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बाबा बैद्यनाथ मंदिर में ‘गौमांस’ वाले कॉन्ग्रेसी MLA इरफान अंसारी ने की पूजा, BJP सांसद ने उठाई गिरफ्तारी की माँग

झारखंड के मधुपुर में विधानसभा उपचुनावों के मद्देनजर कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी के खुद को शिवभक्त बताकर बाबाधाम में पूजा अर्चना करने से बवाल हो गया है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इस घटना के बाद अंसारी की गिरफ्तारी की माँग उठाई है। दुबे का कहना है कि जैसे गैर मुस्लिम मक्का में नहीं जाते, वैसे बाबा बैद्यनाथ के मंदिर में गैर हिंदू प्रवेश नहीं कर सकता।

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस नेता इरफान अंसारी बुधवार (अप्रैल 14, 2021) को देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर पहुँचे थे। यहाँ मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि जब भी उनका मन विचलित होता है तो वह बाबाधाम आते हैं और चुपके से शीश नवाकर पूजा अर्चना करते हैं।

अंसारी की इसी हरकत से गोड्डा सांसद व भाजपा नेता निशिकांत दुबे ने अपना गुस्सा व्यक्त किया। उन्होंने जामताड़ा विधायक इरफान अंसारी पर धार्मिक भावना के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। वह बोले कि जिस तरह काबा में गैर मुस्लिम नहीं जा सकते, उसी तरह द्वादश ज्योतिर्लिंग बाबा बैद्यनाथ मंदिर में गैर हिंदू का प्रवेश नहीं हो सकता है। इरफान अंसारी ने वहाँ जाकर हिंदुओं की धार्मिक भावना से खिलवाड़ किया है।

सांसद निशिकांत दुबे ने झारखंड सरकार से अंसारी पर रासुका लगाने और देशद्रोह का मुकदमा दर्ज करने की अपील की। उनका कहना है कि इरफान का पागलपना बढ़ गया है। वह कभी गौमाता पर बोलते हैं, कभी गंगा मैया पर, लेकिन इस बार जो किया, वह किसी भी चीज की हद है।

अपने ट्वीट में भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लिखा, “आज ग्लानि हुई कि मेरे सांसद रहते, बाबा बैद्यनाथ मंदिर के गर्भगृह में कॉन्ग्रेस विधायक इरफ़ान अंसारी ने पूजा के बहाने ज्योतिर्लिंग को स्पर्श कर अपवित्र करने का प्रयास किया,आस्था के अनुसार मक्का में गैर मुस्लिम का प्रवेश वर्जित है, गर्भगृह में गौमांस भक्षण करने वालों का प्रवेश?”

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, निशिकांत दुबे ने इस बाबत अपने आवास पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। यहाँ उन्होंने डीसी-एसपी को बर्खास्त करने की माँग उठाई। डीसी मंदिर प्रबंधन के सचिव हैं। दुबे ने घटना को शर्मसार करार देते हुए कहा कि ऐसा कभी नहीं हुआ था। एक बार फारूक अब्दुल्लाह भी मंदिर आए थे, लेकिन उन्हें भी प्रांगण तक ले जाया गया, गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं दी गई।

सांसद निशिकांत दुबे के अनुसार, इरफान का यह प्रयास मधुपुर चुनाव में हिंदू-मुस्लिम भावना भड़काने के लिए हुआ है। इस संबंध में वह मुख्य सचिव से बात कर चुके हैं। अब भाजपा चुनाव आयोग और मुख्य सचिव से मिल कर कार्रवाई की माँग करेगी।

बता दें कि कॉन्ग्रेस नेता इरफान अंसारी झारखंड के जामताड़ा विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं। इससे पहले वह गोड्डा लोकसभा क्षेत्र का भी प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। बुधवार को बाबाधाम पहुँचकर पूजा अर्चना करने के बाद उन्होंने जब खुद को शिवभक्त बताया तो भाजपा ने इसका खुलकर विरोध किया और बिना देर किए राँची स्थित मुख्य निर्वाचन कार्यालय में इसकी शिकायत करवाई।

भाजपा की ओर से कहा गया कि बैद्यनाथ धाम मंदिर में हिन्दू धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म के व्यक्ति के जाने और पूजा-अर्चना करने पर पूरी तरह से मनाही है। ऐसे में इरफान अंसारी बाहरी होकर मंदिर गए और वहाँ उन्होंने पंडा समाज और ब्राह्मणों को नीचा दिखाया।

पार्टी की ओर से यह भी बताया गया कि कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी ने देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम मंदिर के गर्भ गृह में न केवल पूजा अर्चना की, बल्कि अमर्यादित, धार्मिक उन्माद फैलाने जैसा शब्दों का प्रयोग भी किया। पार्टी ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि आखिर देवघर उपायुक्त और पुलिश अधीक्षक ने उन्हें ये अनुमति दी कैसे? पार्टी का कहना है कि देवघर के उपायुक्त लगातार ऐसे काम कर रहे हैं, जिससे जेएमएम प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बने।

‘मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन को रोका’ – कॉन्ग्रेस के साथी मौलाना सिद्दीकी का ममता पर आरोप

पश्चिम बंगाल के फुरफुरा शरीफ दरगाह के पीर मौलाना अब्बास सिद्दीकी राजनीतिक रूप से काफी महत्वाकांक्षी हैं। बंगाल में इनके बड़े फॉलोवर्स हैं। मौलाना अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए कॉन्ग्रेस और वामपंथियों के साथ मिलकर 30 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

द हिंदू को दिए इंटरव्यू में मौलाना सिद्दीकी ने कहा, “मैं केवल मुसलमानों को नहीं, बल्कि सभी गरीबों और वर्तमान राजनीतिक ढाँचे से खुद को ठगा महसूस कर रहे लोगों को संबोधित कर रहा हूँ। मैं उन सभी के साथ गठबंधन के लिए तैयार था, जो मेरी शर्तों को मानने के साथ मुझे सीटें देता, लेकिन ममता बनर्जी तैयार नहीं हुईं, जबकि कॉन्फ्रेंस और लेफ्ट फ्रंट ने मेरी शर्तों को माना।”

बता दें कि मौलाना सिद्दीकी का पश्चिम बंगाल में बड़ा जनाधार है। राज्य के कम से कम पाँच जिलों, उत्तर और दक्षिण परगना, हावड़ा, हुगली, नादिया और पूर्वी मिदनापुर के कुछ हिस्सों तक में उसके फॉलोवर्स की भारी तादात है।

सिद्दीकी ने भाजपा के लिए रास्ता आसान करने के सवाल पर जोर देकर कहा कि वह नबाना या राज्य सचिवालय में बीजेपी की पहुँच को आसान नहीं होने देंगे। बंगाल का चुनाव अब तक के सर्वाधिक ध्रुवीकरण के दौर में है। अब्बास सिद्दीकी कहते हैं, “अगर कोई मुझे जाहिल और असभ्य कहता है तो मैं उससे पूछता हूँ कि जब 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा जीती थी तो उस वक्त तो मैं था ही नहीं।” अब्बास सिद्दीकी ने ममता बनर्जी पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा:

“ममता बनर्जी के कार्यों के कारण भाईचारे का अंत हो रहा है। प्रशासन ने मुहर्रम के कारण दुर्गा विसर्जन को रोक दिया था। इसकी माँग किसने की? कहा गया था कि इमामों को 2,500 रुपए मिलेंगे, लेकिन इस बात का खुलासा नहीं किया गया कि वो पैसा वक्फ बोर्ड से आया था। जब ममता का जनाधार खिसकने लगा तो उन्होंने मंदिरों के पुजारियों को भी पैसे देने की बात कही। हम केवल वही चाहते हैं, जो संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार हैं। इस तरह की राजनीति के कारण सबसे बड़ा नुकसान यह हुआ है कि समुदायों के बीच भाईचारा प्रभावित हुआ है। बंगाल में भाजपा के आगमन के लिए खुद ममता बनर्जी ही जिम्मेदार हैं। वह वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थीं और मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा केवल मजबूत हुई है।”

50 करोड़ हिंदुओं के मरने की दुआ

पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान भाईचारे का राग अलाप रहे मौलाना फुरफुरा शरीफ के वही पीरजादा हैं, जिन्होंने अप्रैल 2020 में वायरस से 50 करोड़ हिंदुओं के मरने की दुआ माँगी थी। उन्होंने वायरल वीडियो में कहा था, “बहुत जल्द मेरे पास खबर आई है कि पिछले दो दिनों से मस्जिदों में आग लगाई जा रही है, माइक जलाए जा रहे हैं। मुझे लगता है कि एक महीने के अंदर ही कुछ होने वाला है। अल्लाह हमारी दुआ कबूल करे। अल्लाह हमारे भारतवर्ष में एक ऐसा भयानक वायरस दे कि भारत में दस-बीस या पचास करोड़ लोग मर जाएँ। क्या कुछ गलत बोल रहा मैं? बिलकुल आनंद आ गया इस बात में।” इसके बाद वहाँ मौजूद भीड़ ने भी मौलवी की कही बात पर खूब शोर के साथ अपनी सहमति दर्ज कराई थी।

पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव का ऐलान होने से कुछ ही घंटों पहले ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार ने फुरफुरा शरीफ के विकास के लिए 1 मार्च 2021 को 2.60 करोड़ रुपए आवंटित किया था। गौरतलब है कि बंगाल में ममता मुस्लिम वोटों के सहारे ही सत्ता पर काबिज होती आई हैं।

खुद को ओवैसी का बड़ा फैन बताने वाले मौलाना सिद्दीकी चुनाव के समय गरीबों और दलितों की बात कर रहे हैं, लेकिन बीते साल 28 नवंबर 2020 में उन्होंने कहा था, “हम मुस्लिम यहाँ पर बहुसंख्यक हैं। आदिवासी, मथुआ और दलित हिन्दू नहीं हैं, इसीलिए यहाँ हम मेजॉरिटी में हैं।”

‘जब गैर मजहबी मरते हैं तो खुशी…’ – नाइजीरिया का मंत्री, जिसके अलकायदा-तालिबान समर्थन को लेकर विदेशी मीडिया में बवाल

नाइजीरिया के संचार मंत्री इसा अलियू पंतामी (Isa Aliyu Pantami) को लेकर कुछ दिन पहले विदेशी समाचार में खबर चली कि पंतामी के संबंध बोको हरम नाम के आतंकी संगठन से हैं और अमेरिका की खूफिया एजेंसी ने उन्हें अपनी वॉचलिस्ट में रखा हुआ है। 

अब यूएस खूफिया एजेंसी की वॉचलिस्ट सार्वजनिक नहीं है, इसलिए उस रिपोर्ट के दावों को खारिज कर दिया गया। साथ ही कई अन्य वेबसाइट्स ने फैक्ट चेक करके बिंदुवार तरीके से बताया कि कैसे रिपोर्ट में लिखी बातें गलत हैं जबकि पंतामी का असलियत में बोको हरम से कोई लेना-देना नहीं है। 

इसी बीच इसा को लेकर एक बहस और उठी। इसमें दावा किया गया कि इसा पंतामी भले ही बोको हरम से कोई संबंध न रखता हो, मगर वह अलकायदा और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों का खुलकर समर्थन करता है।

इस नई बहस का आधार इसा पंतामी के कुछ पुराने बयान हैं। इसमें वह जिहाद को लेकर कह रहा है, “यह जिहाद हर एक आस्तिक के लिए एक दायित्व है, विशेष रूप से नाइजीरिया में।” आगे वह दुआ करते हुए कहता है, “या अल्लाह, तालिबान और अलकायदा को जीत दिलाओ।”

जाहिर है कि कोई भी शख्स इस प्रकार जिहाद का महिमामंडन और आतंकी समूहों की जीत की प्रार्थना बिना इस्लामी कट्टरपंथी हुए नहीं करेगा। शायद यही वजह है कि जब बोको हरम पर सफाई देते हुए नाइजीरिया के मंत्री ने दावा किया कि वह आतंकियों के ख़िलाफ पिछले 15 साल से बोल रहे हैं, उस समय लोगों को उनकी पुरानी बातें याद आ गईं।

पीपुल गैजेट की रिपोर्ट में एक 2019 में प्रकाशित एक अकादमिक दस्तावेज ‘डिबेटिंग बोको हरम’ का जिक्र है। इसी का हवाला देकर रिपोर्ट में बताया गया कि एक बार पंतामी ने शांति और समझ के नाम पर अहलुस सुन्ना समुदाय के राजनेताओं और धार्मिक नेताओं को बुलाया, लेकिन बातें जिहाद की हुई और अंत में ये दुआ की गई कि अल्लाह तालीबान और अलकायदा को जीत दिलाए।

बता दें कि केवल एक बार ही ऐसा नहीं हुआ, जब इसा ने इस प्रकार खुल कर अलकायदा के लिए बोला, बल्कि साल 2006 में अलकायदा नेता के मरने पर पंतामी ने खेद व्यक्त किया था। इसके अलावा एक समय वह भी था, जब ओसामा बिन लादेन पर विचार पूछे जाने पर पंतामी ने स्वीकारा था कि जब गैर मजहबी मरते हैं तो उन्हें इसकी खुशी होती है… लेकिन शरीया बिना कारण उन्हें मारने की इजाजत नहीं देता। उन्होंने कहा था, “हमारा उत्साह हमारे पाक मजहब पर हावी नहीं होना चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि बोको हरम से संबंधों पर न्यूज छापे जाने से इसा नाराज थे। उन्होंने कहा था कि कई प्रकाशकों को वह उन्हें अपमानित करने के लिए कोर्ट में ले जाएँगे। हालाँकि, मालूम हो कि कई रिपोर्टस के अनुसार, 48 साल के इस नाइजीरिया मंत्री को लेकर कहा जाता है कि नाइजीरिया की राजनीति में कदम रखने से पहले इसा कई संस्थानों में जाकर नफरत भरी स्पीच देता था। मगर, साल 2019 में इसे संचार मंत्री बनाया गया, जिसके बाद इस पर आरोप लगे कि वह अपने पद का इस्तेमाल कट्टरपंथ फैलाने के लिए करता रहा है।

मजनू का टीला: पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थियों की इस तरह से मदद कर रहा ‘सेवा भारती’, केजरीवाल सरकार ने छोड़ा बेसहारा

कोरोना से हर किसी का हाल बेहाल है। ऐसे में ऑपइंडिया की टीम निकली मजनू का टीला स्थित पाकिस्तान से आए उन हिन्दू शरणार्थियों का हाल-चाल लेने कि किस तरह से उन्होंने पूरा लॉकडाउन काटा, कौन सी मुसीबतें झेलीं? अभी के क्या हालात हैं और वहाँ ज़िन्दगी कितनी पटरी पर आई है? क्या किसी ने उनकी इस संकट के समय सुध ली, मदद की या नहीं? कैसे वह इस महामारी के समय खासतौर से दिल्ली में कोरोना की विकट परिस्थितियों के समय अपना जीवन चला रहे हैं?

हमें इसकी आवश्यकता इसलिए भी पड़ी कि हालिया कुछ रिपोर्टों और वीडियो में यह बात सामने आई थी कि कुछ NGO के लोग वहाँ सिर्फ बिस्कुट या किलो दो किलो चावल लेकर जाते हैं। मदद के नाम पर फोटो और तस्वीरें खिंचाते हैं फिर पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों के नाम पर अपनी दुकान चलाने के बावजूद भी उनकी जमीनी स्तर पर कोई मदद नहीं करते हैं। सोचने का विषय यह भी है कि ऐसे लोग कहाँ से इतनी कठोरता लेकर आते हैं कि जो खुद असहाय है उसको भी अपने मतलब के लिए इस तरह से इस्तेमाल करते हैं।

मजनू का टीला : पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी कैंप में उम्मीदें तलाशती ज़िन्दगी

ऐसा नहीं है कि इस तरह की हरकतों का उन शरणार्थियों को कुछ पता न हो वो जानते हैं। लेकिन बहुत हद तक खुद की मेहनत पर भरोसा रखने वाले उन पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों ने ऑपइंडिया को बताया कि कौन लोग हैं जो वास्तव में न सिर्फ इस कोरोना काल बल्कि जब से वह यहाँ बसे हैं तब से उनकी भरपूर मदद कर रहे हैं।

ऑपइंडिया ने लगभग 150 परिवार के करीब 650 पाकिस्तानी हिन्दुओं वाले इस शरणार्थी शिविर का जायजा लिया कि किस तरह से वहाँ लोग अभी रह रहे हैं। ज़्यादातर लोग अपनी झुग्गियों में थे तो कुछ यहाँ वहाँ भटकते और खाते हुए भी मिले। वहाँ के हालात उनकी बेबसी की कहानी खुद ही बयान कर रहे थे।

इस बाबत ऑपइंडिया ने यहाँ के प्रधान धर्मवीर सोलंकी से बात की। वो पाकिस्तान से भारत तीर्थ यात्रा के बहाने अपने बाकी कुटुंब के साथ 2013 में आए थे। उन्होंने हमसे बात करते हुए बताया कि कोरोना के दौर में बड़ी मुश्किल से सभी का समय बीता। हालाँकि, शुरू से ही आरएसएस और सेवा भारती के लोग हमारी मदद करते रहे हैं तो कोरोना और लॉकडाउन के दौरान भी आरएसएस और सेवा भारती ने उनकी मदद की।

उन्होंने हमें बताया कि पाकिस्तान से आने के कुछ समय बाद जब सरकार से कागज मिला तब से दूसरे के यहाँ मजदूरी करके इस आस में किसी तरह जीने का संघर्ष करने लगे कि एक दिन वो भारत के हैं और भारत के ही हो जाएँगे। CAA कानून बन जाने के बाद उनकी उम्मीद जगी थी लेकिन अभी उनकी नागरिकता पर मुहर लगना बाकी है। जिसकी ख़ुशी और दर्द दोनों उन्होंने ऑपइंडिया से साझा किया। धर्मवीर जी ने कहा कि अब तो और भी विकट परिस्थिति है, क्योंकि लोग कोरोना के डर की वजह से काम भी नहीं दे रहे हैं। इसकी वजह से वहाँ रह रहे लोगों की स्थिति और भी ख़राब होती जा रही है।

उन्होंने आरएसएस और सेवा भारती से जुड़ें कुछ नाम भी गिनाए जो न सिर्फ उनकी बल्कि गोशाला के जानवरों की भी मदद कर रहे हैं। दिल्ली में जबकि बीजेपी की सरकार नहीं है फिर भी आरएसएस के लोग सेवा भावना से भरकर लगातार उनकी मदद को तैयार हैं। वहीं जब हमने धर्मवीर जी से दिल्ली सरकार से मिलने वाली मदद के बारे में सवाल किया तो उनका साफ़ कहना था कि केजरीवाल सरकार से जुड़ा कोई व्यक्ति जब इतने सालों में मदद को नहीं आया तो कोरोना में क्या कहें? उन्होंने कहा कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार उनकी नहीं सुन रही। उन्होंने यह बी बताया कि केजरीवाल के लोग यहाँ 5-6 साल पहले आए थे। इसके बाद नहीं आए। उस समय उन्होंने बिजली लगाने का वादा किया था, लेकिन कुछ भी नहीं किया। जैसे-तैसे सोलर लैंप और और जुगाड़ से वो लोग बिजली का काम चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को दिल्ली सरकार की तरफ से राशन भी नहीं मिला।

मजनू का टीला : पाकिस्तान से आए सोना दास ने सुनाई बस्ती की व्यथा, किसी तरह घर सँभालने की जद्दोजहद करतीं शरणार्थी महिला

यह पूछे जाने पर कि आरएसएस और सेवा भारती के लोग उनकी और किस तरह से सेवा करते हैं तो उन्होंने बताया कि जैसे ही उन्हें पता चलता है कि कोई बीमार है, उनकी गाड़ी आती है और मरीज को डॉक्टर के पास ले जाकर दवाइयाँ दिलवा देते हैं। इस तरह से भी सेवा भारती ने काफी मदद किया। उन लोगों ने गायों के लिए कम से कम 50,000 रुपए का चारा दिया। सेवा भारती के लोगों ने मास्क, दवाई और राशन को लेकर भी काफी मदद की।

पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी बस्ती के हालात जानने के लिए हमने सोना दास से भी बात की। उन्होंने बताया कि विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस के लोग यहाँ पर उनकी मदद के लिए आते हैं, मगर वो अपनी आजीविका चलाने के लिए मेहनत भी कर रहे हैं। वो लोग जब भी काम मिलता है मजदूरी, रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगाकर अपनी आजीविका चला रहे हैं। लेकिन कोरोना के समय उन्हें बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि सरकार को इनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।

मजनू का टीला स्थित पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी शिविर में हमारी पड़ताल में हमें एक बार फिर से निस्वार्थ भाव से सेवा कार्यों में लगे आरएसएस और उसकी सेवा विंग सेवा भारती के स्वयं सेवक ही मिले। जिस समय हम वहाँ रिपोर्टिंग करने गए थे तो गौशाला के लिए चारा लेकर भी आरएसएस का एक स्वयं सेवक वहाँ आया था। जब हमने उनसे कैमरे पर कुछ बोलने के लिए कहा तो उनका कहना था हमारा काम सेवा करना है। बयान के लिए आप इस क्षेत्र के सेवा भारती इंचार्ज से बात कीजिए।

मजनू का टीला: ग्राहकों के इंतजार में कैंप के बाहर हिन्दू शरणार्थियों की कुछ दुकानें

जैसा कि ऑपइंडिया ने पहले भी रिपोर्ट किया है और यहाँ भी वही बात सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काफ़ी समय से जरूरतमंदों के लिए बेहतरीन काम कर रहा है और लगातार जनसेवा में लगा हुआ है। न सिर्फ मजनू का टीला बल्कि संघ के संगठन ‘सेवा भारती’ ने पूरी दिल्ली में ग़रीबों को खाना खिलाने से लेकर बेसहारा लोगों को ज़रूरी संसाधन मुहैया कराने के लिए दिन-रात एक किया हुआ है। इसी कड़ी में सेवा भारती ने मजनूँ का टीला स्थित पाकिस्तानी हिन्दू रिफ्यूजी कैंप में रह रहे हिन्दू शरणार्थियों का भी भरपूर सहयोग किया।

मजनू का टीला: भगवान भरोसे हर रोज नए सपने देखते हैं पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थी

बता दें कि पिछले साल भी कोरोना काल में सेवा भारती ने जरूरतमंदों की बढ़-चढ़ कर मदद की थी। पश्चिम दिल्ली के हस्तसाल नगर में जोमी चर्च (Zomi Church) से जुड़े 50 परिवारों के लगभग ढाई सौ सदस्य राशन और खाद्य सामग्री से परेशान थे। इस चर्च में ज्यादातर नार्थ-ईस्ट के लोग थे, खासकर मिजोरम के निवासी थे। जानकारी मिलने पर सेवा भारती संगठन के कार्यकर्ता इस चर्च के जरूरतमंद लोगों के पास पहुँचे और उन्होंने राशन तथा अन्य चीजें उपलब्ध करवाईं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े इस संगठन ने कोरोना वॉरियर्स के लिए सहयोग राशि देने का भी ऐलान किया था। संगठन ने कहा था कि सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी और पत्रकार ऐसी विपरीत परिस्थितियों में अपना दायित्व निभा रहे हैं और समाज की मदद करने के लिए अपनी जान खतरे में डाल रहे हैं। ऐसे में संगठन ने फैसला लिया कि अगर गैर सरकारी सफाईकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी (अनुबंधित) या कोई पत्रकार कोविड-19 से प्रभावित हैं तो उनकी भी मदद की जाएगी।

रेलवे स्टेशनों से लेकर बस स्टेशनों तक फँसे लोगों की मदद की गई। सबसे बड़ी बात कि दिल्ली के रेडलाइट एरिया में रहने वाली 986 महिलाओं तक लगातार राशन-सामग्री पहुँचाई गई। इसके अलावा घुमंतू लोगों का भी ध्यान रखा गया, जिनके पास सरकार भी नहीं पहुँच पाती है।

मथुरा की अदालत में फिर उठी मस्जिद की सीढ़ियों से भगवान श्रीकृष्ण की मूर्तियाँ निकलवाने की माँग: 10 मई को अगली सुनवाई

मथुरा की अदालत में एक बार फिर से सन् 1670 में ध्वस्त किए गए श्रीकृष्ण मंदिर की मूर्तियों को आगरा फोर्ट की मस्जिद से निकलवाने की माँग की गई है। यह माँग श्रीकृष्ण विराजमान के माध्यम से श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन को लेकर किए गए दावे के वादी शैलेंद्र सिंह व अन्य ने की है।

सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में दिए गए प्रार्थना पत्र में कहा गया है कि इतिहासकारों का मानना है कि केशव राय निवासी लला कटरा मथुरा द्वारा 33 लाख रुपए की लागत से बनवाए गए भव्य मंदिर को औरंगजेब ने जनवरी 1670 में ध्वस्त करा दिया था और मंदिर की प्रतिमाओं को मंदिर से निकाल कर छोटी मस्जिद दीवाने खास जामा मस्जिद आगरा फोर्ट में दफना दी थीं। जिससे उस पर पैर रखकर मुसलमान चढ़कर जाएँ और दुआ माँग सकें।

आवेदकों के अनुसार, कई इतिहासकारों का कहना है कि जेल (जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था) की जगह पर ईदगाह मौजूद है। आवेदन में पिछले सप्ताह वाराणसी की एक अदालत द्वारा पारित आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें ज्ञानवापी मस्जिद के एएसआई सर्वेक्षण को यह पता लगाने की अनुमति दी गई थी कि क्या यह मस्जिद ध्वस्त काशी विश्वनाथ मंदिर के ऊपर बनाया गया था।

वादी शैलेंद्र सिंह ने बताया कि उन्होंने अदालत से माँग की है कि डायरेक्टर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को वैज्ञानिक अन्वेषण करके प्रतिमाओं का उत्खनन कर उन्हें पुन: स्थापित करने का आदेश दिया जाए। अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 10 मई की तारीख तय की है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों श्रीकृष्ण जन्मस्थान वाद में अधिवक्ता महेंद्र प्रताप सिंह ने एक प्रार्थना पत्र दिया था। उन्होंने औरंगजेब द्वारा मथुरा के केशवदेव मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ की रत्नजड़ित प्रतिमाओं, भगवान श्रीकृष्ण व अन्य विग्रहों को आगरा किला के दीवान-ए-खास की छोटी मस्जिद की सीढ़ियों में दबाने की बात कही थी। उन्होंने अदालत से माँग की थी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) या अन्य सक्षम संस्था से वैज्ञानिक ढंग से अन्वेषण कराकर प्रतिमाएँ निकलवाई जाएँ। वहाँ से निकली प्रतिमाओं को श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर के किसी भाग में सुरक्षित रखवाया जाए।

उदित राज ने कुम्भ पर फैलाया फेक न्यूज, 2013 की तस्वीर को जोड़ा तबलीगी जमात से: लोगों ने दिखाया आइना

दलित नेता उदित राज ने कुंभ मेले को लेकर फेक न्यूज फैलाई है। उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट पर एक तस्वीर को पोस्ट करते हुए लिखा, “1500 तबलिगी जमात भारत में कोरोना जेहाद कर रहे थे और अब लाखों साधू जुटे कुम्भ में उस जेहाद और कोरोना से निपटने के लिए।” हालाँकि, उदित राज का यह ट्वीट ज्यादा देर तक टिक न सका।

बता दें कि उदित राज ने जो तस्वीर पोस्ट की है, वह 2019 की है। गूगल पर जब हम इस तस्वीर को सर्च करते हैं तो पाते हैं कि 2019 में इसे कई लोगों द्वारा शेयर किया गया था।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर कुछ लोगों का कहना है कि यह तस्वीर 2013 के कुंभ मेले की है, जिसका इस्तेमाल कर उदित राज अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। 2013 में भी कई रिपोर्ट में इस तस्वीर का इस्तेमाल किया गया है।

उदित राज के ट्वीट करते ही सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया। एक यूजर ने लिखा, अरे बेवकूफ, यह पिछले साल की तस्वीर है।

वहीं अन्य ने लिखा, महाराष्ट्र में तो चुनाव नहीं है तो वहाँ क्या हो गया।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “2013 की फोटो डाल कर अफवाह फैला रहा है। संज्ञान लिया जाए।” यूजर ने इस ट्वीट में दिल्ली पुलिस को भी टैग किया है।

एक यूजर ने लिखा, “सर सबसे ज्यादा केस तो आपके यहाँ से आ रहे हैं। महाराष्ट्र नंबर 1 पर है। थोड़ा आत्म निरीक्षण कीजिए सर।”

एस सोमवंशी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “पुराने कुंभ की फोटो है महोदय, बाकी काफिर की सजा आपको भी मिलेगी।”

सौरभ राय नाम के यूजर ने लिखा, “एक तो तुम 2013 की तस्वीर ट्वीट करते हो और फिर बोलते हो कि लोग तुम्हे गालियाँ क्यों देते हैं और ये बताओ की महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में कौन सा कुंभ हो रहा है जो वहाँ की हालत इतनी खराब है। इन पर बोलने की भी तो थोड़ी सी हिम्मत दिखाइए उदित राज जी।”

गौरतलब है कि उदित राज ने पिछले साल कुंभ पर होने वाले खर्चों को लेकर सवाल उठाया था। ट्विटर पर उदित राज ने लिखा था, “सरकार द्वारा किसी भी धार्मिक शिक्षा या अनुष्ठान का खर्च वहन नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का खुद का कोई धर्म नहीं होता है। यूपी सरकार इलाहाबाद में कुंभ मेले के आयोजन में 4200 करोड़ रुपए खर्च करती है, वह भी गलत है।”

कॉन्ग्रेस नेता उदित राज द्वारा इस ट्वीट के कुछ ही समय बाद इसकी जम कर आलोचना हुई और अंत में उन्होंने खुद अपना यह ट्वीट डिलीट कर दिया। ट्वीट डिलीट करने के बाद उदित राज ने कहा कि धर्म को राजनीतिक ताकतों से दूर रखना चाहिए और सरकार को किसी भी धर्म में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके अलावा न तो उसे बढ़ावा देना चाहिए और न ही उसे हतोत्साहित करना चाहिए। मैंने कुम्भ मेले का उदाहरण इसलिए दिया था क्योंकि इसका खर्च बहुत ज़्यादा था।

कोरोना का कहर: दिल्ली की कब्रिस्तान में जगह नहीं, लखनऊ में बढ़ा रेट, गुजरात में एडवांस में खुद रही कब्र; कम पड़ने लगे कफन

देश और राजधानी दिल्ली में कोरोना तेजी से फैल रहा है। हर दिन कोरोना के आँकड़े पिछले रिकॉर्ड को तोड़ रहे हैं। हालात ये हैं कि मरीजों को अस्पतालों में जगह नहीं मिल रही है, तो दूसरी तरफ कब्रिस्तान में भी सुपुर्द-ए-खाक करने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। दिल्ली के ITO स्थित कब्रिस्तान ‘जदीद कब्रिस्तान अहले इस्लाम दिल्ली’ की तस्वीरें और आँकड़ा डराने वाला है। मुर्दों को सुपुर्द-ए-खाक करने की जगह बनाने के लिए JCB मशीन की मदद लेनी पड़ रही है।

कब्रिस्तान के केयरटेकर शमीम का कहना है कि अप्रैल से पहले के 55 दिनों में सिर्फ 5 कोरोना संक्रमितों की डेड बॉडी आई थी। लेकिन पिछले 3 दिन में ही 5 गुना यानी 25 डेड बॉडी आ चुकी है। एक अप्रैल से 11 अप्रैल तक 39 शवों को दफनाया जा चुका है, शमीम को कब्रिस्तान में शवों की बढ़ती तादाद और कम होती जगह की फिक्र सताने लगी है।

शमीम के मुताबिक अब सिर्फ 100 शवों को दफनाने की जगह बची है, अगर मौत का यही आँकड़ा रहा तो 10 से 12 दिनों में भर जाएगी। इसको लेकर कब्रिस्तान से जुड़ी कमेटी को जानकारी दे दी गई है। कब्रिस्तान में शवों को दफनाने का काम करने वाले वसीम की शिकायत है कि उन्हें इस काम के वक्त इस्तेमाल के लिए पीपी‌ई नहीं दी जाती। इससे उनकी जिंदगी को भी खतरा रहता है।

गौरतलब है कि पिछले साल भी इस कब्रिस्तान का भी कुछ ऐसा ही हाल था। इसमें से 5 बीघा जमीन कोरोना संक्रमण से मरने वालों को दफन करने के लिए आरक्षित की गई थी। दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, कुछ ही हफ्तों में इस 5 बीघे जमीन का 75 फीसदी हिस्सा भर चुका था। शमीम के हवाले से दैनिक भास्कर ने बताया था कि जिस रफ्तार से मौतें हो रही है कोरोना संक्रमितों के लिए आरक्षित यह कब्रिस्तान हफ्ते भर से भी कम समय में भर जाएगा। उन्होंने बताया था कि इसके बाद ऐसे लोगों का शव दफन करने के लिए कब्रिस्तान प्रबंधन कमिटी को और जमीन आवंटित करनी पड़ेगी। 

दिल्ली उच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी सरकार के लापरवाही भरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा था, “आप लोग (दिल्ली सरकार) गहरी नींद में थे और आपको झकझोर कर नींद से उठाना पड़ा। जब हम आपको झकझोरते हैं तब आप कछुए की चाल चलने लगते हैं।”

राँची में कब्र खोदने के लिए नहीं मिल रहे मजदूर

वहीं राँची के रातू कब्रिस्तान में कब्र खोदने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। कब्रिस्तान में मृतकों की लंबी कतार है क्योंकि मृतकों को दफनाने के लिए कब्र नहीं है। कब्रिस्तान में कब्र खोदने वाले मजदूर कोविड संक्रमण के डर से कब्रिस्तान से भाग खड़े हो रहे हैं। कब्र खोदने के लिए रातू कब्रिस्तान में जेसीबी की व्यवस्था की जा रही है ताकि शवों को दफनाया जा सके। मंगलवार (अप्रैल 13, 2021) को भी रातू कब्रिस्तान में करीब 10 शव पहुँचे, जिनमें 2 शव कोविड पॉजिटिव मरीजों के थे लेकिन कब्र खोदने वाले मजदूर नदारद रहे।

लखनऊ में बढ़ रहा खुदाई का रेट

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी शवों को दफनाने में दिक्कतें आनी शुरू हो गई हैं। शहर में बढ़ते मौतों के ग्राफ से श्मशान से लेकर कब्रिस्तानों तक की व्यवस्था प्रभावित हुई है। राजधानी के प्रमुख कब्रिस्तानों में सामान्य दिनों के मुकाबले इन दिनों कहीं अधिक मय्यतें आ रही हैं। जिससे लगातार गड्ढे खुदवाए जा रहे हैं, क्योंकि कोरोना संक्रमित लाशों को दफनाने के लिए गहरे गड्ढे खोदे जाते हैं इसलिए खुदाई का रेट भी बढ़ गया है।

गुजरात में एडवांस में खुद रही कब्र

हालात यह हैं कि जिन कब्रिस्तानों में औसतन दो-चार, दस मय्यतें दफन होने आती थीं वहाँ पर इस समय ताँता लगा हुआ है। शहर के सबसे बड़े कब्रिस्तान ऐशबाग की बात करें दो पिछले दो हफ्ते में यहाँ 210 मय्यतों को दफनाया गया है। इनमें 14 शव संक्रमित थे जिन्हें दूसरी जगह गहरा गड्ढा खोदकर दफनाया गया।

इधर गुजरात में भी कुछ ऐसा ही हाल है। कोरोना के बढ़ते कहर को देखते हुए कब्रिस्तानों में एडवांस में कब्रों की खुदाई की जा रही है। सूरत में महामारी का इतना ज्यादा प्रकोप बढ़ गया है कि शवों को लाने वाली मुर्दाघर की गाड़ियों की कमी आने लगी है। एक वाहन में कई शव ढोए जा रहे हैं। शव वाहन एक साथ कई शवों को लेकर निकलते हैं और उन्हें अलग-अलग कब्रिस्तान पर उतारते हुए चलते बनते हैं। सूरत में रहने वाले लोगों का कहना है कि इतना बुरा वक्त हमने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नहीं देखा।

7000 वाली मस्जिद में सिर्फ 50 लोग नमाज पढ़ेंगे… प्लीज अनुमति दीजिए: बॉम्बे HC का फैसला – ‘नहीं’

रमजान के महीने में मस्जिदों में नमाज पढ़ने को लेकर बुधवार (अप्रैल 14, 2021) को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जुमा मस्जिद ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई की। इस याचिका में ट्रस्ट ने 50 लोगों के साथ 5 वक्त नमाज पढ़ने की अनुमति मांँगी थी। हालाँकि कोर्ट ने मामले में सुनावई करते हुए कहा कि भले ही धार्मिक प्रथाओं को फॉलो करने का अधिकार महत्वपूर्ण है लेकिन कोविड महामारी के दौरान लोगों की सुरक्षा सबसे ज्यादा जरूरी है।

जुमा मस्जिद ट्रस्ट की इस याचिका पर न्यायमूर्ति आरडी धानुका और वीजी बिष्ट की डिविजन बेंच ने सुनवाई करते हुए याचिका में की गई माँग को स्वीकारने से मना कर दिया। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि मस्जिद एक एकड़ में फैली है और एक समय में 7 हजार से ज्यादा लोग इसमें एकट्ठा हो सकते हैं। लेकिन कोरोना संक्रमण को देखते हुए मस्जिद में एक समय में पचास लोगों को नमाज पढ़ने की अनुमति दी जाए। 

याचिका में ये भी कहा गया था कि ट्रस्ट इस दौरान कोविड-19 प्रोटोकॉल और सावधानी का पूरी तरह पालन करेगा। अपनी माँग उठाते हुए याचिकाकर्ता ने दिल्ली हाईकोर्ट के 12 अप्रैल के फैसले का उदाहरण दिया था, जहाँ प्रोटोकॉल के साथ नमाज करने की अनुमति दी गई।

सरकारी वकील ने कहा- हम किसी धर्म के लिए अपवाद नहीं बना सकते

सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार की ओर से पेश हुई वकील ज्योति चव्हाण ने याचिका में उठाई गई माँग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि कोरोना के बढ़ते केसों को देखते हुए ये अनमुति नहीं दी जानी चाहिए। वह बोलीं,

“हम किसी भी धर्म के लिए अपवाद नहीं बना सकते, खासकर इस 15-दिन की प्रतिबंध अवधि में। हम इस स्तर पर जोखिम नहीं उठा सकते हैं। सभी नागरिकों को इस समय सहयोग करना चाहिए।”

ज्योति चव्हाण ने कहा कि सरकार ने घर में किसी को उनके धार्मिक कार्य करने से नहीं रोका। राज्य इस समय वैक्सीन और ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहा है। ऐसे में सामाजिक समारोहों की अनुमति देना उचित नहीं होगा। याचिका के विरोध में सरकारी वकील ने कहा कि दिल्ली और महाराष्ट्र की स्थिति अलग है। दिल्ली हाईकोर्ट का ऑर्डर इस राज्य में नहीं माना जा सकता।

कोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि राज्य में कोरोना बेकाबू हालात में है और इसके संक्रमण को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने अनिवार्य हैं। कोर्ट ने स्थिति के मद्देनजर कहा,

“महाराष्ट्र में मौजूदा स्थिति और जमीनी हकीकत को देखते हुए, हम याचिकाकर्ता को मस्जिद में नमाज अदा करने की अनुमति नहीं दे सकते। राज्य सरकार का प्रतिबंध आदेश जनता के हित में और महाराष्ट्र के सभी निवासियों की सुरक्षा के लिए है।”

कोर्ट ने महामारी से पैदा हुई गंभीर स्थिति को देखते हुए कहा धार्मिक प्रथाओं को फॉलो करने और मनाने का अधिकार महत्वपूर्ण है लेकिन कोविड महामारी के दौरान नागरिकों की सुरक्षा ज्यादा जरूरी है।

महाराष्ट्र में लगे कर्फ्यू वाले प्रतिबंध

मालूम हो कि महाराष्ट्र में रिकॉर्ड तोड़ कोरोना वायरस के मामलों की पुष्टि के बाद राज्य सरकार ने कुछ क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर 13 अप्रैल से कड़े प्रतिबंध की घोषणा की है, जिसमें धार्मिक स्थल भी 15 दिन के लिए बंद किए गए हैं। साथ ही ये भी कहा गया है कि धार्मिक स्थल से जुड़े लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं। मंगलवार को सीएम ठाकरे ने हालातों के मद्देनजर कर्फ्यू जैसे प्रतिबंधों की घोषणा करते हुए कहा कि ये नियम 14 अप्रैल की रात 8 बजे से शुरू होकर 1 मई तक रहेंगे।

एंटीलिया का गुनाह छिपाने के लिए 2 और लोगों की हत्या की योजना बना रहा था सचिन वाजे: NIA सूत्रों के हवाले से दावा

एंटीलिया केस में एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। एनआईए सूत्रों के अनुसार मुंबई पुलिस का निलंबित अधिकारी सचिन वाजे दो और लोगों की हत्या की योजना बना रहा था। उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित घर एंटीलिया के बाहर​ विस्फोटक लदी कार रखने के इस मामले की जाँच NIA ही कर रही है।

सूत्रों के अनुसार, वाजे ने एक एनकाउंटर की प्लानिंग की गई थी, ताकि यह बताया जाए कि एनकाउंटर में मारे गए लोगों ने ही एंटीलिया के बाहर जिलेटिन वाली स्कॉर्पियो खड़ी की थी। पूरे प्लान को अंजाम देने के लिए 2 लोगों की पहचान हुई थी, जिनके एनकाउंटर होते ही इन्वेस्टिगेशन का पूरा केस वहीं खत्म हो जाता। लेकिन जिलेटिन की वजह से जब इस केस में टेरर एंगल आया और एटीएस के बाद NIA ने जाँच का काम सँभाला तो वाजे की सारी प्लानिंग फेल होती गई।

बता दें कि पिछले दिनों वाजे के घर में एक अज्ञात व्यक्ति का पासपोर्ट मिला था। सूत्रों के मुताबिक वाजे ने पासपोर्ट होल्डर के साथ ही एक अन्य शख्स को भी मारने का प्लान बनाया था। जाँच में सचिन वाजे के पास से NIA को कई लाख कैश, बेनामी कारतूस और बैंक खाते में जमा डेढ़ लाख रुपए मिले हैं। एजेंसी को शक है कि इस केस में मनसुख हिरेन भी साथ था। इसी वजह से उसकी जान गई।

ठाणे के कारोबारी मनसुख हिरेन की मौत के मामले की जाँच कर रहे अधिकारियों को संदेह है कि पिछले साल नवंबर में औरंगाबाद से चोरी हुई मारुति ईको कार में उसकी हत्या की गई होगी। हिरेन की कथित हत्या मामले में महाराष्ट्र एटीएस के एक अधिकारी ने कहा कि ठाणे जिले में हिरेन का शव मिलने से एक दिन पहले चार मार्च को ईको कार एक अन्य कार के साथ दिखाई दी थी। संदेह है कि वह कार वाजे चला रहा था।

हिरेन उस स्कॉर्पियो कार का मालिक था, जिसमें 25 फरवरी को मुकेश अंबानी के घर के निकट विस्फोटक सामग्री रखी मिली थी। अंबानी की सुरक्षा में सेंध और हिरेन की हत्या के मामले की जाँच फिलहाल राष्ट्रीय जाँच एजेंसी कर रही है, जिसने इस सिलसिले में 13 अप्रैल को वाजे को गिरफ्तार किया था।

संदेह है कि ईको कार 16 नवंबर को औरंगाबाद शहर के सिटी चौक इलाके से चोरी की गई और फिर हिरेन की हत्या में उसका इस्तेमाल किया गया। जाँचकर्ताओं को संदेह है कि हिरेन की हत्या की साजिश पिछले साल नवंबर में रची गई थी। एटीएस अधिकारी ने कहा कि 4 मार्च को ईको कार में कम से कम दो लोगों के होने के बारे में पता चला है। अधिकारी ने कहा है कि संदेह है कि आरोपितों ने हिरेन को उस वाहन में बिठाए रखा और बाद में उसकी हत्या कर दी।

उन्होंने कहा कि ईको कार का पता चलना अभी बाकी है। हो सकता है कि आरोपितों ने सबूत मिटाने के लिए उसको नष्ट कर दिया हो। पुलिस उन गैरेज में ईको कार की तलाश कर रही है, जहाँ वाहनों को नष्ट किया जाता है। एनआईए को जाँच के दौरान मुंबई में मीठी नदी से ईको कार के नंबर प्लेट के अलावा कुछ इलेक्ट्रॉनिक सामान और एक लैपटॉप मिला था।

थूको और उसी को चाटो… बिहार में दलित के साथ सवर्ण का अत्याचार: NDTV पत्रकार और साक्षी जोशी ने ऐसे फैलाई फेक न्यूज

बिहार का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसके आधार पर दावा किया जा रहा है कि एक दलित व्यक्ति को थूक चाटने के लिए ‘सामंती विचारधारा के लोगों’ ने मजबूर किया। इंटरनेट पर इस वीडियो के बारे में कहा जा रहा है कि बिहार में नीतीश कुमार के राज में एक दलित के साथ सवर्ण अत्याचार कर रहे हैं। इस वीडियो में पीड़ित को उठक-बैठक करने के लिए कहा जाता है और कहवाया जाता है कि गलती नहीं करेगा।

NDTV के पत्रकार मनीष ने लिखा, “देखिए, बिहार के गया ज़िले में पंचायत चुनाव में सर उठाने के लिए सामंती लोग एक दलित को थूक चाटने की कैसे सजा दे रहे हैं। नीतीश कुमार के शासन में सब कुछ ठीक नहीं।⁦ दुष्प्रचार किया जा रहा है कि एक दलित को सामान्य वर्ग के व्यक्ति ने थूक चटवाया।⁦ अब आते हैं सच्चाई पर।⁦ बिहार पुलिस ने इस मामले में संज्ञान लिया है।⁦ इसके लिए दोषी लोगों को पकड़ लिया गया है।⁦

पुलिस ने बताया कि ये मामला गया के एक गाँव का है, जहाँ उस दलित व्यक्ति को थूक चटवाया जाता है और उठक-बैठक कराया जाता है।⁦ SSP आदित्य कुमार ने बताया कि वो व्यक्ति अपने ही समुदाय की एक महिला के साथ भाग गया था।⁦ जब वो लौटा, तो उसे पंचायत में लेकर जाया गया।⁦ उसी गाँव में, जहाँ से वो भागा था।⁦ इस मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार गया है।⁦ आरोपितों में महिला का पिता और भाई शामिल है।⁦

महिला और युवक एक ही समुदाय के हैं।⁦ इस मामले में SC/ST एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।⁦ अन्य आरोपितों की धर-पकड़ के लिए छापेमारी की जा रही है।⁦ जबकि NDTV का पत्रकार मनीष पीड़ित का एक वीडियो डाल कर अफवाह फैला रहा था कि मुखिया के पक्ष में प्रचार न करने के कारण उसके साथ ऐसा किया गया।⁦ साक्षी जोशी जैसे पत्रकारों ने भी इस अफवाह को आगे बढ़ाया।⁦