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‘गाय हमारी माता है, जहाँ हिन्दू रहते हैं वहाँ बीफ नहीं चलेगा’: पहले सत्र से ही फॉर्म में असम के नए CM, गोरक्षा के लिए बनेगा कानून

असम में गोरक्षा के लिए बिल लाया गया है। इसका बचाव करते हुए राज्य के नए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने सोमवार (मई 24, 2021) को कहा कि जहाँ गोवंश की पूजा होती है और हिन्दू रहा करते हैं, वहाँ गोहत्या पर पाबंदी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हिन्दू गाय की पूजा करते हैं, इसीलिए गोमाँस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। उन्होंने असम विधानसभा में राज्यपाल के अभी भाषण के बाद धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान ऐसा कहा।

बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व वाली विपक्षी पार्टी AIUDF ने डर जताया कि प्रस्तावित बिल से मॉब लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोतरी होगी और ‘मुस्लिमों के खिलाफ जिस तरह की हिंसा काऊ बेल्ट (उत्तर भारत) में हो रही है’, वैसा ही असम में भी होने लगेगा। मुख्यमंत्री सरमा ने स्पष्ट कहा कि गाय हमारी माता है और नहीं चाहते है कि पश्चिम बंगाल से असम में गोवंश की तस्करी हो या जहाँ गायों की पूजा होती है, वहाँ गोमाँस का भक्षण किया जाए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि वो ऐसा नहीं कह रहे हैं कि सभी लोगों को अपनी स्वाभाविक आदतों को छोड़ देना चाहिए। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में गोरक्षा के लिए पहले ही कानून बनाए जा चुके हैं। तीनों ही राज्यों में भाजपा की सरकार है। असम के सीएम ने यूपी के दारुल उलूम के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि उसने भी हिन्दुओं के रहने के स्थान पर गोहत्या न करने की बात कही है। यहाँ मामला संवेदना से जुड़ जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “इसकी कोई ज़रूरत नहीं है कि गुवाहाटी के फैंसी बाजार, गाँधीबस्ती या शांतिपुर में ‘होटल मदीना’ की मौजूदगी हो क्योंकि यहाँ हिन्दू रहते हैं और मामला संवेदनशील हो जाता है। जहाँ मामला संवेदनशील नहीं है, वहाँ स्वाभाविक या व्यक्तिगत आदतें जारी रहनी चाहिए।” उन्होंने दावा किया कि सरकारी नीति के ‘डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स’ में ही बताया गया है कि गोहत्या नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वो लोगों से अपील करते रहेंगे कि वो धीरे-धीरे बीफ के लिए गोहत्या छोड़ें।

उन्होंने असम में बदलाव के लिए AIUDF विधायकों का भी समर्थन माँगा। 15वें असम विधानसभा के पहले सत्र को सम्बोधित करते हुए राज्यपाल जगदीश मुखी ने भी कहा कि लोग गाय का सम्मान करते हैं और पूजा करते हैं, इसीलिए राज्य सरकार गोरक्षा के लिए अगले सत्र में नया बिल लाने जा रही है, जिससे राज्य से बाहर गायों की तस्करी किए जाने पर रोक लगेगी। असम का मौजूदा कानून कहता है कि वेटेनरी अधिकारी द्वारा 14 से अधिक उम्र वाले गोवंश की बीफ के लिए हत्या की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पहले प्रमाण-पत्र प्राप्त करना पड़ेगा।

भाजपा विधायक मृणाल साइका ने कहा कि हमारा गायों के साथ धार्मिक जुड़ाव है, इसीलिए हिन्दू बहुल इलाकों में न तो उनकी हत्या की जानी चाहिए और न ही कॉस्मोपॉलिटन क्षेत्रों में बीफ की खुलेआम खरीद-बिक्री होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ये गोहत्या विरोधी बिल नहीं, बल्कि गोरक्षा बिल होगा। उन्होंने दूध के साथ-साथ गोबर व गोमूत्र के महत्व की बात करते हुए कहा कि असम में यूपी, बिहार और बांग्लादेश से गायों को लाकर तस्करी की जाती थी, जो बंद होनी चाहिए।

भाजपा विधायक जयंत मल्ला बरुआह ने कहा कि हम गाय को माता कह कर पूजा करते हैं, हम गोहत्या और बीफ की खरीद-बिक्री को बर्दाश्त नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की सोच ये है कि गाय के ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर तस्करी नहीं होनी चाहिए। हालाँकि, AIUDF का सवाल है कि गोवा, मिजोरम और मणिपुर में सत्ता में रहने के बावजूद भाजपा ऐसा विधेयक लेकर क्यों नहीं आ रही है? उन्होंने कहा कि ऐसे बिल से सामाजिक तानाबाना बिगड़ेगा।

तौलिए में क्लास लेने वाला PSBB स्कूल का टीचर अरेस्ट, लगा POCSO एक्ट: लड़कियों को डेट पर चलने को कहता था

चेन्नई की सिटी पुलिस ने छात्रों के यौन शोषण मामले में जी राजगोपालन नाम के PSBB स्कूल टीचर को सोमवार (मई 24, 2021) रात गिरफ्तार कर लिया। अशोक नगर ऑल वीमेन पुलिस ने छात्रों के यौन उत्पीड़न मामले में टीचर को गिरफ्तार कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया और बाद में उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राजगोपालन के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 11, 12, आईपीसी एक्ट की धारा 354, 509 और आईटी एक्ट की धारा 67 और 67 (ए) के तहत मुकदमा दर्ज करके उसे गिरफ्तार किया गया है।

पूरा मामला कृपाली नाम की एक पूर्व छात्रा द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट्स के बाद उजागर हुआ। इसके बाद कई बच्चों ने शिक्षक के खिलाफ बोलते हुए आपबीती साझा की। एक स्क्रीनशॉट में उसे बिना शर्ट के केवल तौलिए में देखा जा सकता है।

सोशल मीडिया में मामला उठने के बाद पीएसबीबी स्कूल ने सोमवार दोपहर जी राजगोपालन को सस्पेंड कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार वह पीएसबीबी स्कूल की केके नगर शाखा में कॉमर्स के बच्चों को अकॉउंट्स पढ़ाता था। स्कूल प्रशासन ने राजगोपालन को सस्पेंड करते हुए लिखा, “आपके खिलाफ कदाचार के कुछ गंभीर आरोप लगाए गए हैं और यह सोशल मीडिया (एसआईसी) के माध्यम से प्रबंधन के संज्ञान में आया है।”

सोशल मीडिया से शुरू हुआ अभियान

गौरतलब है कि चेन्नई में स्कूलों के एक समूह, पद्म शेषाद्री बाला भवन (PSBB) के पूर्व और वर्तमान छात्रों ने इस शिक्षक पर छात्राओं के साथ अनुचित व्यवहार और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया में अपनी आपबीती शेयर की थी। इस दौरान कई छात्रों ने अपने साथ टीचर के खराब व्यवहार को सोशल मीडिया पर लिखकर बताया।

इन पोस्ट के मुताबिक, टीचर ने तौलिए में क्लास लेने के अलावा लड़कियों को देर रात वीडियो कॉल कर करके उनसे डेट पर चलने तक को कहा। इसके अलावा उस पर क्लास ग्रुप में अश्लील लिंक साझा करने के भी आरोप हैं।

सोशल मीडिया पर टीचर के विरुद्ध अभियान में छात्राओं ने अपने संदेशों के स्क्रीनशॉट शेयर किए। एक अन्य छात्रा ने बताया कि वह पाँच साल पहले उसके साथ स्कूल प्रतियोगिता में हांग कांग गई थी तब उसने उसके साथ सेक्शुअल जोक शेयर किए थे। इसके अलावा राजगोपालन पर लड़कों ने भी प्राइवेट पार्ट्स छूने के आरोप लगाए।

इसी बीच कई बच्चों ने अन्य शिक्षकों पर भी अनुचित व्यवहार के आरोप लगाए। छात्रों में से एक ने संस्कृत के एक पूर्व शिक्षक के बारे में बात की जो छात्रों को गाली देता था, बिना किसी स्पष्ट कारण के उन्हें थप्पड़ मारता था और यहाँ तक कि छात्राओं के साथ खुले तौर पर फ्लर्ट भी करता था। वह ‘गलती से’ लड़कियों के चेंजिंग रूम में चला जाता था और लड़कों और लड़कियों दोनों को अनुचित तरीके से छूता था।

गर्भवती को चेन से पीटा, आशाकर्मी ने अर्धनग्न अवस्था में भाग कर बचाई आबरू: पूर्णिया में चिकेन्स नेक काटना चाहती थी मुस्लिम भीड़?

बिहार के पूर्णिया में मुस्लिम समाज के आरोपितों ने 150-200 की संख्या में उत्पात मचाया और एक महादलित बस्ती को आग के हवाले कर के एक रिटायर्ड चौकीदार की हत्या कर दी। मझुआ टोली में हुई इस घटना के बाद सोमवार (मई 24, 2021) को SP दयाशंकर ने पीड़ितों से बात की और बायसी थानाध्यक्ष अमित कुमार को लापरवाही बरतने के आरोप में लाइन हाजिर कर दिया गया। धमदाहा के सर्किल इंस्पेक्टर सुनील कुमार सुमन को नया थाना प्रभारी बना कर भेजा गया।

महादलित बस्ती में महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के साथ जैसा व्यवहार किया गया, उसे याद कर के लोग खौफ में आ जा रहे हैं। रिजवी, शाकिद और इलियास इस मामले के मुख्य आरोपित हैं। पुलिस इसे जमीन विवाद बताते हुए कह रही है कि हमलावरों में कोई बाहर से नहीं आया था। भाजपा का कहना है कि हमलावरों की संख्या 300 में थी। विहिप ने उन्हें जिहादी बताते हुए कहा कि इनमें रोहिंग्या मुस्लिम भी शामिल थे।

इस घटना के लोकेश पर ध्यान दीजिए। पूर्णिया में जहाँ ये वारदात हुई, वो उस चिकेन्स नेक से मात्र 8 किलोमीटर की दूरी पर है जिसे काटने के सपने चीन भी देखता है। यही वो संकीर्ण क्षेत्र है, जो शेष भारत को पूर्वोत्तर भारत से जोड़ता है। सिलीगुड़ी इसका प्रमुख क्षेत्र है। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, सिक्किम, दार्जिलिंग की पहाड़ियाँ इसी क्षेत्र से भारत से जुड़ती हैं। पश्चिम बंगाल का उत्तर दिनाजपुर और बिहार का मुस्लिम बहुल किशनगंज भी इससे जुड़ा हुआ है।

AMU के छात्र रहे शरजील इमाम ने CAA विरोधी शाहीन बाग़ आंदोलन में भाषण देते हुए इस चिकेन्स नेक को काटने की धमकी दी थी और इसके लिए मुस्लिमों को भड़काया था। वो पटना के फुलवारी शरीफ में भी एक बैठक में हिस्सा लेने आया था। उसे जहानाबाद से गिरफ्तार किया गया। भाजपा के विधान पार्षद देवेश कुमार ने कहा कि ममता बनर्जी की सरकार बनने के बाद बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों में हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहा है और वो पलायन कर रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि बिहार में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। उन्होंने कहा कि महादलित बस्ती के लोग दहशत में हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की, जिन्होंने आरोपितों के स्पीडी ट्रायल का आश्वासन देते हुए कहा कि महादलितों को बेघर नहीं होने दिया जाएगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि मुस्लिम भीड़ ने घर में घुस कर महिलाओं की इज्जत-आबरू उछली और पेट्रोल छिड़क कर घरों में आग लगाई।

बच्चों-बुजुर्गों तक को बेरहमी से पीटा गया। लोगों ने कहा कि वो डर के साए में जी रहे हैं, न रात को सो पाते हैं और न काम के लिए बाहर निकल पाते हैं। खुले आसमान के नीचे चूल्हे जलाने पड़ रहे हैं, ताकि बच्चों को भोजन खिलाया जा सके। एक गर्भवती महिला ने बताया कि इलियास ने उसके साथ बलात्कार की कोशिश हुई। असफल रहने पर बाइक की चेन से उसे पीटा। पीड़िता ने किसी तरह भाग कर अपनी जान बचाई

उसकी पीठ और शरीर पर आज भी उस वारदात के जख्म मौजूद हैं। एक आशाकर्मी ने बताया कि उसने हमलावरों के घर में कई बार डिलीवरी कराई है, लेकिन उन दरिंदों ने उसकी इज्जत लूटने का प्रयास करते समय ये भी नहीं सोचा। उस पर तलवार से हमला किया गया, जिसके बाद किसी तरह अर्धनग्न अवस्था में भाग कर उसने अपनी जान बचाई। पूर्णिया के DM ने कहा कि पीड़ितों को 50-50 हजार रुपए का मुआवजा दिया जा रहा है।

मृतक मेवालाल राय बहू ने बताया कि उनके ससुर पर लाठी, साइकिल की चेन और फरसा से हमला किया गया। इस मामले में पुलिस की शिथिलता भी सामने आई है क्योंकि 24 अप्रैल को हुई हिंसा की घटना की जाँच के बगैर ही महादलित परिवारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया गया था। महादलितों का कहना है कि स्थानीय DSP ने उन्हें घर खाली करने को कहा था। 2015 के हिंसा के मामले में भी अब तक पुलिस निष्क्रिय रही।

विहिप ने माँग की है कि हमलावरों पर संगत धाराओं में FIR दर्ज कर गिरफ़्तारी हो तथा पीड़ित परिवारों की सुरक्षा, आर्थिक सहायता व पुनर्वास हेतु स्थानीय प्रशासन द्वारा सार्थक कदम अबिलंब उठाए जाएँ। मिलिंद परांडे ने कहा कि पश्चिम बंगाल में इसी माह हुए क्रूर हिंसक हमलों को दोहरा कर, हिन्दू समाज के धैर्य की परीक्षा लेने का पुन: दुस्साहस किया है। हमले, मारपीट, लूटपाट, हिंसा व आगजनी की इन जघन्य घटनाओं पर स्थानीय पुलिस, प्रशासन व शासन की उदासीनता को भी उन्होंने बेहद चिंतनीय बताया।

‘SIT करे बंगाल हिंसा की जाँच’: 146 रिटायर्ड अधिकारियों का राष्ट्रपति को पत्र, 2000+ महिला वकीलों की CJI से डिमांड

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद राज्य में कई जगहों पर हुई राजनीतिक हिंसा के बाद 146 सेवानिवृत्त अधिकारियों ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर मामले में SIT गठित करने की माँग की है। साथ ही राज्य में हुई इस व्यापक राजनीतिक हिंसा के मद्देनजर 2093 महिला वकीलों ने भी भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना को पत्र लिखकर मामले में संज्ञान लेने की अपील की है।

राष्ट्रपति कोविंद को लिखे पत्र में जिन 146 सेवानिवृत्त अधिकारियों के हस्ताक्षर हैं, उनमें 17 पूर्व न्यायाधीश, 63 नौकरशाह (31 पूर्व आईएएस व सिविल सर्विस ऑफिसर और 32 पूर्व आईपीएस अधिकारी), 10 राजदूत और 56 सशस्त्र बल अधिकारी शामिल हैं जबकि मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने वाली सभी 2093 महिला वकील हैं।

सेवानिवृत्त अधिकारियों के पत्र में तमाम घटनाओं पर हुई मीडिया रिपोर्ट का हवाला देकर एक्शन लेने की माँग की गई। बताया गया कि हिंसा में महिलाओं समेत दर्जनों लोग मारे गए। वहीं बंगाल के 23 जिलों में से 16 जिलों के बुरी तरह प्रभावित होने और 15000 से ज्यादा हिंसा के मामले प्रकाश में आने की बात पत्र में कही गई है। इसके अलावा 4-5 हजार लोगों के घर-बार छोड़कर असम, झारखंड और ओडिशा जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है।

‘बंगाल में स्थानीय पुलिस की गुंडों से साँठ-गाँठ’

पत्र में राष्ट्रपति से सेवानिवृत्त अधिकारियों ने कहा कि मामले की जाँच के लिए के लिए SC के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक टीम गठित होनी चाहिए ताकि निष्पक्ष तौर पर जाँच हो सके। इसके अलावा बंगाल चूँकि संवेदनशील सीमा वाला राज्य है इसलिए इस केस में राष्ट्रविरोधी तत्वों से निपटने के लिए इसे NIA को सौंपा जाना चाहिए।

वहीं महिला वकीलों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे अपने पत्र में हिंसा की निंदा करते हुए राज्य की स्थिति के बारे में CJI को बताया। अपने पत्र में वकीलों ने स्थानीय पुलिस की स्थानीय गुंडों से साँठ-गाँठ होने के आरोप लगाए। इसमें कहा गया है कि पीड़ितों की एफआईआर तक नहीं दर्ज की गई और राज्य में संवैधानिक ढाँचा पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

इसके अलावा निष्पक्ष जाँच के लिए बंगाल से बाहर पुलिस अधिकारी को नोडल अधिकारी बनाने की माँग की गई और केस के जल्द निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन का आग्राह किया गया है। इसमें बंगाल के डीजीपी को हर स्तर पर शिकायतें दर्ज कराने की प्रणाली विकसित करने और विभिन्न चैनलों के जरिए आने वाली शिकायतों का विवरण प्रतिदिन SC भेजने का निर्देश देने की माँग भी की गई है।

बता दें कि 2 मई को बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद बड़े पैमाने पर टीएमसी समर्थकों ने उत्पात मचाया था। इस हिंसा में दर्जनों भाजपा कार्यकर्ताओं की जान चली गई थी। वहीं कई आमजन समेत बीएसएफ जवान और सीपीआई (एम) कार्यकर्ताओं पर भी हमले हुए थे। जिसके बाद कई लोगों ने टीएमसी गुंडों से जान बचाने के लिए लोगों ने असम में आश्रय लिया।

818 मौतें और दमन का वही दौर: पाबंदी के बीच हर रात गुपचुप उतर रहे विमानों में कौन सा चीनी माल?

हिंदी फिल्म का एक मशहूर गाना है, मेरे पिया गए रंगून वहाँ से किया टेलीफोन… पर आज शायद ही कोई चाहे कि उसके पिया रंगून जाएँ। वजह रंगून वाला म्यांमार इस समय लोकतंत्र की वापसी के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों के सैन्य दमन से कराह रहा। वहाँ यह हालत इसलिए हुई क्योंकि 1 फरवरी 2021 को सेना ने संसदीय चुनावों से चुनकर सत्ता में आई सरकार का तख्तापलट दिया। इसके साथ म्यांमार फिर से उसी सैन्य शासन के दौर में चला गया जहाँ से 48 सालों बाद लौटा था। दशकों के संघर्ष के बाद 2011 में वहाँ लोकतंत्र पुनर्जीवित हुआ। लेकिन 10 साल में ही उसे फिर नजर लगी गई। किसकी? चीन की? इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले उन तमाम पहलुओं पर गौर करते हैं जो म्यांमार की इस अस्थिरता से जुड़े हैं।

1948 में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद म्यांमार में तीसरी बार सेना ने तख्तापलट किया और शासन अपने हाथ में ले लिया है। 1 फरवरी 2021 को सेना ने आपातकाल की घोषणा कर दी और लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गई म्यांमार की शीर्ष नेता आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) और उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) के बाकी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद से ही म्यांमार में हिंसक प्रदर्शन शुरू हैं और सैन्य नरसंहार में कई प्रदर्शनकारियों की मृत्यु भी हो चुकी है।

नवंबर 2020 में म्यांमार में हुए संसदीय चुनावों में NLD ने बहुमत हासिल किया और आंग सान सू की देश की सर्वोच्च नेता चुनी गईं। चुने गए संसद सदस्यों ने 2021 में संसद का पहला सत्र बुलाया जिसके बाद ही सेना ने चुनावों में धोखाधड़ी का हवाला देते हुए देश में सैन्य शासन की घोषणा कर दी और सू की समेत अन्य नेताओं को हिरासत में ले लिया। फिलहाल म्यांमार का शासन सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग के हाथों में है। 1 फरवरी 2021 के बाद से लागू सैन्य शासन के बाद म्यांमार में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। ताजा खबरों के मुताबिक म्यांमार में इन प्रदर्शनों में अब तक 818 लोग मारे जा चुके हैं और 4,296 लोग हिरासत में हैं।  

म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है जिसकी राजधानी नेपिडा (Nay Pyi Daw) है। म्यांमार का सबसे महत्वपूर्ण शहर यांगून (Yangon) है, जो कभी रंगून के नाम से जाना जाता था। भारत के साथ-साथ इस देश की सीमाएँ चीन, बांग्लादेश, थाइलैंड और लाओस जैसे देशों से जुड़ी हुई हैं। लगभग साढ़े पाँच करोड़ की जनसंख्या वाला म्यांमार मुख्यतः एक बौद्ध देश है।

म्यांमार की भौगोलिक स्थिति (फोटो : ब्रिटनिका)

म्यांमार में सैन्य शासन

1948 में म्यांमार को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। इसके बाद 1958 से 1960 तक सेना ने म्यांमार की सत्ता अपने पास रखी। 1960 में चुनावों के माध्यम से सेना ने लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को म्यांमार का शासन सौंप दिया, लेकिन 2 साल बाद ही 1962 में एक बार फिर देश में सैन्य शासन लागू हो गया। यह सैन्य शासन 2011 तक चला। 2010 में म्यांमार सेना ने देश को एक लोकतंत्र बनाने का निर्णय लिया और एक बार फिर चुनावों के द्वारा चुनी हुई सरकार ने म्यांमार का शासन सँभाल लिया। 2015 में NLD ने ही चुनाव जीता था और सरकार बनाई थी।

आंग सान सू की हमेशा से ही म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली की समर्थक रही हैं। 1989 से 2010 के बीच सू की 15 सालों तक हिरासत में रहीं। इस दौरान 1991 में उन्हें शांति का नोबल पुरस्कार भी प्रदान किया गया जब वो लोकतंत्र की बहाली के लिए रैली और प्रदर्शन करने के कारण हाउस अरेस्ट में थीं।

म्यांमार की नेता आंग सान सू की (फोटो : हिंदुस्तान टाइम्स)

आसियान का दरवाजा

वर्तमान में म्यांमार में चल रही इस राजनैतिक उथल-पुथल के एक नहीं बल्कि कई महत्वपूर्ण पहलू हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि म्यांमार की अस्थिरता न केवल म्यांमार के लिए, बल्कि भारत के लिए भी मायने रखती है। दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की स्थिति पहले से काफी बेहतर हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले से चली आ रही ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ को ‘ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी’ से बदल दिया और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत अन्य पूर्वी देशों के साथ बेहतर आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों की शुरुआत की।

भारत के लिए म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया और आसियान के दरवाजे की तरह है और शायद यही कारण है कि भारत और म्यांमार के बीच कई समझौते हुए हैं। लेकिन म्यांमार की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है और यह चिंता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि म्यांमार में चल रही इस राजनैतिक अस्थिरता में चीन का बड़ा योगदान बताया जा रहा है।   

भारत और दक्षिण-पूर्वी एशिया की स्थिति

ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी की सफलता

भारत और म्यांमार के बीच प्रगाढ़ होते संबंधों के बारे में जानने से पहले हमें सिलीगुड़ी कॉरिडोर या चिकेन नेक की चर्चा करनी चाहिए। दरअसल भारत अपने पूर्वोत्तर हिस्से से एक छोटे से कॉरिडोर के माध्यम से जुड़ा हुआ है। 20-21 किमी का यह कॉरिडोर चिकेन नेक कहलाता है। इसे लेकर हमेशा से ही भारत के रक्षा विशेषज्ञ चिंतित रहते हैं क्योंकि इस छोटे से गलियारे को ब्लॉक करके भारत का संपर्क उसके पूर्वोत्तर हिस्से से खत्म किया जा सकता है। भौगोलिक स्थिति ही ऐसी है।

चिकेन नेक कहा जाने वाला गलियारा (फोटो : टाइम्स ऑफ इंडिया)

आपको याद होगा कि दिल्ली में शाहीनबाग के विरोध प्रदर्शनों के मास्टरमाइंड शरजील इमाम ने CAA विरोधी रैली में असम और पूर्वोत्तर भाग को भारत से काटने की बात कही थी। उसने कहा था, “अगर 5 लाख लोग हमारे पास ऑर्गेनाइज्ड हों तो हम नार्थ-ईस्ट और हिंदुस्तान को परमानेंटली काट कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो कम से कम एक या आधे महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से काट ही सकते हैं।“ इमाम ने चिकेन नेक का जिक्र करते हुए कहा था कि भारतीय सेना को असम तक पहुँचने से रोकने के लिए चिकेन नेक को काटा (ब्लॉक) जा सकता है, क्योंकि चिकेन नेक एक मुस्लिम बहुल इलाका है।  

इसी समस्या को खत्म करने के लिए भारत और म्यांमार संयुक्त रूप से ‘कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट’ पर कार्य कर रहे हैं। इस परिवहन प्रोजेक्ट के तहत कोलकाता को म्यांमार के रखाइन प्रांत स्थित सित्वे बंदरगाह से जोड़ा जा रहा है। इसके बाद भारत के पूर्वोत्तर भाग तक पहुँचने के लिए परिवहन के माध्यम के रूप में म्यांमार की प्रमुख नदी कलादान और म्यांमार के भूभाग का उपयोग किया जाएगा। इस तरह भारत म्यांमार के रास्ते भी अपने सबसे महत्वपूर्ण पूर्वोत्तर भाग से जुड़ पाएगा। यह प्रोजेक्ट ही चिकेन नेक की समस्या का एक बड़ा समाधान है।

भारत को पूर्वोत्तर क्षेत्र से जोड़ने वाला ‘कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांसिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (फोटो : विकिपीडिया)

अब आते हैं भारत के आर्थिक हितों पर। अपने ऐक्ट ईस्ट पॉलिसी के कारण भारत के संबंध दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ बेहतर हुए हैं। भारत, म्यांमार और थाइलैंड के साथ एक त्रिपक्षीय हाइवे प्रोजेक्ट पर भी काम कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत का उद्देश्य है सड़क मार्ग से म्यांमार होते हुए थाइलैंड और उसके बाद अन्य दक्षिण-पूर्वी देशों के साथ संपर्क बढ़ाना। ध्यान दें कि म्यांमार आसियान संगठन का एकमात्र देश है जो जमीन और समुद्र दोनों माध्यमों से भारत से जुड़ा हुआ है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास और रणनीतिक सुरक्षा के लिए म्यांमार एक बड़ी भूमिका अदा कर सकता है।

भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाइवे प्रोजेक्ट (फोटो : विकिपीडिया)

हालाँकि म्यांमार की सेना के साथ भी भारत के संबंध सही रहे हैं। 2020 में म्यांमार ने 22 भारतीय उग्रवादियों को भारत को सौंपा था। इसके अलावा भारत ने म्यांमार को सैन्य उपकरण निर्यात करने का फैसला भी किया था। चूँकि भारत की एक बड़ी सीमा म्यांमार के साथ जुड़ी हुई है, ऐसे में भारत को म्यांमार की सेना की सहायता भी आवश्यक है। 2015 में भारत की सेना ने म्यांमार में घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की थी। भारतीय सेना के पास जानकारी थी कि म्यांमार के पोन्यु इलाके के पास उंजिया में उग्रवादी गुट ‘द नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड-खापलांग’ (NSCN-K) के कैंप सक्रिय हैं। 8 और 9 जून की रात को भारतीय सेना के जवान म्यांमार की सीमा में दाखिल हुए थे और सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। स्ट्राइक के बाद म्यांमार को इसकी सूचना दे दी गई थी।

चीन की BRI

यहाँ भी चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) की चर्चा करना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि म्यांमार ने इसका हिस्सा बनना स्वीकार किया है। म्यांमार में अपनी इस परियोजना के माध्यम से चीन बंगाल की खाड़ी और उसके बाद हिन्द महासागर के पूर्वी हिस्से में अपनी उपस्थिति मजबूत करना चाहता है।

पिछले साल अगस्त में रिपोर्ट आई थी कि म्यांमार में BRI के अंतर्गत चीन के द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट लगातार देरी में चल रहे हैं। म्यांमार यांगून मेगा सिटी प्रोजेक्ट में चीन की भूमिका को सीमित करना चाहता है। म्यांमार ने इस मेगा प्रोजेक्ट को चीन की कंपनी के अलावा अन्य वैश्विक कंपनियों के लिए खोलने का निर्णय लिया है। यांगून मेगा सिटी प्रोजेक्ट, चीन-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर (CMEC) का एक हिस्सा है। CMEC के अंतर्गत चीन ने अपने युन्नान प्रांत को म्यांमार के मंडाले से जोड़ने का लक्ष्य रखा है।

इसके अलावा म्यांमार के काचीन प्रांत में निर्माणरत मिटकिना इकोनॉमिक डेवलपमेंट जोन (MEDZ) पर भी म्यांमार सरकार और चीन की कंपनियों के बीच सामंजस्य नहीं बन पा रहा है। 2018 में हुए समझौते के बाद 2021 में इस प्रोजेक्ट के पूरा होने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन असहमति के कारण यह प्रोजेक्ट शुरू भी नहीं हुआ है। दरअसल चीन इन परियोजनाओं के माध्यम से अपने शहरों को बंगाल की खाड़ी से जोड़ना चाहता है।

हालाँकि पिछले कुछ समय से म्यांमार और भारत में नजदीकियाँ बढ़ी हैं और दोनों देश इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के मामले में साथ कार्य करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत, म्यांमार में श्वे ऑयल एण्ड गैस प्रोजेक्ट (Shwe Oil and Gas Project) में निवेश कर रहा है। साथ ही भारत ने रखाइन स्टेट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के अंतर्गत म्यांमार के रखाइन प्रांत में विकास कार्यक्रमों के लिए समझौता किया है।

चीन पर आरोप

अब बात करते हैं कि म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद चीन की भूमिका पर प्रश्न क्यों उठ रहे हैं। म्यांमार ने पहले भी चीन पर अराकान आर्मी और अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी की सहायता करने का आरोप लगाया था। दोनों ही म्यांमार के रखाइन प्रांत के उग्रवादी समूह हैं। इसके अलावा म्यांमार में चीनी नागरिकों पर यह आरोप भी लगे कि 2015 से 2017 के बीच उन्होंने म्यांमार नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस आर्मी को फंडिंग की। यह एक वामपंथी सशस्त्र संगठन है।

इस वामपंथी संगठन ने चीनी नागरिकों के द्वारा वीचैट के माध्यम से पाँच लाख डॉलर (लगभग 3 करोड़ 65 लाख रुपए) जुटाए थे। इसके अलावा भी चीन पर म्यांमार के सबसे बड़े सशस्त्र संगठन यूनाइटेड वा स्टेट आर्मी की सहायता करने का भी आरोप है। इस समूह को चीनी उद्योगपति ने पॉन्जी स्कीम की सहायता से करोड़ों रुपए की फंडिंग की।

अब आते हैं म्यांमार में सैन्य शासन और उसके चीन से कथित संबंधों पर। ताइवान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार चीनी सैनिकों की तरह दिखने वाले कई लोग चीन से फ्लाइट के माध्यम से म्यांमार आ रहे हैं और इन्हें म्यांमार के शहरों में देखा जा सकता है। थिंक टैंक ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) के मुताबिक म्यांमार में अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध के बाद भी हर रात संदिग्ध फ्लाइट म्यांमार के हवाईअड्डों में उतरती हैं जिनमें बड़ी संख्या में लोग होते हैं और संदिग्ध सामान होता है।

म्यांमार में एक बड़े वर्ग के बीच यह चर्चा है कि चीन, म्यांमार की सेना (मिलिट्री जनता) को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है जिससे सोशल मीडिया के जरिए विरोध-प्रदर्शन के लिए लोगों को इकट्ठा होने से रोका जा सके। स्थानीय लोगों में चीन के प्रति गुस्सा भी है। इसी के चलते 14 मार्च 2021 को हलिंगथैया (Hlaingthaya) में चीनी फैक्ट्री को आग के हवाले कर दिया गया था।

चीन में बाकी देशों की तरह आंतरिक विरोध की कोई समस्या नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चीन की कम्युनिस्ट सरकार एक पूर्ण तानाशाही सरकार है जो दुनिया पर आधिपत्य स्थापित करने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही है। यही कारण है कि बिना किसी आंतरिक विरोध की चिंता किए बिना चीन दूसरे देशों के मामलों में दखल देता रहता है।

म्यांमार के उच्च सैन्य अधिकारियों के साथ चीन के संबंध पहले उतने सही नहीं थे जितने अब हैं। म्यांमार के इन अधिकारियों ने कई बार चीन के प्रोजेक्ट्स का विरोध किया है। लेकिन चीन समय के साथ अपनी रणनीतियों को बदलना जानता है। म्यांमार में सैन्य शासन के बाद जहाँ पश्चिमी देशों ने म्यांमार की सैन्य सरकार पर प्रतिबंध लगाने की शुरुआत की वहीं चीन ने इसमें अपने फायदे के लिए अवसरों को तलाश लिया। एक ओर जहाँ यूके और अमेरिका ने सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग पर रोहिंग्या मुद्दे के बाद प्रतिबंध लगाए वहीं चीन के विदेश मंत्री ने लैंग को भरपूर इज्जत देते हुए उनसे मुलाकात की और म्यांमार सेना के ‘राष्ट्रीय पुनर्निर्माण’ के लक्ष्य की सराहना की।

हालाँकि म्यांमार की सेना के उच्च सैन्य अधिकारी और चीन किस रणनीति पर काम कर रहे हैं यह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के विशेषज्ञ ऐसे मामलों में चीन की कुटिलता के विषय में लगातार बात कर रहे हैं। अस्थिरता में अवसर की तलाश करना ही चीन की रणनीति रही है।

रोहिंग्या विरोधी कमांडर

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि म्यांमार की सत्ता सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग लैंग के हाथों में है और ये वही हैं जिन पर रोहिंग्या मुस्लिमों के नरसंहार का आरोप है। ऐसे में लैंग के सत्ता अपने हाथ में लेने से रोहिंग्या मुसलमानों का पलायन और तेज हो सकता है। अब आगे आने वाले समय में यह देखना होगा कि क्या एक बार फिर बड़ी संख्या में रोहिंग्या बांग्लादेश या भारत का रूख करते हैं। हालाँकि भारत रोहिंग्या मुस्लिमों को डिपोर्ट करने की रणनीति पर काम कर रहा है। हाल ही में अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों के विषय में कहा था कि इन अवैध घुसपैठियों के नियमानुसार डिपोर्टेशन को अनुमति दी जा सकती है।  

म्यांमार सेना के कमांडर-इन-चीफ मिन आंग (फोटो : डेक्कन हेराल्ड)

म्यांमार की यह अस्थिरता किस सीमा तक जाती है, यह तो समय ही बताएगा लेकिन म्यांमार की परिस्थितियों पर भारत पूरी तरह से नजर बनाए हुए है। जब तक आंग सान सू की (Aung San Suu Kyi) और उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) सत्ता में थी तब भारत के म्यांमार से बेहतर संबंध थे। म्यांमार की सेना के साथ भी भारत के संबंध खराब नहीं हैं। लेकिन तख्तापलट में चीन की भूमिका को लेकर उठते सवाल एक नया रणनीतिक मोर्चा खोल रहा है।

बम की अफवाह फैला फाइटर जेट भेजा, विमान से पत्रकार को गर्लफ्रेंड संग उठाया: बेलारूस सरकार के विरोध की सजा

बेलारूस में सरकार की आलोचना करने वाले एक पत्रकार को गिरफ्तार करने के लिए लिथुआनिया से ग्रीस जा रही एक फ्लाइट को डाइवर्ट कर के मिन्स्क में जबरदस्ती लैंड कराया गया। उसकी इस हरकत के लिए यूरोपियन यूनियन व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने भी निंदा की है। ब्लॉगर रोमन प्रोतसेविच ने एथेंस में ही अपनी दोस्तों को बताया था कि उनका पीछा किया जा रहा है। जब फ्लाइट को मिन्स्क की तरफ ले जाया जा रहा था, तब वो काफी घबरा गए थे।

उन्होंने अपना मोबाइल फोन और लैपटॉप अपनी गर्लफ्रेंड को दे दिया। साथ ही वो फ्लाइट एटेंडेंट से भी लगातार गुहार लगाते रहे कि फ्लाइट की लैंडिंग को रोका जाए। उन्होंने कहा था, “ऐसा मत करो। वो लोग मुझे मार डालेंगे। मैं एक शरणार्थी हूँ।” इसके जवाब में फ्लाइट एटेंडेंट ने उन्हें कहा कि लैंडिंग करानी ही पड़ेगी क्योंकि उसके पास कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नहीं है। फ्लाइट में सवार अन्य यात्रियों ने इस बातचीत का ब्यौरा दिया है।

रोमन प्रोतसेविच ने टेलीग्राम एप के जरिए बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको के खिलाफ कई विरोध प्रदर्शन आयोजित कराए। लुकाशेंको पिछले 27 वर्षों से रूस से सटे पूर्वी यूरोप के इस देश के राष्ट्रपति हैं। प्रोतसेविच की गर्लफ्रेंड सोफिया सफेजा को भी हिरासत में ले लिया गया। उन्होंने बताया था कि उन्हें बेलारूस में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। वो लिथुआनिया में शरणार्थी के रूप में रह रहे थे।

उन्होंने दोस्तों को बताया था कि रूसी भाषा बोलने वाला एक गंजा व्यक्ति उनका पीछा कर रहा है, जिसके हाथ में एक लेदर सूटकेस है। उस व्यक्ति ने उनके डाक्यूमेंट्स की तस्वीरें लेने की भी कोशिश की थी। उन्होंने अपने एक दोस्त को मैसेज कर के इसे संदेहास्पद बताया था। बेलारूस ने प्रोतसेविच के प्लेन में बम होने की बात कह के इसे डाइवर्ट कराया और फिर एक MiG-29 साथ भेज कर इसे मनचाहे जगह पर लैंड कराया

बता दें कि एलेक्जेंडर लुकाशेंको को यूरोप का अंतिम तानाशाह भी कहा जाता है। उन्होंने पिछले साल अपनी सरकार के खिलाफ आयोजित विरोध प्रदर्शनों का दमन किया, जिसके बाद बेलारूस पर कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे। विमानन कंपनी ‘Reyanair‘ के CEO माइकल ओलेरी ने ही ‘स्टेट स्पॉन्सर्ड हाइजैकिंग’ बताया है। प्रोतसेविच ग्रीस में बेलारूस के एक विपक्षी नेता के भाषण को कवर करने गए थे, जो खुद निर्वासन में रह रहे हैं।

बेलारूस में रोमन प्रोतसेविच पर आतंकवाद और दंगे कराने के आरोप लगाए थे। वो 2019 में अपने जीवन पर मँडराते खतरे के कारण देश से निकल गए थे। जब प्लेन को जबरन लैंड कराया गया, तब वो मिन्स्क के मुकाबले लिथुआनिया की राजधानी विलनीयस के ज्यादा करीब था। उनकी और उनकी गर्लफ्रेंड की तलाशी भी ली गई। गार्ड डॉग्स के साथ आए बेलारूस के सुरक्षाकर्मियों ने बाकी यात्रियों को एक जगह एकत्रित किया और फिर इन दोनों को पकड़ा।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन ने इसे इसे एक बेरहम कार्रवाई बताते हुए कहा कि ये न सिर्फ राजनीतिक असहमति, बल्कि मीडिया की स्वतंत्रता पर भी शर्मनाक वार है। यूरोपियन यूनियन ने इस घटना के बाद बेलारूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाते हुए आगे और कार्रवाई की बात कही है। EU ने बेलारूस के साथ संबंधों को तोड़ने पर सहमति बनाई है। लुकाशेंको सरकार द्वारा सैकड़ों राजनीतिक एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया गया है, जिनकी रिहाई की माँग की जा रही है।

लक्षद्वीप पर इस्लामी कट्टरपंथी+कम्युनिस्ट प्रोपेगेंडा, विकास की कोशिशों को ‘भगवाकरण’ बता प्रशासक पर वार

केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में केरल के राजनेताओं द्वारा समर्थित कुछ इस्लामिकों ने नए सुधारों में बाधा डालने के लिए लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल और उनके प्रशासन के खिलाफ एक प्रचार युद्ध छेड़ दिया है। Organiser की एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामिकों ने पटेल पर लक्षद्वीप के ‘इस्लामिक चरित्र’ को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया। लक्षद्वीप में मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का 96% है।

गलत सूचनाओं का प्रचार करने के लिए सोशल मीडिया का भी जमकर उपयोग किया जा रहा है, जिसमें दावा किया गया है कि लक्षद्वीप में नए कोविड-19 मामलों में वृद्धि की वजह प्रशासन द्वारा क्वारंटाइन नियमों में ढील दिए जाने का निर्णय है। हालाँकि, द प्रिंट के साथ एक साक्षात्कार में कलेक्टर आस्कर अली ने इन दावों का खंडन करते हुए बताया कि कोविड मामलों में बढ़ोतरी के लिए पूरी दोष क्वारंटाइन नियमों में छूट को देना गलत है। उन्होंने कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के लिए आर्थिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने से होने वाली लोगों की वाजाही और नए स्ट्रेन की “बहुत अधिक” फैलने की दर ‘को दो मुख्य कारण बताया।

लक्षद्वीप में अपराध की रोकथाम की कोशिशों में जुटा पटेल प्रशासन

रिपोर्ट के अनुसार, इस केंद्र शासित प्रदेश में युवाओं में शराब और नशीली दवाओं की लत बढ़ रही है। दिसंबर 2020 में जिम्मेदारी संभालने के तुरंत बाद, प्रफुल्ल पटेल ने बढ़ते खतरे से लड़ने के लिए पूरे लक्षद्वीप में 18 छापे मारे थे। इसके अतिरिक्त, शराब और नशीली दवाओं की तस्करी और वितरण को प्रतिबंधित करने के लिए लक्षद्वीप में गुंडा ऐक्ट लगाया गया था। साथ ही प्रशासन ने इस पूरे द्वीप में कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों द्वारा लगाए गए एंटी-सीएए/एनआरसी पोस्टरों को भी हटा दिया था।

पटेल कथित तौर पर लक्षद्वीप में बुनियादी ढाँचे और विकास परियोजनाओं को लाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य इसकी पर्यटन क्षमता को बढ़ावा देना है। कई सोशल मीडिया हैंडल पटेल की सुधार नीतियों का विरोध करते हुए उनके प्रशासन को ‘फासीवादी’ बताते हुए नजर आए। खास बात ये है कि सोशल मीडिया पर बीजेपी विरोधी दुष्प्रचार करने वाले सामान्य संदिग्धों को भी पटेल के खिलाफ हैशटैग का प्रचार करते देखा गया।

नए प्रशासन की जिन नीतियों का विरोध किया जा रहा है, उनमें 2 से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को पंचायत चुनाव लड़ने से रोकना ( एक नियम जो पहले से ही कई राज्यों में लागू है) तट के किनारे अवैध भंडारण सुविधाओं को हटाने, और अधिकारियों से उचित अनुमति के बिना व्यक्तियों को अपनी नावों को पट्टे पर /किराए पर देने के खिलाफ नाव मालिकों के लिए जारी सख्त आदेश शामिल है।

सुरक्षा खतरे से निपटता लक्षद्वीप प्रशासन

एक ओर जहाँ इस्लामी कट्टरपंथी इस द्वीप के अपराध मुक्त होने का दावा करते हैं, तो वहीं खुफिया ब्यूरो (आईबी) ने विदेशी जहाजों की यहाँ अवैध आवाजाही और पुलिस एजेंसियों द्वारा इन विदेशी जहाजों से निपटने में दिखाई जाने वाली ढिलाई को लेकर चिंता जताई है।

हाल के हफ्तों में, मिनिकॉय द्वीप से तटरक्षक बल द्वारा 3000 करोड़ रुपये मूल्य के ड्रग्स को जब्त किया गया है। सुरक्षा एजेंसियों ने श्रीलंकाई मछली पकड़ने वाली नाव रविहांसी को 300 किलोग्राम हेरोइन और 5 एके-47 राइफलों और 1,000 जिंदा कारतूस के साथ पकड़ा था। 2019 में आई एक खुफिया रिपोर्ट में श्रीलंका से लक्षद्वीप द्वीप समूह में 15 आईएसआईएस आतंकवादियों की गतिविधि की बात कही गई थी।

माकपा और कांग्रेस नेताओं ने किया इस्लामी कट्टरपंथियों का समर्थन

ऑर्गनाइज़र की रिपोर्ट के अनुसार, जहाँ इस्लामी संगठन प्रशासन के खिलाफ ‘विरोध’ के लिए कमर कस रहे हैं, सीपीआईएम नेता और राज्यसभा सांसद एलामनम करीम ने टेल के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर लक्षद्वीप से उनको वापस बुलाने का आग्रह किया।

केरल कांग्रेस के नेता वी.टी. बलराम ने भी इन ‘विरोध प्रदर्शनों’ के साथ एकजुटता की घोषणा की। इस मुद्दे को सनसनीखेज बनाते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ‘संघ परिवार’ ‘लक्षद्वीप को कश्मीर में बदलने’ की कोशिश कर रहा है।

इस क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन तेज होने पर, अभिनेता पृथ्वीराज सुकुमारन सोमवार (24 मई) को अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करने के लिए केंद्र शासित प्रदेश के लोगों के समर्थन में सामने आए।

प्रशासन का लक्ष्य लक्षद्वीप को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना

पटेल प्रशासन अपने सामरिक महत्व के कारण विकास को प्राथमिकता देने, पर्यटन को बढ़ावा देने और लक्षद्वीप की सुरक्षा में सुधार करने की कोशिश कर रहा है।

मालदीव के नए पसंदीदा हॉलीडे डेस्टिनेशन बनकर उभरने के बीच, पटेल प्रशासन का लक्ष्य लक्षद्वीप के खराब बुनियादी ढाँचे को ठीक करना है ताकि इसे सबसे लोकप्रिया पर्यटन स्थल में बदला जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि निहित स्वार्थों और कट्टरवादी रवैये वाले कुछ समूह लक्षद्वीप में विकास कार्यों को रोकने की कोशिश कर रहे हैं।

घर से डिनर के लिए निकला और ‘लापता’ हो गया मेहुल चोकसी: एंटीगुआ छोड़ क्यूबा भागने की अटकलें

भारत में ₹13 हजार करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी कर भागा मेहुल चोकसी (63) एंटीगुआ से भी गायब हो गया है। इसकी जानकारी मीडिया को चोकसी के वकील विजय अग्रवाल ने दी है। अग्रवाल ने बताया कि उसके लापता होने के बाद से उसका परिवार बेहद परेशान और चिंतित है। शिकायत मिलने के बाद एंटीगुआ पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

वकील विजय अग्रवाल की मानें तो चोकसी सोमवार (मई 24, 2021) को अपने घर से द्वीप के दक्षिणी हिस्से में एक प्रसिद्ध रेस्टोरेंट में डिनर करने के लिए निकला, तब से उसे नहीं देखा गया। अग्रवाल द्वारा दी जानकारी के अतिरिक्त मेहुल के लापता होने की खबर एंटीगुआ की एक न्यूज वेबसाइट Antiguanewsroom.com पर भी प्रकाशित हुई है। इसके मुताबिक चोकसी के बारे में पता लगाने के लिए एंटीगुआ पुलिस ने बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान शुरू किया है। उसकी कार जॉली हार्बर इलाके से मिली है। वह वहाँ रविवार शाम ड्राइव करते देखा गया था।

कुछ रिपोर्ट्स बता रही हैं कि चोकसी एंटीगुआ से गायब होकर क्यूबा पहुँच गया है और वहाँ अपने आलीशान घर में रह रहा है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि चौकसी ने एंटीगुआ इसलिए छोड़ा, क्योंकि भारत सरकार वहाँ के अधिकारियों से उसकी नागरिकता रद्द करने की माँग कर रही थी। कथित तौर पर उसके पास दूसरे कैरिबियन देशों की भी नागरिकता है।

गौरतलब है कि चोकसी 4 जनवरी 2018 को एंटीगुआ भाग गया था। उस पर पंजाब नेशनल बैंक से 13,578 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी करने का आरोप है। इस मामले में उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया था। पेश न होने पर उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया था।

पिछले साल दायर एक चार्जशीट में प्रवर्तन निदेशालय ने दावा किया था कि चोकसी ने न केवल भारतीय बैंकों को बल्कि दुबई और संयुक्त राज्य अमेरिका में भी ग्राहकों और ऋणदाताओं को धोखा दिया। इस क्रम में अब तक उसकी 2,500 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क हो चुकी है।

जानकारी के अनुसार वह कथित तौर पर साल 2013 में शेयर बाजार के हेरफेर में शामिल था। इसके अलावा उसने साल 2017 में निवेश कार्यक्रम के जरिए एंटीगुआ और बारबुडा की नागरिकता ली थी जिसके कुछ महीने बाद घोटाला सामने आया। चोकसी का भतीजा नीरव मोदी भी भगोड़ा घोषित किया जा चुका है। नीरव इस समय लंदन जेल में हैं। वहाँ कई बार उसकी जमानत अर्जी रद्द हो चुकी है। वह खुद को भारत को प्रत्यर्पित किए जाने से बचने के लिए लगातार कानून लड़ाई लड़ रहा है।

‘चीन के प्रोपेगंडा ने मीडिया को बना दिया अंधा, वुहान लैब से कोरोना के लीक होने पर नहीं की गई रिसर्च’: NYT के पूर्व साइंस एडिटर

अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के रिटायर्ड साइंस एडिटर निकोलस वेड ने उन पत्रकारों को लताड़ लगाई है, जिन्होंने कोरोना वायरस के चीन के वुहान स्थित लैब से लीक होने की संभावनाओं को एकदम से नकार दिया या नजरंदाज कर दिया। निकोलस वेड का मानना है कि मीडिया के लोग चीन के प्रोपेगंडा के चक्कर में आ गए और उन्होंने खुद का रिसर्च करने की बजाए चीन की बात मानने में ही भलाई समझी।

उन्होंने ‘फॉक्स न्यूज’ के एक इंटरव्यू में कहा कि कोरोना वायरस का मूल स्रोत क्या है, इस संबंध में अभी तक कुछ पता नहीं चल पाया है क्योंकि चीन पर शासन करने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने इसे दबा दिया है। उन्होंने कहा कि चीन द्वारा इस सम्बन्ध में एक बृहद प्रोपेगंडा चलाया जा रहा है। साथ ही उन्होंने मीडिया के अंधेपन को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया, जिसने वैज्ञानिक चीजों में भी राजनीति घुसाई।

कोरोना वायरस के मूल स्रोत को लेकर निकोलस वेड ने कहा कि ज्यादा संभावना यही है कि ये वुहान स्थित वायरस लैब से ही निकल कर आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मीडिया ने इसकी तह तक जाने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि उसे अंधा बना दिया गया था। निकोलस वेड ने कहा कि मीडिया ने इस पर रिसर्च करने की बजाए इसमें राजनीति घुसा दी। उसने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन ही नहीं किया।

उन्होंने अमेरिका की सरकारी संस्थाओं की भी आलोचना की, जिन्होंने अब तक इस वायरस के स्रोत को लेकर कुछ खास नहीं कहा है। निकलस वेड से पहले भी कई वैज्ञानिकों ने चीन के लैब से इस वायरस के निकलने का आरोप लगाया था और कहा था कि इसकी तह तक जाने की जरूरत है। पिछले साल अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसे ‘चाइनीज वायरस’ ही नाम दे दिया था। कुछ डॉक्टरों का कहना है कि ये वायरस प्राकृतिक रूप से पैदा नहीं हुआ है।

कोरोना वायरस के शुरुआती दिनों में अमेरिका के कई बड़े मीडिया संस्थानों ने इसे चीन में बनाए जाने की संभावनाओं से इनकार कर दिया था। अप्रैल 2020 में NYT के एक लेख में जब आशंका जताई गई कि वुहान के लैब की गलती से कोरोना वातावरण में लीक हो गया होगा, तो फ़ेसबुक ने इस पर ‘झूठी सूचना’ का लेबल लगा दिया था। डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के आखिरी दिनों में स्टेट डिपार्टमेंट की एक रिसर्च में भी यही बात सामने आई थी।

एक हालिया अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि चीन में कोरोना वायरस के पहले मामले की पुष्टि से हफ्तों पहले ही ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ के कई शोधकर्ता बीमार पड़ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वुहान लैब के तीन शोधकर्ता उससे पहले ही नवंबर 2019 में बीमार पड़ गए थे और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। कोरोना के लक्षणों वाला पहला मरीज 8 दिसंबर, 2019 को ही वुहान में रजिस्टर किया गया था।

मैहर का शक्ति पीठ: मध्य भारत का ‘श्रृंगेरी मठ’, जहाँ सदियों से एक योद्धा करता आ रहा है माँ शारदे की पहली पूजा

माता सती द्वारा अग्निदाह करने के बाद जब भगवान शिव माता के पार्थिव देह को लेकर भयानक क्रोध में ‘तांडव’ नृत्य करने लगे, तब उनके क्रोध को शांत करने और ब्रह्मांड की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की देह के कई टुकड़े कर दिए। माता सती के शरीर के अंग और उनके आभूषण भूमि पर जहाँ भी गिरे वहाँ स्थापित हुए शक्ति पीठ। तंत्र चूड़ामणि में इन शक्तिपीठों की संख्या 52 बताई गई है। देवी भागवत और देवीगीता में क्रमशः 108 एवं 72 शक्तिपीठों का वर्णन है। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठ हैं और माँ दुर्गा के भक्त, विद्वतजन और धर्मगुरु भी सामान्य तौर पर शक्तिपीठों की संख्या 51 ही मानते हैं।

मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग में स्थित सतना जिले के मैहर में माता शारदा का प्रसिद्ध मंदिर है, जो इन्हीं शक्तिपीठों में से एक है। मैहर एक प्रस्तावित जिला है। फिलहाल यह सतना का हिस्सा है। मैहर का माता शारदा का मंदिर विंध्य पर्वत श्रेणी के त्रिकूट पर्वत की चोटी पर स्थित है। यहाँ माता सती के गले का हार गिरा था इस कारण इस स्थान का नाम मैहर (माई का हार) पड़ा। 

मैहर का त्रिकूट पर्वत (फोटो : पत्रिका)

मंदिर का इतिहास और माता शारदाम्बिका

मैहर में माता शारदा के वर्तमान मंदिर की स्थापना सन् 502 में हुई थी। मैहर के इस पवित्र मंदिर में जगत माता शारदाम्बिका की उपासना की जाती है। इसे मध्य भारत का श्रृंगेरी मठ भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ विराजित माता शारदाम्बिका श्रृंगेरी की पूज्य देवी का ही रूप मानी जाती हैं। साथ ही श्रृंगेरी मठ की पूजा पद्धति के अनुसार ही यहाँ भी तीन प्रहर की पूजा होती है। स्थानीय विद्वानों और मंदिर से जुड़े लोगों का मानना है कि आदि शंकराचार्य ने मैहर में सबसे पहले माता शारदा की विशेष पूजा की थी।

मैहर में विराजित माता शारदा

माता शारदाम्बिका, महासरस्वती की अवतार स्वरूप हैं जो पृथ्वी पर सनातन धर्म की स्थापना में आदि शंकराचार्य की सहायता के लिए आई थीं। उत्तर भारत में जो लोग श्रृंगेरी मठ तक नहीं जा सकते उनके लिए मैहर का माता शारदा मंदिर ही महान तीर्थ है।

नवरात्रि है प्रमुख त्यौहार

वैसे तो यह स्थान सदैव ही श्रद्धालुओं से भरा रहता है, किन्तु विशेष पर्वों पर यहाँ भीड़ बढ़ जाती है। दो मुख्य नवरात्रि के अलावा गुप्त नवरात्रि को भी यहाँ का विशेष त्यौहार माना जाता है। नवरात्रि में मध्य-भारत के अलग-अलग स्थानों से लोग माता शारदाम्बिका के दर्शन के लिए मैहर आते हैं। नवरात्रि पर्व का प्रारम्भ महाअभिषेक से होता है। इसके बाद चार दिन तक लक्षार्चन एवं देवी माहात्म्य परायण होता है। अंत में नवमी के दिन शत चंडी यज्ञ एवं विद्यारंभ की पूजा होती है। इस दिन लोग अपनी संतान के विद्यारम्भ के आशीर्वाद की प्राप्ति के लिए मैहर आते हैं।

इन नौ दिनों के दौरान माता शारदाम्बिका की उपासना महाकाली, ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, इन्द्राणी, चामुण्डेश्वरी एवं गजलक्ष्मी के रूप में होती है। मंदिर परिसर माता शारदाम्बिका के अतिरिक्त काल भैरव, बाल गणेश, हनुमान, ब्रह्मा आदि देवों की प्रतिमाएँ स्थापित हैं, जिनकी उपासना का विशेष महत्व है।

माता शारदा के परम भक्त आल्हा द्वारा की जाती है पहली पूजा

आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो चंदेल राजा परमाल के सेनापति थे। दोनों ही माता शारदा के अनन्य भक्त थे। कहा जाता है कि आल्हा ने लगभग 12 वर्ष की तपस्या की जिससे उन्हें माता शारदा के दर्शन प्राप्त हुए और अमरत्व का वरदान मिला। मैहर के मुख्य परिसर से लगभग 2 किमी की दूरी पर आल्हा का मंदिर, तालाब एवं अखाड़ा है। इसी अखाड़े में आल्हा और ऊदल कुश्ती लड़ा करते थे।   

आल्हा तालाब और मंदिर, पीछे है त्रिकूट पर्वत (फोटो : पत्रिका)

इस स्थान की विशेषता है कि आज भी यहाँ लगभग हजार वर्षों से आल्हा अपनी आराध्य देवी की उपासना करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में आते हैं। ऐसा कई बार हुआ है कि जब सुबह मंदिर के कपाट खोले गए हैं तब मंदिर के गर्भगृह में जल और ताजे पुष्प मिले। यह कई वर्षों से होता आया है और आल्हा द्वारा सबसे पहले पूजा किए जाने की बात पर न केवल श्रद्धालु बल्कि कई विद्वान भी यकीन करते हैं।

अब तो मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए प्रशासन द्वारा रोप वे की व्यवस्था कर दी गई है किंतु अभी भी श्रद्धालु लगभग 1100 सीढ़ियाँ चढ़कर अपनी जगतमाता के दर्शन के लिए जाते हैं। कई श्रद्धालु तो सैकड़ों किमी पैदल चलकर और पेट के बल लेटकर माता के दर्शन के लिए पहुँचते हैं। यह मंदिर न केवल मध्य प्रदेश बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान के श्रद्धालुओं के बीच भी काफी प्रसिद्ध है।

कैसे पहुँचे?

मैहर के सबसे नजदीक खजुराहो हवाई अड्डा है जो मंदिर से लगभग 140 किमी की दूरी पर है। इसके अलावा मैहर जबलपुर-सतना रेल खंड से जुड़ा हुआ है जहाँ रेलवे स्टेशन भी है और यहाँ से शारदा माता मंदिर की दूरी लगभग 6 किमी है। हालाँकि मैहर पहुँचने के लिए सतना मुख्य रेलवे स्टेशन माना जाता है, क्योंकि सतना जंक्शन पर लगभग सभी ट्रेनें रुकती हैं। सतना जंक्शन से मैहर स्थित मंदिर की दूरी 43 किमी है। मैहर सड़क मार्ग से भी जबलपुर, खजुराहो, सतना और प्रयागराज से जुड़ा हुआ है।