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गुरुद्वारा तख्त श्री हजूर साहिब द्वारा अस्पतालों के लिए 50 साल से इकठ्ठा सोना दान करने की वायरल खबर फर्जी: जानें क्या है मामला

पिछले दिनों मीडिया में खबर आई कि महाराष्ट्र के नांदेड़ में स्थित गुरुद्वारा तख्त श्री हजूर साहिब की प्रबंधक कमेटी ने ऐलान करते हुए कहा कि उनके पास पिछले 50 सालों में जितना भी सोना दान में आया है वो उसे अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए दान करेंगे। हालाँकि, यह दावा भ्रामक पाया गया है। इस खबर को कई मीडिया नेटवर्कों ने चलाया और कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने भी ट्विटर पर इसका प्रचार किया।

वायरल दावा पर मीडिया रिपोर्ट

2020 के वीडियो से लिया गया दावा

यह दावा 2020 में अपलोड किए गए एक वीडियो पर आधारित था, जिसमें जत्थेदार कुलवंत सिंह, जिन्हें हाल ही में अस्पताल से छुट्टी मिली थी, ने सिफारिश की थी कि गुरुद्वारा को दिया गया सोना बेकार नहीं होना चाहिए और इसे अच्छे काम के लिए उपयोग में लाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि नांदेड़ में एक बीमार व्यक्ति को इलाज के लिए हैदराबाद या मुंबई जाना पड़ता है और इसलिए समय आ गया है कि शहर की अपनी सुविधाएँ हों।

उन्होंने भक्तों से अस्पतालों और स्कूलों के निर्माण के लिए दान करने का आग्रह किया। कुलवंत सिंह ने कहा, “हमने इमारतों और गुरुद्वारों पर बहुत सोना खर्च किया है। मेरी राय है कि अस्पताल या मेडिकल कॉलेज बनाया जाना चाहिए।”

अस्पतालों के लिए सोने के इस्तेमाल का दावा भ्रामक

सोशल मीडिया पर इस खबर को व्यापक रूप से शेयर किए जाने के तुरंत बाद, विशेष रूप से पंजाबी मीडिया के पत्रकारों ने इस दावे को भ्रामक घोषित कर दिया। तख्त श्री हजूर साहिब के पीआरओ के साथ समाचार की पुष्टि करने पर, कई पत्रकारों ने खुलासा किया कि स्कूलों और अस्पतालों के लिए 50 वर्षों में एकत्र किया गया सोना जारी करने की खबर भ्रामक और बिना तथ्यों के है। एक लोकप्रिय पंजाबी पत्रकार संदीप सिंह इस दावे का भंडाफोड़ करने वाले पहले लोगों में से एक थे।

साभार: ट्विटर

गुरुद्वारा के योगदान की सराहना करने वाले केसी सिंह के पोस्ट का जवाब देते हुए, टीवी पंजाब के पत्रकार गगनदीप सिंह ने बताया कि गुरुद्वारा ने पहले ही इस दावे को भ्रामक बताया है।

साभार: ट्विटर

पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता सनम वज़ीर ने ट्वीट किया, “गुरुद्वारा बोर्ड, तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब के वायरल दावे की पुष्टि की, अस्पतालों के निर्माण के लिए अपना सारा सोना जारी करने की कोई योजना नहीं है। खबर सच नहीं है।” उन्होंने सचिव रविंदर सिंह को भी उद्धृत किया जिन्होंने खुलासा किया, “हमारे पास पर्याप्त नकदी है और हम 50 बिस्तरों वाले कोविड केंद्र का निर्माण कर रहे हैं।”

साभार: ट्विटर

एक अन्य पत्रकार शमिंदर सिंह माही ने खुलासा किया कि यह दावा वास्तव में भ्रामक है जैसा कि गुरुद्वारा के पीआरओ शरण सिंह सोढ़ी द्वारा सूचित किया गया था।

साभार: ट्विटर

एक अन्य नेटिज़न ने स्वयं गुरुद्वारा के पीआरओ के साथ इस तथ्य की पुष्टि करने का दावा किया और खुलासा किया कि दावे 2020 में किए गए थे और किसी भी तरह से मौजूदा सोने की बिक्री का संकेत नहीं दिया था।

साभार: ट्विटर

तख्त श्री हजूर साहिब सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। पंजाब के लगभग 4,000 तीर्थयात्री पिछले साल गुरुद्वारे में लगभग एक महीने तक फँसे रहे थे, क्योंकि महामारी के बीच देशव्यापी लॉकडाउन हुआ था, जिनमें 100 से अधिक कोविड पॉजिटिव पाए गए थे। नांदेड़ में तख्त श्री हजूर साहिब द्वारा पिछले 50 वर्षों में एकत्र किया गया सोना अस्पताल के निर्माण के लिए देने का दावा फर्जी है।

PM मोदी के 7 साल: वे फैसले जो साबित हुए मील का पत्थर, खुला सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का रास्ता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज से ठीक सात पहले देश के 15वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 24 मई 2014 को प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उन्होंने देश में विकास की नई गाथा लिखने की शुरुआत कर दी थी। कॉन्ग्रेस के कई दशकों के शासनकाल के बावजूद शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास समेत तमाम मोर्चों पर पीछे रह जाने के बाद मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने पिछले सात सालों में देश को विकास के नए पथ पर अग्रसर करने का काम किया है।

मोदी सरकार के सात साल के कार्यकाल में ऐसे कई ऐतिहासिक फैसले लिए गए जिनसे न केवल देश विकास के नए मार्ग पर आरूढ़ हुआ, बल्कि आम लोगों को भी उसका भरपूर फायदा मिला। आइए एक नजर डालते हैं मोदी सरकार के पिछले सात साल के कार्यकाल के दौरान देश के लिए गेमचेंजर साबित हुए उनके बड़े फैसलों पर।

1. एक देश, एक संविधान

मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ही ताबड़तोड़ बड़े फैसले लिए। इसी के तहत 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को एक विशेष राज्य का दर्जा देने वाले आर्टिकल 370 को हटाते हुए जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख के दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फैसला किया गया था। मोदी सरकार ने इस फैसले से विशेष राज्य के दर्जे के नाम पर अलग झंडे, अलग कानून और अलग संविधान देने वाले आर्टिकल 370 को खत्म करके जम्मू-कश्मीर को शेष देश के साथ एकता के सूत्र में पिरो दिया।

आर्टिकल 370 हटाया जाना क्यों जरूरी था

17 अक्टूबर 1949 को भारतीय संविधान का हिस्सा बने आर्टिकल 370 जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए एक ‘अस्थायी प्रावधान’ था। आर्टिकल 370 में ये उल्लेख किया गया था कि देश की संसद को जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश मामले और संचार के अलावा अन्य किसी विषय में कानून बनाने का अधिकार नहीं होगा। साथ ही, जम्मू-कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने की अनुमति दे दी गई थी। भारत के अन्य राज्यों के लोग कश्मीर में अपनी जमीन नहीं खरीद सकते, यदि कोई कश्मीरी महिला किसी अन्य राज्य के लोगों से शादी करती है तो उसकी कश्मीरी नागरिकता छिन जाती है। साथ ही भारत सरकार द्वारा अन्य राज्यों में लागू आर्टिकल 356 (राष्ट्रपति शासन) या वित्तीय आपातकाल (आर्टिकल 360) कश्मीर पर लागू नहीं हो सकता था।

मोदी सरकार ने आर्टिकल 370 को हटाकर विशेष दर्जे के नाम पर कश्मीर को शेष भारत से काटने वाले कानून को हटाने का काम किया है। इससे न केवल कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकी घटनाओं पर लगाम लगी है बल्कि दशकों तक आतंक की आग में झुलसने वाले कश्मीर में विकास की नई उम्मीद भी जगी है।

2. सामाजिक उत्थान

तीन तलाक पर रोक: ‘ट्रिपल तलाक’ या तीन तलाक बिल को अपराध करार देने वाला कानून बनाकर मोदी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ जारी सामाजिक बुराई का अंत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया।

तीन तलाक को अपराध घोषित करने के लिए लाए गया बिल को जुलाई 2019 में संसद से पास होने के बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) एक्ट कानून बन गया, जिसे 19 सितंबर 2018 से लागू माना गया। इसके तहत तीन तलाक कहते हुए तलाक देना गैरकानूनी होगा और ऐसा करने वाले पति को तीन साल तक सजा का प्रावधान इस कानून में किया गया है।

उज्ज्वला योजना: गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की महिलाओं को 5 करोड़ एलपीजी कनेक्शन वितरित करने के लिए 1 मई 2016 को पीएम नरेंद्र मोदी ने उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के लिए 8000 करोड़ का बजट रखा गया था। 5 करोड़ गैस कनेक्शन का लक्ष्य 2018 में ही पूरा कर लिया गया था और फरवरी 2021 तक उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 8.3 करोड़ मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए जा चुके हैं।

3. आर्थिक उत्थान

जन धन योजना से करोड़ों भारतीयों को हुआ फायदा: प्रधानमंत्री जन-धन योजना देश के एक बड़े तबके की पहुँच वित्तीय सेवाओं जैसे कि बैंक खातों, ट्रांसफर, क्रेडिट, बीमा और पेंशन तक करने के उद्देश्य से मोदी सरकार ने जन-धन योजना की शुरुआत की। पीएम मोदी ने 15 अगस्त 2014 के लालकिले की प्राचीर से दिए गए अपने पहले भाषण के दौरान ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ की घोषणा की थी।

जन-धन योजना के तहत एक हफ्ते के अंदर (23-29 अगस्त, 2014) ही 1.8 करोड़ खाते खोले गए, ‘जिसे एक हफ्ते में सर्वाधिक बैंक खाते खोलने’ की उपलब्धि के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दी गई। सरकार के मुताबिक, अब तक देश भर में जन-धन के 42.40 करोड़ खाते खुले हैं और लाभार्थियों के खाते में ₹146,658.88 करोड़ रुपये की धनराशि जमा है।

जीएसटी लागू करने का फैसला: मोदी सरकार द्वारा 1 जुलाई 2017 से लागू किया गया गुड्स ऐंड सर्विस टैक्स (GST), देश के सबसे बड़े टैक्स सुधारों में से एक है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक इनडायरेक्ट टैक्स (या कंज्मप्शन टैक्स) है जिसका उपयोग भारत में वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर किया जाता है। यह एक व्यापक, बहुस्तरीय, गंतव्य-आधारित टैक्स है। इसकी व्यापकता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसमें कुछ स्टेट टैक्स को छोड़कर लगभग सभी अप्रत्यक्ष कर या इनडायरेक्ट टैक्स शामिल हैं।

जीएसटी में पहले से चल रहे 17 अप्रत्यक्ष कर समाहित कर दिए गए, जिसे व्यापार जगत के लिए टैक्सेशन कानूनों का अनुपालन आसान हो गया। 2017 में संसद के एक विशेष सत्र के जरिए जीएसटी को पास करवाना मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

4. स्वस्थ भारत

आयुष्मान भारत योजना: 23 सितंबर 2018 को मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई ‘आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना‘ (पीएम जय) का उद्देश्य देश में 50 करोड़ लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना है। इसके तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मिल रहा है।

आयुष्मान भारत दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजनाओं में से है, जिसका उद्देश्य 10 करोड़ से भी अधिक गरीब और वंचित परिवारों (या लगभग 50 करोड़ लाभार्थियों को) को प्रति वर्ष 5 लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवाना है। इसके तहत इन परिवारों को मुफ्त इलाज मुहैया कराया जाता है।

5. आपदा में अवसर

आत्मनिर्भर भारत अभियान: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मई 2020 में ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत कोविड-19 महामारी के खिलाफ देश की लड़ाई के लिए 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक और व्यापक पैकेज की घोषणा की थी, जोकि भारत भारत की जीडीपी के लगभग 10% के बराबर है। मोदी सरकार ने दूसरे और तीसरे राहत पैकेज को क्रमश: आत्मनिर्भर भारत अभियान 2.0 और 3.0 नाम दिया।

इस योजना की घोषणा करते हुए पीएम मोदी ने कहा था कि 21 वीं सदी के भारत के सपने को साकार करने के लिये देश को आत्मनिर्भर बनाना जरूरी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कोविड-19 महामारी के पैदा हुए संकट को एक अवसर के रूप में देखा चाहिए।

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत तीन करोड़ किसानों को 4.22 लाख करोड़ रुपये का कृषि लोन दिया गया। सरकार ने बताया है कि मार्च और अप्रैल के बीच ₹86,600 करोड़ रुपये के 63 लाख लोन कृषि क्षेत्र में दिए गए ।

6. कृषि पर ध्यान

  1. किसानों के भले के लिए लाए गए तीन नए कृषि कानून भारत को गाँवों का देश कहा जाता है और आज भी देश की करीब 70 फीसदी आबादी कृषि कार्यों से जुड़ी है। देश की जीडीपी के लिए महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र के विकास के लिए मोदी सरकार ने 2020 में तीन नए कृषि कानूनों को मँजूरी दी। इनमें किसान उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020; मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता; और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 समेत तीन नए कृषि कानून शामिल हैं।

इन कानूनों का उद्देश्य किसानों को अपनी उपज की बेहतर कीमत दिलाने और मंडियों पर उनकी निर्भरता कम करने के साथ ही कॉन्ट्रैक्ट खेती जैसी विधियों से उनके लिए कमाई के साधन बढ़ाना आदि हैं।

क्या हैं मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानून

  1. किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम 2020: इस कानून के मुताबिक, अब किसान अपनी उपज राज्यों द्वारा गठित कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) की मंडियों के बाहर भी बेच सकता है। सरकार का कहना है कि इस कानून से किसान अपनी मर्जी से एपीएमसी की मंडियों के बाहर भी अपने उत्पाद अपनी मनमर्जी से कहीं ऊँची कीमत पर बेच पाएँगे, इससे उन्हें ही ज्यादा फायदा होगा।

मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 पर किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौता: इस कानून का उद्देश्य कॉन्ट्रैक्ट खेती को बढ़ावा देना है। इसके मुताबिक, कोई निजी कंपनी या ठेकेदार एक निश्चित राशि के बदले अपने हिसाब से खेत में फसल उत्पादन के लिए किसान के साथ करार करेगा।

आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून: इस कानून में अनाज, दालों, आलू, प्याज और खाद्य तेल जैसे खाद्य पदार्थों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर करने का प्रावधान है। इसके बाद युद्ध व प्राकृतिक आपदा जैसी आपात स्थितियों को छोड़कर स्टॉक करने की कोई सीमा नहीं रह जाएगी।

7.पूर्वोत्तर के विकास के लिए बनाई नई राह

विकास के मामले में पिछड़े माने जाने वाले पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए मोदी सरकार ने कई योजनाओं की घोषणा की। मोदी सरकार पूर्वोत्तर में इंफ्रास्ट्रक्चर से उद्योग धंधों के विकास को लेकर काम कर रही है। मोदी सरकार अब तक पूर्वोत्तर में रेल नेटवर्क के विकास पर 10 हजार करोड़ रुपएखर्च कर चुकी है। यही नहीं यहाँ सड़कों के निर्माण पर भी ध्यान दिया जा रहा है जिसमें 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से 1,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हो रहा है।

मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर के 19 जलमार्गों को राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में विकसित करने की घोषणा की है। पूर्वोत्तर राज्यों में दो बड़ी बिजली परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिन पर 10 हजार करोड़ रुपए की लागत आएगी। साथ ही मोदी सरकार पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास के लिए 5,300 करोड़ रुपए की लागत से एक व्यापक दूरसंचार योजना लागू कर रही है।

मोदी सरकार के पिछले 7 साल के कार्यकाल के दौरान लिए गए इन फैसलों से देश, समाज और हर तबके का भला हुआ है।

‘मेरे पिता की मेडिकली हत्या हुई’: दिल्ली के जयपुर अस्पताल पर संभावना सेठ ने लगाए गंभीर लापरवाही के इल्जाम, देखें वीडियो

टीवी एक्ट्रेस संभावना सेठ ने 22 मई को सोशल मीडिया पर अपने पिता के निधन को मेडिकली तौर पर हुई एक हत्या करार देते हुए दिल्ली के जयपुर गोल्डन अस्पताल की एक वीडियो शेयर की थी। अपने पोस्ट में उन्होंने अपने कोविड संक्रमित पिता की मौत पर बात करते हुए अस्पताल की लापरवाहियों को उजागर किया था।

अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट की गई वीडियो पर उन्होंने अस्पताल को लेकर कहा था, “इन्होंने मेरे पिता को मार डाला।” सेठ ने पोस्ट में बताया कि उनके पिता इस वीडियो को रिकॉर्ड करने के 2 घंटे बाद खत्म हो गए। वह लिखती हैं, “पिता को खोना मेरे जीवन का सबसे बड़ा भय था जिसका मैंने सामना कर लिया। अब मैं पूरी जिंदगी बिना डरे सच्चाई के लिए लड़ूँगी जैसा कि मेरे पिता ने मुझे आजीवन सिखाया। हो सकता है मैं इन बड़ी मछलियों को हरा पाऊँ या न भी हरा पाऊँ लेकिन मैं इन्हें पानी से बाहर निकालकर इनका असली चेहरा उजागर करूँगी।”

अपने पोस्ट में उन्होंने यह भी लिखा कि जैसे पूरा जहान सिर्फ अंधकार या उजाले से भरा नहीं हो सकता, वैसे ही डॉक्टर को भगवान की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए।

अपने समर्थकों से साथ माँगते हुए वह लिखती हैं, “मैं जानती हूँ कि आप में से हर कोई जो इन कठिन समय में अस्पतालों में गया है, उसे इसी तरह की चिकित्सा लापरवाही का सामना करना पड़ा है। लेकिन वह विभिन्न कारणों से इसके लिए संघर्ष नहीं कर सका लेकिन अब हम सभी इस वीडियो को साझा करके एक साथ लड़ सकते हैं।”

संभावना सेठ ने बताया कि उनके वकील ने इस संबंध में अस्पताल के ख़िलाफ़ लीगल कार्रवाई शुरू कर दी है। वह बोलीं, “मेरे वकील एडवोकेट रोहित अरोड़ा और लेक्स लॉरिएट के सीनियर एसोसिएट्स एडवोकेट कोशिमा जयपुर गोल्डन हॉस्पिटल को लीगल नोटिस भेजकर कानूनी लड़ाई शुरू करने की प्रक्रिया में हैं।”

संभावना ने वीडियो में लगाया अस्पताल पर लापरवाही का आरोप

7 मिनट की वीडियो में संभावना ने कहा कि अस्पताल के स्टाफ सदस्य उनके पिता की केयर नहीं कर रहे। एक नर्स पर दुर्व्यवहार का इल्जाम लगाते हुए वह बोलीं कि नर्स ने उन्हें ही उनके पिता का ध्यान रखने को कहा है क्योंकि वह खुद बिजी है। वह पूछती हैं, ” मैं जानना चाहती हूँ कि आखिर वह किसका इलाज कर रही है।”

इसके बाद संभावना ने बताया कि जब उन्होंने इस बात को उठाया कि उनके पिता का ऑक्सीजन सैचुरेशन 55 पहुँच गया है, तो नर्स ने इस पर कहा कि ये तो बढ़िया ऑक्सीजन स्तर है।

अपने ट्वीट में एक्ट्रेस ने आरोप लगाया है कि अस्पताल नर्स को बचाने की कोशिशों में जुटा है। ऑडियो में सुना जा सकता है कि दूसरी नर्स पीछे से बता रही है कि (संभावना सेठ के) पिता बार बार अपना ऑक्सीजन मास्क हटा रहे थे, लेकिन वह लोग वहीं है तभी तो बार बार उन्हें मास्क लग पा रहा है। संभावना कहती हैं, “मैंने सोचा था कि ये अस्पताल घर से नजदीक है तो ठीक रहेगा, लेकिन मैं गलत थी।”

दूसरी वीडियो में क्या कहा

24 मई को संभावना ने एक और वीडियो अपलोड की। इस वीडियो में उन्होंने कहा, “आपको लगता है कि यह उस नर्स के बारे में था जिसने दुर्व्यवहार किया था। बात सिर्फ उसकी नहीं थी। मैंने उन्हें अन्य मरीजों के साथ भी दुर्व्यवहार करते देखा। जब मैंने अपने पिता का ऑक्सीजन लेवल 55 पर देखा तो जाहिर सी बात थी कि बेटी होने के नाते मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती।”

वह कहती हैं कि लोग पूछ रहे हैं कि आखिर वह कोविड वार्ड में गईं कैसे । इस पर सेठ कहती हैं, “भगवान का शुक्र है कि मैं कोविड वार्ड के अंदर चली गई। अगर नहीं जाती तो सच्चाई भी नहीं पता चल पाती।” उन्होंने कहा, “मेरे पिता का नाश्ता साइड में था। उन्होंने सुबह से एक कौर तक नहीं खाया था न पानी पिया था।”

वह बोलती हैं कि वह हर डॉक्टर या नर्स को गलत नहीं कह रहीं, लेकिन वहाँ (उस अस्पताल में) राक्षस थे। सेठ के वकील अविनाश वीडियो में कहते हैं, “हमारे पास हर सवाल का जवाब है। लेकिन ये कानूनी मामला है और हम हर चीज नहीं बता सकते। इससे केस पर फर्क पड़ेगा।”

‘मेरे पिता ठीक हो रहे थे’

संभावना ने अपनी वीडियो में बताया कि उनके पिता ठीक हो रहे थे और उन्होंने इस पर वीडियो भी बनाई थी। लेकिन अस्पताल ने न जाने ऐसा क्या किया जिससे पिता की सेहत बिगड़ी। केवल असिस्टेंट डॉक्टर उनसे बात करने आया और उन्हें कहा कि वह अंदर नहीं जा सकतीं क्योंकि अंदर उनके पिता को बचाने का प्रयास हो रहा है और इलाज का तरीका बदला गया है। लेकिन 2 मिनट बाद वही डॉक्टर आकर कहता है कि आपके पिता को दिल का दौरा पड़ा। संभवना का मानना है कि डॉक्टरों को पता था उनके पिता जा चुके हैं लेकिन उन्होंने फिर भी झूठ बोला।

‘पिता को नहीं मिला ICU बेड’

एक्ट्रेस के मुताबिक, अस्पताल का दावा था कि उनके पिता को आईसीयू बेड मिला, लेकिन हकीकत में वह कोविड मरीजों का कमरा था। उनके भाई ने उन्हें अस्पताल के वार्ड की वीडियो भेजी था जहाँ उन्हें पहले एडमिट किया गया था। वहाँ 12 बेड थे उनमें से 11 खाली थे। अस्पताल सिर्फ लोगों को बेवकूफ बना रहा था कि उनके पास जगह नहीं है।

संभावना ने अपने पिता के लिए लड़ने की ठानी है। उनका ये भी आरोप है कि अस्पताल ने बॉडी देने में उन्हें घंटे लगाए। वहीं एबुलेंस ड्राइवर ने 30,000 रुपए माँगे और बाद में कहा कि 27 हजार रुपए में शव को ले चलेगा क्योंकि श्मशान बहुत दूर है। वहीं अविनाश कहते हैं, “कोई नहीं जानता कि जो शव उन्हें मिला है वो उनके परिजन का है या नहीं। उन्हें बस भगवान का नाम लेकर उनका दाह संस्कार करना है।” बता दें कि अपनी वीडियोज के जरिए संभावना ने लोगों से समर्थन माँगा है और वीडियोज को शेयर करने की अपील की है।

वैक्सीन बर्बादी का राष्ट्रीय औसत 6.3%, पर झारखंड में 37.3% तो छत्तीसगढ़ में 30.2% टीका बेकार

स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से राज्यों को टीकों की बर्बादी 1% से कम रखने की सलाह के बावजूद, झारखंड जैसे राज्यों में 37.3 फीसदी की बर्बादी दर्ज की गई है। छत्तीसगढ़ 30.2% से अधिक टीके की बर्बादी दर्ज करने वाला दूसरा राज्य है। 

तमिलनाडु में टीकों की बर्बादी 15.5 फीसदी, जम्मू-कश्मीर में 10.8 फीसदी और मध्य प्रदेश में 10.7 फीसदी की बर्बादी दर्ज की गई। इन राज्यों ने राष्ट्रीय औसत 6.3% से टीके की बर्बादी दर्ज की है। झारखंड में जहाँ कॉन्ग्रेस गठबंधन सहयोगी है, वहीं छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी है।

ईटी नाउ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दो हफ्ते पहले हरियाणा कोविशील्ड की 6% बर्बादी और कोवैक्सिन की 10% डोज बर्बाद करने को लेकर सूची में सबसे ऊपर था। हालाँकि, हरियाणा के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजीव अरोड़ा ने कहा कि राज्य में यह घट कर क्रमश: 3.1 फीसदी और 2.4 फीसदी हो गया है।

वैक्सीन की बर्बादी

सभी टीकाकरण कार्यक्रमों में टीके की बर्बादी अपरिहार्य है। हालाँकि, बर्बादी को कम करने के प्रयास किए जाने चाहिए। परिवहन, भंडारण और यहाँ तक कि टीकाकरण केंद्रों पर भी वैक्सीन की बर्बादी हो सकती है।

COVID-19 टीकों की आपूर्ति 10 डोज वाली मल्टी डोज शीशियों में की जाती है। संभावना है कि प्रबंधन करने पर कुछ बोतलें टूट सकती हैं। इसके अलावा, यदि 10 डोज का पैक खोला जाता है और सभी खुराक का उपयोग नहीं किया जाता है, तो शेष बेकार हो जाता है। यह टीके की बर्बादी में सबसे बड़ा योगदान करने वाले कारकों में से एक रहा है।

इसके अलावा, टीकों को एक विशेष तापमान पर संग्रहित करने की आवश्यकता होती है। इसकी विफलता के परिणामस्वरूप टीकों की बर्बादी हो सकती है। चोरी से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। टीकों को बर्बाद करने का एक और तरीका सम्मिश्रण है।

टीकाकरण कार्यक्रम की योजना बनाते समय अपव्यय गुणन कारक (WMF) को ध्यान में रखा जाता है। स्वास्थ्य मंत्रालय के के दिशानिर्देश के अनुसार, WMF = अपव्यय गुणन कारक = 1.11 COVID-19 वैक्सीन के लिए, 10% की स्वीकार्य प्रोग्रामेटिक बर्बादी मानते हुए [WMF = 100/(100 – अपव्यय) = 100/(100-10) = 100/90 = 1.11 ]

माता बगलामुखी का मंदिर: साधुओं की समाधि और श्मशान से घिरा, गुप्त अनुष्ठान के लिए आते हैं नेता

मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले में नलखेड़ा तहसील में स्थित है माता बगलामुखी का मंदिर। यह शैव और शाक्त संप्रदाय के साधुओं और तांत्रिकों के लिए सिद्ध स्थान है। मंदिर की प्रसिद्धि कुछ ऐसी है कि देश के कई बड़े नेता चुनाव जीतने के लिए यहाँ यज्ञ-अनुष्ठान कराते हैं।  

लखुंदर (पुराना नाम लक्ष्मणा) नदी के किनारे स्थित इस देवी मंदिर में त्रिशक्ति माता विराजित हैं जो स्वयंभू अर्थात स्वयं प्रकट मानी जाती हैं। माता बगलामुखी की मूर्ति पूरे विश्व में मात्र तीन स्थानों में विराजित है, जो हैं नेपाल, मध्य प्रदेश का दतिया और मध्य प्रदेश का ही नलखेड़ा। इनमें से नलखेड़ा ही प्रमुख और सिद्ध बगलामुखी माता का मंदिर माना जाता है। 

मंदिर का इतिहास

प्राण तोषिणी, तंत्र विद्या पर आधारित एक पुस्तक है जिसमें माता बगलामुखी की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है। कहा जाता है कि सतयुग में एक ऐसा विनाशकारी तूफान आया जिसमें सम्पूर्ण विश्व का नाश करने की क्षमता थी। इस तूफान को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र क्षेत्र में हरिद्रा सरोवर के पास तपस्या की। उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर चतुर्दशी तिथि को माता बगलामुखी प्रकट हुईं और उस विनाशकारी तूफान से विश्व की रक्षा की।

मंदिर में स्थापित माता बगलामुखी त्रिशक्ति माता कही जाती हैं क्योंकि संभवतः भारत में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ माता की स्वयंभू मूर्ति में तीन देवियाँ समाहित हैं। मध्य में माता बगलामुखी, दाएँ भाग में माँ लक्ष्मी और बाएँ भाग में माँ सरस्वती विराजित हैं। माता बगलामुखी को महारुद्र (मृत्युंजय शिव) की मूल शक्ति के रूप में जाना जाता है।

माता बगलामुखी की प्रतिमा

माता बगलामुखी के वर्तमान मंदिर के इतिहास के बारे में मुख्य पुजारी कैलाश नारायण बताते हैं। उनके अनुसार इस सिद्ध मंदिर की स्थापना भगवान कृष्ण के कहने पर पांडवों ने की थी। ज्येष्ठ पांडव महाराज युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए इस मंदिर में माता बगलामुखी की आराधना की। मंदिर में माता बगलामुखी के अलावा दक्षिणमुखी हनुमान जी, भगवान कृष्ण और काल भैरव का मंदिर है। मंदिर के सामने ही एक दिव्य दीपमालिका है जिसकी स्थापना महाराज विक्रमादित्य ने करवाई थी। इसके अलावा मंदिर का सिंह द्वार भी अपने आप में अद्वितीय है।  

मध्य प्रदेश के नलखेड़ा स्थित माता बगलामुखी मंदिर

तंत्र साधना का महान स्थल

नलखेड़ा स्थित माता बगलामुखी मंदिर सामान्य श्रद्धालुओं के अलावा सिद्ध साधु-संतों और तांत्रिकों के लिए साधन का सर्वश्रेष्ठ स्थान माना जाता है। चारों ओर से श्मशान से घिरा होने और नदी के किनारे बसा होने के कारण यह स्थान तांत्रिक विद्या साधना के लिए उपयुक्त माना जाता है। नवरात्रि में इस मंदिर का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।

मंदिर के आसपास और नदी के किनारे साधु-संतों की कई समाधियाँ हैं जो इस बात का प्रमाण है कि यहाँ साधु-संत अपने जीवन के अंतिम समय तक निवास करते रहे। मंदिर का मिर्ची हवन पूरे भारत में प्रसिद्ध है जो सभी प्रकार के कष्टों के निवारण और शत्रुओं के नाश के लिए किया जाता है। मंदिर के पीछे हवन स्थल है जहाँ एक साथ 25-30 हवन होते रहते हैं। इस हवन क्रिया को प्रत्यक्ष रूप से देखना अपने आप में एक दैवीय अनुभव है।

गुप्त अनुष्ठान के लिए आते हैं नेता

चुनावों में विजय प्राप्त करने और अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए देश के कोने-कोने से नेता इस मंदिर में गुप्त अनुष्ठान के लिए आते हैं। भारतीय राजनीति के कई बड़े नेता इस मंदिर में माता बगलामुखी का आशीर्वाद प्राप्त करके चुनावों में विजय प्राप्त कर चुके हैं। जब भी देश में लोकसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनावों का दौर शुरू होता है, माता बगलामुखी के मंदिर में बड़े-बड़े नेताओं का आना-जाना शुरू हो जाता है। 

कैसे पहुँचे?

श्रद्धालु माता बगलामुखी के इस दिव्य मंदिर की यात्रा कभी भी कर सकते हैं। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले इंदौर शहर से नलखेड़ा करीब 158 किमी दूर है। इंदौर सड़क मार्ग से नलखेड़ा से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा नलखेड़ा पहुँचने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन उज्जैन का है जो मंदिर से लगभग 100 किमी की दूरी पर है। आगर-मालवा जिला इंदौर और उज्जैन के अलावा, भोपाल, कोटा और अन्य शहरों से भी सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है।

‘मुझे पता है इसी व्यक्ति ने यह अपराध किया है…’: प्रियदर्शिनी की राह पर तेजपाल का केस, क्या वैसा ही होगा आखिरी फैसला

आठ वर्ष लग गए यह तय करने में कि तरुण तेजपाल पर बलात्कार के आरोप झूठे थे। न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा थी वह अंत में आया और तब पता चला कि तेजपाल निर्दोष हैं। खुशियाँ मनाई गई। तेजपाल ने अपने मृत वकील के लिए बड़ा भावनात्मक धन्यवाद ज्ञापन लिखा। साथ ही उन्होंने भारत की न्याय व्यवस्था में अपनी आस्था जाहिर की। कई लोगों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।

तेजपाल के मित्रों और समर्थकों ने राहत की साँस लेते हुए बताया कि उन्हें तेजपाल पर और देश की न्याय व्यवस्था, दोनों पर विश्वास था और दोनों ने उनके इस विश्वास की रक्षा की। सोशल मीडिया पर उपस्थित लोगों ने यह कहते हुए- ‘यदि तेजपाल निर्दोष थे तो उन्होंने वह स्वीकारोक्ति क्यों लिखी थी जिसमें उन्होंने खुद को दोषी मानते हुए किसी पछतावे की बात कही थी’, शोर जैसा कुछ मचाने की कोशिश की। कुछ लोग यह कहते हुए निराश दिखे कि देश की न्याय व्यवस्था बड़े लोगों का कुछ नहीं कर पाती।
       
न्याय व्यवस्था और न्यायालयों की अपनी प्रक्रिया होती है। वे उसी अनुसार चलते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि किसी निर्णय से लोग निराश दिखे। यह पहले भी सैकड़ों बार हो चुका है और भविष्य में भी होगा। केवल इतिहास ही खुद को नहीं दोहराता, न्यायालय भी खुद को दोहराते हैं। साक्ष्य की उपलब्धता या अनुपलब्धता के आधार पर होने वाले फैसले किसी न किसी को निराश करते रहे हैं और तरुण तेजपाल पर अपराध का यह मामला अपवाद नहीं है।

अब जबकि न्यायालय का विस्तृत फैसला आ चुका है, तेजपाल को निर्दोष साबित करने के पीछे के कारणों का पता चल रहा है। पता चल रहा है कि गिरफ्तारी के समय जिस तेजपाल को गोवा की कानून-व्यवस्था पर जरा भी विश्वास नहीं था और बार-बार यह रटे जा रहे थे कि उन्हें फँसाया जा रहा है, क्योंकि गोवा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, उसी तेजपाल को बाद में गोवा की कानून-व्यवस्था और भारत की न्याय व्यवस्था पर इतना विश्वास कैसे हो गया।

527 पेज के विस्तृत फैसले से महत्वपूर्ण हिस्से को उद्धृत करते हुए आई खबर से पता चल रहा है कि कैसे जाँच अधिकारी ने अपराध के इस मुक़दमे में सबूत मिटाए या उनकी अनदेखी की। अपने फैसले में न्यायाधीश क्षमा जोशी लिखती हैं, “गोवा पुलिस ने अपराध के इस मामले में ठोस सबूत मिटाने का काम किया।” फैसले में यह बताया गया है कि कैसे जाँच अधिकारी ने होटल के फर्स्ट फ्लोर के सीसीटीवी फुटेज मिटाने का काम किया।

न्यायाधीश ने अपने फैसले में लिखा, “जाँच अधिकारी ने ग्राउंड फ्लोर और सेकंड फ्लोर का सीसीटीवी फुटेज न्यायालय के सामने रखा पर फर्स्ट फ्लोर का सीसीटीवी फुटेज न्यायालय के सामने रखा ही नहीं गया और यह जाँच अधिकारी द्वारा की गई बहुत बड़ी भूल है। न्यायालय ने और बहुत से उदहारण गिनाए हैं जिनसे लगता है कि जाँच अधिकारी और गोवा पुलिस ने अपराध की जाँच ठीक तरह से नहीं की और सबूतों को मिटाने में भी उनकी भूमिका थी।  

यह फैसला हमारी कानून-व्यवस्था को अपराधियों द्वारा साध लेने की कहानी का दस्तावेज है। पर न्यायालय द्वारा गोवा पुलिस और जाँच अधिकारी के काम को भूल बताया जाना भी कुछ तर्कपूर्ण नहीं लगता। यदि इस बात के सबूत हैं कि ऐसा जानबूझकर किया गया है तो पुलिस के खिलाफ कोई मामला क्यों नहीं बन सकता? जिन सबूतों के आधार पर अपराध के एक मुकदमे में फैसला होना है, उसे जानबूझकर मिटाना भूल है या अपराध?

यदि न्यायालय का मानना है कि ऐसा करने के पीछे उद्देश्य आपरधिक मुक़दमे के निर्णय को प्रभावित करना था तो फिर तेजपाल दोषी हों या निर्दोष, वह जाँच अधिकारी तो दोषी है। सबूतों के अभाव में जिस तरह से तेजपाल निर्दोष साबित हुए उसे देखते हुए मुझे प्रियदर्शिनी मट्टू बलात्कार और हत्या के आपराधिक मुकदमे की याद आ गई। उस मुक़दमे में भी सबूतों के अभाव में फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा था, “मुझे पता है कि इसी व्यक्ति (संतोष कुमार सिंह) ने यह अपराध किया है पर सबूतों के अभाव में मुझे बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए इसे रिहा करना पड़ रहा है।” 

प्रियदर्शिनी मट्टू के बलात्कार और हत्या के मामले में जो ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ 1999 में संतोष कुमार सिंह को मिला था ठीक वही ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ 2021 में तरुण तेजपाल को मिला है। न्यायालय के फैसले से पता चलता है कि सबूतों का अभाव नहीं था, बल्कि अभाव बनाया गया। गोवा सरकार ने निर्णय के खिलाफ मुंबई उच्च न्यायालय में अपील की गई है पर ऐसी अपील का क्या अर्थ? जब मामला सेशन कोर्ट में था तब राज्य सरकार के वकील को यह पता नहीं चला कि उसी की तरफ से जाँच अधिकारी या गोवा पुलिस क्या कर रही है तो मुंबई उच्च न्यायालय में गोवा पुलिस और राज्य सरकार के वकील मिलकर ईमानदारी से मुकदमा लड़ेंगे, इस बात की गारंटी कौन देगा?
 
सबूतों के अभाव में तेजपाल के निर्दोष साबित होने से लेकर गोवा सरकार द्वारा मुंबई उच्च न्यायालय में की गई अपील तक यह मामला भी प्रियदर्शिनी मट्टू केस की तरह ही दिखाई दे रहा है। यह समानता यही ख़त्म हो जाएगी या आगे तक चलेगी, यह मुंबई उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई और उसके तरीकों से पता चलेगा। प्रियदर्शिनी मट्टू केस केवल बलात्कार ही नहीं, बल्कि हत्या का भी मामला था ऐसे में उसे लेकर लोगों की और दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की प्रतिक्रिया जैसी थी, वैसी ही मुंबई उच्च न्यायालय में दिखाई देगी या नहीं, यह समय बताएगा।

यह बात जरूर है कि गोवा सरकार द्वारा की जाने वाली यह अपील हमें आशावान अवश्य बनाती है। यह आशा दिलाती है कि न्यायालय के फैसले में सबूत नष्ट करने की बात का जिक्र बिना किसी लाग-लपेट के किया गया तो उच्च न्यायालय अपील में इस बात का संज्ञान लेते हुए न्याय की दिशा में जाएगा। 

अंत में प्रश्न यह उठता है कि न्यायाधीश क्षमा जोशी द्वारा लिखे गए इस विस्तृत फैसले के सार्वजनिक होने के बाद तेजपाल नैतिकता के किस टीले पर खड़े होकर गौरवान्वित महसूस करेंगे? न्यायालय से निर्दोष करार दिए जाने के बाद जिस बनावटी नैतिकता ओढ़ते हुए उन्होंने जिस न्याय-व्यवस्था में अपनी आस्था जाहिर की थी, उसका आस्था का अब क्या होगा? साथ ही न्याय-व्यवस्था में प्रकट की गई उनके मित्रों की आस्था का क्या होगा? फिर से वही प्रश्न उठाये जाएँगे कि यदि निर्दोष ही थे तो आठ वर्ष पहले माँगी गई माफी के पीछे क्या कारण थे? उस पछतावे के मूल में क्या था जिसे उन्होंने अपनी सजा के तौर पर स्वीकार किया था? क्या एक बार फिर से वर्षों की बेशर्मी न्याय व्यवस्था में प्रकट की गई आस्था के ऊपर चढ़ बैठेगी?

विस्तृत फैसले में सबूतों को मिटाने की बात से एक सीख सरकार चलाने वालों के लिए भी है। विचार करें कि प्रशासन सरकार के नीचे है या ऊपर?

‘उन्होंने वैक्सीन तक VIP कैटेगरी में नहीं ली’: रोहित सरदाना की संपत्ति व लाइफस्टाइल को लेकर यूट्यूब पर बड़े दावे, परिवार ने नकारा

पत्रकार रोहित सरदाना के निधन के बाद उन्हें लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जिसके बाद उनके परिवार ने स्पष्टीकरण जारी कर के उसका खंडन किया है। ‘ज़ी न्यूज़’ के शो ‘ताल ठोक के’ और फिर ‘आज तक’ के शो ‘दंगल’ के लिए लोकप्रिय रहे रोहित सरदाना कोरोना संक्रमित थे और कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हुआ था। अब कुछ यूट्यब पेज उनकी लाइफस्टाइल और संपत्ति को लेकर बातें कर रहे हैं।

रोहित सरदाना के निधन के करीब एक सप्ताह बाद मई 6, 2021 को ‘सेलेब्रिटी वर्ल्ड’ नामक वेरिफाइड यूट्यूब चैनल पर ‘Anjana Om Kashyap vs Rohit Sardana – दोनों में से कौन है ज्यादा अमीर?’ शीर्षक के साथ एक वीडियो शेयर किया गया, जिसमें कहा गया कि रोहित सरदाना को लक्जरी आइटम्स का शौक नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने करियर में शो और होस्टिंग कार्यक्रमों से ‘मोटी कमाई’ की थी।

साथ ही इस वीडियो में दावा किया गया था कि रोहित सरदाना की ‘कार कलेक्शन’ में नंबर-1 पर ‘मारुती सुजुकी एस-क्रॉस’ है, जिसकी कीमत भारत में फ़िलहाल लगभग 9 लाख रुपए है। साथ ही रोहित सरदाना के पास ‘BMW X3’ कार के होने का भी दावा किया गया, जिसकी कीमत 64 लाख रुपयों के आसपास है। साथ ही उनकी संपत्ति 2 मिलियन डॉलर (14.54 करोड़ रुपए) है। वीडियो में उनके घर के भीतर की कुछ झलक भी दिखाई गई थी।

साथ ही ‘कुछ पल सुकून के’ नामक यूट्यूब चैनल ने भी ‘Rohit Sardana Property, Lifestyle, Networth, Income, Luxury, Salary, Cars, Life’ शीर्षक के साथ शेयर किए गए वीडियो में दावा किया गया कि रोहित सरदाना की संपत्ति 10 मिलियन डॉलर (72.7 करोड़ रुपए) है और उनके पास घर व कार के अलावा कई बाइक्स हैं। इसी तरह एक वीडियो में एक आलीशान घर की तस्वीर दिखा कर बताया गया कि ये उन्हीं का है।

रोहित सरदाना के परिवार ने इसका खंडन करते हुए जारी किए गए बयान में कहा है, “गाजियाबाद के क्रॉसिंग रिपब्लिक में 1450 स्क्वायर फ़ीट का EMI पर फ्लैट है।गाड़ियो के नाम पर EMI पर क्रेटा है। सम्पत्ति दो बेटियाँ और करोड़ों लोगों का अथाह प्यार। दयाभाव नहीं चाहिए लेकिन जाने वाले को ऐसे बदनाम ना करें, जिसने VIP कैटेगरी में जाकर वैक्सीन तक लगवाना गवारा ना किया।” ये बयान रोहित सरदाना के ही आधिकारिक ट्विटर हैंडल से आया, जिसका प्रबंधन अब उनकर परिवार करता है।

बता दें कि हुंडई के करता कार की कीमत 10-17 लाख के बीच है। ऐसे में उन्हें लेकर वीडियोज में अलग-अलग दावे किए जा रहे थे, जिसे परिवार ने नकार दिया है। उनकी पत्नी प्रमिला दीक्षित ने एक इमोशनल नोट भी शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा, “अब कोरोना के लिए इम्युनिटी आई हो या न आई हो, मौत की खबरों के लिए गजब का इम्यून सिस्टम बन गया है। ‘काश, ये कर लिटा होता, वो कर लिया होता’ का अपराध बोध रह जाता है।”

राजनीति से नहीं ट्विटर के रार का सरोकार, यह ‘विदेशी मसीहा’ को लेकर लिबरल बेचैनी का है इजहार

भारत में जब साल 2009-2011 में मोबाइल डेटा और स्मार्टफोन के साथ-साथ ट्विटर का तेजी से प्रसार हुआ, उस दौरान लिबरल इससे बेहद खुश थे। वास्तव में वे इसका इस्तेमाल करने वाले पहले लोगों में से थे। उन दिनों शशि थरूर के फॉलोअर्स की चर्चा जोरों पर थी। दरअसल, उस समय शशि थरूर ट्विटर पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले भारतीय नेता थे।

उस दौरान मेनस्ट्रीम मीडिया में ट्विटर को काफी प्रमोट किया गया। इसके चलते थरूर अपने ही ट्वीट्स को लेकर एक-दो बार विवादों में घिर गए, जिसके बाद आम लोगों का सच से सामना हुआ। उन विवादों के कारण केंद्रीय मंत्री की कुर्सी उनसे लगभग छीन ली गई थी। पहला विवाद 2009 में ‘Cattle Class‘ को लेकर किए गए उनके ट्वीट को लेकर खड़ा हुआ था। वहीं दूसरा विवाद 2010 में आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी और शशि थरूर के ट्वीट के कारण गरमाया था, जो उनके सुनंदा पुष्कर से व्यक्तिगत और वित्तीय संबंधों की ओर संकेत करते थे, जिनसे थरूर ने बाद में शादी कर ली थी।

हालाँकि, थरूर को शुरुआती दौर में कुछ परेशानियाँ हुईं, लेकिन ट्विटर लिबरल लोगों के लिए तब तक एक बेहतर खेल का मैदान बना रहा, जब तक कि ‘दूसरे पक्ष’ ने वास्तव में इसका प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करना शुरू नहीं किया था। लेकिन दूसरे पक्ष की बारी आने में वास्तव में ज्यादा समय नहीं लगा। 2011 तक, अन्ना हजारे के समर्थन में काफी लोग थे। अन्ना को सबसे अधिक युवाओं ने सपोर्ट किया। ट्विटर पर ‘हिंदुत्व टाइप’ घनी आबादी थी।

इस मंच (ट्विटर) ने लोकतंत्र को एक नई दिशा दी। जिन लोगों को मेनस्ट्रीम मीडिया आउटलेट में लेख प्रकाशित होने का कोई मौका नहीं मिलता था, उन्हें अब एक ऐसा मंच मिल जो न केवल मेनस्ट्रीम मीडिया की पहुँच से काफी तेज और प्रभाव डालने वाला है। इसने मेनस्ट्रीम मीडिया प्रकाशन में मौजूद सभी बाधाओं को तोड़ दिया।

खासकर, भाषा (मुख्य रूप से शैली), पहुँच (आपको एक संपादक को जानने या लोगों तक पहुँच बनाने के लिए किसी पीआर एजेंसी को किराए पर लेने की आवश्यकता नहीं थी) और सबसे महत्वपूर्ण विचारधारा (प्रकाशित होने के लिए आपको उसी पुरानी लिबरल लाइन को ढर्रा बनाने की आवश्यकता नहीं थी)।

जो लोग ‘संपादक के नाम पत्र’ भी कभी प्रकाशित भी नहीं करवा पाए, वे संपादकों को अब मजाकिया जवाब भेज रहे थे और खुद के पाठकों को बढ़ा रहे थे। जिससे एक नए दौर की शुरुआत होना तय माना जा रहा था। स्वाभाविक है कि इस उलटफेर से लिबरल असहज होने लगे।

अगस्त 2012 में भारत की तत्कालीन सरकार ने कई हैंडल को ब्लॉक कर दिया था। इनमें से कई ‘हिंदुत्व टाइप’ थे, जो सरकार द्वारा ट्विटर को सेंसर करने के शुरुआती प्रयासों में से एक हैं। यूपीए सरकार ने बस ट्विटर को दरकिनार कर दिया और आईएसपी (इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर) को उन ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने के लिए कहा। इसको लेकर बड़े पैमाने पर हंगामा किया गया, लेकिन कुछ लिबरल का इसे मौन समर्थन मिला।

उनमें से कई ने मनमोहन सरकार के इस कदम को यह कहते हुए उचित ठहराया कि ट्विटर अकाउंट में सांप्रदायिक आधार पर ‘अभद्र भाषा’ का इस्तेमाल किया गया था। आम लोगों के ट्विटर अकाउंट को ब्लॉक करने के मनमोहन सिंह सरकार के फैसले का समर्थन करने वाले एक ऐसे लिबरल आउटलेट ‘हार्डन्यूज’ के संस्थापक और संपादक अब एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पदाधिकारी हैं।

हालाँकि, सभी लिबरल्स ने उस समय खुले तौर पर कुछ ट्विटर हैंडल को ब्लॉक करने के सरकार के फैसले का समर्थन नहीं किया। उनके से अधिकतर ने, खासकर मीडिया में बात करने वाले प्रमुखों ने ट्विटर पर ‘ट्रोल्स’ के बारे में एक ठोस चर्चा शुरू की कि यह कैसे एक बड़ी समस्या थी, जिसे हल करने की जरूरत थी। वे चाहते थे कि ट्विटर उन्हें ‘सेफ स्पेस’ दे और सरकार ऐसे ‘अपराधियों’ के खिलाफ कार्रवाई करे, जो उन्हें ट्रोल करते हैं और अपना पक्ष रखने की हिम्मत रखते थे।

जैसा वह चाहते थे वैसा तुरंत नहीं हो पाया। ट्विटर अपने नए यूजर्स के अकाउंट को लेकर काफी व्यस्त था, जबकि दूसरी ओर यूपीए सरकार नए घोटालों में बहुत व्यस्त थी। हालाँकि, यूपीए सरकार के प्रति निष्पक्ष होने के लिए, उन्होंने आईटी अधिनियम की धारा 66ए के साथ आने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत ही शर्मनाक और घिनौना था। उनके शब्द थे, ‘प्रो लिबरल’ अर्थात लिबरल के पक्ष में लिखे गए विचार, पोस्ट की बजाय सरकार के पक्ष में लिखे गए विचार पर कंट्रोल होना चाहिए, जो अंततः लिबरल लोगों का लक्ष्य हैं।

लिबरल छल-कपट में विश्वास करते थे। उस समय मूल रूप से उनके पास स्वरा भास्कर जैसे लोग नहीं थे। इसलिए वे खुले तौर पर समर्थन में नहीं उतर सकते थे। हालाँकि, खासतौर पर कुछ पत्रकारों ने यह तर्क देने की कोशिश की कि ट्विटर पर ‘ट्रोलिंग’ को कंट्रोल करने के लिए ऐसे कानूनों की आवश्यकता है, लेकिन ट्विटर ने यह काम नहीं किया। उसने इस मंच को लोकतांत्रिक बनाना जारी रखा, जहाँ विचारों पर कंट्रोल करना आसान नहीं था।

जुलाई 2013 में नरेंद्र मोदी शशि थरूर को पछाड़कर सबसे अधिक फॉलो किए जाने वाले भारतीय नेता बन गए। अधिकांश लिबरल ने विकास को लेकर उनका मजाक उड़ाया और कहा कि ‘मोदी निश्चित रूप से ट्विटर के प्रधानमंत्री बन सकते हैं’। अगले साल मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इससे लिबरल लोगों को सबसे बड़ा झटका लगा, चारों ओर सन्नाटा पसर गया।

इस झटके से देसी लिबरल को झटका लगा और वह जाग खड़े हुए। उन सभी ने महसूस किया कि उन्हें उन टूल और प्लेटफॉर्म पर दोबारा कंट्रोल करने की जरूरत है, जो नैरेटिव बनाने में मदद करते हैं। वे भाग्यशाली थे कि 2016 में, डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव जीता, इसलिए वैश्विक वामपंथियों को भी नए प्लेटफार्मों को कंट्रोल करने की जरूरत का अहसास हुआ।

अगले 4 सालों में ट्विटर पर लिबरल ने दोबारा कंट्रोल पा लिया। डोनाल्ड ट्रंप को सक्रियता से दबाया गया और उन्हें सेंसर किया। हाँ ये बात भी है कि डोनाल्ड ट्रंप के मुँहफट रवैये ने इसमें उनकी मदद हुई। लेकिन ये भी सच है कि इसके लिए उन्हें पहले से निशाने पर रखा गया था। इस बात का पता सक्रिय लिबरलों और ट्विटर के बीच की साँठगाँठ से भी मालूम होता है। आज डोनाल्ड ट्रंप ट्विटर और फेसबुक दोनों से गायब हो चुके हैं।

लेकिन ये सब चीज नरेंद्र मोदी का कुछ नहीं बिगाड़ पाई। उन्होंने 2019 में दोबारा चुनाव जीता। या यूँ कहें कि वैश्विक वामपंथ को अपनी सारी ऊर्जा नरेंद्र मोदी पर केंद्रित करनी बाकी थी। ऐसा लगता है कि ये सब बदल रहा है। अमेरिका से ट्रंप को हटाकर वामपंथी खुद को किसी मसीहा से कम नहीं समझ रहे। लेकिन ये भी ध्यान रहे कि ऐसे मसीहा अपनी जमीन बदलने के बाद एक जगह नहीं रुकते। ये और शागिर्द अगली भूमि को बदलने, उन्हें नई चीज सिखाने और उसे सभ्य बनाने के लिए निकल पड़ते हैं।

भारत इनके लिए इस परिवर्तन को लाने के लिए सबसे बढ़िया जगह है या कहें कि भारत भी इस परिवर्तन को लाने के लिए इनके लिए सबसे बढ़िया जगह है।

भारत के देसी लिबरल हूबहू पश्चिमी लिबरल जैसे हैं। इन्हें बस यहाँ श्वेत शब्द को ब्राह्मण शब्द से रिप्लेस करके अपना काम करना है। अब तो हैरानी भी नहीं होती कि लिबरल फिल्ममेकरों का बेस्ट काम आखिर हॉलीवुड फिल्मों के रीमेक के तौर पर क्यों पकड़ा जाता है।

देसी लिबरल जानते हैं कि इनके अपने हीरो तो कभी इंटलेक्चुअल दिखेंगे नहीं। मेरा मतलब है कि आप क्या उम्मीद करते हैं उनसे जिनके हीरो ही स्वरा भास्कर जैसे लोग हों। खैर, भूल जाइए,  प्रशांत भूषण जैसे लोग अब निम्न स्तर के ट्रोल में आ चुके हैं, जिसे अभी हाल में मास्क और वैक्सीन पर झूठ फैलाते पकड़ा गया और बाद में ट्विटर से ब्रेक लेकर बैठ गया।

मोदी ने 2019 में दोबारा जीत हासिल की और वो भी बड़े वोट शेयर व ज्यादा सीटों के साथ… ये एक सबूत है कि ये देसी लिबरल आम भारतीयों के दिमाग पर कब्जा नहीं कर पाए थे और इसलिए इन्हें अपने विदेशी मसीहाओं की आवश्यकता है। भारतीय अब भी विदेशी माल और गोरी चमड़ी पर यकीन करते हैं, ताकि इनका षड्यंत्र कामयाब हो। इसी से परे, मुझे लगता है कि लिबरल्स को फेयरनेस क्रीम पर ज्यादा गुस्सा नहीं करना चाहिए वो भी तब तक, जब तक कि ये भारतीय गोरी चमड़ी के इतने दीवाने हों और इनसे इनका प्रोपेगेंडा हवा पाता हो।

प्वाइंट ये है कि मोदी की 2019 मे जीत के बाद विदेशी पहलू होना लिबरल नैरेटिव में महत्वपूर्ण बन गया है। ये कोई संयोग नहीं है कि जो पत्रकार अपने लोगों में विश्वसनीयता खो रहे हैं, वो अब कैसे न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, टाइम्स मैग्जीन में लगातार बाइलाइन लिख रहे हैं। एक बेचारी पत्रकार को तो इन सबके चलते धोखाधड़ी भी झेलनी पड़ी। उसे लगा कि वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर लग गई है… इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बायलाइन राणा अय्यूब की है या रवींद्र अटूत की, जिससे फर्क पड़ता है वो ये बात है कि प्रकाशन में ‘विदेशी’ हिस्सा क्या मायने रखता है।

कुछ हफ्ते पहले द डेली गार्जियन अखबार में एक लेख छपा जिसमें इस बात पर तर्क दिए गए थे कि कैसे पीएम मोदी कोरोना महामारी से निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत में लगे थे। इस लेख को लिबरल्स ने निशाने पर ले लिया। उन्होंने इसके कंटेंट के लिए इसे नहीं घेरा, बल्कि फैक्ट चेक के जरिए ये खुलासा करने लगे कि अखबर यूके का गार्जियन न्यूजपेपर नहीं है।

मूलत: ये लिबरल सिर्फ ये बताना चाह रहे थे कि कैसे फॉरेन मीडिया तो बस उनके साथ है और अगर ऐसा कुछ प्रकाशित हुआ तो मतलब ये तो उन्हें धोखा देने जैसे होगा। मैं जोड़ना चाहता हूँ कि ये सोच मुख्य रूप से उपनिवेशवादी मानसिकता का ही एक लक्षण है।

यही मानसिकता तब भी दिखी तब इन्होंने गल्फ न्यूज में प्रकाशित एक और लेख को आड़े हाथों लिया। इनसे आखिर ये कैसे बर्दाश्त होता कि एक विदेशी मीडिया में किसी विदेशी पत्रकार ने मोदी सरकार की प्रशंसा कर दी। दरअसल, ये देसी लिबरल कुछ भी ऐसा नहीं देख सकते हैं जिससे इनकी ये विदेशी भाग वाली रणनीति बेकार हो। ये जुटे हुए हैं अपने विदेश में बैठे अपने माई-बापों से मदद लेने के लिए, आखिर यही तो मोदी के ख़िलाफ़ इनकी आखिरी उम्मीद है।

विदेश से मसीहा आकर स्थानीय छद्म नायकों को नेस्तनाबूद कर देगा, यह उम्मीद कई मौकों पर सामने आई है न कि केवल उन दो अवसरों पर जिनका जिक्र मैंने ऊपर किया है। हमने लिबरलों के उत्साह को हिलोरे मारते कई मौके पर देखा है, चाहे वह कोई अमेरिकी राज्य या यूरोपीय देश की नगरपालिका ही सीएए के खिलाफ प्रस्ताव क्यों न पारित कर दे। यही ‘किसान आंदोलन’ में विदेश नेताओं से हस्तक्षेप की अपील के दौरान और अधिक बेशर्मी के साथ दिखा। ऐसे किसी भी हस्तक्षेप, यहाँ तक कि पूर्व पोर्न स्टार के समर्थन का भी देसी लिबरलों और वोक्स की जमात ने बढ़-चढ़कर स्वागत किया।

इस आशा का सबसे निर्मम रूप गलवान घाटी में भारत-चीन के टकराव के बीच तब देखने को मिला था, जब देसी लिबरलों और ‘वोक्स’ में से कई सार्वजनिक तौर पर कामना कर रहे थे की भारत को बीजिंग ‘परास्त’ कर दे। यह मसीहा को लेकर इनकी व्याकुलता का एक और प्रमाण था जो विदेशी जमीन से आकर एक नाकाम समाज का साक्षात्कार सच्ची व्यवस्था और धर्म से कराएगा।

एक विदेशी मसीहा को लेकर ये इतने बेचैन हैं कि जब ऑड्रे ट्रुशके नामक विदेशी गोरा औरंगजेब की क्रूरता पर पर्दा डालता है तो ये न केवल उस पर मोहित होते हैं, बल्कि कई कथित इतिहासकार तो उसकी ही धुन पर नाचने लगते हैं। बात अपने पुराने पापों पर पर्दा डालने की हो या नए प्रोपेगेंडा को हवा देनी हो, देशी लिबरलों को अब विदेशी मदद की दरकार है क्योंकि उनके पुराने घरेलू नायकों का चेहरा बेपर्दा हो चुका है।

मोदी सरकार और माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट के ताजा गतिरोध में लिबरलों ने ट्विटर को जिस तरह का समर्थन और प्यार दिया है, वह उसी मानसिकता को दर्शाता है। एक अमेरिकी कंपनी को काफिरों को परास्त करने में मददगार के तौर पर देखा जा रहा। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या लोकतंत्र के बारे में बिल्कुल भी नहीं है।

इस तरह के सिद्धांतों का समर्थन लिबरलों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के आने पर किया था, लेकिन जल्दी ही उन्हें एहसास हो गया कि यह इस तरह काम नहीं करता। आत्मचेतना के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे  कि वे सिद्धांतविहीन हैं, लेकिन उनके पास विशेषाधिकार है जिसे उन्हें संरक्षित करना चाहिए। तब से वे ‘वोक’ में तब्दील हो गए जिनके लिए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नस्ली है’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उनकी हत्या करती है’ (ये आधुनिक उदारवादियों के वास्तविक विचार हैं) तथा उनके लिए अपने पंसदीदा नेता के नहीं जीतने का मतलब लोकतंत्र में खोट होना है।

ट्विटर (अन्य बड़ी तकनीकी मीडिया कंपनियाँ भी) के साथ मौजूदा गतिरोध का चुनाव से सरोकार नहीं है। यह बीजेपी आईटी सेल या कॉन्ग्रेस टूलकिट के बारे में नहीं है। यह उस मानसिकता से जुड़ा है, जो विदेशी मसीहा को श्रेष्ठ और काफिरों को उजड्ड मानता है।

(राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद जयंती मिश्रा और सुनीता मिश्रा ने किया है)

15 दिन में माफ़ी माँगो, वरना वसूलेंगे ₹1000 करोड़: IMA का बाबा रामदेव को नोटिस, कोरोनिल का विज्ञापन हटाने को भी कहा

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और बाबा रामदेव के बीच का विवाद खत्म होता नहीं दिख रहा। IMA उत्तराखंड ने बाबा रामदेव को 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा है। नोटिस में उनसे अपने बयान का खंडन कर लिखित और वीडियो के जरिए माफी की माँग की गई है। इसके लिए 15 दिनों का वक्त दिया गया है।

नोटिस के अनुसार 15 दिन में माफी नहीं मॉंगने पर बाबा रामदेव से 1000 करोड़ रुपए की मॉंग की जाएगी। उनसे 76 घंटे के अंदर कोरोनिल के भ्रामक विज्ञापन को हरेक जगह से हटाने को कहा गया है। बताया गया है कि इन विज्ञापनों में दावा किया गया है कि कोरोनिल कोविड वैक्सीन के बाद होने वाले साइड इफेक्ट पर प्रभावी है।

इससे पहले आईएमए की राज्य शाखा के सचिव डॉ. अजय खन्ना ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने कहा था कि बाबा रामदेव के बयान से आईएमए के डॉक्टरों में खासी नाराजगी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने भी बाबा रामदेव के बयान को गलत माना है। पत्र में उत्तराखंड सरकार से बाबा रामदेव के खिलाफ तत्काल सख्त से सख्त कार्रवाई की मॉंग की गई थी।

बता दें कि एक वीडियो में एलोपैथी को लेकर बाबा रामदेव के दावे के बाद इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई थी। इसको लेकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्द्धन ने भी आपत्ति जताई थी। इसके बाद बाबा रामदेव ने अपने बयान के लिए माफी माँगी थी।

लेकिन, इसके बाद बाबा रामदेव ने आईएमए और दवा कंपनियों ने से 25 सवाल पूछे थे। उन्होंने हाइपरटेंशन, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज जैसे कई बीमारियों के स्थायी समाधान के बारे में सवाल पूछा था। पत्र में उन्होंने पूछा था कि बिना बैरियाट्रिक सर्जरी और लाइपोसेक्शन या किसी छेड़छाड़ के फॉर्मा इंडस्ट्री में कोई ऐसी दवा है जिसे खाने से वजन घट जाए? सोरायसिस, सोरायटिक अर्थरायटिस और सफेद दाग का बिना साइड इफेक्ट के स्थायी समाधान बताने को भी कहा था।

बाबा रामदेव ने अपने पत्र में IMA से सवाल किया था कि एलोपैथी के पास पार्किंसन का निर्दोष स्थायी समाधान क्या है? बाबा ने यह भी कहा था कि कब्ज, गैस, एसीडिटी का फॉर्मा इंडस्ट्री के पास स्थायी समाधान क्या है? अनिद्रा, लोगों को नींद नहीं आती है, क्योंकि आपकी दवा 4-6 घंटे ही असर करती हैं, वह भी साइड इफेक्ट के साथ। क्या इन सबका कोई स्थायी समाधान है?

‘कोरोना वैक्सीन से नपुंसक हो रहे लोग, नोबेल विजेता ने कहा- 2 साल में मर जाएँगे टीका लगवाने वाले’: FACT CHECK

कोरोना वैक्सीन को लेकर तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं। सोशल मीडिया में कुछ तत्व अफवाह फैला रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन लेने से महिलाओं एवं पुरुषों में संतानहीनता (Infertility) की समस्या आ सकती है। जबकि सच्चाई ये है कि यह वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित है व इससे संतानहीनता होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। ये पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी है। ऐसी सूचनाओं और अफवाहों को आगे न बढ़ाएँ।

ये अफवाह फैलाने में नेतागण भी पीछे नहीं थे। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के विधान पार्षद आशुतोष सिन्हा ने कहा था कि कोरोना का टीका लगाने से नुकसान हो सकता है और बाद में सरकार ये कह सकती है वो जनसंख्या कम करने के लिए इसे लगवा रही थी। उन्होंने कहा था कि वैक्सीन से लोग नपुंसक बन सकते हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र के धनोरा तहसील में लोगों ने नपुंसक होने का डर जताते हुए वैक्सीन लगवाने से इनकार कर दिया था। PIB ने भी अपने फैक्ट-चेक में इस तरह के अफवाहों को फर्जी करार दिया है।

इसी तरह एक और पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें लिखा है कि कोरोना वैक्सीन लगवाने के बाद अगले 2 सालों में ही लोगों की मौत हो जाएगी। फ़्रांसिसी नोबेल पुरस्कार के विजेता लुक मोन्टैग्नीर के हवाले से उनकी तस्वीर के साथ ये बयान चलाया जा रहा है कि किसी ने कोरोना की कोई भी वैक्सीन ली हो, उसके बचने की कोई संभावना नहीं है। इसमें ये भी लिखा है कि हमें बड़े पैमाने पर लोगों के अंतिम संस्कार के लिए तैयार रहना चाहिए।

ये खबर भी बिलकुल फर्जी है और उन्होंने इस तरह का कोई बयान ही नहीं दिया है। इसी तरह जापान के नोबेल विजेता तासुकु होंजो के हवाले से भी उसकी तस्वीर लगा कर इसी तरह के बयान चलाए जा रहे हैं। इसमें लिखा है कि होंजो ने वुहान के लैब में काम किया है, जबकि ये भी झूठ है। वैज्ञानिकों ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है।