पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में किस्मत आजमा रहे सबसे निर्धन उम्मीदवारों में से एक चंदना बाउरी थीं। बीजेपी ने उन्हें सल्तोरा से मैदान में उतारा था। तृणमूल कॉन्ग्रेस के शानदार प्रदर्शन के बीच वह जीत हासिल करने में कामयाब रहीं हैं। 30 साल की चंदना एक दिहाड़ी मजदूर की पत्नी और तीन बच्चों की माँ हैं।
बांकुरा जिले की सल्तोरा विधानसभा सीट पर चंदना बाउरी ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के प्रत्याशी संतोष कुमार मण्डल को 4,145 मतों से हराया है। बीजेपी का टिकट मिलने के बाद इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उन्हें इसका बिल्कुल अंदाजा नहीं था। बीजेपी की सूची में नाम आने के बाद स्थानीय नेतृत्व ने उन्हें उम्मीदवारी की सूचना दी थी।
चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हुए अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने सल्तोरा क्षेत्र से चंदना का प्रचार अभियान प्रारंभ किया था। इसके बाद चंदना बाउरी ने कहा था, “मिथुन चक्रवर्ती द्वारा मेरे विधानसभा क्षेत्र से चुनाव प्रचार शुरू किया जाना मेरे लिए गर्व की बात है।”
कौन हैं चंदना बाउरी :
चंदना बाउरी तीन बच्चों की माँ हैं। वह अपनी दो बेटियों और एक बेटे को अपनी माँ और सास के साथ घर में छोड़ चुनाव प्रचार करने निकलती थीं। कभी-कभी उनके पति भी उनके साथ जाते थे जो कि एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में दिहाड़ी मजदूर हैं।
चंदना, सल्तोरा में 2014 से भाजपा कार्यकर्ता के रूप में काम करती आ रही हैं। वह 2018 में पंचायत चुनावों के समय ग्राम पंचायत सदस्य बनीं। इसके बाद चंदना 2019 में भाजपा बांकुरा जिला समिति की सदस्य बनीं। चंदना के अनुसार भाजपा में कोई अमीर या गरीब नहीं है। भाजपा सबकी है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने मुझे बहुत सम्मान दिया है जिसके लिए मैं पार्टी की शुक्रगुजार हूँ।
इसके अलावा भाजपा ने पूर्वी बर्दवान के आशाग्राम से कलिता माझी को टिकट दिया था। कलिता एक बेहद साधारण महिला हैं जो घर-घर काम करके अपना जीवन-यापन करती हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें काम करने में दिक्कत आ रही थी इसलिए उन्होंने इसके लिए एक महीने की छुट्टी ली थी। खबर लिखे जाने तक कलिता तृणमूल कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार से पीछे चल रहीं थी।
2 मई 2021 को चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। पश्चिम बंगाल में टीएमसी, असम में बीजेपी और केरल में लेफ्ट फ्रंट सत्ता बचाने में सफल रहा है। पुदुच्चेरी में एनडीए को मौका मिला है तो तमिलनाडु डीएमके के खाते में गई।
सबसे ज्यादा चर्चा बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत को लेकर हो रही है। लेकिन, बंगाल के जनादेश में छिपे वे संदेश जो फिलहाल नहीं पढ़े जा रहे वह बताते हैं कि इस बार भले केरल में वामपंथियों की सत्ता बच गई हो, लेकिन उनके इस आखिरी किले का भरभराना भी अब समय की बात है। अगले चुनावों में वहाँ शायद त्रिपुरा जैसे ही बड़ा उलटफेर देखने को मिल जाए।
हालाँकि मेट्रो मैन ई श्रीधरन की हार और केरल में एक बार फिर सिंगल डिजिट में बीजेपी की सीटों के सिमट जाने से भले आज यह दूर की कौड़ी लगती हो, लेकिन 2016 में बंगाल में जब बीजेपी ने 3 सीटें हासिल की थी तब भी कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि 2021 के विधानसभा चुनावों में वह टीएमसी से सीधे मुकाबिल होगी और उसकी सीटें 70 के पार जाएगी।
पर राजनीति इसी का नाम है। जितनी चीजें, जितने समीकरण कागज पर उभरते हैं, उससे बहुत कुछ अलग जमीन पर पक रहा होता है। जो चीजें स्पष्ट तौर पर दिखती हैं, उससे गहरे राज छिपे संदेशों में होते हैं जो भविष्य की राजनीतिक उलटफेर की ओर इशारा कर रहे होते हैं।
अब इसको सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं। असल में बंगाल के नक्सलबाड़ी से, जिसने माओवादियों के हिंसक आंदोलन का उभार दिया था, बीजेपी ने आसानी से जीत दर्ज की है। वामपंथियों के समर्थन वाले कॉन्ग्रेस पत्याशी तीसरे नंबर पर और टीएसमी दूसरे नंबर पर रही है। आधिकारिक तौर पर खबर लिखे जाने तक यहाँ के बीजेपी प्रत्याशी आनंदमय बर्मन की जीत का ऐलान नहीं हुआ था, लेकिन वह कुल वोटों का करीब 58% हासिल करने में कामयाब रहे थे। उनके और टीएमसी प्रत्याशी के बीच 70 हजार से ज्यादा वोटों का फासला था।
यह बताता है कि बंगाल में बीजेपी न केवल मुख्य विपक्षी पार्टी बनने में कामयाब रही है, बल्कि उसने यह तय कर दिया है कि भविष्य में बंगाल में लेफ्ट का अस्तित्व नहीं बचे, जो एक दशक पहले तक उनका अभेद्य किला माना जाता था।
यही कारण है कि 2016 के चुनावों में बंगाल में 10.16% वोट हासिल कर तीन सीट जीतने वाली बीजेपी इस बार करीब 38% वोट हासिल करते दिख रही है। ऐसा ही कुछ साल पहले ही बीजेपी ने त्रिपुरा में कर दिखाया था, जब उसने 43.59% मत हासिल करते हुए 25 साल से सत्तारूढ़ वामदलों को सत्ता से बाहर कर दिया था।
बंगाल में इस बार सीपीआई को 0.25% वोट तो सीपीआईएम को 4.64% वोट मिले हैं। लेफ्ट का खाता भी नहीं खुल रहा। 2016 के विधानसभा चुनावों में सीपीआई को 1.45% वोट प्राप्त हुए थे और पार्टी 1 सीट जीतने में सफल रही थी। सीपीआईएम 19.75% वोट हासिल कर 26 सीटें जीतने में सफल रही थी। बावजूद इस बार लेफ्ट का सूपड़ा साफ हो गया जबकि उन्होंने कॉन्ग्रेस से गठबंधन कर रखा था।
केरल में इस बार वामदल सरकार बचाने में सफल रहे हैं। लेकिन यह उनकी खुद की मजबूती से ज्यादा कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ की कमजोरी के कारण ही मुमकिन हुआ है। इसके कारण ही केरल की परंपरा के उलट इस बार सरकार सत्ता बचाने में सफल रही है।
2016 में केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) ने बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। गठबंधन के प्रमुख वामदलों सीपीआईएम और सीपीआई को क्रमशः 26.7% और 8.2% मत प्राप्त हुए थे। 2021 में हुए विधानसभा चुनाव में LDF गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापस आ रहा है, लेकिन प्रमुख वामपंथी दलों के वोट शेयर में कमी देखने को मिल रही है। 2021 के चुनावों में सीपीआईएम और सीपीआई को क्रमशः 24.8% और 7.2% मत हासिल होते दिख रहे हैं। सीपीआई और सीपीआईएम के अलावा अन्य वामपंथी दलों का अस्तित्व न के बराबर है।
जिस तरह से त्रिपुरा और बंगाल जैसे अनजान प्रदेशों में बीजेपी ने संगठन खड़ा कर खुद का विस्तार किया है, यदि ऐसा ही केरल में हुआ तो नतीजे भी मनमाफिक मिलने तय हैं। केरल में संघ और उसके आनुषंगिक संगठन भी वामपंथी हिंसा के बावजूद अरसे से लगातार काम कर रहे हैं। केरल में फिलहाल बीजेपी का वोट शेयर करीब 11 फीसदी है। करीब-करीब उतना ही जितना 2016 में बंगाल में था। जिस तरह से बंगाल में ताकत झोंक पार्टी आज 38 फीसदी के करीब पहुॅंच ही, यदि ऐसा ही केरल में हुआ तो 2024 में नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं। क्योंकि केरल की जनता ने इस बार यह तो संदेश दे दिया है कि कॉन्ग्रेस अब उसके लिए विकल्प नहीं रही। उसे विकल्प की शिद्दत से तलाश है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल सीटें हैं 292। लेकिन जिस एक सीट पर इन चुनावों में सबकी नजर थी वह थी, नंदीग्राम। यहाँ से बीजेपी के तरफ से मैदान में थे शुभेंदु अधिकारी। वही शुभेंदु अधिकारी जो चुनाव से कुछ महीने पहले तक ममता बनर्जी की कैबिनेट का हिस्सा थे। जिनके लिए कहा जाता है कि वे ही ममता को नंदीग्राम ले गए थे, जहाँ से उठी राजनीतिक बदलाव की हवा ने बंगाल में वाम मोर्चा का किला एक दशक पहले ध्वस्त कर दिया था।
अधिकारी परिवार के इस गढ़ में शुभेंदु को चुनौती देने के लिए इस चुनाव में ममता खुद टीएमसी की तरफ से मैदान में थीं। जैसा कि उम्मीद थी कि मुकाबला काँटे का हुआ। पहले खबर आई कि ममता 1200 वोटों के अंतर से जीत गईं हैं। फिर पता पता चला कि 1622 वोटों के अंतर से बाजी शुभेंदु के हाथ लगी है। अंत में ममता ने यह कहकर उनके जीत पर मुहर लगा दी कि ‘मैं हार मानती हूँ’। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया है कि चुनाव परिणामों की घोषणा के बाद कुछ हेरफेर की गई है। इसको लेकर वह कोर्ट जाएँगी और जल्द इसका खुलासा करेंगी।
I accept the verdict. But I will move the Court because I have information that after the declaration of results there were some manipulations done and I will reveal those: West Bengal CM Mamata Banerjee pic.twitter.com/JM88edOgAa
पश्चिम बंगाल में यूँ तो शुभेंदु अधिकारी कोई नया नाम नहीं है और उनके भाजपा में शामिल होने के बाद इस साल हुए विधानसभा चुनावों में कई बार वो ख़बरों में छाए रहे। पहले उन्होंने कहा था कि भाजपा किसी को भी यहाँ से उम्मीदवार बनाती है तो वे उसकी जीत की गारंटी लेते हैं। फिर उन्हें ही मैदान में उतारा गया। शुभेंदु अधिकारी ने खुली घोषणा की थी कि अगर वो नंदीग्राम हारे तो राजनीति छोड़ देंगे।
जैसा कि हमने बताया है, मेदिनीपुर और आसपास की सीटों पर अधिकारी परिवार का दबदबा है। उनके पिता शिशिर अधिकारी ने 2009 से लगातार काँठी लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं। उससे पहले वो काँठी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से 1982, 2001 और 2006 में विधायक चुने गए थे। खुद शुभेंदु तामलुक लोकसभा क्षेत्र से 2009 और 2014 में सांसद रहे हैं। 2016 में उनके इस्तीफे के बाद उनके भाई दिव्येंदु यहाँ से सांसद बने।
2019 में दिव्येंदु ने फिर से जीत दर्ज की। काँठी दक्षिण से शुभेंदु ने पिता की विरासत सँभाली और 2006 में यहाँ से विधायक चुने गए। अब उन्होंने नंदीग्राम से लगातार दूसरी बार (2016, 2021) जीत दर्ज की है। इस तरह से अधिकारी परिवार के इन तीनों सदस्यों ने लगभग एक दर्जन विधानसभा/लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की है। स्थानीय म्युनिसिपल्टी के चुनावों में भी इस परिवार का दबदबा रहा है।
शुभेंदु अधिकारी अपनी हिन्दू पहचान जाहिर करने में कभी पीछे नहीं हटते। कई मौकों पर उन्हें भगवान श्रीराम की तस्वीर वाला ध्वज लहराते हुए देखा गया है तो कई बार मंदिर में मत्था टेकते हुए। इस बार भी अपने नामांकन से पहले उन्होंने जानकी मंदिर में हवन किया था और सिंहवाहिनी मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। उनके मंचों से ‘जय श्री राम’ के नारे लगने आम बात है। दुर्गा पूजा और हिन्दू त्योहारों के साथ भेदभाव को लेकर उन्होंने ममता को कई बार घेरा।
शुभेंदु अधिकारी के पिता मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। 50 वर्षीय शुभेंदु अधिकारी के जीवन में एक समय ऐसा भी आया था जब उनका नाम शारदा स्कैम में आया था और सितम्बर 2014 में CBI ने उनसे पूछताछ भी की थी, लेकिन वो इन सभी आरोपों से बाहर निकलने में कामयाब रहे। ममता बनर्जी के नंदीग्राम आंदोलन को सफल बनाने में उनकी बड़ी भूमिका थी, जिसके बाद 2011 में TMC पहली बार सत्ता में आई थी।
शुभेंदु अधिकारी को उनके क्षेत्र में लोग ‘दादा’ या ‘भूमिपुत्र’ कह कर भी पुकारते हैं। अपने क्षेत्र के लोगों के लिए वे हमेशा सहज रहे हैं। चुनावी कवरेज के दौरान भी कई कारोबारियों और दुकानदारों ने स्वीकारा था कि कभी न कभी उन्होंने शुभेंदु से मदद ली है। यही कारण है कि TMC के दिनों में इस इलाके में वो ममता बनर्जी के सबसे ज़्यादा विश्वस्त हुआ करते थे। उन्हें 2016 में मंत्री बनाया गया था।
ममता बनर्जी की सरकार में परिवहन मंत्रालय सँभालने वाले शुभेंदु अधिकारी ‘जूट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया’ और ‘हुगली रिवर ब्रिज कॉर्पोरेशन’ के अध्यक्ष भी रहे हैं। नंदीग्राम आंदोलन में उनकी नेतृत्व व प्रबंधन क्षमता को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें जंगलमहल (पश्चिम मेदिनीपुर, बाँकुरा और पुरुलिया) में TMC का प्रभारी बनाया था। इन 3 जिलों में पार्टी का संगठन खड़ा करने में उनकी ही भूमिका रही है।
उनके आने से पश्चिम बंगाल में भाजपा को एक बड़ा और जमीनी चेहरा मिल गया है, जो अगर आगे जाकर राज्य में पार्टी का नेतृत्व सँभालता है तो ‘बाहरी बनाम भीतरी’ वाला आरोप यूँ ही ख़त्म हो जाएगा। इस चुनाव में भाजपा में आए नेता, पार्टी के नए विधायक और 18 सांसद मिल कर राज्य में अगले 3 वर्षों में एक ऐसा माहौल तैयार कर सकते हैं, जिसका फायदा पार्टी को 2024 और 2026 में ज़रूर मिलेगा। फ़िलहाल तो शुभेंदु की तुलना स्मृति ईरानी की अमेठी विजय से हो रही है।
‘राधे’ के बाद सलमान खान की अगली फिल्म ‘कभी ईद कभी दीवाली’ के नाम को लेकर निर्माताओं और निर्देशक में संशय का माहौल है, जिसके बाद इसे बदलने की योजना बनाई गई है। ‘बॉलीवुड हंगामा’ ने एक ट्रेड सोर्स के हवाले से दावा किया है कि सलमान खान और पूजा हेगड़े अभिनीत इस फिल्म का टाइटल बदला जाएगा, क्योंकि फिल्म से जुड़े लोग नहीं चाहते थे कि वो किसी विवाद में फँस जाएँ।
इस फिल्म के लिए कई अन्य टाइटलों पर भी विचार किया जा रहा है और जल्द ही उनमें से एक को फाइनल किया जाएगा। फिल्म की रिलीज को लेकर कोई कंट्रोवर्सी न हो, इसी डर से ऐसा किया जा रहा है। इस फिल्म के निर्माता साजिद नाडियावाला हैं। सलमान और साजिद ने विवादों से बचने के लिए ये फैसला लिया। उनका मानना है कि इस टाइटल से दो त्योहारों का मजाक उड़ने की बात सामने आ सकती है, इसलिए ये बदलाव ज़रूरी है।
‘कभी ईद कभी दीवाली’ एक आइए परिवार की कहानी है, जो सभी मजहबों के गॉड्स के एक होने में विश्वास रखता है। इसमें सलमान खान के पिता का किरदार मुस्लिम होगा, जबकि उनकी माँ हिन्दू होंगी। उनकी चाची कैथलिक होंगी। इस तरह से फिल्म में एक ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ दिखाया जाएगा। ये परिवार ईद और दीवाली दोनों मनाता है, इसी में आने वाली दिक्कतों और खुशियों को फिल्म में दिखाया जाएगा।
सूत्रों का कहना है कि ‘वर्तमान माहौल में’ ये फिल्म भाईचारे को मजबूत करेगी और हिन्दू-मुस्लिम एकता को दिखाने के लिए इसे बनाया जा रहा है। सितम्बर 2021 में इस फिल्म की शूटिंग शुरू होने वाली है। फ़िलहाल सलमान खान ‘राधे’ के बाद टाइगर सीरीज की तीसरी फिल्म में व्यस्त रहने वाले हैं। ‘राधे’ के ट्रेलर के साथ-साथ दो गाने भी रिलीज हो चुके हैं और सोशल मीडिया में उनका खूब मजाक भी उड़ा है।
बता दें कि हाल ही में कई ऐसी फ़िल्में और वेब सीरीज आई हैं, जिनमें हिन्दू धर्म के अपमान का आरोप लगा है। हाल ही में आई सैफ अली खान अभिनीत ‘तांडव‘ के खिलाफ यूपी पुलिस ने मामला दर्ज किया था। इससे पहले ‘पाताल लोक’ और ‘असुर’ से लेकर ‘लैला’ और ‘लूडो’ तक में हिन्दू विरोधी कंटेंट्स की बातें सामने आई हैं। हिन्दूफोबिक कंटेंट्स के खिलाफ सोशल मीडिया में अभियान भी चलता रहा है।
उत्तर प्रेदश में कोरोना संक्रमण के बीच तीन चरणों में संपन्न कराए गए पंचायत चुनावों के लिए 829 केंद्रों पर मतगणना हो रही है। वैसे तो चुनाव के बाद सभी की नजर पूरे नतीजों पर अटकी हुई है। लेकिन इस बीच इटावा में सैफई नाम का ग्राम ऐसा है, जिसने यूपी में हुए इन चुनावों को ऐतिहासिक बना दिया है।
ये गाँव मुलायम सिंह यादव का है। 1971 से यहाँ मुलायम सिंह यादव के दोस्त दर्शन सिंह का राज था। हर बार उन्हें ही यहाँ निर्विरोध प्रधान बनाया जाता था। मगर, पिछले साल 17 अक्टूबर को उनका निधन होने के बाद यह सीट रिक्त हो गई।
फिर सामान्य पंचायत चुनाव में सैफई गाँव के प्रधान पद को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। इस बार भी प्रधान निर्विरोध चुन लिया जाता, लेकिन विनीता नाम की दलित महिला ने इस प्रक्रिया में ब्रेक लगा दी।
विनीता के चुनाव में उतरने से गाँव में मतदान हुआ। हालाँकि, नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे। उन्हें मात्र 15 वोट मिलने की खबर है जबकि मुलायम सिंह यादव का समर्थन पाने वाले रामफल वाल्मिकी को 3877 वोट मिले हैं। आजादी के बाद यह पहला मौका है जब इस क्षेत्र में कोई दलित बतौर प्रधान निर्वाचित हुआ।
मुलायम सिंह यादव के गाँव सैफई में आजादी के बाद हमेशा प्रधान पद का चुनाव निर्विरोध ही होता रहा। आजादी के बाद पहली बार दलित जाति का कोई प्रधान उनके गाँव में बना। यह और बात है कि जो प्रधान बने, वो भी मुलायम सिंह यादव का समर्थन पाने वाले ही हैं।
इसी प्रकार यूपी के मैनपुरी के नगला उसर गाँव का चुनाव भी इस समय चर्चा में बना हुआ है। बताया जा रहा है कि वहाँ से विजेता का नाम पिंकी कुमारी है, जिन्होंने वर्तमान प्रधान चंद्रावती को हराया और 115 वोटों से जीत हासिल की। हालाँकि दुखद बात ये है कि पिंकी कुमारी के नाम पर जीत की मुहर तो लग गई, लेकिन वह अब इस दुनिया में नहीं है। पंचायत चुनाव के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी थी और जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो उनकी मौत हो गई। अब यहाँ दोबारा चुनाव करवाए जाएँगे।
कानपुर के बिधनू ब्लॉक में इस बार एक काजल किरन नाम के किन्नर को ग्राम प्रधान निर्वाचित किया गया। काजल किरन ने गुड़िया देवी को 185 वोटों से हराकर जीत हासिल की। इससे पहले काजल किरन नौबस्ता पशुपति नगर वार्ड 48 से पार्षद थीं। उन्होंने महाराजपुर विधानसभा से निर्दलीय विधायक उम्मीदवार के तौर पर चुनाव भी लड़ा था।
बता दें कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर पहला चरण 15 अप्रैल, दूसरा चरण 19 अप्रैल और तीसरा चरण 26 अप्रैल को संपन्न कराया गया था। इन पंचायत चुनाव के लिए 1 करोड़ 7 लाख 4435 लोगों ने नामांकन पत्र दाखिल किया था। इसमें से 17,619 का नामांकन खारिज हो गया था, जबकि 77669 लोगों ने अपना नामांकन वापस ले लिया और 3 लाख 19,317 का निर्वाचन निर्विरोध हो गया।
देश में कोविड-19 के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इसकी वजह से दिल्ली में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी की कई खबरें आ रही हैं। इस बीच यह आरोप सामने आ रहा है कि ऑक्सीजन रिफिलर्स को सरकार से उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह से आम जनता को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जो ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए इन पर निर्भर थे। अब उनके लिए ऑक्सीजन मिलना काफी मुश्किल हो रहा है।
NGO HUM के संस्थापक एडवोकेट अमित कुमार सिंह ने एक वीडियो संदेश पोस्ट किया जिसमें उन्होंने दिल्ली सरकार द्वारा शहर में ऑक्सीजन रिफिलरों पर कार्रवाई के बाद की स्थिति का वर्णन किया है। कुमार के अनुसार, कोविड -19 मरीजों के परिचारक जो रिफिलरों से मेडिकल ऑक्सीजन की व्यवस्था कर रहे थे, अब उनकी व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि सरकार ने उनके परिचालन को बंद कर दिया है। केवल 13 रिफिलर्स को मेडिकल ऑक्सीजन प्रदान करने की अनुमति है, लेकिन सरकार द्वारा जारी किए गए नंबर या तो बंद हो रहे हैं या फिर कोई जवाब नहीं दिया जा रहा है।
Many private vendors in Delhi were refilling oxygen cylinders at a nominal cost in Delhi. The Kejriwal govt yesterday closed all of them and released a list of just 13 refillers. People are running from pillar to post to get oxygen refill but nothing happening. pic.twitter.com/kuPTSabxZy
अमित कुमार सिंह ने कहा कि दिल्ली सरकार ने वेस्ट विनोद नगर के एक ऑक्सीजन रिफिलर एजेंसी को सील कर उनके सिलेंडर जब्त कर लिए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उसके बाद सरकार ने 6 ऑक्सीजन एजेंसियों के नंबर जारी किए, लेकिन उनमें से कोई भी फोन नहीं उठा रहा है। सिंह ने सुझाव दिया कि दिल्ली सरकार को अपने अधिकारियों को तैनात कर वेस्ट विनोद नगर के इस एजेंसी को कार्य करने देना चाहिए और निजी रिफाइनरी को चालू रखने की अनुमति देनी चाहिए।
रिफिलर स्टेशन के मालिक का प्रताड़ित किए जाने का दावा
अमित कुमार सिंह का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद, ऑपइंडिया वेस्ट विनोद नगर के उस एजेंसी के पास पहुँचा, जिसका सिंह ने उल्लेख किया कि वे किन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर, रिफिलिंग एजेंसी के मालिक ने हमें बताया कि चूँकि दिल्ली सरकार द्वारा मेडिकल ऑक्सीजन रिफिलिंग स्टेशनों पर टीमों को तैनात करने के आदेश दिए गए थे, इसलिए अधिकारियों द्वारा उनके स्टेशन को बंद कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि सरकारी अधिकारियों ने उनके सिलेंडर जब्त कर लिए और परिसर को बंद कर दिया। उन्होंने आगे कहा कि उनकी टीम के सदस्यों को सरकारी अधिकारियों ने डीएम के कार्यालय में पेश करने के उठा कर ले गए।
ऑपइंडिया से बात करने के दौरान मालिक लगभग टूट सा गया और कहा, “उन्होंने मेरा रिफ़िलिंग स्टेशन बंद कर दिया है। लोग मुझे बुला रहे हैं। अब बताइए कि मैं उनके लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था कहाँ से करूँ? उन्होंने मेरी टीम के सदस्यों को उठाया और उन्हें परेशान किया। यह टॉर्चर था। उन्होंने मेरा सिलेंडर भी छीन लिया। मेरे पास मदद माँगने वालों को देने के लिए कोई जवाब नहीं है।”
जब हमने सोशल मीडिया पर सर्च किया तो पाया कि उसके रिफिलिंग स्टेशन का पता अभी भी व्यापक रूप से सोशल मीडिया पर मेडिकल ऑक्सीजन के लिए एक प्रामाणिक सोर्स के रूप में शेयर किया जा रहा है।
28 अप्रैल को दिल्ली सरकार ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें जिला मजिस्ट्रेटों को लाइसेंस शर्तों के अनुसार मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति सुनिश्चित करवाने के लिए टीम की तैनाती का निर्देश दिया था। यह आदेश राष्ट्रीय राजधानी में मेडिकल ऑक्सीजन की आपूर्ति को सुचारू करने के लिए था। लेकिन ऐसा लगता है कि इससे रिफाइनरी केंद्र मालिकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पश्चिम बंगाल में रविवार (2 मई 2021) को शुरुआती रुझानों में तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के जीतने की खबरें आते ही तृणमूल कार्यकर्ताओं और कट्टर मुस्लिमों ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ नफरत का जहर उगलना और खून की होली खेलने जैसी धमकियाँ देना शुरू कर दिया।
नफरत फैलाने वाले गैंग के शुरुआती ट्वीट्स में ही बीजेपी समर्थकों के खिलाफ जमकर जहर उगला गया और इन लोगों ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ लोगों को उकसाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। जुल्फिकार अली ने जोर देकर कहा, “पश्चिम बंगाल ने खुद को संघी वायरस के खिलाफ टीका लगाया।”
कोरोना वायरस द्वारा मानवता के लिए पैदा किए गए खतरे के बीच इस असंवेदनशील ट्वीट ने वायरस और बीजेपी समर्थकों के बीच समानताएँ खींचने की कोशिश की।
एक और ट्विटर यूजर ने बीजेपी समर्थकों के खिलाफ अपशब्द का इस्तेमाल किया और गाली को अंग्रेजी में तोड़-मरोड़ कर पेश किया और कहा कि 6 बजने में कितना समय है, क्योंकि उन्हें पता है कि तब तक चुनाव नतीजे आ जाएँगे।
राजनीति में प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ अपमानजनक ट्वीट करना अब नई बात नहीं है, लेकिन इस्लामी कट्टरपंथी और टीएमसी समर्थक इस मामले और भी नीचे गिर गए। वे ‘संघियों’ को हिंसा, हत्या, और गंभीर शारीरिक नुकसान पहुँचाने की धमकी देने लगे।
इस्लामी कट्टरपंथी फहमी रियाज ने कहा, ”टीएमसी की जीत के बाद संघियों का इलाज होते देखना पसंद करूँगा। उनके सिर से खून निकलना चाहिए।”
एक और ट्विटर यूजर ने हाथ में चाकू लिए एक आदमी की तस्वीर शेयर की और लिखा, ”ममता की जीत के बाद बीजेपी कार्यकर्ता।” इस तस्वीर के जरिए वह ये कहने की कोशिश कर रहा था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस की सत्ता में वापसी के बाद बीजेपी कार्यकर्ताओं को चाकुओं से निर्दयता से गोदा जाएगा।
Despacito नाम के एक इंस्टाग्राम अकाउंट ने भी ”हिंदी बोलने वालों को धमकाते हुए कहा, “तुम लोग बहुत बहादुर बन गए हो। ममता की जीत के बाद रुको और इंतजार करो तुम ‘बाहरी, हिंदी बोलने वाले कमीनों।”
वहीं एक यूजर ने लिखा कि देखो हम 30 करोड़ होकर भी कैसे अपनी सरकार बनाते हैं और तुम 100 करोड़ होकर भी कुछ नहीं कर पाते हो?
शुरुआती रुझानों में टीएमसी पश्चिम बंगाल में कम से कम 200 सीटों पर आगे है। रुझानों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी की भारी-भरकम जीत के बाद कथित तौर पर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कोलकाता में हेस्टिंग्स में बीजेपी ऑफिस का घेराव किया। टीएमसी की जीत के बाद अब बीजेपी समर्थकों और जिन्होंने इस पार्टी के लिए वोट किया उनके मन में टीएमसी और उनके कार्यकर्ताओं का गुस्सा झेलने का डर है।
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की जीत अभी आधिकारिक तौर पर घोषित भी नहीं हुई कि अभी से वहाँ हिंसा की तस्वीरें सामने आने लगीं। सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आई है, जिसमें भाजपा का कार्यालय जलता नजर आ रहा है।
टीएमसी कार्यकर्ताओं का जश्न आसनसोल में भी दिखा। जब चुनाव आयोग और अधिकारियों ने पुलिस को चुनाव नतीजों के बाद पार्टियों द्वारा जुलूस निकालने या जश्न न मनाने का निर्देश दिया था। बंगाल पुलिस को राज्य में बढ़ते कोविड मामलों के बीच टीएमसी कार्यकर्ताओं को जश्न न मनाने का निर्देश देते देखा गया। लेकिन बंगाल पुलिस के निर्देशों से बेपरवाह टीएमसी कार्यकर्ताओं को पुलिस के बगल में पटाखे फोड़ते देखा गया।
पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों के लिए वोटों की गिनती जारी है। अभी तक जो रुझान सामने आए हैं उससे स्पष्ट है कि ममता बनर्जी की TMC लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं से लेकर BJP के दफ्तरों पर बमबारी तक, इस चुनाव या इससे पहले से पश्चिम बंगाल में वो सब कुछ हो रहा था जो एक सभ्य लोकतंत्र में नहीं होना चाहिए। इस पूरे चुनाव को कैसे लड़ा गया, ये भी लोगों ने देखा।
आइए, कोरोना वायरस से ही शुरू करते हैं। आज पश्चिम बंगाल में कोरोना से लोग बेहाल हैं और चुनाव आयोग को भी इसके लिए दोष दिया जा रहा है। ये बात मार्च 2020 के पहले हफ्ते की है। तब कोरोना से निपटने के लिए केंद्र सरकार कमर कस रही थी और विभिन्न एयरपोर्ट्स पर क्वारंटाइन वाला नियम लागू कर दिया गया था। शाहीन बाग़ वाले तब भी बैठे हुए थे। तबलीगी जमात वाले मरकज़ में छिपे हुए थे।
तब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा था कि कोरोना तो बस एक बहाना है भाजपा का, मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए। उन्होंने कहा था कि दिल्ली दंगों से ध्यान भटकाने के लिए केंद्र सरकार कोरोना का डर फैला रही है। उन्होंने बुनियादपुर की एक रैली में ही ये बात कही थी। सोचिए, जब भारत में कोरोना के मात्र 28 मामले आए थे, तब जहाँ केंद्र इससे निपटने की तैयारी में व्यस्त था, एक बड़े राज्य की CM इसे नाटक बता रही थी।
क्या आपने किसी लिबरल गिरोह के सदस्य को सुना ममता बनर्जी की आलोचना करते हुए? जब किसी राज्य के मुखिया को ही कोई चीज गंभीरता से लेने लायक नहीं लगती हो, आज उस राज्य में जब कोरोना से साढ़े 8 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं और 12,000 लोग मर चुके हों, वहाँ के लिए क्या उस राज्य सरकार को दोष नहीं दिया जाना चाहिए? चुनाव के आड़े कोरोना के दिशा-निर्देश न आएँ, इसका जुगाड़ तो भाजपा विरोधी पार्टियाँ ही कर रही थीं।
If BJP wins West Bengal today: Media will start covering corona situation of WB same like UP & with EVM RUDAALI..
If TMC wins West Bengal : West Bengal will become corona free state for them.Someone rightly said…#BengalElections2021
खैर, EVM से हुए चुनावों में तृणमूल कॉन्ग्रेस की जीत तो हो ही रही है, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव जैसे नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएँ भी प्रेषित की हैं। देश में 2014 से लेकर अब तक जिन भी चुनावों में भाजपा की जीत हुई है, वहाँ ज़रूर EVM का राग अलापा गया है। विदेश में हुई एक नकाबपोश की प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर कई नेताओं के अनर्गल बयान तक, ईवीएम को लेकर कई बेतुकी चीजें कही गईं।
आइए, लोकसभा चुनाव 2019 से शुरू करते हैं। जून 2019 में ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव में भाजपा की भारी जीत पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि EVM से हुई वोटिंग जनादेश नहीं हो सकता। अप्रैल 2021 के पहले हफ्ते में तो TMC में नए-नवेले आए यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मिल कर EVM को लेकर चिंता जताई थी। TMC सांसद डेरेक ओब्रायन ने 29 मार्च को चुनाव आयोग को पत्र लिख कर वोटर टर्नआउट से लेकर मतगणना तक में गड़बड़ी की बात की थी।
पार्टी ने आरोप लगाया था कि कुछ ही मिनटों में वोटर टर्नआउट घट-बढ़ रहा था। उसी दिन खुद ममता बनर्जी ने एक रैली में अमित शाह के दावे को आधार बना कर पूछा था कि उन्हें कैसे पता कि भाजपा को इतनी सीटें आएँगे, क्या EVM फिक्स्ड है? पहले चरण का चुनाव प्रचार जब ख़त्म हुआ था, तब भी ममता ने कहा था कि भाजपा ‘कुछ भी’ कर सकती है और साथ ही EVMs पर नजर रखने की सलाह दी थी।
ममता बनर्जी ने बार-बार अलापा था EVM वाला राग
उससे पहले भी एक रैली में उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से कहा था कि वो अधिकारियों के सामने EVM को चेक करें, उन पर नजर रखें क्योंकि भाजपा उसमें कुछ खेल कर सकती है। उन्होंने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को 2024 का सेमीफाइनल बताते हुए ऐसा कहा था। अब सवाल ये उठता है कि पश्चिम बंगाल में सभी 294 सीटों पर चुनाव इन्हीं EVM से हुए हैं तो परिणाम पक्ष में आने पर अचानक मशीन पर भरोसा कैसे कायम हो गया पूरे भाजपा विरोधी गिरोह का?
हमारे देश के जो अर्धसैनिक बल अपनी जान पर खेल पर देश के बाहरी और भीतरी हिंसक तत्वों से निपटने में लगे रहते हैं, उनका इस चुनाव में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और उनके कैडर द्वारा कैसे अपमान किया गया, ये भी याद करने लायक है। उन्होंने आरोप लगाया था कि CRPF तृणमूल के वोटरों को प्रताड़ित कर रही है। साथ ही अपने कार्यकर्ताओं को अर्धसैनिक बलों के घेराव करने की भी सलाह दी थी।
ममता बनर्जी के इस बयान के खिलाफ भाजपा ने चुनाव आयोग में शिकायत भी दर्ज कराई थी। इस बयान के बाद जो हुआ, वो भी आपको याद होना चाहिए। सीतलकूची में अर्धसैनिक बलों को घेर लिया गया और उन पर लाठी-डंडों व ईंट-पत्थर से ताबड़तोड़ वार किया जाने लगा। आत्मरक्षा में चली गोली में हमलावर भी मरे। चौथे चरण के चुनाव के दौरान 4 लोगों की मौत का जिम्मेदार किसे माना जाए?
एक कथित ऑडियो क्लिप में ममता बनर्जी को सीआरपीएफ के जवानों को टीएमसी के चार उपद्रवियों को मारने के लिए जेल में डालने की बात कहते हुए सुना गया। इन उपद्रवियों ने सीआरपीएफ के जवानों के हथियारों को छीनने का प्रयास किया था। इसके अलावा ममता को अपने एक नेता से कथित तौर पर यह भी कहते सुना गया था कि वो जनता की संवेदना और वोट हासिल करने के लिए लाशों के साथ एक राजनैतिक रैली का आयोजन करें।
लेकिन, भाजपा विरोधी दलों के लिए ये सब कुछ सामान्य है। देश के उद्योगपतियों को लेकर घृणा फैलाते हैं, जिससे एक टेलीकॉम कंपनी के 1500 टॉवर्स किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा उखाड़ डाले जाते हैं। इसी तरह वैक्सीन को लेकर अफवाह फैलाई जाती है। वैक्सीन बनाने वालों को धमकाया जाता है। भारतीय सेना तक को भला-बुरा कहा जाता है। ऐसे ही नेताओं को फिर जनता के बीच मसीहा बना कर भी पेश किया जाता है।
पश्चिम बंगाल के 8 चरण में से प्रत्येक में हिंसा की खबर आई और उनके तार कहीं न कहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस से जाकर जुड़े। कभी किसी भाजपा नेता को मार कर लटका दिया गया तो कभी किसी की लाश कहीं खेत में पड़ी हुई मिली। एक बूढ़ी महिला और उसके बेटे को भाजपा का समर्थन करने पर इतना पीटा गया कि वो कुछ दिनों बाद चल बसीं। अब मतगणना के दौरान भी भाजपा दफ्तर में आग लगाने की घटना सामने आई है।
सोशल मीडिया पर राजदीप सरदेसाई सरदेसाई सहित गुट विशेष के पत्रकार लगातार TMC के पक्ष में माहौल बनाते रहे। कॉन्ग्रेस तो एग्जिट पोल्स के बाद से ही अपनी ही हार का जश्न मनाते नहीं थक रही है। तेजस्वी यादव TMC के लिए गोलबंदी करने कोलकाता पहुँचे, जबकि वामपंथी बिहार में उनके गठबंधन साथी हैं। सपा ने जया बच्चन को चुनाव प्रचार के लिए भेजा। और आज ये सभी EVM से मिली जीत का जश्न मना रहे हैं।
आज (02 मई 2021) पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों की मतगणना चल रही है। केरल में फिर से लेफ्ट गठबंधन सत्ता में वापस आता दिख रहा है। तमिलनाडु में डीएमके और एआईएडीएमके के बीच लड़ाई है, लेकिन डीएमके भी राज्य में सरकार बनाने की ओर अग्रसर है। पुडुच्चेरी में भाजपा गठबंधन जीत की ओर बढ़ रहा है। लेकिन यहाँ हम पश्चिम बंगाल और असम की बात करेंगे।
असम और पश्चिम बंगाल दो ऐसे राज्य हैं जहाँ अल्पसंख्यक वोट भाजपा की जीत-हार को तय करते हैं। असम में अल्पसंख्यक वोट शेयर पश्चिम बंगाल से ज्यादा है। फिर भी असम में भाजपा विजय हासिल करने की ओर अग्रसर है, लेकिन पश्चिम बंगाल में वह संघर्ष कर रही है।
चुनाव आयोग की अधिकारिक वेबसाइट के द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे आँकड़ों (3.30 PM) के अनुसार 48.5% वोट शेयर के साथ तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) 203 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि भाजपा 37.6% वोट शेयर के साथ 81 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है।
भाजपा के लिए यह एक अच्छी खबर हो सकती है कि पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में पश्चिम बंगाल में इस बार उसके वोट शेयर और विधानसभा सीटों में काफी बढ़त मिल रही है, लेकिन चिंता की बात यह है कि भाजपा का वोट शेयर 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में घटा है। इससे साफ है कि 2019 में जिस प्रकार से पश्चिम बंगाल में हिन्दू मतदाताओं ने भाजपा का समर्थन किया था, वह 2021 के विधानसभा चुनावों में देखने को नहीं मिला, बल्कि हिन्दू वोट का एक बड़ा हिस्सा टीएमसी को चला गया।
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए कुछ प्रश्न खड़े करते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढने के लिए भाजपा को असम में अपनाई गई अपनी रणनीति पर ध्यान देना होगा। असम में भाजपा की रणनीति थी हिन्दू मतदाताओं को ध्यान में रखना, बजाय इसके कि सभी को साथ लेकर चलने की संतुलित रणनीति बनाई जाए।
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने मतुआ और महिसया समुदाय पर विशेष ध्यान दिया। इससे जमीनी स्तर पर हिन्दू वोटों का एकत्रीकरण नहीं हो पाया। ऐसी ही कुछ विशेष समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जाना चुनावों में लाभकारी साबित नहीं हुआ। ममता बनर्जी मतुआ और महिसया समुदायों वाली सीटों पर भी जीत दर्ज करती नजर आ रही हैं। यह सही है कि चुनाव जीतने के लिए अलग-अलग समुदायों को भी ध्यान में रखना होता है, किन्तु पश्चिम बंगाल में हिन्दू मतदाताओं की तुलना में इन समुदायों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा था।
असम में नेताओं ने चुनाव जीतने के लिए हिन्दू वोटों पर ध्यान देने में कोई हिचक नहीं दिखाई। यह माना जा रहा था कि असम के कई हिस्सों में सीएए विरोधी लहर भाजपा का नुकसान करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। क्योंकि यह साफ था कि असम के हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच जो भी मतभेद हैं वो सुलझा दिए जाएँगे जो कि राज्य में बढ़ती मुस्लिम आबादी के चलते संभव नहीं थी।
तथ्य यही है कि भाजपा ने बंगाल के अंदर हिन्दू वोटों का एकत्रीकरण नहीं किया। यह भी स्पष्ट नहीं है कि सीएए लागू न करने से चुनाव परिणाम पर क्या असर हुआ है।
अब कुछ ऐसे भी समर्थक होंगे जो बंगाल के मतदाताओं को चुनाव परिणाम के लिए दोष देंगे, लेकिन ऐसा करना सही नहीं है। लोकतंत्र में एक वोट भी किसी राजनैतिक पार्टी का उधर नहीं होता है, बल्कि प्रत्येक राजनैतिक पार्टी को अपने वोट कमाने पड़ते हैं। भाजपा को 2019 लोकसभा चुनावों में वोट देने वाले 3-4% मतदाताओं नए इस बार ममता बनर्जी को वोट दिया। यह बताना इसलिए जरूरी है कि पार्टियाँ परिणामों की समीक्षा करें, लेकिन इसके लिए मतदाताओं को दोष देना पूरी तरह गलत है।
2019 में बंगाल में धार्मिक आधार पर वोटों का ध्रुवीकरण हुआ था, लेकिन 2021 में यह नहीं हुआ। परिणामस्वरूप भाजपा 2021 में बुरी तरह से हार गई। असम में 2019 और 2021 में दोनों बार वोटों का ध्रुवीकरण हुआ जिससे पार्टी को जीत मिली।
यह भी कहा जा रहा है कि 2019 में लोकसभा चुनाव थे जिसमें पीएम मोदी प्रमुख चेहरा थे और यह विधानसभा चुनाव है। लेकिन एक सत्य यह भी है कि इन दोनों ही राज्यों में 2019 में जो महत्वपूर्ण था, वही आज भी है। सीएए, अवैध घुसपैठिए और अल्पसंख्यक वोट शेयर 2019 में भी महत्वपूर्ण थे और आज भी हैं। आगे भाजपा के लिए यह साफ है कि वह विभिन्न समुदायों पर ध्यान केंद्रित करने के स्थान पर हिन्दू मतदाताओं को संगठित रखने की रणनीति पर काम करे।
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि भाजपा के पास स्थानीय स्तर पर कोई चेहरा नहीं था। दिलीप घोष और शुभेन्दु अधिकारी की लोकप्रियता के बाद भी भाजपा इन क्षेत्रों में हार रही है। निश्चित तौर पर भाजपा को इन चुनावों पर विश्लेषण करना चाहिए।
देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जूझ रहा है। अस्पतालों में ऑक्सीजन, बेड और जरूरी दवाओं की कमी ने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (2 मई) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए विशेषज्ञों के साथ ऑक्सीजन और दवाइयों की उपलब्धता की समीक्षा की।
Prime Minister Narendra Modi to meet experts at 9:30 am today to review oxygen and medicine availability.#COVID19pic.twitter.com/lLMvbV59aM
इस दौरान पीएम मोदी ने कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए देश में मौजूद मानव संसाधन की स्थिति की समीक्षा की और साथ ही इसे बढ़ाने के तरीकों पर विशेषज्ञों के साथ चर्चा भी की।
Delhi: Prime Minister Narendra Modi virtually meets experts to review oxygen and medicine availability. He reviewed the human resource situation, in relation to the #COVID19 pandemic, and ways to augment it. pic.twitter.com/gKsdzLPZ00
बैठक में छात्रों को प्रोत्साहित करने और कोविड ड्यूटी में शामिल होने के लिए मेडिकल और नर्सिंग पाठ्यक्रमों के पास-आउट को प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। बताया जा रहा है कि मेडिकल की पढ़ाई कर रहे एमबीबीएस के छात्रों को भी कोरोना मरीजों के इलाज के लिए तैनात किया जा सकता है।
Decisions may include delaying NEET and incentivizing MBBS pass-outs studying for it to join Covid duty. The decisions may also include utilizing services of final year MBBS & nursing students in Covid Duty: Govt of India Sources
इसके अलावा कोविड ड्यूटी करने वाले चिकित्साकर्मियों को सरकारी भर्ती में वरीयता के साथ-साथ वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाएगा।
Those medical personnel doing Covid duty will be given preference in Government recruitment as well as a financial incentive: Government of India Sources
मालूम हो कि इससे पहले 16 और 23 अप्रैल को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में ऑक्सीजन की किल्लत को दूर करने और इसका उत्पादन बढ़ाने को लेकर बैठक की थी। साथ ही अधिकारियों को कोरोना से निपटने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश भी दिए थे। वहीं, बीते दिनों सेना प्रमुख और वायु सेना प्रमुख ने भी प्रधानमंत्री से मुलाकात कर उन्हें सशस्त्र बलों द्वारा कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई में उठाए गए कदमों से अवगत कराया था।
बता दें कि रविवार (2 मई) को बीते 24 घंटे में कोरोना के 3 लाख से अधिक नए मामले दर्ज किए गए। इससे पहले शनिवार (1 मई) को 4 लाख से अधिक मामले सामने आए थे। यह अब तक एक दिन में आए सबसे अधिक कोरोना मामलों का आँकड़ा है।