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‘कुम्भ में जाकर कोरोना+ हो गए CM योगी, CMO की अनुमति के बिना कोविड मरीजों को बेड नहीं’: प्रियंका व अलका के दावों का फैक्ट चेक

प्रियंका गाँधी और अलका लाम्बा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर अलग-अलग दावे किए हैं। जहाँ कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी ने CMO की अनुमति के बिना मरीजों को अस्पताल में बेड्स नहीं मिल रहे हैं, वहीं अलका लाम्बा ने सीएम योगी आदित्यनाथ के कोरोना पॉजिटिव होने और कुम्भ को साथ में जोड़ा। आइए, यहाँ देखते हैं कि इन दोनों ही दावों की सच्चाई क्या है और इनके दावों में कितना दम है।

प्रियंका गाँधी ने सोशल मीडिया के माध्यम से दावा किया, “कई जगहों से सूचना आ रही है कि कई गंभीर मरीजों को CMO के पत्र के बिना एडमिट नहीं किया जा रहा। मुख्यमंत्री जी, CMO के पत्र के इंतजार में लोगों की जानें जा रही हैं। कृपया ये नियम बंद कराएँ, लोगों की जान बचाएँ। ऐसी व्यवस्था बनाएँ जिससे कि गंभीर मरीजों का अस्पताल में एडमिशन आसान हो सके।” ब्रजेश मिश्रा जैसे पत्रकारों ने भी इस दावे को आगे बढ़ाया।

उत्तर प्रदेश के ‘सूचना एवं जनसंपर्क विभाग’ ने इस दावे का खंडन किया है। विभाग ने ‘इन्फो उत्तर प्रदेश फैक्ट चेक’ के जरिए बताया, कोरोना संक्रमित मरीज को इंटीग्रेटेड कोविड एंड कमांड कंट्रोल रूम की मदद से एम्बुलेंस से लेकर टेस्ट और अस्पताल में भर्ती करने की व्यवस्था की जाती है। सरकार ने कहा कि ऐसा कोई नियम ही नहीं है कि कोविड-19 पॉजिटिव मरीज को भर्ती होने के लिए सम्बंधित जिले के ‘चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO) से अनुमति पत्र लेना होगा।

कॉन्ग्रेस की एक अन्य नेता अलका लाम्बा ने योगी योगी आदित्यनाथ की साधुओं के साथ नदी में स्नान करते हुए एक तस्वीर शेयर की और लिखा, “योगी आदित्यनाथ कोरोना पॉजिटिव हुए। ये कौन सी जमात में जाकर आए थे? पूछता है भारत।” उन्होंने कुम्भ की तबलीगी जमात से तुलना वाले नैरेटिव को आगे बढ़ाया। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई अन्य लोगों ने भी इस तस्वीर को हरिद्वार कुम्भ 2021 की बताया।

अलका लाम्बा ने तस्वीर शेयर कर चलाया प्रोपेगंडा

साथ ही अमित शाह की भी ऐसी ही तस्वीर शेयर की गई। जबकि सच्चाई कुछ और ही है। ये तस्वीर फरवरी 2019 की है और स्थान है प्रयागराज। तब प्रयागराज संगम में लगे कुम्भ में इन दोनों ने डुबकी लगाई थी। यानी, ये तस्वीरें भारत में कोरोना का पहला मामला सामने आने के 1 साल पहले की है। फिर भी कॉन्ग्रेस नेता यूपी सीएम को बदनाम करने के लिए इस तरह के तिकड़म चल रहे हैं, जिसकी अब पोल खुल गई है।

पुलिस अधिकारियों को अगवा कर मस्जिद में ले गए, DSP को किया टॉर्चरः सरकार से मोलभाव के बाद पाकिस्तान में छोड़े गए बंधक

प्रतिंबंधित इस्लामी संगठन तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) पाकिस्तान ने अगवा किए गए 11 पुलिसकर्मियों को रिहा कर दिया है। पाकिस्तान की पंजाब प्रांत की सरकार के साथ मोलभाव के बाद यह कदम उठाया गया है। इन पुलिसकर्मियों को लाहौर में हिंसक झड़पों के बाद रविवार (18 अप्रैल 2021) को बंधक बना लिया गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फ्रांस के राजदूत को देश से बाहर निकालने की शर्त पर पुलिस अधिकारियों को रिहा किया गया है।

सोमवार को पाकिस्तान के गृह मंत्री शेख राशिद अहमद ने 11 पुलिसकर्मियों की रिहाई की पुष्टि की। उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर कर कहा, ”टीएलपी के साथ बातचीत शुरू हो गई है। बातचीत का पहला दौर सफलतापूर्वक रहा और दूसरा दौर सेहरी के बाद होगा। उन्होंने उन 11 पुलिसकर्मियों को रिहा कर दिया है जिन्हें बंधक बनाकर रहमतुल लील अलमीन मस्जिद (यतीम खाना चौक) ले जाया गया था। पुलिस ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए हैं।”

उन्होंने आगे कहा, ”हमें उम्मीद है कि सेहरी के बाद दूसरी बैठक भी बेहतर साबित होगी और टीएलपी के साथ इन मामलों पर बातचीत कर समाधान निकाला जाएगा।” मालूम हो कि पाकिस्तान ने कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान (टीएलपी) पर आतंकवाद कानून के तहत गुरुवार को औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया था। उस पर पुलिसकर्मियों के अपहरण करने का मामला भी दर्ज किया गया था। लाहौर CCPO (अतिरिक्त महानिरीक्षक) गुलाम महमूद डोगर ने भी बातचीत की प्रक्रिया में भाग लिया।

पंजाब पुलिस के प्रवक्ता राणा आरिफ ने बताया कि कि टीएलपी कट्टरपंथियों ने जिन पुलिस अधिकारियों बंधक बनाया था, उनमें एक पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) भी थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि DSP को प्रतिबंधित संगठन के समर्थकों द्वारा प्रताड़ित किया गया था।

रविवार को एक बयान में पंजाब पुलिस ने कहा था, ”आज सुबह बदमाशों ने नवाकोट पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया। इसके बाद वे डीएसपी का अपहरण कर उन्हें मरकज में ले गए। कट्टरपंथी एक तेल टैंकर के साथ करीब 50,000 लीटर पेट्रोल भी मरकज में लेकर गए थे।”

साथ ही यह भी कहा गया था, “बदमाश हथियारों से लैस थे। उन्होंने रेंजरों, पुलिस पर पेट्रोल बम से हमला किया। पुलिस ने मस्जिद या मदरसे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। कार्रवाई केवल आत्मरक्षा में और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा के लिए की गई थी।” हालाँकि, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के सहयोगी डॉ. फिरदौर आशिक एवान ने ट्वीट कर 12 पुलिस अधिकारियों को अगवा किए जाने का दावा किया था।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में रिहा किए गए कुछ पुलिस अधिकारी खून से लथपथ और चोटिल नजर आ रहे हैं। उनके सिर के चारों ओर पट्टियाँ बँधी हुई हैं। पुलिस ने बाद में अनौपचारिक रूप से इस वीडियो के वास्तविक होने की पुष्टि की।

बता दें कि इमरान खान ने पिछले सप्ताह TLP को आतंकी संगठन बताते हुए बैन कर दिया था। वहीं, टीएलपी ने पाकिस्तान की इमरान सरकार को चेतावनी दी थी कि वे 20 अप्रैल तक फ्रांस के राजदूत को देश से बाहर निकाले। उनका कहना था कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने विवादित पत्रिका शार्ली हेब्दो द्वारा पैगंबर मुहम्मद के बनाए गए कार्टून का बचाव किया था। इसके बाद से पाकिस्तान में फ्रांस विरोधी प्रदर्शनों की शुरुआत हुई, जिसकी अगुवाई कट्टरपंथी इस्लामी पार्टी तहरीक-ए-लब्बैक-पाकिस्तान ने की। इस दौरान देश के कई हिस्सों में हिंसा हो चुकी है।

कोरोना के चलते रैली नहीं करने की बात कह, बंगाल में बड़ी राजनीतिक रैलियाँ कर रही CPI(M): दोहरी नीति उजागर

कोरोना संकट के बीच सामाजिक जिम्मेदारी का दिखावा करते हुए एक सप्ताह पहले CPI (M) नेता और राज्यसभा के पूर्व सदस्य मोहम्मद सलीम ने ट्विटर पर ऐलान किया था कि संक्रमण को देखते हुए उनकी पार्टी अब कोई भी राजनीतिक रैली नहीं करेगी।

16 अप्रैल सलीम द्वारा किए गए ट्वीट में कहा गया था कि देश भर में वायरस फैल रहा है, इसलिए माकपा ने कोई बड़ा राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं करने का फैसला किया है। अपने ट्वीट में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता से अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की अपील की।

मोहम्मद सलीम ने ट्वीट किया, “महत्वपूर्ण! कोरोना की सेकेंड वेव के चलते माकपा ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कोई बड़ी रैली नहीं करने का फैसला किया है। कोरोना को ध्यान में रखते हुए हम डोर-टू-डोर और छोटे समूह की बैठकें करेंगे। हम सीएम और पीएम से आग्रह करते हैं कि वे जिम्मेदारी से काम करें और लोगों को पार्टी से ऊपर रखें।”

सोर्स: ट्विटर

हालाँकि, नैतिकता की ऊँची-ऊँची बातें करने के एक घंटे बाद ही मोहम्मद सलीम ने बंगाल के हेमटाबाद में CPI (M) द्वारा आयोजित संयुक्त मोर्चा के माकपा उम्मीदवार भूपेन बर्मन के समर्थन में बड़े रोड शो में भाग लिया।

इसको लेकर किसी और ने नहीं, बल्कि सीपीआई (एम) के उत्तर दिनाजपुर जिले के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से जानकारी दी गई है। मोहम्मद सलीम के दावे के एक दिन बाद ही पार्टी ने बड़ा रोड शो किया। जहाँ रैली में शामिल किसी ने भी “मास्क” नहीं पहना था।

18 अप्रैल को मोहम्मद सलीम के दावों के एक दिन बाद कोरोना संकट को दरकिनार करते हुए सीपीआई (एम) ने बल्लीगंज विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार फौद हलीम के समर्थन में भी विशाल रैली की।

सोर्स: ट्विटर

खास बात, यह है कि इससे पहले कॉमरेड सलीम ने ऐलान किया था कि माकपा देश में बड़े पैमाने पर कोरोनो वायरस प्रकोप के बीच बड़ी राजनीतिक रैलियों का आयोजन नहीं कर रही है। दूसरी ओर पार्टी की तरफ से बड़े पैमाने पर भीड़ को जुटाया जा रहा है। लेकिन, भीड़ जुटाने के बाद भी सीपीआईएम लोगों की भीड़ को वोटों में नहीं बदल पा रही है। बता दें कि पश्चिम बंगाल चुनाव में कॉन्ग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन में है।

सोर्स: ट्विटर
सोर्स: ट्विटर

राज्य में दोतरफा मुकाबला देख राहुल गाँधी ने कोरोना का हवाला दे रद्द की रैलियाँ

इससे पहले रविवार को कोरोना का राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश में कॉन्ग्रेंस नेता राहुल गाँधी सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल में भविष्य में रैलियाँ नहीं करने को कहा था। खास बात यह है कि राहुल गाँधी ने यह घोषणा कई राजनीतिक रैलियाँ करने के बाद की।

उन्होंने दावा किया कि COVID की स्थिति को देखते हुए, वह पश्चिम बंगाल में तीन चरणों के मतदान के साथ सभी सार्वजनिक रैलियों को स्थगित कर रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि राहुल गाँधी बढ़ते हुए COVID मामलों के बावजूद, अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा द्वारा आयोजित बड़ी रैलियों में जाना जारी रखा है।

गौरतलब है कि बीते कुछ दिनों में पश्चिम बंगाल ने COVID-19 मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। रविवार को राज्य में कोरोना के चलते 25 से अधिक मौतें हुईं, जबकि 8,000 से अधिक नए COVID-19 संक्रमण दर्ज किए। राज्य में आठ चरण का विधानसभा चुनाव चल रहा है। इस बीच पश्चिम बंगाल का COVID-19 केस रविवार को 6,59,927 पर पहुँच गया।

हेल्थ बुलेटिन के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में 8,419 नए संक्रमितों से साथ 28 मौतें हुई हैं। इसी के साथ राज्य में कोरोना से मरने वालों का आँकड़ा 10,568 पर पहुँच गया है।

जमातों के निजी हितों से पैदा हुई कोरोना की दूसरी लहर, हम फिर उसी जगह हैं जहाँ से एक साल पहले चले थे

हाल में एक ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का जुमला खूब चला। ये जुमला क्यों था? क्योंकि इसका इस्तेमाल ही कुछ ऐसे तरीके से हो रहा था। सोशल मीडिया पर लिखे एक पोस्ट या 4-6 ट्वीट ‘सत्ता से सच पूछना’ तो नहीं हो सकता। उन्हें क्या जरूरत पड़ी है 4-6 ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे की सोशल मीडिया पोस्ट देखने की?

आज ये सभी जानते हैं कि बड़े लोगों का सोशल मीडिया चलाने के लिए एक टीम होती है। मान लीजिए उनके लिए सोशल मीडिया चलाने वालों ने वो ट्वीट, वो पोस्ट या कमेंट देखा भी तो वो मंत्री या नेता को क्यों बताने जाएगा? उसका काम तो सोशल मीडिया पर नेताजी को प्रसिद्ध करना है! अपनी ही नाकामी वह काम और पैसे देने वाले को जाकर बता दे और काम हाथ से जाता रहे?

ये ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ तब होता जब विभागों को चिट्ठी लिखकर, आरटीआई के जरिए उनसे ये पूछा जाता कि जनता को बीमारी और इलाज के लिए जागरूक करने के लिए विभाग ने क्या किया? ये सवाल किसी आईएएस अफसर से होना चाहिए था। पूछा जाना था कि कितने अस्पतालों में नए वेंटिलेटर की सुविधा दी गई?

पूछा जाना था कि इस वेंटिलेटर को लगाने के लिए कितने कर्मचारियों को किसने प्रशिक्षण दिया? बिहार या दिल्ली में भी सवाल ये होना चाहिए था कि कोविड-19 के इलाज के लिए किन-किन इलाकों में कौन से अस्पताल तैयार कर दिए गए हैं? आज की तारीख में कम से कम बिहार में तो ये स्थिति है कि सरकारी अस्पतालों (एम्स, पीएमसीएच, एनएमसीएच किसी में भी) बेड खाली नहीं हैं।

इसके बाद मरीज और उसके परिजन क्या करेंगे? चूँकि अखबारों में लगातार ये सरकारी प्रचारों के जरिए नहीं बताया जा रहा कि किस अस्पताल में इसके इलाज की व्यवस्था है और कहाँ कितने बेड खाली हैं, इसलिए मरीज और उसके परिजन एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भटकते रहने को मजबूर हैं।

क्यों सरकारों से इतना भी नहीं हो पाया कि लाखों का प्रचार रोज देते रहने के बाद भी कोविड-19 के इलाज के लिए अस्पतालों की एक सूची छपवा देते? वेंटिलेटर लगाने के लिए मिलने वाले प्रशिक्षण की भी वही स्थिति है। नए लोगों को वेंटिलेटर लगाने, आँगनबाड़ी-आशा कर्मचारियों को इस बारे में प्रशिक्षित करने के लिए क्या किया गया है, ये भी पूछा जाना चाहिए।

एक सिद्धांत अक्सर ‘अवतारवाद’ का भी सुनाई देता है। इसमें माना जाता है कि बहुसंख्यक भारतीय अपनी समस्याओं के लिए किसी अवतार के आने और समस्या सुलझा देने का इंतजार करते हैं। शायद विदेशों के कोई ‘सुपरमैन’ आएगा वाली सोच से ये जन्मा होगा। यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था राज्य सरकार के हाथ में होती है।

उनसे कड़े सवाल पूछने के बदले लोग इंतजार कर रहे हैं कि कोई मोदी आएगा और जादू की छड़ी घुमा कर सब ठीक कर देगा? पिछले वर्ष जब इसी दौर में लॉकडाउन लगा था तो इससे अर्थव्यवस्था चौपट हो गई का शोर मचाने जो लोग आए थे वो सब इस स्थिति के लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। आज जब दिल्ली के व्यावसायिक संगठन खुद ही बाजार बंद कर रहे हैं, उस समय उनकी बातें भी तो याद आएँगी ही!

चाहें या ना चाहें, ये स्वीकारना होगा कि इसकी शुरुआत तभी हो गई थी जब अक्टूबर-नवंबर के दौरान बिहार में चुनाव करवाए जा रहे थे। उस वक्त तेजस्वी यादव की रैलियों में भीड़ दिख रही थी और ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ वालों ने भीड़, मास्क की अवहेलना, आपसी दूरी जैसे नियमों से आँखें मूँद ली थीं। इन चुनावों में चुनाव आयोग ने वर्चुअल रैलियों की बात भी की थी। उस समय इस पर फैसला लेने के लिए बैठक हुई थी

इस बैठक में कॉन्ग्रेस, राजद, सीपीआई (एमएल), आरएलएसपी, सीपीआई, सीपीआई (एम) के नेता मौजूद थे। उन्होंने इस कदम का पूरा विरोध किया था। उस वक्त तक कोरोना का कहर भी केंद्र सरकार के क़दमों से नियंत्रण में आने लगा था। ऊपर से तेजस्वी जीतते दिख रहे थे तो वर्चुअल रैलियों के बदले भीड़ लगाने की छूट मिली।

शायद लोगों को लगा था कि कोरोना का खतरा टल गया। बीमारियों से बचने के लिए खुद स्वच्छता रखनी होती है, परहेज कोई और नहीं कर देगा, ये बातें लोग भूल गए थे। फिर ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ जमातों के अपने निजी हित तो सधते ही थे! नतीजा ये हुआ कि एक के बाद एक चुनाव घोषित होते रहे और हम एक गोल चक्कर लगाने के बाद फिर से उसी जगह पर हैं, जहाँ से हम एक साल पहले चले थे। बल्कि पिछले वर्ष तक तो मौतों की खबर कहीं दूर-दराज से अख़बार-समाचार के जरिए आती थी। इस वर्ष तो वो रिश्तेदारों-दोस्तों के फ़ोन से आने लगी है। पिछले वर्ष से भी बुरी स्थिति से निपटने के लिए पहले से ज्यादा सख्त कदम तो उठाने ही होंगे।

महामारी या आपदा की स्थिति में सरकार या किसी और की सहायता कब आएगी, इसका बैठकर इंतजार तो नहीं किया जा सकता। हमारे हाथ में खुद के ऊपर प्रतिबन्ध लगाना तो है ही। अगर बहुत जरूरी ना हो तो घरों से ना निकलें। एक वर्ष में ज़ूम, गूगल मीट, जैसे दर्जनों ऐसे सॉफ्टवेयर हैं, जो मीटिंग को डिजिटल-वर्चुअल तरीके से निपटा सकते हैं।

उनका इस्तेमाल अधिकांश बड़ी निजी कंपनियाँ पहले से ही कर रही हैं। स्थानीय दुकानदारों को भी कोऑपरेटिव की तरह साथ मिलकर होम डिलीवरी जैसी व्यवस्थाएँ तैयार करनी होंगी। फिल्म थिएटर को खोला जाना एक मूर्खतापूर्ण फैसला था। ऐसी गैरजरूरी चीज़ों को फ़ौरन फिर से बंद किया ही जाना चाहिए।

विवाह जैसे आयोजनों में भीड़ की इजाजत ना होने के कारण शादियों और ऐसे दूसरे आयोजनों में दिखावे के लिए फिजूलखर्ची भी कम हो गई थी। थोड़ी ढील मिलते ही उसमें वही सब शुरू हो गया- ज्यादा से ज्यादा लोगों को बुलाना, सजावट से लेकर खाने की बर्बादी तक में फिजूलखर्ची।

जब कोरोना संक्रमण के फैलने के खतरों को देखते हुए कुंभ जैसे आयोजनों को साधु ही प्रतीकात्मक कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ केरल ने ‘थ्रिस्सुर पूरम’ मनाए जाने की इजाजत दे दी है। ये तब है जब केरल में टेस्ट के पॉजिटिव निकलने की दर 17% पर पहुँची हुई है। मगर फिर वहाँ तो एक सेक्युलर सरकार है, तो ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ का नियम वहाँ लागू नहीं होगा।

पूरे मामले को निष्पक्ष तरीके से देखा जाए तो बस एक बात नजर आती है। भारत में तंत्र कुछ इस तरह से चलता है, जिसमें अधिकार तो किन्हीं अधिकारियों के पास होते हैं, लेकिन जवाबदेही किसी के सर नहीं होती। हम सबने मिलकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ा है। उसका नतीजा है कि अब हमें दोबारा कोरोना लहर का सामना करना पड़ रहा है। पूरे मामले में अच्छी बात ये है कि हमारे पास एक बार इस चुनौती को पीछे धकेलने का अनुभव है। कोशिश कीजिए, हम इसे दोबारा हरा सकते हैं!

‘दवाओं से नहीं, पैग से असर होगा’: दिल्ली में लॉकडाउन के ऐलान पर शराब लेने पहुँची महिला की बात सुन पकड़ लेंगे माथा

दिल्ली में कोरोना संक्रमण पर काबू पाने के लिए केजरीवाल सरकार ने आज (अप्रैल 19, 2021) से 26 अप्रैल तक लॉकडाउन का ऐलान किया है। इस दौरान जरूरी सेवाओं को छोड़कर बाकी सब बंद रहेगा। दिल्ली सरकार ने शराब की दुकानों पर भी प्रतिबंध लगाया। लॉकडाउन के ऐलान के बाद दिल्ली में शराब की दुकानों पर लंबी-लंबी लाइनें लग गईं। क्या महिला, क्या पुरुष, क्या वृद्ध सभी इन लाइनों में लगे नजर आए। यहाँँ एक महिला ने तो ये तक दावा कर दिया कि जो इंजेक्शन नहीं कर सकता, वह अल्कोहल कर देगा।

शिवपुरी गीता कॉलोनी स्थित एक दुकान के बाहर शराब खरीदने के लिए खड़ी महिला ने कहा कि उसे कोविड-19 का इंजेक्शन फायदा नहीं करेगा, अल्कोहल फायदा करेगा। महिला ने कहा कि उसे दवाओं से असर नहीं होगा, पैग से असर होगा।

महिला ने बताया कि अगले 6 दिन लॉकडाउन हैं, इसलिए वो एक बोतल और दो पव्वे लेने के लिए आई है। महिला ने जब सवाल किया गया कि आखिर उसे ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी की वो कोरोना काल में भीड़ में दारू खरीदने के लिए आ गई, तो उसने कहा कि शराब में अल्कोहल होता है, उसे कोरोना का इंजेक्शन फायदा नहीं करेगा, अल्कोहल फायदा करेगा। महिला ने कहा कि जो भी लोग शराब पीएँगे, वो सभी सही रहेंगे।

महिला ने कहा कि लॉकडाउन से शराबियों को फर्क पड़ेगा, शराबियों को दवाइयों से कोई असर नहीं पड़ेगा, पैग से असर पड़ेगा। महिला ने आगे बताया कि उसे 35 साल हो गए पीते हुए, उसने कोई दूसरी डोज नहीं ली। उसने बताया कि हर रोज एक पैक लेती है, उसके बाद कुछ नहीं। महिला ने कहा कि दिल्ली में लॉकडाउन में शराब के ठेके खुलने चाहिएं। ठेके खुलने से वो डॉक्टरों के पास जाने से बच जाएँगे।

बता दें कि दिल्ली में अब तक कोरोना के 8,53,460 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 74,941 अब भी सक्रिय हैं। पिछले 1 दिन में यहाँ 25,462 नए कोरोना मरीज सामने आए हैं और 161 की मौत हुई है। पिछले एक सप्ताह में कोरोना 2.4% की रफ़्तार से प्रतिदिन बढ़ा है। राज्य में मृत्यु दर 1.4% है। राज्य में अब तक 1.6 करोड़ लोगों की टेस्टिंग हो चुकी है। पिछले 1 सप्ताह में हालात ज्यादा बदतर हुए हैं। बावजूद इसके आम लोगों में भी सतर्कता का अभाव दिख रहा है। इधर केजरीवाल ने जैसे ही कर्फ्यू का ऐलान किया वैसे ही दिल्ली के ठेकों पर लंबी-लंबी कतारें देखने को मिली।

मनमोहन सिंह का PM मोदी को पत्रः पुराने मुखौटे में कॉन्ग्रेस की कोरोना पॉलिटिक्स को छिपाने की सोनिया-राहुल की नई कवायद

डॉक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को कोरोना से लड़ने के लिए सुझाव दिए हैं। डॉक्टर सिंह के इन सुझावों में सबसे अधिक ज़ोर राज्यों को वैक्सीन की खरीद/निर्यात, उत्पादन और उनके इस्तेमाल पर नीति बनाने के लिए स्वतंत्रता की माँग को लेकर है। साथ ही उन्होंने यह माँग की है कि वैक्सीन की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से पेटेंट अधिनियम 1970 के तहत अनिवार्य लाइसेन्सिंग से सम्बंधित धाराओं का सहारा लेकर दवा बनाने वाली अन्य कंपनियों को वैक्सीन का उत्पादन करने का अधिकार दे।

इसके अलावा डॉक्टर सिंह ने प्रधानमंत्री से माँग की है कि राज्यों को और अधिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए ताकि वे अपनी ज़रूरतों के अनुसार अपने लिए नियम तय कर सकें। उनकी एक और माँग के अनुसार सरकार दवाओं और वैक्सीन के आँकड़ों को लेकर और पारदर्शिता बरते। यह पत्र कॉन्ग्रेस वर्किंग कमेटी की एक मीटिंग के बाद लिखा गया है।

पिछले लगभग एक महीने से राहुल गाँधी के साथ ही विपक्ष के नेताओं ने कई बार यह माँग रखी कि सरकार भारत में बनने वाली वैक्सीन के अलावा और भी वैक्सीन आयात करने की अनुमति दे। उनके सहायकों ने उनकी इस माँग का समर्थन करते हुए सोशल मीडिया पर बहस भी चलाई। हाल ही में सरकार ने कुछ और वैक्सीन के आयात की अनुमति दी जिसे बाद में राहुल गाँधी की जीत बताया गया। यह बात अलग है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन वैक्सीन के भारतीय निर्माताओं के साथ पहले भी बात कर चुके थे।

भारत में महामारी आए एक वर्ष से अधिक हो गए। सरकार ने विपक्ष के साथ मिलकर काम किया और हर निर्णय, आदेश, अनुमति और प्रोटकॉल तय करने में राज्यों से मिलने वाली जानकारियों को आधार बनाया। कई मौक़ों पर केंद्र ने राज्य सरकारों को कोरोना से लड़ने के लिए अपने नियम ख़ुद बनाने की स्वतंत्रता दी। ऐसे में डॉक्टर सिंह की माँग कि राज्यों को नियम बनाने की अनुमति दी जाए, एक राजनीतिक माँग लगती है।

जहाँ तक आँकड़ों में पारदर्शिता की बात है, सुझाव और नियम बनाने से लेकर राज्यों को दी जाने वाली वैक्सीन और उसके इस्तेमाल के आँकड़े पहले ही सार्वजनिक हैं और मीडिया, शोधकर्ता और तमाम संस्थान अपने विश्लेषण के लिए इन आँकड़ों का इस्तेमाल करते रहे हैं। वैक्सीन उत्पादन के लिए अनिवार्य लाइसेन्सिंग से सम्बंधित धाराओं का इस्तेमाल करने का सुझाव नया नहीं है। इससे पहले वामपंथी दल यह सुझाव दे चुके हैं। इस पर कहाँ तक काम हो सकेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्तमान परिस्थितियों में कोरोना के वैक्सीन से सम्बंधित पेटेंट के अंतर्राष्ट्रीय नियम क़ानूनी और व्यावहारिक तौर पर क्या कहते हैं।

डॉक्टर सिंह द्वारा लिखा गया यह पत्र कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग के बाद की औपचारिकता से अधिक कुछ नहीं लगता। यह बात अलग है कि जब कोरोना की दूसरी लहर शायद अपने चरम पर है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बड़ा दबाव है, ऐसे समय में यह पत्र जनता के बीच कई सवाल खड़े करता है।

पिछले एक वर्ष में जब देश के लगभग सभी राज्यों ने केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करते हुए पहली लहर पर लगभग हर तरह से क़ाबू पा लिया था, तब कुछ गिने-चुने राज्य, जिनमें कॉन्ग्रेस शासित राज्य भी शामिल हैं, केंद्र सरकार के साथ क्या पूरी तरह से समन्वय बना सके? महाराष्ट्र और केरल ऐसे राज्यों में से रहे हैं। पिछले एक महीने में महाराष्ट्र की तरफ़ वैक्सीन की सप्लाई को लेकर कई बार भ्रम की स्थिति पैदा की गई। वैक्सीन को लेकर विपक्षी दलों के नेताओं की ओर से जो बयान दिए गए, उन बयानों पर रोक लगाने को लेकर कोई बहस क्यों नहीं हुई? यह जानना दिलचस्प रहता कि डॉक्टर सिंह ने इन राज्यों की अकर्मण्यता पर उन्हें क्या सुझाव दिया होगा?

कोरोना की दूसरी लहर आने से पहले बिहार चुनावों के समय सारे दल मिलकर इस बात पर विचार क्यों नहीं कर सके कि संक्रमण के ख़तरे को देखते हुए चुनाव प्रचार के नए संभावित तरीक़ों पर सहमति बनाई जाए? यदि कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी तब एक पत्र लिखकर सरकार और विपक्ष के बीच एक समन्वय बनाने का प्रयास करती दिखाई देती तो अच्छा रहता।

कॉन्ग्रेस पार्टी जब भी केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री को पत्र लिखती है तो उस पर हस्ताक्षर करने के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह को आगे ले आती है। पार्टी को शायद लगता है कि किसी भी तरह के पत्र को विश्वसनीय बनाने के लिए एक ही रास्ता है और वह है पत्र पर डॉक्टर सिंह का हस्ताक्षर। दल को शायद यह लगता है कि सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी यदि सरकार को पत्र लिखेंगे तो उसे शायद गंभीरता से न लिया जाएगा।

वर्तमान परिस्थितियाँ किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं हैं। ऐसे में सरकार और विपक्ष जितना अधिक समन्वय बना सकें, देश के लिए अच्छा होगा। डॉक्टर सिंह के सुझावों का सरकार स्वागत करेगी पर विचार कितना करेगी वह जल्द ही दिखाई देगा। विपक्षी दलों की जो भूमिका पिछले एक वर्ष में दिखाई दी है, उसके बाद इस तरह के पत्रों को सरकार की तरफ़ से भले नहीं पर उसके समर्थकों की तरफ़ से शंका की दृष्टि से देखा जाएगा।

केरल में कुत्ते को स्कूटर से बाँधकर 200 मीटर तक घसीटता रहा जेवियर, वीडियो वायरल होने पर गिरफ्तार

केरल के मल्लापुरम से इंसानियत को शर्मसार करने वाली एक घटना सामने आई है। यहाँ पर व्यक्ति ने एक कुत्ते को स्कूटर में रस्सी से बाँध कर 200 मीटर तक सड़क पर घसीटा। मौके पर मौजूद कुछ लोगों ने इस पूरी घटना को अपने कैमरे में कैद कर लिया, जिसके बाद यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

बता दें कि कुत्ते के मालिक ने ही इस शर्मनाक हरकत अंजाम दिया है। वीडियो वायरल होने के बाद एडाकारा पुलिस ने इस मामले में जाँच शुरू कर दी और इस घटना को अंजाम देने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया है। व्यक्ति की पहचान 53 वर्षीय जेवियर के रूप में हुई है। शख्स एडकरा करुनेची का निवासी है।

जानकारी के मुताबिक 200 मीटर तक घसीटने के बाद भी उसकी क्रूरता नहीं रुकी तो उमेर वालप्पन नामक एक शख्स ने उसका स्कूटर रुकवाकर कुत्ते की जान बचाई। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ पशुओं के प्रति क्रूरता का निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। इस घटना का पता चलने के बाद बचाव दल कुत्ते को नीलांबूर ले गया है।

एडाकारा पुलिस स्टेशन के एक पुलिसकर्मी ने द न्यूज मिनट को बताया, “यह घटना पश्चिमी पेरुमकुलम में शनिवार (अप्रैल 17, 2021) शाम को हुई। कुत्ते को अस्पताल ले जाया गया और अभी सेफ कस्टडी में है। कुत्ता एक सप्ताह से अधिक समय तक जेवियर के घर पर था। जब पड़ोसियों ने शिकायत की कि कुत्ते ने चप्पल चुरा लिए और उनके मुर्गियों को मार दिया तब उसने कुत्ते को छोड़ने का फैसला किया।”

उमेर वालप्पन ने कहा, “मैं एडाकारा में अपने घर वापस जा रहा था जब मैंने इस क्रूरता को देखा। मैंने उसे एक बार रोकने की कोशिश की, लेकिन उसने गाड़ी चालाना जारी रखा। मैंने अपने स्कूटर पर उसका पीछा किया। आखिरकार, 200 मीटर की दूरी के बाद मैंने ओवरटेक करके उसे रोका। कुत्ता बेदम हो गया था, लेकिन वो उसे फिर भी खींच रहा था। मैं पूरा शूट नहीं कर सकता था, क्योंकि मैं भी गाड़ी चला रहा था।”

इस घटना का वीडियो देखने के बाद लोगों के अंदर गुस्सा है। लोग हर हाल में आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। बता दें कि यह पहला मौका नहीं है, जब किसी शख्स ने कुत्ते के साथ इतना क्रूर बर्ताव किया है। इसके पहले भी इस तरह की कई घटनाएँ देखने को मिली हैं।

‘छोटा सा लॉकडाउन, दिल्ली छोड़कर न जाएँ’: इधर केजरीवाल ने किया 26 अप्रैल तक कर्फ्यू का ऐलान, उधर ठेकों पर लगी कतार

दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार ने कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए अगले सोमवार (अप्रैल 26, 2021) तक देश की राजधानी में लॉकडाउन का ऐलान किया है। इससे पहले वीकेंड कर्फ्यू लगाया गया था। नए आदेश के मुताबिक आज (अप्रैल 19, 2021) रात से लेकर अगले सोमवार सुबह 5 बजे तक लॉकडाउन लगा रहेगा।

दिल्ली सरकार के अधिकारियों ने कहा है कि कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते रफ़्तार को रोकने के लिए ये निर्णय लिया गया है। इस फैसले से पहले दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कोविड-19 के प्रकोप की मौजूदा स्थिति पर चर्चा की। दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू से पहले रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक का नाइट कर्फ्यू लागू किया गया था।

इसी बीच अब दिल्ली से प्रवासी मजदूरों के पलायन का डर भी बढ़ गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि वे हाथ जोड़ कर प्रवासी मजदूरों से विनती करते हैं कि ये एक छोटा सा लॉकडाउन है जो मात्र 6 दिन ही चलेगा, इसलिए वे दिल्ली को छोड़ कर कहीं और न जाएँ। AAP सुप्रीमो ने आशा जताई कि इस लॉकडाउन को आगे नहीं बढ़ाना पड़ेगा। उन्होंने आश्वासन दिया कि सरकार प्रवासियों का ख्याल रखेगी।

हालाँकि, कर्फ्यू के दौरान स्वास्थ्यकर्मी ड्यूटी पर आ-जा सकेंगे। साथ ही गर्भवती महिलाओं और अन्य मरीजों को अपने किसी एक परिजन के साथ अस्पताल जाने से नहीं रोका जाएगा। टीकाकरण या कोरोना टेस्टिंग के लिए भी लोग बाहर निकल सकेंगे। सीएम ने दिल्ली वालों से अपील की है कि वो लॉकडाउन का पालन करें, इस बार स्वास्थ्य व्यवस्था सुधार ली जाएगी। उन्होंने केंद्र सरकार का सहायता के लिए धन्यवाद दिया।

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि प्रदेश में हॉस्पिटल बेड्स की संख्या बढ़ाई जाएगी और लॉकडाउन की अवधि में अधिक से अधिक ऑक्सीजन सिलिंडर और दवाओं का इंतजाम किया जाएगा। मेडिकल और फ़ूड सहित अन्य ज़रूरी सुविधाएँ मिलती रहेंगी। शादी समारोह 50 व्यक्ति के साथ आयोजित किए जा सकेंगे, जिसके लिए अलग से पास बनवाना होगा। सीएम ने कहा कि दिल्ली में ये कोरोना की चौथी लहर है।

दिल्ली में अब तक कोरोना के 8,53,460 मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें से 74,941 अब भी सक्रिय हैं। पिछले 1 दिन में यहाँ 25,462 नए कोरोना मरीज सामने आए हैं और 161 की मौत हुई है। पिछले एक सप्ताह में कोरोना 2.4% की रफ़्तार से प्रतिदिन बढ़ा है। राज्य में मृत्यु दर 1.4% है। राज्य में अब तक 1.6 करोड़ लोगों की टेस्टिंग हो चुकी है। पिछले 1 सप्ताह में हालात ज्यादा बदतर हुए हैं। बावजूद इसके आम लोगों में भी सतर्कता का अभाव दिख रहा है। इधर केजरीवाल ने जैसे ही कर्फ्यू का ऐलान किया वैसे ही दिल्ली के ठेकों पर लंबी लंबी कतारें देखने को मिली।

‘तमीज से बात करो, जल्दी पता चल जाएगा मैं कौन हूँ’: MP के अस्पताल में अब कॉन्ग्रेस की नूरी खान ने डॉक्टर को हड़काया

‘तमीज से बात करो, जल्द ही पता लग जाएगा मैं कौन हूँ।’ ये शब्द मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस की प्रवक्ता नूरी खान के हैं। कुछ दिनों पहले भोपाल के जेपी अस्पताल से कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मंत्री पीसी शर्मा द्वारा की गई अभद्रता का एक वीडियो सामने आया था। अब एक वीडियो उज्जैन के माधव नगर अस्पताल से सामने आया है, जिसमें कॉन्ग्रेस नेता नूरी खान डॉक्टर से अभद्रता करते नजर आईं हैं।

कॉन्ग्रेस नेता कथित तौर पर अस्पताल में व्यवस्था देखने पहुँची थीं। इस दौरान अस्पताल के ही डॉक्टर से किसी बात पर उनकी बहस शुरू हो गई। डॉक्टर ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं, कोविड गाइडलाइन का ध्यान रखिए। इस पर कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, “मैं कौन हूँ, आपको जल्द ही पता लग जाएगा।”

क्या है पूरा मामला

उज्जैन के 130 कोविड मरीजों की क्षमता वाले माधव नगर अस्पताल में इस वक्त 150 से भी ज्यादा मरीज हैं। दूसरे अस्पतालों में जगह के अभाव के चलते मरीजों को यहाँ रखा गया। किसी जगह एक बेड पर दो मरीजों को रखना पड़ा, तो कहीं फर्श पर जगह कर मरीजों के इलाज की व्यवस्था की गईं। कई मरीजों को साँस लेने में दिक्कत भी हो रही थीं, डॉक्टरों ने OPD खाली कर ऐसे मरीजों को वार्ड में भर्ती करा दिया।

नूरी खान माधव नगर अस्पताल में व्यवस्था देखने पहुँचीं। उनके साथ मोबाइल कैमरा ऑन किए हुए करीब 10 और लोग वार्ड में घुस गए। वार्ड में भीड़ देख डॉक्टर भोजराज शर्मा व अन्य स्वास्थ्यकर्मी वहाँ इकट्ठा हो गए। मरीजों को फर्श पर देख नेता डॉक्टरों से कहने लगीं ये व्यवस्थाएँ हैं आपके अस्पताल की, इस तरह दो गज दूरी का पालन हो रहा है। जिस पर डॉक्टर ने कहा आप कौन हैं, कृपया कोविड गाइडलाइंस का पालन कीजिए।

डॉक्टर की बात सुन नूरी खान ने कहा, “आप तमीज से बात कीजिए, आपको जल्द ही पता लग जाएगा कि मैं कौन हूँ।” उन्होंने पूछा कि ये मरीजों को रखने का कोई तरीका है, यहाँ बिना दूरी के कोरोना मरीजों का इलाज कैसे हो रहा है। डॉक्टर ने कहा कि ये कोई तरीका नहीं हुआ बात करने का। कुछ देर दोनों में बहस जारी रहने के बाद कॉन्ग्रेस नेता मोबाइल कैमरों के सामने अपना पक्ष रख कर चली गईं।

मोदी सरकार ने चुपके से हटा दी कोरोना वॉरियर्स को मिलने वाली ₹50 लाख की बीमा: लिबरल मीडिया के दावों में कितना दम

सोशल मीडिया में मीडिया रिपोर्टों के हवाले से अफवाह फैलाई जा रही है कि कोरोना की दूसरी लहर के बीच केंद्र सरकार ने चुपचाप स्वास्थ्यकर्मियों को मिलने वाले बीमा वापस ले ली है। ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ ने ये प्रोपेगेंडा फैलाया, जिसे ‘द हिन्दू’ की निस्तुला हेब्बर ने आगे बढ़ाया। इस खबर में दावा किया गया है कि कोरोना की ड्यूटी के दौरान मरने वाले स्वास्थ्यकर्मियों के लिए 50 लाख की बीमा योजना केंद्र सरकार ने वापस ले ली है। ‘द न्यूज मिनट’ ने भी इस खबर को आगे बढ़ाया।

जबकि सच्चाई कुछ और है। असल में केंद्र सरकार ने मार्च 2020 में ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज’ का ऐलान किया था, जिसकी अवधि अप्रैल 24, 2021 तक 3 बार बढ़ाई गई। इसके जरिए स्वास्थ्यकर्मियों को एक सुरक्षा कवच प्रदान किया गया गया, अगर कोरोना की ड्यूटी के दौरान उनके साथ कुछ गड़बड़ होती है तो सरकार ने उनके परिवार के लिए ये व्यवस्था की थी। PMKGP के तहत ही 50 लाख का बीमा कवर का प्रावधान था।

जिन्होंने भी अब तक कोरोना की ड्यूटी के दौरान अपनी जान गँवाई थी, उनके परिजनों को ये रकम बीमा मुआवजा के रूप में प्रदान की गई। इंश्योरेंस कंपनी ने अब तक इसके तहत 287 क्लेम का भुगतान किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि इस योजना ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में लगे स्वास्थ्यकर्मियों के मनोबल को मजबूत करने में मनोवैज्ञानिक रूप से एक बड़ी भूमिका निभाई है। अप्रैल 24 तक इसके सभी क्लेम सेटल कर लिए जाएँगे।

इसके बाद मंत्रालय ने जो कहा, उसे ही मीडिया संस्थानों ने गलत तरीके से पेश किया। असल में अप्रैल 24, 2021 के बाद कोरोना वॉरियर्स के लिए एक नई व्यवस्था आने वाली है, जिसके तहत उन्हें सहायता मिलेगी। इसके लिए मंत्रालय ‘न्यू इंडिया इंश्योरेंस’ नामक एक कंपनी के साथ बातचीत भी कर रही है। अब नई और बेहतर व्यवस्था आएगी तो स्पष्ट है कि पुरानी वाली हटेगी, जिसे लेकर मीडिया अफवाह फैला रहा है।

पिछले साल केंद्र सरकार ने इस योजना की घोषणा करते हुए कहा था कि इससे 22 लाख स्वास्थ्यकर्मियों को फायदा मिलेगा। इसमें सफाई कर्मचारी, वार्ड बॉयज, आशा कर्मचारी, नर्स, पैरामेडिक्स, स्वास्थ्य के कार्य में लगे टेक्निशियंस, डॉक्टर्स और स्पेशलिस्ट सहित सभी स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों को कवर किया गया था। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है कि कोरोना से अब तक 739 MBBS डॉक्टरों की जान गई है।