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‘मंत्री मेरे पिता को लौटाएँगे’: झारखंड के मंत्री अस्पताल का कर रहे थे निरीक्षण, बाहर बुजुर्ग की हो गई मौत

झारखंड की राजधानी राँची के सदर अस्पताल से प्रशासन की लापरवाही का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में एक महिला अपने पिता के शव के पास रो-रोकर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री पर अपना गुस्सा उतार रही है। महिला को कहते सुना जा सकता है कि वह डॉक्टर-डॉक्टर चिल्लाती रही, लेकिन किसी ने उसकी नहीं सुनी।

घटना मंगलवार (अप्रैल 13, 2021) की है। महिला अपने बीमार पिता को सुबह से तमाम प्राइवेट अस्पतालों में ले जाकर थक चुकी थी और कहीं भी बेड उपलब्ध न होने के कारण वह हजारीबाग से उन्हें राँची के सदर अस्पताल लेकर आई। इसी बीच राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता अस्पताल का निरीक्षण करने पहुँच गए। 

महिला ने आरोप लगाया कि वह लगातार डॉक्टरों से अपने पिता को देखने को कह रही थी, लेकिन कई घंटे उसकी किसी ने एक न सुनी। उन्हें घंटों बाहर गर्मी में इंतजार करना पड़ा। बहुत देर बाद डॉक्टर उन्हें अंदर लेकर गए, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। अपने पिता का शव अस्पताल से बाहर लाते हुए महिला की नजर स्वास्थ्य मंत्री पर पड़ी और महिला ने वहीं सबके सामने उन पर चिल्लाना शुरू कर दिया।

महिला ने कहा, “मंत्री जी! हम डॉक्टरों के लिए चिल्लाते रहे लेकिन कोई भी मेरे पिता को देखने नहीं आया। हम बाहर खड़े थे कि उन्हें अस्पताल में एडमिट कर लिया जाए, लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था, उन्हें देखने के लिए। अंत में इलाज न मिलने से उनकी मौत हो गई।” महिला ने चिल्ला कर पूछा, “क्या मंत्री मेरे पिता को लौटाएँगे।”

महिला ने उन लोगों पर भी अपना गुस्सा उतारा जो वोट लेने के लिए आ जाते हैं, लेकिन उन्हें कोई मतलब नहीं होता आम जन किस दर्द से गुजर रहे हैं। वह बताती हैं कि इस समय हालात बहुत बुरे हैं और लोग इलाज के अभाव में मर रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने घटना के संबंध में कहा कि इस समय हर जगह परेशानियाँ हैं और वह इससे निपटने का प्रयास कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, “हर दिन कोविड मरीजों की संख्या बढ़ रही है। हम बेडों का उसी हिसाब से इंतजाम कर रहे हैं। हमने प्राइवेट अस्पतालों से 50 प्रतिशत बेड कोविड मरीजों के लिए आरक्षित रखने को कहा है… जो भी गलतियाँ हैं हम उन्हें सुधारने की कोशिश कर रहे हैं।”

इस बीच राज्य के भाजपा अध्यक्ष दीपक प्रकाश ने महिला के पिता की मौत का इल्जाम राज्य सरकार पर लगाया। भाजपा अध्यक्ष ने लिखा, “राज्य सरकार की लापरवाही के कारण अपने पिता को खो देने से स्वास्थ्य मंत्री के समक्ष महिला ने आपा खो दिया। आखिर मुख्यमंत्री को अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कब होगा।”

इससे पहले भाजपा अध्यक्ष ने राज्य में कोरोना के हालत से निपटने के लिए सीएम को पत्र लिखा था। पत्र में मुख्यमंत्री से मरीजों के लिए बेड, पर्याप्त ऑक्सीजन सप्लाई, अतिरिक्त वेंटिलेटर और पर्याप्त पैरा मेडिकल स्टाफ रखने की बात कही गई थी।

बता दें कि इस समय कोरोना के कारण कई बड़े राज्यों की स्थिति बद्तर होती जा रही है। झारखंड में कल 2844 नए संक्रमित मरीज मिले। इसके साथ ही राज्य में सक्रिय कोरोना संक्रमित मरीजों का आँकड़ा बढ़कर 17,155 हो गया। सक्रिय मरीजों का राज्य के अलग-अलग अस्पतालों में इलाज चल रहा है। वहीं राज्य में कोविड-19 संक्रमितों का आँकड़ा अब 1 लाख 44 हजार 594 हो गया है।

कर्फ्यू का ऐलान होते ही महाराष्ट्र से प्रवासी मजदूरों की वापसी शुरू: स्टेशनों पर खचाखच भीड़, चलाई जा रही अतिरिक्त ट्रेनें

महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार ने ‘ब्रेक द चेन’ नाम से नई पाबंदियाँ लगाई हैं। इसमें लॉकडाउन की तरह सख्ती से काम लिया जाएगा। मंगलवार (अप्रैल 13, 2021) की रात मुख्यमंत्री ने कर्फ्यू का ऐलान किया। उसके बाद राजधानी मुंबई स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) पर प्रवासियों की भारी भीड़ जुट गई, जिनमें अधिकतर मजदूर थे। महाराष्ट्र में 14 अप्रैल की रात से 15 दिनों का कर्फ्यू लगाया गया है।

जहाँ कई प्रवासियों को पहले से ही इस घोषणा का अंदेशा था तो उन्होंने अपना टिकट करा लिया था, वहीं अधिकतर ऐसे थे जिन्हें टिकट नहीं मिल पाया लेकिन वो किसी तरह ट्रेन में जगह बना कर अपने घर पहुँचना चाहते थे। अधिकतर लोग जनरल टिकट खरीद कर स्टेशन में घुसे। सेंट्रल रेलवे अब वहाँ से उत्तर भारतीय राज्यों में जाने वाली ट्रेनों की संख्या में इजाफा कर रहा है, लेकिन लोगों की भीड़ कम नहीं हो रही।

मंगलवार तक 2000 से भी अधिक लोगों को वेटिंग लिस्ट में रखा गया था। ट्रेनों के आने से पहले से ही कन्फर्म टिकट वाले कई प्रवासी मजदूर बड़ी-बड़ी पंक्तियों में खड़े दिखे। उनमें से अधिकतर का मानना है कि फिर पिछले साल वाली स्थिति आ सकती है, इसलिए घर लौटना ही उचित है। 2 महीने पहले ही मुंबई लौटे एक व्यक्ति ने कहा कि वो जिस फर्नीचर की दुकान में काम करता है, उसके मालिक ने छुट्टियों पर जाने को कह दिया है।

प्रवासी मजदूरों का कहना है कि अब वे अपने परिवार का गुजर-बसर करने के लिए क्या करेंगे, ये उन्हें समझ नहीं आ रहा है। हीरे की पॉलिश करने वाले कारखाने में काम करने वाले एक मजदूर का कहना है कि कंपनी ने दो हफ्ते तक कारखाना बंद रखने की बात कही है। पिछले साल के अनुभवों के आधार पर प्रवासी मजदूरों का दावा है कि कर्फ्यू की अवधि फिर बढ़ाई जाएगी। अब वो कर्फ्यू खत्म होने के बाद ही वापस आने की बात कह रहे हैं।

आज बुधवार को भी उत्तर भारतीय राज्यों के लिए मुंबई से 10 ट्रेनें जा रही हैं। ऐसे हर ट्रेन में वेटिंग लिस्ट में 100-1500 लोग हैं। इसे देखते हुए मुंबई सेंट्रल और बांद्रा से एक-एक और ट्रेनें चलाई जाएँगी। मजदूरों के लिए बस से जाना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि एक टिकट का दाम 5000 रुपए है। सड़क मार्ग से भी उनका पलायन चालू है। पिछले 10 दिनों में यूपी-बिहार के लिए मुंबई से 100 बसें आई हैं।

पिछले साल लॉकडाउन के दौरान ऐसी 1000 बसें चली थीं। लेकिन, पिछले साल इन बसों को टैक्स में छूट दिया गया था, जिस कारण एक टिकट का दाम 3000 रुपए था। यूपी-बिहार में पंचायत चुनाव भी होने हैं। ट्रक संगठनों का कहना है कि उनके संघ में 90 लाख ट्रक वाले हैं, जिनमें से 14 लाख महाराष्ट्र के हैं। इनमें ड्राइवरों से लेकर समान चढ़ाने-उतारने वाले तक, सभी प्रवासी हैं। उनका कहना है कि पलायन हुआ तो काफी दिक्कतें आएँगी।

‘होटल एंड रेस्टोरेंट्स एसोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया (HRAWI)’ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रदीप शेट्टी ने मुख्यमंत्री ठाकरे को पत्र लिख कर कहा है कि कर में छूट के साथ-साथ स्पेशल टीकाकरण अभियान भी चलाया जाए, ताकि आर्थिक रूप से इस डूबते सेक्टर का भला हो। उन्होंने कहा कि 20% कर्मचारी जा चुके हैं और पूर्ण लॉकडाउन हुआ तो बाकी भी निकल जाएँगे। उन्होंने ये बात कर्फ्यू के ऐलान से पहले ही कही थी।

उधर CM उद्धव ठाकरे ने सभी संगठनों से मदद की अपील करते हुए कहा कि राज्य में हालात गंभीर हैं। 14 अप्रैल रात 8 बजे से पूरे राज्य में अगले 15 दिनों तक धारा 144 यानी बिना जरूरत के आना-जाना प्रतिबंधित होगा। ये जनता कर्फ्यू है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वो इन प्रतिबंधों को लॉकडाउन का नाम नहीं देंगे। जरूरी सेवाओं को छोड़कर सारे दफ्तर बंद रहेंगे। ई-कॉमर्स, बैंक, मीडिया, पेट्रोल पंप, सुरक्षा गार्ड जैसे लोगों को इसमें छूट दी गई है।

महाराष्ट्र में 14 अप्रैल की रात से धारा 144 के साथ ‘Lockdown’ जैसी सख्त पाबंदियाँ, उद्धव को बेस्ट CM बताने में जुटे लिबरल

महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने राज्य में कोरोना की बेकाबू होती रफ्तार पर काबू पाने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार लगाई है। उन्होंने पीएम से अपील की है कि राज्य में विमान से ऑक्सीजन भेजी जाए। टीकाकरण की रफ्तार बढ़ाई जाए। इसके अलावा उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि कोरोना से लड़ाई जारी है। हमें लगा था कि हम कोरोना से जंग जीत चुके हैं लेकिन ऐसा नहीं है। पिछले साल जब कोरोना ने देश में कदम रखा था तब की सुविधा और अब की सुविधा में फर्क है। पहले महाराष्ट्र में जाँच के लिए एक-दो लैब थे, अब 523 लैब हैं।

CM उद्धव ठाकरे ने सभी संगठनों से मदद की अपील करते हुए कहा कि राज्य में हालात गंभीर हैं। ठाकरे ने कहा कि हम बुधवार रात आठ बजे से सख्त प्रतिबंध लागू करने जा रहे हैं। 14 अप्रैल रात 8 बजे से पूरे राज्य में अगले 15 दिनों तक धारा 144 यानी बिना जरूरत के आना-जाना प्रतिबंधित होगा। ये जनता कर्फ्यू है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि मैं इन प्रतिबंधों को लॉकडाउन का नाम नहीं दूँगा।

मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन शब्द का इस्तेमाल न करते हुए इसे ‘ब्रेक द चेन अभियान’ करार दिया। ठाकरे ने साफ किया कि जरूरी सेवाओं को छोड़कर सारे दफ्तर बंद रहेंगे। ई-कॉमर्स, बैंक, मीडिया, पेट्रोल पंप, सुरक्षा गार्ड जैसे लोगों को इसमें छूट दी गई है।

उन्होंने कहा कि लोकल ट्रेन और बस सेवा केवल आवश्यक सेवाओं के लिए चलेगी। पेट्रोल पंप, सेबी से संबंधित वित्तीय संस्थान और निर्माण कार्य चालू रहेंगे। रेस्तराँ आदि खुले रहेंगे, लेकिन वहाँ बैठकर खाने पर रोक होगी। सिर्फ होम डिलिवरी और टेक-अवे की सुविधा रहेगी।

उन्होंने आगे कहा कि हमने लंबे समय तक विचार किया है, लेकिन अब सख्त कदम उठाने का वक्त आ गया है। हमें इस मामले में ब्रिटेन से सीख लेने की जरूरत है। उद्धव ठाकरे ने नए डॉक्टरों से अपील की कि वे कोरोना के संकट में मदद करें। इसके अलावा उन्होंने रिटायर्ड डॉक्टरों से भी कोरोना संकट में आगे आने की अपील की।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि हम कोरोना के पीक तक पहुँचे हैं या नहीं, यह कह नहीं सकते। आँकड़ों में कब तक इजाफा जारी रहेगा, यह भी नहीं कहा जा सकता। ऐसे में हमें कोरोना वैक्सीनेशन की प्रक्रिया को तेज करना होगा ताकि आने वाली लहर को कमजोर किया जा सके। हमने पिछली बार आप लोगों की मदद से कोरोना को नियंत्रित किया था, लेकिन इस बार हालात अलग हैं।

महाराष्ट्र में मंगलवार को कोरोना के 60,212 नए मामले सामने आए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि राशन की दुकानों से 3 किलो गेंहूँ, 3 किलो चावल मुफ्त में मिलेगा। कार्ड धारकों को 3 महीने तक मुफ्त राशन दिया जाएगा। 12 लाख मजदूरों को 1500-1500 रुपए की आर्थिक मदद दी जाएगी। 

वहीं, जो पत्रकार पहले केवल ट्वीटर थ्रेड के कारण उद्धव को बेस्ट CM बताने में लगे थे। वह अब फिर काम पर लग गए हैं। वह कह रहे हैं कि पूर्ण लॉकडाउन न लगाकर उद्धव ने कोरोना की जंग जीत ली है। ऐसे ट्वीट करके वह भले ही उन्हें पुनः बेस्ट CM साबित करने में लग गए हों, लेकिन सच्चाई इससे परे है। जिसे मुख्यमंत्री भी देश के समक्ष कबूलते नजर आ रहे हैं कि उनके राज्य में कोरोना के कारण भयावह स्थिति का मंजर देखने को मिल रहा है।

बता दें कि इससे पहले मुख्यमंत्री ने लॉकडाउन को लेकर उपमुख्यमंत्री अजीत पवार के साथ महत्‍वपूर्ण बैठक की थी। इस बैठक में राज्‍य के लॉकडाउन से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए एक वित्‍तीय पैकेज तैयार करने को लेकर चर्चा की गई थी। इसके बाद लॉकडाउन को लागू करने और उसकी अवधि को लेकर अंतिम फैसला लिया गया था। रविवार को हुई टास्क फोर्स के साथ बैठक में मुख्यमंत्री ने 8 दिनों का लॉकडाउन लगाने, जबकि टास्क फोर्स के कुछ सदस्य 14 दिनों के सख्त लॉकडाउन के पक्ष में थे।

पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जा रहा काफिर हिंदुओं से नफरत की बातें: BBC उर्दू डॉक्यूमेंट्री में बच्चों ने किया बड़ा खुलासा

बीबीसी उर्दू ने सोमवार (अप्रैल 12, 2021) को यूट्यूब पर एक वीडियो अपलोड किया। इस वीडियो में पाकिस्तान के पाठ्यपुस्तकों में हिंदुओं के खिलाफ निहित पूर्वाग्रह को उजागर किया गया। वीडियो में कई पाकिस्तानी हिंदुओं को दिखाया गया है, जिन्होंने पाकिस्तान में स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा की तरफ इशारा किया। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सिर्फ हिंदू होने की वजह से उन्हें अपने दोस्तों, सहकर्मियों और सहपाठियों से अपमान का सामना करना पड़ता है। 

यह वीडियो स्कूली पाठ्य पुस्तकों में हिंदू विरोधी कट्टरता के सामान्यीकरण को भी दर्शाता है जो आधिकारिक तौर पर पाकिस्तानी सरकार द्वारा स्वीकृत है। कम उम्र में ही पाठ्य पुस्तक के माध्यम से बच्चों में हिंदू के लिए ‘काफिर’ (इस्लाम में विश्वास न करने वालों के लिए अपमानजक शब्द) शब्द का इस्तेमाल कर उनके प्रति नफरत पैदा किया जाता है। उन्हें पाकिस्तान की बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।

वीडियो में पाकिस्तानी हिंदू विभिन्न स्कूल की पाठ्यपुस्तकों को यह दिखाने के लिए उद्धृत करते हैं कि स्कूल की पाठ्यपुस्तकें हिंदुओं और हिंदू धर्म के खिलाफ नफरत का समर्थन कैसे करती हैं। उन्होंने विभिन्न मानकों के स्कूल की पाठ्यपुस्तकों के अंशों का हवाला दिया, जिन्होंने हिंदुओं को दूसरे दर्जे के नागरिकों के लिए वापस कर दिया।

इनमें से एक राजेश ने एक पाकिस्तानी स्कूल की पाठ्यपुस्तक का हवाला दिया जिसमें हिंदुओं को ‘काफ़िर’ के रूप में वर्णित किया गया था, जिसका अर्थ मूर्तिपूजा करने वाले थे, और आरोप लगाया कि हिंदू स्त्री जाति से द्वेष करते हैं और अगर वो लड़की होने पर नवजात शिशु को जिंदा दफना देते हैं।

कुमार ने सिंध टेक्स्ट बुक बोर्ड की 11 वीं और 12 वीं कक्षा की किताबों का हवाला देते हुए हिंदुओं और सिखों का वर्णन करने के लिए ‘मानवता के दुश्मनों’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को उजागर किया। वह आगे कहते हैं कि पुस्तक में दावा किया गया है कि हिंदुओं और सिखों ने हजारों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों को मार डाला।

पाकिस्तान में पुस्तकें इस नैरेटिव को आगे बढ़ाती हैं कि देश में हिंदू अल्पसंख्यक अपने पड़ोसी देश और कट्टर भारत के प्रति वफादार हैं। इस तरह, मुस्लिम छात्रों में यह धारणा पैदा होती है कि उनके देश में हिंदू देशद्रोही हैं और पाकिस्तान के लिए देशभक्ति की भावना नहीं है।

डॉ. कुमार ने 9 वीं और 10 वीं कक्षा की पुस्तकों का हवाला देते हुए बताया कि पाकिस्तानी किताबें हिंदुओं को विश्वासघाती और धोखेबाज कैसे बताती हैं। किताबों में दावा किया गया कि मुसलमानों और हिंदुओं ने दमनकारी ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने के लिए हाथ मिलाया था। हालाँकि, हिंदुओं के मुसलमानों के प्रति शत्रुता दिखाए जाने की वजह से यह लंबे समय तक नहीं टिक सका।

जाने-माने पाकिस्तानी शिक्षाविद एएच नैयर के अनुसार, हिंदुओं के खिलाफ नफरत को पाकिस्तानी किताबों में सूक्ष्म तरीके से उकेरा गया है। वह बताते हैं कि जब पाकिस्तान का इतिहास पढ़ाया जाता है, तो मुस्लिम लीग और कॉन्ग्रेस के बीच लड़ाई को मुसलमानों और हिंदुओं के बीच लड़ाई के रूप में चित्रित किया गया है। नैय्यर कहते हैं, पाकिस्तान की स्थापना और इसके पीछे की राजनीति को सही ठहराने के लिए, पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में हिंदुओं को खलनायक के रूप में पेश किया जाता है।

उन्होंने पाकिस्तानी पाठ्यपुस्तकों में एक और महत्वपूर्ण समस्या पर प्रकाश डाला। उनका कहना है कि इन किताबों में मुस्लिम शासन के इतिहास को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया है, लेकिन हिंदू इतिहास में इसका कोई उल्लेख नहीं है। उदाहरण के लिए, उपमहाद्वीप का इतिहास इस क्षेत्र में मुसलमानों के आगमन से शुरू होता है। पिछले हिंदू शासकों का कोई उल्लेख नहीं है जो इस क्षेत्र में मुस्लिम शासन से पहले थे।

महाराष्ट्र के भयावह हालात के लिए संजय राउत ने दूसरों राज्यों को कोसा, कहा- कुंभ मेले से आने वाले लोग और फैलाएँगे कोरोना

महाराष्ट्र में कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए शिवसेना सांसद संजय राउत दूसरों राज्यों को कोस रहे हैं। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में कोरोना बढ़ रहा है, क्‍योंकि अन्य राज्‍यों से लोग यहाँ आ रहे हैं। कोरोना से राज्य में हालात बद से बदतर स्थिति में पहुँच रहे हैं। पिछले 24 घंटे में यहाँ कोरोना के 51,751 नए मामले सामने आए, जबकि 258 लोगों की मौत हुई।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा, ”महाराष्‍ट्र में कोरोना इसलिए बढ़ रहा है, क्‍योंकि और राज्‍यों से लोग यहाँ आते हैं। हमारे यहाँ आज गुड़ी पड़वा है, मुख्‍यमंत्री ने नियंत्रण लगाया है। हमें क्‍या आनंद मिलता है कि हमारे त्‍योहार पर इस तरह से नियंत्रण लगाया जाए? लोग भी गुस्‍सा करते हैं। लेकिन हमने किया है। ये हिम्‍मत है सरकार की।”

उन्होंने आगे दावा किया कि मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। वह राज्य को बेहतर ढ़ंग से संचालित कर रहे हैं। राउत ने महाराष्ट्र के स्वास्थ्य ढाँचे को देश भर में सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहा कि यहाँ कोरोना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन इन सबके बावजूद स्थिति को जल्द से जल्द सीएम ठाकरे के नेतृत्व में नियंत्रण में लाया जाएगा।

संजय राउत ने कुंभ मेले की अनुमति देने के लिए जहाँ उत्तराखंड सरकार को दोषी ठहराया। वहीं दूसरी ओर गुड़ी पड़वा त्योहार पर नियंत्रण लगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार की सराहना की। उन्होंने कहा कि हमारे त्योहारों और धार्मिक समारोहों पर प्रतिबंध लगाना दुखद है। लेकिन लोगों की जान बचाने के लिए पार्टी ने ऐसा करने की हिम्मत की। हमारी प्राथमिकता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाई जा सके। मेरा अनुमान है कि कुंभ मेले से आने वाले लोग COVID-19 मामलों को और फैलाएँगे, जो तबाही का कारण बनेगा।

महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री असलम शेख को भी यही राग अलापते हुए देखा गया है। एक वीडियो में बातचीत के दौरान उन्होंने कुंभ मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों की तुलना तब्लीगी जमात से की। कुंभ मेले से लौटने वाले श्रद्धालुओं को संभावित खतरे के रूप में बताते हुए उन्होंने कहा, ”आगामी त्योहारों के लिए सख्त एसओपी (केंद्र से मानक प्रचालन प्रक्रिया) होंगे। अन्यथा, आप देख सकते हैं कि हरिद्वार कुंभ के लिए सरकार द्वारा अनुमति देने के कारण COVID-19 मामलों में कैसे वृद्धि हुई है। ये वही लोग हैं जिन्होंने तब्लीगी जमात को बदनाम किया और उन पर कोरोना महामारी फैलाने का आरोप लगाया।”

यहाँ गौर करें उत्तराखंड सरकार के तहत कुंभ मेला सख्त नियमों के साथ हो रहा है। अगर किसी व्यक्ति के पास कोविड-19 की RT-PCR नेगेटिव टेस्ट रिपोर्ट नहीं होगी अन्यथा 72 घंटे से अधिक पुरानी होगी, तो उसे हरिद्वार में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। कुंभ में भाग लेने के लिए यह अनिवार्य है।

ज्ञात हो कि देश में अन्य राज्यों की तुलना में कोविड-19 के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र से सामने आ रहे हैं। इसलिए, संजय राउत महाराष्ट्र की इस स्थिति के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। वह बातों को इधर-उधर घुमाकर दूसरे राज्यों को दोष दे रहे हैं, जिसका कोई मतलब नहीं है।

बता दें कि नालासोपाड़ा विधानसभा क्षेत्र में 9 लोगों की मौत कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई थी, जिसके बाद कई लोग अस्पताल के बाहर विरोध करने गए थे। लेकिन वहाँ अस्पताल प्रशासन अपनी ढिलाई मानने को तैयार नहीं हुआ। अस्पताल ने बताया कि जितनी मौतें हुईं वह या तो मरीज की उम्र या उसकी तबीयत बिगड़ने के कारण हुई, ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं थी। इसके अलावा वसई विधानसभा क्षेत्र में भी कुल 10 लोगों की मौत का कारण ऑक्सीजन में कमी बताया जा रहा है। यहाँ 7 हजार संक्रमित केस हैं। इनमें से 3,000 को ऑक्सीजन की जरूरत है। पिछले 2 दिन में यहाँ 10 लोगों की मौत ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से इस मामले में संबित पात्रा-बग्गा को बड़ी राहत, बीजेपी ने की बघेल सरकार से माफी की माँग

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. संबित पात्रा और बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा को बड़ी राहत मिली है। सोमवार को हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए उनके खिलाफ दर्ज कराई गई FIR को निरस्त करने के आदेश दिए। हालाँकि, इससे पहले कोर्ट ने इस संबंध में दायर याचिका पर नो कोरेसिव एक्शन का आदेश दिया था। यानी इस मामले में कोई भी कार्रवाई से मना किया था। पात्रा के वकील शरद मिश्रा ने कहा कि पिछले साल मई में रायपुर और दुर्ग में पात्रा के खिलाफ दो FIR दर्ज की गई थीं, जबकि एक केस कांकेर में बग्गा के खिलाफ दायर किया गया था।

गौरतलब है कि पात्रा के खिलाफ पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू और राजीव गाँधी सहित कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व के खिलाफ कथित रूप से अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए ये एफआईआर दर्ज की गई थीं। पात्रा के खिलाफ एक एफआईआर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 499, 500, 501 व 505 (1) और दूसरी एफआईआर आईपीसी की धारा 298, 153A और 505 (2) के तहत दर्ज की गई थी।

इसी प्रकार, तजिंदर बग्गा के खिलाफ आईपीसी की धारा 153A, 505 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66 के तहत एक एफआईआर दर्ज की गई थी। बग्गा के खिलाफ यह एफआईआर जवाहरलाल नेहरू और राजीव गाँधी के बारे में पात्रा के ट्विटर पोस्ट को रीट्वीट करने के संबंध में दर्ज की गई थी।

जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने कहा कि मानहानि के मामले में जाँच शुरू करने से पूर्व पुलिस को मजिस्ट्रेट से उचित निर्देश प्राप्त करने होते हैं। इन्हें असंज्ञेय अपराध (ऐसे अपराध जिनमें पुलिस को बिना वारंट के गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं प्राप्त होता) कहते हैं। एक असंज्ञेय अपराध आमतौर पर एक मामूली अपराध है, जिसका उल्लेख आईपीसी की पहली अनुसूची में किया गया है, जिसके लिए अभियुक्त को बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान जस्टिस अग्रवाल ने डॉ. पात्रा के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर पहले ही रोक लगा दी थी। पूर्व में इस मामले में याचिकाकर्ता पात्रा के वकील ने अंतिम सुनवाई का आग्रह किया था।

हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद बीजेपी की छत्तीसगढ़ इकाई ने भूपेश बघेल सरकार से माफी की माँग की है। छत्तीसगढ़ प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा, ”तमाम एफआईआर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा निरस्त किया जाना लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्य की विजय है।”

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और मोहन मार्कम में जरा भी नैतिकता बाकी हो तो पूरे देश-प्रदेश के साथ-साथ बीजेपी और पात्रा से बिना शर्त माफी माँगनी चाहिए, क्योंकि उनके इशारे पर प्रदेश के अलग-अलग थानों में पात्रा के विरुद्ध लगभग एक सौ एफआईआर की गई थी।

‘पेंटर’ ममता बनर्जी को गुस्सा क्यों आता है: CM की कुर्सी से उतर धरने वाली कुर्सी कब तक?

चुनाव आयोग ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर 24 घंटे तक चुनाव प्रचार न करने का जो प्रतिबंध लगाया था वह आज ख़त्म हो जाएगा। इस तरह का प्रतिबंध इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नया नहीं है। आयोग इससे पहले आसाम के मंत्री और भाजपा नेता हिमंत विस्व सरमा पर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के लिए 48 घंटे का प्रतिबंध लगा चुका है।

अंतर बस यह है कि जहाँ हिमंत विस्व सरमा ने आयोग के आदेश का चुपचाप पालन किया, वहीं ममता बनर्जी इसे आयोग द्वारा की गई ज़्यादती बता रही हैं। आयोग के इस आदेश के विरुद्ध वे कोलकाता में महात्मा गाँधी की मूर्ति के नीचे बैठी। चूँकि वे पेंटर हैं तो वहाँ बैठकर उन्होंने पेंटिंग भी की।

चुनाव आयोग के अनुसार ममता बनर्जी ने 3 अप्रैल को तारकेश्वर में अल्पसंख्यकों से वोट न बँटने देने की जो अपील की थी, उससे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन हुआ है। अल्पसंख्यकों से वोट बँटने न देने की अपील के अलावा चुनाव आयोग ने एक लिखित शिकायत पर ममता बनर्जी के उस बयान का भी संज्ञान लिया जिसमें उन्होंने सीआरपीएफ के जवानों के घेराव की बात कही थी।

चुनाव आयोग के अनुसार, ममता बनर्जी ने निहायत ही घातक और उकसाने वाली बातें की और ऐसी बातों में क़ानून व्यवस्था को बिगाड़ने की क्षमता थी। वहीं ममता बनर्जी का कहना है कि चुनाव आयोग का यह फ़ैसला अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है।

लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावों के समय दिए जाने वाले भाषणों में विवादास्पद बयान आना कोई नई बात नहीं है। हर दल के नेता ऐसे बयान देते रहे हैं और यह सिलसिला बहुत पहले से चलता आया है। नेता कॉन्ग्रेस के हों या भाजपा के, वामपंथी हों या समाजवादी, कोई दल या विचारधारा ऐसे नेताओं से ख़ाली नहीं।

कुछ नेताओं ने तो कई बार विवादास्पद बयान दिया है। ममता बनर्जी, वरुण गाँधी, दिग्विजय सिंह, शरद पवार से लेकर पिनराई विजयन और एम करुणानिधि जैसे नेता चुनाव के समय दिए गए भाषणों में अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं।

भाषणों से विवाद उत्पन्न होते रहे पर जो बात देखने की रही वह यह थी कि बयान देते समय ये नेता कौन से संवैधानिक पद पर थे या किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे तो उनका राजनीतिक क़द कितना बड़ा था। इसके अलावा यदि इतिहास देखें तो पाएँगे कि पहले दिए गए अधिकतर बयान विरोधी नेता या दल पर व्यक्तिगत हमला या राजनीतिक आरोप लिए होते थे।

ऐसा शायद ही कभी हुआ हो जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने चुनाव में ड्यूटी करने वाले अर्ध सैनिक बलों के घेराव की बात की हो या खुलेआम किसी समुदाय से सीधे वोट न बँटने देने की अपील की हो। ऐसे विवादास्पद बयानों के अलावा इसी चुनाव में मतदान के दौरान अपने चुनाव क्षेत्र के एक बूथ पर ममता बनर्जी की उपस्थिति लोकतंत्र में उनकी आस्था को दर्शाती है।

ऐसा करना हालाँकि चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन है पर इस बात के लिए आयोग ने उनपर कोई कार्यवाई न करके कुछ हद तक अपनी सहिष्णुता का ही परिचय दिया था। यह बात और है कि उसके लिए आयोग को भाजपा समर्थकों की आलोचना भी झेलनी पड़ी थी।

नेताओं द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध व्यक्तिगत आक्षेप या हमले होते रहे हैं। हाल के दशक में देखें तो 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के तत्कालीन उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर ममता बनर्जी ने बहुत बुरा व्यक्तिगत हमला करते हुए उनके कमर में डोरी बाँधकर ले जाने तक की बात की थी।

उनकी पार्टी के प्रवक्ता डेरेक ओ’ ब्रायन ने तो मोदी को गुजरात का कसाई तक कह डाला था। उसके बाद भी तृणमूल कॉन्ग्रेस की नेत्री समय-समय पर ऐसे व्यक्तिगत हमले करती रही हैं पर भाजपा या नरेंद्र मोदी की ओर से कोई बड़ी प्रतिक्रिया अब तक न आई थी। गृह मंत्री अमित शाह पर भी ऐसे हमले होते रहे हैं पर उन्होंने अपनी तरफ़ से शायद ही कभी व्यक्तिगत टिप्पणी की हो।

पर इस बार व्यक्तिगत हमलों के अलावा ऐसे बयान के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इसका उत्तर शायद चुनावों के संभावित परिणामों में है। ज्ञात रहे कि केवल चुनावी पंडित ही नहीं बल्कि ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर भी पश्चिम बंगाल में बड़े बदलाव की संभावना जता चुके हैं।

इस सम्भावित बदलाव के अलावा एक और बात महत्वपूर्ण है और वह है केंद्रीय अर्ध सैनिक बलों की भूमिका। पिछले लगभग पाँच दशकों से चुनाव में भीषण हिंसा देखने के आदी पश्चिम बंगाल में इस बार अब तक वोटिंग के दिनों में बहुत कम हिंसा देखना राज्य के अधिकतर नागरिकों के लिए सुखद अनुभव रहा है।

जितनी भी हिंसा देखने को मिली है उसमें अधिकतर हमले सत्ताधारी दल के लोगों द्वारा भाजपा प्रत्याशियों या कार्यकर्ताओं पर हुए हैं। इस बार हिंसा में इस कमी का श्रेय पूरी तरह से चुनाव आयोग के शेड्यूल, अर्ध सैनिक बलों की संख्या और शांतिपूर्ण मतदान के लिए उनके समर्पण को जाता है।

कहीं न कहीं अर्धसैनिक बलों का प्रभाव न केवल पहले के चुनावों से भिन्न है बल्कि सत्ताधारी दल को खटक भी रहा है। इसके ठीक विपरीत कॉन्ग्रेस पार्टी और वाम दलों ने केंद्रीय अर्ध सैनिक दलों की भूमिका के विरुद्ध कोई बड़ी आपत्ति नहीं की है।

ममता बनर्जी द्वारा चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के बीच साँठ-गाँठ की बात नई नहीं है। वे इससे पहले भी चुनाव आयोग पर ऐसे आरोप लगा चुकी हैं। उनके अलावा भी कई और नेता और दल चुनाव आयोग पर ऐसे आरोप लगाते रहे हैं पर चुनावों के नतीजे पक्ष में आने पर उन नतीजों का स्वागत भी करते हैं।

राजनीतिक दल और उनके नेता आरोप लगाते समय नहीं सोचते कि चुनावी लोकतंत्र का पहिया घूमता रहता है। पहिए के किस ओर सत्ता और किस ओर विपक्ष रहेगा यह पूरी तरह से मतदाता के हाथ में है।

ऐसे में यह आवश्यक है कि दल और उनके नेता न केवल मतदाता में बल्कि चुनावी प्रक्रिया में अपनी आस्था बरकरार रखें। ऐसा नहीं हो सकता कि जो चुनाव आयोग एक दिन दलों या नेताओं की प्रशंसा का पात्र बने उसी के फ़ैसलों को किसी और दिन अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक बता दिया जाए।

इस बार के शांतिपूर्ण चुनाव का असर न केवल आने वाले चुनावों पर पड़ेगा बल्कि नागरिकों के बीच इस बहस का कारण भी बनेगा कि चार दशकों तक चुनाव के दौरान जिस हिंसा को देखने के वे आदी हो गए थे उसके कारण क्या थे? ऐसी हिंसा पहले क्यों नहीं रोकी जा सकी या ऐसी हिंसा पर पहले सार्वजनिक बहस क्यों नहीं हो सकी?

आख़िर क्या कारण थे कि पिछले लगभग तीन दशकों में समय-समय पर चुनावी हिंसा और अपराध रोकने के लिए लाए गए अधिकतर चुनाव सुधारों से पश्चिम बंगाल अछूता क्यों रहा? शायद शांतिपूर्ण विधानसभा चुनावों का असर म्यूनिसिपल और पंचायत चुनावों में भी होने वाली हिंसा को रोकने के लिए प्रेरणा दे।

महाकुंभ में उत्तराखंड पुलिस की सहयोगी बनी RSS : 1500 से अधिक स्वयं सेवकों ने मुस्तैदी से संभाला है मोर्चा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता कुंभ यातायात व्यवस्था में पुलिस के सहयोग के लिए कुंभ क्षेत्र के 45 से अधिक पॉइंट पर सेवा कार्य कर रहे हैं। संघ कार्यकर्ताओं का सेवा के प्रति ये जुनून देख समाज में संघ के प्रति जहाँ सम्मान बढ़ रहा है, वहीं स्वयंसेवकों की निष्ठा, अनुशासन व कर्तव्य को देख समाज को प्रेरणा भी मिल रही है।

हरिद्वार में संघ के प्रमुख प्रचारक सुनील का कहना है कि उन्होंने कुंभ क्षेत्र में 55 केन्द्र बनाए हैं, जहाँ उनके 1500 स्वयंसेवक कुंभ की व्यवस्था बनाने में नि:स्वार्थ भाव से सेवा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस काम में कुंभ मेला पुलिस प्रशासन ने उन्हें एसपीओ नाम देकर कुंभ में व्यवस्थाओं को लेकर कार्य करने को कहा है। हर चौराहे पर इनके 6 स्वयं सेवक पुलिस के चार जवानों के साथ तैनात रहते हैं।

उत्तराखंड के सीमांतवर्ती जनपद पिथौरागढ़ से लेकर चमोली टिहरी, पौड़ी मुनस्यारी तक के स्वयंसेवक कुंभ मेले में सेवा कार्य कर रहे हैं। 1100 स्वयंसेवक हरिद्वार महाकुंभ में सेवा में दे रहे हैं। कुंभ में कुमाऊँ के 300 स्वयंसेवक भी शामिल हैं। कई मोर्चों पर तो पुलिस व अर्धसैनिक बलों से भी पहले संघ के स्वयंसेवक व्यवस्था सँभाल रहे हैं। स्वयंसेवक सुबह कैंप से नास्ता करने के बाद दिन की रोटियाँ साथ बाँधकर ले जाते हैं और फिर पूरी मुस्तैदी से पुलिस के सहयोग में जुट जाते हैं।

आरएसएस के क्षेत्र प्रचार प्रमुख पदम सिंह ने कहा कि जो लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विषय में कहते हैं कि संघ क्या करता है वह इन दिनों महाकुंभ में लगे स्वयंसेवकों को देख कर जान सकता है। उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति निर्माण करता है, जो अपना सर्वस्व देश, समाज, धर्म के प्रति समर्पित करते हैं।

आरएसएस के क्षेत्र शारीरिक शिक्षण प्रमुख नरेश कुमार ने बताया कि पूरे कुंभ क्षेत्र में 1500 से अधिक स्वयंसेवक यातायात व्यवस्था में लगे हुए हैं। उन्होंने बताया कि हरिद्वार शहर के अतिरिक्त लक्सर, रुड़की, भगवानपुर, ऋषिकेश आदि कुंभ क्षेत्र में भी स्वयंसेवक पुलिस के साथ यातायात व्यवस्था सँभालने में सहयोग कर रहे हैं। संघ के प्रांत शारीरिक शिक्षण प्रमुख सुनील तिवारी ने बताया कि कार्यकर्ताओं को खाने, रहने. ड्यूटी पॉइंट तक आनेजाने सहित सभी प्रकार की चिंता संघ के स्थानीय कार्यकर्ता कर रहे हैं।

ममता से बात नहीं करना चाहता, TMC के गुंडों को गिरफ्तार करो: मृतक आनंद बर्मन के पिता का छलका दर्द

पश्चिम बंगाल में चौथे चरण के मतदान के दौरान कूच बिहार के सीतलकुची विधानसभा के कई इलाकों में हिंसा हुई, जिसमें दो अलग-अलग जगहों पर 5 लोगों की मौत हो गई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन चार युवकों के परिवार वालों से बात की और अपनी संवेदनाएँ प्रकट कीं, जो कि सीतलकुची के आम तल्ली गाँव में पोलिंग बूथ संख्या 126 पर केंद्रीय पुलिस बल की गोली लगने से मारे गए थे।

कूच बिहार के सीतलकुची में मतदान के दौरान झड़पों में बूथ संख्या 285 पर अपनी जान गँवाने वाले 18 वर्षीय आनंद बर्मन के परिवार ने ममता बनर्जी पर सवाल खड़े किए कि आखिर क्यों उन्होंने चार मृतक युवकों के परिवार वालों से बात करने के साथ-साथ उनसे बात नहीं की?

आनंद बर्मन के पिता जगदीश बर्मन ने कहा, “मेरा बेटा चुनाव हिंसा में मारा गया, मगर ममता बनर्जी ने हमसे बात नहीं क्योंकि हम भाजपा समर्थक हैं। वह 14 अप्रैल को कूच बिहार आ रही हैं लेकिन अब हम उससे बात नहीं करना चाहते हैं। हम जानते हैं कि हमारे बेटे को किसने मारा है और हम चाहते हैं कि उन्हें जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए।” जगदीश बर्मन ने आरोप लगाया कि मतदान के दिन तृणमूल कॉन्ग्रेस के समर्थकों ने मतदान केंद्र पर बमबाजी की और उसके बाद उनके बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी।

ममता बनर्जी के इस कदम के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी उन पर जमकर हमला बोला था और सवाल पूछा कि आखिर धर्म के आधार पर उन्होंने उन चार युवकों के परिवार वालों से ही बात क्यों की जिनकी सीआईएसएफ की गोली लगने से मौत हुई थी और उन्होंने पाँचवें युवक आनंद बर्मन के परिवार वालों से अपनी संवेदना क्यों नहीं जताई ?

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि ममता बनर्जी शीतलकुची फायरिंग में मारे गए चार लोगों को श्रद्धांजलि दे रही हैं। सीतलकुची बूथ पर ही शनिवार को आनंद बर्मन मारा गया। ममता बनर्जी ने उनके लिए एक शब्द नहीं बोला। दीदी आनंद बर्मन की मौत से दुखी नहीं हैं। यह उनके गिरते राजनीति के स्तर का परिचय है। अमित शाह ने मृत्यु को राजनीति से अलग रखने की बात भी कही। उन्होंने कहा आनंद बर्मन एक यूथ वोटर था। उनकी मौत ममता बनर्जी के वोट बैंक के लिए अनुकूल नहीं है।

पिछले दिनों ‘जन की बात’ के संस्थापक प्रदीप भण्डारी ने इस घटना पर एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान शेयर किया। इसमें प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि जब आनंद बर्मन की हत्या हुई, तब वह वोट डालने के लिए लाइन में खड़ा था। वीडियो में प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “आनंद वोट डालने गया था, तब वो लोग बम लेकर आए। उन्हें देखकर आनंद डर गया और घर लौटते समय उसकी हत्या कर दी गई।”

प्रत्यक्षदर्शी ने यह भी बताया कि आनंद की उनसे कोई दुश्मनी भी नहीं थी। हत्या का एक मात्र कारण था कि आनंद भाजपा के लिए काम करता था, जबकि दूसरे लोग तृणमूल कॉन्ग्रेस के लिए। प्रत्यक्षदर्शी ने यह भी बताया कि लोगों को धमकियाँ भी दी गई थीं कि वो भाजपा को वोट न करें। 

भारत के प्रति बढ़ रहा है प्यार: अमेरिकन सिंगर मैरी मिलबेन ने श्लोक पढ़कर दी भारतीयों को नए साल की बधाई, देखें Video

चैत्र नवरात्रि के शुरू होने साथ ही आज (13 अप्रैल 2021) से हिंदुओं के नववर्ष का भी आरंभ हो गया। देश-विदेश में बैठा हर हिंदू इस अवसर पर एक दूसरे को नए साल की बधाई दे रहा है। इसी मौके पर अमेरिकन सिंगर मैरी मिलबेन ने भी भारतीय सभ्यता के साथ जुड़ते हुए संस्कृत में श्लोक पढ़कर समस्त हिंदू समुदाय के लोगों को शुभकामनाएँ भेजी हैं।

39 वर्षीय सिंगर और एक्ट्रेस मैरी मिलबेन ने संदेश की शुरुआत संस्कृत श्लोक से की और बाद में हिंदी में ये भी कहा– आप सभी को नया साल मंगलमय हो। मंत्र पढ़ने के बाद उन्होंने विश्व भर में रहने वाले भारतीयों को मेरे प्यारे भारत, भारतीय समुदाय और पूरे विश्व में रहने वाले भारतीय कहकर संबोधित किया और नए साल की बधाई दी।

उन्होंने कहा, “दीपावली 2020 में बधाई देने के बाद मैं हिंदुओं के पारंपरिक त्योहारों के बारे में और अधिक जानना चाहती हूँ। मेरा रिश्ता भारतीय संस्कृति से और अधिक मजबूत होता जा रहा है। जैसे-जैसे मैं भारत के बारे में जान रही हूँ, मेरा इस देश के प्रति प्यार बढ़ रहा है।”

अपनी वीडियो में मिलेबन ने अपने कोच को धन्यवाद दिया और नववर्ष की महत्ता पर बात की। साथ ही सभी के अच्छे स्वस्थ व भविष्य के लिए भी कामनाएँ की।

बता दें कि मैरी मिलबेन ने नवंबर में दीपावली के अवसर पर ओम जय जगदीश हरे गाया था। दुनिया भर के भारतीय समुदाय के लोगों ने इस पसंद किया। उन्होंने इसके लिए अपने हिंदी शिक्षक डॉ मोक्षराज का आभार व्यक्त किया।

वह बोलीं कि आज उन्होंने भारत और भारतीय समुदाय के लिए प्रार्थना की है, जिससे समस्त भारतीय सुरक्षित रहे। वहीं, मिलबेन को शिक्षा देने वाले डा मोक्षराज ने कहा कि वह भारतीय संस्कृति के बारे में सब कुछ जानने को उत्सुक रहती हैं। हिंदी के माध्यम से वह भारतीय संस्कृति और त्योहारों को जानना चाहती हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों जब पॉप सिंगर रिहाना और पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग टूल किट के लिए भारत में चल रहे किसान आंदोलन पर विदेशी प्रोपगेंडा चलाने की कोशिश कर रही थीं। उस समय भी मिलबेन ने भारत के महामहिम पीएम मोदी पर विश्वास जताया था। मैरी ने कहा था,

“आज, मैं अपने भारतीय भाइयों और बहनों के साथ एकजुटता प्रदर्शित करती हूँ। मुझे भारत में नए सुधारों के माध्यम से भारतीय किसानों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए महामहिम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर पूरा भरोसा है। कृषि वैश्विक अर्थ व्यवस्था का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसान किसी भी देश के पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। हमें हमेशा उन लोगों का ध्यान रखना चाहिए जो भूमि (किसानों) का काम करते हैं और जो भूमि (सैनिकों) की रक्षा करते हैं। अब शांति के राजदूतों के ऊपर उठने का समय है।”