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कॉन्ग्रेस MLA ने कहा- अज्ञात महिला ने की वीडियो कॉल में आपत्तिजनक हरकत, अब कर रही ब्लैकमेल: शिकायत दर्ज

मध्य प्रदेश के छतरपुर से कॉन्ग्रेस विधायक नीरज दीक्षित ने एक अज्ञात महिला के खिलाफ वीडियो कॉल में अश्लील हरकतें करने और बाद में कॉल रिकॉर्ड करके ब्लैकमेल करने के आरोप में शिकायत दर्ज कराई है।

डीएसपी शशांक जैन ने मंगलवार (25 मई) को यह सूचना दी कि पुलिस ने कॉन्ग्रेस विधायक नीरज दीक्षित की शिकायत पर अज्ञात महिला के खिलाफ आईपीसी की धारा 385 और आईटी ऐक्ट के प्रावधानों के तहत केस दर्ज कर लिया गया है। मामला गढ़ी मलहरा पुलिस थाने में दर्ज किया गया है।

डीएसपी जैन ने बताया कि विधायक ने यह सोच कर वीडियो कॉल रिसीव किया कि यह कॉल उनके क्षेत्र से किसी का हो सकता है। हालाँकि इसकी पुष्टि नहीं हो सकी है कि उस महिला ने विधायक से कितनी फिरौती की माँग की है।

कॉन्ग्रेस विधायक नीरज दीक्षित से संपर्क न हो पाने की स्थिति में उनके प्रतिनिधि ने बताया कि घटना 4-5 दिन पुरानी है। रिपोर्ट्स के अनुसार विधायक अपने परिवार के सदस्यों के साथ बैठे थे तब यह घटना हुई। इस कारण विधायक दीक्षित ने तुरंत ही वीडियो कॉल डिसकनेक्ट कर दिया।

दिल्ली की साइबर सेल के द्वारा भी ऐसे मामलों के विषय में लोगों को सावधान किया गया था। साइबर सेल ने बताया कि इस समय लोगों को (अधिकतर पुरुष) इंस्टाग्राम के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। पहले तो महिलाओं की प्रोफाइल वाले एकाउंट से पुरुषों से सपर्क किया जाता है और उनसे सेक्स चैट या न्यूड वीडियो कॉल की बात कही जाती है। जैसे ही कोई व्यक्ति इसके लिए तैयार हो जाता है, इसकी पूरी रिकॉर्डिंग कर ली जाती है और उसे ब्लैकमेल किया जाता है।

ईमेल पॉर्न स्कैम :

इस समय ब्लैकमेल करके पैसे उगाहने का एक और माध्यम बना हुआ है ईमेल। यूजर के फोन में एक ईमेल आएगा जिसमें लिखा होगा, “हम जानते हैं कि तुमने गलत काम (अश्लील या अभद्र) किए हैं। हमें पैसे (कोई भी एक अमाउंट) दे दो नहीं तो हम उसे (किसी एक व्यक्ति का नाम) बता देंगे।“ इस ईमेल में यूजर का कोई पुराना पासवर्ड भी हो सकता है। इस ईमेल में यह भी दावा किया जाता है कि यूजर के फोन या डिवाइस को हैक किया जा चुका है। इसलिए डरने की बजाय ऐसे ईमेल को डिलीट कर दिया जाना चाहिए।  

तनवीर, जिया उल हक और वसीम ने झारखंड से किया युवती को किडनैप: MP में पुलिस ने दबोचा

मध्यप्रदेश के जबलपुर में पुलिस ने तीन युवकों को एक लड़की के अपहरण के आरोप में गिरफ्तार किया। तीनों युवक, लड़की को झारखंड से किडनैप करके मुंबई ले जा रहे थे। हालाँकि, इस बीच मुखबीर की सूचना पर सभी आरोपितों को पुलिस ने बीच रास्ते में दबोच लिया।

जानकारी के मुताबिक, लोकमान्य तिलक टर्मिनल से मुंबई जाने वाली भागलपुर एक्सप्रेस ट्रेन में सवार होकर तीनों मुंबई जा रहे थे। लेकिन जीआरपी जवानों ने जबलपुर स्टेशन पर जब ट्रेन की चेकिंग की तो उन्हें तीन युवकों के साथ एक युवती ट्रेन में मिली।

पूछताछ में युवकों ने स्वीकार किया कि वो युवती का अपहरण कर उसे मुंबई ले जा रहे थे। वहीं ये भी पता चला कि झारखंड के साहेबगंज थाने में युवती के अपहरण का मुकदमा दर्ज हुआ है।

न्यूज 18 की खबर के मुताबिक, आरोपितों की पहचान मो. तनवीर, जिया उल हक और मोहम्मद वसीम के तौर पर हुई है। पूरा मामला चूँकि झारखंड के साहेबगंज थाने का है इसलिए युवती को पुलिस ने अपनी कस्टडी में लेकर साहेबगंज थाना पुलिस को सूचना दे दी है। वहीं साहेबगंज से भी पुलिस की टीम जबलपुर के लिए रवाना हो गई है। अब आगे की जाँच साहेबगंज पुलिस ही करेगी।

गौरतलब है कि अभी हाल में राजस्थान के करौली से एक लड़की के अपहरण और गैंगरेप का मामला सामने आया था। करौली के कैलादेवी थाना इलाके में तीन युवक लड़की का अपहरण करके उसे जंगलों में ले गए और वहाँ गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया। यही नहीं आरोपी बाद में पीड़िता को एक कुएँ में फेंककर फरार हो गए।

खबरों में बताया गया कि गाँव की लड़की बकरियाँ चराने गई हुई थी। इसी बीच गाँव के तीन लड़के उसे उठाकर जंगलों में ले गए और उसके साथ गैंगरेप किया। इसके बाद उसे एक कुएँ में फेंक दिया गया। कुएँ में बरसाती पानी भरा हुआ था। शाम तक लड़की के घर नहीं पहुँचने पर घरवाले उसे तलाशते रहे, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं लगा वहीं पीड़िता रातभर बिहोशी की हालत में कुएँ में ही पड़ी रही।

योगी सरकार के कदमों का दिख रहा असर, UP के 55 जिलों में कोरोना के नए केस डबल डिजिट में सिमटे

उत्तर प्रदेश में अप्रैल में कोरोना संक्रमण के एक्टिव केस तीन लाख के पार थे। लेकिन, प्रदेश की योगी सरकार के ओर से युद्धस्तर पर किए गए पहलों की वजह से देश का सबसे आबादी वाला राज्य अब इस संक्रमण से उबरता दिख रहा है। ग्रामीण इलाकों में जाँच से लेकर ऑक्सीजन और अस्पतालों में बेड की किल्लत दूर करने के लिए उठाए गए कदमों की वजह से 24 मई को प्रदेश में संक्रमण के एक्टिव मामलों की संख्या 76703 पर आ गई थी।

इस बीच राज्य सरकार ने कोरोना संक्रमितों के साथ ही पोस्ट कोविड से जूझ रहे मरीजों के लिए भी बड़ा फैसला किया है। प्रमुख सचिव चिकित्सा शिक्षा, आलोक कुमार ने बुधवार (मई 26, 2021) को इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संक्रमण से ठीक होने के बाद जो मरीज पोस्ट कोविड लक्षणों से जूझ रहे हैं, यदि उन्हें मेडिकल कॉलेज में भर्ती होना पड़ता है तो उपचार निःशुल्क होगा।

वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के जिला अस्पतालों समेत सभी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध चिकित्सकों, दवाओं और उपकरणों की जानकारी आम जनता को देने के लिए एक मोबाइल एप्लिकेशन विकसित करने के निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार के एक प्रवक्ता के अनुसार, मुख्यमंत्री ने बुधवार को टीम-9 की बैठक में अधिकारियों को निर्देश दिए कि स्वास्थ्य विभाग के अधीन संचालित सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तथा जिला अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं का एक डेटाबेस तैयार किया जाए।

एक तिहाई जिलों में कोरोना खात्मे की ओर

कोरोना के भयावह रूप को झेल चुके यूपी में एक बार फिर से जिंदगी पटरी पर लौटती नजर आ रही है। बीते दो महीने में हजारों जाने गँवा चुके प्रदेश के कई जिलों में आशा की नई बयार शुरू हो गई है। करीब एक तिहाई जिले ऐसे हैं, जहाँ कोविड के नए केसों की संख्या इकाई और दहाई में आकर सिमट गई है। एक जिला तो ऐसा भी है, जहाँ सोमवार (मई 24, 2021) को कोविड का एक भी नया केस नहीं मिला। इसके अतिरिक्त इनमें से ज्यादातर जिलों में मौतें भी शून्य पर पहुँच गई हैं। 

मात्र एक महीने पूर्व प्रदेश में सक्रिय केसों की संख्या तीन लाख से ऊपर पहुँच चुकी थी जो अब 76703 पर आ गई है। कुछ दिन पूर्व ऐसा भी समय था जब एक दिन में नए केसों की संख्या 40 हजार के करीब पहुँच गई थी, आज वह चार हजार से नीचे पहुँच चुकी है। 

सोमवार को प्रदेश के 75 जिलों में से 11 जिले ऐसे थे, जहाँ नए पॉजिटिव केसों की संख्या इकाई में पहुँच चुकी है। कौशाम्बी में तो यह संख्या शून्य है। इसी प्रकार 55 जिले ऐसे हैं, जहाँ नए केसों की संख्या दहाई में पहुँच गई है। इन 55 जिलों में भी 18 जिलों में कोरोना से मरने वालों की संख्या शून्य पर पहुँच चुकी है। 30 अप्रैल को राज्य में मंगलवार को 78% की गिरावट देखी गई, जिसमें केवल 69,828 सक्रिय मामले थे।

इन जिलों में नए केसों की संख्या दहाई में पहुँची

कानपुर नगर, प्रयागराज, गौतमबुद्धनगर, बरेली, मुरादाबाद, झाँसी, आगरा, लखीमपुर खीरी, बलिया, अलीगढ़, गाजीपुर, गाजीपुर, मथुरा, शाहजहांपुर, देवरिया, बाराबंकी, आजमगढ़, अयोध्या, सोनभद्र, रायबरेली, अमरोहा, चन्दौली, प्रतापगढ़, कुशीनगर, बदायूं, सुलतानपुर, उन्नाव, बिजनौर, इटावा, हरदोई, ललितपुर, शामली, सीतापुर, महाराजगंज, हापुड़, गोण्डा, रामरपुर, बस्ती, बहराइच, पीलीभीत, फर्रुखाबाद, एटा, मैनपुरी, अमेठी, संभल, कन्नौज, सिद्धार्थनगर, बागपत, फिरोजाबाद,संतकबीर नगर, मऊ, भदोही, बलरामपुर, अम्बेडकरनगर, श्रावस्ती तथा कासगंज।  

किसानों का उग्र प्रदर्शन: पुलिस से धक्का-मुक्की, PM मोदी के खिलाफ नारे, टिकैत ने कहा- ‘किसी हालत में नहीं झुकेंगे’

कृषि कानून के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन के गुरुवार (26 मई) को 6 माह पूरे होने पर संयुक्त किसान मोर्चा काला दिवस मना रहा है। इसी क्रम में प्रदर्शन के समर्थक दिल्ली की सीमा पर, अपने-अपने घरों पर और अपने वाहनों पर काले झंडे लगाकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इस ब्लै कडे को कई गैर भाजपा पार्टियों कॉन्ग्रेस, टीएमसी, एसपी, एनसीपी समेत कई पार्टियों का समर्थन प्राप्त है।

वहीं यूपी गेट पर आंदोलनकारी किसानों ने हंगामा किया। इस दौरान काले झंडे फहराए गए। भारतीय किसान यूनियन के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता राकेश टिकैत ने काली पगड़ी बांधकर विरोध जताया। इस दौरान प्रदर्शनकारी किसानों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की भी हुई। राकेश टिकैत ने कहा कि किसान किसी भी हालत में नहीं झुकेंगे। किसानों को बचाने के लिए आंदोलन शुरू किया गया है।

प्रदर्शन में कई जगह पुतले फूँकने का काम भी हो रहा है। सिंघू बॉर्डर से सामने आई वीडियो में प्रदर्शनकारी पुतले जलाते हुए और मोदी सरकार मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए देखे जा सकते हैं। इसके अलावा वीडियो में प्रदर्शनकारी पुतले जलाते हुए पीएम मोदी के खिलाफ नारे लगाते हुए भी सुने जा सकते हैं।

वीडियो में दिख रहा है कि न तो कहीं कोविड नियमों का न पालन हो रहा है और न ही प्रदर्शनकारी किसी के नियंत्रण में हैं। कइयों ने मास्क तक नहीं पहना और न सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। 

इसके अलावा खबर है कि बीकेयू कार्यकर्ता मुजफ्फरनगर में टोल फ्री करवाकर वहाँ बैठकर अपना धरना दे रहे हैं। बागपत में भी जाम लगाकर विरोध जताया गया। मेरठ में बीकेयू और रालोद कार्यकर्ताओं ने काली पट्टी बाँधकर प्रदर्शन किया। सहारनपुर में भी किसानों ने अपने मकान पर काले झंडे दिखाकर पुतले फूँके।

वहीं बुलंदशहर में बीकेयू के एनसीआर मंडल अध्यक्ष मांगेराम त्यागी व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष श्योपाल सिंह के नेतृत्व में चौराहे पर केंद्र सरकार का पुतला फूँकने का प्रयास हुआ। लेकिन इस दौरान पदाधिकारियों और पुलिस में छीना झपटी हो गई। वहीं खुर्जा, गुलावठी व कलेक्ट्रेट पर तीनों कृषि कानून के विरोध में काला झंड़ा लेकर नारेबाजी की गई। ग्राम सिसौली में बीकेयू कार्यकर्ताओं ने काला दिवस मनाते हुए ट्रक रैली निकाली।

बता दें कि काला दिवस को लेकर बीकेयू राष्ट्रीय प्रवक्ता टिकैत ने एक दिन पहले घोषणा की थी। इसी क्रम में आज किसान हाथों में काले झंडे लिए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारेबाजी करते दिखे। पुलिस ने कई जगह प्रदर्शनकारियों को रोकने का प्रयास भी किया मगर इस बीच धक्का मुक्की शुरू हो गई। किसानों ने कहा कि जब तक तीनों कानून वापस नहीं लिए जाएँगे, तब तक आंदोलन खत्‍म नहीं होगा। यह आंदोलन लोकसभा चुनाव यानी 2024 तक चलेगा।

नेताओं में ‘हिन्दू’ दिखने की होड़, क्षेत्रीय क्षत्रपों का PM ख्वाब टूटा: 7 साल में बदल दी पूरी सियासत

वो सितम्बर 13, 2013 का दिन था, जब भारत की राजनीति में अगले कई वर्षों के लिए होने वाले बदलाव की औपचारिक शुरुआत हुई थी। उसी दिन गोवा में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को पार्टी का प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया था। तब मीडिया उन्हें ‘हिंदुत्ववादी नेता’ कह कर सम्बोधित करता था। इंटरव्यूज में उनसे 2002 के गुजरात दंगों को लेकर ही सवाल पूछे जाते थे।

नरेंद्र मोदी ने जिस तरह गुजरात में कार्य किया था और राज्य में उद्योग-धंधों को बढ़ाने के साथ-साथ वहाँ सड़क और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं को जन-जन तक पहुँचाया था, उसने जनता का भरोसा ‘गुजरात मॉडल’ पर कायम हुआ। तभी नरेंद्र मोदी ने देश भर में जहाँ भी रैली की, वहाँ भारी भीड़ जुटी और लोगों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया। अब भी उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के टूलकिट में भी लिखा था कि प्रधानमंत्री की अप्रूवल रेटिंग पर कोई असर नहीं पड़ा है।

आखिर क्या कारण है कि पिछले 7 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री और उससे पहले 12 वर्षों तक गुजरात का मुख्यमंत्री रहे नेता से जनता का लगाव अभी तक हूबहू है? अपनी सांगठनिक क्षमता का लोहा मनवा कर चुनावी राजनीति में उतरे नरेंद्र मोदी की रैली जहाँ भी हो, लगभग हर मीडिया चैनल इसका लाइव प्रसारण ज़रूर करता है क्योंकि उसे पता है कि जनता क्या देखना चाहती है। ये वो चेहरा है, जिससे लोग बोर नहीं होते।

‘राजनीति मेरे लिए एक व्यवसाय नहीं, सेवा है’ – नरेंद्र मोदी

इसका कारण है नई किस्म की राजनीति। सन् 2014 के बाद से भारत की राजनीति बदल गई है। अब भाजपा की स्थिति ये है कि अगर वो हैदराबाद के नगरपालिका चुनाव में जान लगा दे, तो वो चुनाव भी किसी राज्य के विधानसभा चुनाव की तरह महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा को 116 से सीधे 282 और फिर 303 लोकसभा सीटों तक पहुँचाने वाले नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल भारत में राजनीति का एक नया युग है।

राष्ट्रीय राजनीति से गायब हो गया PM बनने का सपना देखने वाला हर क्षेत्रीय क्षत्रप

2014 से पहले के चुनावों में कई अघोषित प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हुआ करते थे। बिहार के लालू यादव और नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और महाराष्ट्र में शरद पवार जैसे नेता आए दिन प्रधानमंत्री बनने के सपने देखते थे और खंडित जनादेश की स्थिति में ये असंभव भी नहीं था। 90 के दशक में जनता ने देखा था कि कैसे 1989-99 तक 10 वर्षों 8 बार प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण हुआ।

बिहार में नीतीश कुमार शुरू से राजग के साथ थे, लेकिन उन्होंने नरेंद्र मोदी के आगमन को ठीक से भाँपने में गलती कर दी और मुस्लिम वोटों के लिए भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू का ये हाल हुआ कि उसकी सीटों की संख्या 18 से सीधे 2 पर आ गई। अगले साल राजद के साथ मिल कर उन्होंने राज्य में सरकार ज़रूर बनाई, लेकिन उन्हें वापस NDA में आकर अपनी भूल का पश्चाताप करना पड़ा।

लालू यादव जैसे नेता, जिनके बिना एक समय बिहार की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती थी, का प्रभाव एकदम से कम हो गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में भीषण चुनाव प्रचार अभियान के बावजूद उन्हें हार का मुँह देखना पड़ा। आज बीमारी और जेल की सज़ा के कारण उनकी प्रासंगिकता ही ख़त्म सी हो गई है। इतनी ख़त्म, कि राजद को अपना संस्थापक और अध्यक्ष की तस्वीर भी पोस्टर पर नहीं चाहिए।

मुलायम सिंह यादव का प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब पुराना है, लेकिन 2014 में जिस तरह से भाजपा ने उत्तर प्रदेश में लगभग क्लीन स्वीप किया, उससे उनकी और मायावती की लुटिया डूब गई। दलित वोटों के सहारे रहने वाली मायवती से भाजपा की जन-कल्याणकारी नीतियों ने वो भी छीन लिया, ऊपर से चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ ‘रावण’ जैसों ने उनके जनाधार को नुकसान पहुँचाया। आज मुलायम जहाँ अस्वस्थ हैं, मायावती की राजनीति ट्वीट्स तक ही सीमित है।

इसी तरह शरद पवार जैसे नेता भी महाराष्ट्र में तीसरे नंबर की पार्टी बन कर खुश हैं। राष्ट्रीय राजनीति से वो गायब हो चुके हैं। इन सबका एक ही कारण है कि नरेंद्र मोदी के उदय ने इन नेताओं की सालों की घिसी-पीटी और ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर जाति-मजहब और क्षेत्र के नाम पर की जाने वाली राजनीति का अंत कर दिया। मोदी ने एक Unifier की तरह कार्य करते हुए जनता को बताया कि विकास भी एक मुद्दा हो सकता है।

राजनीति में तकनीक की एंट्री, डिजिटल हुआ पॉलिटिक्स

आज कोरोना काल में वर्चुअल बैठकों से लेकर ऑनलाइन रैलियाँ हुई हैं। अगर यही स्थिति रही तो आगे भी चुनाव प्रचार अभियान हमें डिजिटल रूप में ही दिखाई देगा। लेकिन, क्या आपको पता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में किस तरह से नरेंद्र मोदी ‘3D अवतार’ के जरिए जनता के बीच पहुँचते थे? गुजरात में वो ये प्रयोग 2012 में ही कर चुके थे और 2013-14 में दिल्ली से लेकर कई इलाकों में उनकी 3D रैलियाँ हुईं।

ट्विटर और फेसबुक पर वो पहले से ही सक्रिय थे। देश के अन्य नेताओं के मन में जनता की छवि तकनीक से दूर ‘अनपढ़’ लोगों की बनी हुई थी, तब मोदी ने डिजिटल युग का भविष्य पहचाना और हर प्लेटफॉर्म के जरिए जनता तक पहुँचे। आज भाजपा की तर्ज पर कई पार्टियों के IT सेल हैं, यहाँ तक कि तेजस्वी यादव की पार्टी का भी। आज पीएम मोदी का अपना एप और वेबसाइट है, वो डिजिटली जनता से जुड़े रहते हैं।

टीवी की दुनिया में रेडियो के जरिए ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 90 के दशक में उन विरले लोगों में थे, जो अपना पर्सनल कम्प्यूटर रखा करते थे। उससे पिछले दशक में उनके पास डिजिटल कैमरा था। आज करोड़ों भारतीय विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर जुड़े हुए हैं और उन्हें नज़रअंदाज़ करना किसी भी पार्टी या नेता के लिए असंभव है। यूट्यूब से लेकर इंस्टाग्राम तक राजनीतिक दलों और राजनेतओं की उपस्थिति है।

नरेंद्र मोदी ने 2009 में ही अपना ट्विटर हैंडल बना लिया था। 2014 लोकसभा चुनाव से भी पहले से उनकी वेबसाइट चल रही थी। इसीलिए, आज जब राहुल गाँधी जैसे नेता ‘ट्वीट’ करते हैं और उस पर खबर बनती है तो इसके पीछे भाजपा की वो रणनीति है जिसके पीछे चलते हुए सारे दल अपनी डिजिटल उपस्थिति को और मजबूत करने में लगे हुए हैं। पीएम मोदी आज भी दुनिया में सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले नेताओं में से एक हैं।

जब बाकी दल और नेताओं ने डिजिटल होना शुरू किया, तब तक भाजपा बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने में लगी हुई थी, क्योंकि उसे पता था कि RSS के कैडर का लाभ तो मिलता रहेगा लेकिन साथ ही निचले स्तर पर संगठन की उपस्थिति मजबूत होनी चाहिए। सत्ता में आते ही उनकी सरकार ने MyGov पोर्टल लॉन्च किया। मोबाइल गवर्नेंस पर भी उनका शुरू से जोर रहा है। बाकी दलों को ये चीज देर से समझ आई।

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के बिना आज की राजनीति अधूरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हिंदुत्ववादी होने की बात मीडिया और विपक्षी नेता आज से नहीं बल्कि 2002 से ही कहते आ रहे हैं। गुजरात दंगों में इन नेताओं ने उन पर पक्षपात का आरोप लगाया और सोनिया गाँधी जैसे नेताओं ने तो उन्हें ‘मौत का सौदागर’ तक कह दिया। लेकिन, नरेंद्र मोदी ने अपनी हिन्दू पहचान को लेकर कभी समझौता नहीं किया और सितंबर 2011 में सद्भावना उपवास में इस्लामी टोपी को नकार कर उन्होंने अपनी मंशा जाहिर कर दी।

राम मंदिर का भूमिपूजन करने में उन्होंने कोई संकोच नहीं दिखाया। नए संसद भवन का भूमिपूजन हिन्दू रीति-रिवाज से हुआ, जिसके बाद सर्वधर्म प्रार्थना हुई। जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर से लेकर तमिलनाडु के मदुरै के मिनाक्षी मंदिर तक, वो जहाँ भी गए उन्होंने ईश्वर के सामने मत्था टेका। तिलक लगाने, धोती पहनने और हिन्दू पर्व-त्यहारों को मनाने से उन्होंने कभी गुरेज नहीं किया। यहीं से बाकी नेताओं ने उनकी नकल शुरू की।

आज पप्पू यादव जैसे नेता खुद को श्रीकृष्ण का वंशज बताते हैं। लालू यादव के आवास के बाहर उनके श्रीकृष्ण का अवतार होने के पोस्टर लगाए जाते हैं। उनके बेटे तेज प्रताप कभी श्रीकृष्ण तो कभी भगवान शिव की वेशभूषा में घूमते रहते हैं। अरविंद केजरीवाल जैसे नेता मंदिर में घंटों पूजा-पाठ और आरती पर करोड़ों खर्च करते हैं। राहुल गाँधी भी मंदिर-मंदिर घूमते हैं। ममता बनर्जी चंडी पाठ करती हैं।

और तो और, ईश्वर को मानने का दावा करने वाले वामपंथियों के नेता पिनराई विजयन कहते हैं कि भगवान अयप्पा समेत सभी देवी-देवता लेफ्ट के साथ हैं। फारूक अब्दुल्लाह से चुनाव प्रचार करवाने वाले चंद्रबाबू नायडू मंदिरों में चोरी और प्रतिमाओं के विखंडित किए जाने पर आवाज़ उठाते हैं। तमिलनाडु में ब्राह्मण विरोध पर खड़ी पार्टी के मुखिया स्टालिन भगवान मुरुगन का नाम लेते हैं। प्रियंका गाँधी राम मंदिर का स्वागत करती है।

हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की ये भावना राजनीति में लंबी टिकने वाली है। मुस्लिम तुष्टिकरण कर-कर के जिस तरह आज तक सभी दलों ने हिन्दुओं का शोषण किया, उसका नरेंद्र मोदी ने अंत कर दिया। सोचिए, क्या आज कोई नेता ये बोलने की हिम्मत कर सकता है कि देश की संपत्ति पर पहला हक़ मुस्लिमों का है? मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते ये बयान दिया था। नरेंद्र मोदी के आने के बाद सब हिन्दू होने चले हैं।

अजीबोगरीब गठबंधनों का दौर: जानी दुश्मन भी मोदी को हराने के लिए हुए एक

इसमें सबसे बड़ा उदाहरण बिहार का ही है, जहाँ नीतीश कुमार ने उस लालू यादव के साथ मिल कर सरकार बनाई, जिन्हें हटाने की बात करके और जिनका डर दिखा कर उन्होंने अपना पूरा राजनीतिक करियर बनाया था। 1994 में लालू यादव के खिलाफ एक रैली के साथ नीतीश कुमार ने अपनी अलग पहचान की जो राजनीति शुरू की थी, मोदी लहर के कारण वो भी दाँव पर लग गई। सरकार बनी, पर टिकी नहीं। नीतीश को वापस भाजपा के पाले में आना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में गेस्ट हाउस कांड आपको याद होगा, जिसने मुलायम सिंह यादव और मायावती के बीच ऐसी लकीर खींची थी कि दोनों एक-दूसरे के सिर्फ राजनीतिक ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत दुश्मन भी बन बैठे। नरेंद्र मोदी के कारण सपा-बसपा ‘बुआ-भतीजा’ के नेतृत्व में एक हुई पर परिणाम ढाक के तीन पात ही रहा। दोनों की राहें फिर जुदा हो गईं। जिस माया-मुलायम के टक्कर की लोग मिशाल देते थे, मोदी के कारण वो बची ही नहीं।

जम्मू कश्मीर को देख लीजिए। किसे पता था कि दशकों से एक-दूसरे के खिलाफ लड़ने वाला अब्दुल्लाह और मुफ़्ती परिवार एक हो जाएगा? कर्नाटक में HD कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में ममता बनर्जी भी जुटीं और लेफ्ट के नेता भी आए। पश्चिम बंगाल में हुए एक शक्ति प्रदर्शन में कई नेता जुटे। दिल्ली में भी इसी तरह का एक शक्ति प्रदर्शन हुआ। ये नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व ही है कि आपस में दशकों से लड़ने वाले दल आज भी दिल्ली में एक हैं।

कल को अगर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और लेफ्ट एक हो जाते हैं या फिर DMK और AIADMK तमिलनाडु में गठबंधन करते हैं तो शायद ही किसी को आश्चर्य हो क्योंकि इस मोदी युग ने ऐसे कई उदाहरण दिखा दिए हैं। यही कॉन्ग्रेस केरल में लेफ्ट की जानी-दुश्मन है और पश्चिम बंगाल में उसके साथ गठबंधन में है। नरेंद्र मोदी ने इन राजनीतिक दलों के बीच ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ वाला भाव पैदा कर दिया है।

कल लड़ाई प्रधानमंत्री बनने की थी, आज इसकी है कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा। जिस राज्य में जिस पार्टी की जीत होती है, उसके नेता को मीडिया इसके योग्य बताने लगता है। राहुल गाँधी की ‘एंट्री’ तो न जाने कितनी बार हो चुकी है। कभी एक छोटे से राज्य के सीएम अरविंद केजरीवाल को विपक्ष का ‘मसीहा’ बता दिया जाता है तो कभी शरद पवार अपने राज्य में तीसरे नंबर की पार्टी का मुखिया होकर मीडिया के दुलारे बन जाते हैं।

दक्षिण, उत्तर-पूर्व और कश्मीर की राजनीति भी मुख्यधारा में आई

क्या आपने हिमंता बिस्वा सरमा का नाम सुना है? असम के मुख्यमंत्री तभी लोकप्रिय होने लगे थे, जब उन्होंने राज्य में भाजपा की सरकार बनवाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। फिर उत्तर-पूर्व के अन्य राज्यों में भाजपा को स्थापित करने में अहम रहे। आज उनके बयान लोकप्रिय होते हैं, नॉर्थ-ईस्ट को लेकर बातें होती हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से वहाँ की संस्कृति को आगे बढ़ाने और वहाँ विकास में दिलचस्पी दिखाई है, उससे उपेक्षित लोगों को एहसास हुआ है कि वो भी इस देश की मुख्यधारा का हिस्सा हैं।

इसका अंदाज़ा इसी से लगा लीजिए कि मोरारजी देसाई के बाद नरेंद्र मोदी अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने नॉर्थ-ईस्टर्न काउंसिल की बैठक में हिस्सा लिया। प्रधानमंत्री बनने के बाद वो उत्तर-पूर्व के सभी राज्यों में जा चुके हैं, कुछ में तो कई बार। कोरोना का टीका लगवाते समय भी नरेंद्र मोदी ने असम का गमोछा ओढ़ रखा था। देश के संवेदनशील इलाके के लोगों का दिल जीतने का ख्याल उनके मन में ही आया, इसीलिए मोदी ने राजनीति को बदला।

जम्मू कश्मीर पर आज सभी की नजरें रहती हैं और इसका कारण आतंकी घटनाएँ कम और राजनीतिक वजह ज्यादा हैं। कॉन्ग्रेस को ये बात बखूबी पता है, तभी तो देश की जनता के सामने दिखावा करने के लिए उसे गुपकार गैंग से खुद को अलग किया। ये अलग बात है कि नगरपालिका चुनाव के बाद सत्ता के लिए उसने फिर से समझौता किया। अनुच्छेद-370 हटाए जाने से वहाँ के दलितों को न्याय मिला। आज जम्मू-कश्मीर और लद्दाख देश की राजनीति का अहम हिस्सा हैं।

केरल का सबरीमाला मंदिर मुद्दा हो या फिर हैदराबाद के नगरपालिका चुनाव में भाजपा द्वारा ताकत झोंकना, इस ‘अलग तरह की राजनीति’ ने देश की जनता को दक्षिण के मुद्दों से रूबरू कराया। नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से चीन के राष्ट्रपति का स्वागत तमिलनाडु के ऐतिहासिक मल्लपुरम में किया, जापान के पीएम को बनारस ले गए, चीन के राष्ट्रपति को अहमदाबाद घुमाया – उससे इन जगहों के लोगों के मन में एक भाव पैदा हुआ कि देश सिर्फ दिल्ली से नहीं चलता है।

पश्चिम बंगाल में उपेक्षित मतुआ समुदाय की बात करनी हो या फिर CAA के द्वारा पीड़ित हिन्दू शरणार्थियों को नागरिकता देने की, जो वोट बैंक नहीं हैं उनके बारे में भी सोचना नए युग की राजनीति का नाम है, जो नरेंद्र मोदी करते हैं। अभी तो बस 7 साल ही हुए हैं और इनमें से 2 साल महामारी से निपटने में ही जा रहे हैं, लेकिन फिर भी आगे ‘मोदी युग’ की राजनीति और भी रोचक होने वाली है, नए बदलावों के साथ।

‘आबादी के हिसाब से 16 लाख अधिक वैक्सीन मिली, फिर भी अफरा-तफरी का माहौल बना रहे केजरीवाल’: गंभीर ने दागे 5 सवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में युवाओं की वैक्सीन खत्म हो गई है और उनके वैक्सीन सेंटर पिछले 4 दिनों से बंद हैं। उन्होंने बताया कि बुजुर्गों की कोवैक्सीन भी खत्म हो गई है। बकौल दिल्ली सीएम, उन्होंने केंद्र सरकार को लिखा है लेकिन अभी तक वैक्सीन आई नहीं है। केजरीवाल ने यहाँ तक दावा किया कि कोरोना महामारी के इस दौर में देश भर में कई टीका केंद्र बंद हो गए हैं।

आम आदमी पार्टी (AAP) सुप्रीमो ने कहा कि देश में वैक्सीन की जबर्दस्त किल्लत है और अगर देश के लोगों को सही समय पर वैक्सीन लगा दी जाती तो शायद कोरोना दूसरी लहर के प्रकोप को काफी कम किया जा सकता था। उन्होंने कहा, “मेरी जानकारी के मुताबिक, शायद अभी तक कोई भी राज्य वैक्सीन के एक भी अतिरिक्त टीके का इंतज़ाम नहीं कर पाया है। ये वक्त 130 करोड़ लोगों को मिलकर इस महामारी से मुकाबला करने का है।”

केजरीवाल ने आगे ज्ञान देते हुए कहा कि कोरोना को हराने के लिए हमें टीम इंडिया बनकर काम करना पड़ेगा। लोगों ने उनके इस बयान को लेकर उनकी आलोचना की। किसी ने उसने कोरोना वैक्सीन ऑर्डर के डिटेल्स माँगे, तो किसी ने बताया कि बिहार जैसे गरीब राज्य का भी कोरोना टीकाकरण में शानदार प्रदर्शन रहा है। एक यूजर ने पूछा कि बाकी CM इतने परेशान क्यों नहीं हैं? एक अन्य यूजर ने उनसे पूछा कि केंद्र सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप के अलावा उन्होंने किया ही क्या है?

वहीं नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के सांसद गौतम गंभीर ने अरविंद केजरीवाल के आरोपों का जवाब दिया है। गौतम गंभीर ने कहा कि टीकाकरण को लेकर केजरीवाल सरकार ने जिस तरह अफरा-तफरी और लोगों के अंदर डर का माहौल बनाया हुआ है, वो उनकी घटिया और निचले स्तर की राजनीति को बताता है।

उन्होंने केजरीवाल को आँकड़ों का आइना दिखाते हुए कहा कि दिल्ली की कुल आबादी 2 करोड़ है जो पूरे देश की जनसंख्या का लगभग 1.6% के बराबर है। अभी देश में कुल 20 करोड़ वैक्सीन लगी हैं, यानी कुल आबादी और कुल वैक्सीन के हिसाब से दिल्ली को लगभग 35 लाख वैक्सीन मिलना चाहिए जबकि इससे 16 लाख अधिक वैक्सीन मिले हैं, फिर भी केजरीवाल केंद्र पर आरोप लगा रहे हैं। उन्होंने AAP सरकार से 5 सवाल पूछे:

  1. केंद्र सरकार जब केजरीवाल सरकार को वैक्सीन दे रही थी, तब कंपनी से सीधा खरीदने की माँग कर रहे थे, लेकिन जब इजाजत मिली तब पलटकर केंद्र सरकार से वैक्सीन की माँग क्यों करने लगे?
  2. केजरीवाल सरकार इसकी जानकारी दे कि दिल्ली में 50 लाख से अधिक लोगों को वैक्सीन लग चुकी है, वैक्सीन खरीद में AAP का क्या योगदान है?
  3. केजरीवाल सरकार ने वैक्सीन खरीदने के लिए ऑर्डर कब दिया? केंद्र की इजाजत के बाद भी अभी तक वैक्सीन क्यों नहीं ली?
  4. दिल्ली की भोली-भाली जनता को वैक्सीन के नाम पर धोखा क्यों? AAP नेताओं ने अपने चहेतों के लिए टाइम स्लॉट बुक कर रखा है।
  5. केंद्र द्वारा रोडमैप दिए जाने के बावजूद केजरीवाल अफरा-तफरी क्यों पैदा कर रहे हैं?

बता दें कि दिल्ली में टीकाकरण की गति भी काफी धीमी है। जिन्हें दूसरा डोज लगवाना है, उनके लिए समस्या उत्पन्न हो गई है। 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए सरकारी साइट्स पर फ्री वैक्सीनेशन लगभग बंद हो गया है। केवल प्राइवेट अस्पतालों में पेड वैक्सीनेशन जारी है। जिनके दूसरे डोज का समय बीत जाएगा, उनका क्या होगा? कोवैक्सीन की उपलब्धता तो और भी कम है। मात्र 6 जगहों पर 18-44 उम्र के लोगों को वैक्सीन दिए जा रहे हैं।

रतन टाटा की दरियादिली: कोविड से टाटा स्टील के कर्मचारी की मौत पर परिवार को रिटायरमेंट तक सैलरी

कोरोना से देश में लाखों की संख्या में लोगों की मौत हुई है और इससे तमाम परिवारों पर दुखों का पहाड़ टूटा है। कोरोना से जान गँवाने वाले लोगों के पति या पत्नी अकेले हो गए हैं और बच्चे बेसहारा हो गए हैं। ऐसे में उनको राहत देने के लिए कॉरपोरेट कंपनियाँ तरह-तरह के प्रयास कर रही हैं। इसी कड़ी में टाटा स्टील ने एक बड़ा ऐलान किया है। 

टाटा स्टील ने कोविड-19 से प्रभावित अपने कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना की घोषणा की है। कंपनी ने घोषणा की कि यदि किसी कर्मचारी की कोविड से मृत्यु हो जाती है तो उनके परिवार को कर्मचारी के रिटायरमेंट की उम्र (60 साल) तक उस कर्मचारी का पूरा वेतन देती रहेगी। यह सैलरी उस कर्मचारी की आखिरी सैलरी के बराबर होगी। 

कंपनी ने सोशल मीडिया पर जारी एक बयान में कहा, कि कोविड से मरने वाले कर्मचारियों को हर संभव लाभ मिलेगा। इस योजना के तहत परिवार को मृतक कर्मचारी द्वारा नामांकित व्यक्ति को 60 वर्ष की आयु तक वेतन मिलेगा। इसके साथ ही मेडिकल लाभ और आवासीय सुविधाओं का लाभ भी उठाया जा सकेगा।

बयान में आगे कहा गया, “कंपनी हमेशा स्टील की ढाल रही है, हर समय अपने हितधारकों का समर्थन करती है। यह समय अलग नहीं है। टाटा स्टील परिवार अपने सभी लोगों के साथ खड़ा है, उनकी सुरक्षा और भलाई के लिए प्रतिबद्ध है।”

यदि कंपनी का कोई फ्रंटलाइन कर्मचारी काम के दौरान कोरोना संक्रमित हो जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है, तो कंपनी उसके बच्चों के ग्रैजुएट होने तक उनकी पढ़ाई का सारा खर्च वहन करेगी। कंपनी ने योजनाओं की घोषणा करते हुए ट्विटर पर लिखा, “टाटा स्टील ने कोविड-19 से प्रभावित कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार कर के #AgilityWithCare का रास्ता अपनाया है। हम सभी से आग्रह करते हैं कि वे इन कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए अपने आसपास के लोगों की हर संभव मदद करें।”

कोविड के दौरान और उसके बाद टाटा की परोपकारी परियोजनाएँ

कोविड महामारी के दौरान, टाटा समूह कई अन्य कॉरपोरेट घरानों के साथ जरूरतमंद लोगों को सहायता प्रदान करने के लिए आगे आया। मार्च 2020 में, समूह ने कोविड -19 महामारी से लड़ने के लिए 500 करोड़ रुपए का योगदान दिया। अप्रैल 2021 में, जब देश गंभीर चिकित्सा ऑक्सीजन की कमी का सामना कर रहा था, स्टील इंडस्ट्री ने अस्पतालों को ऑक्सीजन प्रदान करने के लिए कदम बढ़ाया। 1 अप्रैल से 18 मई के बीच कंपनी ने 30,000 टन से अधिक मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति की।

अप्रैल में, कंपनी ने ऑक्सीजन परिवहन में सहायता के लिए 14 क्रायोजेनिक कंटेनरों का आयात किया।

26/11 हमले के दो हफ्ते बाद रतन टाटा ने आतंकी हमले से प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए ताज पब्लिक सर्विस वेलफेयर ट्रस्ट बनाया था। ट्रस्ट का काम 26/11 हमले तक ही सीमित नहीं है बल्कि युद्ध, आतंकवादी हमले, बम विस्फोट या प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसी भी भारतीय की सहायता तक है।

7 साल बाद PM मोदी यहाँ हैं… नेहरू, इंदिरा, मनमोहन कहाँ थे

लोकतंत्र और सियासत की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वह हर दौर में चेहरा/चेहरे तलाश लेता है, जिनके इर्द-गिर्द चुनावी राजनीति सिमटी रहती है। इन चेहरों का प्रभाव व्यापक या क्षेत्रीय हो सकता है। पर इसका उलट एक क्रूर सत्य भी है। अमूमन ऐसे चेहरे अपने राजनैतिक प्रभाव को राष्ट्र या आम लोगों के जीवन के उत्थान के लिहाज से इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। वजह राजनीति का वही घिसा-पिटा अंदाज। नई लकीरें नहीं खींचने का साहस… वगैरह, वगैरह।

इसकी वजह से ये चेहरे दौर बीतते ही काल के गर्भ में खो जाते हैं। कुछ विरले ही होते हैं जो अपने प्रभाव को राष्ट्र और आम लोगों की अवधारणा पर लगातार कसते हैं। समय पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं और दौर से परे हर हाल कालखंड में प्रासंगिक बने रहते हैं। या यूँ कहें कि अगले नायक की प्रतीक्षा में राजनीति उनके रास्तों पर ही गतिमान रहती है। असल में नेता से राजनेता बनने की यात्रा यही है।

उम्र के चौथे दशक की ओर बढ़ रहे हम जैसे लोग जो राजनीतिक तौर पर जागरूक माने जाने वाले इलाके से आते हैं, ने कई नेताओं की यात्रा देखी है। लेकिन नेता के राजनेता बनने की यात्रा पहली बार 2014 में राष्ट्रीय राजनीतिक फलक पर नरेंद्र मोदी के उदय के बाद से देखनी शुरू की। जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गाँधी जैसे अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों की एक विशेष कालखंड में आभा को लेकर सुन/पढ़ भी रखा है।

मोदी की यह यात्रा कितनी सफल रहती है, इसका पूर्ण मूल्यांकन आने वाला समय ही करेगा। वैसे भी इतिहास बेहद क्रूर होता है और सबको अपनी कसौटियों पर परखता है। हमने देखा भी है कि वामपंथी बुद्धिजीवियों द्वारा करीने से सजाई गई नेहरू की मूर्ति को समय के सत्य ने किस कदर तहस-नहस किया है। बावजूद इसके 2014 की 26 मई को ही नरेंद्र मोदी ने पहली बार शपथ ली थी तो उनकी अब तक की यात्रा का मूल्यांकन किया जाना जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि उनसे पहले केवल तीन प्रधानमंत्री ही हुए जिन्होंने इस कुर्सी पर लगातार सातवाँ साल पूरा किया है। वह ऐसा करने वाले पहले गैर कॉन्ग्रेसी प्रधानमंत्री हैं। लिहाजा मूल्यांकन बेहद जरूरी भी दिखता है। खासकर, तब जब पूरी दुनिया एक चीनी वायरस के कारण आई आपदा से जूझ रही और भारत का विपक्ष, तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग तथा मुख्यधारा की मीडिया के विदेशी ताकतों के साथ मिलकर साजिश रचे जाने को लेकर रोज-रोज नए तथ्य सामने आ रहे हैं।

देश के स्वतंत्र होने के बाद प्रधानमंत्री बने पंडित नेहरू 16 साल से ज्यादा वक्त तक इस कुर्सी पर रहे। लेकिन, इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि कार्यकाल के 7वें साल तक आते-आते उनके राजनैतिक ग्राफ में गिरावट का दौर शुरू हो गया था। कश्मीर के मोर्चे पर उनकी नाकामी नजर आने लगी थी। चीन की नीयत का खोट नजर आने लगा था। उनकी बेटी इंदिरा ने जनवरी 1966 में कमान सँभाली तो मार्च 77 तक लगातार प्रधानमंत्री बनी रहीं। उनके बतौर प्रधानमंत्री सातवें साल में प्रवेश करते-करते देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी गड्डमड्ड दिखाई देने लगी थी। राजनीतिक अस्थिरता और उनके एकाधिकार का उभार होने लगा था। उनके बेटे संजय गाँधी की समानांतर सरकार चलने लगी थी। आखिर में इन सबके रिएक्शन से पैदा हुए आपातकाल और उस दौर में लोकतंत्र के हुए दमन से हम सब बखूबी परिचित हैं।

2004 में इंदिरा की बहू सोनिया गाँधी की कृपा से मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचे। मोदी के उदय से पहले तक वे इस पर कुर्सी पर रहे। लेकिन कार्यकाल के 7वें बरस तक आते-आते उनकी और सरकार, दोनों की साख खत्म हो चुकी थी। एक के बाद एक घपले-घोटाले सामने आने शुरू हो चुके थे। अन्ना आंदोलन की नींव पड़ गई थी। मनमोहन सिंह की छवि एक ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ की बन चुकी थी। पॉलिसी पैरालिसिस जैसे शब्द उनकी सरकार के पर्याय बन चुके थे। कई पैरों वाली देवेगौड़ा, गुजराल और खरीद-फरोख्त से चली नरसिम्हा राव सरकार देख चुके हम जैसे लोगों ने वैसी निराशा कभी नहीं देखी थी, जो मनमोहन सरकार की मौजूदगी से पैदा हो रही थी। उनके बतौर प्रधानमंत्री 7वें वर्ष में प्रवेश के साथ यह और घनी होती गई थी।

इसके उलट मोदी इस समय जिस संकट से जूझ रहे हैं उस तरह की विपदा दशकों/शताब्दियों में एक बार आती है। बावजूद न तो उनकी आभा मलिक होती दिख रही है। न लोककल्याणकारी राज्य, मजबूत तथा आत्मनिर्भर भारत की उनकी दृष्टि से मोहभंग होता दिख रहा। बीजेपी और संघ से जुड़े कई लोगों का तो यह भी मानना है कि मोदी का उत्कर्ष अभी आया ही नहीं है। जब वे इस तरह के दावे करते हैं तो समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण कानून जैसे बहुप्रतीक्षित फैसले निकट भविष्य में होने की दलील देते हैं। जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) का हवाला दे बताया जाता है कि यह सब मुमकिन है, बस कोरोना संक्रमण के कारण उपजे हालात की वजह से इनके हकीकत बनने में विलंब हो रहा है।

अपने फैसलों से मोदी ने बार-बार साबित भी किया है वे लीक से बँधकर चलने वालों में से नहीं हैं। सो, जब इस तरह के दावे किए जाते हैं तो वे हवा-हवाई भी नहीं लगते हैं। आखिर पाकिस्तान पर सर्जिकल/एयर स्ट्राइक हो या कश्मीर से 370 हटाए जाने का फैसला, कल्पना हममें से कितनों ने कर रखी थी?

असल में यही मोदी की ताकत है। इसे समझाते हुए वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी पुस्तक भारत कैसे हुआ मोदीमय में लिखा है, “प्रजेंटेशन में सवाल हुआ- अगर आप (दो बड़े उद्योपतियों का नाम लिया गया, जिसमें एक भगोड़ा है तो दूसरा लंबे समय तक जेल में रहा) इनका नाम लेते हैं तो आपके जेहन में क्या छवि आती है? जवाब था- फ्रॉड की। लेकिन जब नरेंद्र मोदी का नाम लेते हैं तो क्या जवाब होता है? एक ऐसा नेता जो कोई भी बड़ा निर्णय ले सकता है, चाहे विकास के एजेंडे पर हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा।”

यह छवि सिर्फ बीजेपी को चुनावी सफलता हीं नहीं दिलाती है। वह कैराना की एक बुजुर्ग महिला के भीतर वह भरोसा जगाती है, जिसके कारण वह कहती है, “मोदी क्या नहीं दिए। गैस चूल्हा दिए। घर दिए। पैखाना दिए। इतना कोई नहीं किया हम गरीब लोगों के लिए। उनको ऊपर वाला भेजा है हमलोगों के लिए!”

अच्छी बात यह है कि सात साल पूरे करने वाले अपने अन्य पूर्ववर्तियों की तरह मोदी की साख और प्रभाव पर तब भी कोई सवाल नहीं है, जब हम वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं। यह मोदी भी जानते हैं और वे तो बकायदा एक साल पहले इसका ऐलान कर चुके हैं। अपनी मौजूदा सरकार के एक साल पूरे होने पर उन्होंने 30 मई 2020 को एक खुला पत्र देश की आम जनता को लिखा था। इसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि भारत का भविष्य कोई आपदा नहीं तय कर सकती। उन्होंने कहा था, “हम अपना वर्तमान भी खुद तय करेंगे और अपना भविष्य भी। हम आगे बढ़ेंगे, हम प्रगति पथ पर दौड़ेंगे, हम विजयी होंगे।”

आज के भारत का सच यही है कि मोदी सपने देखने छोड़ देने वाली आँखों में उम्मीदें जगाने का नाम है। विकास के सपनों को पूरा करने का नाम है। मजबूत एवं आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बढ़ने का नाम है। उसके अलावा जो कुछ दिखता है, वह सब सियासी तमाशा है, उनका जो न जमीन से जुड़े हैं, न जिनमें लकीर छोड़ चलने का साहस है।

‘अरेस्ट तो उनका बाप भी नहीं कर सकता’: गिरफ्तारी की माँग के बीच वायरल हो रहा स्वामी रामदेव का ये बयान

बाबा रामदेव द्वारा एलोपैथ को स्टूपिड साइंस बताने के बाद से योगगुरू चिकित्सकों के निशाने पर आ गए हैं। कोई उनकी गिरफ्तारी की माँग कर रहा है तो कोई इसे कोरोना योद्धा चिकित्सकों का अपमान बता रहा है।

इस मामले में बाबा रामदेव ने अब एक और बड़ा बयान दे दिया है। उनका कहना है कि किसी का बाप भी रामदेव को गिरफ्तार नहीं करा सकता है। बता दें कि बुधवार (मई 26, 2021) को सोशल मीडिया पर इसी विवाद के चलते ‘अरेस्ट बाबा रामदेव’ ट्रेंड कर रहा था। जिसके जवाब में रामदेव ने यह टिप्पणी की।

वायरल हो रहे इस वीडियो में आईएमए पर तंज कसते हुए बाबा रामदेव ने कहा, “अरेस्ट तो उनका बाप भी नहीं कर सकता संत रामदेव को, लेकिन वह एक शोर मचा रहे हैं कि ‘क्विक अरेस्ट स्वामी रामदेव’। आगे उन्होंने कहा कि कभी कुछ चलाते हैं, कभी कुछ चलाते हैं। कभी ठग रामदेव, कभी महाठग रामदेव, कभी गिरफ्तार रामदेव।”

अब अपने लोगों को भी ट्रेंड चलाने की प्रैक्टिस हो गई

तंज कसते हुए बाबा रामदेव ने कहा कि वह ट्रेंड चलाते रहते हैं। अब अपने लोगों को भी ट्रेंड चलाने की प्रैक्टिस हो गई है। इस दौरान रामदेव ने ताली बजाई और हँसते हुए कहा कि आप ट्रेंड में हमेशा ही टॉप पर पहुँच जाते हो इसके लिए आपको बधाई है।

बता दें कि एलोपैथी और एलोपैथिक चिकित्सकों पर की गई बाबा रामदेव की टिप्पणी से उठा तूफान शांत होता नजर नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं रामदेव ने तो यह भी पूछ डाला कि यदि एलोपैथी सर्वशक्तिमान और सर्वगुण संपन्न है तो फिर एलोपैथिक चिकित्सकों को बीमार ही नहीं होना चाहिए।

इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने बाबा रामदेव को पत्र लिख सख्त संदेश भी दिया था, जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा था कि उनकी टिप्पणी एलोपैथिक चिकित्सकों का मनोबल तोड़ने वाली है। इसके बाद बाबा रामदेव ने अपने बयान के लिए माफी माँगी थी।

IMA उत्तराखंड ने बाबा रामदेव को 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा है। नोटिस में उनसे अपने बयान का खंडन कर लिखित और वीडियो के जरिए माफी की माँग की गई है। इसके लिए 15 दिनों का वक्त दिया गया है। नोटिस के अनुसार 15 दिन में माफी नहीं मॉंगने पर बाबा रामदेव से 1000 करोड़ रुपए की माँग की जाएगी।

बता दें कि बाबा रामदेव ने आईएमए और दवा कंपनियों ने से 25 सवाल पूछे थे। उन्होंने हाइपरटेंशन, टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज जैसे कई बीमारियों के स्थायी समाधान के बारे में सवाल पूछा था। पत्र में उन्होंने पूछा था कि बिना बैरियाट्रिक सर्जरी और लाइपोसेक्शन या किसी छेड़छाड़ के फॉर्मा इंडस्ट्री में कोई ऐसी दवा है जिसे खाने से वजन घट जाए? सोरायसिस, सोरायटिक अर्थरायटिस और सफेद दाग का बिना साइड इफेक्ट के स्थायी समाधान बताने को भी कहा था।

बाबा रामदेव ने अपने पत्र में IMA से सवाल किया था कि एलोपैथी के पास पार्किंसन का निर्दोष स्थायी समाधान क्या है? बाबा ने यह भी कहा था कि कब्ज, गैस, एसीडिटी का फॉर्मा इंडस्ट्री के पास स्थायी समाधान क्या है? अनिद्रा, लोगों को नींद नहीं आती है, क्योंकि आपकी दवा 4-6 घंटे ही असर करती हैं, वह भी साइड इफेक्ट के साथ। क्या इन सबका कोई स्थायी समाधान है?

किम जोंग उन के बाद अब नॉर्थ कोरिया में उसकी बहन का खौफ, दिया शीर्ष अधिकारियों की हत्या का आदेश

नॉर्थ कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की तरह उनकी बहन किम यो जोंग ने भी पूरे देश में अपने निरंकुश बर्ताव से हाहाकार मचाया हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि किम ने देश की सरकारी एजेंसियों में सफाई अभियान के तहत कई शीर्ष अधिकारियों को मार दिए जाने के आदेश दे दिए हैं। हाल ही में यो जोंग के आदेश पर एक एक शीर्ष अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसी क्रम में किम ने आगे अन्य अधिकारियों की भी गोली मारकर हत्या के आदेश दिए हैं।

दो नॉर्थ कोरियाई अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि प्योंगयांग में एक उच्च पदस्थ अधिकारी की गोली मारकर हत्या करने की खबर अभी हाइसान में अधिकारियों के बीच फैल रही है। अधिकारियों का कहना है कि वह नहीं जानते हैं कि किस अधिकारी को मारा गया है। लेकिन उन्हें भी अपने शीर्ष अधिकारी से पता चला है कि अधिकारी को किम यो जोंग के कहने पर गोली मारा गया है।

सूत्रों ने रेडियो फ्री एशिया को बताया कि सेंट्रल पार्टी के पास पिछले साल नवंबर में सोना तस्करी का एक मामला आया गया था। इसके बाद दिसंबर महीने में देश के बॉर्डर सिक्‍यॉरिटी कमांड के कुल 10 सुरक्षा अधिकारियों को गोलियों से भून दिया गया था। इनके अलावा 9 अन्‍य लोगों को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।

जानकारी के मुताबिक किम यो जोंग ऐसे आँकड़े इकट्ठा करती हैं जो बताता है कि कुछ लोग पार्टी की सत्ता की चुनौती दे रहे हैं। इसके बाद वह अपने भाई को इस बारे में बताती हैं और फिर इसी क्रम में आगे पार्टी के विरुद्ध काम करने वाले तत्वों को मार दिया जाता है।

इससे पहले 2019 में उत्तरी प्योंगान प्रांत में सिनुइजू सीमा शुल्क अधिकारियों के नरसंहार के बाद किम यो जोंग का नाम सामने आया था। जिसके बाद अधिकारियों ने किम यो जोंग को “डेविल वुमन” कहना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि अपने भाई की खराब हालत के कारण किम यो जोंग ने उसकी जिम्मेदारियाँ ऐसी संभाली हैं कि अब ये बातें होने लगी है कि वह अपने भाई की मौत के बाद कुर्सी संभाल सकती हैं।