संपन्नता की कहानी कहता है।

कनक भवन में स्थापित श्रीराम, माता सीता और उनके अनुजों के विग्रह (फोटो साभार: ayodhyadhaam.com)

श्रीराम-जानकी के महल में विचरण की मान्यता

आज भी साधु-संत और श्रीराम के अनन्य भक्त यह विश्वास करते हैं कि महल में भगवान श्रीराम और माता सीता विचरण करते हैं। इसी विश्वास के कारण भगवान राम से जुड़ा यह मंदिर रामभक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। कहा जाता है कि मंदिर के प्रांगण में बैठे रहने पर किसी प्रकार की कोई चिंता मन में नहीं रह जाती है और व्यक्ति अपने सभी दुखों को भूलकर मात्र श्रीराम के चरणों में खो जाता है।

कनक भवन का आँगन

कैसे पहुँचे?

लखनऊ का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा सबसे निकटतम हवाई अड्डा है जो अयोध्या से 152 किलोमीटर दूर है। अयोध्या स्थित यह मंदिर गोरखपुर हवाई अड्डे से लगभग 158 किमी, प्रयागराज हवाई अड्डे से 172 किमी और वाराणसी हवाई अड्डे से 224 किमी दूर है। अयोध्या में भी अब एक बड़े एयरपोर्ट का निर्माण कराया जा रहा है जिसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एयरपोर्ट के नाम से जाना जाएगा। अयोध्या जिला लगभग सभी महानगरों और शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। अयोध्या रेल मार्ग द्वारा लखनऊ से 128 किमी, गोरखपुर से 171 किमी, प्रयागराज से 157 किमी एवं वाराणसी से 196 किमी की दूरी पर है।

इसके अलावा अयोध्या के लिए उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की सेवा 24 घंटे उपलब्ध है और सभी छोटे-बड़े स्थानों से यहाँ पहुँचना बहुत आसान है। अयोध्या बस मार्ग द्वारा लखनऊ से 152 किमी, गोरखपुर से 158 किमी, प्रयागराज से 172 किमी एवं वाराणसी से 224 किमी की दूरी पर स्थित है।

कॉन्ग्रेस की समिति, स्वतंत्रता आंदोलन पर किताब, नेहरू की प्रस्तावना और सावरकर के नाम के आगे ‘वीर’: इतिहास का एक पन्ना यह भी

कुछ साल पहले वीर सावरकर के पड़पोते रणजीत सावरकर ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को वीर सावरकर पर अपमानजनक एवं अमर्यादित टिप्पणी करने के लिए एक नोटिस भेजा था। दरअसल, 2016 में कॉन्ग्रेस ने अपने अधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर वीर सावरकर को देशद्रोही और कायर कहकर संबोधित किया था। साल 2019 में राहुल गाँधी ने एकबार फिर सावरकर का उपहास करते कहा कि ‘मेरा नाम राहुल गाँधी है, राहुल सावरकर नहीं’।

कॉन्ग्रेस द्वारा दिवंगत स्वतंत्रता सेनानी के लिए निचले स्तर की भाषा का प्रयोग करना एक तरह का प्रचलन बन गया है। यह समझ से बिलकुल भी बाहर है कि ऐसा करने से कॉन्ग्रेस और उसके समर्थकों को कौन सी खुशी मिलती है? वे कभी उन्हें नाजी कहते है तो कभी ब्रिटिश एजेंट, कभी षड्यंत्रकारी तो कभी घृणित कट्टरपंथी। यही नहीं, वीर सावरकर की दया याचिकायों को लेकर कॉन्ग्रेस और वामपंथी दोनों दलों के लोग हमेशा उनपर आक्षेप करने के लिए आतुर रहते है।

इन दया याचिकाओं पर बात करने से पहले यह समझने की जरुरत है कि उस दौर में कॉन्ग्रेस के नेताओं के ब्रिटिश वायसरॉय एवं अधिकारियों से बहुत ही अच्छे संबंध थे। यह आपसी संबंध इतने गहरे थे कि जैसा ब्रिटिश सरकार चाहती थी, कॉन्ग्रेस के नेता वैसा ही करते थे। जैसे जब कर्जन के बाद मिंटो को भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया तो उस समय बंगाल विभाजन के चलते स्वदेशी एवं विदेशी सामान के बहिष्कार का आन्दोलन अपने चरम पर था। मिंटो पर ब्रिटेन से ही दवाब था कि वह इस सन्दर्भ में कोई समाधान निकाले। इसलिए उसने कलकत्ता स्थित अपने निवास स्थान पर गोपाल कृष्ण गोखले को मिलने के लिए बुलाया।

उस मुलाकात में मिंटो ने गोखले से कहा, “मेरे भूतपूर्व वायसराय की नीतियों के चलते लोगों में असंतोष पैदा हो गया है। हालाँकि, मैंने अभी कुछ सोचा नहीं है। मुझे उम्मीद है कि तब तक आन्दोलन के नेता मेरे लिए कोई समस्या पैदा नहीं करेंगे।” गोखले ने वायसराय के कमरे में निजी सचिव, कर्नल डनलप स्मिथ की तरफ मुड़ते हुए कहा, “हिज एक्सेलेंसी ने सहानुभूति और समझदारी दिखाई है। मैं बहिष्कार को रोक दूँगा।”

इस मुलाकात का जिक्र खुद मिंटो की पत्नी द्वारा लिखित पुस्तक ‘मैरी काउंटेस ऑफ़ मिन्टो – इंडिया मिन्टो एंड मोर्ले 1905-1910’ के पृष्ठ 20 पर मिलता है। अब कोई कॉन्ग्रेस का नेता इस घटना की सफाई पेश करेगा कि गोखले को मिंटो से मिलने की आखिर क्या जरुरत थी? जबकि इस स्वदेशी एवं बहिष्कार के आन्दोलन ने ब्रिटिश सरकार के भारत में अस्तित्व पर लगभग प्रश्न खड़ा कर दिया था।

एक अन्य तथ्य तो यह भी है कि कॉन्ग्रेस के कई अधिवेशनों की शुरुआत ब्रिटेन के महाराजा के गुणगान से शुरू होती थी। जैसे जलियांवाला नरसंहार के कुछ दिनों बाद ही कॉन्ग्रेस का 34वाँ अधिवेशन अमृतसर में बुलाया गया था। इसके पहले दिन यानी 27 दिसंबर 1919 को मोतीलाल नेहरू ने अध्यक्षीय भाषण दिया और उन्होंने ब्रिटिश शासन की शान में खूब तारीफ की। उस दौरान जॉर्ज फ्रेडेरिक (V) यूनाइटेड किंगडम के राजा और भारत के कथित सम्राट थे। उनके उत्तराधिकारी प्रिंस ऑफ़ वेल्स, एडवर्ड अल्बर्ट (VIII) का 1921 में भारत दौरा प्रस्तावित था। अधिवेशन में मोतीलाल ने ‘सर्वशक्तिमान भगवान से प्रार्थना करते हुए भारत की समृद्धि और संतोष के लिए एडवर्ड की बुद्धिमानी और नेतृत्व की सराहना की थी।’

कॉन्ग्रेस के आज के नेताओं को जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के इन उपरोक्त शब्दों का भी स्पष्टीकरण देना चाहिए। वे ऐसा कैसे कह सकते है जबकि कुछ दिनों पहले ही जलियांवाला नरसंहार उसी शहर में घटित हुआ था जहाँ कॉन्ग्रेस का अधिवेशन आयोजित हो रहा था।

इन घटनाओं के जिक्र का यह मतलब नहीं है कि गोखले और मोतीलाल कोई देशद्रोही अथवा ब्रिटिश एजेंट थे। वे दोनों राष्ट्रभक्त थे, जिनका स्वतंत्रता के आन्दोलन में अभूतपूर्व योगदान था। स्वाभाविक रूप से उस दौरान सभी नेता एवं क्रन्तिकारी अपनी-अपनी सोच अथवा विचारों के अनुसार स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे। वास्तव में, इसी सच्चाई को समझने की जरुरत है। अतः अपनी राजनैतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए स्वतंत्रता सेनानियों को घसीटने का कोई अर्थ नहीं है।

यह बात ठीक है कि सावरकर ने दया याचिकाएँ लिखी, जो एक कैदी के रूप में उनका अधिकार भी था। मगर इसके साथ उस पत्र का भी जिक्र होना चाहिए जो उन्होंने अपने भाई को अंडमान जेल से 9 मार्च 1915 को लिखा था। वे लिखते है, “राजा या राष्ट्र क्षमा के अधिकार का उपयोग, तब तक नहीं कर सकता, जब तक स्वयं जनता ही कैदी को वापिस लाने, स्वतंत्र करने के लिए जोर न लगाए। यदि हिंदुस्तानवासी इस बात को चाहे और इस आशय के प्रार्थना पत्र लड़ाई (विश्व युद्ध) के अंत में जाए तो संभव है कि हम लोग मुक्त कर दिए जाए। परन्तु यदि हिंदुस्तानवासी ही हमें वापस नहीं चाहते हो तो न तो सरकार हमें छोड़ सकती है और न ही अन्य प्रकारों से मुक्ति का पाना हमें ही श्रेयस्कर है।”

जो व्यक्ति अपनी रिहाई के लिए भारत की जनता से अनुमति माँग रहा है, क्या उसके लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना न्यायसंगत होगा? जब सावरकर को फिर से आजीवन कारावास की सजा मिली तो जनता ही नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस भी उनकी रिहाई के लिए प्रयासरत थी। साल 1923 में कॉन्ग्रेस के अधिवेशन के दौरान विनायक दामोदर सावरकर के नाम से एक प्रस्ताव खुद तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मोहम्मद अली ने पेश किया था।

उस प्रस्ताव के शब्द इस प्रकार थे, “जैसा कि हम जानते है कि श्रीमान सावरकर को इस प्रशासन ने आजीवन कारावास दिया है। उनके भाई को भी यही सजा मिली है और मैं यहाँ एक बात जोड़ना चाहता हूँ कि कैदी के नाते मैं भी बीजापुर की उस जेल में बंद था जहाँ श्रीमान विनायक दामोदर सावरकर और श्रीमान गणेश दोमादर सावरकर कैद थे। श्रीमान गणेश सावरकार को रिहा कर दिया गया, लेकिन विनायक दामोदर सावरकर अभी वहीं कैद है। इसलिए हम उनके संबंध में सरकार की कार्रवाई की निंदा करने के लिए यह प्रस्ताव पेश कर रहे है। एक निर्बल व्यक्ति को बदले की भावना से जेल में रखा जा रहा है जबकि वह रिहा होने का हकदार है।”

यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ और सावरकर की शान में एक उर्दू गीत भी इसी अधिवेशन में गाया गया था। इस घटना को हुए लगभग एक सदी पूरी होने वाला है लेकिन साक्ष्य अभी मिटे नहीं है। यह दुर्भाग्य ही है कि कॉन्ग्रेस का एक अध्यक्ष सावरकर को सम्मान दे रहा था तो आज की कॉन्ग्रेस अपने ही इतिहास को भूल गई है।

महात्मा गाँधी भी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे थे और उनका सावरकर भाइयों से पुराना रिश्ता था। वे 1909 में विजयादशमी के दिन लंदन में विनायक सावरकर से पहली बार मिले थे। अपनी इस मुलाकात का जिक्र उन्होंने’ यंग इंडिया’ में 18 मई 1921 को किया था।

महात्मा गाँधी ने लिखा, “सावरकर बंधुओं की प्रतिभा का उपयोग जन-कल्याण के लिए होना चाहिए। अगर भारत इसी तरह सोया पड़ा रहा तो मुझे डर है कि उसके ये दो निष्ठावान पुत्र सदा के लिए हाथ से चले जाएँगे। एक सावरकर भाई को मैं अच्छे से जानता हूँ। मुझे लंदन में उनसे भेंट का सौभाग्य मिला था। वे बहादुर हैं, चतुर हैं, देशभक्त हैं। वे क्रन्तिकारी हैं और इसे छुपाते नहीं हैं। मौजूदा शासन प्रणाली की बुराई का सबसे भीषण रूप उन्होंने बहुत पहले, मुझे से काफी पहले, देख लिया था। आज भारत को, अपने देश को, दिलोजान से प्यार करने के अपराध में कालापानी भोग रहे हैं। अगर सच्ची और न्यायी सरकार होती तो वे किसी ऊँचे शासकीय पद को सुशोभित कर रहे होते। मुझे उनके और उनके भाई के लिए बड़ा दुःख है।” (सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड 20, पृष्ठ 102)

वीर सावरकर की जीवनी लिखने वाले प्रख्यात लेखक धनंजय कीर लिखते है, “समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। इसमें एक व्यक्ति वह होता है, जोकि समाज के भलाई के लिए दुख सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठता है। गाँधी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते है।” कीर, सावरकर के साथ-साथ लोकमान्य तिलक, डॉ. भीमराव आंबेडकर और ज्योतिराव फुले के भी जीवनीकार हैं।

गाँधी और सावरकार को अलग नजरिए से देखना कोई समझदारी नहीं है। जब महात्मा गाँधी 1927 में रत्नागिरी के दौरे पर थे, उनकी मुलाकात सावरकर से हुई थी। दोनों ने अस्पृश्यता और शुद्धि के सम्बन्ध में बातचीत की। इस विषय को लेकर दोनों व्यक्तियों के मतों में अंतर था फिर भी किसी ने एक-दूसरे से वैर नहीं रखा। महात्मा गाँधी लिखते है, “सत्यप्रेमी तथा सत्य के लिए प्राणतक न्योछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अंततः हम दोनों का ध्येय भी एक है और मैं चाहूँगा कि उन सभी बातों के सम्बन्ध में आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें जिनमे आपका मुझसे मतभेद है। और दूसरी बातों के बारे में भी लिखे। मैं जानता हूँ कि आप रत्नागिरी से बाहर नहीं जा सकते, इसलिए यदि जरुरी हो तो इन बातों पर जी भरकर बातचीत करने के लिए मुझे दो-तीन दिन का समय निकालकर आपके पास आकर रहना भी नहीं अखरेगा। (सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, खंड 33, पृष्ठ 147)

क्या आज के कॉन्ग्रेस के नेता महात्मा गाँधी के सावरकर के प्रति विश्वास और लगाव को झुठला सकते है? वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस के नेताओं को अपने पुस्तकालय में ‘धूल खा रही’ पुस्तकों को भी एकबार पढने की जरुरत है। स्वतंत्रता के बाद कॉन्ग्रेस ने एक समिति का गठन किया जिसमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. पट्टाभि सीतारामय्या, डॉ एस. राधाकृष्णन, जय प्रकाश नारायण और विजयलक्ष्मी पंडित शामिल थीं। इस समिति के नेतृत्व में भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन पर एक पुस्तक – ‘To The Gates of Liberty’ का प्रकाशन किया गया। प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू ने लिखी और सावरकर के भी दो लेखों ‘Ideology of the War Independence – Swadharma and Swaraj and ‘The Rani of Jhansi’ को इसमें समाहित किया गया था। इस पुस्तक की एक विशेष बात यह भी थी कि इस समिति ने सावरकर के नाम के आगे ‘वीर’ लगाया था।

‘NYT के दावे आधारहीन और झूठे’: कल्पनाओं में भारत में मार दिए 42 लाख लोग, राहुल गाँधी ने भी लपका

मोदी सरकार को लेकर विदेशी मीडिया की घृणा नई नहीं हैं। कोरोना संक्रमण की आड़ लेकर भी उन्होंने भारत सरकार को बदनाम करने के लिए हाल के दिनों में कई आधारहीन और भ्रामक दावे किए हैं। इसी कड़ी में न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) ने अपनी एक रिपोर्ट में भारत में Covid-19 संक्रमण से होने वाली मौतों को लेकर आँकड़ा दिया है। ये आँकड़ें किस आधार पर दिए गए हैं, इसका कुछ पता नहीं है। इस रिपोर्ट का एक ही उद्देश्य मालूम होता है, Covid-19 संक्रमण से भारत की लड़ाई को मलिन करना।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के कारण हुई मौतों पर तीन स्तर में आँकड़े देते हुए बताया है कि भारत में इस संक्रमण से सबसे अच्छी हालत में भी लगभग 600,000 लोग मर चुके हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सबसे अधिक संभावना 1.6 मिलियन अर्थात 16,00,000 लाख लोगों के मरने की जताई है। साथ ही सबसे खराब हालत में भारत में संक्रमण से हुई मौतों की संख्या 4.2 मिलियन अर्थात 42 लाख बताई। वैसे भारत में अब तक इस संक्रमण से लगभग 3,16,000 मौतें हुई हैं।  

सरकार ने न्यूयॉर्क टाइम्स की इस रिपोर्ट को नकार दिया है। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वीके पाल ने कहा कि न्यूयॉर्क टाइम्स का अनुमान पूरी तरह से आधारहीन है। साथ ही उन्होंने मीडिया समूह की इस रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह रिपोर्ट भ्रामक तथ्यों पर आधारित है जो संक्रमण से संबंधित मृत्युदर को लगभग 6 गुना बता रही है। डॉ. पाल ने बताया कि इन्फेक्शन की मृत्युदर 0.05% है, जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स इस दर को 0.3% अर्थात वास्तविक दर से 6 गुना अधिक बता रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा है कि भारत में हुई कोरोना वायरस संक्रमण की मौतों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने वाली यह रिपोर्ट पूर्णतः तथ्यहीन है।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने जैसे ही यह रिपोर्ट जारी की कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने विदेशी मीडिया की इस आधारहीन रिपोर्ट को हाथों-हाथ लेते हुए भारत सरकार पर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा, “आँकड़े झूठ नहीं बोलते, भारत सरकार बोलती है।“

राहुल गाँधी के इस ट्वीट का जवाब देते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने कहा कि पेड़ों से भले गिद्ध लुप्त हो रहे हैं, लेकिन उनकी ऊर्जा धरती के गिद्धों में समाहित हो रही है।

आपको बता दें कि न्यूयॉर्क टाइम्स से पहले चिकित्सा क्षेत्र के जर्नल लैंसेट ने भी भारत में अगस्त तक 1 मिलियन अर्थात 10 लाख से अधिक लोगों की मौत होने का अनुमान लगाया था। इस अनुमान के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैट्रिक्स एण्ड इवेल्यूएशन (IHME) के आँकड़ों का उपयोग किया गया था। हालाँकि IHME के आँकड़ें भी बिल्कुल भी विश्वसनीय नहीं दिखते हैं, क्योंकि IHME के आँकड़े भी आधारहीन तथा प्रमाणहीन थे।

देश में अब कोरोना वायरस संक्रमण की रफ्तार कमजोर पड़ रही है। जहाँ एक ओर रोजाना मिलने वाले नए संक्रमितों की संख्या में कमी आ रही है वहीं स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। 10 मई को देश में 37,45,000 सक्रिय मरीज थे जो अब घटकर 24,19,000 रह गए हैं। देश में गुरुवार (27 मई) को Covid-19 संक्रमण से स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या 2,83,000 रही। इसी के साथ देश का रिकवरी रेट बढ़कर 90% तक पहुँच गया है।

कानून का पालन करो, हमे न हाँको: ट्विटर को मोदी सरकार की दो टूक, नए नियमों पर डिजिटल प्लेटफॉर्म/OTT को 15 दिन का वक्त

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए बनाई गई भारत सरकार की गाइडलाइन फॉलो नहीं करने और अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला देने पर भारत सरकार ने ट्विटर को फटकार लगाई है। सरकार ने कहा है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना भारत सरकार की जिम्मेदारी है न कि ट्विटर जैसी किसी निजी लाभकारी, विदेशी संस्था की। इस बीच केंद्र सरकार ने नए नियमों के अनुपालन पर ब्यौरा देने के लिए डिजिटल मीडिया और ओटीटी प्लेटफॉर्मों 15 दिनों का समय दिया है।

इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्ट्री की ओर से ट्विटर को फटकार लगाते हुए कहा गया है कि ट्विटर ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपने हिसाब से हांकने का प्रयास किया। मंत्रालय ने कहा कि अपने एक्शन्स और जानबूझकर आदेश न मानकर ट्विटर भारत की कानूनी-व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। मंत्रालय ने कहा कि ट्विटर ने रेग्युलेशंस को मानने से इनकार कर भारत में किसी आपराधिक गतिविधि के लिए एक सुरक्षित ठिकाना बनने जैसा काम किया है। 

मंत्रालय ने पूछा कि अगर ट्विटर इतना प्रतिबद्ध है तो आखिर उन्होंने खुद से ऐसा तंत्र क्यों नहीं स्थापित किया, जबकि उसके प्रतिनिधि नियमित रूप से यह दावा करके अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं कि उनके पास कोई अधिकार नहीं है और भारत के लोगों को यूएसए हेडक्वार्टर में बात करनी होगी। मंत्रालय ने ट्विटर की प्रतिबद्धता वाले दावों को खोखला और स्वार्थी करार दिया है।

ट्विटर को ये भी कहा गया कि वह भारत से भारी मात्रा में राजस्व इकट्ठा करने के बावजूद यहाँ निगरानी के लिए एक तंत्र नहीं बनाना चाहती। मंत्रालय के बयान के मुताबिक नए नियम कई तरह के पीड़ितों को एक तंत्र देते हैं। इन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से परामर्श और हर एक का सुझाव लेकर बनाया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के भी ऐसे आदेश हैं कि वो इस संबंध में सही कदम उठाएँ।

मंत्रालय ने आगे कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है। भारत सरकार नागरिकों के ट्विटर सहित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सवाल पूछने और आलोचना करने के अधिकार का सम्मान करती है। सरकार निजता के अधिकार का भी सम्मान करती है।

ट्विटर को सरकार ने भारत की लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की परंपरा की भी याद दिलाई है। सरकार ने कहा, “भारत में सदियों से लोकतांत्रिक व्यवस्था रही है और अभिव्यक्ति की आजादी रही है। भारत में फ्री स्पीच का प्रोटेक्शन करने के लिए हमें किसी निजी, मुनाफे के लिए संचालित और विदेशी संस्थान की जरूरत नहीं है। यहाँ तक कि फ्री स्पीच को रोकने का काम खुद ट्विटर और उसकी गैर-पारदर्शी नीतियों ने किया है। इसी के चलते लोगों के अकाउंट्स को सस्पेंड किया जा रहा है और बिना किसी वाजिब कारण के ही ट्वीट्स भी डिलीट किए जा रहे हैं।”

भारत की कानूनी नीति क्या हो… यह अधिकार ट्विटर का नहीं

मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि ट्विटर को इधर-उधर सिर मारना बंद करना चाहिए और भारतीय कानून का पालन करना चाहिए। कानून बनाना और नीति बनाना संप्रभु राष्ट्र का विशेषाधिकार है और ट्विटर सिर्फ एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है। भारत की कानूनी नीति की रूपरेखा क्या होनी चाहिए, यह तय करने में इसका कोई अधिकार नहीं होगा।

मंत्रालय ने यह भी उदाहरण दिया कि कैसे ट्विटर ने भारतीय कानून का उल्लंघन किया है और भारत के लोगों के हितों को नकारा।

– ट्विटर ने भारतीय केंद्र शासित प्रदेश के कुछ हिस्सों को चीन के हिस्से के रूप में दिखाया था और याद दिलाने के बावजूद गलतियों को सुधारने में कई दिन लग गए थे।

-ट्विटर ने संयुक्त राज्य अमेरिका में कैपिटल हिल में हिंसा के अपराधियों के खिलाफ खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई की थी, लेकिन दिल्ली में लाल किले में इसी तरह की घटनाओं के दौरान भारत सरकार द्वारा ऐसे कंटेंट को रोकने के अनुरोध पर प्लेटफॉर्म ने त्वरित कार्रवाई से इनकार कर दिया था।

-ट्विटर की कार्रवाई न होने के कारण ने भारत और भारतीयों के खिलाफ फर्जी और हानिकारक कंटेंट बड़े पैमाने पर प्रसारित हुआ। टीके को लेकर उठे संदेह को सोशल मीडिया के माध्यम से बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया था और कंपनी ने कोई कार्रवाई नहीं की।

-WHO के निर्देशों के बावजूद B.1.617 कोविड वैरिएंट को ‘भारतीय वैरिएंट’ बताने वाले ट्वीट्स पर फर्जी का टैग नहीं लगाया गया।

इन सबको देखते हुए मंत्रालय ने कहा है कि ट्विटर केवल एक निजी कंपनी है और उसे झूठी शान से बचना और भारत के कानूनों का पालन करना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा कि ट्विटर सहित भारत में सोशल मीडिया कंपनियों के प्रतिनिधि हमेशा सुरक्षित रहेंगे और भारत में उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा और सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है। सरकार ने ट्विटर के बयान को पूरी तरह से निराधार, झूठा करार देते हुए कहा कि ट्विटर खुद अपनी मूर्खता को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

I&B मंत्रालय ने दिया 15 दिन का समय

बता दें कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 25 फरवरी को ‘मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता नियम, 2021’ के तहत डिजिटल प्लेफॉर्म्स के लिए नई गाइडलाइन जारी की थी। इसे लागू करने की अंतिम तिथि 26 मई थी। हालाँकि, अधिकतर प्लेटफॉर्म इन दिशा-निर्देशों का पालन करने में विफल रहे हैं, जिसके बाद ऑनलाइन न्यूज पब्लिशर्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को 15 दिन का समय देकर गाइडलाइन के अनुपालन का ब्योरा माँगा गया है।

‘ट्विटर न जाँचकर्ता है और न जज, लेकिन कोशिश दोनों बनने की कर रहा’: टूलकिट पर दिल्ली पुलिस ने लताड़ा

कॉन्ग्रेस टूलकिट मामले में ट्विटर के बयान के बाद दिल्ली पुलिस ने इस प्लेटफॉर्म को जमकर लताड़ लगाई है। दिल्ली पुलिस ने कहा है कि ट्विटर के सारे आरोप मिथ्या हैं। इनका उद्देश्य वैध जाँच को बाधित करना है। पुलिस के बयान में यह भी कहा गया कि ट्विटर जाँच और न्यायिक प्राधिकारी होने का प्रयास कर रहा है, जबकि उसे इसकी इजाजत नहीं है।

दिल्ली पुलिस ने कहा है कि ‘टर्म्स ऑफ सर्विस’ के नाम पर ट्विटर मौजूदा दस्तावेजों (कॉन्ग्रेस टूलकिट) की प्रमाणिकता जाँचने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा वह खुद जाँच अधिकारी और न्यायाधीश बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे इसकी मँजूरी नहीं है।

बयान में कहा गया कि इस मामले में जाँच के लिए अधिकृत एकमात्र कानूनी संस्था पुलिस है और दस्तावेजों की सत्यता का पता लगाने के लिए न्यायालय है। बयान में दिल्ली पुलिस ने ये भी कहा कि टूलकिट मामले में शिकायत को कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा दायर करवाया गया था। लेकिन ट्विटर ने यह दिखाने की कोशिश की कि इस शिकायत को भारत सरकार ने दर्ज करवाया है, जो बिलकुल झूठ है।

जानकारी है लेकिन पुलिस के साथ नहीं साझा करना चाहते

पुलिस ने बताया कि मामला जाँच के तहत था जब ट्विटर ने डॉक्यूमेंट को मैनिपुलेटि़ड मीडिया टैग के साथ जोड़ा। इसका मतलब है कि ट्विटर मामले से परिचित था और उसके पास ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी थी जिसकी एक कानून प्रवर्तन एजेंसी को आवश्यकता थी। इसलिए ट्विटर से दिल्ली पुलिस ने पूछताछ का हिस्सा होने को कहा। उन्होंने यह भी बताया कि कानूनी तौर पर ट्विटर इस तरह की जानकारी पुलिस के साथ साझा करने के लिए बाध्य है, इसे लेकर तो कोई कन्फ्यूजन होनी ही नहीं चाहिए। 

पुलिस के बयान में आगे कहा गया है कि ट्विटर इंडिया के एमडी ने दावा किया है कि वह केवल एक सेल्स प्रमुख है और कंटेंट में उनकी कोई भूमिका नहीं है। हालाँकि, ये दावे ट्विटर एमडी के अपने पहले की बातों (प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान की गई) से विरोधाभासी हैं, जहाँ उन्होंने अपमानजनक और मेनिपुलेटिव कंटेंट की पहचान करने के तरीकों को विकसित करने के लिए कंपनी की योजनाओं पर चर्चा की थी। पुलिस ने ट्विटर की इस पलटी को अंग्रेजी मुहावरे डियर कॉट इन हेडलाइट्स से जोड़ा है।

इसके आगे दिल्ली पुलिस ने ट्विटर के बयान को गलत और निराधार कहा। पुलिस के मुताबिक ट्विटर इंडिया के एमडी को केवल एक नोटिस दिया गया था। वह भी जाँच में भाग लेने के लिए। इसमें उन्हें ‘आरोपित’ नहीं बनाया गया था, क्योंकि ट्विटर (मैनिपुलेटिड मीडिया का टैग जोड़कर) ने मामले के बारे में जानकारी रखने का दावा किया था।

पुलिस का मानना है कि ट्विटर इंडिया के हालिया बयान सहानुभूति प्राप्त करने के लिए है, जबकि सच ये है कि वे खुद न केवल देश के कानून का पालन करने से इनकार करते हैं, बल्कि टूलकिट मामले चल रही पुलिस जाँच में सबूत होने के बावजूद उन्हें पुलिस से साझा नहीं करना चाहते।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस ने टूलकिट मामले में दिल्ली पुलिस के पास दर्ज शिकायत को हाल में वापस लेकर इसे छत्तीसगढ़ से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। इसके बाद पार्टी ने ट्विटर को भी पत्र लिख कर भाजपा नेताओं पर कार्रवाई करने की अपील की थी।

बयान में ट्विटर ने क्या कहा था

बता दें कि ट्विटर ने इससे पहले दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह पुलिस के डराने-धमकाने की रणनीति और अभिव्यक्ति की आजादी को खतरा होने से चिंतित हैं। Twitter ने अपने बयान में दावा किया कि नए IT नियमों के मूल तत्वों का वो पालन कर रहा है और साथ-साथ वैश्विक ‘टर्म्स ऑफ सर्विस’ के हिसाब से भी कार्य कर रहा है। उसने भारत सरकार द्वारा लाए गए नए IT नियमों के बारे में कहा कि वो इसके कुछ हिस्से में बदलाव चाहता है, ताकि लोगों के बीच बातचीत या चर्चा खुली व स्वतंत्र रूप से हो सके। उसने भारत सरकार के साथ अपनी बातचीत को जारी रखने की भी बात कही थी।