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समलैंगिक संबंधों पर मनोवैज्ञानिक से ‘क्लास’ लेंगे हाई कोर्ट जज, कहा- शब्द दिमाग से नहीं दिल से निकलने चाहिए

समलैंगिक संबंधों के बारे में समझ बढ़ाने के लिए मद्रास हाई कोर्ट के एक जज ने मनोवैज्ञानिक से सलाह लेने का फैसला किया है। जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने कहा है कि समलैंगिक सेक्स के मामले में उनकी समझ अच्छी नहीं है। इसे समझने के लिए उन्होंने एक मनोवैज्ञानिक के साथ ‘शैक्षिक सत्र’ की योजना बनाई है। जज ने कहा कि इस साइको-एजुकेशन सेशन से उन्हें सेम सेक्स रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट समझने में मदद मिलेगी।

असल में जस्टिस वेंकटेश एक समलैंगिक जोड़े द्वारा दायर की गई एक याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। इस बीच उन्होंने समलैंगिक जोड़े से कहा कि उनके परिवार एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत करें और काउंसिलिंग सेशन में हिस्सा लें, ताकि एक-दूसरे को अच्छे से समझ सकें। समलैंगिक जोड़ों के सम्मान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कोर्ट को आगे भी कई फैसले सुनाने हैं, जिसमें इस सेशन से मदद मिलेगी।

समलैंगिक जोड़ों के सम्बन्ध में मद्रास हाई कोर्ट को दिशा-निर्देश जारी करने का निवेदन किया गया था, जिसके जवाब में जस्टिस वेंकटेश ने कहा कि इस मामले में वो और समय चाहते हैं। उन्होंने कहा कि शब्द उनके दिल से आने चाहिए, दिमाग से नहीं। यह तब तक संभव नहीं होगा जब तक वो इस मामले की पूरी समझ न रख लें। उन्होंने मनोविज्ञान शिक्षिका विद्या दिनाकरन से सुविधानुसार अपॉइंटमेंट देने को कहा है।

उन्होंने कहा कि एक बार वे इस मामले की समझ लेकर और शिक्षित होकर फैसला देंगे तो शब्द उनके दिल से निकलेंगे। इस मामले में उन्होंने एक NGO को समलैंगिक जोड़े की देखभाल की जिम्मेदारी सौंपी और उनके काउंसल से दोनों के माता-पिता से बात कर उनके बीच समझ विकसित करने को कहा। दोनों के परिवार ने इससे जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए समाज की सोच की बात की थी। कोर्ट ने कहा कि रातोंरात कुछ नहीं होगा, इसलिए थोड़ा समय देकर उनके मन में समलैंगिक जोड़े को लेकर सकारात्मक बात बिठाई जाए।

जिस समलैंगिक कपल की यहाँ बात हो रही है, उसमें दोनों महिलाएँ हैं। दोनों महिलाओं के परिजनों ने मिसिंग कंप्लेन दर्ज करवाई थी, जिसे बंद करने के लिए हाई कोर्ट में अपील की गई है। कोर्ट ने कहा कि मनोवैज्ञानिक का मानना है कि दोनों महिलाओं ने इस रिश्ते को समझ कर ही फैसला लिया है। दोनों को उनके परिवारों को सौंपने के मुद्दे पर विद्या ने कहा कि उन्हें अलग-अलग रहने को मजबूर किया जा सकता है और इससे उनकी प्रताड़ना होगी।

त्रिपुरा: कोरोना प्रोटोकॉल के नाम पर शादी समारोह में बदसलूकी करने वाले DM ने माँगी माफी, सस्पेंड किए गए

COVID-19 प्रोटोकॉल का पालन करने के नाम पर एक शादी समारोह में बदसलूकी और असभ्य भाषा का प्रयोग करने वाले पश्चिमी त्रिपुरा के DM शैलेश कुमार यादव को सस्पेंड कर दिया गया है। घटना का वीडियो वायरल होने के बाद त्रिपुरा के मुख्यमंत्री ने इस मामले पर संज्ञान लिया था। राज्य के भाजपा विधायकों ने भी मुख्य सचिव मनोज कुमार को पत्र लिखकर DM शैलेश कुमार यादव के निलंबन की कार्रवाई करने की माँग की थी।

सोमवार (26 अप्रैल 2021) की रात DM शैलेश कुमार यादव ने कथित तौर पर कोरोना प्रोटोकॉल का पालन न करने पर दो मैरिज गार्डनों पर कार्रवाई की थी। इनमें से एक मैरिज हॉल का वीडियो वायरल हो गया। इस वीडियो में DM शैलेश यादव मैरिज हॉल में उपस्थित लोगों के साथ बदसलूकी करते देखे गए। DM के साथ पुलिसकर्मी भी थे।

वीडियो में DM को दूल्हे और बुजुर्ग पुरोहित के साथ भी बदसलूकी करते हुए देखा गया। DM पर आरोप था कि उन्होंने हॉल में उपस्थित लोगों के साथ मारपीट की और बुजुर्गों को भी नहीं छोड़ा। इसके अलावा DM शैलेश यादव ने गाली-गलौज करते हुए अपने ही द्वारा हस्ताक्षरित अनुमति आदेश की कॉपी को फाड़ दिया और नियमों के उल्लंघन की कार्रवाई करने की धमकी देने लगे।

विधायकों द्वारा मुख्य सचिव को लिखे पत्र में कहा गया था कि डीएम ने महिलाओं के साथ भी बदसलूकी की। उन्हें थाने ले जाया गया। हालाँकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया लेकिन विधायकों ने आरोप लगाया कि DM शैलेश यादव के साथ महिला पुलिसकर्मी नहीं थीं।

इस मामले पर DM शैलेश कुमार यादव की आलोचना होने के बाद उन्होंने माफी माँगी। उन्होंने कहा, “मेरी इस कार्रवाई से किसी को ठेस पहुँची हो तो मैं उसके लिए माफी माँगता हूँ। हालाँकि मैंने यह कार्रवाई लोगों और समाज की भलाई के लिए ही की। सरकार के दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन कराने के लिए यह कार्रवाई की।”

हालाँकि विधायकों ने अपने पत्र में बताया है कि इन्हीं DM ने शादी के लिए अनुमति दी थी। इसी अनुमति के तहत 4-4 कार ले जाने और शादी समारोह में 50 लोगों के शामिल होने की बात कही गई थी। इस घटना पर मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देव ने मुख्य सचिव मनोज कुमार से रिपोर्ट तलब की थी जिसके बाद अब पश्चिमी त्रिपुरा के DM शैलेश कुमार यादव को निलंबित कर दिया गया है।

दिल्ली में अब जजों के लिए 5 स्टार कोविड सेंटर नहीं, AAP सरकार ने वापस लिया आदेश: हाई कोर्ट ने फटकारा था

दिल्ली हाई कोर्ट के जज और अन्य न्यायिक कर्मचारियों के लिए अशोक होटल में कोविड सेंटर बनाने का आदेश केजरीवाल सरकार ने वापस ले लिया है। अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने इसके लिए दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित 5 स्टार अशोक होटल में 100 कमरे आवंटित करने का आदेश दिया था।

इस आदेश को वापस लिए जाने की जानकारी आप सरकार ने गुरुवार (29 अप्रैल 2021) को दिल्ली हाई कोर्ट को दी। इसके बाद जस्टिस विपिन सांघी और रेखा पल्ली की डिवीजन बेंच ने इस मुद्दे पर कार्यवाही का निस्तारण कर दिया। इस संबंध में समाचार प्रकाशित होने के बाद हाई कोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया था।

चाणक्यपुरी के एसडीएम ने 26 को अशोक होटल में कोविड सेंटर को लेकर नोटिफिकेशन जारी किया था। इसमें कहा गया था कि इस कोविड फैसिलिटी को प्राइमस हॉस्पिटल द्वारा संचालित किया जाएगा। जजों के अलावा न्यायिक कर्मचारी और उनके परिजन भी इस सुविधा का लाभ उठाने के हकदार थे।

यह मामला संज्ञान में आने के बाद हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा था कि क्या यह सब अदालत को खुश करने के लिए किया गया है? कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि उनकी ओर से न्यायाधीशों और अन्य न्यायिक अधिकारियों और उनके परिवारों के लिए अशोक होटल परिसर को प्राथमिकता के आधार पर कोविड-19 सुविधा में बदलने का कोई अनुरोध नहीं किया गया था।

अफसरों के लिए भी VIP कोविड इंतजाम

मंगलवार को (27 अप्रैल) केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के चार बड़े होटलों को सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार के लोगों के लिए कोविड केयर सेंटर बनाने का आदेश जारी किया था।

चार फोर स्टार होटलों विवेक विहार के होटल जिंजर, शाहदरा के होटल पार्क प्लाजा, कड़कड़डूमा के पास स्थित होटल लीला एंबियंस, हरि नगर में होटल गोल्डन ट्यूलिप एसेंशियल को सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार वालों के लिए रिजर्व करने का फैसला किया गया था। दिल्ली सरकार द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, इन होटलों को राजीव गाँधी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से जोड़ा जाएगा ताकि दिल्ली सरकार, स्वायत्त संस्थाओं और निगम के अधिकारियों और उनके परिवार वालों का इलाज किया जा सके।

अनुभव शर्मा को परिवार ने छोड़ा, मोहम्मद युनूस ने किया दाह संस्कार: मीडिया गिरोह के प्रोपेगेंडा की खुली पोल

प्रोपगेंडा फैलाने के लिए कोरोना महामारी को वामपंथियों ने एक अवसर की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। झूठ का कारोबार चलाने के लिए वह लोगों की संवेदनाओं से खेल रहे। सबसे ताजा उदाहरण कल तब देखने को मिला, जब अनुभव शर्मा का नाम लेकर एक तस्वीर वायरल हुई और दावा कर दिया गया कि उनका दाह संस्कार मोहम्मद यूनुस ने किया है। 

इस पोस्ट को तमाम लोग सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे

इस तस्वीर को रवीश कुमार, अभिसार शर्मा, मोहम्मद जुबेर समेत कई मीडिया गिरोह के लोगों ने जमकर शेयर किया। अभिसार शर्मा के ट्वीट पर इसे 27000 शेयर मिले हैं। इस तस्वीर को शेयर करके ट्विटर पर बताया गया कि यह मुजफ्फरनगर की है। अनुभव कोविड से ग्रसित थे। ऐसे में उनके परिवार के लोग भी जब दाह संस्कार को आगे नहीं आए, तब मोहम्मद यूनुस ने उनका अंतिम संस्कार किया। इस तस्वीर को आधार बनाकर संदेश दिया गया कि धर्म की राजनीति करने वालों को कोरोना महंगा पड़ रहा है।

अब इस तस्वीर की सच्चाई क्या है? यह स्वराज्य की पत्रकार स्वाति गोयल ने बताया है। गोयल ने खबर को फर्जी बताते हुए कहा कि उन्होंने इस संबंध में अनुभव के परिवार से बात की। अनुभव के भाई शरद ने उनसे कहा कि उन्हें हँसी का पात्र बना दिया गया है। इस वायरल पोस्ट से वह लोग बहुत आहत हैं। अनुभव के भाई ने कहा कि उनके भाई की कोरोना से मृत्यु नहीं हुई। किसी ने झूठ प्रकाशित करने से पहले परिवार से सच जानने का प्रयास नहीं किया।

पत्रकार आगे बताती हैं कि कोई परिवार जिसने अपना जवान बेटा खोया हो, उसके साथ आप सबसे बुरा क्या कर सकते हैं? फर्जी न्यूज फैला दीजिए कि उसके परिवार ने उसका दाह संस्कार नहीं किया। जो पोस्ट वायरल है, उसके अनुसार मो यूनुस ने अनुभव का अंतिम संस्कार किया। वो बिलकुल झूठ है।

स्वराज्य की रिपोर्ट के अनुसार, शरद ने कहा, “मैंने अपने भाई का अपने हाथ से अंतिम संस्कार किया। मेरे समुदाय और मेरे घर के लोग वहाँ मौजूद थे।” उनके मुताबिक, “यूनुस फैमिली बिजनेस में ड्राइवर के तौर पर काम करते हैं और अनुभव के दोस्त भी थे, लेकिन अनुभव का दाह संस्कार सिर्फ़ मैंने ही किया है। अमर उजाला की रिपोर्ट फेक है, इसमें दिए गए बयान का सोर्स भगवान जाने कौन है। किसी ने न हमसे बात की, न यूनुस से।”

Hindu Man’s Family Refutes Report And Viral Social Media Posts That Muslim Man Performed Last Rites Of Their Son
27 अप्रैल को प्रकाशित हुई अमर उजाला में खबर

शरद ने ये भी कहा, “तस्वीर में आग पकड़ाने के लिए युनूस ‘राल (एक तरह का पाउडर)’ डालता दिख रहा है… उससे पहले, हमारे पंडितजी ने भी 5 किलो राल डाला लेकिन किसी ने उनकी तस्वीर नहीं शेयर की।” शरद के अनुसार, “वहाँ खड़ा हर व्यक्ति एकजुटता दिखा रहा था। उससे कोई समस्या नहीं है। लेकिन सच यही है कि मैंने अपने भाई का अंतिम संस्कार किया।”

अनुभव शर्मा को क्या हुआ था?

शरद खुद भी एक रिपोर्टर हैं। वह ऑन ड्यूटी नाम की मैग्जीन चलाते हैं। इस संबंध में वह अपने फेसबुक और मैग्जीन पर इस पर लिखने वाले थे, लेकिन वह व्यस्त रहे। इस बीच किसी ने उनसे इस संबंध में सच्चाई जानने के लिए संपर्क नहीं किया। उन्होंने बताया कि उनके भाई को 4-5 दिन से बाजुओं में दर्द था। डॉक्टरों ने कहा कि सर्वाइकल था। वह पूछते हैं, “अगर मेरे भाई को कोरोना होता तो क्या प्रशासन इस प्रकार दाह संस्कार करने की अनुमति देता?” तस्वीर वायरल होने पर उन्होंने कहा, “वह कोई तस्वीर खींचने वाला मौका नहीं था। हमें नहीं पता किसने यूनुस की तस्वीर खींची। लेकिन मुझे मालूम है जिसने फोटो ली, उसने मेरी और मेरे परिवार की भी ली होगी।”

पिछले साल फैली फेक न्यूज

कोरोना महामारी के समय पहली बार ऐसा झूठ फैलाने की कोशिश नहीं हुई। पिछले साल भी उन कहानियों को ढूँढकर शेयर करने का काम हुआ, जहाँ हिंदुओं के दाह संस्कार दूसरे मजहब के लोगों ने किए हों। इसी क्रम में तेलंगाना के एक परिवार के बारे में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ (TOI) में फेक न्यूज़ छपी कि वहाँ एक हिन्दू की मौत होने के बाद दूसरे मजहब के लोगों ने मिल कर उसे कन्धा दिया और उसके अंतिम संस्कार की भी व्यवस्था की।

हेडिंग में लिखा गया कि समुदाय विशेष के 5 लोगों ने मिल कर एक हिन्दू की लाश को कंधा दिया और उसका अंतिम संस्कार किया। मृतक पेशे से ऑटो ड्राइवर था, जिसकी मौत टीबी के कारण हुई थी। अख़बार में यहाँ तक दावा किया गया कि दूसरे मजहब वालों ने पीड़ित परिवार और अंतिम संस्कार में भाग लेने आए सम्बन्धियों के लिए भोजन की भी व्यवस्था की।

लेकिन, सच्चाई पता की गई तो मालूम हुआ कि पीड़ित परिवार TOI की खबर सुनने के बाद सदमें मे था। मृतक के भाई का कहना था कि समुदाय विशेष की वाहवाही के लिए ये सब प्रपंच रचा गया। वहीं मृतक के बेटे ने बताया था कि 5 लोगों ने उनके पिता के दोस्त होने की बात कह के अर्थी को कंधा दिया और इसका फोटो पत्रकारों को दे दिया।

इसके अलावा एक खबर अगस्त 2020 में वायरल हुई थी। वायरल तस्वीर में मुस्लिम भीड़ किसी अर्थी को कांधा देती दिख रही थी। तस्वीर को शेयर कर कहा गया कि ये लोग तबलीगी जमात के हैं जिन्होंने अपने मजहबी कार्य को छोड़ कर हिंदू डॉक्टर का दाह संस्कार करवाया, जो कोरोना संक्रमित थे। हालाँकि पड़ताल में पता चला कि डॉ की मृत्यु कोरोना से नहीं हुई थी। सारा प्रोपगेंडा जमातियों की छवि निर्माण के लिए थे।

लखनऊ के मेदांता अस्पताल में प्रियंका गाँधी ने कराई ऑक्सीजन की व्यवस्था? जानिए, क्या है सच

हाल ही में कई मीडिया समूहों ने यह न्यूज चलाई कि प्रियंका गाँधी वाड्रा ने लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था कराई। भास्कर ने रिपोर्ट दी कि प्रियंका गाँधी वाड्रा ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ऑक्सीजन की व्यवस्था करने के लिए कहा और उन्होंने ऑक्सीजन का एक टैंकर लखनऊ के लिए भेज दिया। इसी न्यूज को कई अन्य मीडिया आउटलेट्स ने शेयर किया।

भास्कर की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
वन इंडिया की रिपोर्ट

कॉन्ग्रेस नेता ललन कुमार ने भी ऑक्सीजन टैंकर की फोटो शेयर करते हुए छतीसगढ़ से ऑक्सीजन की व्यवस्था कराने के लिए प्रियंका गाँधी वाड्रा को श्रेय दिया।

हालाँकि अब रिपोर्ट आ रही है कि लखनऊ के मेदांता अस्पताल के लिए ऑक्सीजन की व्यवस्था दिल्ली के एक एनजीओ ने कराई। इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अस्पताल प्रशासन ऑक्सीजन की आपूर्ति के किसी भी राजनैतिक पहलू से पूरी तरह से अनभिज्ञ है।

इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट का एक अंश

रिपोर्ट्स में बताया गया है कि अस्पताल के डायरेक्टर राकेश कपूर के अनुसार दिल्ली के एक एनजीओ ने ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कराई। उन्होंने यह भी कहा कि वह इस मामले में किसी भी प्रकार के राजनैतिक हस्तक्षेप से वाकिफ नहीं हैं।

पंजाब: फ्यूचर ग्रुप के स्टोरेज सेंटर की 4 महीनों से नाकेबंदी, ‘किसानों’ को हटाने के लिए हाई कोर्ट में कंपनी

फ्यूचर सप्लाई चेन्स सॉल्यूशंस ने पंजाब ऐंड हरियाणा हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इसमें उन किसान प्रदशर्नकारियों को हटाने का निर्देश देने की अपील की गई जिन्होंने गैरकानूनी तरीके से करीब 4 महीने से उसके स्टोरेज फैसिलिटी की नाकेबंदी कर रखी है। यह स्टोरेज फैसिलिटी पटियाला जिले के शंभू कलां गाँव के पास है। याचिका 28 अप्रैल 2021 को दाखिल की गई।

कंपनी ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह किसानों की नाकाबंदी को तत्काल वहाँ से हटवाए और समूह को अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को चलाने के लिए सुरक्षित रास्ता प्रदान करे। कंपनी ने अपनी दलील में कहा है कि 4 करोड़ रुपए का खराब होने वाला माल स्टोरेज में है। अगर किसानों को वहाँ से नहीं हटाया जाता है तो उत्पाद जल्द ही खराब हो जाएँगे।

खराब हुए 66 लाख रुपए के सामान

याचिका में, फ्यूचर ग्रुप ने दावा किया है कि 66 लाख रुपए के पैक किए गए खाद्य वस्तुएँ, दालें और अन्य खाद्यान्न पहले ही खराब हो चुके हैं। 1.5 करोड़ रुपए के उत्पादों का एक और बैच आने वाले दिनों में खराब हो जाएगा। ग्रुप ने कहा कि इन उत्पादों को कर्मचारियों द्वारा भंडारण सुविधा से दैनिक आधार पर बाहर निकालने की आवश्यकता होती है।

किसान प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर इस स्टोरेज सेंटर को इसलिए घेर रखा है, क्योंकि उन्हें लगता है कि फ्यूचर समूह की सप्लाई चेन को रिलायंस खरीद रहा है। हालाँकि, यह सौदा अभी लंबित है, क्योंकि इसे अमेजॉन ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अमेजॉन, रिलायंस और फ्यूचर ग्रुप के बीच केस की सभी कार्यवाही पर रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत ने मामले में सुनवाई के लिए 4 मई की तारीख तय की है और सभी पक्षों को तब तक अपने जवाब तैयार करने को कहा है।

नाकेबंदी हटाने को कुछ नहीं कर रहा जिला प्रशासन: फ्यूचर ग्रु

फ्यूचर ग्रुप के वरिष्ठ प्रबंधक आकाश भरारा के माध्यम से हाई कोर्ट में आवेदन दायर किया गया है। कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता सचिन राय वैद ने दलील दी कि इस रुकावट से कंपनी को काफी वित्तीय नुकसान हुआ है। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस स्टोरेज सेंट में 400 से अधिक लोग कार्यरत हैं, जिनकी आजीविका पूरी तरह से भंडारण सुविधा के संचालन पर निर्भर है। पिछले चार महीने से रुकावट के कारण वे बेरोजगार बैठे हैं।

वैद ने कहा, “किसानों की गैरकानूनी कार्रवाई और उक्त नाकेबंदी को हटाने में जिला प्रशासन की निष्क्रियता से याचिकाकर्ता कंपनी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, जिससे व्यापार और व्यवसाय चलता है।” न्यायमूर्ति महाबीर सिंह संधू ने याचिकाकर्ता को खाद्य पदार्थों को स्टोर करने के लिए राज्य अधिकारियों द्वारा दी गई लाइसेंस की प्रति पेश करने का निर्देश दिया। इस मामले की सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।

हनुमान जी की पूजा में भीड़ लगी तो कॉन्ग्रेसी CM ने DM-SP को डाँटा, गाजी फकीर के जनाजे में जुटी भारी भीड़ पर चुप्पी

कोरोना दिशा-निर्देशों का पालन कराने को लेकर राजस्थान की सरकार का दोहरा रवैया सामने आया है। जहाँ एक तरफ धौलपुर के धार्मिक आयोजन में भीड़ जुटी तो सीधा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने स्थानीय SP को फटकार लगाई, जबकि जैसलमेर में ‘सरहद का सुल्तान’ गाजी फकीर के जनाजे में उमड़ी भीड़ की तरफ से आँख मूँद ली गई। गाजी फकीर के बेटे मोहम्मद सालेह राजस्थान सरकार में वक्फ और अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री हैं।

ये सब तब हो रहा है, जब राजस्थान कोरोना की दूसरी लहर सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों की सूची में शीर्ष 5 में पहुँच गया है। यहाँ सक्रिय कोरोना मामलों की संख्या 1,63,372 हो गई है। पिछले 24 घंटों में यहाँ 16,613 नए मामले सामने आए हैं और 120 लोगों ने कोविड-19 के कारण अपनी जान गँवा दी। राजधानी जयपुर में सबसे ज्यादा 33,324 सक्रिय मामले हैं। राजस्थान में कोरोना ने अब तक 3926 लोगों की जान ली है।

मामला कुछ यूँ है कि राजस्थान में कोरोना की दूसरी लहर के बीच धार्मिक आयोजनों पर रोक लगी हुई है। ऐसे में धौलपुर में भाजपा विधायक सुखराम खोली ने हनुमान जी की प्राण प्रतिष्ठा के बाद अखंड रामायण का पाठ कराया। इसमें 500 से अधिक लोग जुट गए। सीएम गहलोत ने एक बैठक में यहाँ के DM-SP को सबके सामने फटकार लगा डाली। उन्होंने मुख्य सचिव को भी आदेश दिया कि वो इस मामले का स्पष्टीकरण स्थानीय प्रशासन से तलब करें।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार के दोहरे रवैये पर ‘दैनिक भास्कर’ की खबर (साभार)

ये हुई एक खबर। अब आते हैं उस दूसरी खबर पर, जहाँ हजारों लोगों की भीड़ तो जुटी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा इसलिए, क्योंकि जिसका जनाजा था वो जैसलमेर, खासकर पोखरण का एक प्रभावशाली हस्ती था। इलाके में उसका दबदबा था ही, साथ ही भारत-पाकिस्तान के सिंधी मुस्लिम उसे खलीफा भी मानते थे। उसके परिवार के कई लोग बड़े-बड़े पदों पर हैं। एक बेटा अशोक गहलोत की कैबिनेट में मंत्री है।

सालेह मोहम्मद के अब्बा का निधन हुआ। इसमें खुद सालेह भी शामिल हुए, जबकि मात्र 4 दिन पहले ही वो कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे। वो हजारों लोगों के साथ जनाजे में शामिल हुए लेकिन राज्य सरकार या प्रशासन के कान में जूँ तक न रेंगी। मीडिया के सूत्र कह रहे हैं कि उनकी रिपोर्ट नेगेटिव भी आ गई थी। राजस्थान में अंतिम यात्रा में मात्र 20 लोगों के शामिल होने की अनुमति है। वहाँ की घटना के लिए मुख्यमंत्री ने कोई रिपोर्ट तलब नहीं की।

गाजी फकीर की जैसलमेर की राजनीति पर ऐसी पकड़ थी कि उनकी सलाह के बिना वहाँ कॉन्ग्रेस कोई भी निर्णय नहीं लेती थी। शायद अशोक गहलोत को डर है कि उनके परिवार के खिलाफ कार्रवाई करने का इशारा भर करने से पश्चिमी राजस्थान के मुस्लिम उनके खिलाफ हो सकते हैं, जो हर चुनाव में अपने खलीफा के फतवे का पालन करते थे। सार ये कि राजस्थान में पूजा-पाठ गलत है, जनाजे की भीड़ के लिए कोई बंदिश नहीं है।

कोरोना के कारण उत्तराखंड सरकार ने रद्द की इस वर्ष की चार धाम यात्रा, 14 मई से होनी थी शुरुआत

इस साल की चार धाम यात्रा रद्द कर दी गई है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि देश में बढ़ रहे कोरोना वायरस के संक्रमण के चलते यह निर्णय लिया गया है। मुख्यमंत्री रावत ने कहा, “उत्तराखंड सरकार के द्वारा इस वर्ष चार धाम यात्रा रद्द करने का निर्णय लिया गया है। देश में Covid-19 के बढ़ते संक्रमण के चलते यह निर्णय लिया गया है कि चार धाम मंदिरों में सिर्फ पुजारी ही पूजा और विभिन्न अनुष्ठान करेंगे।“

हालाँकि मंदिर के कपाट तय समय पर ही खुलेंगे। इस वर्ष 14 मई से चार धाम यात्रा शुरू होने वाली थी। उत्तराखंड में प्रत्येक वर्ष आयोजित होने वाली इस यात्रा में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की यात्रा श्रद्धालुओं द्वारा की जाती है।

पिछले कुछ दिनों से वामपंथी और लिबरल मीडिया गिरोह चार धाम यात्रा और उत्तराखंड की भाजपा सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा चला रहे थे। इनमें द वायर और द लॉजिकल इंडियन जैसे मीडिया समूह सबसे आगे हैं। द वायर ने लिखा कि हरिद्वार कुम्भ मेला में हुई आलोचना के बाद भी उत्तराखंड की सरकार चार धाम यात्रा की अनुमति दे रही है।

द लॉजिकल इंडियन ने भी चार धाम यात्रा को एक गलत निर्णय बताया। इसके अलावा इंडियन एक्स्प्रेस भी कुम्भ मेला पर उत्तराखंड सरकार की आलोचना कर चुका है, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्तक्षेप के बाद कुम्भ को प्रतीकात्मक बना दिया गया था।

गौरतलब है कि पिछले साल भी चार धाम यात्रा के दौरान कड़े प्रतिबंध थे। इसके कारण 2019 में आए 38 लाख श्रद्धालुओं के मुकाबले साल 2020 में मात्र 4 लाख श्रद्धालुओं ने चार धाम यात्रा में भाग लिया था। इस साल Covid-19 के बढ़ते संक्रमण के कारण चार धाम यात्रा को रद्द ही कर दिया गया है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 28 अप्रैल को 6054 नए संक्रमित मरीज मिले। राज्य में वर्तमान में 45,383 सक्रिय मरीज हैं। 28 अप्रैल को ही 3485 मरीज स्वस्थ हुए।

दुकान पर ‘उपलब्ध नहीं’ का बोर्ड, फोन पर- 20 हजार एडवांस दो… होम डिलिवरी के बाद 15 हजार: दिल्ली में ऑक्सीजन वेंडर्स ऐसे कर रहे खेल

एक तरफ कोरोना महामारी का कहर जारी है, वहीं दूसरी ओर इस आपदा के समय में एक और बीमारी बड़ी तेजी से पनप रही है। यह है- झूठ, धोखेबाजी, बेईमानी और कालाबाजारी। इस मुश्किल में वक्त कई लोग ऐसे हैं जो इंसानियत को शर्मसार करते हुए कोविड मरीजों और उनके परिजनों को धोखा देने और लूटने में जरा भी नहीं हिचक रहे हैं।

एक वायरल ट्विटर थ्रेड ने ​राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ऑक्सीजन सिलिंडर की कालाबाजारी पर से पर्दा उठा दिया है। इसके मुताबिक दुकानों पर उपलब्ध नहीं है का साइनबोर्ड लगाकर रखने वाले वेडर्स फोन पर मनचाही कीमत में सिलिंडर मुहैया कराने का दाव कर रहे हैं।

ट्विटर पर विनायक त्रिपाठी नामक यूजर ने लिखा है, “कल मैंने ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए ‘रणवीर’ नामक व्यक्ति से बात की। जब मैंने कहा मुझे तुरंत सिलिंडर चाहिए। उसके बाद उसने मुझे कॉल किया और कहा कि आप 20 हज़ार एडवांस भेज दो। मैं 4 घंटे में होम डिलिवरी करवा दूँगा। 15 हज़ार सिलेंडर मिलने के बाद देना।”

विनायक ने आगे लिखा है, “मेरे यह कहने पर कि मैं आकर ले जाता हूँ क्यूँकि हमारे पास समय नहीं है, रणवीर ने खुलेआम कहा कि अगर आप एड्रेस पर जाओगे तो उसके गेट पे हमने साफ़-साफ़ ‘Not Available’ लिखा है क्योंकि हम पुलिस और सरकार से बच के बेच रहे हैं। चाहिए तो मेरे अकाउंट में एडवांस भेजना होगा।”

विनायक ने लिखा है, “मैंने कहा पैसे देने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन मुझे उसकी रसीद कैसे मिलेगी? इस पर उसने बड़ी बेशर्मी से कहता है कि हम ब्लैक में दे रहे हैं और आपको लेना है लो, वरना मेरे पास लोगों की लाइन लगी हुई है। यह कह उसने कॉल काट दी।”

आगे विनायक ने बताया है, “फिर उसने मुझे एक महिला के बैंक अकाउंट का स्क्रीनशॉट भेजा। साथ में वॉयस नोट- सर कल से 150 सिलिंडर डिलिवर करवा चुका हूँ, आपको लेना है तो एडवांस भेजिए नहीं तो कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं है।”

उन्होंने लिखा है, “दुःख की इस घड़ी में आम जनता से लेकर सभी बड़े चेहरे एक-दूसरे की मदद के लिए एकजुट हैं और इस जैसे लोग मजबूरी का फ़ायदा उठा ऑक्सीजन की कालाबाज़ारी करने में लगे हुए हैं। प्रशासन को इसका संज्ञान ले इस व्यक्ति पर त्वरित कार्यवाही कर इसे ‘Cheating, Epidemic Disease & Essential Commodities Act’ के तहत गिरफ़्तार करना चाहिए।”

गौरतलब है कि 27 अप्रैल को दिल्ली हाई कोर्ट ने ऑक्सीजन सिंलिंडरों की कालाबाजारी रोकने में नाकाम रहने के लिए दिल्ली सरकार को फटकार लगाई थी। विनायक जैसों की आपबीती दिल्ली की केजरीवाल सरकार की निष्क्रियता का एक और सबूत है।

RSS कार्यकर्ता की मौत को लेकर ‘लोकसत्ता’ और ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने किया फैक्टचेक, बेटी ने वीडियो के जरिए दिया जवाब

नागपुर के 85 वर्षीय RSS स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर के निधन के बाद जहाँ परिवार शोक में है, वहीं कुछ मीडिया संस्थानों ने उनके बलिदान को फेक न्यूज़ साबित करने की कोशिश की है। उन्होंने अस्पताल में अपना बेड किसी अन्य कोविड मरीज को दे दिया था और वापस घर आ गए थे। 3 दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। उन्होंने ये बलिदान दिया, ताकि उनसे लगभग आधी उम्र के एक व्यक्ति की जान बच जाए।

जब सोशल मीडिया पर उनके इस बलिदान की खूब चर्चा हुई और लोगों ने सराहना करते हुए उन्हें नमन किया तो एक मराठी मीडिया संस्थान ने इस खबर को झूठा साबित करने का प्रयास किया। ‘लोकसत्ता’ ने एक ‘फैक्टचेक’ कर इस खबर को गलत बता दिया, लेकिन उसने गलत अस्पताल से संपर्क कर लिया। नारायण भाऊराव को उन्हें जानने वाले लोग ‘दाभाडकर काका’ कह कर सम्बोधित करते थे।

‘लोकसत्ता’ का कथित फैक्टचेक नागपुर के एक तथाकथित समाजसेवक शिवम थावरे की इंदिरा गाँधी हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट अजय प्रसाद से हुई बातचीत पर आधारित है। इंदिरा गाँधी हॉस्पिटल ने कहा कि उनके यहाँ नारायण भाऊराव दाभाडकर नाम का कोई मरीज भर्ती ही नहीं हुआ था। ये स्पष्ट नहीं है कि उसने सरकारी इंदिरा गाँधी हॉस्पिटल से संपर्क किया या नागपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के इंदिरा गाँधी रुग्णालय में।

इंदिरा गाँधी रुग्णालय में नारायण भाऊराव दाभाडकर भर्ती थे। उनकी बेटी ने अब एक वीडियो जारी कर चीजें साफ़ की हैं। लेखिका शेफाली वैद्य ने नारायण भाऊराव की बेटी आश्वारी दाभाडकर का वीडियो शेयर किया, जिसमें उन्होंने बताया है कि उनके पिता इंदिरा गाँधी म्युनिसिपल हॉस्पिटल में एडमिट थे और उनकी हालत दिनोंदिन बिगड़ती ही जा रही थी। डॉक्टरों ने उन्हें उनकी हालत के बारे में बताया भी था।

बेटी के अनुसार, जब उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे तो उन्होंने बाहर बेड के लिए हंगामा सुना। तभी उन्होंने फैसला किया कि वे तो अपनी ज़िंदगी जी चुके है, इसलिए उनके द्वारा लिए गए बेड के कारण कहीं किसी युवा की जान न चली जाए। ये बताते-बताते आश्वारी दाभाडकर रो पड़ीं। उधर इंदिरा गाँधी रुग्णालय ने भी इस बात की पुष्टि की है कि नारायण भाऊराव दाभाडकर वहाँ भर्ती थे और उनका इलाज हो रहा था।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ की शीलू चिमुरकर को दिए गए एक बयान में हॉस्पिटल के इंचार्ज डॉक्टर ने कहा, “दाभाडकर को अप्रैल 22 को शाम 5:55 में एडमिट किया गया था। उन्हें कैजुअल्टी वॉर्ड में एक ऑक्सीजन बेड पर रखा गया था। हमने परिजनों से कहा था कि अगर स्थिति बिगड़ती रही तो उन्हें किसी बेहतर अस्पताल में ले जाना पड़ेगा। वे तैयार भी हो गए थे। शाम को 7:55 में उन्होंने डिस्चार्ज होने की अनुमति माँगी।”

हॉस्पिटल के इंचार्ज डॉक्टर ने कहा कि उन्हें कारण तो नहीं पता, लेकिन उन्हें बेहतर अस्पताल में ले जाने के लिए ज़रूर कहा गया था। उनके दामाद अमोल पाचपोर ने डिस्चार्ज लेटर पर हस्ताक्षर किए, जिसके बाद उन्हें डिस्चार्ज किया गया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की भी इस खबर में हॉस्पिटल के बयान के बावजूद भ्रम फैलाया गया और दाभाडकर के एक परिजन से बयान के लिए दबाव बनाया गया, जबकि वो खुद कोरोना संक्रमित हैं।