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भारत की मिसाइलों से दहला पाकिस्तान का जर्रा-जर्रा, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के घर से मात्र 20KM दूर गिरा बम: इस बार लाहौर, कराची समेत 9 शहर लिए निशाने पर

भारत ने पाकिस्तान पर जवाबी कार्रवाई करते हुए 300 किलोमीटर तक अंदर मौजूद ज्यादातर अहम ठिकानों पर जबरदस्त हमले किये जिससे पाकिस्तान थर्रा उठा। 8 मई की रात पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद समेत 9 अहम शहरों पर भारत ने मिसाइलों और ड्रोन की बौछार कर दी। एबटाबाद जहाँ कभी आतंकवादी ओसाम बिन लादेन छिपा हुआ था उस शहर पर भी मिसाइल दागे गए।

इतना ही नहीं एलओसी पर हो रहे गोलीबारी और ड्रोन अटैक का भी जबरदस्त जवाब दिया। न सिर्फ पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल अटैक को निरस्त किया बल्कि ताबड़तोड़ जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान की नाक में दम कर दिया। भारत ने जिन शहरों पर हमले किये उसमें इस्लामाबाद, लाहौर, कराची, सियालकोट, पेशावर, बहावलपुर शामिल हैं। भारत की वायु सेना. नौसेना और थल सेना ने कदम से कदम मिलाते हुए पूरे ऑपरेशन को अंजाम दिया।

कराची पर जबरदस्त हमला

अरब सागर में तैनात विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत ने कराची पर बड़ा हमला किया और एक के बाद एक कई मिसाइलें और ड्रोन दागे। पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कहा जाने वाला शहर कराची पर अटैक से पाकिस्तान तिलमिला उठा है। ये पाकिस्तान का अहम बंदरगाह है जो भारत से करीब 350 किलोमीटर दूर है।

इस्लामाबाद- लाहौर पर अटैक

भारत के गोले राजधानी इस्लामाबाद तक पहुँच गए। यहाँ राष्ट्रपति, पीएम कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन जैसे अहम संस्थान हैं। वहीं पाकिस्तानी पंजाब का अहम शहर लाहौर भारत के निशाने पर रहा।

पेशावर और रावलपिंडी पर हमला

खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानी पेशावर कई मायने में पाकिस्तान के लिए अहम है। भारत के ड्रोन ने यहाँ स्थित पाकिस्तानी सैन्य ठिकानों पर हमला किया। वहीं रावलपिंडी पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय है। भारत ने पाकिस्तानी सेना के गढ़ पर हमला कर ये साबित किया कि हम घर में घुस कर मारेंगे.

सियालकोट पर जवाबी कार्रवाई

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के उत्तर पूर्व में स्थित सियालकोट पाकिस्तानी फौज के लिए काफी अहम है और व्यावसायिक शहर भी है। ये अमृतसर से 100 किलोमीटर दूर है जबकि जम्मू से 47 किलोमीटर दूर है। भारत ने जवाबी कार्रवाई में पाकिस्तान के अंदर 300 किलोमीटर से ज्यादा दूर शहरों पर भी बम बरसाए। इसके अलावा गुजरांवाला, अटॉक, मिआनो, खेनजूं, बहावा जैसे शहरों में भी धमाके हुए. यहाँ तक कि पाकिस्तान के एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम यानी AWACS को भी नष्ट कर दिया।

8 मई को देर रात रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा, “केवल पाकिस्तान ही ये फैसला ले सकता है कि वो भारत के साथ तनाव कम कर सकता है या नहीं क्योंकि भारत ने पहलगाम हमले का जवाब दिया था। इससे पहले भारत ने जम्मू से जैसलमेर तक पाकिस्तान के ड्रोन और मिसाइल हमले को नाकाम कर दिया. भारतीय एयर डिफेंस सिस्टम सुदर्शन ने इन हमलों को नाकाम किया है. पाकिस्तान के हमले को देखते हुए जम्मू कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, हिमाचल समेत कई राज्यों के कई शहरों में ब्लैक आउट किया गया था. भारतीय सुरक्षाबलों ने पाकिस्तान के अत्याधुनिक विमान F-16 और JF-17 को मार गिराए. भारत ने 7 मई को कई शहरों में पाकिस्तानी वायु रक्षा प्रणालियों को निशाना बनाया था

जिस ‘द आयरिश टाइम्स’ ने चलाया पाकिस्तान का प्रोपेगेंडा, उसी में लेख लिख कर भारतीय राजदूत ने लगाई लताड़: ऑपइंडिया को बताया – ये हमेशा चलाते हैं हिन्दू विरोधी एजेंडा

आयरलैंड में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले पर ‘द आयरिश टाइम्स’ के संपादकीय की तीखी आलोचना की। उन्होंने अखबार पर हिंसा की स्पष्ट रूप से निंदा न करने और इसके बजाय आतंकवादियों तथा उनके समर्थकों को अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण देने का आरोप लगाया। अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ के दृष्टिकोण को पक्षपातपूर्ण और संवेदनहीन बताया।

मंगलवार (6 मई, 2025) को भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ द्वारा फैलाए गए दुष्प्रचार का एक विस्तृत खंडन प्रकाशित किया। उन्होंने इस पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि अखबार ने पहलगाम आतंकवादी हमले के संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कथित ‘तलवारें लहराने’ की आलोचना पर तो ज़ोर दिया, लेकिन हमले के पीड़ितों के प्रति संवेदना या एकजुटता दिखाने में पूरी तरह विफल रहा।

‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट साझा करते हुए भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने कहा, “पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले पर ‘द आयरिश टाइम्स’ के दुर्भावनापूर्ण संपादकीय पर अखिलेश मिश्रा का जवाब – यह लेख आतंकवाद की स्पष्ट निंदा करने और निर्दोष पीड़ितों के प्रति सहानुभूति जताने की बजाय, प्रधानमंत्री मोदी पर ‘तलवारें लहराने’ का आरोप लगाता है और भारत की तुलना पाकिस्तान से करता है, जिससे आतंकवादियों और उनके प्रायोजकों को अप्रत्यक्ष रूप से कवर फायर मिलता है।”

‘द आयरिश टाइम्स’ के संपादक को लिखे एक पत्र में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने कहा कि जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले पर अखबार के संपादकीय में न केवल पेशेवर निष्पक्षता का अभाव है, बल्कि यह आयरलैंड के आम नागरिकों और नेताओं, विशेषकर ताओसीच माइकल मार्टिन द्वारा भारत के प्रति व्यक्त की गई सहानुभूति के भी विपरीत है। मिश्रा ने उल्लेख किया कि मार्टिन ने स्पष्ट रूप से कहा था कि आयरलैंड इस दुखद घटना के मद्देनज़र भारत के लोगों के साथ एकजुटता में खड़ा है।

राजदूत अखिलेश मिश्रा ने अपने पत्र में यह स्पष्ट किया कि यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा की है। उन्होंने ‘द आयरिश टाइम्स’ के संपादकीय में महत्वपूर्ण विवरणों की अनुपस्थिति को भी उजागर किया, विशेष रूप से उन बयानों की, जिनमें हमले के अपराधियों को जवाबदेह ठहराने की संयुक्त राष्ट्र की अपील शामिल थी। मिश्रा ने आलोचना की कि अखबार ने इन गंभीर पहलुओं को दरकिनार करते हुए जम्मू और कश्मीर में भारत सरकार की नीतियों पर ध्यान केंद्रित करना चुना।

राजदूत अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ को संबोधित अपने पत्र में जोर देकर कहा कि पहलगाम आतंकी हमले की वैश्विक स्तर पर कड़ी निंदा की गई है। उन्होंने उल्लेख किया कि यूरोपीय संघ की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन इस हमले की निंदा करने वाली पहली वैश्विक नेताओं में से थीं, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी सर्वसम्मति से इस नृशंस कृत्य की आलोचना करते हुए अपराधियों, आयोजकों, वित्तपोषकों और प्रायोजकों को न्याय के कटघरे में लाने की आवश्यकता पर बल दिया। मिश्रा ने आलोचना की कि ‘द आयरिश टाइम्स’ ने संयुक्त राष्ट्र के इस महत्वपूर्ण बयान को अपने संपादकीय में नज़रअंदाज़ कर दिया।

उन्होंने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि निर्दोष पीड़ितों के साथ खड़े होने के बजाय अखबार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ‘तलवारें लहराने’ का आरोप लगाया और भारत की पाकिस्तान से तुलना की—एक ऐसा देश जिसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा नामित आतंकवादियों को शरण देने और ओसामा बिन लादेन को वर्षों तक छिपाने के लिए जाना जाता है। मिश्रा ने यह भी रेखांकित किया कि 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू और कश्मीर में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिसमें तेज़ आर्थिक विकास, विदेशी निवेश में वृद्धि और पर्यटन क्षेत्र का विस्तार शामिल है।

पत्र में ‘द आयरिश टाइम्स’ की इस धारणा को भी गलत बताया गया कि जम्मू कश्मीर में प्रत्यक्ष शासन और सुरक्षा उपायों के चलते स्थानीय लोगों को ‘झटका’ लगा है। मिश्रा ने स्पष्ट किया कि इसके विपरीत, इन कदमों ने क्षेत्र में स्थायित्व और समृद्धि को बढ़ावा दिया है।

राजदूत अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ को लिखे पत्र में बताया कि 2019 में भारतीय संविधान से अस्थायी अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद जम्मू और कश्मीर में अभूतपूर्व आर्थिक और अवसंरचनात्मक विकास हुआ है। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में घरेलू और विदेशी निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, पर्यटन तेज़ी से बढ़ा है, और एक पूर्ण लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया का पुनरुद्धार हुआ है। इसका प्रमाण 2024 में हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं, जिसमें 63.9 प्रतिशत मतदान के साथ लोगों ने लोकतांत्रिक सरकार चुनी।

मिश्रा ने आगे कहा कि पहलगाम में हुए इस्लामिक आतंकी हमले के बाद भारत में गहरा आक्रोश है। पूरा देश—जिसमें कश्मीर घाटी के नागरिक, सभी राजनीतिक दल, विपक्षी नेता, प्रमुख मुस्लिम नेता और नागरिक समाज शामिल हैं—सरकार के उस संकल्प के साथ खड़ा है, जिसके तहत इस जघन्य हमले के अपराधियों और साजिशकर्ताओं को न्याय के कठघरे में लाया जाएगा।

आयरलैंड में भारत के राजदूत ने ऑपइंडिया से की बात

ऑपइंडिया को ईमेल पर दी गई प्रतिक्रिया में आयरलैंड में भारत के राजदूत अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ पर भारत के प्रति ‘बेहद नकारात्मक’ रवैया अपनाने का आरोप लगाया। अखिलेश मिश्रा ने कहा कि भले ही अखबार की भारत से जुड़ी अधिकांश खबरें समाचार एजेंसियों से ली जाती हैं, लेकिन इसके संपादकीय और राय लेख लगातार एकतरफा रहे हैं, जिनमें भारत की आलोचना और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति कठोर टिप्पणियाँ प्रमुख रही हैं। उन्होंने इस रुख को भारत की छवि खराब करने और उसके खिलाफ पक्षपातपूर्ण बयानबाज़ी को बढ़ावा देने का ‘सुनियोजित प्रयास’ बताया।

राजदूत मिश्रा ने स्पष्ट किया कि भारतीय दूतावास ने ‘द आयरिश टाइम्स‘ को बार-बार इस तरह की मोदी-विरोधी और भारत-विरोधी सामग्री प्रकाशित करने पर चेताया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अखबार न केवल पक्षपाती है, बल्कि ‘हिंदुओं की भावनाओं के प्रति संवेदनहीन’ भी रहा है।

भारतीय राजदूत अखिलेश मिश्रा ने ‘द आयरिश टाइम्स’ पर एक बार फिर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि हाल ही में प्रकाशित संपादकीय ‘भारत और पाकिस्तान पर आयरिश टाइम्स का दृष्टिकोण व्यापक संघर्ष से बचना चाहिए’ के अलावा, आयरिश मीडिया आउटलेट ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक हिटजॉब भी प्रकाशित की थी। इस लेख का शीर्षक था – “भारतीय चुनाव पर आयरिश टाइम्स का दृष्टिकोण, मोदी ने अपनी पकड़ मजबूत की”, जिसमें भारत पर ‘असहिष्णु हिंदू-प्रथम बहुसंख्यकवाद’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया।

अखबार ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के पक्ष में तर्क प्रस्तुत करते हुए दावा किया कि भारत की ‘लोकतांत्रिक साख को भारी नुकसान पहुँचा है’ और प्रधानमंत्री मोदी की तुलना तुर्की के इस्लामवादी नेता रेसेप तैय्यप एर्दोआन से की। उस समय भी राजदूत अखिलेश मिश्रा ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए ‘द आयरिश टाइम्स’ के प्रचार और पूर्वाग्रह से भरे रुख की कड़ी निंदा की थी।

अगस्त 2023 में ‘द आयरिश टाइम्स’ ने एक और मोदी-विरोधी संपादकीय प्रकाशित किया था, जिसमें उसने बिना पर्याप्त तथ्यों के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को मणिपुर में जातीय हिंसा भड़काने के लिए दोषी ठहराया। इस लेख में न केवल मैतेई हिंदू समुदाय को बदनाम किया गया, बल्कि कुकी ईसाई समूहों की संलिप्तता, विशेष रूप से म्यांमार और मणिपुर से मिज़ोरम और बांग्लादेश के माध्यम से होने वाली अफीम और सिंथेटिक ड्रग्स की तस्करी में उनकी भूमिका को नजरअंदाज किया गया। इसके अलावा, अखबार ने ‘दक्षिणपंथी हिंदू चरमपंथियों से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को खतरा’ जैसे भ्रामक आरोप लगाए, जबकि इस्लामी हिंसा के कई मामलों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया।

राजदूत अखिलेश मिश्रा ने उस समय भी इस पक्षपातपूर्ण और भ्रामक संपादकीय का स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब दिया था। उन्होंने बताया कि उनके जवाब  द आयरिश टाइम्स की वेबसाइट के “संपादक को पत्र” खंड में प्रकाशित तो हुए, लेकिन अखबार ने उनके पत्रों को “गंभीर रूप से विकृत” कर प्रस्तुत किया। जब ऑपइंडिया ने पूछा कि क्या अखबार ने उन खंडनों का कोई उत्तर दिया या अपने दृष्टिकोण में कोई बदलाव किया, तो अखिलेश मिश्रा ने स्पष्ट किया कि न तो अखबार ने कोई प्रतिक्रिया दी, न ही भारत और विशेष रूप से हिंदू समुदाय के प्रति अपने पूर्वाग्रही और संवेदनहीन दृष्टिकोण को बदला।

ऑपइंडिया द्वारा पूछे गए एक अन्य सवाल के जवाब में अखिलेश मिश्रा ने बताया कि पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों द्वारा 26 निर्दोष लोगों की धार्मिक आधार पर हत्या किए जाने वाले पहलगाम आतंकी हमले को लेकर आयरलैंड के प्रधानमंत्री ने भारत और पीड़ितों के प्रति संवेदना और एकजुटता प्रकट की थी।

हालाँकि, जब पाकिस्तान में भारत द्वारा की गई आतंकवाद विरोधी कार्रवाई ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर आयरलैंड की आधिकारिक प्रतिक्रिया के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि ‘अब तक आयरिश पक्ष ने ऑपरेशन सिंदूर पर कोई बयान जारी नहीं किया है।’

आयरिश टाइम्स या पाकिस्तान टाइम्स: पीड़ित को ही दिखाता है उपद्रवी

28 अप्रैल को प्रकाशित द आयरिश टाइम्स  के संपादकीय ‘भारत और पाकिस्तान पर आयरिश टाइम्स का दृष्टिकोण व्यापक संघर्ष से बचना चाहिए’ की भारत में तीव्र आलोचना हुई, विशेष रूप से आयरलैंड में भारतीय राजदूत अखिलेश मिश्रा द्वारा, जिन्होंने इसे ‘पाकिस्तानी प्रचार’ के अनुरूप बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संपादकीय ने भारत को पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद का शिकार होने के बावजूद एक हमलावर के रूप में दिखाया, जबकि पाकिस्तान को एक भयभीत पीड़ित की तरह पेश किया गया।

संपादकीय में पाकिस्तान के ‘जिम्मेदारी से इनकार’ और ‘स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच’ में सहयोग की बात तो की गई, लेकिन भारत की ओर से वर्षों से आतंकवाद पर प्रस्तुत किए गए ठोस सबूतों की पूरी तरह से अनदेखी की गई। उदाहरणस्वरूप, 26/11 मुंबई हमलों के बाद भारत ने पाकिस्तान को लश्कर-ए-तैय्यबा और जमात-उल-दावा प्रमुख हाफ़िज़ सईद की संलिप्तता के साथ कई डोजियर सौंपे।

मार्च 2012 में पाकिस्तानी न्यायिक आयोग को भारत आकर गवाहों के बयान दर्ज करने की अनुमति भी दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान की अदालतों ने सईद को दोषमुक्त कर दिया। इसी तरह, पठानकोट (2016) और पुलवामा (2019) आतंकी हमलों में भी भारत ने पाकिस्तान को सबूत सौंपे, जिसमें हमलावरों की पहचान, DNA नमूने और वित्तीय दस्तावेज शामिल थे, लेकिन पाकिस्तान ने न तो कोई कार्रवाई की, न ही जाँच में सहयोग दिया।

राजदूत अखिलेश मिश्रा ने यह भी इंगित किया कि द आयरिश टाइम्स को यह अपेक्षा है कि भारत पाकिस्तान को सबूत देता रहे, जबकि पाकिस्तान उनका वर्षों तक उपयोग न करे, उन्हें खारिज कर दे या आतंकवादियों की मौजूदगी से ही इनकार कर दे। उन्होंने कहा कि यह नजरिया इस हकीकत को नजरअंदाज करता है कि पाकिस्तान की धरती से सक्रिय इस्लामी आतंकी संगठनों को वहाँ की सरकार, सेना और ISI का संरक्षण प्राप्त है, जो उन्हें भारत के खिलाफ प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

संपादकीय ने अनुच्छेद 370 और 35A के निरसन पर भी विरोध जताते हुए कहा कि मोदी सरकार ने भारत के एकमात्र मुस्लिम-बहुल राज्य की सीमित स्वायत्तता छीन ली। अखिलेश मिश्रा ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि द आयरिश टाइम्स ने कश्मीर की धार्मिक जनसांख्यिकी के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और यह बताना उचित नहीं समझा कि 1990 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं को जिहादी हिंसा के चलते उनके ही घरों से मार-भगाया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 370 और 35A का हटाया जाना मुस्लिम समुदाय पर अत्याचार नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सुधार था। जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा है।

अखिलेश मिश्रा के अनुसार, यह वही हिंदू-विरोधी मानसिकता है जो कश्मीरी पंडितों के पलायन और हाल के पहलगाम आतंकी हमले दोनों की जड़ में है। उन्होंने द आयरिश टाइम्स के रुख को भारत और विशेष रूप से हिंदुओं के प्रति पूर्वाग्रही, पक्षपातपूर्ण और ऐतिहासिक तथ्यों की अनदेखी करने वाला बताया।

द आयरिश टाइम्स के संपादकीय में लेख के अंत में यह दावा किया गया कि “पहलगाम पर तनाव में भयावह वृद्धि, विभाजन के समय से चली आ रही कटु सांप्रदायिक विभाजन का परिणाम है, जिससे दोनों देशों के बीच पूर्ण युद्ध की आशंका है।” इस कथन की तीखी आलोचना करते हुए भारत ने इसे वास्तविकता से पूरी तरह विपरीत बताया।

राजदूत अखिलेश मिश्रा और अन्य विश्लेषकों ने स्पष्ट किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ता तनाव सांप्रदायिक विभाजन का नहीं, बल्कि पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद और हिंदुओं तथा अन्य समुदायों के प्रति उसकी गहरी घृणा का परिणाम है। यह भावना हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर द्वारा सार्वजनिक रूप से दोहराई गई थी।

भारत में हिंदू बहुल आबादी के बीच मुसलमानों, सिखों और अन्य धार्मिक समुदायों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की एक समृद्ध परंपरा रही है। इसके विपरीत, इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान ने 1947 के बाद से लगातार अपने हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ हत्या, बलात्कार, उत्पीड़न और व्यवस्थित भेदभाव किया है।

“ऑपरेशन सिंदूर” के जरिए भारत ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अब वह अपने नागरिकों की धार्मिक पहचान के आधार पर लक्षित हत्याओं को बर्दाश्त नहीं करेगा और न ही ‘अमन की आशा’ (शांति की आशा) के नाम पर चुप्पी साधेगा। यह कार्रवाई पाकिस्तान और इस्लामी आतंकवाद को समर्थन देने वाले तत्वों के लिए एक कड़ा संदेश था।

(यह खबर मुख्य रूप से हमारे यहाँ ऑपइंडिया इंग्लिश टीम की श्रद्धा पांडे ने लिखी है।)

CJI ने राष्ट्रपति और PM को भेजी जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जाँच रिपोर्ट, कैश मिलने की पुष्टि फिर भी इस्तीफा देने से किया इनकार: चल सकता है महाभियोग

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने आंतरिक जाँच समिति की रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेज दी है। समिति का गठन जस्टिस यशवंत वर्मा के घर में लगी आग में नकदी मिलने के दावों की जाँच के लिए किया गया था।

समिति की रिपोर्ट के साथ जस्टिस वर्मा की प्रतिक्रिया भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई। हालाँकि रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं है कि जस्टिस वर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया में क्या कहा है। इससे पहले खबरें आई थी कि आंतरिक जाँच समिति ने जस्टिस वर्मा के घर आगजनी में कैश जलने की बात सही पाई है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से 8 मई 2025 को जारी बयान में कहा गया है, “मुख्य न्यायाधीश ने आंतरिक जाँच प्रक्रिया के तहत राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को 3 मई 2025 की 3 सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट की कॉपी और जस्टिस यशवंत वर्मा का 6 मई 2025 का पत्र/जवाब भेजा दिया है।”

आंतरिक जाँच समिति में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थे। इन्होंने 25 मार्च को जाँच शुरू की थी। जस्टिस वर्मा के घर में 14 मार्च 2025 को आग लगी थी। उसके बाद बेहिसाब कैश बरामद होने की बात सामने आई थी। जले हुए नोटों की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए थे।

जिस समिति ने इस मामले की जाँच की है उसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू हिमाचल हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस GS संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश अनु सिवारमन शामिल थे। 25 मार्च को समिति ने जाँच की प्रक्रिया शुरू की थी और 4 मई को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को रिपोर्ट सौंप दी थी। बताया जाता है कि जब आग लगी थी तब जज अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे, जबकि घर में उनकी बुजुर्ग माँ और बेटी मौजूद थी।

जले हुए कैश का वीडियो भी सामने आया था। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने बताया था कि इसके वीडियो जिन पुलिसकर्मियों ने बनाए थे वो उनके फोन से डिलीट करवा दिए गए, ताकि ये गलत जगह न पहुँच जाए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक ने कहा था कि बिना CJI की अनुमति के जज के विरुद्ध FIR दर्ज करने के अधिकार पुलिस के पास नहीं हैं। हालाँकि, अब भी जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है, जबकि जाँच समिति ने माना है कि उनके यहाँ से कैश मिला।

ऐसे में अगर वो दोषी पाए जाते हैं तो उन्हें महाभियोग की प्रक्रिया के तहत भी हटाया जा सकता है। उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस मामले को लेकर सार्वजनिक रूप से बयान दिया था और न्यायपालिका की साख पर बट्टा बताते हुए कहा था कि जो भी मामला है वो बाहर आना चाहिए।

सत्यपाल मलिक की ‘वफादारी’ पर पाकिस्तान फिदा, आतंकी मुल्क की संसद में गूँजा नाम: पहलगाम अटैक से पल्ला झाड़ने के लिए The Wire को दिए इंटरव्यू का इस्तेमाल, जानिए क्या कहा था?

भारत में कुछ ऐसे तत्व हैं, जिन्हें अपनी सरकार से दिक्कत है, सेना से दिक्कत है, और यहाँ तक कि हमारे देश की संस्कृति और परंपराओं से भी दिक्कत है। असल में ‘The Wire’ पर पत्रकार करण थापर ने जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का इंटरव्यू लिया, जिसके बाद उनकी चर्चा पाकिस्तान के संसद में भी हो रही है। बता दें कि 22 अप्रैल को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के 13 दिन बाद भारत ने पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिसे ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम दिया गया है।

ऐसे संवेदनशील समय में जब पूरा देश एक होकर अपनी सेना व सरकार के साथ खड़ा है, सत्यपाल मलिक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘बेशर्म’ और ‘डरपोक’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, साथ ही लिखा कि उन्हें पहलगाम हमले के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री के इस्तीफे तक की माँग कर दी। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी जनता की परवाह नहीं करते, उनकी सरकार को ‘निर्दयी’ और ‘संवेदनहीन’ तक बता दिया। करण थापर ने कहा कि पीएम मोदी देश को डरा रहे हैं, वहीं सत्यपाल मलिक ने कह डाला कि भारत युद्ध झेल ही नहीं सकता है।

साफ़ है, ये दोनों महानुभाव खुलकर हर उस एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं, जो पाकिस्तान चाहता है। शायद तभी तो पाकिस्तान की संसद में इनकी चर्चा हो रही है। पाकिस्तान की संसद में एक महिला सांसद ने कहा, “लोग सवाल कर रहे हैं। भारत अधिकृत जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि ये तो बड़ा सुरक्षित इलाक़ा है, यहाँ फौज और पुलिस होनी चाहिए थी लेकिन एक अहलकार नहीं था। उन्होंने मोदी सरकार से उन्होंने सवाल किया।” (नोट: पाकिस्तान वाले जम्मू कश्मीर को ‘भारत अधिकृत’ कहते हैं जबकि उन्होंने प्रदेश का एक हिस्सा अवैध रूप से कब्जा रखा है)

इसके अलावा उक्त महिला सांसद ने एंकर करण थापर का भी नाम लेते हुए कहा कि उनके शो में सत्यपाल मलिक ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शर्म आनी चाहिए और सुरक्षा चूक के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए। पाकिस्तान की महिला सांसद ने आगे कहा कि भारत के भीतर से सवाल उठ रहे हैं और उन सवालों को दबाया जा रहा है। बता दें कि सत्यपाल मलिक राज्यपाल पद से हटने के बाद से लगातार मोदी सरकार पर हमलावर रहे हैं, और झूठ फैलाने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

कोई माँग रहा सबूत तो कोई कह रहा चील-कौवे मारे, किसी को ‘सिंदूर’ शब्द से ही दिक्कत: पाकिस्तान पर कार्रवाई के बाद भारत में बिलबिला कर निकल रहे ‘पाकिस्तानपरस्त’

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसारन घाटी में 22 अप्रैल, 2025 को हुए आतंकी हमलों के जवाब में भारतीय सेना ने मंगलवार (6 मई, 2025) की रात ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाकर पाकिस्तान में बसे 9 आंतकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया। पूरा देश इस बात पर जश्न मना रहा है। 24 हिंदुओं समेत कुल 26 पर्यटकों की मौत पर हुए एक्शन में लगभग 100 आतंकियों को मार गिराया गया।

जहाँ एक ओर पूरे देश में पहलगाम के हमले के बदले को लेकर खुशी का माहौल है। पहलगाम हमले के बाद गमगीन देश संतोष में है, क्योंकि ‘न्याय’ हुआ है। वहीं, दूसरी ओर विपक्ष के राजनेताओं को भारतीय सेना के इस शौर्य पर भी संदेह है। जिन्हें संदेह नहीं है, उन्हें इस मिशन के नाम से परेशानी हो रही है।

कॉन्ग्रेस नेता पृथ्वीराज चौहान ने सरकार पर साधा निशाना

‘ऑपरेशन सिंदूर’ से कई कॉन्ग्रेस नेता परेशान दिख रहे हैं। जहाँ एक ओर नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस के मुखिया राहुल गाँधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक साथ सामने आकर इस ऑपरेशन की सराहना की थी तो वहीं दूसरी ओर कई अन्य कॉन्ग्रेसी नेताओं को इस ऑपरेशन के नाम या काम में खामियाँ नजर आईं।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पृथ्वीराज चौहान ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कह दिया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम रखकर सरकार इसका भावनात्मक लाभ ले रही है। चौहान ने कहा, “युद्ध विमानों, बंदूकों और बमों का उपयोग करके लड़ा जाता है, भावनाओं या प्रतीकात्मकता से नहीं।”

हालाँकि, पृथ्वीराज चौहान के इस बयान से कॉन्ग्रेस पार्टी ने किनारा कर लिया। कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा ने ही चौहान के बयान को गलत बता दिया। खेड़ा ने कहा, “इस समय किसी को भी मिशन पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। सरकार कोई भी कदम उठाए, कॉन्ग्रेस पार्टी पूरी मजबूती के साथ उनके साथ खड़ी है।”

राशिद अल्वी ने फिर माँगे सबूत

कॉन्ग्रेस के नेता राशिद अल्वी भी भारतीय सेना के इस मिशन की सफलता पर सवाल खड़े करने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने यह तक पूछ डाला कि ऑपरेशन में क्या हर एक आतंकवादी मारा गया है?

राशिद अल्वी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को सबसे न्यूनतम जवाब माना है। उन्होंने कहा, “क्या सभी आतंकवादी खत्म हुए? मोदी ने कहा था कि आतंकवादियों का नामोनिशान मिटा देंगे। अगर यह हुआ तो अच्छा है।” बता दें कि राशिद अली पहले भी सर्जिकल स्ट्राइक पर सबूत माँग चुके हैं।

उदित राज ने नाम पर जताई आपत्ति

उनके अलावा कॉन्ग्रेस के ही वरिष्ठ नेता उदित राज ने भारतीय सेना के इस मिशन के नाम पर ही आपत्ति जताई। उदित राज ने कहा,”सिंदूर एक विशेष धर्म से संबंधित है। बेहतर होता कि मिशन का कोई और नाम दिया होता।”

उदित ने यह भी कहा कि सरकार को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बारे में स्पष्टता रखनी चाहिए। पाकिस्तान के पीएम का संसद में 3 राफेल मार गिराने पर भी अपना पक्ष रखना चाहिए और बताना चाहिए कि पाक पीएम झूठे हैं। कॉन्ग्रेसियों के अलावा ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की राज्यसभा सांसद महुआ माजी को भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का नाम नहीं पसंद आया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाना चाहिए।

माजी ने कहा, “जब तीनों सेनाओं को अपने लक्ष्य और समय चुनने की छूट दी गई तो भी प्रधानमंत्री मोदी ने इसका नाम ‘ऑपरेशन सिंदूर’ रख दिया, इसलिए इसमें कुछ राजनीति ज़रूर है, नाम कुछ और भी हो सकता था।” माजी ने इसके बाद पाकिस्तान की परमाणु धमकी को भी दोहराया।

इमरान मसूद ने कहा, पाकिस्तान हँस रहा

इनके अलावा सहारनपुर से कॉन्ग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता पर सवाल उठा दिए। उन्होंने सरकार से इस मिशन का पूरा हिसाब माँग लिया। मसूद ने कहा, “हमने बार-बार कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लीपा-पोती नहीं सख्त एक्शन होना चाहिए, जो सेना ने करके दिखाया।” इसके अलावा एक न्यूज चैनल से बातचीत करते हुए इमरान मसूद ने सर्जिकल स्ट्राइक पर भी कहा, “पाकिस्तान हमारे हम लोग का मजाक उड़ाता है। उनका कहना है कि सर्जिकल स्ट्राइक में हिंदुस्तानियों ने हमारे तीन कौवे मार दिए। इससे पूरी दुनिया में हमारा मजाक बन गया है।”

विपक्ष को पहले मौका मिला था कि पहलगाम पर कोई कड़ा एक्शन नहीं लिया गया। अब जब सरकार ने एक्शन ले लिया तो उसमें भी उन पर सवाल खड़े कर दिये। कुल मिलाकर विपक्ष को एक्शन तो चाहिए था लेकिन उस एक्शन को हजम करना नहीं आ पाया।

लाहौर का एयर डिफेन्स सिस्टम उड़ाया, 15 सैन्य ठिकानों पर पाकिस्तानी हमले किए नाकाम: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद ‘आतंकी मुल्क’ ने देर रात दागे थे ड्रोन-मिसाइल, सब फुस्स

भारत ने पाकिस्तान के भीतर गुरुवार (8 मई, 2025) की सुबह कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। भारत ने इस हमले में लाहौर के एयर डिफेन्स सिस्टम और राडार तबाह कर दिए हैं। यह हमला पाकिस्तान के भारतीय सैन्य ठिकानों पर किए गए हमले के जवाब में किया गया है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ऐसी सभी हरकतों का माकूल जवाब देगा।

इस संबंध में सरकार ने एक आधिकारिक बयान जारी किया है। इसमें लिखा गया, “7-8 मई 2025 की रात को पाकिस्तान ने ड्रोन और मिसाइलों का उपयोग करके अवंतीपुरा, श्रीनगर, जम्मू, पठानकोट, अमृतसर, कपूरथला, जालंधर, लुधियाना, आदमपुर, भटिंडा, चंडीगढ़, नल, फलोदी, उत्तरलाई और भुज सहित उत्तरी और पश्चिमी भारत में कई सैन्य ठिकानों पर हमला करने की कोशिश की। इन हमलों को इंटिग्रेटेड काउंटर UAS ग्रिड और एयर डिफेंस सिस्टम द्वारा बेअसर कर दिया गया।”

भारत ने बताया कि इन हमलों के मलबे अब कई जगह से बरामद किए जा रहे हैं जो इनका सबूत हैं। भारत ने लाहौर में किए गए हमले के विषय में बताया, “आज सुबह भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान में कई स्थानों पर एयर डिफेंस रडार और सिस्टम को निशाना बनाया। भारत ने भी पाकिस्तान की ही तरह उसी तीव्रता से जवाब दिया है। विश्वसनीय जानकारी के अनुसार, लाहौर में एयर डिफेंस सिस्टम को बेकार कर दिया गया है।”

इसी बयान में बताया गया कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा, बारामूला, उरी, पुंछ, मेंढर और राजौरी सेक्टरों में मोर्टार और भारी तोपों का इस्तेमाल करते हुए LOC पर बिना उकसावे के गोलीबारी बढ़ा दी है। सरकार ने बताया है कि इस गोलीबारी में तीन महिलाओं और पाँच बच्चों समेत सोलह निर्दोष लोगों की जान चली गई है। सरकार ने बताया है कि इस कार्रवाई का जवाब सेना ने माकूल तरीके से दिया है। भारत ने साफ़ कर दिया है कि वह तनाव घटाने का पक्षधर है लेकिन पाकिस्तानी फ़ौज को भी शांत होना पड़ेगा।

गौरतलब है कि भारत ने 7 मई, 2025 को रात में ऑपरेशन सिंदूर चलाया था। इस स्ट्राइक में भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर के भीतर 9 ठिकानों को निशाना बनाया था। यह लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के अड्डे थे। इनमें 80 से अधिक इस्लामी आतंकी मारे गए थे। इसके बाद से पाकिस्तान ने भारत में ड्रोन हमले किए और सीमा पर गोलीबारी की। इनका ही जवाब भारत ने दिया है।

पहलगाम में इस्लामी आतंकियों ने धर्म पूछकर हिंदुओं को गोली मारी, दरभंगा में मजहबी लोगों ने राह चलते हिंदुओं पर धर्म पूछ लाठी-तलवार से किए हमले: 21 पर केस, 4 गिरफ्तार

पहलगाम आतंकी हमले में 22 अप्रैल को हिंदुओं को धर्म पूछकर मौत के घाट उतारा गया और अब बिहार के दरभंगा में धर्म पूछकर हिंदुओं पर हमला करने का मामला सामने आया है। पीड़ितों ने बताया है कि सड़क किनारे खड़े होकर कुछ मजहबी लोगों ने उनसे पहले उनका धर्म पूछा और फिर बाद में उनपर लाठी-डंडा और तलवार से हमला किया।

इस घटना में कई लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की बात सामने आई है और पुलिस द्वारा 4 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी घटना जाले थाना क्षेत्र की है। पीड़ितों की पहचान राजकिशोर यादव, रामसागर यादव, अमित कुमार, सुमित कुमार, रंजीत यादव, ऋतिक यादव, मिथिलेश यादव, लक्ष्मण यादव, सोनू कुमार, दिनेश मांझी के तौर पर हुई है।

पीड़ितों ने बताया कि वो लोग 6 मई को शाम 7 बजे बहेड़ा पोखर के पास मुस्लिम समुदाय के युवक लाठी, भाला, तलवार, रॉड और पिस्टल लेकर खड़े थे। जैसे ही वो लोग उस रास्ते से गुजरे वहाँ उनसे पहले उनका धर्म पूछा गया और फिर जानलेवा हमला कर दिया गया।

घायलों में एक अमित कुमार भी हैं। अमित ने बताया कि उन लोगों ने पहले धर्म पूछा और जैसे ही हमने खुद को हिंदू बताया, उन लोगों ने हमला कर दिया। वो लोग बस हिंदुओं को मार रहे थे।

वहीं, धर्म पूछकर निशाना बनाने वाली जानकारी स्थानीयों ने भी दी है। साफ बताया गया है कि मुस्लिम युवक धर्म पूछ-पूछकर हिंदुओं को निशाना बना रहे थे।

घटना में कुल 11 लोग घायल हुए हैं। इनमें एक इन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाले में भर्ती कराया गया है। कुछ लोगों की हालत गंभीर है। वहीं कुछ को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई।

घटना के संबंध में लक्ष्मण कुमार यादव, मनोज कुमार यादव, सोनू यादव, दिनेश यादव, संजय यादव ने थाने में शिकायत दी है।

एफआईआर में 21 आरोपितों का नाम दिया गया है। इनमें कुरबान कुरैशी इरफान कुरैशी, सलमान इब्रान कुरैशी, पप्पू कुरैशी, मेराज, रेयाज, आसिफ, इम्तियाज, सरफरराज, एजाज, शहनवाज, दर्जी रिजवान के नाम हैं।

इस पूरे मामले में बता दें कि ये भी कहा जा रहा है कि ये विवाद स्कूटी में टक्कर लगने के बाद शुरू हुआ। टक्कर ऋतिक और दर्जी नूर आलम की बेटे की स्कूटी के बीच हुई थी। ऋतिक ने जब नुकसान का मुआवजा माँगा तो नूर का बेटा आनाकानी करने लगा। ऋतिक ने स्कूटी अपने पास रख ली और कहा स्कूटी अगले दिन मिलेगी।

इसके बाद दोनों को समझाया गया और मामला शांत कराकर उन्हें वापस भेज दिया गया। लेकिन, अगले दिन मुस्लिम भीड़ इकट्ठा हुई और फिर हिंदुओं को निशाना बनाने लगी।

पुलिस कार्रवाई की बात करें तो यही पता चला है कि इस केस में 4 लोग गिरफ्तार हुए हैं और आगे की कार्रवाई के लिए जाँच जारी है। पूरे मामले में पुलिस ने शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए थाना परिसर में शांति समिति की बैठक कराई। थानाध्यक्ष ने बताया कि अन्य आरोपितों की तलाश के लिए छापेमारी जारी है।

सिद्धार्थनगर में 1990 में थे 16 मदरसे, 2023 आते-आते हो गए 597: खाड़ी देशों से आ रहा धड़ाधड़ पैसा, नेपाल बॉर्डर पर अब योगी सरकार का चल रहा ‘समतल अभियान’

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार नेपाल सीमा पर बने अवैध मस्जिद-मदरसों पर लगातार कार्रवाई कर रही है। उत्तर प्रदेश और नेपाल के बीच 7 जिलों की 570 किलोमीटर की सीमा पर रोज अवैध ढाँचे समतल किए जा रहे हैं। महराजगंज से लेकर सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी में इन कब्जों को चिन्हित किया जा रहा है। बीते लगभग एक माह में सैकड़ों ऐसे अवैध ढाँचे गिराए गए हैं।

सिद्धार्थनगर में तेजी से हो रही कार्रवाई

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि सिद्धार्थनगर जिले में वर्ष 1990 में केवल 16 मान्यता प्राप्त मदरसे थे। यह साल 2000 तक बढ़कर 147 हो गए, लेकिन तब इनमें से केवल 45 को ही सरकारी मान्यता मिली थी। यह आँकड़ा 2023 तक बढ़ते-बढ़ते यह संख्या 597 तक पहुँच गई। इनमें से 452 ही रजिस्टर्ड हैं जबकि 145 मदरसे अभी भी गैर-मान्यता प्राप्त हैं।

सबसे अधिक मदरसे सिद्धार्थनगर की डुमरियागंज तहसील में हैं। यहाँ 152 मदरसे संचालित हो रहे हैं जबकि इटवा तहसील में 134, नौगढ़ तहसील में 119 और शोहरतगढ़ तहसील में 102 और बांसी तहसील में 90 मदरसों का संचालन हो रहा है।

यहाँ सिर्फ मदरसों की संख्या ही नहीं बढ़ी, बल्कि इन पर कई गंभीर आरोप भी हैं। कुछ मदरसों में नकली नोट छापने जैसी गतिविधियों के सबूत मिले हैं। इसके साथ ही, इन संस्थानों को विदेश से फंडिंग मिलने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे मामलों को देखते हुए प्रशासन को कई जगहों पर अवैध मदरसों पर कार्रवाई की है।

सिद्धार्थनगर में योगी सरकार ने 17 अवैध मदरसे चिन्हित किए गए हैं। इसके अलावा 4 अवैध मजहबी स्थल भी चिन्हित किए गए हैं। इन पर भी कार्रवाई जारी है। इनमें से कई पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा चुकी है। इनके अलावा कई मजहबी स्थल भी हैं।

सबसे बड़ी कार्रवाई श्रावस्ती में

श्रावस्ती जिला भी नेपाल से लम्बी सीमा साझा करता है। यहाँ प्रशासन सबसे अधिक सख्त है। यहाँ बीते कुछ वर्षों में तेजी से मस्जिद-मदरसे बढ़े हैं। इस बढ़ोतरी को लेकर सशस्त्र सीमा बल (SSB) ने गंभीर चिंता जताई है और इसे संभावित डेमोग्राफिक बदलाव का संकेत बताया है।

SSB अधिकारियों के अनुसार, इन इलाकों में 15 किलोमीटर के दायरे में मजहबी संरचनाओं की संख्या में 26% तक का इजाफा हुआ है। जानकारी के मुताबिक, वर्ष 2018 में इन सीमावर्ती इलाकों में कुल 738 मस्जिदें थीं, जो 2021 तक बढ़कर 1000 हो गईं। वहीं, मदरसों की संख्या 500 से बढ़कर 645 हो गई है।

श्रावस्ती में प्रशासन अब सख्त हो गया है। श्रावस्ती में योगी सरकार ने 100 से अधिक मदरसे सील कर दिए हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि श्रावस्ती में लगभग आधे दर्जन मदरसे गिराए भी जा चुके हैं। कई जगह मजारों पर भी कार्रवाई हुई है।

बहराइच में भी मदरसे सील, कब्जे खाली

बहराइच जिले की नेपाल सीमा के आसपास भी उत्तर प्रदेश सरकार कार्रवाई कर रही है। यहाँ 24 अवैध मदरसे चिन्हित किए गए हैं जिनमे से 9 को सील कर दिया गया है। इन पर बुलडोजर कार्रवाई भी चालू हो गई है। बहराइच में 384 अतिक्रमण के मामले चिन्हित किए गए हैं। इनमें से कुल 89 कब्जे ध्वस्त किए जा चुके हैं। आगे और भी ऐसे ही कब्जों पर कार्रवाई चल रही है।

बहराइच में नेपाल सीमा के पास बड़ी संख्या में बीते वर्षों में कई अवैध ढाँचे बन गए थे। इनसे डेमोग्राफी चेंज का खतरा भी बढ़ा है। इसके बाद योगी सरकार ने चिन्हित करना चालू किया था। अब इन पर सिलसिलेवार ढंग से कार्रवाई चालू हो गई है।

बलरामपुर जिले में भी 25 मदरसों पर कार्रवाई

बलरामपुर जिले में भी योगी सरकार ने 25 गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे ढूंढ निकाले हैं। इनमें से 23 को सील कर दिया गया है। बाकी 2 मदरसों को नोटिस जारी किए गए हैं। कई लोग कार्रवाई के डर से अपने अवैध कब्जे खुद ही हटा लिए हैं। बलरामपुर जिले में बाकी ढाँचे भी तोड़े जा रहे हैं।

बलरामपुर जिले से नेपाल जिले की खुली सीमा है। इस जिले में जंगल का इलाका भी है। बीते कुछ वर्षों में तेजी से इन इलाकों में मस्जिद-मदरसे बढे थे। जहाँ पहले कोई नहीं रहता था, वहाँ भी मुस्लिम आबादी दिखने लगी थी। इस तेजी से होते बदलाव को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई है।

इनके अलावा महाराजगंज, पीलीभीत और लखीमपुर खीरी जैसे जिलों में भी दर्जनों मदरसे सील किए गए हैं। इन पर प्रशासन बुलडोजर कार्रवाई कर रहा है। इसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भेजी जा रही है। यह कार्रवाई मुख्य रूप से नेपाल सीमा के 15 किलोमीटर के इलाके तक हो रही है।

नेपाल सीमा से सटे इन जिलों में मजहबी ढांचे और मदरसों की तेजी से बढ़ती संख्या न केवल सामाजिक संतुलन के लिए चुनौती बन रही है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी चिंता का विषय है। 2023 में पुलिस की जाँच में सामने आया था कि इन जिलों में मस्जिद -मदरसे बनाने के लिए ₹150 करोड़ की फंडिंग खाड़ी देशों से आई थी।

उत्तराखंड के नेपाल सीमा वाले जिले भी प्रभावित

नेपाल सीमा से लगे सिर्फ उत्तर प्रदेश के ही नहीं बल्कि उत्तराखंड के जिले भी प्रभावित हैं। इन क्षेत्रों में भी मुस्लिम आबादी में 2.5 गुना इजाफा हुआ है। उत्तराखंड के ऊधमसिंह नगर, चम्पावत और पिथौरागढ़ जिलों को गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। खास तौर पर पिथौरगढ़ के धारचूला और जौलजीवी कस्बों को अतिसंवेदनशील घोषित किया गया है।

उत्तराखंड में बनबसा और टनकपुर जैसे इलाकों से नेपाल में काफी आवाजाही होती है। इस आवाजाही पर कोई विशेष रोकटोक नहीं रही है। यह दोनों बॉर्डर चम्पावत जिले हैं। चम्पावत की सीमा उत्तराखंड के US नगर और उत्तर प्रदेश के पीलीभीत-बरेली जैसे जिलों से मिलती है। यहाँ बड़ी मुस्लिम आबादी है।

मुस्लिम पट्टी बसाने की है योजना

इन बढ़ती गतिविधियों को लेकर बीते वर्ष दैनिक जागरण में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि उत्तर भारत में एक ‘मुस्लिम पट्टी‘ बनाने की साजिश चल रही है, जिसमें पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य शामिल होंगे।

यह पट्टी बांग्लादेश से सटे पश्चिम बंगाल से शुरू होकर पाकिस्तान तक जाएगी। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि असम में घुसपैठियों के खिलाफ हुए आंदोलनों के बाद कई मुस्लिमों को इस संभावित ‘पट्टी’ में बसाने की रणनीति अपनाई गई है।

ऐसे में भारत के लिए यह सीमावर्ती क्षेत्र रणनीतिक और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बन गया है। नेपाल से लगे यूपी और उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों में मस्जिदों और मदरसों की संख्या में वृद्धि, मुस्लिम आबादी में इजाफा और पड़ोसी देशों की संदिग्ध गतिविधियाँ इन सभी कारकों ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता को बढ़ा दिया है।

‘ग्लोबल टाइम्स’ को भारतीय दूतावास ने लताड़ा, DW और Bloomberg ने चलाया पाकिस्तानी प्रोपेगंडा: इस्लामी आतंकियों को आतंकवाद कहने में फिर झिझका विदेशी मीडिया

पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकी हमला होता है, जिसमें 26 निर्दोष लोगों को उनका धर्म पूछ-पूछकर मार डाला जाता है। इसके बाद विदेशी मीडिया उन आतंकवादियों के लिए ‘बंदूकधारी’ और ‘बाग़ी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है। फिर इस घटना के 13 दिन बाद भारत पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन संरचनाओं को तबाह कर देता है, जहाँ वर्षों से भारत की धरती पर ख़ून बहाने की साजिशें रची जा रही थीं। इनमें मसूद अजहर के ठिकाने भी शामिल थे, जिसे छुड़ाने के लिए 1999 में एक भारतीय विमान को हाईजैक करके कंधार ले जाया गया था।

जर्मनी के DW को फिर आतंकी को आतंकी कहने में आई शर्म

अब विदेशी मीडिया का वही धड़ा एक बार फिर से भारत के विरुद्ध प्रपंच फैलाने में लग गया है। अब जर्मन मीडिया संस्थान DW को ही ले लीजिए। वो अपने शीर्षक में लिखता है, “भारत ने कहा कि उसने पाकिस्तान में ‘आतंकी’ ठिकानों को निशाना बनाया”। यानी, एक बार फिर से उसने आतंकी को आतंकी कहने में हिचक दिखाई है। जिस शख्स को छुड़ाने के लिए विमान हाईजैक कर लिया जाता है, वो आतंकी नहीं? साथ ही इस ख़बर में उसने पाकिस्तानी एजेंडा चलाते हुए कहा है कि भारत ने नागरिकों को निशाना बनाया।

DW ने पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाया

जबकि भारत स्पष्ट कर चुका है कि उसने न नागरिक ठिकानों को निशाना बनाया है और न ही सैन्य ठिकानों को। साथ ही इसे DW द्वारा ‘तथाकथित ऑपेरशन सिंदूर’ नाम दिया गया। सबसे पहले उसके वीडियो में यही कहा गया कि पाकिस्तान ने 26 नागरिकों के मारे जाने की बात कही है। साथ ही इसकी दिल्ली ब्यूरो चीफ सैंड्रा पीटर्समैंन ने कहा कि भारत के प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने की अनुमति नहीं थी। साथ ही लश्कर-ए-तैय्यबा को सीधे आतंकी संगठन कहने की बजाए घुमा-फिर कर उन्होंने कहा कि ये एक ‘समूह’ है जिसे UN ने आतंकी संगठन घोषित कर रखा है।

ब्लूमबर्ग ने बिना तथ्य जाँचे चलाया पाकिस्तानी एजेंडा

ब्लूमबर्ग भी पीछे नहीं रहा। उसने ख़बर चला दी कि पाकिस्तान ने भारत के 5 लड़ाकू विमानों को मार गिराया गया है। ये विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का एजेंडा था। पाकिस्तानी रक्षा मंत्री तक से जब इसके सबूत माँगे गए तो उन्होंने कह दिया कि सोशल मीडिया पर देखकर उन्होने ये दावा किया है।

फिर भी, बिना पुष्टि किए Bloomberg ने इस ख़बर को चला दिया। जब भारत के विमानों ने सीमा पार किया ही नहीं, फिर कैसे ये संभव हो सकता है कि पाकिस्तान ने उन्हें मार गिराया हो। इस तरह ब्लूमबर्ग ने ख्वाजा मोहम्मद आसिफ के बयान का फैक्ट-चेक करने की भी जहमत नहीं उठाई।

भारतीय दूतावास ने चीन के ‘ग्लोबल टाइम्स’ को लताड़ा

वहीं चीन के प्रोपेगंडा पोर्टल ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने तो ऐसा झूठ चलाया कि भारतीय दूतावास को इसका खंडन करना पड़ा। बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने उसे चेताया कि भ्रामक ख़बरों को प्रकाशित करने से पहले वो कम से कम तथ्यों की जाँच कर ले या उनकी पुष्टि तो कर ले। ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने एक तस्वीर पोस्ट करके दावा किया था कि पाकिस्तान ने भारत के 3 लड़ाकू विमानों को मार गिराया है। उसने कुछ ऐसे झूठ फैलाया कि ‘X’ को उसके पोस्ट पर ‘कम्युनिटी पोस्ट’ में नोट डालकर सही करना पड़ा।

‘ग्लोबल टाइम्स’ की पोस्ट के नीचे लगाए गए नोट में स्पष्ट कहा गया है कि ख़ुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज़ शरीफ ने कहा है कि भारतीय विमानों ने सीमा पार नहीं किया, फिर उन्हें मार गिराने की बात ही झूठी है। साथ ही ये भी कहा गया कि पाकिस्तान TV चैनलों ने पाकिस्तान में स्ट्राइक की पुष्टि की है। नोट में बताया गया कि ‘ग्लोबल टाइम्स’ के दावे की पुष्टि का कोई आधार नहीं है। असल में कई पाकिस्तानी हैंडल ये झूठ फैला रहे थे, जिसे उठाकर चीन के मीडिया संस्थान ने प्रकाशित कर दिया।

जिस ‘सालार गाजी’ ने की थी सोमनाथ में लूटपाट, हिंदुओं को उतारा था मौत के घाट… बहराइच में नहीं लगेगा अब उसके नाम से मेला: योगी सरकार का फैसला, HC ने भी राहत देने से किया मना

उत्तर प्रदेश के बहराइच में इस्लामी आक्रान्ता सैयद सलार मसूद गाजी की दरगाह पर होने वाले जेठ मेला को लेकर अनुमति देने से प्रशासन ने मना कर दिया है। इसके विरोध में इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँची मस्जिद कमिटी को भी कोई राहत नहीं मिली है। इस मेले में लाखों की भीड़ हर साल जुटा करती थी। इससे पहले उत्तर प्रदेश के संभल में सालार मसूद के नाम पर होने वाले मेले को भी अनुमति देने से प्रशासन ने इनकार कर दिया था।

क्या है पूरा मामला?

उत्तर प्रदेश के बहराइच में इस्लामी आक्रान्ता सालार मसूद की बड़ी दरगाह है। यहीं पर उसे वीर हिन्दू राजा सुहेलदेव ने मौत के घाट उतार दिया था। सालार मसूद की इसी दरगाह पर प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ महीने (मई-जून) में एक बड़ा मेला लगता आया है। यह मेला एक महीने चलता है। इस मेले में लगभग 15 लाख लोग शामिल होते रहे हैं।

इस मेले में इस एक महीने के भीतर हर शनिवार को सालार मसूद की बारात देश-विदेश के अलग-अलग हिस्से से जायरीन लाते हैं और रविवार को दरगाह पर जाते हैं। इसके बाद वह सोमवार को लौटते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि ऐसी लगभग 200 प्रतीकात्मक बारातें आक्रान्ता सालार मसूद की दरगाह पर लाई जाती हैं।

कई और भी दरगाहों से यहाँ आक्रान्ता मसूद की बारात आती है। इन बारातों में मुस्लिम शेरवानी, पलंग और शादी से जुड़ा और भी सामान लाते हैं। यहाँ आने से पहले लोग बाराबंकी में स्थित एक बूढ़े बाबा की मजार पर जाते हैं जो असल में सालार मसूद के बाप की मजार है। उसका नाम सैयद सालार साहू गाजी उर्फ बूढ़े बाबा की दरगाह है।

हिन्दू संगठन इस मेले का लगातार विरोध करते आए हैं। हिन्दू संगठन इस मेले के दौरान पास में ही महाराजा सुहेलदेव के सम्मान में कार्यक्रम आयोजित करते हैं। वह इस दौरान हिन्दुओं को इस आक्रान्ता की सच्चाई से भी अवगत करवाते हैं। हिन्दू संगठन माँग करते आए हैं कि इस मेले पर रोक लगाई जाए।

प्रशासन ने नहीं दी अनुमति

2025 में भी दरगाह वालों ने मेले का आयोजन करने का प्लान बनाया था। हालाँकि, हिन्दू संगठनों के विरोध और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने इससे मना कर दिया। प्रशासन ने हवाला दिया कि संभल में पहले ही एक ऐसे ही मेले की अनुमति नहीं दी गई थी और यहाँ भी विरोध चल रहा है।

बहराइच प्रशासन ने स्पष्ट किया कि स्थानीय लोग भी इस मेले के आयोजन के पक्ष में नहीं हैं। उसने हाल ही में हुई हिंसक घटनाओं के विषय में भी जानकारी देते हुए मेले ना करवाने का निर्णय लिया है। प्रशासन ने इसे कानून व्यवस्था के लिए एक समस्या बताया है। इसी के चलते दरगाह कमिटी को इसकी अनुमति नहीं दी गई।

हाई कोर्ट से भी झटका

प्रशासन के इनकार करने के बाद बाद दरगाह कमिटी इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुँची थी। इस मामले पर बुधवार (7 मई, 2025) को इस मामले में सुनवाई हुई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में दरगाह कमिटी को अंतरिम तौर पर राहत देने से इनकार कर दिया है। हाई कोर्ट ने कहा कि वह अब सब पक्षों को सुनने के बाद ही कोई आदेश देगा।

अब इस मामले में 12 मई, 2025 को सुनवाई होगी। हाई कोर्ट में प्रशासन ने स्पष्ट किया कि दरगाह कमिटी ने उनसे कोई अनुमति नहीं माँगी बल्कि सिर्फ सुरक्षा इंतजाम करने को ही कहा। प्रशासन ने स्पष्ट तौर पर बताया कि स्थिति को देखते हुए वह आयोजन करवाने में अभी सक्षम नहीं है।

प्रशासन ने कहा, “दरगाह परिसर के अंदर मजहबी गतिविधियों में हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है… जिस चीज को अनुमति नहीं दी गई है, वह है दरगाह परिसर के बाहर मेला आयोजित करने की अनुमति, जिसमें मुख्य रूप से व्यावसायिक गतिविधियाँ शामिल हैं। प्रशासन ने स्पष्ट किया कि उसने किसी भी संवैधानिक या कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया है।

इससे पहले संभल में मार्च, 2025 में संभल में आयोजित होने वाले नेजा मेला को भी अनुमति नहीं दी गई थी। यह मेला भी सालार मसूद गाजी के लिए होता था। इसकी अनुमति माँगने पर ASP श्रीश चन्द्र दीक्षित भड़क गए थे और स्पष्ट किया था कि आक्रान्ताओं की याद में लगने वाले किसी मेले को अनुमति नहीं दी जाएगी।

कौन था सैयद सालार मसूद गाजी

सैयद सालार मसूद गाजी का जन्म 11वीं सदी में सन 1014 ईस्वी में राजस्थान के अजमेर में हुआ था। हालाँकि, सालार के जन्म को लेकर भी संशय है और इतिहासकारों में एकमत नहीं है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सालार का जन्म अफगानिस्तान में हुआ था और वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। खैर, उसका जन्म जहाँ कहीं भी हुआ हो, लेकिन वह बेहद ही क्रूर और हिंदुओं से नफरत करने वाला था।

यह प्रमाणित सत्य है कि अफगानिस्तान के गजनी के शासक महमूद गजनवी का भाँजा था। इसके साथ ही वह गजनवी के सेना का सेनापति भी था। यह वहीं गजनवी है, जिसने सबसे पहले सन 1001 में भारत पर हमला किया था। इसके बाद उसने एक-के-बाद एक करके लगातार 17 बार हमले किए और भारत के सोमनाथ मंदिर सहित भारत के कई मंदिरों को लूटा और उन्हें ध्वस्त कर दिया था।

सन 1930 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस से छपी ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ सुल्तान महमूद ऑफ गाजना’ नाम की पुस्तक में इतिहासकार मोहम्मद नाजिम ने इसके बारे में बताया है। उन्होंने लिखा है कि वह गजनी के नेतृत्व में सन 1026 ईस्वी में सैयद सालार मसूद गाजी ने सबसे बड़ा हमला सोमनाथ मंदिर पर किया था। रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों, रियासतों और हिंदुओं का नरसंहार करता आया।

‘अनवार-ए-मसऊदी’ नाम की अपनी किताब में बहराइच के रहने वाले और इतिहासकार मौलाना मोहम्मद अली मसऊदी ने लिखा है कि सोमनाथ और आसपास की रियासतों पर लूटने-पाटने केबाद सैयद सालार गाजी आगे बढ़ा। वह 1030 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के सतरिख पहुँचा। वहाँ से वह श्रावस्ती पहुँचा और वहाँ के राजा सुहेलदेव से उसका मुकाबला हुआ।

सन 1034 ईस्वी में बहराइच जिला मुख्यालय के पास सालार मसूद का मुकाबला महाराजा सुहेलदेव से हुआ। कहा जाता है कि महाराजा सुहेलदेव ने 21 अन्य छोटे-बड़े राजाओं के साथ मिलकर उसका सामना किया और आखिरकार इस गाजी का उपाधि धारण करने वाले इस आक्रांता को मार गिराया। इसके बाद स्थानीय मुस्लिमों ने उसके शव को दफना दिया।

इसके बाद उस जगह पर मेला लगने लगा जिसे अब रोक दिया गया है।