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अभिसार, रवीश, इमरान प्रतापगढ़ी, आदेश, काशिफ… टोपी वाले यूनुस से अनुभव की चिता को मुखाग्नि दिलाने वाला गैंग

एक तरफ जहाँ देश में महामारी बढ़ रही है वहीं दूसरी ओर प्रोपेगेंडा फैलाने वाले वामपंथी और लिबरल पत्रकार भी तेजी से सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। ये पत्रकार महामारी की आड़ में हिन्दू घृणा और फेक न्यूज के माध्यम से अपना प्रोपेगेंडा समाज में प्रसारित कर रहे हैं।

हाल ही में मुजफ्फरनगर में अनुभव शर्मा नाम के एक व्यक्ति की मृत्यु को एजेंडा बनाकर इन वामपंथी पत्रकारों ने फेक न्यूज फैलाई और अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से बताया कि जब अनुभव शर्मा की मृत्यु के बाद दाह संस्कार के लिए उनके परिजन आगे नहीं आए तो मोहम्मद यूनुस ने उनका दाह संस्कार किया।

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें एक जलती हुई चिता और एक मुस्लिम युवक दिखाई दे रहा है। फिर क्या था, अभिसार शर्मा, रवीश कुमार और मोहम्मद जुबैर जैसे पत्रकार गिरोह ने इसे शेयर करना शुरू कर दिया। इस तस्वीर को शेयर करके बताया गया कि अनुभव शर्मा Covid-19 से संक्रमित थे। ऐसे में जब उनके परिवार के लोग भी दाह संस्कार के लिए आगे नहीं आए तब मोहम्मद यूनुस नाम के एक मुस्लिम ने अनुभव का दाह संस्कार किया। इस तस्वीर को शेयर करते हुए इस वामपंथी पत्रकार गिरोह ने धर्म निरपेक्षता का राग जम कर अलापा।

अमर उजाला ने भी 25 वर्षीय अनुभव शर्मा की मृत्यु और मोहम्मद यूनुस द्वारा उनके दाह संस्कार की खबर प्रकाशित की। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अनुभव शर्मा Covid-19 से संक्रमित थे।

अनुभव शर्मा की मृत्यु और इस पूरे मामले का सच :

स्वराज्य द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया कि अनुभव शर्मा के बड़े भाई शरद शर्मा ने इस पूरे मामले पर सच्चाई बताई। शरद शर्मा ने कहा कि अनुभव की मृत्यु कोरोना वायरस संक्रमण से नहीं हुई है और उनका दाह संस्कार भी परिवार के सदस्यों के द्वारा ही किया गया। मोहम्मद यूनुस के बारे में शरद ने बताया कि वह उनका ड्राइवर था और अनुभव शर्मा का अच्छा दोस्त भी। वह दाह संस्कार के समय उनके साथ ही था लेकिन दाह संस्कार शरद ने ही किया। शरद शर्मा ने बताया कि यूनुस चिता में आग को बनाए रखने के लिए ‘राल’ डाल रहा था, उसी समय उसकी फोटो खींच ली गई जिसे सोशल मीडिया पर इस रूप में प्रसारित कर दिया गया कि अनुभव शर्मा का दाह संस्कार उसी ने किया है।

द वायर के स्तंभकार, मोहम्मद जुबैर और रवीश कुमार की फेक न्यूज :

लिबरल गिरोह ने तुरंत ही अमर उजाला की यह रिपोर्ट लपक ली और निकल पड़े समाज में फेक न्यूज के माध्यम से भाईचारा बाँटने। एनडीटीवी के क्रांतिकारी पत्रकार रवीश कुमार ने आदेश रावल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर किया और लिखा, “सोचिए, समझिए और जागिए”

रवीश कुमार के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

अभिसार शर्मा ने इसे फेसबुक पर शेयर करते हुए लिखा, “मुजफ्फरनगर में अनुभव शर्मा का अंतिम संस्कार मोहम्मद यूनुस ने किया। जिस दिन आप धर्म की ‘हिपोक्रेसी’ को समझ जाएँगे, रेत की यह दीवार गिर जाएगी।“

अभिसार शर्मा के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

न्यूजक्लिक के साथ काम करने वाले काशिफ ककवी, जो कि द वायर और द क्विंट जैसी न्यूज वेबसाइट में स्तंभकार भी है, ने अपने ट्विटर पर लिखा, “मुजफ्फरनगर के अनुभव शर्मा की कोविड से मौत हो गई। उसके परिजन अंतिम संस्कार को सामने नहीं आए तो आँखों में आँसू लिए टोपी वाले दोस्त यूनुस ने मुखाग्नि दी।“ काशिफ के इस ट्वीट को स्व-घोषित फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर ने बिना फैक्ट चेक किए ही रिट्वीट कर दिया।

काशिफ ककवी के पोस्ट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि जैसे ही यह खबर फेक निकली, ककवी ने स्पष्टीकरण देते हुए भ्रामक जानकारी देने के लिए माफी माँगी।

ककवी की माफी

एक और कथित पत्रकार आदेश रावल ने अभिसार शर्मा की तरह ही कैप्शन लिखकर वायरल फोटो को पोस्ट किया।

आदेश रावल की ट्विटर पोस्ट का स्क्रीनशॉट

इस फोटो को शेयर करते हुए इमरान प्रतापगढ़ी ने लिखा, “ये तस्वीर मुजफ्फरनगर से आई है। अनुभव शर्मा की चिता को मुखाग्नि मोहम्मद यूनुस। ज़िन्दाबाद यूनुस साहब!”

इमरान प्रतापगढ़ी की पोस्ट का स्क्रीनशॉट

फोटो पर प्रतिक्रिया देते हुए अनुभव शर्मा के बड़े भाई शरद शर्मा ने कहा कि यह फोटो खींचने का समय नहीं था लेकिन जिसने भी यह फोटो खींची है, उसके पास मेरी और मेरे परिवार की फोटो भी होगी।

मुंबई की हालत कब्रिस्तानों से: नहीं मिल रही शवों को दफनाने की जगह, 1 कब्र में 2 शव दफनाने के निर्देश

मुंबई में कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतें इतनी ज्यादा हैं कि अब कब्रिस्तान में शव दफनाने के लिए जगह तक नहीं बची। स्थानीयों को जहाँ चिंता ये है कि जिन जगह पर कोरोना संक्रमितों को दफनाया गया है, वह उसका इस्तेमाल कम से कम 4-5 साल तक नहीं कर सकेंगे। वहीं मृतक के रिश्तेदारों को कल्बादेवी में बने बड़े कब्रिस्तान जाने की सलाह दी जा रही है।

महाराष्ट्र में अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मलिक ने कब्रिस्तान में कम जगह देखते हुए निर्देश दिए हैं कि शवों को 20 फुट अंदर गाड़ा जाए। ताकि एक जगह पर दो शव दफन हो सकें।

बड़ा कब्रिस्तान के प्रबंधन ने जगह की कमी पर बताया कि मुंबई में यह सबसे बड़ा कब्रिस्तान है। उन्होंने इसे 7 भाग में बाँटा है। इनमें 3 का इस्तेमाल सामान्य शवों के लिए हो रहा है बाकी सबका सिर्फ़ कोविड संक्रमित शवों के लिए है।

मिड डे रिपोर्ट के अनुसार, जुमा मस्जिद और बॉम्बे ट्रस्ट के अध्यक्ष शोएब खातिब ने बताया, “अब तक लगभग एक हजार से अधिक COVID शवों को यहाँ दफनाया गया है। इनमें 125 पिछले महीने दफन किए गए हैं। हमारे पास अब तक जगह की कोई कमी नहीं हुई।”

खातिब कहते हैं, “सामान्य केस में कब्र को दोबारा इस्तेमाल कर लेते हैं लेकिन कोविड संक्रमित शवों के लिए ऐसा नहीं है। हम उस जगह को दोबारा कम से कम 5 सालों के लिए यूज नहीं कर सकते, ये सबसे बड़ी चिंता है।”

मुंबई के मुस्लिम बहुल गोवांडी में ये समस्या तेजी से बढ़ रही है। देवनर सुन्नी मुस्लिम कब्रिस्तान के अध्यक्ष अब्दुल रहमान करीमुल्लाह शाह का कहना है कि उनके इलाके में 10-15 लाख मुस्लिम हैं। बावजूद इसके वह वही स्थान इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे 50 हजार की तादाद होने पर करते थे। रफीक नगर में आवंटित किए गए दूसरे कब्रिस्तान का भी यही हाल है।

शाह का कहना है कि दूसरा कब्रिस्तान उन्हें पिछले साल मिला था। उसमें 200 से ज्यादा शव दफनाने के लिए जगह थी लेकिन अब हालात हाथ से निकल रहे हैं। उन्होंने कब्रिस्तान में ओपन स्पेस की माँग की है।

वहीं महीम सुन्नी कब्रिस्तान वाले सिर्फ 3 किलोमीटर रेडियस के दायरे में आने वाले लोगों को कब्रिस्तान में जगह दे रहे हैं, वो भी सिर्फ अस्पताल और पुलिस की इजाजत से। कब्रिस्तान के अध्यक्ष सुहेल कहते हैं, “हम किसी को मना नहीं कर रहे। हम दूसरे कब्रिस्तान में भी जगह की मदद कर रहे हैं।” 

खंडवानी कहते हैं, “हम शवों को दफनाने के लिए सरकार और WHO की गाइडलाइन फॉलो कर रहे हैं। लेकिन कहीं भी ऐसी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है कि एक कब्र में दो शव दफना सकते हैं। हमने इस संबंध में सरकार को कुछ सुझाव देने के लिए पत्र लिखा है। अभी जवाब आना बाकी है।”

इसी प्रकार वर्सोवा मुस्लिम कब्रिस्तान का प्रबंधन संभालने वाले ट्रस्ट का कहना है कि वो सारी जगह कोविड संक्रमित शवों के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते। अपनी ओर से वह कोविड शवों को सरकार के दिशा-निर्देश के मुताबिक दफनाने के लिए सब प्रयास कर रहे हैं।

यही हालत बांद्रा के नौपाड़ा कब्रिस्तान की भी है। वहाँ के ट्रस्टी बहलूल कहते हैं, “हम कोविड शवों को दफना रहे थे। लेकिन पिछले साल एक मुस्लिम के मलाड़ में दाह संस्कार से मुस्लिम पैनिक हो गए। अब हमने जगह की कमी के कारण शव लेने बंद कर दिए हैं। हम कोशिश करते हैं कि जहाँ जगह हो, वहाँ शव को दफना दिया जाए।”

गौरतलब है कि कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य भारत में महाराष्ट्र है। वहाँ की हालत इस समय बहुत खराब है। बुधवार को वहाँ 985 मौतें हुई और 63309 लोग पॉजिटिव पाए गए। अब तक कुल 44,77, 394 लोग यहाँ संक्रमित हो चुके हैं। मुंबई में सिर्फ़ 24 घंटे में 102 मौतें हुई और 7, 503 नए मामले आए। ऐसे में कब्रिस्तान में कोविड शवों के कारण जो समस्या देखनी पड़ रही है, उस पर वरिष्ठ पत्रकार इकबाल ममदानी ने सरकार से पॉलिसी लाने की माँग की है।

उन्होंने कहा, “मुस्लिम नेताओं को कम से कम ये सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग अपने प्रियजनों के शव को ढंग से दफना पाएँ। मुंबई में कई कब्रिस्तान हैं लेकिन लोग वैधता में फँसे हैं। कुछ को सरकार के फंड का भी इंतजार है। ” 

एक संघी की मृत्यु होती है, फिर उसकी फैक्ट-चेकिंग की जाती है… भारतीय मीडिया इससे नीचे नहीं गिर सकती

लगातार बढ़ती हुई महामारी के बीच भी दो अखबारों ने अपने संसाधनों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एक मृत 85 वर्षीय स्वयंसेवक के परिवार को झूठा साबित करने में लगा दिया। आगे बढ़ने से पहले भविष्य के प्रत्येक संदर्भ के लिए भारतीय मीडिया के ‘नैतिक दायित्व’ को ध्यान रखा जाए।

महाराष्ट्र में, जहाँ सरकार कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों को स्वास्थ्य सुविधाएँ दे पाने में असमर्थ दिख रही है, नागपुर के एक वरिष्ठ स्वयंसेवक नारायण दाभदकर ने 22 अप्रैल को अस्पताल में स्वेच्छा से अपना बेड उम्र में उनसे छोटे एक मरीज को दे दिया। नारायण काका ने कहा कि अब वह बहुत जी चुके हैं जबकि उस मरीज को अभी अपने बच्चों की देखभाल करनी है। इसके 3 दिन के बाद नारायण काका की मृत्यु हो गई।

RSS के स्वयंसेवक के इस त्याग को ‘फेक’ बताने के लिए पहले अखबार ने एक ‘एक्टिविस्ट’ के बयान को आधार मानते हुए खबर प्रकाशित की। इस एक्टिविस्ट ने किसी दूसरे अस्पताल से जानकारी जुटाई कि वहाँ ऐसा कोई मरीज था ही नहीं। ऐसे ही दूसरे अखबार ने उस अस्पताल के डॉक्टर के बयान को ही घुमा दिया, जहाँ नारायण काका भर्ती थे।

इस रिपोर्ट में कथित तौर पर डॉक्टर द्वारा कहा गया है कि वह अथवा उसका स्टाफ नारायण काका द्वारा अपना बेड किसी अन्य मरीज को दिए जाने के समय वहाँ मौजूद नहीं था। इससे अप्रत्यक्ष रूप से यही अर्थ निकलता है कि डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को मरीजों और उनके परिजनों की बातचीत पर पूरी नजर बनाए रखनी चाहिए और वहीं आसपास भटकते रहना चाहिए।

इन दोनों में से कोई भी रिपोर्ट यह साबित नहीं करती कि नारायण काका का परिवार झूठ बोल रहा है। लेकिन यह सही है कि लोकसत्ता द्वारा प्रकाशित फेक न्यूज और द इंडियन एक्स्प्रेस के प्रोपेगेंडा पर आधारित खबर के माध्यम से ‘सेक्युलर और लिबरल इकोसिस्टम’ RSS, उसके कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों को बदनाम करने का कार्य करेगा।

इस घटना से दो बातें सामने आती हैं। पहली यह कि ‘फैक्ट-चेकिंग’ अब फेक न्यूज और प्रोपेगेंडा फैलाने का एक नया माध्यम बन गया है और दूसरी यह कि मीडिया किसी भी ‘संघी’ अथवा एक प्रखर ‘हिन्दू पहचान’ वाले व्यक्ति द्वारा किए गए भले कामों को भी नकारने के लिए अत्यंत आतुर है।

इसके पीछे कारण है वह विचारधारा, जो हिन्दू धर्म को बुरा और अन्यायपूर्ण धर्म मानती है और यह विश्वास करती है कि हिन्दू धर्म ही भारत के अंदर सभी समस्याओं की जड़ है (इस चाइनीज महामारी के दौरान हिन्दू मंदिरों के प्रति उपजती हुई घृणा इसका द्योतक है)। अधिकतर पत्रकार इसी विचारधारा के सिपाही हैं। हालाँकि ये पत्रकार हिन्दू धर्म पर सीधा हमला नहीं कर सकते किन्तु वो ‘संघियों’ और ‘हिन्दू समूहों’ के अच्छे कार्यों को भी नजरअंदाज करके उन पर भी अपना प्रोपेगेंडा चलाते रहते हैं।

एजेंडा एक ही है, हिन्दू समाज को कमजोर बनाना क्योंकि एक कमजोर समुदाय पर आसानी से विजय प्राप्त की जा सकती है। इसी उद्देश्य के लिए ‘संघी’ और ‘हिन्दू समूह’ जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता है। RSS और उसके स्वयंसेवकों को बदनाम करने के अलावा, जैसा कि उन्होंने नारायण काका के मामले में किया, मीडिया हमेशा से यही प्रयास करती है कि ‘हिन्दू समूह’ किसी मूर्खतापूर्ण अथवा अस्वीकार्य कारणों (सनसनीखेज बयान, असुविधा उत्पन्न करने वाली और गैर-तार्किक घटनाओं) से खबरों में आएँ।

जब भी RSS अथवा कोई हिन्दू समूह किसी प्रकार का अच्छा कार्य करता भी है तो उसे इस तरीके से खबरों में ढाला जाता है कि उनके इस तरह के कार्यों का कोई महत्व न रह जाए। उदाहरण के लिए यदि RSS द्वारा किसी प्राकृतिक आपदा अथवा दुर्घटना के समय कोई सहायता की जाती है तो उसे इस प्रकार बताया जाएगा, ‘RSS ने बढ़ाया मदद का हाथ’ अथवा ‘स्थानीय निवासियों ने की घायलों की सहायता’। बाकी रिपोर्ट में कहीं RSS के कार्यों के बारे में थोड़ा-बहुत बता दिया जाएगा। अब यदि कोई हिन्दू समूह RSS की सहायता के लिए आता भी है, समान्यतः ऐसा ही होता है, तो खबर से ‘हिन्दू समूह’ को गायब कर दिया जाएगा।

इसका परिणाम होता है कि एक सामान्य हिन्दू यही सोचने लगता है कि यदि हिन्दू समूह किसी गतिविधि में है तो वह निश्चित तौर पर गलत ही होगी, भले ही वह समाज के हित में ही क्यों न हो। ऐसा होने के बाद एक सामान्य हिन्दू की नजरों में ‘हिन्दू समूहों’ द्वारा किया गया उनके ही हित से संबंधित कोई भी कार्य एक राजनैतिक अथवा अवसरवादी तराजू पर तौल दिया जाता है।

मीडिया का यह इकोसिस्टम ऐसे ही काम करता है। सबसे पहले तो मीडिया रिपोर्ट्स में हिंदुओं के खिलाफ होने वाले किसी अपराध को कोई महत्व ही नहीं दिया जाएगा लेकिन जब हिंदुओं के दबाव के कारण ऐसा करना पड़ेगा तब कुछ इस प्रकार रिपोर्टिंग की जाएगी, ‘हिन्दू समूहों ने XYZ घटना पर प्रदर्शन किया’। अब यह XYZ घटना किसी हिन्दू मंदिर से जुड़ी हो सकती है अथवा लव जिहाद या हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी पर आधारित हो सकती है। यहाँ तक कि इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हत्या या नरसंहार की खबरें या धमकियों से जुड़ी खबर में ‘हिन्दू समूह’ जुड़ जाने के कारण यह महत्वहीन हो जाती हैं। एक सामान्य हिन्दू इन खबरों को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। ऐसा इसलिए कि ‘हिन्दू समूह’ कभी भी किसी अच्छे उद्देश्य से खबरों में रहे ही नहीं। यही है सॉफ्ट ‘जेनोसाइड डिनायल’ जहाँ पीड़ित या तो फ्रेम से गायब हो जाता है या उसे ही दोष दे दिया जाता है।  

और इस प्रकार हिंदुओं को अस्तित्ववादी खतरों के प्रति अंधा बनाने का अंतिम लक्ष्य तय होता है। हिन्दू मारे जाएँगे और उन्हें सम्मान से भी वंचित रखा जाएगा, जैसे नारायण काका। हिंदुओं की हत्याएँ होंगी और हिन्दू ही अपनी हत्या के लिए दोषी माना जाएगा जैसे कमलेश तिवारी और कश्मिरी पंडित। इसके बाद भी यदि हिन्दू बच गए तो उन्हें इतना शर्मिंदा किया जाएगा कि वो किसी भी ‘हिन्दू समूह’ का हिस्सा न बनें।    

वास्तविक लेख इंग्लिश में यहाँ पढ़ा जा सकता है।

बंगाल चुनाव: ममता की एक दशक की गलतियों ने ही लिखी है बीजेपी की जीत की पटकथा!

गुरुवार (29 अप्रैल) को आठवें चरण के मतदान के साथ ही पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 का समापन हो गया। इस राज्य के इतिहास के सबसे बहुचर्चित चुनावों में से एक में सबकी नजरें इस बात पर टिकी हुई हैं कि क्या राज्य में सत्ता परिवर्तन और बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के साथ एक नए युग का सूत्रपात होगा या तृणमूल कॉन्ग्रेस लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करते हुए हैट-ट्रिक पूरी कर लेगी।

हिंसा प्रभावित आठ चरणों के मतदान के मैराथन दौर के पूरा होने के बाद सबको 2 मई की उस तारीख का इंतजार है, जो न केवल भारत के इस पूर्वी राज्य बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और दशा को बदलने वाली तारीख साबित हो सकती है। भले ही पश्चिम बंगाल जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जन्म भूमि रहा हो लेकिन मजह कुछ सालों पहले तक भारतीय जनता पार्टी के लिए ये अपने ही देश में किसी पराई जगह से कम नहीं था।

लेकिन 2014 में केंद्र की सत्ता में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की जोरदार जीत ने इस राज्य में भी पार्टी के लिए बदलाव की नई बहार बहाना शुरू कर दिया था। 2016 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 10 फीसदी वोट के साथ 3 सीटें मिली थीं और ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस ने करीब 45 फीसदी वोटों के साथ 294 में से 211 सीटों पर कब्जा जमाते हुए 2011 के चुनावों (टीएमसी-184 सीट) से भी बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन महज तीन साल बाद 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने 40 फीसदी वोटों के साथ 42 में से 18 सीटों पर कब्जा जमाते हुए पहली बार उस राज्य में अपनी मौजूदगी का अहसास करा दिया था, जहां कुछ सालों पहले तक किसी भी चुनाव से पहले शायद ही कोई उसकी जीत पर दाँव लगाता था।

सवाल ये है कि अगर पिछले कुछ सालों के दौरान बंगाल में बीजेपी के लिए माहौल और इतना जबर्दस्त माहौल बना है तो क्या उसके लिए नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता या फिर अमित शाह की कारगार रणनीति ही जिम्मेदार है? इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी को ‘बंगाली भद्रलोक’ वाले इस राज्य में मिल रही इतनी बड़ी कामयाबी के पीछे इन दो दिग्गजों का बड़ा हाथ रहा है। पर बीजेपी को राज्य में मिल रही कामयाबी के पीछे एक और बड़ी वजह रही है और वह है, तृणमूल कॉन्ग्रेस और ममता बनर्जी खुद।

याद कीजिए 2011 का वह दौर, जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा के 34 साल के शासन को खत्म करते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस की जीत से एक नई इबारत लिखी थी। उनकी जीत को बंगाल में ‘परिवर्तन’ की उम्मीद के तौर पर देखा गया था। उम्मीद थी कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य राजनीतिक हिंसा के उस रक्तरंजित दौर को पीछे छोड़ देगा, जो 34 साल के लेफ्ट शासन काल में उसके लिए एक स्याह सच बन गई थी। उम्मीद थी कि कभी पूर्व का मैनेचेस्टर कहलाने वाला राज्य औद्योगिक विकास के मामले में नई ऊँचाइयाँ छुएगा?

लेकिन ममता की उस ऐतिहासिक जीत के एक दशक बाद आज जब बंगाल का युवा इस राज्य की ओर देखता है तो उसे राजनीतिक हिंसा का दौर वाम मोर्चा से भी बदतर हालात में नजर आता है। टीएमसी की धुव्रीकरण की राजनीति में हिंदू युवा खुद को उपेक्षित सा महसूस करता है। कमाई के लिए अपना घर-बार छोड़कर दूसरे राज्यों की ओर पलायन करने वाले युवा ममता और टीएमसी से पूछना चाहते हैं कि उनके उन वादों का क्या हुआ जिसमें वो कभी ‘कोलकाता को लंदन बनाने का ख्वाब’ दिखाया करती थीं, वो पूछना चाहता है कि क्या शहर की सड़कों को लाइटों से सजा देने से या कुछ चमकदार फव्वारे लगा देने से ये लंदन बन गया? या फिर राज्य का ये सबसे विकसित शहर भारत के अन्य मेट्रो सिटी की तुलना में सबसे आगे हो गया?

कभी वाम मोर्चा के शासन को बंगाल के लिए काला अध्याय बताने वाली ममता बनर्जी के पिछले एक दशक के शासनकाल के दौरान वह भी खुद उसी राह पर चलती नजर आई हैं। बंगाल के आम जनों में एक कहावत बहुत चर्चित है कि ‘कल की लेफ्ट आज की टीएमसी बन गई’ है। यानी जो अराजक तत्व कल तक वाम मोर्चा के साथ थे वे अब अपनी टोपी का रंग बदलकर ममता की पार्टी के साथ आ खड़े हुए हैं।

बंगाल में अगर बीजेपी का उभार हुआ है तो इसके लिए बहुत हद तक ममता बनर्जी और टीएमसी खुद भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने जनता द्वारा दिखाए गए भरोसे को बार-बार छला है। नारद, सारदा जैसे घोटाले हों या मुस्लिम तुष्टिकरण, ममता बनर्जी अपने एक दशक के शासनकाल में बहुसंख्यक आबादी की उम्मीदों पर कभी भी खरी उतरती नजर नहीं आई हैं। चुनाव के ठीक पहले मंदिरों के लिए दौड़ लगाकर वह अपनी एक दशक की गलतियों को झुठलाना चाहती हैं, पर सवाल ये है कि क्या बंगाल की जनता उन्हें माफ करने के मूड में है? एग्जिट पोल के हिसाब से तो नहीं… बाकी 2 मई को नतीजा सबके सामने होगा।

आपदा में गिद्ध: ₹23000 में बेची जा रही दाह संस्कार की तस्वीरें, देशी-विदेशी मीडिया और फोटोग्राफर ले रहे फायदा

कोरोना संक्रमण से प्रभावित भारतीयों की संख्या ने इस समय विश्व भर की मीडिया का ध्यान देश की ओर खींचा हुआ है। ऐसे में अपने भारतीय दर्शकों को चकित करने के लिए विदेशी मीडिया लगातार हिंदू रीति-रिवाज से हुए दाह संस्कार की फोटो इस्तेमाल कर रहा है। बरखा दत्त द्वारा श्मशान में रिपोर्टिंग के बाद अब ऐसी तस्वीरें पश्चिमी मीडिया के लिए बेहद ‘महत्वपूर्ण’ हो गई हैं।

ब्रिटिश अमेरिकन मीडिया कंपनी Getty Images ने तो ऐसी तस्वीर के कारोबार को देखते हुए बकायादा इनके दाम तय किए हैं। इन्हें इस्तेमाल करने के लिए मीडिया ग्रुप तस्वीर यहाँ से खरीदकर अपनी खबरों में लगा सकते हैं। गेटी इमेज्स ने इनकी 3 तरह की कीमत तय की है। सबसे बढ़िया क्वालिटी की पिक्चर 23 हजार रुपए की है।

इनमें एक तस्वीर तो दिल्ली में कल ही क्लिक की गई। तस्वीर में कई बॉडी सड़क किनारे पड़ी हुई हैं। गेटी इमेज्स इसे 23,000 रुपए में दे देगा। 

अगली तस्वीर का प्राइज भी नीचे तस्वीर में देख सकते हैं।

इसके अलावा श्मशान के ऊपर ड्रोन से ली गई तस्वीरें भीं गेटी इमेज्स पर उपलब्ध हैं। इन्हें कई तरह की रिपोर्ट में इस्तेमाल होते हुए अब तक देखा जा चुका है। 

इसके अलावा एक परिवार की रोती बिलखती फोटो भी 23,000 रुपए में गेटी इमेज दे रहा है।

गौरतलब हो कि ये तस्वीरें भारत के ही कई फोटोग्राफरों ने खींची हैं। इसमें कुछ फ्रीलांसर भी हैं और कुछ मीडिया हाउस से जुड़े हुए भी हैं। इसका मतलब ये साफ है कि केवल गेटी इमेज्स ही नहीं बल्कि भारतीय फोटोग्राफर भी श्मशान में जल रहे शवों की तस्वीर खींचकर, उन्हें विदेशी या देशी मार्केट में बेचकर फायदा उठा रहे हैं।

इन तस्वीरों को देख ये बात स्पष्ट है कि विदेशी और कुछ देशी मीडिया भी इन्हें भारत में कोरोना से उपजी बदतर स्थिति दिखाने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए ये भी हैरानी की बात नहीं है कि भारतीयों की बिगड़ी हालत दिखाने के लिए गेटी इमेज इतनी भारी कीमतों पर इनका सौदा कर रहा है। 

गौरतलब है कि आपदा में फायदा उठाने का बिजनेस मॉडल हमेशा से पश्चिमी मीडिया के लिए अच्छा रहा है। इसलिए उन्होंने इसे भी उसी में शामिल कर दिया। प्रकाशक प्रकाशन का काम करता है, लेखक लिखता है और फोटोग्राफर संंबंधी फोटो उपलब्ध कराता है। मगर, इन सबका इन बात से कोई मतलब नहीं होता कि जिस पर आपदा का कहर टूटा है वह किस दुख से गुजर रहा है और इस तरह पश्चिमी और देशी मीडिया में उनकी तस्वीर पहुँचने से उन्हें कितना दुख होगा।

नोट: रिपोर्ट में इस्तेमाल हुई हर तस्वीर गेटी वेबसाइट का स्क्रीनशॉट है। हमने किसी भी कॉपीराइट नियम का उल्लंघन नहीं किया। खबर के लिए ये स्क्रीनशॉट लगाने जरूरी थे।

फातिमा शेख के साथ थप्पड़-घूँसा… जब जमीन पर गिर गईं, तब पापा को कॉल किया: सुनाई आपबीती

दंगल फिल्म में गीता फोगाट का किरदार निभाकर हर घर में अपनी पहचान बनाने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री फातिमा शेख ने पिंकविला को दिए इंटरव्यू में चौंकाने वाला खुलासा किया। पिंकविला से बातचीत में फातिमा ने अपने ऊपर हुए एक हमले की चर्चा की। इससे पहले वह एक साक्षात्कार में बता चुकी हैं कि उन्हें कैसे इंडस्ट्री में कई बार कास्टिंग काउच का शिकार होना पड़ा।

अपने साक्षात्कार में फातिमा ने बताया, “जिम के बाद मैं रास्ते में जा रही थी। एक लड़का आया और घूरने लगा। मैंने बोला- घूर क्या रहा है। वो बोला- घूरूँगा मेरी मर्जी। मैंने कहा- मार खानी है। वो बोला- हाँ मार।” इसके बाद दोनों के बीच आपसी बहस हो गई। तभी फातिमा ने तंग आकर उसे थप्पड़ मार दिया।

फातिमा के मुताबिक, “मेरे थप्पड़ मारते ही उसने मुझे घूँसा मार दिया और मैं गिर गई। उसके बाद मैंने तुरंत अपने पापा को कॉल किया और पूरा वाकया बताया। पापा तुरंत दो चार लोगों को अपने साथ लेकर मेरे पास पहुँचे, तब तक वो लड़का भाग गया था। मेरे पापा, मेरा भाई और उसके दोस्तों के साथ वहाँ खड़े होकर चिल्ला रहे थे- कौन था, जिसने मेरी बेटी को हाथ लगाया।”

बता दें कि इससे पहले एक इंटरव्यू में फातिमा ने कास्टिंग काउच पर बड़ा बयान दिया था। फातिमा ने कहा था, “बेशक मैं भी कास्टिंग काउच का शिकार हुई हूँ। मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ है, जब मेरे को कहा गया था कि अगर काम चाहिए तो सेक्स करना पड़ेगा। वहीं कई बार मेरे प्रोजेक्टस भी दूसरे लोगों के पास पहुँच गए, क्योंकि उनके पास रिफरेंस था।”

फातिमा ने अपने एक इंटरव्यू में ये भी बताया कि उनका शुरू में कैसे मनोबल गिराया गया। वह बोलीं, “मुझे कई बार ये सुनना पड़ा कि तुम कभी हीरोइन नहीं बन सकोगी। तुम दीपिका पादुकोण या ऐश्वर्या राय की तरह नहीं दिखती हो। कैसे हीरोइन बनोगी। कई लोग आपका मनोबल गिराने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन आज जब मैं मुड़कर देखती हूँ तो सोचती हूँ कि ठीक है, ये लोग खूबसूरती को इस पैमाने से देखते हैं कि एक ऐसी दिखने वाली लड़की ही हीरोइन बन सकती है। मैं इनके साँचे में फिट नहीं बैठती, मैं दूसरे साँचे के लिए हूँ। लेकिन अब कई अवसर हैं। मेरे जैसे लोगों के लिए भी फिल्में बनती हैं, जो सुपरमॉडल्स की तरह नहीं बल्कि नॉर्मल और दिखने में औसत हैं।”

कोविड से लड़ाई में अब आर्मी का साथ: आम जनता नजदीक के सेना अस्पताल में करा सकती है इलाज, PM मोदी से मिले सेनाध्यक्ष

Covid-19 के बढ़ते संक्रमण के बीच अब भारतीय सेना भी सक्रिय हो चुकी है। सेना के मेडिकल स्टाफ के कर्मचारी विभिन्न राज्यों की सहायता कर रहे हैं, साथ ही सेना के द्वारा देश के अलग-अलग हिस्सों में Covid-19 से संक्रमित मरीजों के ईलाज के लिए अस्थायी अस्पताल भी बनाए जा रहे हैं। यह जानकारी भारतीय सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दी। पीएम मोदी ने गुरुवार (29 अप्रैल) को भारतीय थल सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे के साथ Covid-19 महामारी में भारतीय सेना के द्वारा दिए जा रहे योगदान और सेना की तैयारी की समीक्षा करने के लिए बैठक की।

पीएम मोदी के साथ बैठक में शामिल हुए थल सेनाध्यक्ष नरवणे ने बताया कि सेना का मेडिकल स्टाफ राज्यों की हर संभव सहायता कर रहा है और देश के कई हिस्सों में Covid-19 संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए सेना अस्थायी अस्पतालों का निर्माण भी कर रही है। सेनाध्यक्ष ने यह भी कहा कि कई स्थानों पर भारतीय सेना अपने अस्पतालों को आम जनों के लिए खोल रही है और नागरिक अपने निकटतम सेना अस्पताल की सेवा ले सकते हैं।

सेनाध्यक्ष नरवणे ने बैठक में पीएम मोदी को सूचना दी कि सेना आयातित ऑक्सीजन टैंकरों और उनके परिवहन के लिए उपयुक्त वाहनों के प्रबंधन के लिए आवश्यक सहायता मुहैया करा रही है। उन्होंने कहा कि जहाँ भी दक्षता और कुशलता की बात है, वहाँ सेना सहायता करने के लिए तत्पर है।

इस समय देश में ऑक्सीजन की आपूर्ति एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में ऑक्सीजन के उत्पादन और परिवहन से जुड़े किसी भी प्रकार के उपकरणों का उचित प्रबंधन एवं निर्बाध परिवहन अति आवश्यक है। ऐसे समय में भारतीय सेना कुशल तरीके से Covid-19 महामारी से लड़ने में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपना सहयोग दे सकती है।

भारतीय सेना के अलावा भारतीय वायुसेना भी सक्रियता से Covid-19 संक्रमण के खिलाफ इस युद्ध में शामिल है। ऑक्सीजन के टैंकरों के परिवहन की बात हो या आवश्यक दवाओं और उपकरणों को शीघ्रता से एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने की, भारतीय वायुसेना लगातार अपने विमानों के माध्यम से Covid-19 संक्रमण से निपटने में सरकार की सहायता कर रही है। यहाँ तक कि स्वास्थ्यकर्मियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में भी वायुसेना अपना योगदान दे रही है। इसके अलावा वायुसेना विदेशों से भी ऑक्सीजन से संबंधित उपकरणों के आयात में भी सहायक साबित हो रही है।  

पिछले 24 घंटों में देश में 3,70,000 से अधिक Covid-19 संक्रमण के मामले सामने आए हैं। इसके साथ ही भारत में कुल संक्रमितों की संख्या 1.80 करोड़ से अधिक हो चुकी है। संक्रमण बढ़ने के साथ ही देश की स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में भारतीय सेना का दक्ष और कुशल कार्यबल सरकार की काफी सहायता कर सकता है।

Rutgers University में हिंदूफोबिया के खिलाफ प्रस्ताव पास: वामपंथी प्रोफेसर अब हिंदू छात्रों के माता-पिता के पीछे

24 अप्रैल 2021 को रटगर्स यूनिवर्सिटी स्टूडेंट असेंबली (RUSA) ने हिंदूफोबिया की परिभाषा को अपनाते हुए एक ऐतिहासिक प्रस्ताव (No. 1451-XX) पारित किया। यह प्रस्ताव अंडरस्टैंडिंग हिंदूफोबिया कॉन्फ्रेंस के निष्कर्ष के 14 दिन बाद आया।

इस कॉन्फ्रेंस को यूनिवर्सिटी में लगातार हिंदूफोबिक घटनाएँ देखते हुए आयोजित किया गया था। मामले के संबंध में हिंदू छात्रों के समूह ने मार्च में याचिका डाली थी। इसमें यूनिवर्सिटी से विवादित इतिहासकार व प्रोफेसर ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की बात की गई थी।

इन सबके बावजूद प्रोफेसर ऑड्रे ट्रूस्के सुधरने की बजाय उन छात्रों के अभिभावकों को स्टॉक करने लगीं, जिन्होंने कॉन्फ्रेंस में भाग लिया था। इसके प्रमाण, ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी में नस्लवाद का शिकार होने वाली स्टूडेंट यूनियन की पूर्व अध्यक्ष रश्मि सामंत ने भी पेश किए।

रश्मि सामंत द्वारा शेयर किया गया स्क्रीनशॉट

सामंत ने रटगर्स यूनिवर्सिटी के किसी एक छात्र के साथ अपनी चैट पब्लिक की। इससे साफ है कि प्रोफेसर LinkedIn के जरिए छात्रों के माता-पिता को स्टॉक कर रही हैं।

अनुमान है कि ऐसा सिर्फ यूनिवर्सिटी के हिंदू छात्रों को निशाना बनाने के लिए हो रहा है बिलकुल वैसे जैसे रश्मि सामंत को बनाया गया था। सामंत लिखती हैं, “घटिया। ऑड्रे ट्रूस्के क्या ऑक्सफॉर्ड के अभिजीत सरकार की तरह हेट कैंपेन चलाना चाहती हैं? ”

ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ हिंदू छात्रों ने लिखा यूनिवर्सिटी को पत्र

बता दें कि हिंदूफोबिक ऑड्रे ट्रूस्के के ख़िलाफ़ यह मुद्दा हिंदू छात्रों द्वारा उठाया गया था। छात्रों ने यूनिवर्सिटी को पत्र लिख कर बताया कि ऑड्रे इतिहास के नाम पर हिंदूफोबिक फिक्शन बेच रही हैं। याचिका में कहा गया कि ऑड्रे ने औरंगजेब द्वारा किए गए हिंदू नरसंहार को तुच्छ दिखाने की कोशिश की।

लेटर में बताया गया कि कैसे यूनिवर्सिटी में हिंदू धर्म, हिंदू देवी-देवता और पवित्र ग्रंथों का लगातार मजाक बनाकर अभियान चल रहा है। इससे कैंपस में या फिर सोशल मीडिया में उनके धर्म के कारण उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है, कोई भी उन पर हमला कर सकता है। हिंदू छात्रों ने इस मुद्दे को प्राथमिकता से तब उठाया, जब कई अन्य फैकल्टी सदस्यों ने ऑड्रे ट्रूस्के का समर्थन किया।

बता दें कि 7 मार्च को हिंदू समूह के छात्रों ने बताया था कि कैसे ऑड्रे ट्रूस्के यूनिवर्सिटी में हिंदुओं के ख़िलाफ़ माहौल बना रही हैं। अमेरिका में हुई हिंसा के समय ट्रुस्के ने ही भारतीय झंडे को देख हिंदू दक्षिणपंथियों को घेरा था। इसके बाद उन्होंने भगवद् गीता को लेकर फर्जी बातें कहीं और साथ में गैंगरेप जैसी घटनाओं को महाभारत की घटना के समतुल्य रख बताया कि हिंदू संस्कृति में रेप कल्चर है।

हिंदूफोबिया की परिभाषा

इन घटनाओं के बाद रटगर के कई फैकल्टी सदस्यों ने ऑड्रे ट्रूस्के का समर्थन किया, जिसे देख हिंदू छात्र इतना परेशान हुए कि उन्होंने विश्वविद्यालय में आवेदन करने का फैसला किया। स्टूडेंट्स ने हिंदूफोबिया पर एक कॉन्फ्रेंस की। इसमें कुछ संशोधनों के साथ हिंदोफोबिया की एक नई परिभाषा दी गई, जो इस प्रकार है- “सनातन धर्म (हिंदू धर्म) और हिंदुओं के प्रति विरोधी, विनाशकारी, और अपमानजनक व्यवहार और सामूहिक व्यवहार जो भय या घृणा प्रकट कर सकता है।”

रश्मि सामंत कौन हैं?

रश्मि सामंत, कर्नाटक से हैं। हाल में वह ऑक्सफॉर्ड स्टूडेंट यूनियन में पहली भारतीय महिला के तौर पर अध्यक्ष चुनी गईं। लेकिन उनके कुछ विरोधियों ने उनके ख़िलाफ सोशल मीडिया पर उनके पुराने पोस्ट वायरल कर दिए। उन पर इस्लामोफोबिक समेत तमाम इल्जाम लगने लगे। नतीजन उन्हें एक हफ्ते में पद से इस्तीफा देना पड़ा। बाद में सामंत भारत आ गईं। मानसिक तौर से प्रताड़ित हुईं सामंत यहाँ कई दिन अस्पताल में रहीं। ठीक होने के बाद उन्होंने दोबारा यूनिवर्सिटी जाकर अपनी पढ़ाई खत्म करने का फैसला किया।

जिसके ट्ववीट पर किया ‘फैक्टचेक’, उसने गलत वीडियो के लिए माँगी माफी: ‘लोकसत्ता’ ने चुपके से एडिट की रिपोर्ट

मराठी मीडिया संस्थान ‘लोकसत्ता’ ने नागपुर के 85 वर्षीय RSS स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर के बलिदान को झूठा बताने की कोशिश की थी। अब उसने एक अपुष्ट ट्वीट पर आधारित अपनी तथाकथित ‘फैक्टचेक’ रिपोर्ट को चुपके से एडिट कर दिया है। ‘लोकसत्ता’ ने दाभाडकर और उनके परिवार को बदनाम करने के लिए rohanrtweets नामक ट्विटर हैंडल के एक अपुष्ट वीडियो के आधार पर झूठ फैलाया था।

अब उस वीडियो को डिलीट कर दिया गया है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि नारायण भाऊराव को नागपुर के इंदिरा गाँधी अस्पताल में भर्ती नहीं कराया गया था। सच्चाई ये है कि उन्हें इंदिरा गाँधी रुग्णालय में भर्ती कराया गया था। ‘लोकसत्ता’ ने एक दूसरे इंदिरा गाँधी सरकारी अस्पताल से बातचीत कर रिपोर्ट बना दी थी। सोशल मीडिया पर लोगों ने इस रिपोर्ट में हुई गलतियों की तरफ ध्यान दिलाया।

‘लोकसत्ता’ ने चुपचाप इस रिपोर्ट को एडिट कर दिया और इसमें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)’ के विदर्भ प्रान्त के कैम्पेन चीफ अनिल साम्ब्रे का बयान जोड़ दिया। साम्ब्रे ने स्पष्ट कहा कि ये घटना सच्ची है। उन्होंने बताया कि नारायण भाऊराव ने अस्पताल से विनती की कि उनका बेड किसी और को दे दिया जाए और अस्पताल ने ऐसा किया। उन्होंने ये भी कहा कि मीडिया का एक हिस्सा इसे गलत रूप में पेश कर रहा है।

‘लोकसत्ता’ द्वारा की गई एडिटिंग

‘लोकसत्ता’ ने इस दौरान उस ट्वीट का भी जिक्र किया, जिसके आधार पर ये रिपोर्ट बनाई गई थी। ये ट्वीट अब डिलीट कर दिया गया है और यूजर ने ग़लतफ़हमी फैलाने के आरोपों पर माफ़ी भी माँगी है। यूजर रोहन ने कहा कि उनका ट्वीट अपुष्ट था, जिसके आधार पर ‘लोकसत्ता’ ने खबर बनाई। उन्होंने कहा कि वो इस प्रकरण से दुःखी हैं। उन्होंने नारायण भाऊराव दाभाडकर की बेटी के बयान का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने सारे तथ्य साफ़ कर दिए हैं।

यूजर ने ट्वीट डिलीट कर माँगी माफ़ी

रोहन ने लिखा, “ऐसे कठिन समय में इस तरह का बलिदान देने के लिए अनंत साहस चाहिए होता है। मैंने इस अपुष्ट वीडियो को देखा था और इसे सही समझा। लेकिन, आश्वारी मैम का वीडियो देखने के बाद मैं खेद व्यक्त करता हूँ कि मैंने बिना सच्चाई जाने इस वीडियो को शेयर किया। मैं दाभाडकर परिवार के दुःख को समझ सकता हूँ।” उन्होंने ये भी बताया कि कई लोग गलत दावा कर रहे हैं कि दाभाडकर ज़िंदा हैं।

बता दें कि ‘लोकसत्ता’ का कथित फैक्टचेक नागपुर के एक तथाकथित समाजसेवक शिवम थावरे की इंदिरा गाँधी हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट अजय प्रसाद से हुई बातचीत पर आधारित था। दाभाडकर की बेटी आश्वारी के अनुसार, जब उनके पिता अस्पताल में भर्ती थे तो उन्होंने बाहर बेड के लिए हंगामा सुना। तभी उन्होंने फैसला किया कि वे तो अपनी ज़िंदगी जी चुके है, इसलिए उनके द्वारा लिए गए बेड के कारण कहीं किसी युवा की जान न चली जाए। ये बताते-बताते आश्वारी दाभाडकर रो पड़ी थीं।

‘मास्क पहनना मूर्खता, मैंने भिखारियों साथ खाया… नहीं हुआ कोरोना’: सिंघम-2 के एक्टर मंसूर अली खान पर ₹2 लाख का जुर्माना

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिल फिल्मों में सहायक किरदार निभाने वाले अभिनेता को कोरोना वैक्सीन को लेकर अफवाह फैलाने के आरोप में 2 लाख रुपए बतौर जुर्माना राज्य सरकार के पास जमा कराने को कहा है। इससे पहले अप्रैल में मंसूर अली खान को गैर-जमानती धाराओं में आरोपित बनाया गया था। उन्होंने तमिलनाडु में कोरोना टीकाकरण अभियान को लेकर गलत सूचनाएँ फैलाई थी। इस पर उनकी खूब आलोचना भी हुई थी।

मंसूर अली खान ने अभिनेता विवेक के निधन को कोरोना वैक्सीन से जोड़ा था। उन्होंने आरोप लगाया था कि स्थानीय प्रशासन और सरकारें मिल कर लोगों की ‘हत्या’ कर रही है। तमिल फिल्मों में अक्सर कॉमेडी किरदार निभाने वाले विवेक को रजनीकांत की फिल्म ‘शिवाजी’ में उनके किरदार के लिए ज्यादा जाना जाता था। SIMS अस्पताल में उनका निधन होने के बाद खान ने दावा किया था कि वो वैक्सीन लेने से पहले एकदम ठीक थे।

मंसूर अली खान ने मास्क पहनने के सरकारी और मेडिकल दिशा-निर्देशों को ‘मूर्खतापूर्ण कार्य’ तो बताया ही था, साथ ही दावा किया था कि चुनाव प्रचार के दौरान वो जमीन पर सोए और भिखारियों के साथ जम कर अपना खाना शेयर किया, लेकिन उन्हें कोरोना वायरस संक्रमण नहीं हुआ। खान ने बाद में उम्मीदवार के रूप में अपना नाम वापस ले लिया था। तमिलनाडु में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम 2 मई को आएँगे।

स्थानीय भाजपा यूनिट ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कराया था। ‘द ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (GCC)’ ने भी उनके खिलाफ ‘पब्लिक हेल्थ एक्ट’ के तहत मामला दर्ज किया था। मंसूर अली खान के पर गिरफ़्तारी की तलवार लटक रही थी, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। वडापानी पुलिस थाने ने उनके खिलाफ IPC की धारा-153 (बेहूदगी से लोगों को भड़काना), 270 (अपने क्रियाकलापों से संक्रमण फैलाना और दूसरों की जान खतरे में डालना), और 505(1)(b) (जनता में भय पैदा करना) के तहत मामला दर्ज किया था।

साथ ही उन पर एपिडेमिक्स एक्ट और डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत भी मामले दर्ज किए गए थे। मंसूर अली खान ने मद्रास उच्च-न्यायालय में दायर की गई याचिका में अपने बचाव में कहा कि उन्होंने एक अस्पताल के गेट पर इमोशनल होकर ये बयान दिए थे और उनका इरादा किसी को ठेस पहुँचाने का नहीं था। 30 वर्षों से तमिल फिल्मों में सक्रिय मंसूर अली खान ने कई बार राजनीति में भी किस्मत आजमाई है लेकिन नाकाम रहे।