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हत्या से पहले BJP कार्यकर्ता ने 2 बार किया था फेसबुक लाइव, बताया कैसे गुंडागर्दी कर रहे TMC वाले: जानवर के बच्चों तक को नहीं छोड़ा

जैसे ही पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की जीत सुनिश्चित हुई, राज्य में हिंसा का दौर फिर से शुरू हो गया। मतगणना वाले दिन न सिर्फ भाजपा प्रत्याशियों पर हमले हुए और पार्टी के दफ्तरों को जलाया गया, बल्कि एक कार्यकर्ता की भी हत्या कर दी गई। रविवार (मई 2, 2021) को अभिजीत सरकार नामक एक भाजपा कार्यकर्ता ने TMC के गुंडों की हरकतों के बारे में बताया। उसके कुछ ही देर बाद उनकी हत्या कर दी गई।

अभिजीत सरकार ने फेसबुक लाइव के माध्यम से अपनी बात रखी थी। उन्हें पता भी नहीं था कि फेसबुक पर लाइव कैसे आते हैं, लेकिन उन्होंने किसी तरह वीडियो बनाया और बताया कि TMC के गुंडे लगातार बमबारी कर रहे थे और उन्होंने उनके घर और दफ्तर को तहस-नहस कर डाला। उन्होंने कहा कि उनकी एक ही गलती है कि वे भाजपा कार्यकर्ता हैं। अभिजीत सरकार ने बताया था कि वे कुत्तों से काफी प्यार करते थे।

उन्होंने कई बेसहारा कुत्तों को पाला था, जिनका कोई नहीं था। उनमें से एक मादा कुत्ते ने कुछ बच्चों को भी जन्म दिया था। अभिजीत सरकार ने उस कुत्ते की तरफ इशारा करते हुए कहा कि गुंडों ने इसके बच्चों को भी नहीं बख्शा और उन सभी को मार डाला। उन्होंने रोते-रोते इन हरकतों के बारे में बताया। एक अन्य वीडियो में उन्होंने बताया कि उनके घर और NGO दफ्तर को तोड़ डाला गया है। कुत्ते के 5 बच्चे को मार डाला गया।

उन कुत्तों के बच्चों की तस्वीरें अभिजीत सरकार ने अपने फेसबुक हैंडल से शेयर की थी। उन्होंने बताया कि कोलकाता के बेलिहाता में वॉर्ड संख्या 30 से हिंसा की शुरुआत हुई और परेश पॉल व स्वप्न समंदर जैसे तृणमूल नेताओं के नेतृत्व में ये सब हुआ। अभिजीत सरकार ने फेसबुक के वीडियो के माध्यम से पूछा कि क्या ये लोग मनुष्य भी हैं? उन्होंने पूछा कि उन्हें क्यों नुकसान पहुँचाया जा रहा है, उनकी क्या गलती है?

अभिजीत ने कहा था कि उन्हें किसी भी पार्टी के जीतने से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन बेरहम तरीके से उनके घर को ध्वस्त किया जा रहा है। इन दोनों वीडियो के अपलोड करने के बाद पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी गई। कई भाजपा कार्यकर्ताओं ने विभिन्न माध्यमों से डर जताया है कि ममता के तीसरी बार सत्ता में लौटने से उनका जीना दूभर हो सकता है और उनकी जान को TMC वालों से खतरा हो सकता है।

दो मई को ही हल्दिया में शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर भी हमला किया गया था। न्यूज 18 की पत्रकार पायल मेहता ने ट्विटर पर शुभेंदु अधिकारी के कार पर हुए हमले का वीडियो शेयर किया था। उन्होंने टीएमसी के गुंडों द्वारा पत्रकारों पर हमले का भी वीडियो साझा किया। इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही। इसी तरह TMC उम्मीदवार सुजाता मंडल के हारने के बाद उनके समर्थक आग-बबूला हो गए और उन्होंने आरामबाग में भाजपा दफ्तर को फूँक डाला।

केंद्र से राजस्थान को मिले 1500 वेंटिलेटर, 10 माह से ज्यादातर डिब्बों में बंद, 230 रखे-रखे खराब: अब 1000 नए की डिमांड

कोरोना की दूसरी लहर देश में लोगों को तेजी से संक्रमित कर रही है। रोजाना कोरोना के नए मामले रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं। इसके बावजूद राजस्थान सरकार आँखें मूँदकर बैठी है और अपनी नाकामियों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है।

कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान को पीएम केयर फंड के तहत प्राप्त 1500 वेंटिलेटर में से ज्यादातर डिब्बों में बंद पड़े हैं। ये वेंटिलेटर राज्य सरकार को 10 महीने पहले मिले थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, इन 1,500 वेंटिलेटरों में से 230 खराब हैं। कोरोनो महामारी के बावजूद इनकी साल भर से ना तो रिपेयरिंग हुई है, ना ही इन्हें बदला गया है।

मालूम हो कि अब तक राजस्थान में 6,33,951 लोगों की कोविड-19 के लिए जाँच की जा चुकी है, जिसमें 1,89,178 एक्टिव मामले सामने आए हैं। वहीं अब तक कोरोना की वजह से राजस्थान में 4,558 लोग अपनी जान गँवा चुके हैं।

बताया जा रहा है कि जोधपुर में तो पीएम केयर फंड के 100 में से एक भी वेंटिलेटर को चालू नहीं किया गया है। इसके अलावा पहले से खरीदकर प्रदेश के अस्पतालों में लगाए गए 164 वेंटिलेटर भी काम नहीं कर रहे। वहीं, डॉक्टरों का कहना है कि मरीजों के हिसाब से अभी भी प्रदेश में 1000 और वेंटिलेटर्स की जरूरत है।

इसी तरह जयपुर के एसएमएस मेडिकल कॉलेज में आईसीयू में इस साल फरवरी में 50 वेंटिलेटर लगाए गए थे। हालाँकि, इन्हें कुछ दिनों पहले ही पहली बार इस्तेमाल में लाया गया था। पिछले 6 महीनों से यहाँ 18 अन्य वेंटिलेटर काम नहीं कर रहे हैं। इसी तरह, अन्य मेडिकल कॉलेजों में भी वेंटिलेटर खराब हैं। जयपुरिया में एक साल से 7 वेंटिलेटर, कांवटिया में 2, गणगौरी में 6 वेंटिलेटर खराब हैं।

कोटा में मेडिकल कॉलेजों को 138 वेंटिलेटर दिए गए थे। इनमें से 65 या तो स्थापित नहीं थे या इनमें कमी बताकर इन्हें हटा दिया गया था। उदयपुर के आरएनटी मेडिकल कॉलेज को 95 वेंटिलेटर मिले थे, जो एक साल तक स्टोर हाउस में बंद रहे। इनमें से 22 को ईएसआईसी हॉस्पिटल में इंस्टॉल किया गया, लेकिन ये बार-बार बंद हो गए। अंत में 5 अप्रैल, 2021 के बाद 32 वेंटिलेटर अपडेट किए गए।

इसके अलावा, अजमेर में 300 और भरतपुर में 60 वेंटिलेटर हैं, ये भी अस्पताल में स्थापित किए जा चुके हैं। बांसवाड़ा में 22 वेंटिलेटर्स में से 5, नागौर में 52 में से 16 वेंटिलेटर ही स्थापित किए गए हैं।

बता दें कि राजस्थान से पहले कॉन्ग्रेस शासित पंजाब में भी इस तरह की लापरवाही का मामला सामने आ चुका है। पंजाब में 250 वेंटिलेटर एक साल से गोदाम में पड़े थे। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल 20 मार्च को केंद्र सरकार ने राज्य में लगभग 30 करोड़ रुपए की लागत से 290 वेंटिलेटर भेजे थे। लेकिन राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने एक साल बाद भी इसका इस्तेमाल नहीं किया है। उसे गोदाम में बंदकर धूल जमने के लिए रखा गया।

इन वेंटिलेटर को मेडिकल कॉलेजों या अन्य कोविड सेंटर में भेजा जाना था, जहाँ पर L-3 केयर प्रदान किया जाता है। L-3 केयर उन मरीजों को दी जाती है, जिन्हें दो या दो से अधिक ऑर्गन सपोर्ट या मैकेनिकल वेंटिलेशन की आवश्यकता होती है। बताया गया कि मेडिकल कॉलेजों या कोविड सेंटरों से माँग इसलिए नहीं की गई, क्योंकि वेंटिलेटर पर मरीजों की देखभाल करने वाले कुशल मैन पावर की कमी थी।  

द ट्रिब्यून की रिपोर्ट में आगे कहा गया कि यह पहला मौका नहीं था जब राज्य के अस्पताल वेंटिलेटर का उपयोग करने में विफल रहे। पाँच साल पहले, 10 वेंटिलेटर सिविल अस्पताल, लुधियाना भेजे गए थे, लेकिन पाँच साल तक उनका इस्तेमाल नहीं किया गया था। बाद में विवाद होने और महामारी के बढ़ने पर एक स्थानीय निजी अस्पताल को वेंटिलेटर सौंपा गया। 

जहाँ संघ कार्यकर्ता के पूरे परिवार को रेता, जहाँ आजादी पर लहराया था पाकिस्तानी झंडा; हर जगह TMC जीती

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में लगातार तीसरी बार तृणमूल कॉन्ग्रेस ने जीत हासिल की है। बीजेपी ने भी 2016 के तीन सीटों के मुकाबले इस बार 77 सीटें जीती है। इन चुनावों में बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाकों में वोटिंग का एक खास पैटर्न नजर आता है। इसका सीधा फायदा टीएमसी को मिला है। मसलन, मुर्शिदाबाद जिले की भागाबंगोला सीट। कभी हिंदू बहुल इस इलाके में अब मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। इसका सबसे बड़ा कारण बांग्लादेश से घुसपैठ कर आए लोगों का यहाँ बसना माना जाता है।

भागाबंगोला सीट से तृणमूल कॉन्ग्रेस के इदरिस अली को डेढ़ लाख से ज्यादा वोट मिले। यह कुल वोटों का 68 फीसदी से भी ज्यादा है। उनके प्रतिद्वंद्वी बीजेपी के मुस्लिम उम्मीदवार महबूब आलम को 7.39 फीसदी यानी महज 16707 वोट ही मिले। बीजेपी से ज्यादा मत तो बंगाल चुनावों में खाता भी न खेल पाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को मिले। उसके उम्मीदवार मोहम्मद कमल हुसैन को 21 फीसदी से ज्यादा मत यानी 47 हजार से अधिक वोट मिले।

भागाबंगोला सीट पर 1971 के बाद से कोई भी हिंदू उम्मीदवार कभी नहीं जीता है। संयोग से यह वही साल है जब बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी का बांग्लादेश से पश्चिम बंगाल में आना शुरू हुआ था।

इस इलाके में हुई थी आरएसएस कार्यकर्ता की नृशंस हत्या

भागाबंगोला से जीते टीएमसी के इदरिस अली 2007 में तस्लीमा नसरीन के कोलकाता आगमन पर पार्क सर्कस इलाके में हुए दंगे के मामले में गिरफ्तार हुए थे। उन दंगों में हिंदुओं की आबादी को निशाना बनाया गया था। इस इलाके में मुस्लिमों के दबदबे के अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीजेपी ने भी यहाँ से सीपीएम के एक पूर्व मुस्लिम उम्मीदवार को ही उतारा था।

संयोग से भागाबंगोला वही सीट है जहाँ दो साल पहले राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़े और पेशे से शिक्षक प्रकाश पाल और उनकी गर्भवती पत्नी और छह साल के मासूम बेटे की घर में घुसकर धारदार हथियारों से नृशंस हत्या कर दी गई थी। सत्ताधारी टीएमसी द्वारा इस मामले को संपत्ति विवाद घोषित करते हुए राजनीतिक हत्या पर पर्दा डाल दिया गया था। ये ममता बनर्जी की टीएमसी ही थी, जिसने इदरिस अली के ऊपर लगे दंगे के आरोपों को हटाते हुए उन्हें अपनी पार्टी का टिकट दिया था।

बांग्लादेशी सीमा से सटे मुस्लिम इलाकों के इस वोटिंग पैटर्न का विश्लेषण ट्विटर यूजर @BharadwajSpeaks ने सिलसिलेवार तरीके से की है।

रानीनगर

मुर्शिदाबाद जिले की एक और सीट रानीनगर से आज तक कोई भी हिंदू उम्मीदवार कभी नहीं जीता। 2021 विधानसभा चुनावों में इस सीट से किसी भी हिंदू उम्मीदवार ने चुनाव नहीं लड़ा। बीजेपी ने भी इस सीट से मुस्लिम उम्मीदवार (मसुआरा खातून) को उतारा था, लेकिन उन्हें मुश्किल से 10% वोट (21 हजार वोट) ही मिल सके। इस सीट पर 60 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करके तृणमूल के अब्दुल सौमिक हुसैन जीते।

हरिहरपारा

मुर्शिदाबाद जिले की एक और सीट है हरिहरपारा। यहाँ 1947 में देश के आजाद होने पर पाकिस्तानी झंडा लहराकर जश्न मनाया गया था। इस सीट से भी कभी कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है। 2021 विधानसभा चुनावों में हरिहरपारा से टीएमसी के नईमत शेख ने 47 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करते हुए आसान जीत दर्ज की।

जलाँगी

मुर्शिदाबाद के जलाँगी में आजादी के बाद से ही बड़ी संख्या में अवैध प्रवासियों का आना शुरू हो गया था। इस सीट पर 1972 के बाद से ही कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में इस सीट से टीएमसी के टिकट पर लड़े अब्दुर रज्जाक ने 55 फीसदी मत (कुल 1.23 लाख वोट) हासिल करते हुए जीत हासिल की।

दोमकल

कुछ ऐसा ही हाल मुर्शिदाबाद जिले की दोमकल सीट का भी है। इस सीट से भी अब तक कोई हिंदू कभी चुनाव नहीं जीत सका है। 2021 विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने भी मुस्लिम उम्मीदवार उतारा था, लेकिन वह 5 फीसदी मत (कुल 12 हजार वोट) ही हासिल कर सका। इस चुनाव में इस सीट से कोई भी हिंदू मैदान में नहीं उतरा था। यहाँ से टीएमसी के जफिकुल इस्लाम ने 56 फीसदी (1.27 लाख वोट) से अधिक मत हासिल करते हुए जीत हासिल की।

अवैध बांग्लादेशी मुस्लिमों के आने से बढ़ा आतंकवाद का नेटवर्क

2011 की जनगणना के मुताबिक, मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों की जनसंख्या 55 से बढ़कर 66 फीसदी हो गई, जबकि हिंदुओं की आबादी 44 से घटकर महज 33 फीसदी रह गई। लेकिन जनसंख्या के आँकड़ों से एक सबसे जरूरी बात पता नहीं चलती और वह है कि जनसंख्या में कमी के साथ, हिंदू पूरी तरह से राजनीतिक हाशिए पर चले गए हैं।

बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों के आने से आंतकवाद बढ़ने, हिंदुओं के खिलाफ हिंसा में बढ़ोतरी भी देखने को मिली है। मुर्शिदाबाद से पिछले साल एनआईए ने अलकायदा आतंकी को गिरफ्तार किया था।

मालदा में भी मुर्शिदाबाद जैसा ही वोटिंग पैटर्न

मालदा पश्चिम बंगाल का एक और जिला है जहाँ बांग्लादेश से बड़ी संख्या में मुस्लिमों के आने से हिंदू अल्पसंख्यक रह गए हैं। यहाँ मुस्लिमों की आबादी 1961 के 36% से बढ़कर 2011 में 51% हो गई। यहाँ पर हिंदू आबादी 63 फीसदी से घटकर 48 फीसदी रह गई है। अब मालदा एक मुस्लिम बहुल जिला है।

मालदा में भी वोटिंग का पैटर्न मुर्शिदाबाद जैसा ही है। सुजापुर मालदा की सीट है, जहाँ अवैध प्रवासियों के आने से यहाँ की जनसांख्यिकीय बदल गई है। यहाँ 1962 से ही कोई हिंदू चुनाव नहीं जीता है और इस बार कोई हिंदू यहाँ चुनाव लड़ा ही नहीं। बीजेपी ने यहाँ से मुस्लिम उम्मीदवारा उतारा, लेकिन उन्हें महज 6 फीसदी मत ही मिले।

हरिश्चंद्रपुर मालदा की एक सीट है, जहाँ से हिंदुओं का बड़ी संख्या में पलायन हुआ है। यहाँ हिंदू आबादी घटकर 31 फीसदी रह गई है। 2021 के चुनावों में यहाँ से टीएमसी के तजमुल हुसैन ने जीत हासिल की, जबकि बीजेपी मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर भी हारी।

मलातीपुर भी मालदा की एक सीट है जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी आएँ हैं। इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम आबादी बढ़कर 72% हो गई है। इस सीट से टीएमसी के अब्दुर रहीम बोक्सी ने जीत हासिल की, जिन्होंने खुले तौर पर ऐलान किया था कि उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल को रोहिंग्याओं से भर देगी।

ओवैसी की पार्टी AIMIM ने भी यहाँ से अपना उम्मीदवार उतारा था, जिसे कुछ लोगों ने मुस्लिम मतदाताओं को बाँटने की कोशिश के तौर पर बीजेपी का छिपा हुआ मास्टरस्ट्रोक करार दिया था। लेकिन ओवैसी की पार्टी मुस्लिम बहुल इलाके में एक फीसदी वोट भी हासिल नहीं कर पाई।

‘बाबरी टूटने से कहर, राम मंदिर के कारण कोरोना से मर रहे लोग’: राजस्थान में कचरे की गाड़ी पर बज रहा था हिंदूफोबिक धुन

राजस्थान के कोटा में कचरे उठाने वाली गाड़ी से एक ऐसा ऐलान सुनाया जा रहा था जिससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता था। आरोप है कि गाड़ी से जो हिन्दू-विरोधी धुन बजाई जा रही थी, वो कॉन्ग्रेस के नगर निगम पार्षद ने डलवाई है। राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार से माँग की जा रही है कि वह जाँच कर कार्रवाई करे। इस गाड़ी की माइक से बाबरी मस्जिद और राम मंदिर का नाम लेकर भड़काऊ बातें की जा रही थी।

DD न्यूज़ के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव की मानें तो उन्होंने इस वीडियो की पुष्टि की है और इसे सही पाया। उन्होंने कहा कि इसका पूरे 4 मिनट का वीडियो उनके पास है, जिसमें कचरे की गाड़ी से कहा जाता है, “भारत में कोरोना महामारी में लोग इसलिए मर रहे हैं क्योंकि बाबरी मस्ज़िद तोड़ी गई और अदालत ने वहाँ राम मंदिर बनाने की अनुमति दे दी।”

इस गाड़ी पर लिखा था: जोन- विज्ञान नगर, सेक्टर- 14। साथ ही इस पर ‘वॉर्ड नंबर 29 और रूट संख्या 1’ भी लिखा हुआ था। गाड़ी पर ‘जमादार’ का नाम अशोक और साथ ही उसका फोन नंबर भी दर्ज था। गाड़ी चालक से जब पूछा जाता है ये ट्यून किसने लगवा रखी है तो वह किसी रोहित का नाम लेता है। कुछ लोगों ने इस गाड़ी को रुकवा कर पूछताछ की। माइक से आवाज़ आती है, “भाइयो, ध्यान से सोचिए और समझिएगा। बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के कारण भारत में कहर बरप रहा है।”

‘दैनिक भास्कर’ के स्थानीय संस्करण में प्रकाशित खबर

कचरे की गाड़ी की माइक से आगे कहा जाता है, “भारत में अचानक इतनी मौतें क्यों हो रही हैं, इसे ध्यान से समझने की कोशिश कीजिए। जब से सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर को लेकर फैसला सुनाया है, तभी से भारत के लोग चैन से नहीं हैं।” स्थानीय DSP अंकित जैन ने बताया कि आपत्तिजनक भाषण चलाने वाले दोनों ठेका कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले की जाँच की जा रही है कि ये वीडियो किसने बनाया और प्रचारित करवाया।

ये मामला कोटा दक्षिण नगर निगम क्षेत्र का है। गाड़ी के चालक दीपक और भड़काऊ वीडियो भेजने वाले जसविंदर को गिरफ्तार कर लिया गया है। ठेकेदार ने इन दोनों को नौकरी से भी निकाल दिया है। इस गाड़ी का नंबर RJ-20 4739 है। ये दादाबाड़ी क्षेत्र में कचरा कलेक्शन कर रहा था। रोहित सुपरवाइजर है, जिसने पूछताछ में बताया कि जसविंदर नामक एक अन्य चालक ने ग्रुप में इस वीडियो को डाला था।

स्थानीय भाजपा विधायक संदीप शर्मा ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि ये एक साजिश के तहत किया गया है और दोषियों को पकड़ कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। कोटा दक्षिण के महापौर राजीव अग्रवाल ने बताया कि इंस्पेक्टर और जमादार को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर दिया गया है। नगर निगम ने निर्णय लिया है कि अब कचरे वाला जिंगल सिर्फ पेनड्राइव से ही बनाई जाएगी, व्हाट्सएप्प या ब्लूटूथ से नहीं।

महाराष्ट्र में MVA को बड़ा झटका, भाजपा ने छीनी NCP की सीट: कर्नाटक की बेलगाम LS सीट पर भी BJP का कब्ज़ा

देश में 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गए है। पुडुचेरी और तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन हुआ तो केरल, पश्चिम बंगाल और असम में सत्ताधारी दलों पर ही जनता ने भरोसा जताया। भाजपा ने असम जीत कर उत्तर-पूर्व का गढ़ और मजबूत किया। साथ ही पुडुचेरी से सुदूर दक्षिण में एंट्री ली। CPI(M) केरल तो TMC पश्चिम बंगाल बचाने में कामयाब रही। तमिलनाडु में DMK के स्टालिन पहली बार मुख्यमंत्री बनेंगे।

लेकिन, इन 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों के अलावा अन्य राज्यों में भी लोकसभा व विधानसभा की कुछ सीटों पर उपचुनाव हुए थे। आंध्र प्रदेश, केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में हुए लोकसभा उपचुनावों में उन्हीं पार्टियों को सफलता मिली, जिनका इन सीटों पर पहले से ही कब्ज़ा था। इसके अलावा विधानसभा उप-चुनावों में भी अधिकतर दलों ने अपनी सीटें बचा लीं। लेकिन, सबसे तगड़ा झटका महाराष्ट्र की ‘महा विकास अघाड़ी (MVA)’ सरकार को लगा।

महाराष्ट्र के सोलापुर में चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पंढरपुर विधानसभा क्षेत्र में MVA को भाजपा ने झटका दिया। यहाँ से भाजपा के समाधान अवताडे महादेव ने NCP के भगीरथ भालके को 3733 वोटों से हराया। भगीरथ भालके दिवंगत NCP विधायक भरत भालके के पुत्र हैं। अवताडे को जहाँ 109450 (48.15%) वोट मिले, भालके 105717 (46.51%) वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे। भरत भालके की मौत दिसंबर 2020 में कोरोना के कारण हुई थी।

गुजरात के मोरवा हदफ़ विधानसभा क्षेत्र में चुनाव हुए, जिसे भाजपा ने आसानी से जीत लिया। झारखंड के मधुपुर में सत्ताधारी JMM ने जीत दर्ज की। कर्नाटक के बसवकल्याण सीट पर भाजपा तो मस्की सीट कॉन्ग्रेस के खाते में गई। मध्य प्रदेश की सामोह सीट कॉन्ग्रेस के खाते में गई। मिजोरम की सेरछिप सीट ‘ज़ोराम पीपल्स मूवमेंट (ZPM)’ के खाते में गई, जो कॉन्ग्रेस की गठबंधन साथी है। राजस्थान की राजसमंद सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की।

तेलंगाना के नागार्जुन सागर विधानसभा सीट पर सत्ताधारी TRS का ही कब्ज़ा रहा। उत्तराखंड की साल्ट सीट पर भाजपा के महेश जीना ने जीत दर्ज की। लोकसभा उपचुनाव की बात करें तो आंध्र प्रदेश की तिरुपति सीट से YRSCP ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। कर्नाटक के बेलगाम भाजपा के खाते में आया। केरल की मल्ल्पुरम सीट ‘इंडियन मुस्लिम लीग (IUML)’ के खाते में गया। तमिलनाडु की कन्याकुमारी सीट पर कॉन्ग्रेस ने आसान जीत दर्ज की।

असम ने CAA विरोधी एजेंडे को नकारा, कानून के विरोध में बने 3 दलों में से 2 का खाता भी नहीं खुला

एक तरफ पश्चिम बंगाल की जनता ने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को स्पष्ट जनादेश देकर हैरान कर दिया है, क्योंकि ज्यादातर पोल पंडित राज्य में कड़े संघर्ष का अनुमान लगा रहे थे। दूसरी तरफ, असम विधानसभा चुनाव के नतीजे उम्मीदरों के अनुरुप रहे हैं। करीब-करीब 2016 के चुनावी नतीजों जैसे ही।

इस बार 126 सदस्यीय असम विधानसभा में बीजेपी को अकेले 60 और उसकी अगुवाई वाली एनडीए को 75 सीटें मिली है। एनडीए में बीजेपी के अलावा असम गण परिषद् (AGP) और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (UPPL) शामिल है। वहीं कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 50 सीटें मिली है। इस नतीजे ने न केवल राज्य में बीजेपी की सत्ता बरकरार रहने के पुर्वानुमानों को सही साबित किया है, बल्कि मतदाताओं ने सीएए विरोधी एजेंडे को भी नकार दिया है।

सीएए विरोधी एजेंडे की आड़ लेकर असम की सत्ता से बीजेपी को बेदखल करने के लिए विधानसभा चुनाव से पहले तीन नए राजनीतिक दलों का गठन किया गया था। पिछले साल सितंबर में दो कथित छात्र संगठनों ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) और असम जातीयतावादी युवा छात्र परिषद (AJYCP) के नेता साथ आए और असम जातीय परिषद का गठन किया। एएएसयू के पूर्व अध्यक्ष लुरिनज्योति इस पार्टी के मुखिया बनाए गए।

1985 में असम गण परिषद (एजीपी) के गठन के पीछे भी AASU और AJYCP थी। एजीपी दो बार असम की सत्ता में रही है और मौजूदा एनडीए में शामिल। इन दोनों संगठनों का राज्य में जमीनी स्तर पर सांगठनिक ढाँचा है। वर्ष 2019-20 में असम में सीएए के विरोध में हुए प्रदर्शनों में आसू सबसे आगे थी।

विधानसभा चुनाव से पहले असम में सीएए विरोध के नाम पर बनने वाली दूसरी पार्टी रायजोर दल थी। रायजोर दल ‘आत्मनिर्भर असम’ के स्लोगन के साथ इस चुनाव में उतरा था। रायजोर दल (आरडी) का गठन कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) के प्रमुख अखिल गोगोई ने किया था। अखिल गोगोई पर आरोप है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ उन्होंने हिंसक विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था। उन्हें दिसंबर, 2019 में UAPA एक्ट के तहत गिरफ्तार किया गया था।

असम में तीसरी पार्टी आंचलिक गण मोर्चा (एजीएम) थी, जिसका गठन पूर्व पत्रकार और राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां ने किया था। आंचलिक गण मोर्चा ने कॉन्ग्रेस पार्टी की अगुवाई वाले सात दलों के महागठबंधन में शामिल होने का फैसला किया था। विधानसभा चुनाव में उन्होंने केवल एक सीट पर लड़ने का फैसला किया था। दरअसल, पार्टी ने दो सीटों के साथ एक सूची जारी की थी, लेकिन बाद में देखा गया कि कॉन्ग्रेस ने उसी सीट से अपने दिसपुर के उम्मीदवार को खड़ा कर दिया था। इसलिए, उन्होंने केवल बोकाखाट विधानसभा सीट से ही चुनाव लड़ा था।

एजेपी और रायजोर दल को भी कॉन्ग्रेस, एआईयूडीएफ और वाम दलों के महागठबंधन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने इनके साथ आने से मना कर दिया। दरअसल, AIUDF की उपस्थिति का मतलब था कि वे इसमें शामिल नहीं हो सकते थे। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि वे (एजेपी और रायजोर दल) सीएए का यह कहते हुए विरोध कर रहे थे कि वो किसी भी विदेशी को नागरिकता नहीं देना चाहते हैं, जो सीएए में मुसलमानों को शामिल करने की कॉन्ग्रेस और एआईयूडीएफ की माँग के विपरीत था। बाद में, असम जातीय परिषद और रायजोर दल ने एनडीए और महागठबंधन के खिलाफ अपना खुद का गठबंधन बनाने का निर्णय किया था।

हालाँकि, इन सबके बावजूद सर्बानंद सोनोवाल और हिमंत बिस्वा सरमा को राज्य में बड़ी जीत मिली है। कोई भी पार्टी NDA सरकार की लोकप्रियता में सेंध नहीं लगा पाई। वहीं, कुछ राजनीतिक विश्लेषकों ने भविष्यवाणी की थी, या यूँ कहें की उन्हें पूरी उम्मीद थी कि ये नए विरोधी दल CAA को लेकर भाजपा के वोटों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगे। यह भी कहा जा रहा था कि अपर असम में सीएए विरोध हावी है और वहाँ दोनों नई पार्टियों की मजबूत स्थिति है।

एजेपी ने लगभग 70 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि रायजोर दल ने लगभग 34 सीटों पर चुनाव लड़ा था। लेकिन रविवार (2 मई 2021) को जो नतीजे सामने आए हैं, उससे दोनों के हाथ केवल निराशा लगी है। वहीं, एआईयूडीएफ ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की है। इसके अलावा एजीपी को 9, बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट को 4, सीपीआई (एम) को एक, निर्दलीय को 1 और यूनाइटेड पीपल्स पार्टी, लिबरल को 6 सीटें हासिल हुई हैं।

रायजोर दल का गठन करने वाले अखिल गोगोई ने असम की शिवसागर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की है। हालाँकि, उनको यह जीत सीएए के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने के चलते हासिल नहीं हुई है, उनकी इस जीत के पीछे कई अन्य कारक हैं। इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारक लोगों में उनके प्रति सहानुभूति माना जा रहा है, क्योंकि वह चुनाव के दौरान जेल में बंद थे। हालाँकि अप्रैल में एक विशेष अदालत ने गोगोई को जमानत दे दी थी। गोगोई पिछले एक दशक से असम की राजनीति में सक्रिय हैं और कई आंदोलन कर चुके हैं। शिवसागर में वह काफी लोकप्रिय हैं।

शिवलिंग पर कंडोम, बीफ फेस्टिवल और हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान: 5 ‘बदजुबान’ जिन्हें जनता ने चटाई धूल

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम आ गए हैं। भाजपा ने असम और पुडुचेरी में जीत दर्ज की है। पश्चिम बंगाल में TMC तो केरल में लेफ्ट सत्ता बचाने में सफल रहा है। तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन हुआ और DMK को जीत मिली। इन चुनावों में कुछ ऐसे नेताओं को हार मिली है, जो राजनीति से ज्यादा अपनी बदजुबानी के लिए चर्चा में आए थे। यहाँ हम ऐसे 5 हिन्दू विरोधी नेताओं के चुनाव परिणाम पर चर्चा करेंगे।

सबसे पहले बात बंगाली अभिनेत्री सायोनी घोष की, जिन्हें TMC ने आसनसोल दक्षिण से उम्मीदवार बनाया था। वहाँ उन्हें 4487 वोटों से हार मिली। जहाँ भाजपा उम्मीदवार अग्निमित्र पॉल 87,881 (45.13%) वोट पाने में कामयाब रहे, सायोनी को 83,394 (42.82%) वोट मिले। उन्होंने शिवलिंग को कंडोम पहनाते हुए एक तस्वीर शेयर कर भगवान शिव का मजाक बनाया था। हिन्दू भावनाओं को आहत करने के आरोप में उन पर FIR भी हुई थी।

इसी तरह केरल में कॉन्ग्रेस की बिंदु कृष्णा ने ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन किया था। उन्हें कोल्लम से उम्मीदवार बनाया गया था। मई 2017 में जब केंद्र सरकार ने हत्या के लिए जानवरों के बाजार से खरीद-बिक्री पर पाबंदी लगाई थी, तब केरल के विभिन्न इलाकों में इस तरह के ‘बीफ फेस्ट’ हुए। बिंदु कृष्णा ने कहा था कि पीएम मोदी को डिलीवर करने के लिए ‘स्वादिष्ट बीफ’ को पैक कर हेड पोस्ट ऑफिस में भेजा जाएगा।

कोल्लम की बात करें तो यहाँ काँटे की टक्कर में जहाँ बिंदु कृष्णा को 56,452 (43.27%) वोट मिले, CPI(M) के एम मुकेश 58,524 (44.86%) मत पाकर विजयी हुए। इस तरह से ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन वाली बिंदु कृष्णा 2072 वोटों से हार गईं।

इस सूची में एक और उम्मीदवार हैं पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की सुजाता खान, जिन्होंने दलितों पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि अनुसूचित जाति (SC) के लोग भिखारी होते हैं। उन्हें आरामबाग से उम्मीदवार बनाया गया था, जहाँ उनकी हार के बाद भाजपा के दफ्तर को जला डाला गया। भाजपा के मधुसूदन बाग़ ने 1,03,108 (46.88%) वोट पाकर 95,936 (43.62%) वोट पाने वाली सुजाता को 7172 मतों से हराया।

इसी तरह केरल के विधायक एम स्वराज ने भगवान अयप्पा पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। वो अपनी सीट भी नहीं बचा पाए। वे ‘डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI)’ के राज्य सचिव भी हैं। उन्होंने कहा था कि भगवान अयप्पा की 2018 में मल्लिकापुरम से शादी हुई है, इसलिए सबरीमाला मंदिर में कोई भी जा सकता है। वो त्रिपुनिथुरा में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के बाबू से 992 वोटों से हार गए।

इस सूची में एक नाम भाजपा के एक नेता का भी है, जिन्होंने कहा था कि बीफ भारत का ‘राष्ट्रीय भोजन’ है। असम के गौरीपुर से उम्मीदवार बनेन्द्र कुमार मुशहरी तब भी हार गए हैं, जब राज्य में उनकी ही पार्टी ने सत्ता में वापसी की है। उनकी बुरी हार हुई है। बनेन्द्र को जहाँ 63,349 (34.48%) वोट मिले, AIDUF के निज़ानुर रहमान को 1,12,194 (61.07%) वोट प्राप्त हुए। इस तरह 48,845 वोटों के अंतर से बनेन्द्र की हार हुई।

बंगाल में खून-खराबे का नया दौर: हत्या, लूट, आगजनी… नंदीग्राम वाले शुभेंदु और पत्रकारों को भी नहीं छोड़ा

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के बहुमत में आते ही हिंसा का दौर फिर से शुरू हो गया है। राज्य में TMC ने 213 तो भाजपा ने 77 सीटें जीती हैं। लेकिन, काँटे की टक्कर में भाजपा के शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नंदीग्राम में 1956 वोटों से हरा दिया। तृणमूल समर्थक इस हार से आग-बबूला हो गए और उन्होंने हल्दिया में शुभेंदु अधिकारी के काफिले पर हमला कर दिया।

इसके अलावा कई अन्य जगहों से भी भाजपा कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने की खबरें आई हैं। बेलिहाता विधानसभा क्षेत्र में भाजपा के 30 वर्षीय कार्यकर्ता अभिजीत सरकार की पीट पीटकर हत्या कर दी गई। पत्रकारों को भी निशाना बनाने की खबरें हैं। न्यूज 18 की पत्रकार पायल मेहता ने ट्विटर पर शुभेंदु अधिकारी के कार पर हुए हमले का वीडियो शेयर किया है। उन्होंने टीएमसी के गुंडों द्वारा पत्रकारों पर हमले का भी वीडियो साझा किया है। इस दौरान पुलिस मूकदर्शक बनी रही।

शुभेंदु पर हमला तब हुआ, जब वे काउंटिंग सेंटर से निकल रहे थे। हमले का आरोप TMC कार्यकर्ताओं पर लगा है। पार्टी ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर नंदीग्राम में वोटों की फिर से गणना करने की माँग भी की है। शुभेंदु की गाड़ी का पीछा कर रहे बदमाश गालियाँ भी बक रहे थे। खुद शुभेंदु अधिकारी ने भी इस हमले का वीडियो शेयर करते हुए लिखा कि जब एक जनप्रतिनिधि पर ऐसा हमला हो सकता है तो आम आदमी की व्यथा के बारे में सोचिए।

शुभेंदु ने कहा कि ये राज्य में बदले और हिंसा का माहौल बनाने का एक घृणित प्रयास है। उधर मतगणना वाली शाम ही आरामबाग में भाजपा के दफ्तर को ही आग के हवाले कर दिया गया। भाजपा की स्थानीय यूनिट का आरोप है कि वहाँ से TMC उम्मीदवार सुजाता मंडल के हारने के बाद उनके समर्थक आग-बबूला हो गए और उन्होंने भाजपा दफ्तर को फूँक डाला, जबकि ममता बनर्जी का कहना है कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने उनके उम्मीदवार को खदेड़ा और सिर पर वार किया।

इसके अलावा बिशुनपुर में एक भाजपा के पोलिंग एजेंट के घर को भी आग के हवाले कर दिया गया। बेलघाटा में भाजपा उम्मीदवार काशीनाथ विश्वास के घर और गाड़ियों को फूँक दिया गया। उन्होंने इस घटना के पीछे तृणमूल कार्यकर्ताओं का हाथ बताया है। आसनसोल में भी TMC कार्यकर्ताओं के गुस्से का ठीकरा वहाँ के एक भाजपा दफ्तर पर ही फूटा, जिसे तहस-नहस कर दिया गया। वहाँ भाजपा कार्यकर्ता भी निशाना बने। कुछ जगहों पर बीजेपी समर्थकों के दुकानों में लूटपाट भी की गई।

भाजपा नेताओं ने कहा है कि इस तरह की घटनाएँ अगले 5 सालों के लिए और ज्यादा भय पैदा करती हैं, क्योंकि सत्ता के संरक्षण में ऐसी हरकतें बार-बार की जाएगी। हालाँकि, TMC ने कहा है कि ये उनके कार्यकर्ताओं का काम नहीं है और भाजपा ही बौखलाहट ये सब कुछ कर रही है। भाजपा और तृणमूल का अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से भी मिला। ये सब तब हो रहा है, जब ECI ने नतीजों का जश्न मनाने पर रोक लगा रखी है।

इन नतीजों के आगे जहाँ और भी हैं… आखिर भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या?

एक बार फिर लोकतंत्र में लोगों की आस्था बनी रह गई है! ईवीएम की खराबी अब बीते दिनों की बात है। मोदी-शाह के अश्वमेध के बगटूट घोड़े को बंगाल की दीदी ने थाम लिया है। ऐसी कुछ हेडलाइंस, ऐसे कुछ स्लग्स, ऐसे कुछ विश्लेषण अगले एकाध दिनों तक देखने को मिलने की संभावना है।

यह वैसे मज़े की बात है कि पाँच राज्यों के चुनाव में से दो में भाजपा या भाजपा नीत गठबंधन पूरे बहुमत से मज़े से सरकार बनाने जा रही है। एक राज्य में उसने तगड़ी एंट्री मारी है। लेकिन चर्चा केवल बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सीटों की ही हो रही। वह भी तब, जब पिछले विधानसभा चुनाव में महज 10 फीसदी वोट और तीन सीटें पानेवाली भाजपा इस बार लगभग 38 फीसदी वोट और 80 सीटों के साथ दमदार विपक्ष बनकर उभरा है।

यह भी ध्यान देने की बात है कि असम में तमाम दम झोंकने के बावजूद कॉन्ग्रेस की दाल नहीं गली और भाजपा ने धमाकेदार वापसी की है। वहाँ मुस्लिम जिहादियों के साथ गठबंधन का भी कॉन्ग्रेस को फायदा नहीं मिला और भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। पुडुचेरी में भाजपा नीत गठबंधन की सरकार बनेगी और तमिलनाडु में भाजपा ने अपनी शुरुआत कर दी है। केरल में भी मेट्रो मैन श्रीधरन भले हार गए हों, पर भाजपा की धमक तो दिखने लगी है।

बंगाल की बात करें, तो ‘दीदी’ के खाते में एक पूर्ण बहुमत की सरकार आई है, लेकिन नंदीग्राम के नतीजे बताते हैं कि जनता उनसे किस तरह ऊब चुकी है। यह टीवी मीडिया और छद्म बुद्धिजीवियों की बनाई दुनिया थी, जिसने भाजपा का सब कुछ बंगाल में दाँव पर लगा हुआ बता दिया। भाजपा के पास बंगाल में खोने को था ही क्या? उसकी तीन से 80 सीटों की यात्रा बताती है कि भाजपा ने बंगाल में उम्मीदों से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है।

बंगाल के नतीजों से अगर हम त्वरित आकलन निकालने की चेष्टा करें तो यही कह सकते हैं कि ममता बनर्जी के गुंडों की धांधली और बेशर्म तुष्टिकरण ही आखिरकार उनके काम आया है। जिन सीटों पर भी मुस्लिम जनसंख्या प्रभाव डालनेवाली थी, वहाँ टीएमसी की जोरदार जीत हुई है। कॉन्ग्रेस और लेफ्ट का जिस तरह सफाया हुआ है, उस पर कोई बात ही करने को तैयार नहीं है। वामपंथी जहाँ 5 फीसदी वोटों और शून्य सीटों पर सिमट गए, तो कॉन्ग्रेस तीन फीसदी के बाद भी खाता खोलते नहीं दिख रही।

जाहिर है कि वोटों का यह बटखरा सीधे तौर पर तृणमूल के पक्ष में गया और उसने पलड़े को झुका दिया। हिंदू वोट हमेशा की तरह ध्रुवीकृत नहीं हुए और उसका भाजपा को नुकसान हुआ, जबकि मुसलमानों ने हमेशा की तरह निगेटिव वोटिंग की, भाजपा को हराने के लिए एकजुट हुए।

ममता बनर्जी ने खुलेआम जब मुस्लिम वोटर्स का आह्वान किया कि केवल उनको ही वोट दें, तो उसका फायदा भी उनको ही मिलना था। यह इस देश का विचित्र हाल है कि अगर आप मुस्लिम वोटों का सीधे तौर पर बाँट-बखरा करें तो आप सेकुलर हैं, लेकिन हिंदुओं के अधिकार के लिए भी अगर किसी ने आवाज़ उठा दी तो वह सांप्रदायिक है।

लोकतंत्र में हार-जीत लगी रहती है, पर असल चुनौती तो अभी बंगाल की है। शायद बंगाल की जनता अभी नर्क के उस अनुभव से नहीं गुजरी है, जहाँ से असम के लोग दो-चार हो चुके हैं। टीएमसी के गुंडों ने नतीजों के आते ही आरामबाग में भाजपा कार्यालय को जलाकर आनेवाले भविष्य के संकेत दे ही दिए हैं। कमीशनखोरी, तोलेबाजी, हरेक केंद्रीय योजना में अड़ंगा अब बंगाल का नसीब होने वाला है, रोहिंग्या और अवैध बांग्लादेशी वहॉं हरेक दिन अब एक नया कश्मीर बनाएँगे।

कूचबिहार में जब जिहादी भीड़ ने सीआरपीएफ पर हमला किया औऱ उसमें चार जिहादियों के साथ एक हिंदू भी गोलीबारी में मारा गया, तो ममता बनर्जी ने उन जिहादियों के परिवारों से मंच से बात कर अपने मुस्लिम वोटर्स को बिल्कुल साफ संदेश दे दिया था। सोचना वहाँ के हिंदुओं को है, जो ममता के साथ गए हैं। हालाँकि, भाजपा एक मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी है, पर हिंदुओं को वह कितना बचा पाएगी, यह सोचने की बात है।

स्पष्ट है कि इन चुनावों में भाजपा का कोई सीधे तौर पर कोई नुकसान नहीं हुआ है। असम उसके पाले में है। पुडुचेरी में वह सरकार बना रही है। बंगाल में शानदार डेंट लगाया है और केरल-तमिलनाडु में अच्छी शुरुआत की है। यही इबारत दीवार पर भी लिखी नज़र आ रही है।

ISIS की एक और ब्रिटिश दुल्हन: शमीमा बेगम जैसी ही फिरदौस की कहानी, लौटना चाहती है घर

शमीमा बेगम के बाद ब्रिटेन की एक और आईएसआईएस (ISIS) दुल्हन का नाम सामने आया है। रविवार (मई 2, 2021) को डेली मेल में प्रकाशित खबर के मुताबिक, 31 वर्षीय फिरदौस जहाँ इन दिनों उसी सीरियाई रिफ्यूजी कैंप में रह रही हैं, जहाँ कभी आईएसआईएस दुल्हन के नाम से कुख्यात शमीमा बेगम रहती थी। अब फिरदौस भी शमीमा की तरह वापस ब्रिटेन लौटने की उम्मीद कर रही है। फिरदौस एक कंप्यूटर इंजीनियर और साइंस टीचर की बेटी है, जो पश्चिमी लंदन में पली-बढ़ी है।

पिछले महीने अल-रोज कैंप में तीन बच्चों की अम्मी जहाँ ने इंटरव्यू में बताया कि ब्रिटेन के गृह मंत्रालय ने उसकी नागरिकता छीन ली है। उसने बताया कि ब्रिटिश पति ने उसे धोखे से आईएस में शामिल करवाया था, जिसकी उसे जानकारी भी नहीं थी। अब वह उम्मीद कर रही है कि उसे ब्रिटेन वापस लौटने दिया जाएगा। उसने कहा, “यदि मेरे बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करते हैं और सामान्य जीवन जीते हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी। लेकिन अगर ब्रिटेन ने ऐसा नहीं करने का फैसला किया, तो मैं क्या कर सकती हूँ?”

जानकारी के मुताबिक फिरदौस ने 2015 में सीरिया भागने से पहले टेरेंस ले पेज से शादी की थी। बता दें कि टेरेंस ने शादी से पहले खुद को अबू खालिद बताया था। वह इराक के मोसुल शहर में मारा गया था। फिरदौस के आतंकी दुल्हन बनने को लेकर टेरेंस ले पेज के माता-पिता से भी पूछताछ की गई।

उन्होंने कहा कि फिरदौस ने ही उसे वहाँ जाने के लिए मनाया था और जब वो वहाँ पर गई थी तो उन लोगों को उनका आना पसंद नहीं आया था। 54 वर्षीय डोना ले पेज ने कहा, “वह उकसाने वाली थी, जिसे सुनकर मैं हतप्रभ रह गई। तुम मेरे बेटे को मेरे से दूर कैसे ले जा सकती हो।” इसके बावजूद, टेरेंस की माँ को उम्मीद है कि उनका परिवार ब्रिटेन में वापस आ सकता है। वह भी सिर्फ अपने 6, 5 और 3 साल के पोते के लिए।

दोस्तों और परिवार के लिए बीना के रूप में जानी जाने वाली फिरदौस जहाँ ट्विंचम (Twickenham) में पली-बढ़ी। लेकिन वह मुसलमानों और बाकी ब्रिटेनवासियों के बीच दीवार खड़ी करने वाले कुख्यात अंजुम चौधरी के नेतृत्व वाले प्रतिबंधित समूह अल-मुहाजिरून (ALM) में शामिल हो गई। ALM ने ही उसका धर्म परिवर्तन (हिंदू से मुस्लिम धर्म) कर टेरेंस ले पेज से निकाह करवाया था। बता दें कि टेरेंस एक मुस्लिम धर्म परिवर्तक था, जिसने अपने भाई के साथ मिलकर चरमपंथी समूह के लिए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।

रिपोर्ट के मुताबिक जहाँ जब दूसरी बार आठ महीने की गर्भवती थी, तब वह अपने पति के साथ सीरिया की यात्रा पर गई थी। लेकिन उसने बताया कि ले पेज ने उससे झूठ बोला कि यह तुर्की की एक रोमांटिक यात्रा थी। दरअसल, जब उसने अपने पति से कहा कि उसे अच्छा हनीमून नहीं मिला, इस पर उसने कहा कि वह अपना वादा पूरा करेगा, पर उसे क्या पता था कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है। जहाँ ने कहा कि वो उस पूरी यात्रा में सो रही थी, इसलिए इस बारे में कुछ नहीं जान पाई थी। मरने से कुछ समय पहले तक ले पेज जहाँ और अपने दोनों बच्चों के साथ आईएस खिलाफत की राजधानी रक्का में रहता था।

एक साल बाद, जहाँ ने अपने तीसरे बच्चे के पिता, कुर्दिश जिहादी से शादी की, जो दक्षिण-पूर्वी सीरियाई शहर मायादीन में एक हवाई हमले में मारा गया। उसकी मौत के बाद, वह आईएस के गढ़ बघौज में भाग गई, जहाँ उसे कुर्द बलों ने हिरासत में लिया और कैंप में भेज दिया।

गौरतलब है कि ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट ने आईएसआईएस दुल्हन के नाम से कुख्यात शमीमा बेगम को वापस लौटने की इजाजत देने से इनकार कर दिया था। इतना ही नहीं, कोर्ट ने उसके फिर से ब्रिटिश नागरिकता हासिल करने के लिए मुकदमा लड़ने की अनुमति देने से भी मना कर दिया था। बता दें कि बांग्लादेशी मूल की शमीमा बेगम फरवरी 2015 में 15 साल की उम्र में अपने दो दोस्तों के साथ आईएसआईएस में शामिल होने के लिए सीरिया चली गई थी।

साल 2019 में ISIS दुल्हन का नाम चर्चा में आया था, जब उसे सीरियाई कैंप में 9 महीने का गर्भवती पाया गया था। बच्चे की जन्म से साथ ही निमोनिया से मौत हो गई थी। शमीमा ने बताया था कि पहले भी उसके दो बच्चों की मौत हो चुकी थी।

फरवरी 2019 में सीरियाई शरणार्थी शिविर में शमीमा बेगम को पाए जाने के तुरंत बाद उसकी ब्रिटिश नागरिकता राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर रद्द कर दी गई थी। ब्रिटेन को डर था कि अगर यह फिर से वापस आती है तो इससे देश की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने शमीमा बेगम की याचिका के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।