जिस तरह उत्तर प्रदेश के मथुरा के बरसाना और नंदगाँव की ‘लट्ठमार होली’ (लाठी के साथ होली का जश्न) दुनिया भर में प्रसिद्ध है, उसी तरह शाहजहाँपुर जिले में हर वर्ष होली के दिन खेली जाने वाली ‘जूता मार होली’ की भी एक अलग पहचान है। शाहजहाँपुर की इस होली के लिए इस बार जश्न की खास तैयारी की जा रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक यहाँ प्रशासन ने इलाके में करीब 43 मस्जिदों को प्लास्टिक की शीट से ढक दिया है, ताकि होली के दिन यहाँ कोई अप्रिय घटना ना हो पाए। पुलिस प्रशासन पूरी मुस्तैदी से जुट गया है। आयोजकों के मुताबिक, इस बार ‘लाट साहब’ दिल्ली से आएँगे, जबकि पिछली बार ‘लाट साहब’ रामपुर से लाए गए थे। होली के दिन भैंसा गाड़ी पर निकलने वाले जुलूस में ‘लाट साहब’ मुख्य आकर्षण होते हैं।
दरअसल यहाँ शहर में लाट साहब के 2 जुलूस निकलते हैं। जहाँ बड़े लाट साहब और छोटे लाट साहब का जुलूस निकाला जाता है। जिसमें एक शख्स को लाट साहब बनाकर भैंसा गाड़ी पर बैठाया जाता है और फिर उसे जूते और झाड़ू मार कर पूरे शहर में घुमाया जाता है। इस दौरान आम लोग लाट साहब को जूते भी फेंक कर मारते हैं।
क्या होता है जूता मार होली में?
आपको बता दें कि अंग्रेजों के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने के लिए यहाँ एक व्यक्ति को अंग्रेज का प्रतीक लाट साहब बनाकर उसे भैंसा गाड़ी पर बिठाया जाता है और फिर जूतों और झाड़ू से पीटा जाता है। सांप्रदायिक सौहार्द ना खराब हो इसके लिए पुलिस और प्रशासन हर थाना स्तर पर पीस मीटिंग का आयोजन करता है और आपसी सहमति के बाद मस्जिदों को पूरी तरीके से ढक दिया जाता है।
फिलहाल यहाँ जूते मार होली खेलने की परंपरा दशकों पुरानी है। पुलिस अधीक्षक आनंद का कहना है कि शहर में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए भारी संख्या में पैरा मिलिट्री फोर्से, पीएसी और कई जिलों की पुलिस फोर्स बुलाई गई है, जो मस्जिदों और पूरे शहर की सुरक्षा करेगी। साथ ही ड्रोन के जरिए भी जुलूस पर नजर रखी जाएगी।
दशकों पुरानी है परंपरा
शाहजहांपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक लड़ाई के चलते फर्रुखाबाद चले गए और 1729 में 21 वर्ष की आयु में वापस शाहजहाँपुर आए। वह हिंदू-मुसलमानों के बड़े प्रिय थे और इसी बीच होली का त्यौहार आ गया और तब दोनों समुदाय के लोग उनसे मिलने के लिए घर के बाहर खड़े हो गए। जब नवाब साहब बाहर आए तो लोगों ने होली खेली। बाद में उन्हें ऊँट पर बैठाकर शहर का एक चक्कर लगाया गया, इसके बाद से यह परंपरा बन गई।
1857 तक हिंदू और मुस्लिम दोनों मिलकर यहाँ होली का पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाते थे तथा नवाब साहब को हाथी या फिर घोड़े पर बैठा कर शहर में घुमाया जाता था परंतु हिंदू और मुस्लिमों का यह सौहार्द प्यार अंग्रेजों को रास नहीं आया। इसके बाद 1858 में बरेली के सैन्य शासक खान बहादुर खान के सैन्य कमांडर मरदान अली खान ने एक टुकड़ी के साथ शाहजहाँपुर में हिंदुओं पर हमला कर दिया, जिसमें तमाम हिंदू और मुसलमान मारे गए थे। तब शहर में सांप्रदायिक तनाव हो गया।
1947 के बाद नवाब साहब के जुलूस का नाम बदल कर प्रशासन ने ‘लाट साहब’ कर दिया और तब से यह लाट साहब के नाम से जाना जाने लगा। इसी दौरान अंग्रेज यहाँ से चले गए और फिर अंग्रेजों के प्रति लोगों में जो आक्रोश था, उससे ही इस नवाब के जुलूस का रूप विकृत हो गया।
विश्व के सबसे बड़े इस्लामिक देश इंडोनेशिया के मकस्सर शहर में रविवार को एक कैथोलिक चर्च के बाहर एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को बम विस्फोट करके उड़ा लिया। ‘ईस्टर होली वीक’ के पहले दिन हुए इस ब्लास्ट में 2 लोगों की मौत जबकि 14 के घायल होने की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अब तक आई है।
दक्षिण सुलावेसी पुलिस के प्रवक्ता ई जुल्पान के मुताबिक जिस वक्त ये ब्लास्ट हुआ, उस दौरान अधिकतर लोग चर्च के भीतर ही थे। धमाके के बाद घटना स्थल पर मानव शरीर के क्षत-विक्षत टुकड़े मिले हैं। रिपोर्ट लिखे जाने तक हालाँकि यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वो केवल हमलावर के थे या किसी और के भी हैं।
चर्च के पादरी ने कहा- 10 लोग घायल हुए
जिस चर्च के बाहर यह ब्लास्ट हुआ, उसके पादरी फादर विल्हेमुस तुलक ने स्थानीय मेट्रो टीवी को बताया कि एक व्यक्ति आत्मघाती हमलावर को पकड़े हुए घायल हो गया था, जिसे मिला कर कुल 10 लोग इसमें घायल हुए हैं, जिनमें से कुछ की हालत गंभीर थी। ब्लास्ट इतना तेज था कि पास की पार्किंग में खड़ी कारें भी इससे क्षतिग्रस्त हो गईं। फिलहाल घटनास्थल के चारों तरफ से सील कर पुलिस ने जाँच शुरू कर दी है।
आतंकी संगठन JAD पर हमले का शक
इस हमले के पीछे किसका हाथ है, यह अभी तक पता नहीं चल सका है। अभी तक किसी आतंकी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी भी नहीं ली है। लेकिन, पुलिस ने इस सुसाइ़ड अटैक के लिए इस्लामिक स्टेट से प्रेरित आतंकी संगठन जमाह-अंशरुत-दौला (JAD) को जिम्मेदार माना है। इसी आतंकी संगठन ने 2018 में इंडोनेशिया के चर्चों और सुरबाया शहर में एक पुलिस चौकी पर हमला किया था। उस घटना में 30 से अधिक लोग मारे गए थे।
2020 में इंडोनेशिया में सबसे घातक इस्लामी आतंकवादी हमला बाली के पर्यटक द्वीप पर हुआ था, जिसमें हमलावरों ने 202 लोगों का कत्लेआम किया था। मरने वाले ज्यादातर विदेशी टूरिस्ट थे। एक समय इंडोनेशिया ने उग्रवाद को कुचल दिया था, लेकिन हाल के वर्षों में वहाँ इस्लामी उग्रवाद रह-रहकर अपना फन उठाना शुरू कर दिया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के जरिए राष्ट्र को संबोधित किया। बता दें कि ये साल 2021 का तीसरा और अब तक का 75 वाँ एपिसोड था। इस दौरान उन्होंने आजादी के अमृत महोत्सव का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि यह महोत्सव 2023 तक चलेगा। पीएम मोदी ने यह भी बताया कि देश को कोरोना से जंग जीतने के लिए दवाई भी, कड़ाई भी मंत्र को जीना होगा।
मिताली राज को दी बधाई
प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाड़ी मिताली राज को नया विश्व रिकॉर्ड बनाने की बधाई दी। उन्होंने कहा कि मिताली, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दस हजार रन बनाने वाली पहली भारतीय महिला क्रिकेटर बनी हैं। दो दशकों से ज्यादा के करियर में मिताली राज ने हजारों-लाखों को प्रेरित किया है। उनके कठोर परिश्रम और सफलता की कहानी, न सिर्फ महिला क्रिकेटरों, बल्कि पुरुष क्रिकेटरों क लिए भी एक प्रेरणा है। उनकी इस उपलब्धि पर बहुत-बहुत बधाई। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज शिक्षा से लेकर आंत्रेप्रोन्योरशिप तक, सैनिक बलों से लेकर विज्ञान और तकनीकी तक, हर जगह देश की बेटियाँ अपनी अलग पहचान बना रही हैं।
देश के अलग-अलग क्षेत्रों में जल्द ही नया साल भी मनाया जाएगा। चाहे उगादी हो या पुथंडू, गुड़ी पड़वा हो या बिहू, नवरेह हो या पोइला बोईशाख हो या बैसाखी – पूरा देश, उमंग, उत्साह और नई उम्मीदों के रंग में सराबोर दिखेगा। इसी समय केरल भी खूबसूरत त्योहार विशु मनाता है। इसके बाद, जल्द ही चैत्र नवरात्रि का पावन अवसर भी आ जाएगा। चैत्र महीने के नौवें दिन हमारे यहाँ रामनवमी का पर्व होता है। इसे भगवान राम के जन्मोत्सव के साथ ही न्याय और पराक्रम के एक नए युग की शुरुआत के रूप में भी माना जाता है।
“इसी विश्वास के साथ, आप सभी को पर्व त्योहारों की एक बार फिर शुभकामनाएँ ।
आप सब खुश रहिए, स्वस्थ रहिए, और खूब उल्लास मनाइए।”
— Mann Ki Baat Updates मन की बात अपडेट्स (@mannkibaat) March 28, 2021
‘दवाई भी-कड़ाई भी’ मंत्र को रखें याद
प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में कहा कि जनता को इस बात का अंदाजा नहीं कि हमारे कोरोना योद्धाओं के प्रति सम्मान, आदर, थाली बजाना, ताली बजाना, दिया जलाना उनके दिल को कितना छू गया। पीएम मोदी ने कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए एक मंत्र हमेशा याद रखने की हिदायत दी और कहा कि इन सबके बीच, कोरोना से लड़ाई का मंत्र भी जरुर याद रखिए – ‘दवाई भी – कड़ाई भी’।
— Mann Ki Baat Updates मन की बात अपडेट्स (@mannkibaat) March 28, 2021
जनता कर्फ्यू के दिन अनुशासन पर पीढ़ियाँ करेंगी गर्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संबोधित करते हुए कहा कि पिछले साल मार्च का ही महीना था, जब देश ने पहली बार जनता कर्फ्यू शब्द सुना था। पीएम मोदी ने कहा कि इस महान देश की महान प्रजा की महाशक्ति के अनुभव ने जनता कर्फ्यू पूरे विश्व के लिए एक अचरज बन गया था। अनुशासन का ये अभूतपूर्व उदाहरण था, आने वाली पीढ़ियाँ इस एक बात को लेकर के जरूर गर्व करेगी।
‘अमृत महोत्सव’ आजादी के 100 साल तक देगी प्रेरणा
प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में कहा कि किसी स्वाधीनता सेनानी की संघर्ष गाथा हो, किसी स्थान का इतिहास हो, देश की कोई सांस्कृतिक कहानी हो, ‘अमृत महोत्सव’ के दौरान आप उसे देश के सामने ला सकते हैं, देशवासियों को उससे जोड़ने का माध्यम बन सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा कि ‘अमृत महोत्सव’ ऐसे ही प्रेरणादायी अमृत बिंदुओं से भर जाएगा और फिर ऐसी अमृत धारा बहेगी, जो हमें भारत की आजादी के सौ वर्ष तक प्रेरणा देगी। देश को नई ऊँचाई पर ले जाएगी, कुछ-न-कुछ करने का जज्बा पैदा करेगी।
“मेरे प्यारे देशवासियो, आज ‘मन की बात’ में हमने ‘अमृत महोत्सव’ और देश के लिए अपने कर्तव्यों की बात की। हमने अन्य पर्वों और त्योहारों पर भी चर्चा की।
इसी बीच एक और पर्व आने वाला है जो हमारे संवैधानिक अधिकारों, और कर्तव्यों की याद दिलाता है।”
— Mann Ki Baat Updates मन की बात अपडेट्स (@mannkibaat) March 28, 2021
श्रोताओं का आभार व्यक्त किया
प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात के दौरान कहा, “मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ कि आपने इतनी बारीक नजर से ‘मन की बात’ को फॉलो किया है और आप जुड़े रहे हैं। ये मेरे लिए बहुत ही गर्व का विषय है, आनंद का विषय है। मैं आज, इस 75वें एपिसोड के समय सबसे पहले ‘मन की बात’ को सफल, समृद्ध और इससे जुड़े रहने के लिए हर श्रोता का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ।”
दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन प्रोग्राम
पीएम मोदी ने कहा कि पिछले साल इस समय सवाल था कि वैक्सीन कब तक आएगी। आज हम दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीनेशन प्रोग्राम चला रहे हैं। देश के कोने-कोने से हम ऐसी खबरें सुन रहे हैं, ऐसी तस्वीरें देख रहे हैं, जो हमारे दिल को छू जाती हैं।
यूपी के जौनपुर में 109 वर्ष की बुजुर्ग माँ, राम दुलैया जी ने टीका लगवाया है। ऐसे ही दिल्ली में भी 107 साल के केवल कृष्ण ने वैक्सीन की डोज ली है। हैदराबाद में 100 साल के जय चौधरी जी ने वैक्सीन लगवाई और सभी से अपील भी है कि वैक्सीन जरूर लगवाएँ। मैं ट्वीटर-फेसबुक पर भी ये देख रहा हूँ कि कैसे लोग अपने घर के बुजुर्गों को वैक्सीन लगवाने के बाद उनकी फोटो अपलोड कर रहे हैं।
पिछली बार पानी की अहमियत पर चर्चा की थी
इससे पहले उन्होंने 28 फरवरी को इस कार्यक्रम के जरिए राष्ट्र को संबोधित किया था। इसमें उन्होंने पानी की अहमियत पर चर्चा की थी। उन्होंने कहा था कि पानी एक तरह से पारस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। कहा जाता है पारस के स्पर्श से लोहा, सोने में परिवर्तित हो जाता है। इसलिए हमें पानी के संरक्षण के लिए प्रयास करने होंगे। इसके लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
होली पर माहौल बिगाड़ने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। 26 मार्च को, उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर के एक गाँव में उपद्रवियों ने निर्धारित समय से पहले होलिका जला दी। रिपोर्टों के अनुसार, निवासियों को अगले दिन इस घटना के बारे में पता चला।
घटना के बारे में जानने के बाद भारतीय जनता पार्टी के जिला प्रमुख सचिन सिंघल और स्थानीय शिवसेना नेता बिट्टू सिगेरा मौके पर पहुँचे। आक्रोशित रहवासियों ने उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।
पुलिस ने सख्त कार्रवाई का वादा किया
रिपोर्टों के अनुसार, लक्ष्मण विहार के निवासी हर साल होलिका दहन मनाते हैं, जो इस वर्ष 28 मार्च को पड़ रहा है। हालाँकि, उपद्रवियों ने शुक्रवार-शनिवार की रात को इसे जला दिया। घटना के बारे में पुलिस को सूचित किया गया, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए एक टीम मौके पर पहुँची। पुलिस ने उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया है।
इंस्पेक्टर अनिल कपरवान ने कहा कि पुलिस जल्द ही अपराधी की पहचान करेगी और कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी। पुलिस ने इलाके से सीसीटीवी फुटेज एकत्र कर मामले की जाँच शुरू कर दी है। मामले में जाँच जारी है और इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इसके अलावा अक्षर विहार में भी होली जलाने वाले की फोटो सीसीटीवी में कैद हो गई है। उनकी पहचान की जा रही है। इंस्पेक्टर बारादरी शितांशु शर्मा ने बताया कि होली जलाने वाले खुराफाती के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। जल्दी उसकी पहचान कर आरोपित को गिरफ्तार किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि रविवार (मार्च 28, 2021) को होलिका दहन व शब-ए-बरात का प्रमुख पर्व दोनों वर्गों के लोगों द्वारा मनाया जाना है। इसके साथ ही सोमवार (मार्च 29, 2021) को रंगोत्सव भी मनाया जाएगा। इसे लेकर जनपद में अगले तीन दिन तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था रहेगी। शहर में शहर कोतवाली क्षेत्र के 95, सिविल लाइंस थाना क्षेत्र के 32 व नई मंडी कोतवाली क्षेत्र के 68 होलिका दहन स्थलों पर शनिवार रात से ही लगातार सुरक्षा रहेगी।
स्थानीय फोर्स के साथ ही दो कंपनी पीएसी और मेरठ से आए सौ स्पेशल रिक्रूट जवान सुरक्षा का जिम्मा सँभालेंगे। एसएसपी अभिषेक यादव ने बताया कि दोनों वर्गों के प्रमुख त्योहारों को लेकर कुछ संवेदनशील स्थल भी चिह्नित किए गए हैं, जहाँ विशेष सुरक्षा इंतजाम रहेंगे।
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने तृणमूल कॉन्ग्रेस नेता और माओवादी समर्थक छत्रधर महतो को रविवार (मार्च 28, 2021) को झाड़ग्राम से गिरफ्तार कर लिया। छत्रधर महतो को साल 2009 के सीपीआई नेता प्रबीर महतो की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया है।
West Bengal: National Investigation Agency (NIA) has arrested TMC leader Chhatradhar Mahato in connection with 2009 murder case of CPI(M) leader Prabir Mahato.
आरोप है कि साल 2009 में टीएमसी नेता छत्रधर महतो और उसके सहयोगियों ने फायरिंग करके राजधानी एक्सप्रेस को अपने कब्जे में करने की कोशिश की थी। लगभग 4 से 5 घंटे तक यह ड्रामा चला था। एक दूसरी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार महतो को UAPA के तहत 2009 के राजधानी एक्सप्रेस केस में गिरफ्तार किया गया है।
#NewsAlert | NIA arrests TMC leader Chhatradhar Mahato in connection with a 2009 murder case.
जानकारी के मुताबिक महतो को आज कोर्ट में पेश किया जाएगा। बता दें कि इससे पहले भी महतो को एनआईए ने गिरफ्तार किया था। लेकिन जेल से आने के बाद महतो को टीएमसी में शामिल कर लिया गया था। छत्रधर महतो बीते साल माओवाद का रास्ता छोड़कर तृणमूल कॉन्ग्रेस में शामिल हुए थे।
एनआईए ने 16, 18 और 22 मार्च को टीएमसी नेता छत्रधर महतो को एजेंसी के सामने पेश होने के लिए समन भेजा था। लेकिन छत्रधर महतो ने बताया कि उन्हें दाँत में दर्द है इसलिए वो एजेंसी के सामने पेश नहीं हो सकते। उन्होंने दाँत में दर्द की मेडिकल रिपोर्ट भी दिखाई दी थी लेकिन एनआईए उनसे संतुष्ट नहीं थी।
इसके बाद राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने हाई कोर्ट का रूख किया। तब कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर छत्रधर महतो एजेंसी के सामने पेश नहीं होते हैं तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता है।
गौरतलब है कि हाल ही में टीएमसी नेता छत्रधर महतो को झाड़ग्राम में हुई सीएम ममता बनर्जी की रैली में स्टेज पर उनके साथ देखा गया था। माना जाता है कि छत्रधर महतो मुख्यमंत्री के काफी करीबी हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद इस बार विधानसभा चुनाव 2021 में छत्रधर महतो पर टीएमसी के पक्ष में वोट डलवाने की बड़ी जिम्मेदारी थी।
छत्रधर महतो पिछले साल फरवरी में ही जेल से छूटे हैं, दस साल तक वो जेल में रहे। जेल से छूटने के बाद टीएमसी ने महतो को जिला समिति में शामिल कर लिया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एनआईए को भुवनेश्वर-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस अपहरण मामले की जाँच करने का आदेश दिया था। 2009 में इस ट्रेन का अपहरण हुआ था और इसका आरोप पीसीएपीए पर लगाया गया था। जो माओवादी इस घटना में शामिल थे, वो महतो की रिहाई की माँग करते रहे।
कनाडा की एक लाइब्रेरी में एक सिरफिरे का आतंक देखने को मिला। शनिवार (मार्च 27, 2021) को सिरफिरे ने लाइब्रेरी में लोगों को बंधक बनाकर चाकू से हमला कर दिया। इसमें एक शख्स की जान चली गई, जबकि 6 से ज्यादा लोग घायल हो गए। घायलों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
जानकारी के मुताबिक लाइब्रेरी में चाकू से लोगों पर हमला करने वाले आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। उसने अकेले ही इस घटना को अंजाम दिया। फिलहाल घटना के पीछे का कारण पता नही चल पाया है। पुलिस हमलावर से पूछताछ कर रही है।
One person dead and multiple others were wounded in a stabbing at a public library in Vancouver, Canada, and a suspect, who apparently acted alone, was taken into custody: Reuters
एकीकृत गृह जाँच दल के सार्जेंट फ्रैंक जंग ने कहा कि इस आदमी का पुलिस के साथ अतीत में संपर्क रहा है और इसका आपराधिक रिकॉर्ड भी है। उन्होंने कहा कि हमलावर जीवित है, लेकिन उसे कितनी चोटें आई हैं, इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है।
बता दें कि घटनास्थल से सामने आए वीडियो में एक व्यक्ति को पुलिस हिरासत में लिए जाने से पहले खुद को चाकू से घायल करते देखा जा सकता है। उन्होंने कहा, “जाहिर है सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ। हम मानते हैं कि कौन, क्या, कब और कैसे हुआ, यह निर्धारित करना अब हमारा काम है।”
चश्मदीदों ने ग्लोबल न्यूज को बताया कि संदिग्ध ने बाहर जाने से पहले लाइब्रेरी के अंदर लोगों को चाकू मारना शुरू कर दिया। मैरी क्रेवर नाम के चश्मदीद ने बताया, “मैं उस समय लाइब्रेरी के कम्युनिटी रूम में था। तभी मैंने बाहर से चिल्लाने की आवाज सुनी। सभी लोग रूक गए और एक-दूसरे को देखने लगे। मैं भी भागने लगा। हम सभी मॉल की तरफ भागे।”
एक अन्य चश्मदीद स्टीव मोसोप ने ग्लोबल न्यूज को बताया, “हम लोग लीन वैली रोड पर ड्राइव कर रहे थे, तभी हमने खून से लथपथ एक महिला को उनके सात साल के बेटे के साथ देखा। उनके शरीर पर कई चोटें थी। उसने बताया कि हमलावर ताबड़तोड़ चाकू से वार कर रहा था। जब हमने और पीड़ितों को देखना शुरू किया तो एक 25 साल की महिला को शरीर और चेहरे पर भी कई चोटें थीं। 50 फुट के रेडियस में कम से कम 6 पीड़ित थे। यह बहुत दर्दनाक दृश्य था। हम अपनी बेटी को खोज रहे थे, यह बहुत ही डरावना था।”
रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) ने पुष्टि की है हमले में ‘कई’ पीड़ित घायल हुए हैं। आपातकालीन सेवाओं ने कहा कि उन्हें दोपहर 1.45 बजे के आसपास बुलाया गया था। 11 एंबुलेंस लाइब्रेरी में पहुँची और 6 लोगों को अस्पताल ले गई।
राजस्थान के दौसा में किसान पंचायत में भाग लेने पहुँचे किसान नेता राकेश टिकैत ने सरकार को अब सीधे तौर पर धमकी दी है। उन्होंने कहा कि अगर किसानों की माँगे नहीं मानी गईं तो 16 राज्यों की बिजली कट जाएगी। शनिवार (मार्च 27, 2021) को भरतपुर में एक बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि अपनी माँगों को लेकर किसान आंदोलन पर डटे रहेंगे। उन्होंने कहा कि अगर किसानों के आंदोलन स्थल की बिजली कटी तो किसानों के खेतों से जाने वाली 16 राज्यों की बिजली लाइन कट जाएगी।
उन्होंने कहा इस समय देश में सरकार नहीं बची है। केंद्र में कोई सरकार नहीं। देश को व्यापारी लोग चला रहे हैं और इन व्यापारियों ने सभी सरकारी संस्थानों को बेच दिया है। टिकैत ने कहा कि देश की जनता अब सब समझ गई है और जनता को उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखाने की जरूरत है।
राकेश टिकैत ने कहा कि जब भी कोई पार्टी विधानसभा में या फिर लोकसभा में पूर्ण बहुमत पाती है तो वह तानाशाह की तरह अपना व्यवहार दिखाती है। उन्होंने कहा कि इस समय केंद्र का रवैया भी एक तानाशाह की ही तरह है। राकेश टिकैत ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार सरकारी संस्थानों को बेचने के बाद अब धीरे धीरे किसानों की जमीन को व्यापारियों को बेचने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा कि देश में बेरोजगारी और भुखमरी बढ़ती जा रही है। युवाओं के भविष्य को लेकर सरकार के पास किसी तरह की योजना नहीं है।
उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “केंद्र में कोई सरकार नहीं है, जबकि कारोबारी देश को चला रहे हैं। उन्होंने सभी सरकारी संस्थाएँ बेच दी हैं और देशवासियों को उन्हें सरकार से बाहर निकाल कर फेंकना चाहिए।” बकौल टिकैत, “कोई भी दल संसद या फिर विधानसभा में पूर्ण बहुमत पाता है, तब वह तानाशाह बन जाता है। केंद्र सरकार हमारी (किसानों की) जमीनों को बेचने की साजिश रच रही है, जबकि आम लोग बेरोजगारी और भुखमरी की मार झेल रहे हैं।”
उन्होंने विपक्ष पर भी हमला किया। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन पाँच से छ: महीने और जारी रहेगा, लेकिन यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि सरकार की नीतियों का कोई विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर एक मजबूत विपक्ष होता और विपक्ष जिंदा होता तो आज किसानों की लड़ाई को आदर्श और मजबूती के साथ संसद में लड़ी जाती। उन्होंने कहा कि नवंबर-दिसंबर में जाकर किसान आंदोलन का फैसला होगा।
दुनिया भर में आप यदि नजर दौड़ाएँ तो आपको एक ऐसी अंधी दौड़ दिखेगी, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता। वहीं जिसे दुनिया भारत के नाम से जानती है, भले वहाँ सुविधाएँ थोड़ी कम हो लेकिन जीवन उल्लास से भरा है। यहाँ लोग जीवन के कठिन से कठिन समय में भी उम्मीद का कोई छोर पकड़े हुए आपको आनंदित दिख जाएँगे जिसका सार-सूत्र यहाँ की माटी में घुले हुए उत्सवों-पर्वों में है। तभी तो सदियों से इस पावन भूमि के बनिस्बत जिसने भी जाना वह खींचा चला आया। कुछ यहाँ से समृद्धि और आनंद लेकर गए तो कुछ इसकी चाह में सदैव यहीं के होकर रह गए। ऐसे कई खास पहलुओं की बात करें तो हमारे पास कहने को बहुत कुछ है लेकिन उसमें भी जो बेहद खास है वह है उत्सवधर्मिता, सांस्कृतिक समृद्धता।
विविधताओं से भरी भारतीय जीवन शैली अपने आप में इतना समृद्ध है कि उसमें जीवन का हर रंग समाहित है। बात जीवन के रंगों की हो, उत्सव की हो, आनंद की हो तो होली से ख़ास क्या होगा? होली कितनी प्राचीन है आज उसके इतिहास में भी उतरेंगे, तलाशेंगे उसमें जीवन के विविध रंग, इसकी पौराणिक मान्यताएँ और सबसे बड़ी बात कितनी गहराई से गुथी है जीवन के उस दर्शन से जो सदियों से मानवमात्र को उल्लासपूर्वक जीने की प्रेरणा दे रही है।
राग-रंग है जीवन का सार (तस्वीर-आनंद निकेतन)
इस साल होली 29 मार्च सोमवार को है जबकि होलिका दहन 28 मार्च को किया जाएगा। आपसी वैरभाव, मतभेद भुलाकर लोग होली खेलते हैं। साल का एक ऐसा दिन जो हर इंसान के जीवन में पुरानी सभी कड़वाहट मिटाकर एक दूसरे को रंग लगाते हुए नई शुरुआत करने का अवसर देता है। रंगों का उत्सव होली, शरद ऋतु के समापन और वसंत ऋतु के आगमन का संकेत है। ब्रजभूमि मथुरा, वृंदावन, नंदगाँव, गोकुल और बरसाना के साथ ही काशी में होली का हुड़दंग हो, रंगभरी एकादशी या चिता-भस्म की होली केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मशहूर है।
बनारस की होली भी बनारस के मिजाज के अनुसार ही अड़भंगी है। दुनिया का इकलौता शहर जहाँ अबीर, गुलाल के अलावा धधकती चिताओं के बीच चिता भस्म की होली होती है।@Ravibhu09 के लेख में जानिए इस प्राचीन परंपरा का धार्मिक इतिहास #ChitabhasmaHolihttps://t.co/Yk9UM6TrCN
अब होली पर बात करते हुए कुछ गहरे आयाम पर भी ले चलता हूँ, अब यह तो आपको पता ही है कि होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है- लेकिन इसके और भी कई नाम है यह नाम ही अपने आप में भारतीय सनातन संस्कृति की तमाम विविधताओं को समेटे हुए हैं। जैसे होली, होलिका या होलाका नाम से वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है।
प्रेम, ताजगी, ऊर्जा के साथ ही रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाई जाती है। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सराबोर कर देते हैं, ढोलक और अन्य वाद्य यंत्रों की ताल पर होली के गीत, कबीरा या जोगीरा गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाने के साथ ही होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर प्यार से गले मिल जाते हैं- वो कहते हैं ना- ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं।’ कहने का मतलब यह है कि यह समरसता का प्रतीक भी है।
संस्कृति के विविध रंग (साभार-मनोज कर)
बात होली की हो और उसमें भी यूपी की न हो यह कैसे हो सकता है। यूपी-बिहार में होली अलग ही लेवल पर होती है लेकिन बाकी राज्य भी कम नहीं है, उनका भी होली मनाने का अपना अलहदा अंदाज है। यह बात आप जानते हैं फिर भी मैं होली में आपको बनारस ले चलता हूँ क्योंकि मेरी होली में बनारस केंद्र में है आप अपने राज्य में मनाए जाने वाले होली के विशेष अंदाज के बारे में जरूर लिखें कमेंट में, आपकी सहभागिता से जानकारी के साथ आपके अपने राज्य के होलियाने मूड का भी पता चलेगा।
खैर, बनारस में होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी से ही हो जाती है। राग-विराग की नगरी काशी की परम्पराएँ भी अपने आप में निराली हैं। रंगभरी एकादशी पर भूतभावन बाबा भोलेनाथ के गौना के दूसरे दिन काशी में उनके गणों के द्वारा चिता भस्म की होली की मान्यता है। रंगभरी एकादशी के मौके पर गौरा को विदा कराकर कैलाश ले जाने के साथ ही भगवान भोलेनाथ काशी में अपने भक्तों को होली खेलने और हुडदंग की अनुमति प्रदान करते हैं। इसके बाद ही काशी होलियाने मूड में आती है। फिर तो अस्सी से लेकर राजघाट तक, क्या गली-क्या घाट चारो तरफ बनारसी मस्ती छा जाती है।
कितनी पुरानी है होली की शुरुआत
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। वैसे होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से भर जाते हैं।
रंग बरसे (तस्वीर साभार-मनोज कर)
होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं। हालाँकि, इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्णिमा के दिन मनाए जाने के कारण पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। कहते हैं, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे ‘मन्वादितिथि’ कहते हैं।
होली से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। भागवत पुराण के अनुसार- प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। जो आज के मुल्तान (पाकिस्तान) पर शासन करता था। ब्रह्मा जी ने उसकी कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया था जिसने उसे एक प्रकार से अमर बना दिया था। अपने बल के घमंड में मदमस्त वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था।
यहाँ तक कि उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद नारायण भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने भगवान की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। इस कथा से आप में से लगभग सभी परिचित होंगे। लेकिन यहाँ इस कथा का मेरे जिक्र करने का उद्देश्य इसमें छिपी एक मर्म समझाना भी है।
सनातन परंपरा में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ है। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।
होलिका दहन
होलिका दहन का पहला काम झंडा या डंडा (रेड़ का पेड़) गाड़ना होता है। पर्व का पहला दिन होलिका-दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं।
होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।
होलिका पर चढ़ाई गई भरभोलिया और होलिका दहन
लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होलिका का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है।
होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा संगीत की लय में नृत्य में डूब जाते हैं।
होलिका दहन का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं।
आध्यात्मिक रूप से होलिका दहन का मकसद पुराने कपड़ों या वस्तुओं को जलाना ही नहीं है, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और उल्लासमय जीवन के रूप में शुरुआत कर सकें।
रंग बरसे, उमंग बरसे
प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली से अगला दिन धूलिवंदन भी कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं।
होली आई रे कन्हाई रंग बरसे (साभार-ट्विटर)
सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। कबीरा और जोगीरा के माध्यम से समाज ने अपने मन की तमाम कुण्ठाओं के विसर्जन और मनोरंजन का भी उपाय कर रखा था।
होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते हैं। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती।
अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं।
नंदगाँव और बरसाने की लट्ठमार होली
कहते हैं मथुरा में नंदगाँव और बरसाना की लट्ठ और ढाल से खेली जाने वाली लट्ठमार होली नहीं देखी तो होली का रंग अधूरा ही रहता है। महिलाएँ लाठियाँ बरसाती हैं, पुरुष लाठियों के वारों को ढालों पर सहते हैं। जितना तेज लाठियों का प्रहार होता जाता है, उतना ही गाढ़ा प्रेम रंग श्रीकृष्ण के गाँव नंदगाँव और राधरानी के गाँव बरसाना के लोगों में गहरा होता चला जाता है।
नंदगाँव और बरसाने की लट्ठमार होली
फुलेरा दूज
हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर साल फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन फुलेरा दूज का पर्व मनाया जाता है। उत्तर भारत की खास पहचान फुलेरा दूज का पर्व मथुरा और वृंदावन में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में भजन-कीर्तन और कृष्ण लीलाओं का आयोजन किया जाता है।
फुलेरा दूज- राधा कृष्ण के मिलन का प्रतीक फूलों की होली
शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी ने इसी दिन फूलों की होली खेली थी। ये फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी। इसे रंगों का त्योहार भी कहते हैं। यह पर्व राधा और कृष्ण के महामिलन के दिन के रूप में भी मनाया जाता है।
मसाने की होली
महादेव की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं। उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं। इसलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।
शिव की नगरी काशी की होली की बात ही निराली है।
जब महादेव महाश्मशान में उतरते हैं तो भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज के गोरी, धन-धन नाथ अघोरी… दिगंबर खेलैं मसाने में होरी।#ChitaBhasmaHolipic.twitter.com/wqQNv3mEeA
परंपराओं के अनुसार, रंगभरी एकादशी के ठीक अगले दिन बनारस के मणिकर्णिका घाट पर भगवान शिव के स्वरुप बाबा मशान नाथ की पूजा कर श्मशान घाट पर चिता भस्म से उनके गण होली खेलते हैं।
काशी मोक्ष की नगरी है और मान्यता है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्यु भी उत्सव है और होली पर चिता की भस्म को उनके गण अबीर और गुलाल की भाँति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का उपक्रम करते हैं।
कहते हैं कि चिता भस्म की होली राग-द्वेष, जीवन-मरण और सुख-दुख से ऊपर उठ कर मनाने का पर्व है और परम्परा भी। काशीवासियों ने इसे न सिर्फ इसे जीवित रखा हुआ है, बल्कि उसे विधिवत सम्पन्न भी करते हैं।
शायद जो इस परंपरा के ऐतिहासिक या आध्यात्मिक महत्त्व से परिचित न हो उसके लिए यह नजारा थोड़ा विचित्र लग सकता है कि एक तरफ चिताएँ जल रही हैं, तो दूसरी तरफ मस्ती में लोग उसी की राख से होली खेल रहे हैं। इस तरह का अद्भुत नजारा दुनिया में काशी के अलावा शायद ही कहीं और देखने को मिले, जहाँ जितना महत्व जीवन को दिया जाता है, उतना ही मृत्यु को भी प्रदान किया जाता है।
होली खेलें मसाने में…..
रंगभरी एकादशी से ही काशी में होली की शुरुआत हो जाती है। हर दिन हर पल उत्सवधर्मी बनारस में इतना कुछ अद्भुत घटित होता रहता है कि उसे तस्वीरों और वीडियो में हम कितना भी संजोना चाहें, कहते हैं अंश मात्र अभिव्यक्त करना मुश्किल हो जाता है। pic.twitter.com/qK68lbMYDu
वाराणसी की यह होली जीवन चक्र से छुटकारा पाने या मोक्ष पाने का नाम भी है। काशी के इस अद्भुत उत्सव में साफ दिखता है कि शंख ,घंटा घड़ियाल, डमरू और हर-हर महादेव की गूँज के साथ बनारस की होली न सिर्फ अद्भुत है, बल्कि कल्पना से भी परे है।
बुढ़वा मंगल
होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं। होली युवाओं के जोश का त्यौहार है लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्ग लोगों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है। बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है। बनारस के इस पारम्परिक मेले से प्रमुख साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी सम्बद्ध रहे हैं।
बुढ़वा मंगल के दिन बनारस में बजड़े पर सजी गीत-संगीत की महफ़िल
हालाँकि, देश में बढ़ते कोरोना वायरस के मामले इस बार पिछले साल की तरह होली के रंग में भंग डालने का काम कर रहे हैं। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर जोर पकड़ती जा रही है, ऐसे में लाजमी है कि होली का रंग पिछले साल की तरह इस साल थोड़ा फीका रह सकता है। फिर भी उत्सवधर्मी देश राज्य सरकारों की इस नई गाइडलाइन के साथ एहतियात बरतने हुए भी आनंद मनाने का अवसर ढूँढ ही लेगा, यह भी इस देश की संस्कृति के मूल में ही है।
चलते-चलते एक जोगीरा की बानगी देखिए, जोगीरा मन के उन भावों को भी व्यक्त करने की कला है जो आमतौर पर मन में होती तो ज़रूर है पर कही नहीं जाती। तो चलिए एक जोगीरा हो जाए—
म्यांमार के विभिन्न कोनों में शनिवार को ‘ऑर्म्ड फोर्सेज़ डे’ के मौके पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर सेना ने ओपन फायरिंग कर दी। घटना में कुल मिलाकर 91 लोग मारे गए। इनमें एक बच्चा भी शामिल है। स्थानीय मीडिया के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के सिर और पीठ पर गोलियाँ मारी गईं। इसी के साथ तख्तापलट के बाद शुरू हुए प्रदर्शनों में मारे गए लोगों की संख्या कम से कम 328 हो गई है।
म्यांगयान के मध्य शहर में थू हाँ ज़ॉ ने कत्लेआम पर कहा “वे हमारे घरों में भी हमें पक्षी या मुर्गियों की तरह मार रहे हैं। लेकिन हम तब तक लड़ेगें जब तक वे झुक नहीं जाते।”
म्यांमार में शनिवार को हुई हिंसा की अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन के अधिकारियों ने निंदा की है। ब्रिटेन के राजदूत डेन चग ने एक बयान में कहा है ”सुरक्षाबलों ने निहत्थे नागरिकों पर गोलियाँ चलाकर अपनी प्रतिष्ठा खो दी है।” अमेरिकी दूतावास ने भी कहा कि म्यांमार में सुरक्षाबल ‘निहत्थे आम नागरिकों की हत्या’ कर रहे हैं। म्यांमार के लिए यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल ने ट्विटर पर कहा, ”76वाँ म्यांमार सशस्त्र बल दिवस आतंक और असम्मान के दिन के तौर पर याद किया जाएगा। बच्चों समेत निहत्थे नागरिकों की हत्या ऐसा कृत्य है जिसका कोई बचाव नहीं है।”
गौरतलब है कि इससे पहले 14 मार्च 2021 को 38 लोगों का सेना की बर्बरता का शिकार होना पड़ा था। तख्तापलट का विरोध करने वालों के ख़िलाफ़ सेना ने अपना खूँखार रूप दिखाते हुए 22 लोगों को गोलियों से भूना था। वहीं 16 लोगों की मांडले (Mandalay) और बागो ( Bago) जैसी जगहों पर संघर्ष में जान गई थी।
बता दें कि म्यांमार में 1 फरवरी की आधी रात तख्तापलट कर दिया गया था। वहाँ की लोकप्रिय नेता और स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और राष्ट्रपति विन मिंट समेत कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके बाद से ही पूरे देश में इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं।
बांग्लादेश की स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगॉंठ। राजधानी ढाका के नेशनल परेड ग्राउंड में राष्ट्रीय दिवस कार्यक्रम। इसमें गुरुवार (26 मार्च 2021) को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बांग्लादेश की अपनी समकक्ष शेख हसीना के साथ मौजूद थे। समारोह को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा था, “यहाँ के लोगों पर पाकिस्तानी सेना के अत्याचार हमें व्यथित कर देता था, कई दिनों तक इन तस्वीरों ने हमें सोने नहीं दिया।”
शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर्रहमान, जिन्हें ‘बंगबंधु’ के नाम से भी जाना जाता है। उनके नेतृत्व में ही बांग्लादेश ने पाकिस्तान के अत्याचार से मुक्ति पाई थी। लेकिन, मुक्ति की यह लड़ाई आसान नहीं थी। अथक संघर्ष और प्रताड़नाओं के एक लंबे सिलसिले के बाद यह मिली थी। इस दौरान पाकिस्तानी सेना ने जिस तरीके से स्थानीय लोगों का दमन किया वह आज भी रूह कँपा देती है।
इन्हीं कहानियों में से एक नीवा पाल की कहानी है। नीवा उन 35 औरतों में से एक हैं जिनके न केवल पतियों को पाकिस्तानी सेना ने मारा बल्कि उनका रेप कर उन्हें प्रताड़ित भी किया। आज नीवा 70 साल पार कर चुकी हैं। लेकिन वह उनकी आँखों से उस समय की तस्वीरें धूमिल नहीं होतीं। वह कहती हैं, “ये बयान नहीं किया जा सकता। मैं कह ही नहीं सकती। तुम्हें मालूम हैं उन्होंने औरतों के साथ क्या किया?”
बकौल नीवा, “बात 25 अप्रैल 1971 की है। पंजाबियों ने हमारे गाँव को घेर लिया था। मैं अपने पति के साथ थी। तीन लोगों ने दरवाजा तोड़कर मेरे पति को उठाया। उस समय मैं दो बच्चों की माँ थी। उन्होंने मुझे कस कर पकड़ा कि मैं भाग नहीं पाई। काश मैं वहाँ से निकल पाती।”
इसी तरह, काली रानी पाल बताती हैं, “पाकिस्तानियों ने मेरे पति को मारा। मैं उस समय प्रेगनेंट थी। उन्होंने मेरे पेट पर मारा। जिसके बाद मुझे एक मृत बच्चे को जन्म देना पड़ा।” सुजोला रानी पाल भी एक ऐसी वीरांगना हैं जिन्हें आज भी अपने लिए पहचान नहीं मिल पाई है। वह एक नौकर के तौर पर घरों में काम करती हैं। वह बताती हैं, “नरसंहार के कुछ दिन बाद का समय बहुत मुश्किल था। हमें कई दिन बिना खाने के रहना पड़ा। हम अपने घरों में खाना नहीं बना सकते थे।”
स्थानीय लोग 1971 के उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे अटायकुला में 6 नावों पर बैठकर 150 पाकिस्तानी नदी पार कर आए और जोगेंद्रनाथ पाल के आँगन में 60 पुरुषों को खड़ा किया। इसके बाद सारे पुरुषों को दो पंक्ति में बाँटा गया। एक जो अपना पैसा और सोना मर्जी से देने को तैयार हो गए और दूसरे वो जिन्होंने मना कर दिया।
सेना ने पहले उन पर गोली चलाई जिन्होंने सब देने से मना किया फिर उन पर जो अपनी जान बचाने को सब देने को तैयार हो गए थे। 60 पुरुषों में से कुल 8 बचे। लेकिन चोटें उनकी भी कम नहीं थी। बाकी सारे शवों को जोगेंद्रनाथ के घर के पास दफनाया गए। शायद तब संभव नहीं था कि हिंदू रीति-रिवाजों से उनका दाह संस्कार हो।
प्रद्युत्त पाल उस नरसंहार के समय जीवित बचे लेकिन उन्होंने अपने पिता, चाचा और तीन भाई सबको खो दिया। गोली उन्हें भी लगी थी, लेकिन बहुत हल्के से। प्रद्युत्त कहते हैं, “सैंकड़ों गोलियाँ मेरे सिर के ऊपर से गईं। घायल मेरे ऊपर गिर रहे थे। वह मुझे चुप रहने को कह रहे थे। मैं देख पा रहा था छोटो जमुना खून से लाल हो गई थी। वहाँ बस खून ही खून था।”
स्थानीय बताते हैं कि पुरुषों को मारने से पहले पाकिस्तानी सेना ने औरतों को उनसे अलग कर दिया था। पुरुष जानते थे कि हमारी कोई महिला नहीं बचेगी। लेकिन खुद को बचाने के लिए कई महिलाओं ने आत्महत्या कर ली और कई लड़कियाँ कुँवारी भी मर गईं।
कोहिनूर विला
अटायकुला गाँव की तरह देशवाली पारा के कुश्तिया में बना कोहिनूर विला भी नरसंहार की तमाम कहानियाँ समेटे हुए है। स्वतंत्रता सेनानी रफीकुल इस्लाम कहते हैं कि 1971 में जो यहाँ पर हुआ वह बताने योग्य नहीं है। जानकारी के अनुसार ये घर रबिउल हक मलिक और अरशद हक नाम के दो भाइयों का था। 1947 के विभाजन के बाद दोनों पश्चिम बंगाल के हुगली के पंचपीरतला से कुशतिया आए थे और अपना बेकरी का कारोबार करते थे।
रबिउल और अरशद का भतीजा बताता है कि कैसे उनके पूरे मलिक परिवार को मारा गया। कुल 16 लोग उस नरसंहार में मरे। हलीम के अनुसार, कुछ की हत्या कर दी गई और अन्य को काट दिया गया। हत्यारों ने सबको मारते हुए एक कैसेट प्लेयर पर जोर से संगीत बजाया ताकि पड़ोसियों को पीड़ितों की चीख की आवाज सुनाई न दे। अगले दिन किसी का शव बाथरूम में, किसी का किचन में तो किसी का घर के कॉरिडोर में पड़ा मिला।