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राजस्थान: हिंदू मंदिरों में लाउडस्पीकर पर रोक, अन्य धर्मस्थलों पर दिन में 5 बार बजते हैं, BJP विधायक ने पुलिस प्रमुख को लिखा

भाजपा के सांगानेर से भाजपा विधायक और जयपुर के पूर्व मेयर अशोक लाहोटी ने सोमवार (मई 24, 2021) को जयपुर के पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर सांगानेर, जयपुर में स्थित सभी हिंदू मंदिरों में स्पीकर को जबरन बंद करने का कारण पूछा है, जबकि क्षेत्र में अन्य धार्मिक संस्थानों को इसके उपयोग की अनुमति दी गई है।

लाहोटी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र की इस घटना को ट्विटर पर शेयर किया और उनके द्वारा पुलिस विभाग को भेजे गए पत्र को भी साझा किया। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लॉकडाउन की आड़ में भांकरोटा, सांगानेर में प्रशासन हिंदू मंदिरों में आरती पूजा के लाउडस्पीकर जबरन बंद करवा रहे हैं, जबकि सामने दूसरे धर्मस्थलों पर दिन में 5 बार बज रहे हैं। यह जनता बर्दाश्त नही करेगी।”

लाहोटी ने अपने पत्र में सरकार और प्रशासन के हिप्पोक्रेसी को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि अगर लॉकडाउन के चलते यह नियम लागू किया गया है तो सभी धार्मिक संस्थाओं को इसका पालन करना चाहिए।

सांगानेर विधायक ने कहा कि उनके निर्वाचन क्षेत्र भांकरोटा के वार्ड संख्या 65 में कई हिंदू मंदिर हैं, जिन्हें स्थानीय पुलिस द्वारा दैनिक आरती के लिए लाउडस्पीकर का उपयोग नहीं करने का आदेश दिया गया है। हालाँकि वहीं आस-पास के अन्य धर्म से संबंधित स्थल पर दिन में पाँच बार लाउडस्पीकर बजते हैं। धर्म के आधार पर भेदभाव होने के कारण क्षेत्र की जनता में प्रशासन के प्रति रोष व्याप्त है।

अशोक लहोटी का पत्र (साभार: Twitter)

उन्होंने पुलिस से क्षेत्र में अन्य धार्मिक संस्थानों में लाउडस्पीकर के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया। लाहोटी ने जोर देकर कहा कि सरकारी आदेशों का कार्यान्वयन सभी के लिए समान होना चाहिए, और यदि अधिकारी क्षेत्र के सभी लाउडस्पीकरों को बंद नहीं करते हैं, चाहे वे किसी भी धर्म के हों, तो हिंदू मंदिरों में भी इसका उपयोग करना शुरू कर दिया जाएगा।

यूपी में लाउडस्पीकर से अजान बजने पर मंत्री और वाइस चांसलर की शिकायत

गौरतलब है कि पिछले दिनों योगी सरकार के मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ल ने भी लाउडस्पीकर की आवाज पर आपत्ति जताते हुए बलिया जिले के जिलाधिकारी को दो पन्नों की एक चिट्ठी भेजी थी। चिट्ठी में कहा गया था कि मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर से की जाने वाली तकरीरों से उन्हें योग, पूजा आदि करने में दिक्कत होती है। उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकरों की ध्वनि की मात्रा अदालत के आदेशों के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी चिट्ठी में कहा कि विद्यालय के प्रबंधक, छात्र-छात्राओं की तरफ से यह शिकायत की जा रही थी कि उनके गाँव मोहल्लों के बाहर मस्जिदों से दिन भर विभिन्न प्रकार के अनाउंसमेंट किए जाते हैं। इससे अनेक तरह की परेशानियाँ लोगों को हो रही हैं।

इससे पहले मस्जिद से आने वाली अवाज को लेकर यूपी के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर संगीता श्रीवास्तव ने शिकायत की थी कि उनके आवास के समीप स्थित मस्जिद से सुबह के वक्त लाउडस्पीकर पर आने वाली अजान से उनकी नींद खराब होती है। उन्होंने इस पर रोक लगाने की माँग की थी।

जिसके बाद जिले के आईजी ने सख्त एक्शन लिया। उन्होंने रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने पर रोक लगाए जाने के आदेश दिए। आईजी का कहना था कि पॉल्युशन एक्ट के तहत रात 10 बजे से सुबह के 6 बजे कर लाउडस्पीकर बजाने पर पूरी तरह से बैन है।  

पानी में मिला Corona वायरस, ICMR-WHO ने देश भर में शुरू की सीवेज सैंपलिंग

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर से निपटने के लिए जीतोड़ कोशिशों मे लगी हुई है। इसी बीच लखनऊ से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अध्ययन में पानी में भी कोरोना वायरस पाया गया है। राजधानी में तीन जगह से लिए गए सैंपल में एक सैंपल पॉजिटिव मिला है।

एसजीपीजीआई (SGPGI) के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. उज्ज्वला घोषाल के मुताबिक, ”कोरोना की दूसरी लहर के बाद इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) व वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने रिसर्च स्टडी शुरू कर दी है। इसमें देश भर के अलग-अलग शहरों से पानी में कोरोना वायरस का पता लगाने के लिए सीवेज सैंपल जुटाए जा रहे हैं।”

टेस्टिंग के लिए देश भर में 8 सेंटर बनाए गए

उन्होंने आगे बताया कि सैंपल टेस्टिंग के लिए देश में 8 सेंटर बनाए गए हैं। इनमें यूपी का लखनऊ SGPGI भी है। पहले फेज में लखनऊ के ही 3 साइट से सीवेज सैंपल लिए गए हैं, जहाँ एक सैंपल में कोरोना वायरस की पुष्टि हुई है। वहीं, इसके अलावा मुंबई के सीवेज में भी कोरोना वायरस पाया गया है। अभी देश के अन्य शहरों में अध्ययन जारी है। सीवेज सैंपल टेस्टिंग के लिए देश भर में 8 सेंटर बनाए गए हैं।

सीवेज में वायरस मिलने का कारण कोरोना मरीजों का मल

डॉ. उज्जवला घोषाल ने बताया कि इस समय कई कोरोना संक्रमित मरीज होम आइसोलेशन में हैं। ऐसे में उनका मल (स्टूल) सीवेज में आ जाता है। कई देशों में हुए अध्ययनों में पाया गया है कि 50 फीसदी मरीजों के स्टूल में भी वायरस पहुँच जाता है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सीवेज में वायरस मिलने के पीछे का कारण स्टूल हो सकता है। उन्होंने आगे कहा कि सीवेज के जरिए नदियों तक पानी पहुँचता है। ऐसे में यह आम लोगों के लिए कितना नुकसान देह होगा इस पर अध्ययन किया जाना बाकी है।

बता दें कि लखनऊ में खदरा के रूकपुर, घंटाघर व मछली मोहाल के ड्रेनेज से सीवेज सैंपल लिए गए थे। यहाँ पूरे मोहल्ले का सीवेज एक स्थान पर गिरता है। 19 मई 2021 को इस सैंपल की जाँच की गई तो रूकपुर के सीवेज के सैंपल में कोरोना वायरस पाया गया। इसको लेकर आईसीएमआर-डब्लूएचओ द्वारा देश भर में सीवेज सैंपलिंग शुरू कर दी गई है।

मुबारक अली और रफीक ने दो गर्भवती गायों को चुराकर मार डाला, किसान ने कटे सिर और पैर से की पहचान

तमिलनाडु के गुडियाथम में अरी नाम के किसान की दो गर्भवती गायों के रविवार (मई 23, 2021) को लापता होने के बाद पड़ोस में हत्या कर दी गईकम्युन रिपोर्ट ने इसकी जानकारी दी। 

अरी ने अपने घर के बाहर शेड में अपनी गायों को बाँधा था। गायों को वहाँ से गायब पाए जाने के बाद अरी उसकी तलाश में निकल पड़ा। किसान ने क़ैद-ए-मिल्लत नगर तक गायों के पैरों के निशान से उसका पता लगाया। चूँकि कुछ देर पहले बारिश हुई थी तो पैरों के निशान के जरिए पता लगाना आसान था। हालाँकि जब अरी पैर के निशानों का पीछा करते हुए वहाँ गया तो उसने वहाँ पर गाय के पैर और कटा हुआ सिर पाया

अरी ने ग्रामीणों के साथ चित्तूर रोड पर चोरों और कसाइयों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया, जिसके परिणामस्वरूप एक घंटे तक नाकाबंदी की गई। सूचना मिलने पर उपाधीक्षक श्रीधरन, नगर पुलिस निरीक्षक श्रीनिवासन, तालुका निरीक्षक सुरेशबाबू, उप निरीक्षक सिलंबरासन और शिवचंद्रन भीड़ को तितर-बितर करने के लिए मौके पर पहुँचे और अपराधियों को गिरफ्तार करने का वादा किया।

अरी ने बाद में गुडियाथम तालुका पुलिस में एक आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई और इंस्पेक्टर सुरेश बाबू ने शिकायत की जाँच के आदेश दिए। जाँच करने पर पता चला कि गुड़ियाथम के चित्तूर गेट क्षेत्र के एक पुलिस अधिकारी का बेटा मुबारक अली (28) अपने भाई रफीक (36) के साथ उसी क्षेत्र में कसाई की दुकान का मालिक गर्भवती गायों की चोरी और हत्या में शामिल था। मुबारक अली को गिरफ्तार कर लिया गया है, वहीं पुलिस फरार रफीक की तलाश कर रही है।

‘दाऊद बॉलीवुड आयोजनों में सबसे आगे बैठता था’: जानिए ‘ड्रग्स के सुल्तान’ ने अमेरिकी एजेंटों से क्या कहा

अमेरिकी ड्रग इनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन (DEA) और सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी (CIA) ने लाहौर के स्वर्ण कारोबारी मुहम्मद आसिफ हाफिज से भगोड़े डॉन दाऊद इब्राहिम के ठिकाने के बारे में पूछताछ की थी। बता दें कि दाऊद मुंबई बम ब्लास्ट का मास्टरमाइमंड है और उसे संयुक्त राष्ट्र संघ भी आतंकवादी घोषित कर चुका है।

हाफिज के वकीलों ने यूके हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस को सौंपे गए दस्तावेज में दावा किया है कि डीईए और सीआइए के एजेंट 2014 से 2017 के बीच हाफिज से दुबई में मिले थे। इस दौरान उन्होंने दाऊद इब्राहिम, 1993 के मुंबई बम धमाके, तोरा बोरा, तालिबान और दाऊद के तत्कालीन ठिकाने के बारे में पूछताछ की थी।

द न्यूज इंटरनेशनल के अनुसार, अमेरिकी एजेंटों ने अंडरवर्ल्ड डान दाऊद इब्राहिम का पता लगाने के लिए पाकिस्तानी स्वर्ण कारोबारी से मदद माँगी। सवालों के जवाब में हाफिज ने कहा कि वह तालिबान और अफगानिस्तान के बारे में कुछ नहीं जानता है। हालाँकि, उसने दाऊद से जान-पहचान होने की बात स्वीकार की।

उसने कहा कि एक समय में वह और दाऊद दोनों दुबई में सोने का कारोबार करते थे और अगल-बगल के बॉक्स में बैठकर क्रिकेट मैच देखा करते थे। लेकिन बाद में जब दाऊद ने दुबई छोड़ दिया, उसके बाद से दोनों का कोई संपर्क नहीं है। कोर्ट के दस्तावेज के मुताबिक, हाफिज ने अमेरिकी एजेंटों को बताया कि दुबई में रहने के दौरान दाऊद बालीवुड से जुड़े आयोजनों में अगली पंक्ति में बैठता था। उस दौरान किसी भी परफार्मेस से पहले आयोजक उससे पूछते थे, ‘इजाजत है?’

द न्यूज इंटरनेशनल ने आगे बताया कि हाफिज ने कानूनी कागजात के अनुसार अमेरिकी एजेंटों को बताया कि उन्हें दाऊद इब्राहिम के वर्तमान स्थान के बारे में पता नहीं है। डीईए एजेंटों ने जाबिर मोतीवाला के बारे में भी पूछताछ की, जिसे जाबिर मोती या जाबिर सिद्दीक भी कहा जाता है। इस पर, हफीज ने कथित तौर पर कहा कि वह सिर्फ इतना जानता था कि जाबिर सिद्दीक एक स्टॉकब्रोकर था, जो कराची में स्टॉक एक्सचेंज में काम करता था।

53 वर्षीय पाकिस्तानी नागरिक जाबिर को लंदन के उच्च न्यायालय में दाऊद इब्राहिम की ‘डी कंपनी’ के विश्वव्यापी आपराधिक नेटवर्क के शीर्ष लेफ्टिनेंट के रूप में वर्णित किया गया था। उसे दाऊद इब्राहिम का दाहिना हाथ माना जाता है। वह यूके, यूएई और दुनिया भर में अंडरवर्ल्ड डॉन के निवेश का प्रबंधन करता है। जाबिर को ब्रिटिश पुलिस ने अगस्त 2018 में लंदन के हिल्टन होटल में गिरफ्तार किया था। इससे एक साल पहले, यानी अगस्त 2017 में, यूके के अधिकारियों ने क्लास ए ड्रग्स के आयात और तैयारी से जुड़े आरोपों के लिए अमेरिका के प्रत्यर्पण के अनुरोध पर आसिफ हाफिज को गिरफ्तार किया था।

3 महीने का समय होने के बावजूद ट्विटर, फेसबुक ने नहीं किया नियमों का पालन, अब हो सकती है सख्त कार्रवाई

ट्विटर, फेसबुक समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 26 मई 2021 तक की समय सीमा मिलने के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करने में अब तक असफल रहे। ऐसे में आगे इनके बने रहने पर इनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

मालूम हो कि केंद्र सरकार के इलेक्ट्रानिक्स एवं इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय ने इस साल 25 फरवरी को सभी सोशल मीडिया कंपनियों को नए नियमों का पालन करने के लिए 3 महीने का समय दिया था। 

इसमें भारत सरकार ने कंपनियों को इंटरमीडिएट्री गाइडलाइन एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड रूल्स, 2021 के तहत नियमों का पालन करने के लिए कहा था। लेकिन कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसा करने में असफल रहे।

शीर्ष सूत्रों का कहना है, “यदि सोशल मीडिया कंपनियाँ नियमों का पालन नहीं करेंगी, तो वे बिचौलियों के रूप में अपनी स्थिति और सुरक्षा खो सकती हैं। साथ ही भारत के मौजूदा कानूनों के अनुसार आपराधिक कार्रवाई के लिए उत्तरदायी हो सकती हैं।”

जानकारी के मुताबिक, केंद्र सरकार ने कंपनियों को दिशा-निर्देश देते हुए कहा था कि ऐसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म देश में थ्री-टायर सेल्फ-रेगुलेट्री फ्रेम वर्क के तहत तीन अफसर (resident grievance officer, chief compliance officer और nodal contact person) तैनात करें, जिनकी हर मामले में जवाबदेही हो, साथ में किसी शिकायत का तुरंत निपटान किया जा सके। इसके अलावा आपत्तिजनक कंटेंट की निगरानी और उस सामग्री को हटाने जैसे नियम भी लागू करने को कहे गए थे।

इन सबके लिए केंद्र सरकार ने देश में काम कर रहीं सभी सोशल मीडिया कंपनियों को 26 मई तक का समय दिया था, लेकिन अभी तक किसी भी कंपनी ने इन नियमों का पालन नहीं किया है। सिर्फ भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म कू ने ही सरकार के दिशा निर्देशों के अनुसार आवश्यक नियुक्तियाँ की।

एक अधिकारी ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर ये भी कहा कि इन प्लेटफॉर्म्स के लिए ये जरूरी नहीं था कि वे मंत्रालय को नियुक्तियों के संबंध में सूचित करें। वे अपने वेबसाइट पर भी विवरण प्रस्तुत कर सकते थे। बस उन्हें नियमों का किसी तरह पालन करना है। अधिकारी के मुताबिक नियमों को 25 फरवरी को अधिसूचित किया गया था और सोशल मीडिया कंपनियों को इसे लागू करने के लिए 3 माह का समय दिया गया था।

फेकबुक का बयान

सरकार द्वारा तय की गई डेडलाइन से एक दिन पहले फेसबुक ने मंगलवार (25 मई) को इस संबंध में अपना बयान दिया। फेसबुक ने कहा “हमारा लक्ष्य आईटी नियमों के प्रावधानों का पालन करना है और कुछ ऐसे मुद्दों पर चर्चा करना जारी रखना है जिनके लिए सरकार के साथ अधिक जुड़ाव की आवश्यकता है। आईटी नियमों के अनुसार, हम परिचालन प्रक्रियाओं को लागू करने और दक्षता में सुधार करने के लिए काम कर रहे हैं। हमारा प्लेटफॉर्म लोगों को स्वतंत्र रूप से और सुरक्षित रूप से खुद को व्यक्त करने की क्षमता के लिए प्रतिबद्ध है।”

बता दें कि बड़ी तकनीकी कंपनी खासकर ट्विटर से अक्सर भारत सरकार का टकराव होता रहा है। खासकर तब जब ट्विटर मनमाने ढंग से बिना कोई वजह दिए किसी का अकॉउंट निलंबित कर दे और गलत सूचनाओं को बिना किसी कार्रवाई के बढ़ाता रहे। हाल ही में ट्विटर को दिल्ली पुलिस ने भाजपा नेताओं के ट्वीट पर मैनिपुलेटिड मीडिया के लेबल लगाने पर तलब किया था। पुलिस जानना चाहती है कि किस आधार पर ऐसा किया गया। वहीं सरकार भी ट्विटर की ऐसी हरकतों से नाखुश है।

न्यूजलॉन्ड्री निवेशक और MeToo आरोपी महेश मूर्ति का मायावती पर घिनौना ट्वीट वायरल, डिलीट कर माँगी माफी

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती के खिलाफ अपने पुराने ट्वीट के वायरल होने के बाद न्यूजलॉन्ड्री निवेशक महेश मूर्ति एक बार फिर सोशल मीडिया पर विवाद का केंद्र बन गए हैं।

4 सितंबर, 2012 को एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, “सरकार प्रमोशन के लिए एससीटी/एसटी आरक्षण को मँजूरी दी। अगला एससी/एसटी आरक्षण आपकी सेक्स लाइफ में होगा! आखिरकार मायावती ने भी पाया।” 

महेश मूर्ति द्वारा किए गए ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यह घिनौना ट्वीट बसपा प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा प्रमोशन में आरक्षण को शामिल करने की अनुमति देने के बाद उन पर किया गया था। हालाँकि सोमवार (मई 24, 2021) को ट्वीट वायरल होने के बाद 2018 #MeToo मामले के आरोपित मूर्ति ने झट से इसे डिलीट कर दिया।

महेश मूर्ति ने मंगलवार (मई 25, 2021) को ‘हास्य की बेकार कोशिश’ में ‘बेतुकी बातें’ कहने के लिए माफी माँगी। उन्होंने ट्वीट किया, “दोस्तों, मैंने लगभग 9 साल पहले ट्विटर पर जाति, आरक्षण और राजनीति के बारे में कुछ बेवकूफी भरी बातें कही थीं। मैं तब बेवकूफ था और यह हास्य का एक घटिया प्रयास था। मैंने उन ट्वीट्स को हटा दिया है और उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ। माफ़ करना।”

दिलचस्प बात यह है कि महेश मूर्ति वामपंथी प्रचारक वेबसाइट न्यूजलॉन्ड्री को फंड देते हैं, जो एक स्वतंत्र संगठन होने का दावा करती है। हालाँकि न्यूजलॉन्ड्री भारत में महिला अधिकारों और #MeToo आंदोलन के बारे में मुखर रही है, लेकिन यह अपने निवेशक के खिलाफ यौन दुराचार के आरोपों के सामने चुप रही है।

महेश मूर्ति पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोप

2017 में, ऑपइंडिया समेत कई मीडिया संगठनों ने 6 महिलाओं द्वारा न्यूजलॉन्ड्री निवेशक महेश मूर्ति के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों की सूचना दी थी। उत्पीड़न की यह घटना 2003 से 2016 के बीच हुई थी। प्रौद्योगिकी वेबसाइट फैक्टर डेली के संस्थापक पंकज मिश्रा ने ट्वीट्स की एक श्रृंखला में, उद्यम पूँजीपति महेश मूर्ति पर आरोप लगाया था, जो वामपंथी झुकाव वाले स्वघोषित ‘मीडिया वॉचडॉग’, न्यूजलॉन्ड्री में निवेशक भी हैं।

यौन दुराचार को उजागर करने वाली रिपोर्टों में कहा गया है कि रश्मि बंसल नाम की एक लेखिका और एक महिला पत्रकार ने मूर्ति पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाया था। मूर्ति ने कथित तौर पर एक अनुचित संदेश भी भेजा था। रिपोर्ट में कहा गया था कि बहुत से लोग मूर्ति के कथित दुर्व्यवहार के बारे में जानते थे, लेकिन एक आईटी दिग्गज को छोड़कर किसी ने भी उनके खिलाफ स्टैंड नहीं लिया। 2006 में मूर्ति द्वारा एक महिला कार्यकारी से कथित तौर पर ‘क्या आप वर्जिन हैं’ पूछा गया था और फिर कंपनी ने मूर्ति की डिजिटल मीडिया कंपनी, पिनस्टॉर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया।

‘एक ऐसी महामारी जो…’: चरक ने हजारों साल पहले चेताया था, पर वायरस की जगह आयुर्वेद से लड़ रहा IMA

ईसाई मजहबी गतिविधियों को आगे बढ़ाने वाले JA जयलाल की अध्यक्षता वाले ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ हाथ धो कर बाबा रामदेव के पीछे पड़ा है। मरीजों के इलाज के लिए और लोगों को स्वस्थ रखने के लिए कौन सी पद्धति बेहतर है, ये तो बड़ी चर्चा का विषय है और इस पर सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। लेकिन, प्राचीन काल से ही आयुर्वेद करोड़ों लोगों के लिए वरदान बन कर कार्य कर रहा है, इस पर शायद ही किसी को शक हो।

एलोपैथी शब्द का ही इस्तेमाल 19वीं शताब्दी (सन् 1852) में शुरू हुआ, जबकि आयुर्वेद भारत में पिछले कई हजार वर्षों से सफलतापूर्वक लोगों का इलाज कर रहा है। IMA को चाहिए कि वह आयुर्वेद व एलोपैथी साथ कैसे कार्य कर सकते हैं, इस पर आगे बढ़े। उसे उन सवालों के जवाब भी देने चाहिए जो ईसाई धर्मांतरण को लेकर उसके अध्यक्ष पर लगे हैं। साथ ही यह भी जगजाहिर है कि लोगों के बीच यह धारणा गहरे तक है कि डॉक्टर फार्मा कंपनियों के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं।

आयुर्वेद को खारिज करने की जगह आईएमए को इन धारणाओं को तोड़ने के लिए कारगर कदम उठाने चाहिए। IMA ये भी बताए कि उसके अध्यक्ष के बयान मानें या मेडिकल दिशा-निर्देशों को? वे कोरोना के प्रकोप के कम होने के लिए भी जीसस को ही क्रेडिट देते हैं। उन्होंने कहा था कि जीसस की कृपा से ही लोग सुरक्षित हैं और इस महामारी में उन्होंने ही सभी की रक्षा की है। क्या IMA भी दवाओं, इंजेक्शन, सर्जरी, ऑक्सीजन सिलिंडर्स इत्यादि को त्याग यही इच्छा रखता है?

आगे हम इस विवाद पर बात करेंगे लेकिन उससे पहले ये बताना आवश्यक है कि जब एलोपैथी का जन्म भी नहीं हुआ था और एलोपैथी दवा बनाने वालों के पूर्वज भी जंगलों में रहते थे, तब चरक और सुश्रुत जैसे विद्वानों ने संक्रामक रोगों के बारे में न सिर्फ बताया था, बल्कि इससे बचाव के उपायों पर भी चर्चा की थी। आज जब ये चर्चा हो रही है कि कोरोना वायरस को चीन के वुहान स्थित लैब में बनाया गया था, ये मानव निर्मित है, ऐसे में हमें आयुर्वेद के जनकों की बातें जाननी चाहिए।

कई हजार वर्ष पूर्व संक्रामक महामारी को लेकर आयुर्वेद ने किया था आगाह

BHU और उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के विद्वानों ने अप्रैल 2020 में एक रिसर्च पेपर तैयार किया था, जिसमें प्राचीन काल के आयुर्वेदिक साहित्य में संक्रामक रोगों का जिक्र होने की बात कही गई थी। संक्रामक रोग, अर्थात सूक्ष्म जीवों द्वारा फैलाए जाने वाले रोग। वे रोग, जो एक जीव से दूसरे जीव में जा सकता है। ये वातावरण के जरिए जानवरों या पेड़-पौधों के माध्यम से इंसान के शरीर में प्रवेश कर सकता है।

स्वच्छ जल का न उपलब्ध होना, शौचालय न होना या मल-मूत्र जैसे अवशिष्ट पदार्थों को ठिकाने लगाने की उचित व्यवस्था न होना, भोजन-पानी में हाइजीन न होना और आसपास का वातावरण प्रदूषित होने से संक्रामक रोग जन्म ले सकते हैं। बाढ़ और सूखे जैसी स्थिति में ये रोग आ सकते हैं या फिर युद्ध या औद्योगिक दुर्घटनाओं की स्थिति में ये मानव निर्मित भी हो सकता है। इसी को आयुर्वेद में जनपदोध्वंस कहा गया है।

इसमें एक पूरे इलाके के लोग किसी रोग से ग्रसित हो जाते हैं, जो संभवतः संक्रामक स्वभाव का होता है। कोरोना वायरस ठीक उसी तरह है। जनपदोध्वंस में रोग वायु, जल और मिट्टी से फ़ैल सकता है। काल, अर्थात मौसम के हिसाब से इसके खतरे बढ़-घट सकते हैं। इतिहासकार कहते हैं कि चरक संहिता 200 BCE की पुस्तक है, लेकिन हिन्दुओं का मानना है कि ये इससे भी कहीं अधिक प्राचीन है।

संक्रामक रोगों के विषय में ये क्या कहता है, आइए जानते हैं। इसमें इसका कारण ‘अधर्म’ को बताया गया है, अर्थात ईमानदारी के साथ प्रकृति और राष्ट्र के नियमों का पालन न करना। आज के जमाने के हिसाब से समझिए तो प्रदूषण से लेकर ग्लोबल वॉर्मिंग तक जैसी चीजें मानव निर्मित कारणों से ही हैं। इसी तरह 800 BCE के माने जाने वाले सर्जरी के जनक सुश्रुत ने इन्हें ‘औपसर्गिक रोग’ नाम दिया है।

आज डॉक्टर से लेकर कई वैज्ञानिक भी कह रहे हैं कि कोरोना वायरस या तो चीन का ‘बॉयो हथियार’ है या फिर वुहान के लैब से गलती से लीक हुआ है और इसे ढकने के लिए उसने अपना प्रोपेगेंडा चलाया। चरक जिस ‘अधर्म’ की बात कर रहे थे, कहीं ये वही तो नहीं? उन्होंने ऐसे संक्रामक रोगों के लिए मानव निर्मित कारणों को यूँ ही नहीं जिम्मेदार ठहराया था, जो पूरी की पूरी जनसंख्या को निगल सकते हैं।

वो लिखते हैं कि कुष्ट रोग, ज्वर और शोष (एक प्रकार की निर्बलता) इस तरह की बीमारियाँ हो सकती हैं। फिर उन्होंने बताया है कि कैसे लोगों के एक-दूसरे से संपर्क में आने, आसपास उसी हवा में साँस लेने, एक ही भोजन को अलग-अलग लोगों द्वारा खाने, साथ में सट कर सोने, बैठने, कपड़ों या माल्यार्पण और एक ही चंदन का लेप लगाने (अब इसे साबुन समझिए) से ये रोग फ़ैल सकता है। इसमें स्पष्ट लिखा है कि आसपास की चीजें गंदी होने से ये रोग फैलते हैं, जो आज भी वैज्ञानिक मानते हैं।

घर, बिस्तर अथवा गाड़ी जैसे चीजों की उचित साफ़-सफाई न करने से ऐसे रोग फैलते हैं। आज भी हमें यही कहा जा रहा है कि आसपास की हर चीज को सैनिटाइज कर के रखें। ‘चरक संहिता’ में भी स्पष्ट लिखा है कि भोजन या एक-दूसरे को छूने के जरिए फैसले वाले खतरनाक रोग किसी क्षेत्र में पूरी जनसंख्या की जान ले सकते हैं। दूषित पौधों या जल से होने वाले रोगों को तब ‘मारक’ नाम दिया गया था।

इसी तरह ईसा के जन्म से 100 वर्ष पूर्व के माने जाने वाले महर्षि भेला ने अपनी संहिता में ऐसे रोगों के बचने के लिए पंचकर्म की बात की है – मुँह के द्वारा उलटी कर के अवांछित पदार्थों को बाहर निकालना, शरीर से अवांछित पदार्थों को अन्य मार्गों से बाहर निकालना, नाक की सफाई या नाक के मार्ग से दवा लेना, वस्तिकर्म (Enema) और अचार-विचार का पालन करना। इसमें साफ़-सफाई के अलावा ज्वर में गर्म पानी पीने के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसकी सलाह आज हमें आधुनिक विज्ञान भी दे रहा है।

यही कारण है कि आयुर्वेद में दिनचर्या और रात्रिचर्या के अलावा ऋतुचर्या की भी बात की गई है। विद्वानों का मानना है कि ‘अष्टांग आयुर्वेद’ की विधियों में से 3 तो विशेषतः महामारी से निपटने के लिए ही बनाए गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी आयुर्वेद को मान्यता देता है और मानता है कि वैदिक उपचार व्यवस्था विश्व की सबसे प्राचीनतम विधा में से एक है। WHO इसे 3000 वर्ष पुराना मानता है। तक्षशिला विश्वविद्यालय में आयुर्वेद के लिए एक अलग विभाग ही था।

आयुर्वेद जीवन जीने की पद्धति भी सिखाता है। विश्व की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में भी पेड़-पौधों के सही उपयोग को लेकर कई चीजें लिखी हुई हैं। आत्रेय और धन्वन्तरि जैसे वैद्यों ने 3000 से भी अधिक वर्ष पूर्व आयुर्वेदिक पद्धतियों को आगे बढ़ाया। WHO आयुर्वेदिक पद्धति में प्रशिक्षण की भी व्यवस्था कर रहा है। ‘ट्रेडिशनल मेडिसिन’ का मुख्य सेंटर भारत में संस्था द्वारा खोला जा रहा है। WHO ने आयुर्वेद व इसके प्रशिक्षण की जानकारी देते हुए एक पेपर भी प्रकाशित किया था।

ऐसे में जब बाबा रामदेव कई रोगों के स्थायी समाधान को लेकर एलोपैथी के ठेकेदारों से सवाल पूछते हैं तो इसमें दम लगता है। उनका सवाल बस इतना है कि है BP, डायबिलिज टाइप-1,2, थायराइड, अर्थराइटिस, अस्थमा, हार्ट ब्लॉकेज अनिद्रा, कब्ज, पायरिया जैसे कई रोगों के लिए क्या कोई दवा है? उनका कहना है कि कई बीमारियों में तो सर्जरी ही एकमात्र उपाय है। IMA को चाहिए कि वो मिशनरी चंगुल से बाहर निकले और आयुर्वेद व एलोपैथी साथ कैसे कार्य कर सकते हैं, इस पर आगे बढ़े।

नवजोत सिद्धू ने ठुकराई अमरिंदर सिंह की अपील, पटियाला में काला झंडा फहराकर किया ‘कोरोना सुपर स्प्रेडर’ किसान आंदोलन का समर्थन

मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के आग्रह की अनदेखी करते हुए विवादों में चल रहे कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू भारतीय किसान यूनियन के समर्थन में आ गए हैं। सिद्धू ने मंगलवार (25 मई 2021) को प्रदर्शन कर रहे किसानों के समर्थन में पटियाला स्थित अपने आवास पर काला झंडा फहराया। पंजाब के सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने रविवार (23 मई 2021) को भारतीय किसान यूनियन को पटियाला में अपने तीन दिवसीय प्रस्तावित धरने को स्थगित करने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि इससे राज्य में कोरोना के मामले बढ़ सकते हैं। उनकी सरकार ने पंजाब के हालात दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे न बने इसके लिए सख्त लड़ाई लड़ी है।

नवजोत सिद्धू ने ट्विटर पर अपना और अपनी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू का घर की छत पर काला झंडा फहराने का एक वीडियो भी साझा किया। वीडियो के साथ उन्होंने लिखा, “विरोध में काला झंडा फहराना … हर पंजाबी को किसानों का समर्थन करना चाहिए !!”

वहीं, अमृतसर में नवजोत सिंह सिद्धू के घर पर उनकी बेटी राबिया सिद्धू ने काला झंडा फहराया। इस मौके पर राबिया सिद्धू ने ‘जो बोले सो निहाल’ के जयकारे लगाए और किसानों के हक में कृषि कानून रद्द करने को लेकर केंद्र सरकार का विरोध करते हुए ‘जय किसान जय जवान’ के नारे लगाए।

सिद्धू ने कृषि कानूनों को ‘काला कानून’ कहा

सिद्धू ने काला झंडा फहराने के बाद किसानों को केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ भड़काया। इन कानूनों के खिलाफ अपनी पार्टी के नेताओं, विशेष रूप से राहुल गाँधी द्वारा फैलाए जा रहे झूठ और भ्रामक सूचनाओं को दोहराते हुए सिद्धू ने कहा, ”कृषि कानून ‘ब्लैक लॉ’ या ‘काला कानून’ है। अगर इसे लागू किया जाता है, तो यह गरीब किसानों के लिए विनाशकारी साबित होगा। सिद्धू ने पंजाब के किसानों को तब तक अपनी जंग जारी रखने के लिए उकसाया जब तक केंद्र सरकार कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए मजबूर नहीं हो जाती।”

दरअसल, दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हुए किसान संगठनों को समर्थन देते हुए पूर्व मंत्री सिद्धू ने सोमवार (24 मई 2021) को ही ऐलान कर दिया था कि वह अमृतसर और पटियाला में अपने घर की छत पर काला झंडा लहराएँगे। 

वहीं, तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर लगातार धरना प्रदर्शन जारी है। विरोध प्रदर्शन को 26 मई के दिन छह महीने पूरे हो रहे हैं। इसको लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने 26 मई को काला दिवस मनाने का निर्णय लिया है।

बता दें कि कोरोना के बढ़ते खतरे के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने किसान संगठन भारतीय किसान यूनियन से प्रस्तावित 3 दिन के धरना प्रदर्शन को रोकने की अपील की थी। सीएम ने संगठन से कहा था कि प्रदर्शन करने से कोरोना वायरस का संक्रमण काफी तेजी से फैल सकता है।

पहली महिला प्रधानमंत्री, संसद में घुसने नहीं दिया; टेंट में लेनी पड़ी शपथ: चीन को हाल ही में समोआ ने दिया है बड़ा झटका

हाल में चीन की एक महत्वाकांक्षी परियोजना को झटका देने वाले ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के द्वीपीय देश समोआ को फियामी नाओमी मताफा (Fiame Naomi Mata’afa) के रूप में अपनी पहली महिला प्रधानमंत्री मिलीं

इस बीच पूर्व प्रधानमंत्री ट्विलाएपा सैलेले मैलिलेगाओई (Tuilaepa Sailele Malielegaoi) ने सत्ता हाथ से जाती देख अपना पद छोड़ने से मना कर दिया। वहीं उनकी पार्टी ने संसद में ताला लगवा दिया, जिसके चलते नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री को तंबू में शपथ लेनी पड़ी।

तंबू में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेना कितना आधिकारिक है या कितना नहीं, इस पर अभी कोई टिप्पणी नहीं आई। लेकिन बता दें कि इस बार नाओमी की जीत के चलते ह्यूमन राइट प्रोटेक्शन पार्टी (HRPP) का 40 साल बाद सत्ता से किनारा हुआ।

पार्टी 1982 से लगातार सत्ता में थी और दो दशक से तो स्वयं ट्विलाएपा सैलेले ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे थे। हालाँकि, इस दफा नाओमी के सत्ता में आने से जीत का यह सिलसिला टूटा। जिससे सत्तारूढ पार्टी बिलबिला उठी और प्रधानमंत्री ट्विलाएपा ने बिना किसी वजह के सोमवार की संसदीय बैठक कैंसिल कर दी।

इस खबर के बाद समोआ के सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गैरकानूनी बताया। वहीं जब नई प्रधानमंत्री संसद में शपथ लेने पहुँची तो उन्हें दरवाजा बंद मिला। यह सब देखकर FAST के प्रवक्ता ने कहा कि ये तख्तापलत बिलकुल सही है। इसके बाद शपथ ग्रहण समारोह एक टेंट में हुआ।

कड़े मुकाबले के बाद समोआ को मिली पहली महिला PM

समोआ में इस बार HRPP और FAST के बीच कड़ा मुकाबला हुआ। इस दौरान दोनों पार्टियों ने 25-25 सीटें अपने नाम की, लेकिन बाद में एक निर्दलीय विजेता ने FAST को अपना समर्थन दे दिया। इस दौरान HRPP ने कुर्सी बचाने के लिए कानून का सहारा लिया और अदालत में कहा कि विरोधियों ने महिला सांसद कोटे का पालन ठीक तरह से नहीं किया है।

नतीजा यह हुआ कि देश में चुनाव आयोग ने अप्रैल के मतदान के नतीजों को रद्द किया और 21 मई को नए चुनाव का ऐलान किया। मगर चुनाव से महज 5 दिन पहले देश के सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल के चुनाव को सही बता दिया। अदालत ने HRPP खिलाफ फैसला सुनाते हुए कहा कि मताफा का शपथ ग्रहण कार्यक्रम होना चाहिए।

चीन की 729 करोड़ रुपए की योजना को समोआ ने किया रद्द

गौरतलब है कि समोआ, ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप का एक द्वीपीय देश है। उसकी आबादी करीब 2 लाख है। पिछले दिनों चीन के ख़िलाफ़ जब हर छोटे बड़े देशों ने अपना मुखर रवैया अपनाया तो समोआ ने भी चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना को रद्द कर दिया।

मात्र 2,831 वर्ग किमी में फैले और लगभग 2,00,000 की जनसंख्या वाले समोआ ने 100 मिलियन डॉलर (लगभग 729 करोड़ रुपए) का चीन का पोर्ट प्रोजेक्ट रद्द कर दिया। चीन अरसे से सामरिक महत्व वाले देशों को अपने कर्ज के जाल में फँसा, वहाँ रणनीतिक रूप से पहुँच बनाने की रणनीति पर काम कर रहा था। ऐसे में समोआ ने उसे जोरदार झटका दिया।

दरअसल, देश के पूर्व प्रधानमंत्री तुईलीफा मालिया लेगोआय चीन समर्थक माने जाते रहे हैं और उन्हीं के शासनकाल में पोर्ट प्रोजेक्ट मंजूर हुआ था।। लेकिन कोरोना महामारी के चलते इस पर काम नहीं हुआ। इसके बाद समोआ की पहली महिला प्रधानमंत्री ने निर्णय लिया कि उनके देश में चीन का यह पोर्ट प्रोजेक्ट रद्द किया जाएगा।

मताफ़ा ने चीन के पोर्ट प्रोजेक्ट को रद्द करने पीछे कारण बताया, “समोआ एक छोटा सा देश है और यहाँ के बंदरगाह और एयरपोर्ट हमारी जरूरतों की पूर्ति के लिए पर्याप्त हैं। हमारे पास कई ऐसे सरकारी प्रोजेक्ट्स हैं जिन्हें प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है और इसलिए हम चीन का यह प्रोजेक्ट रद्द कर रहे हैं।“ इसके बाद पलाओ ने भी चीन को लेकर अपना स्पष्ट बयान दिया कि वह इन सबमें नहीं फँसना चाहता।

राष्ट्रवाद विरोधी इकोसिस्टम के हाथों में खेलता ट्विटर, लोकतंत्र के लिए जरूरी है यह जानना कि कौन कहाँ खड़ा है

सोमवार, यानी 24 मई 2021 की शाम दिल्ली पुलिस ट्विटर इंडिया के गुरुग्राम ऑफिस पहुँची। दिल्ली पुलिस के इस कदम के पीछे के कारणों को लेकर कयास लगाए गए। अफवाहें; दिल्ली पुलिस ने ट्विटर इंडिया के ऑफिस पर छापा मारा से लेकर सरकार अपने ही जाल में फँस गई है, के बीच उड़ती रहीं। सरकार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का भी आरोप लगा। उम्मीद के अनुसार जाने पहचाने लोगों की ओर से सरकार पर लानत भेजी गई।

चूँकि राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ भी राजनीति से अधिक आदत की मारी होती हैं, ऐसे में जो प्रतिक्रियाएँ आई उनमें किसी तरह का कोई आश्चर्य नहीं था। मीडिया के एक वर्ग की ओर से भी आई प्रतिक्रिया आशा के अनुरूप ही रही जो तथ्य की कसौटी पर छोटी और प्रोपेगेंडा की कसौटी पर बड़ी लगी।

बाद में दिल्ली पुलिस की ओर से बयान आया कि उसके ट्विटर इंडिया के ऑफिस जाने के पीछे दो उद्देश्य थे। पहला ट्विटर को एक नोटिस देना और दूसरा, यह पता लगाना कि किसी तहकीकात को लेकर आवश्यकता पड़ने पर दिल्ली पुलिस किसके साथ बातचीत कर सकती है। ज्ञात हो कि दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने कथित रूप से कॉन्ग्रेस द्वारा बनाए गए एक टूलकिट से जुड़ी आरंभिक जाँच के सम्बन्ध में ट्विटर इंडिया के प्रबंध निदेशक मनीष माहेश्वरी को 21 मई के दिन एक नोटिस भेजकर 22 मई को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ऑफिस में उनकी उपस्थिति के लिए अनुरोध किया था।


दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा ट्विटर इंडिया के प्रबंध निदेशक को भेजे गए नोटिस का आधार यह था कि भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा के साथ ही कई और पार्टी नेताओं द्वारा शेयर किए गए कॉन्ग्रेसी टूलकिट को ट्विटर ने “Manipulated Media’ लिख फ्लैग कर दिया है। लिहाजा उसके पास इस टूलकिट से सम्बंधित क्या जानकारियाँ हैं जिनके आधार पर उसने इसे Manipulated Media कहा। मूलतः दिल्ली पुलिस ट्विटर से उसके इस फ्लैगिंग के पीछे का कारण जानना चाहती थी। पर जब सबकी निगाहें ट्विटर इंडिया के संभावित जवाब पर थी, ट्विटर ने कोई जवाब न देने का फैसला किया। ऐसे में दिल्ली पुलिस को ट्विटर के ऑफिस तक जाना पड़ा।

यहाँ प्रश्न यह है कि जब पुलिस ने अपनी नोटिस में यह साफ कर दिया था कि उसे ट्विटर इंडिया से भाजपा नेताओं द्वारा शेयर किए गए टूलकिट को Manipulated Media कहने के पीछे का कारण जानना था तो ट्विटर ने इस नोटिस की अनदेखी क्यों की? ट्विटर से उसके एक रूटीन काम को लेकर स्पष्टीकरण ही तो माँगा गया था। दिल्ली पुलिस इतना ही तो जानना चाहती थी कि उस टूलकिट को Manipulated Media कहने के ट्विटर के फैसले का आधार क्या था?

यदि आधार किसी तरह का कोई आधिकारिक फैक्ट चेक था तो भी ट्विटर के लिए यह स्पष्टीकरण देना कठिन तो नहीं होना चाहिए था। यदि ट्विटर इंडिया की ओर से कोई व्यक्तिगत तौर पर इस नोटिस का जवाब देने दिल्ली पुलिस के कार्यालय नहीं जा सकता था तो एक मेल भेजकर स्पष्टीकरण दे देता। ऐसा करना ट्विटर के लिए कितना कठिन था? 

या फिर यह मामला स्पष्टीकरण से कहीं और आगे का है? क्या कारण थे कि ट्विटर ने दिल्ली पुलिस के नोटिस का जवाब देना सही नहीं समझा? ये प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ट्विटर पर पिछले कई वर्षों में पक्षपातपूर्ण आचरण के आरोप लगते रहे हैं और ये आरोप केवल भारत तक सीमित नहीं रहे हैं। पिछले वर्ष अमेरिका में राष्ट्रपति चुनावों के समय भी ट्विटर का आचरण पूरी दुनिया ने देखा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अकाउंट को डिलीट करने की बात हो या उनकी पार्टी और उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण की, ट्विटर का आचरण न केवल उनके विरुद्ध पक्षपातपूर्ण रहा, बल्कि एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के रूप में आपत्तिजनक था। इन सब के ऊपर ट्विटर ने अपने आचरण सम्बंधित किसी तरह के स्पष्टीकरण की माँग की हमेशा अनदेखी की।
 
भारत में बाकी सोशल प्लेटफॉर्म की तरह विचारधारा के अनुसार ट्विटर यूजर्स के बीच एक विभाजन साफ दिखाई देता रहा है। विभाजन रेखा के एक ओर खड़े राष्ट्रवादी विचारधारा के लोगों की शिकायत हमेशा से रही है कि ट्विटर का आचरण हमेशा से उनके विरुद्ध रहा है। वामपंथी और तथाकथित लिबरल ट्विटर यूजर्स की शिकायतों पर उनके अकाउंट पर आए दिन प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं, जबकि तथाकथित सेक्युलर, वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और लिबरल्स के अकाउंट को लेकर की गई शिकायतों की ट्विटर अनदेखी कर देता है।

ट्विटर इंडिया के लोगों का व्यक्तिगत आचरण भी इसी सोच के अनुरूप रहा है। अभी तक ट्विटर इंडिया में उच्च पदों पर रहने वालों के व्यक्तिगत ट्वीट भी इस बात को साबित करते हैं। Smash the Brahmanical Patriarchy वाले प्लेकार्ड लिए जैक डॉर्सी की फोटो आए अभी उतने दिन नहीं हुए हैं कि लोग उसे भूल जाएँ। 

ट्विटर के आचरण के इस रिकॉर्ड को देखते हुए राष्ट्रवादियों की यह चिंता आए दिन सार्वजनिक बहसों में दिखाई देती है कि जिस तरह से ट्विटर ने अमेरिकी चुनावों में एक भूमिका निभाई, वैसा ही कुछ वह भारत में करने की मंशा रखता है। उनके विरुद्ध आए दिन दिखने वाले ट्विटर के पक्षपातपूर्ण फैसले उनके इस विश्वास को और भी पुख्ता करते हैं। पर क्या मामला केवल ट्विटर, राष्ट्रवादियों और उनके द्वारा समर्थित सरकार और उसके नेताओं तक सीमित है? यह मामला उससे आगे का है जिसमें 2019 लोकसभा चुनावों के बाद उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों और इकोसिस्टम की एक बड़ी भूमिका है। 

लगता है जैसे 2019 के चुनावों के बाद इकोसिस्टम का विश्वास देसी बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, संपादकों और सोशल मीडिया ऑपरेटिव्स से उठ गया है और वह अब विदेशी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, विदेशी विद्वान और विदेशी तौर-तरीकों पर निर्भर रहकर वापसी की कोशिश करना चाहता है। इसके पीछे वही सोच काम कर रही जिसका आधार यह है कि चूँकि विदेशियों ने हमारे ऊपर सैकड़ों साल तक शासन किया है इसलिए आज भी एक आम भारतीय उन्हें अधिक प्रभावशाली, विद्वान या बुद्धिजीवी मानेगा।

यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीयों को संस्कृति, संस्कृत, इतिहास और धार्मिक शास्त्रों की समझाइश देने के लिए किसी वेंडी डोनिगर या ऑड्रे ट्रश्के को बार-बार भारत न बुलाया जाता। ऐसे ही इकोसिस्टम द्वारा बार-बार यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि ट्विटर ने कुछ कहा या किया है तो वह सही है, इसलिए इस पर कोई प्रश्न खड़ा नहीं किया जा सकता। ऐसे में ट्विटर के प्रति लिबरल इकोसिस्टम का लगाव यही दर्शाता है कि इनके लिए विदेशी लोग, ज्ञान और चीजें आज भी उनके भारतीय समकक्षों से अधिक पूजनीय हैं।   

एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जिसमें इकोसिस्टम बार-बार यह साबित करने की कोशिश कर रहा है कि सोशल मीडिया के विदेशी प्लेटफॉर्म, उनसे सम्बंधित फैक्टचेकर और लेफ्ट लिबरल द्वारा प्रमाणित विद्वानों की हर बात को बिना किसी प्रश्न के स्वीकार कर लिया जाए। वहीं सरकार और उसके समर्थकों का मानना है कि अब पानी सर से ऊपर जा चुका है और अब प्रश्न उठाकर उनके उत्तर लेने का समय है। भारतीय जनता पार्टी, कॉन्ग्रेस, सरकार और ट्विटर इंडिया के बीच आगे क्या होगा, उस पर सबकी नजर रहेगी।

ट्विटर इंडिया के लिए सरकार द्वारा उठाए गए प्रश्नों की अनदेखी न तो कानून सम्मत है और न ही आम भारतीय की अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के पक्ष में है। आवश्यक है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिकों को पता चले कि कौन कहाँ खड़ा है और उसकी भूमिका क्या है।