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आप मरिए-जिन्दा रहे प्रोपेगेंडा: NDTV की गार्गी अंसारी ऑक्सीजन उत्पादन के लिए प्लांट खोलने की बात से क्यों बिलबिलाई

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के मद्देनजर वेदांता की स्टरलाइट कॉपर (Vedanta Sterlite Copper) ने तमिलनाडु के तूतुकुड़ी (Thoothukudi) में बंद पड़े अपने दो प्लांट को ऑक्सीजन उत्पादन के लिए फिर से शुरू करने की पेशकश हाल ही में की है। वेदांता ने कहा है कि उसके प्लांट में प्रतिदिन 1,050 टन ऑक्सीजन की संयुक्त उत्पादन क्षमता वाले दो संयंत्र हैं।

भारत में ऑक्सीजन की जरूरत 7 गुना अधिक बढ़ गई है। देश को 700 की जगह 5000 टन प्रतिदिन ऑक्सीजन की आवश्यकता है। बावजूद इसके तमिलनाडु सरकार ने वेदांता के इस ऑफर को नकार दिया है। कथति तौर पर वेदांता के इस ऑफर को केंद्र सरकार ने अपना समर्थन दिया है।

वेदांता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पेशकश रखते हुए कहा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय वेदांता को उसके प्लांट खोलने की अनुमति देती है, तो वह देश में ऑक्सीजन प्रोड्यूस करने में मदद कर सकती है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि देश को इस समय ऑक्सीजन की आवश्यकता है और वेदांता को प्लांट चालू करने की अनमुति दी जानी चाहिए।

लेकिन, राज्य सरकार ने इस दौरान वेदांता की याचिका का यह कहकर विरोध किया कि उनके प्लांट को पर्यावरण संबंधी चिंता के कारण बंद किया गया था। कंपनी और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास की कमी थी। रोचक बात यह है कि इस समय जब देश को सबसे ज्यादा आवश्यकता ऑक्सीजन की है, तब तमिलनाडु सरकार ऐसे तर्क दे रही है।

राज्य सरकार अकेली नहीं है जो वेदांता के इस ऑफर का विरोध कर रही है। एनडीटीवी पत्रकार गार्गी रावत अंसारी के एक ट्वीट को भी देखकर ऐसे ही लग रहा है कि उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं कि राज्य में 1000 टन ऑक्सीजन का उत्पादन मानव जीवन को बचाने में किस तरह मदद करेगा। 

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मुख्तार अहमद अंसारी के पोते युसूफ अहमद अंसारी की पत्नी गार्गी रावत अंसारी ने तंज भरे अंदाज में ट्वीट किया है। उन्होंने कहा, “कितना बढ़िया है कि हरीश साल्वे ने अपनी अपील में वेदांता की ईकाई को खोलने की अपील की जिसे पर्यावरणीय कारणों से बंद किया गया था। बहुत सही। इस महामारी को व्यर्थ मत जाने दो।”

कुल मिलाकर गार्गी शायद हरीश साल्वे पर टिप्पणी करते हुए ये कह रही थीं कि पर्यावरण को होने वाला नुकसान उनके लिए स्वीकार्य नहीं है, चाहे ऑक्सीजन की कमी के कारण जितनी मौते हों। 

मालूम हो कि जो गार्गी रावत तमिलनाडु में वेदांता के प्लांट खोले जाने का विरोध कर रही है, वहीं गार्गी ऑक्सीजन की कमी के चलते दूसरे राज्यों को कोस भी रही हैं।

20 अप्रैल को उन्होंने दिल्ली और देश के अन्य भागों में ऑक्सीजन की कमी की आलोचना की थी। 16 अप्रैल को वह ऑक्सीजन और दवाइयों की कमी के लिए आवाज उठा रही थीं।

लेकिन, बात जैसे ही वेदांता के प्लांट को खोलने की आई, वह तुरंत उसका विरोध करने सामने आ गईं जबकि इस प्लांट के खुलने से 1000 टन अतिरिक्त ऑक्सीजन का उत्पादन हो सकेगा।

हैरानी की बात ये है कि गार्गी अंसारी के विचारों में अस्थिरता इतनी ज्यादा है कि वो एक तरफ प्लांट खुलने का विरोध कर रही थीं और थोड़ी देर में दोबारा कोरोना के कारण हो रही मौतों पर स्थिति बताने पर आ गईं। उन्होंने एक ट्वीट शेयर किया जिसमें दर्शाया जा रहा था श्मशान घाट के पास एंबुलेंस लाइन लगा कर खड़ी है। उन्होंने इसे भयावह भी बताया।

मालूम हो कि वेदांता का यह प्लांट 2018 में कई स्थानीय लोगों और कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद बंद हुआ था। सबका कहना था कि इस प्लांट से कई स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। हालाँकि प्लांट को बाद में नेशनल ग्रीम ट्रिब्यूनल से क्लीयरेंस मिला, मगर राज्य फिर सुप्रीम कोर्ट के पास पहुँच गया ऑर्डर पर स्टे लगवाने के लिए।

यहाँ शीर्ष अदालत ने एनजीटी के आदेश पर रोक लगा दी और स्टरलाइट कॉपर को मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दी, जिसने सरकारी आदेश को बरकरार रखा। मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली स्टरलाइट कॉपर के साथ मामला अब उच्चतम न्यायालय में है। प्लांट को सिर्फ रख-रखाव के लिए इस्तेमाल करने की कंपनी की दलील भी अब तक अदालत ने नहीं मानी है।

बता दें कि तमिलनाडु में इस स्टरलाइट कॉपर प्लांट के बंद होने के बाद कुछ व्यापक फर्क देखने को मिले। जैसे- एक समय में जहाँ देश कॉपर कैथोड के टॉप 5 निर्यातकों में से एक था वो अब कॉपर कैथोड का आयातक बन गया है।

वहीं, वामपंथियों को देखकर लगता है कि उनके लिए प्रोपेगेंडा फैलाना मानव जीवन से ज्यादा ऊपर है, तभी NGT की क्लीयरेंस पाने वाले प्लांट के खुलने का विरोध कर रहे हैं। देश में हकीकत में ऑक्सीजन की कमी है। ऐसे में अगर प्लांट्स और ऑक्सीजन का उत्पादन करें तो समस्या से लड़ा जा सकता है, लेकिन तब शायद ये धड़ा अपना प्रोपेगेंडा न चला पाए। शायद इसीलिए गार्गी ने अपने ट्वीट में लिखा है कि महामारी को व्यर्थ न जानें दें।

4 घंटे का ऑक्सीजन बचा है, 44 घंटों का क्यों नहीं? क्यों अंत में ही जागता है अस्पताल और राज्य सरकारों का तंत्र?

कोरोना की दूसरी लहर तेज और ख़तरनाक है। परिस्थितियों को उन्हें देखकर कहा जा सकता है कि दूसरी लहर ने हमें जिस रफ़्तार से हिट किया है, उसकी कल्पना अधिकतर भारतीयों ने नहीं की थी। यह अलग बात है कि लगभग तीन महीने पूर्व केंद्र सरकार ने राज्यों को कोरोना पर क़ाबू पाने के लिए अपने नियम ख़ुद बनाने का अधिकार भी दिया है।

पर आज एक समाचार में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का एक वक्तव्य पढ़ने को मिला जिसमें उन्होंने कहा है कि; केंद्र सरकार ने कोरोना की दूसरी लहर को लेकर राज्यों को आगाह नहीं किया। यदि आगाह कर देते तो हम तैयार रहते।

इस महामारी को लेकर बघेल की समझ क्या है वह नहीं पता, पर वक्तव्य पढ़कर लगा जैसे उन्हें इस बात का विश्वास था कि दूसरी लहर को लेकर भविष्यवाणी तूफ़ान के बारे में मौसम विभाग द्वारा की गई भविष्यवाणी जैसी होती है, जिसे केंद्र सरकार के विभाग क़रीब दो सप्ताह पहले बता सकते हैं। और यदि केंद्र सरकार बता देती तो बघेल सरकार तैयार रहती, भले ही बघेल आसाम में पार्टी के चुनाव प्रचार में व्यस्त थे।

महामारी के समय सूचना, वक्तव्य, निर्देश और राजनीति की भरमार है पर उससे इस महामारी को नियंत्रित करने में मदद नहीं मिल सकती। उद्धव ठाकरे की प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्रों को ही ले लीजिए। वे कोरोना पर प्रधानमंत्री के साथ मीटिंग करते हैं पर उन्हें ही दूसरे दिन पत्र भी लिख डालते हैं, कभी इस माँग के साथ कि स्टेट डिज़ैस्टर मैनज्मेंट फंड का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार कोरोना को प्राकृतिक आपदा घोषित कर दे और कभी यह बताने के लिए कि उन्होंने प्रधानमंत्री को फ़ोन किया था पर उनके कार्यालय से जवाब मिला कि प्रधानमंत्री बाहर हैं और अभी नहीं मिल सकते। शायद इसीलिए महाराष्ट्र का हाल यह है कि वहाँ तो पहली लहर ही ख़त्म नहीं हुई और जब देश के और राज्यों ने पहली लहर पर लगभग पूरी तरह से क़ाबू पा लिया था, महाराष्ट्र सरकार अपने राज्य के नागरिकों को कभी विश्वास ही नहीं दिला पाई।

इस मामले में दिल्ली का हाल भी कोई अलग नहीं रहा। दिल्ली के मुख्यमंत्री वीडियो बनाकर दावा करते रहे कि राज्य के अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में बेड उपलब्ध हैं और इधर जनता उनके इस दावे की पोल खोलती रही।

लगभग हर राज्य दवाई, ऑक्सीजन, इंजेक्शन की कमी से जूझ रहा है। अंतर बस इतना है कि उनमें से कुछ इस स्थिति से निकलने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ इसी में बने रहने के लिए राजनीति करते जा रहे हैं।

अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी को ही ले लीजिए। कई मौक़े पर देखने को मिला कि ऑक्सीजन जब ख़त्म होने वाला रहता है, उसके तीन-चार घंटे पहले वक्तव्य आता है कि बस चार घंटे के लिए ही ऑक्सीजन है। यदि चार घंटे में मुहैया न कराया गया तो फलाने अस्पताल के मरीज़ न बच सकेंगे। यह कैसी व्यवस्था है जिसमें अस्पताल को चार घंटे पहले ही पता चलता है कि ऑक्सीजन ख़त्म होने वाला है और अब इसे लेकर शोर मचाना चाहिए? कहीं कोई स्टॉक रजिस्टर होता होगा या नहीं? क्या हम मान लें कि अस्पताल को यह नहीं पता है कि उसके पास कितना ऑक्सीजन है और कब ख़त्म होगा? या उसके पास कितने इंजेक्शन हैं और कब ख़त्म होंगे?

हमारे घरों में गृहणी भी यह जानती हैं कि रसोई में रखा गैस सिलेंडर कितने दिनों तक चलता है और यदि अचानक खाने वालों की संख्या बढ़ जाएगी तो कितनी जल्दी ख़त्म होगा। यदि एक गृहणी बिना किसी ERP सिस्टम के हिसाब लगा लेती हैं तो राज्यों और उसके अस्पतालों के पास तो सिस्टम है स्टॉक को ट्रैक करने का। शिफ़्ट इंचार्ज होते होंगे, जो जाने वाले इंचार्ज से पेपर लेते होंगे। फिर ऐसा क्यों है कि जीवन और मृत्यु के मामले तय करने वाला अस्पताल तंत्र अंत में ही जागता है? उसे इतनी देर से ही क्यों पता चलता है कि ऑक्सीजन बस ख़त्म ही होने वाला है?

टीकाकरण की योजना का क्रियान्वयन भी कई राज्यों में औसत से नीचे रहा है। महाराष्ट्र सरकार और सत्ताधारी दलों द्वारा टीके की उपलब्धतता को लेकर भी राजनीति की गई कि केंद्र सरकार राज्य को पर्याप्त मात्रा में टीके नहीं दे रही है। छत्तीसगढ़ तो उससे भी कई कदम आगे रहा जहाँ मुख्यमंत्री ने भी भारत में बनने वाले टीके को लेकर वक्तव्य दिया, उसे रद्दी बताया और देश तथा प्रदेश की जनता के मन में टीके को लेकर शंका पैदा की। शुरुआती दिनों में राजस्थान, गुजरात और कर्नाटक में भी टीकाकरण की रफ़्तार संतोषजनक नहीं थी। देखकर लगता है जैसे एक ही बात हमारी सरकारों को जोड़ती है और वह है अक्षमता। जैसे राज्य इस मामले में एक-दूसरे से होड़ लगा रहे हैं।

अब तक जो भी हुआ है उसे सुधारने का मौका सरकारों के पास फिर आएगा और वह मौक़ा होगा एक मई से शुरू होने वाले वृहद् टीकाकरण को सुचारु रूप से चलाना और उसकी योजना को पूरा करते हुए नागरिकों में एक विश्वास पैदा करना। इस बार ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ना आसान न होगा क्योंकि केंद्र ने राज्यों को पर्याप्त अधिकार देने की घोषणा पहले ही कर दी है।

कोरोना की आड़ में बॉर्डर से हटाया तो भुगतने पड़ेंगे गंभीर परिणामः BKU की मोदी सरकार को एक और धमकी

दिल्ली में कोरोना वायरस का कहर लगातार जारी है। हालात गंभीर होते जा रहे हैं, लेकिन दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहे कथित किसानों ने प्रदर्शन स्थल से एक इंच भी हिलने से साफ इनकार कर दिया है। ये वही कथित किसान हैं, 26 जनवरी को लाल किला हिंसा में भी शामिल रहे हैं। दिल्ली की सीमाओं पर महीनों से डेरा डाले इन कथित किसानों के कारण कोरोना मरीजों की जान बचाने के लिए आवश्यक ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाले वाहनों का रास्ता भी बाधित हो रहा है।

कोरोना की दूसरी लहर जहाँ पहले से कहीं खतरनाक होकर सामने आ रही है, वहीं इन कथित किसानों ने एक बार फिर से पंजाब से दिल्ली तक मार्च करने का निर्णय लिया है। राकेश टिकैत की अगुवाई वाली भारतीय किसान यूनियन ने भाजपा सरकार को हाल ही में प्रदर्शन स्थल खाली नहीं करने की धमकी दी थी। अब बीकेयू के गुरनाम सिंह चढूनी ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर सरकार ने कोरोना संकट की आड़ में सीमाओं को खाली करने की कोशिश की तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

मजे की बात यह है कि ऐसा ही बयान इच्छाधारी प्रदर्शनकारी के नाम से कुख्यात योगेंद्र यादव ने भी दिया था। योगेंद्र यादव ने भी कहा था कि मोदी सरकार कोरोना वायरस महामारी के बहाने विरोध-प्रदर्शन को खत्म करने की कोशिश कर रही है।

इससे पहले 17 अप्रैल को भी चढूनी ने बीजेपी को सत्ता से बेदखल करने की धमकी दी थी। उन्होंने ट्वीट में लिखा था, “बीजेपी को यह नहीं समझना चाहिए कि वो किसानों के प्रदर्शन स्थल को खाली कराने में सक्षम है। अगर सरकार इस तरह की कोई भी कार्रवाई करती है, तो भाजपा अपना चेहरा तक नहीं बचा पाएगी।”

कुछ दिनों पहले, जम्मू के दौरे पर गए किसान नेता राकेश टिकैत ने जोर देकर कहा था कि किसानों का आंदोलन शाहीन बाग नहीं है, जिसे कोरोना वायरस के नाम पर खत्म किया जा सके।

कथित किसानों की ये नौटंकी यहीं समाप्त नहीं होती है। ऐसे वक्त में जब देश में कोरोना संकट की वजह से एक दिन में ही 3 लाख से अधिक नए कोरोना संक्रमण के मामले दर्ज किए गए। प्रदर्शनकारी किसानों ने राष्ट्रीय राजधानी में गाजीपुर की सीमा पर एक इफ्तार पार्टी रखी, जिसमें सोशल डिस्टेंसिंग के सभी नियमों का जमकर उल्लंघन हुआ। प्रदर्शन स्थल की चौंकाने वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी वायरल हुईं। इसमें किसान नेता एक बड़े समूह के साथ भोजन करते दिखे। उस दौरान कोरोना के नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ीं।

पूरे देश में व्याप्त कोविड-19 महामारी के मौजूदा संकट को पूरी तरह से अनदेखा करते हुए भारतीय किसान यूनियन ने कृषि कानूनों के विरोध में 21 अप्रैल को दिल्ली में एक मार्च की भी घोषणा की थी। यह ऐलान ऐसे वक्त में किया गया था, जब दिल्ली में संक्रमितों के मामलों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है। राष्ट्रीय राजधानी में अस्पतालों में बेड, रेमडेसिविर और ऑक्सीजन की किल्लत मची हुई है।

किसानों के कंधों पर बंदूक रखकर निशाना लगा रहे राकेश टिकैत ने कहा है महामारी का बहाना बनाकर किसान आंदोलन को रोका नहीं जा सकता है। खास बात यह है कि राकेश टिकैत ने खुद वैक्सीन की डोज ले ली है। टिकैत ने यह भी कहा है कि अगर दिल्ली की सीमाओं पर प्रदर्शन कर रहा एक भी किसान कोरोना संक्रमित होता है तो इसके लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार होगी।

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के साथ बात करते हुए टिकैत ने कहा, “अगर किसान वायरस से संक्रमित होते हैं तो जिम्मेदारी पूरी तरह से सरकार की होगी। जब देश भर में COVID-19 मामले बढ़ रहे हैं तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इसके लिए भी किसान जिम्मेदार हैं? ”

उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई बीमारी है, तो सरकार को इसका इलाज सुनिश्चित करना चाहिए और इसके लिए अस्पतालों का निर्माण करना चाहिए। राजनेता दूसरी चीजों के लिए धन जुटा रहे हैं। वे रैलियाँ कर रहे हैं और चुनाव लड़ रहे हैं।”

जहाँ ‘खबर’ वहीं द प्रिंट वाले गुप्ता जी के ‘युवा रिपोर्टर’! बस अपना पोर्टल पढ़ना और सवाल पूछना भूल जाते हैं

शेखर गुप्ता का ‘द प्रिंट’ प्रोपेगेंडाबाजी का उस्ताद रहा है। इसी कड़ी में उसने बुधवार (21 अप्रैल 2021) को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का एक साक्षात्कार प्रकाशित किया।

इसमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने दावा किया है, “पहली लहर के दौरान हमने समय से बॉर्डर सील कर संक्रमण को फैलने से रोका। लेकिन, दूसरी लहर को लेकर केंद्र ने राज्यों को सचेत नहीं किया। वे इसके बारे में जानते थे, लेकिन कोई अलर्ट जारी नहीं किया गया।”

इस इंटरव्यू को शेखर गुप्ता ने अपने ट्विटर हैंडल से भी शेयर किया है। साथ ही बताया है कि द प्रिंट के युवा रिपोर्टर उस जगह पहुँच ही जाते हैं, जहाँ खबर होती है।

शेखर गुप्ता का ट्वीट

दिलचस्प यह है कि बघेल के दावों वाले जिस इंटरव्यू को लेकर शेखर गुप्ता ने ‘युवा रिपोर्टर’ की पीठ थपथपाई है उनको भी शायद द प्रिंट की ही खबरों पर भरोसा नहीं है! असल में इसी साल 7 जनवरी को द प्रिन्ट पर एक खबर प्रकाशित हुई थी। इसमें बताया गया था कि केंद्र ने महाराष्ट्र, केरल, छत्तीसगढ़ और बंगाल को Covid-19 के बढ़ते संक्रमण पर सतर्क रहने और नजर बनाए रखने को कहा है। इस रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा हुआ था कि इन चार राज्यों में देश के कुल सक्रिय मरीजों के 59% मरीज हैं।

7 जनवरी 2021 को द प्रिंट में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

7 जनवरी की इस रिपोर्ट में बताया गया था कि केन्द्रीय स्वास्थ्य सचिव ने इन राज्यों में घट रही टेस्टिंग पर भी चिंता व्यक्त की है और राज्यों को यह सलाह दी है कि वे इस पर ध्यान दें। इसी रिपोर्ट में विस्तार से इन राज्यों में कोरोना वायरस के संक्रमण की स्थिति पर चर्चा की गई थी, जिसमें पॉजिटिविटी रेट पर विशेष ध्यान देने की बात कही गई थी क्योंकि रिपोर्ट प्रकाशित होने के समय इन राज्यों की पॉजिटिविटी दर देश की औसत पॉजिटिविटी दर से कहीं अधिक थी।

दिलचस्प यह भी है कि जिस बघेल के इंटरव्यू को शेखर गुप्ता ‘खबर’ बता रहे हैं, उसी मुख्यमंत्री ने स्वदेशी कोरोना वैक्सीन के प्रभाव पर भी सवाल उठाया था। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री ने भी ऐसा ही किया था। लेकिन बघेल के साथ इंटरव्यू में इन सवालों के जवाब नहीं हैं।

लगता है कि खबर के लिए हर जगह पहुँच जाने वाले ‘युवा रिपोर्टर’ तैयार करने वाले शेखर गुप्ता शायद उन्हें पत्रकारिता की मूलभूत चीजों का प्रशिक्षण देना ही भूल गए हैं। कैसे साक्षात्कार की तैयारी होती है? साक्षात्कार में कैसे सवाल पूछे जाते हैं?

वैसे उनसे इसकी उम्मीद करना भी बेमानी ही है। क्योंकि हाल ही में कोरोना संक्रमण का ठीकरा केंद्र पर फोड़ते हुए शेखर गुप्ता ने कहा था कि मोदी सरकार ने शुरू में सबके लिए एक तरह का रास्ता अपनाते हुए हर राज्य को उनका फरमान मानने के लिए मजबूर किया और उनसे (राज्यों से) वो अधिकार भी छीन लिए कि वह महामारी के समय में अपने राज्य की वास्तविकता और जरूरत के हिसाब से फैसले ले सकें। द प्रिंट कोरोना के स्वदेशी टीकों के खिलाफ अफवाहें फैलाने में भी सबसे अगली पंक्ति में था।

₹2800 का Remdesivir 35000 में: डॉक्टर मोहम्मद अबीर मेडिकल स्टूडेंट के साथ मिल कर रहा था कालाबाजारी

राजस्थान के उदयपुर में एक डॉक्टर और एक एमबीबीएस छात्र रेमडेसिविर (Remdesivir) इंजेक्शन की कालाबाजारी करते हुए पकड़ा गया है। कोरोना वायरस से संक्रमित एक मरीज के परिजन की शिकायत पर पुलिस ने कालाबाजारी कर रहे डॉक्टर मोहम्मद अबीर और और उसके साथी को गिरफ्तार किया। आरोपियों से उनके पूरे गिरोह की जानकारी प्राप्त करने के लिए पूछताछ की जा रही है।

उदयपुर पुलिस ने बताया कि उन्हें रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी की सूचना मिली थी। इसके बाद एक पुलिसकर्मी को ग्राहक बनाकर आरोपितों के पास भेजा गया। आरोपितों ने 2800 रुपए का रेमडेसिविर इंजेक्शन 35,000 रुपए में बेचने का सौदा तय किया। इसके बाद निजी अस्पताल में पदस्थ डॉक्टर मोहम्मद अबीर और उसके साथी एमबीबीएस छात्र मोहित पाटीदार को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। रुपयों के लेन-देन में डॉक्टर ने 2 इंजेक्शन लेने पर प्रति इंजेक्शन 35,000 रुपए की बात कही। डॉक्टर ने एक इंजेक्शन के लिए इससे भी अधिक कीमत बताई।

गिरफ्तार डॉक्टर मोहम्मद अबीर उदयपुर के गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में कार्डियोलॉजिस्ट है। अबीर मूल रूप से उदयपुर के सवीना का रहने वाला है। दूसरा आरोपित गीतांजलि मेडिकल कॉलेज में ही एमबीबीएस के सेकेंड ईयर का छात्र है।

उदयपुर के एकलिंगपुरा चौराहे से पुलिस बुधवार (21अप्रैल 2021) दोनों को पकड़ा। ग्राहक बनकर आए पुलिसकर्मी ने अपने साथियों की सहायता से दोनों को गिरफ्तार किया। इनके पास से इंजेक्शन भी बरामद किए गए।

ऑक्सीजन प्लांट लगा रहा श्रीराम मंदिर ट्रस्ट: मंदिरों के रुपयों का हिसाब माँगने वाले गायब, मस्जिद से पत्थरबाजी पर चुप्पी

अब जब देश कोरोना काल में एक तरह के मेडिकल आपातकाल से गुजर रहा है, ऐसे समय में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट देश में ऑक्सीजन की कमी को पूरा करने के लिए आया है। ट्रस्ट ने निर्णय लिया है कि वो दशरथ मेडिकल कालेज में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करेगा। देश में ऑक्सीजन की दिक्कत को देखते हुए ट्रस्ट ने ये बड़ा फैसला लिया है। इस ऑक्सीजन प्लांट को स्थापित करने में 55 लाख रुपए का खर्च आएगा।

‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के ट्रस्टी डॉक्टर अनिल मिश्र ने इस सम्बन्ध में जानकारी देते हुए कहा कि इस समय पूरा देश कोरोना की दूसरी लहर से परेशान है, ऐसे में राम मंदिर की तरफ से भी जनहित में योगदान दिया जा रहा है। बता दें कि रामलला के अस्थायी मंदिर में दर्शन-पूजन पहले ही रोक दिया गया है, ताकि श्रद्धालुओं की भीड़ न जुटे। इसी तरह कुम्भ के अखाड़ों ने भी हरिद्वार में अब इसे प्रतीकात्मक रखने का फैसला किया।

इस खबर से गिरोह विशेष को ज़रूर परेशानी हो सकती है, जो लगातार मंदिर-मंदिर की रट लगाए हुए था और पूछा जा रहा था कि जिस देश में मंदिर बनवाए जाते हों, वहाँ स्वास्थ्य सिस्टम कैसे सुधरेगा? अब उन्हें आत्मचिंतन करने का समय आ गया है क्योंकि मंदिर सरकार नहीं, श्रद्धालु बनवा रहे हैं। हाँ, मंदिर की संपत्ति पर ज़रूर सरकार का कब्ज़ा है। क्या किसी अन्य मजहब में ऐसा होता है? हिसाब माँगा जाता है?

हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इसी तरह का प्रोपेगंडा फैलाया था। स्वरा भास्कर को ये तो जानना ही चाहिए कि इस आपात स्थिति में राम मंदिर क्या कर रहा है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी दो और खबरें हैं, जो आजकल में ही आईं। राजस्थान के सांगनेर स्थित जामा मस्जिद में जब पुलिस लॉकडाउन का पालन कराने गई तो पुलिस पर ईंट-पत्थरों से हमला किया गया। गुजरात के कपड़वंज स्थित अली मस्जिद में भीड़ जुटाने से रोका गया तो पुलिस पर हमला हुआ

अभी तक गिरोह विशेष के एक भी सेलेब्रिटी ने इन घटनाओं की निंदा नहीं की है। पिछले साल भी ऐसी कई घटनाएँ सामने आई थीं, ये नई नहीं हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि गाँवों में स्थित छोटे मंदिरों से लेकर हजारों वर्ष पुराने भव्य मंदिर तक कोरोना काल में जिस तरह से गरीबों की सेवा कर रहे हैं, उसे छिपाने के लिए राम मंदिर के दान का मुद्दा बार-बार उठाया जाता है? साथ ही इससे इस्लामी कट्टरपंथियों की करतूतों पर भी पर्दा डाला जाता है?

असली कारण यही है। पीएम केयर्स फंड में जिस तरह से मंदिरों ने आगे आकर बढ़-चढ़ कर दान दिया, उसकी प्रशंसा इन सेलेब्रिटीज ने नहीं की। कुम्भ को सही समय पर समाप्त कर के अखाड़ों ने बिना किसी के कहे ही जनहित में निर्णय लिया, उसकी तारीफ़ इन वामपंथी पत्रकारों ने नहीं की। IIT कानपुर के उस रिसर्च पर आँख मूँद लिया गया, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि कुम्भ से कोरोना के प्रसार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

देश में मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन की फ़िलहाल किल्लत है, जिसके लिए रिलायंस से लेकर टाटा और कई अन्य कंपनियाँ सामने आई हैं। टाटा को जब नए संसद भवन के निर्माण की जिम्मेदारी दी गई थी तो इन्हीं लोगों ने उसकी आलोचना की थी। अंबानी-अडानी को ये लोग रोज गाली देते हैं। इसी तरह अब वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। साथ ही एक वर्ग दोहरा रवैया अपनाते हुए ये भी पूछ रहा है कि 18 से कम के उम्र वालों को वैक्सीन पहले ही क्यों नहीं दी?

असली दिक्कत ये नहीं है। अगर हम मंदिरों की सूची गिनाने लगें जिन्होंने कोरोना काल में गरीबों के भोजन से लेकर आमजनों में जागरूकता फैलाने का काम किया है तो कई पन्ने छोटे पड़ जाएँगे। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि लिबरल गिरोह को ह्यूमन चेन टाइप की कोई स्टोरी आजकल मिल नहीं रही है क्योंकि तबलीगी जमात प्रकरण से लेकर अबकी रमजान में छूट की माँग तक, मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कहानियों का उनके पास भी अभाव है।

आपको याद होगा एक युवती ने लिखा था कि जब राम मंदिर के लिए चंदा माँगने के लिए लोग उसके घर आए तो वो कई मिनटों तक गुस्से में काँपती रही। एक महिला ने तो चंदा माँगने वालों की बेइज्जती करते हुए वीडियो भी पोस्ट कर मजे लिए थे। अब यही लोग मंदिरों से हिसाब माँगते हैं, जबकि इन मंदिरों को बनाने से लेकर इनमें पूजा-पाठ तक, इनका योगदान शून्य ही होता है। अब सोशल मीडिया मंदिर के रुपयों से हिसाब का सवाल लिए भरा पड़ा है।

हाल ही में स्वामीनारायण मंदिर ने अपने परिसर में ही कोविड केयर यूनिट स्थापित किया। वजह ये है कि मोदी काल में पौने 2 लाख किलोमीटर सड़कें, 12 नए AIIMS, 7 नए IIT-IIM-IIIT और 35 एयरपोर्ट्स बने हैं; इन आँकड़ों को छिपाने के लिए ये नैरेटिव तो बनाना पड़ेगा न कि ‘मोदी सरकार मंदिर बनवाती है।’ अभी तो 3 करोड़ परिवारों को उज्ज्वला गैस योजना का लाभ मिलने और 11 करोड़ टॉयलेट्स बनवाने की बात हमने की ही नहीं।

मंदिर का पैसा सरकार रखती है। लेकिन, हज के लिए सब्सिडी सरकार देती है। कई राज्यों में मौलानाओं और मस्जिद के कर्मचारियों को वेतन सरकार देती है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दरगाह के लिए खजाने सरकार खोलती है। राजस्थान और पंजाब जैसे राज्यों में CM की तस्वीर के साथ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए विज्ञापन सरकार देती है। हज हाउस सरकार बनवाती है। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग सरकार का मंत्रालय है।

अब जब इस कोरोना काल में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट ने अयोध्या के राजाश्री दशरथ मेडिकल कॉलेज में 55 लाख रुपए की लागत से ऑक्सीजन प्लांट लगाने का निर्णय लिया है, तो लिबरल गिरोह की जुबान सिल जाएगी। तबलीगी जमात के सुपर स्प्रेडर्स का बचाव करने वाले ये लोग श्रीराम मंदिर ट्रस्ट द्वारा ऑक्सीजन प्लांट लगाने या देश के हजारों मंदिरों द्वारा कोरोना के खिलाफ लड़ाई में योगदान दिए जाने पर चूँ तक न करेंगे।

कोरोना संकट में IAF ने संभाला मोर्चा: ऑक्सीजन और दवाइयों के साथ एयरलिफ्ट हो रहे स्वास्थ्यकर्मी

कोरोना महामारी के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं की बिगड़ती स्थिति को देखते हुए भारतीय वायुसेना ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया है। संकट की घड़ी में वायुसेना ऑक्सीजन कंटेनर, सिलिंडर, जरूरी दवाओं के साथ-साथ स्वास्थ्यकर्मियों को भी एयरलिफ्ट कर रही है। 

भारतीय वायुसेना ने ट्वीट कर कहा है, “IAF की ट्रांसपोर्ट फ्लीट कोरोना के खिलाफ लड़ाई में साथ है। देशभर में कोविड अस्पतालों तक मेडिकल कर्मी, जरूरी उपकरण और दवाओं को एयरलिफ्ट करना जारी है।” एयरफोर्स अधिकारियों के मुताबिक, IAF ने दिल्ली में डीआरडीओ के बनाए कोविड-19 अस्पताल में कोच्चि, मुंबई, विशाखापत्तनम और बेंगलुरु तक से नर्सिंग स्टाफ को एयरलिफ्ट कर पहुँचाया है।

बता दें कि देश में कोरोना से उपजे संकट को देखते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को सभी रक्षा प्रतिष्ठानों को अपनी तैयारी पूरी रखने और सरकार की मदद के लिए आगे आने को कहा था। रक्षा मंत्री ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) बिपिन रावत सहित मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इस बैठक में एक रूपरेखा बनाई गई थी, जिसमें यह स्पष्ट था कि संकट की घड़ी में राज्य सरकारों को किसी तरीके से मदद पहुँचाई जाए। 

उल्लेखनीय है कि विदेशों से ऑक्सीजन कंटेनर और जरूरी उपकरण मँगाने का जिम्मा भी IAF को देने पर विचार हो रहा है। बुधवार को केंद्र ने 8 राज्यों में ऑक्सीजन का कोटा बढ़ाने की भी घोषणा की थी।

‘1 लड़की ने सब पप्पू की वाट लगा रखी है’: कंगना के नाम पर शेयर हो रहा फेक ट्वीट, अभिनेत्री ने दिया जवाब

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के बेबाक रवैए के कारण सोशल मीडिया पर उनके कई विरोधी हैं। यही कारण है कि तरह-तरह के हथकंडे इस्तेमाल करके उन्हें बुरा दिखाने का प्रयास होता रहता है। कभी उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर उन पर इल्जाम मढ़े जाते हैं तो कभी वे जो कहती हैं उसे ही विवादित बना दिया जाता है।

कंगना को बदनाम करने के प्रयासों में आज ट्रोलर्स का एक नया कारनामा सोशल मीडिया पर सामने आया। दरअसल, कंगना रनौत के नाम से एक ट्वीट वायरल हुआ। इस ट्वीट की तस्वीर में एक आदमी गाय को चूम रहा है और टेक्स्ट में लिखा है, 

“जिसका भी ऑक्सीजन का स्तर नीचे गिर रहा है वो कृपया इसे ट्रॉय करें। गाय ऑक्सीजन ही छोड़ती है, इसलिए ये सबसे सरल तरीका है कुछ ही समय में ऑक्सीजन लेने का। जय श्रीराम। “

वायरल होती तस्वीर में ट्वीट की तारीख 21 अप्रैल 2021 लिखी है। हकीकत में कंगना ने ऐसा ट्वीट किया ही नहीं। उन्हें बदनाम करने के लिए इसे व्हॉट्सएप पर शेयर किया जा रहा था, जिसे यूजर्स ने पकड़ लिया और स्क्रीनशॉट शेयर कर बताया कि ये ट्वीट ही फेक है।

रोजी नाम की महिला ने ट्वीट किया,

“व्हॉट्सएप फॉर्वर्ड में कंगना के नाम से शेयर हो रहा एक फेक ट्वीट मिला। इसे कई बार फॉर्वर्ड किया गया है। लोग न सिर्फ़ कंगना को बुरा दिखाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, बल्कि हिंदू धर्म को भी बदनाम कर रहे हैं। “

रोजी के इस ट्वीट को देखने के बाद कंगना ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। कंगना ने लिखा,

“ये मुझे मोदी के अभियानों की याद दिलाते हैं, ‘ये मेरे ख़िलाफ़ नहीं है, ये तुम्हारे खिलाफ हैं, लेकिन मैं इनके रास्ते में हूँ।’ अगर आप ऐसे झूठ पर यकीन सिर्फ इसलिए करेंगे क्योंकि आप बहुत आलसी हैं, तो आप उन्हें ताकत देंगे कि वो आपको बर्बाद करें। कुछ भी हो। ध्यान से निर्णय लीजिए। मेरे पास जीतने और हारने के लिए कुछ नहीं है। ”

कंगना ने इस संबंध में एक और ट्वीट किया। उन्होंने लिखा,

“बब्बर शेरनी का ऐसा प्रभाव है कि बहुत सारे अभियान, असीमित धन, रणनीतियाँ और समय एक अकेली महिला को तोड़ने में लगाए जा रहे हैं। लेकिन फिर भी पप्पू पार्टी, राजनीति से लेकर मूवी माफियाओं तक ऐसा करने में विफल हो रहे हैं। एक लड़की ने सब पप्पू की वाट लगा रखी है।”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार के ख़िलाफ़ खुलकर बयानबाजी करने वाली कंगना रनौत ने हाल में सुप्रीम कोर्ट से सुरक्षा के लिए गुहार लगाई थी। कंगना ने कोर्ट में कहा था कि उनके खिलाफ चल रहे सारे मामले हिमाचल प्रदेश में ट्रांसफर किए जाएँ, क्योंकि महाराष्ट्र में उन्हें जान का खतरा है। कंगना ने शिवसेना नेता संजय राउत के बयानों का उल्लेख करते हुए याचिका में ये भी कहा था कि महाराष्ट्र सरकार उन्हें प्रताड़ित कर रही है।

राहुल गाँधी की फ़ॉर्म्युला पॉलिटिक्स और उसमें फँसी कॉन्ग्रेस: प्रधानमंत्री बनने/बनाने की ख्वाहिश कब तक?

वर्तमान में कॉन्ग्रेस पार्टी की राजनीति का एक प्रमुख दर्शन है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मित्र गढ़ लेना। किसी उद्योगपति को उनका मित्र घोषित करके यह बताना कि मोदी उन्हें फ़ायदा पहुँचाने के लिए ही प्रधानमंत्री बने हैं। चार वर्ष पहले राहुल गाँधी बताते थे कि मोदी के दस पंद्रह उद्योगपति मित्र हैं जिन्हें वे फ़ायदा पहुँचा रहे हैं। बाद में यह संख्या कम होते-होते दो पर आ रुकी। क़रीब डेढ़ वर्षों तक दो पर टिकी रही और बड़ी मेहनत के बाद राहुल गाँधी ने एक और उद्योगपति की खोज कर ली है जिसे वे मोदी का मित्र बता सकें और ये नाम है सिरम इन्स्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के अदार पूनावाला का। कल उन्होंने पूनावाला को भी नरेंद्र मोदी का मित्र घोषित करते हुए बताया कि; मोदी उन्हें फ़ायदा पहुँचाना चाहते हैं।

राहुल गाँधी के अनुसार नरेंद्र मोदी दिन-रात काम कर रहे हैं ताकि किसी और को फ़ायदा पहुँचे। कौन भारतीय इस बात पर विचार भी करेगा कि एक व्यक्ति, जो प्रधानमंत्री है, अपने फ़ायदे के लिए मेहनत न करके किसी और के फ़ायदे के लिए मेहनत करेगा? ऐसा कैसे है कि एक आम भारतीय की सोच की भनक उस नेता को नहीं है जो देश का प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखता है?

क्या नेताजी ने पिछले डेढ़ दशकों में एक आम भारतीय में होने वाले विचार परिवर्तन के बारे कभी नहीं सोचा? कभी चिंतन नहीं किया कि कैसे एक आम भारतीय अब अपने लिए काम करना चाहता है? क्या किसी सलाहकार ने इस नेता को यह नहीं बताया कि; देखिए सर, लोगों का विचार ऐसा बदल रहा है कि नौकरी करने वाला एक आम भारतीय अब नौकरी छोड़कर बिज़नेस करना चाहता है क्योंकि उसे लगता है कि उसकी क्षमता, ज्ञान और एक्स्पर्टीज़ का फ़ायदा उसे हो रहा है जिसके लिए वह काम करता है।

फ़ॉर्म्युला पॉलिटिक्स की एक समस्या है। किस फ़ॉर्म्युला की एक्सपाइरी डेट आकर चली गई है, इस बात की भनक फ़ॉर्म्युला लगाने वाले को नहीं होती। वह बेचारा लगा रहता है उसे अप्लाई करके नए परिणाम निकालने में। इधर फ़ॉर्म्युला मन ही मन ख़ुश हो रहा होता है, यह सोचते हुए कि; इसे यह नहीं पता कि मुझमें अब फल नहीं लग सकते। इनके बार-बार दोहराए जाने के पीछे एक कारण यह भी होता है कि ऐसे फ़ॉर्म्युलों को किराए पर मिलने वाले बुद्धिजीवी, संपादक, सोशल मीडिया ऑपरेटिव और तथाकथित आरटीआइ ऐक्टिविस्ट राजनीतिक दाँव-पेंच बताकर नेता के मन में झूठा आत्मविश्वास पैदा कर देते हैं।

भारत का वर्तमान विपक्ष इसी फ़ॉर्म्युला पॉलिटिक्स का मारा है, बस इन विपक्षी नेताओं को इनके सलाहकार नहीं बता पा रहे कि ये फ़ॉर्म्युला क्यों नहीं चल रहा और उनके वांछनीय परिणाम क्यों नहीं आ रहे। इसके पीछे शायद कारण यह है कि ऐसा करने से सलाहकारों को मिलने वाला मेहनताना बंद हो जाएगा।

विपक्ष, ख़ासकर कॉन्ग्रेस के नेता को अभी भी लगता है कि भारतीय राजनीति समय के उसी बिंदु पर खड़ी है जहाँ उन्हें उनकी पार्टी विरासत में मिली थी और वही सारे फ़ॉर्म्युले आज भी प्रासंगिक हैं जो उन्हें पार्टी के साथ परंपरागत ज्ञान के रूप में मिले थे।

ऐसे में बेचारे परंपरागत ज्ञान के रूप में मिले फ़ॉर्म्युले चलाए जा रहे हैं। नवाचार के नाम पर बस उस फ़ॉर्म्युले के किसी एक नट को कस दिया जाता है या किसी दूसरे को ढीला कर दिया जाता है, इस आशा में कि ऐसा करने के बाद परिणाम कुछ अलग आएँगे। यदि ऐसी राजनीति में राहुल गाँधी का विश्वास न होता तो नोटबंदी के समय न ही वे ATM से पैसे निकालने के लिए लाइन में खड़े न होते और न ही उत्तराखंड की रैली में अपने कुर्ते की फटी जेब दिखाते।

यह भी फ़ॉर्म्युला पॉलिटिक्स का ही असर है जिसमें कॉन्ग्रेस ने अपनी राजनीतिक लड़ाई को संपादकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और बोट्स के लिए आउट्सोर्स कर दिया है। ऐसा नहीं कि यह कोई नया फ़ॉर्म्युला है। यह पहले भी था पर चूँकि तब मीडिया की पहुँच सीमित थी इसलिए दिखाई कम देता था।

इस परिप्रेक्ष्य में मुलायम सिंह यादव का वह वक्तव्य याद आ जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि; कॉन्ग्रेस के हज़ारों हाथ हैं। संपादकीय, कॉलम, मीडिया हाउस और खबरों पर नियंत्रण की शक्ल आज बदल कर अजेंडा चलाने वाले गिरोह के फेसबुक पोस्ट, यूट्यूब वीडियो, ट्विटर ट्रेंड, आंदोलनजीवियों और ‘एमिनेंट’ इंटेल्लेक्टुअल्स के पत्रों और अवॉर्ड वापसी ने ले लिया है। प्रश्न यह है कि जिनके सहारे यह दल पुनः राजनीति की प्रमुख धुरी बनना चाहता है उनकी निजी विश्वसनीयता ऐसी है कि वे दिए गए काम कर सकें?

पर मेरे विचार से उससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि एक राजनीतिक दल, जो भारतवर्ष जैसे विशाल देश में सरकार बनाकर अपने नेता को प्रधानमंत्री बनाने की ख्वाहिश रखता है, क्या अपना राजनीतिक दर्शन, संघर्ष और राजनीतिक संरचना किसी और को आउटसोर्स करने का ख़तरा बार-बार लगातार उठा सकता है?

‘प्लाज्मा के लिए नंबर डाला, बदले में भेजी गुप्तांग की तस्वीरें; हर मिनट 3-4 फोन कॉल्स’: मुंबई की महिला ने बयाँ किया दर्द

जहाँ कोरोना की दूसरी लहर से लोगों की जान जा रही है, वहीं मदद के लिए गुहार लगाने वालों के साथ कुछ लोग संवेदनहीन व्यवहार भी कर रहे हैं। मुंबई की एक महिला ने ऐसी ही अपनी आपबीती सुनाई है। महिला ने एक परिजन को कोविड-19 होने का बाद अपना नंबर सार्वजनिक किया था, ताकि प्लाज्मा थेरेपी के लिए ब्लड मिल सके। लेकिन, बदले में उसके नंबर पर कई लोगों ने अश्लील फोटो भेजे।

महिला ने ‘VICE’ में एक लेख के जरिए अपना अनुभव साझा किया है। मुंबई की रहने वाली महिला ने बताया कि कोरोना वायरस से उपजे खतरे का उसे सही अंदाज़ा तब लगा, जब इसने उसके परिवार में दस्तक दी। उसने यह भी बताया है कि किस तरह तमाम सावधानियाँ बरतने के बावजूद उनके परिजन संक्रमित हुए और उनका सामना ध्वस्त हो चुके स्वास्थ्य सिस्टम से हुआ।

इस महिला का नाम शास्वती सिवा है। पिछले सप्ताह उनके परिवार का एक सदस्य कोरोना पॉजिटिव हो गया। इसके बाद वह वेंटिलेटर की खोज में थीं, जिसकी महाराष्ट्र में किल्लत है। फिर उन्होंने ट्विटर पर मदद की गुहार लगाई। उनका संपर्क कुछ अच्छे लोगों से हुआ और 6 घंटे के भीतर वेंटिलेटर उपलब्ध भी हो गया। इसके 2 दिन बाद A+ ब्लड ग्रुप प्लाज्मा की ज़रूरत पड़ी। इसके लिए कोरोना से ठीक हो चुके व्यक्ति की ज़रूरत थी।

रिपोर्ट नेगेटिव आने के 28 दिन बाद ही प्लाज्मा डोनेट किया जा सकता है। इसके बाद उनके एक ‘प्रभावशाली दोस्त’ ने सोशल मीडिया पर इसे डाल दिया और उनके फोन पर कई मैसेज आने लगे। कुछ अन्य लोकप्रिय हैंडल्स से भी ये शेयर किया गया। शास्वती लिखती हैं कि उन्हें अपना नंबर सार्वजनिक रूप से देख कर डर भी लगा, लेकिन फिर उन्हें दोस्तों ने बताया कि यही अंतिम विकल्प है और उन्होंने भी अपने परिजन का जीवन बचाने के लिए ये खतरा मोल लिया।

शास्वती ‘VICE’ में लिखती हैं कि जिस दिन उन्होंने इमरजेंसी रिक्वेस्ट डाला, उस दिन उनके पास हर मिनट 3-4 फोन कॉल्स आने लगे। वो ब्लड बैंक्स से बात कर रही थीं, डोनर्स का जुगाड़ कर रही थीं और दोस्तों से संपर्क बनाए हुए थीं। लेकिन, उस बीच एक व्यक्ति ने कॉल कर के पूछा कि वो SOS जारी करने वाले व्यक्ति को कैसे जानती हैं? फिर वो पूछने लगा कि क्या तुम सिंगल हो? इसके कुछ देर बाद एक और कॉल आया।

उधर से दो लोग धीरे-धीरे आपस में बात कर रहे थे, जिसके बाद एक ने फोन पर कहा कि तुम्हारी प्रोफ़ाइल पिक्चर बहुत अच्छी है। इसके बाद उनका पता, रिलेशनशिप और अन्य डिटेल्स पूछने के लिए कई फोन कॉल्स आए। शास्वती सिवा के अनुसार, एक व्यक्ति ने फोन पर किस करते हुए आवाज़ें भी निकालीं। वो लिखती हैं कि जब पारिवारिक इमरजेंसी में वो फँसी थीं, तब इस तरह की प्रताड़ना तोड़ देने वाली थी।

उन्होंने उन नंबरों को ब्लॉक किया। अगली सुबह सेकेंड्स के अंतराल में ही 7 लोगों के फोन कॉल आए। सबको ब्लॉक कर के शास्वती ने फोन साइलेंट कर के बगल में रख दिया। लेकिन, वो लिखती हैं कि जब उन्होंने व्हाट्सएप्प खोला तो वहाँ अश्लील तस्वीरें भरी पड़ी हुई थीं। कई अपरिचितों ने उन्हें अपने गुप्तांग (D#ck) की तस्वीरें भेज रखी थीं। तब तक उन्हें डोनर भी मिल चुका था। उन्होंने महिलाओं को सलाह दी है कि वो कभी अपना नंबर सार्वजनिक न करें।