तब कॉन्ग्रेस की सरकार थी। मतलब ‘लोकतंत्र’ था। फिर भी ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ और ‘फ्रीडम ऑफ टैक्स चोरी’ जैसे ‘मूलभूत अधिकारों’ को कुचला गया था। देश में अंधेरा था… क्योंकि अनुराग कश्यप को मनमोहन सरकार ने 2013 में घेर लिया था।
55 लाख रुपए की टैक्स चोरी या छुपाने (जो भी तकनीकी शब्द लिखिए) के मामले में अनुराग कश्यप को श्रीलंका से शूटिंग छोड़ भारत आने का आदेश दिया गया था। 2013 का वो दिन लोकतंत्र के इतिहास का काला दिन था… आपातकाल की रातों से भी ज्यादा काला!
Director Anurag Kashyap's bank accounts have been sealed following legal issues with the service tax department
खैर! 8 साल बाद 2021 आ गया है। ‘फ्रीडम ऑफ टैक्स चोरी’ निरंतर जारी है। बस अब ‘चोर’ बड़े हो गए हैं। 55 लाख रुपए वाले ‘चोर’ अब करोड़ों में खेलने लगे हैं। अब लोकतंत्र भड़भड़ा कर आए दिन गिर जाता है।
टैक्स ‘चोरों’ के समर्थन में नेता खुलेआम उनकी वीरता और उनके नायाब और दुर्लभ कैरेक्टर के बारे में कविता लिखते हैं। 2 लाइन की कविता से मन नहीं भरता है तो फिर 10 लाइन का महाकाव्य भी लिख डालते हैं। अपनी पार्टी का तो पता नहीं लेकिन देश भर लोकतंत्र के खंभों को इन्हीं नेताओं ने बचा रखा है – क्योंकि इनके अनुसार ‘किसानों’ ने आत्मरक्षा में दिल्ली पुलिस पर हमला किया था।
4.False leads and stories will be planted via sources for next few weeks
5.Godi Anchors will create Naxal/Pakistan connection
6.Very delayed & voluminous chargesheet ( total waste of time & paper)
7.Acquittal from Court ( won't be covered in Media) 2/n
लोकतंत्र में जनता सब देखती है, देख रही है। सोशल मीडिया पर जवाब भी देती है। जो टैक्स चोर होते हैं, वो जनता के ही पैसे को चुराते हैं। इसलिए जनता कविता लिखने वाले नेताओं और टैक्स चोरों के साथ मिल कर ‘मर गया लोकतंत्र’ के गीत गाने वालों को जवाब दे रही है। पढ़ा जाए 2-4 मस्त जवाब… अंग्रेजी में इसको “befitting reply” कहते हैं।
नोट: जहाँ-जहाँ ‘चोर’ लिखा गया है, उसे कृपया ‘टैक्स चोरी के आरोपित’ पढ़ें। वाक्य को छोटा और सहज करने के लिए ऐसा लिखा गया। कृपया इसका कोई अन्य आशय न निकालें।
पीएम नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया पर बहुत बड़े फैन बेस होने के लिए जाने जाते हैं। 2017 में ही वह वैश्विक स्तर पर फेसबुक पर शीर्ष पर चल रहे नेता बन गए, पिछले साल, मोदी ट्विटर पर 50 मिलियन से अधिक फॉलोवर्स के साथ और तीसरे वैश्विक नेता के रूप में स्थापित होने वाले पहले भारतीय बन गए थे। हाल ही में कोलकाता में पीएम मोदी के उतरने की फोटो वायरल हुई, जिसे 24 घंटे से भी कम समय में फेसबुक पर 1 मिलियन से ज्यादा लाइक मिले। अब, ताजा आँकड़ों से पता चलता है कि उनके सोशल मीडिया फैन-बेस के समान ही, टेलीविजन पर पीएम मोदी का प्रभाव भी कई गुना बढ़ गया है।
ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (BARC) ने 2019-2020 की सालाना टीवी व्यूअरशिप रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल भारत में टेलीविजन पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले व्यक्ति रहे हैं। चाहे वो कोविड-19 महामारी के दौरान दिए गए मोदी के संबोधन हो या कोविड वैक्सीन निर्यात करने में देश की अग्रणी भूमिका, लाल किले से दिया गया भाषण या किसान आंदोलन पर दिए गए भाषण हों। यह तमाम बातें इस रिपोर्ट में शामिल हैं।
प्रधानमंत्री मोदी के इम्पैक्ट को समझाते हुए BARC के इस रिपोर्ट में कहा गया है, “चाहे उनके मीडिया को दिए इंटरव्यू हों, वैश्विक कार्यक्रमों में दिए गए उनके भाषण, देश के लिए संबोधन हो और यहाँ तक कि डिस्कवरी पर दिखाया गया वाइल्डलाइफ एडवेंचर शो हो। हर तरह के कंटेंट ने उनकी व्यूअरशिप को लेकर नए रिकॉर्ड बनाए हैं।”
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2019 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिए गए भाषण की तुलना में पिछले साल लालकिले पर दिए गए उनके लगभग 2 घंटे के भाषण की व्यूअरशिप 40 फीसदी ज्यादा थी। उनके इस भाषण को 133 मिलियन (13.3 करोड़) दर्शकों ने देखा था। इसी तरह 24 मार्च, 2020 को पहले लॉकडाउन की घोषणा वाले भाषण को जितने व्यूइंग मिनट मिले थे, उतने तो उनके किसी भी संबोधन को नहीं मिले थे।
BARC की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, “हर बार जब भी प्रधानमंत्री मोदी के कोरोनावायरस संबंधी भाषण हुए, तब जनरल एंटरटेनमेंट चैनल्स (जीईसी), फिल्मों और बच्चों के दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट आई।” यहाँ तक कि 9 मिनट बत्ती बंद कर दीया या मोमबत्ती जलाने के उनके राष्ट्रव्यापी आह्वान ने भी जीईसी टीवी व्यूअरशिप में 60 फीसदी की गिरावट ला दी थी।
‘एक और नरेन’: पीएम मोदी के जीवन पर बनेगी एक और फिल्म
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के बीच आज उनके जीवन पर बनने वाली एक और फिल्म की घोषणा हुई है। इस फिल्म में फिल्म अभिनेता गजेंद्र चौहान मुख्य भूमिका में होंगे। गजेंद्र चौहान ने बीआर चोपड़ा की महाभारत में युधिष्ठिर की भूमिका निभाई थी। अब वह प्रधानमंत्री मोदी पर बनने वाली फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने जा रहे हैं। फिल्म का नाम ‘एक और नरेन‘ होगा। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस फिल्म में प्रधानमंत्री मोदी और स्वामी विवेकानंद के जीवन चरित्रों को एक साथ दिखाया जाएगा।
फिल्म निर्देशक मिलन भौमिक ने गुरुवार (मार्च 4, 2021) को मीडिया को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि फिल्म ‘एक और नरेन’ की कहानी में दो किस्से होंगे। एक में नरेंद्रनाथ दत्त के रूप में स्वामी विवेकानंद के कार्य और जीवन को दर्शाया जाएगा जबकि दूसरे में नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को दिखाया जाएगा। भौमिक ने कहा कि फिल्म में दो हस्तियों के जीवन को पेश किया जाएगा। विवेकानंद ने अपना जीवन वैश्विक भाई-चारे के संदेश के प्रसार में समर्पित किया था। उसी तरह PM मोदी का जीवन भी राष्ट्र को समर्पित रहा है।
भौमिक ने कहा कि दूसरी शख्सियत नरेंद्र मोदी हैं जोकि भारत को एक नई ऊँचाई पर ले गए और वह राजनीति क्षेत्र के सबसे मशहूर नेताओं में शुमार हैं। इस अवसर पर, अभिनेता गजेंद्र चौहान ने कहा, “वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पिछले 20 वर्षों से निजी तौर पर जानते हैं। एक कलाकार के तौर पर ऐसी शख्सियत का किरदार निभाना उनके लिए बड़ी उपलब्धि है।”
LGBT एक्टिविस्ट दिव्या दुरेजा पर हाल ही में एक योग शिक्षिका ने बलात्कार का आरोप लगाया है। दिव्या ने एक टेड टॉक (Ted Talk) के दौरान दावा किया था कि वह पेनिट्रेटिव सेक्स (penetrative sex) में असमर्थ है।
दिल्ली के कमला नेहरू कॉलेज में 2018 में यह टेडएक्स (TEDx) इवेंट हुआ था। उसने कहा था कि वह 25 की है और कभी सेक्स नहीं किया है, लेकिन इन्टमसी को महसूस करती है। उसने अपने फिजिकल इन्टमसी को लेकर बात की थी जो उसके अन्य महिला और पुरुष के साथ थे।
गौरतलब है कि इंस्टाग्राम पर Elodie नामक महिला ने दुरेजा पर रेप का आरोप लगाते हुए नॉर्थ गोवा के पर्नेम पुलिस थाने में FIR दर्ज कराई थी। इंस्टाग्राम पर अपना दुःख बयाँ करते हुए उन्होंने लिखा, “इसके बारे में लिखना काफी कठिन और दर्द भरा है। यहाँ तक कि ये शर्मिंदगी भरा भी है, इसके बावजूद भी कि मुझे पता है कि जो भी हुआ, उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ। मेरा शोषण करने वाली की लोकप्रियता को देखते हुए काफी समय तक हिचकिचाने के बाद मैं समुदाय के लिए इसे अच्छा समझती हूँ कि जो भी हो, उसके बारे में मैं बताऊँ। इसके लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन, मैं दोनों माध्यमों का इस्तेमाल करूँगी।”
पीड़िता ने बताया था कि मानसिक स्वास्थ्य और LGBTQ एक्टिविस्ट होने के कारण वह दिव्या से खासी प्रभावित थी। यही कारण है कि दिव्या की लंच की पेशकश से वह मना नहीं कर सकती। Elodie का कहना है कि वो लंच के लिए दिव्या को लेने अश्वेम स्थित ‘होटल सी व्यू रिसोर्ट’ गईं, जहाँ दिव्या ने उन्हें अपने होटल के कमरे में बुलाया और बालों को ठीक करने को लेकर मदद माँगी।
पीड़िता ने लिखा था, “उसने मुझे मेरे पीठ के दर्द को ठीक करने का झूठा वादा किया और इसी बहाने उसने मुझे ड्रग्स देकर अपने कमरे में 6 घंटों तक बंद रखा। साथ ही उसने भूत-प्रेतों से बात करने वाली एक तंत्र क्रिया करने का भी ढोंग रचाया। उसने दवा किया कि हम दोनों एक-दूसरे से पिछले जन्म से ही जुड़े हुए हैं और हमारा मिलना लिखा हुआ था। और इस तंत्र क्रिया के बाद दोनों हमेशा के लिए साथ हो जाएँगे। आप जितना सोच सकते हैं, मुझे उससे कहीं ज्यादा विक्षिप्तता महसूस हुई। उसने मुझे बिना रुके 1 लिटर पानी पिला डाला। वो कह रही थी कि मुझे नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाने के लिए ये ज़रूरी है।”
FIR में कहा गया है कि दिव्या ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट्स के भीतर अपनी उँगलियाँ घुसा डालीं और उसके शरीर पर जगह-जगह किस करने लगी। Elodie ने एक अंग्रेजी कविता भी पोस्ट की, जिसमें दिव्या ने लिखा कि दोनों हमेशा के लिए एक हो जाएँगे, यही भाग्य में लिखा है। पीड़िता ने लिखा कि काफी देर खड़े रखने के बाद दिव्या ने उन्हें बिस्तर पर भेजा।
पीड़िता के अनुसार, “उसने मेरे वजाइना में हाथ घुसा दिया। वो गहरी और गहरी घुसाती चली गई। मुझे खासा दर्द हो रहा था लेकिन वो कह रही थी कि वो एक पेड़ रोप रही है। जब मैं दर्द से चिल्ला कर वहाँ से जाने के लिए कहने लगी तो उसने कहा कि आओ प्यार करें। काफी देर बाद उसने कहा कि अब आत्मा ने आदेश दिया है कि वो जा सकती है। कई वेटरों ने भी ऐसा सुना और पुलिस के सामने बताया। दिव्या को फिर कस्टडी में लिया गया।”
पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार और गैंगस्टर से नेता बने मुख्तार अंसारी ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यूपी की योगी आदित्यनाथ की सरकार को उन्हें रूपनगर जेल से उत्तर प्रदेश के बाँदा जेल में ट्रांसफर करने की माँग करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है। वहीं यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर पंजाब की अमरिंदर सरकार और रूपनगर जेल प्रशासन को निर्देश देने की माँग की कि मऊ के विधायक माफिया मुख़्तार अंसारी की हिरासत जल्द से जल्द जिला जेल यूपी के बाँदा जेल को सौंप दी जाए।
न्यायमूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के समक्ष एडवोकेट दवे ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर यूपी सरकार की याचिका के सुनवाई योग्य होने का विरोध किया#MukhtarAnsariCase#SupremeCourthttps://t.co/Sad71cLGEc
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति आरएस रेड्डी की पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए कहा है कि वह उत्तर प्रदेश सरकार और मऊ के विधायक अंसारी की याचिकाओं पर फैसला सुनाएगी। वहीं योगी सरकार के डर से मुख्तार अंसारी ने अपने खिलाफ मामलों को यूपी के बाहर स्थानांतरित किए जाने की माँग की है। सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें दी। वहीं अंसारी की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलीलें पेश की।
सुनवाई के दौरान, सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने जेल नियमों का हवाला देते हुए कहा कि भले ही राज्य के पास मौलिक अधिकार नहीं है… यह बात गलत है। राज्य पीड़ितों के अधिकारों का समर्थन कर सकता है। राज्य हमेशा पीड़ित और समाज की भूमिका का निर्वहन करता रहा है। माफिया मुख्तार अंसारी ने जेल नियमों का उल्लंघन किया है। ऐसे में पीड़ितों के अधिकार के साथ ही राज्य के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। अपराधी को किसी भी सूरत में निष्पक्ष सुनवाई बाधित करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।
वहीं पंजाब सरकार और माफिया डॉन मुख़्तार अंसारी की तरफ से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलीलें पेश करते हुए कहा कि विपक्ष की एक पार्टी से जुड़े होने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। मैं अंसारी से जुड़े मामलों को उत्तर प्रदेश से बाहर स्थानांतरित करने का अनुरोध करता हूँ। इन्हें दिल्ली स्थानांतरित किया जा सकता है।
वहीं पंजाब सरकार की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने कहा कि यूपी में मुख़्तार अंसारी के खिलाफ पिछले 14-15 वर्षों से आपराधिक सुनवाई चल रही है। उत्तर प्रदेश की रिट याचिका सुनवाई के लायक नहीं है और इसको खारिज कर दिया जाना चाहिए।
गौरतलब है कि मुख़्तार अंसारी उगाही के एक कथित मामले में जनवरी 2019 से ही पंजाब के रूपनगर जिला जेल में बंद है। वह उत्तर प्रदेश में कई गंभीर आपराधिक मामलों में भी आरोपित है। योगी सरकार उन मामलों में सुनवाई के लिए कई बार यूपी पुलिस को पंजाब रवाना कर चुकी है लेकिन हर बार पंजाब की अमरिंदर सरकार अंसारी को बचाने के लिए कोई न कोई पैंतरे अपनाती रही है।
फिल्म डायरेक्टर अनुराग कश्यप, अभिनेत्री तापसी पन्नू सहित अन्य के ठिकानों पर आयकर विभाग (IT dept) की छापेमारी में बड़े पैमाने पर टैक्स चोरी पकड़े जाने की बात सामने आ रही है। आईटी डिपार्टमेंट की छापेमारी लगातार दूसरे दिन गुरुवार (4 मार्च 2021) को भी जारी रही।
चार शहरों- मुंबई, पुणे, दिल्ली और हैदराबाद के 28 ठिकानों पर कार्रवाई हुई है। सीबीडीटी ने बताया है कि आयकर विभाग सर्च और सर्वे ऑपरेशंस अंजाम दे रहा है। इसकी शुरुआत मुंबई में 2 फिल्म निर्माण कंपनियों, एक अभिनेत्री और दो टैलेंट मैनेजमेंट कंपनियों से 3 मार्च को हुई थी।
I-T Dept is carrying out search & survey operations which started on Mar 3 on 2 leading film production companies, a leading actress and two talent management companies in Mumbai. Search operation is being carried out at Mumbai, Pune, Delhi and Hyderabad: Spox, CBDT
सीबीडीटीका कहना है कि 5 करोड़ रुपए कैश पेमेंट लेने की रसीदें तापसी पन्नू के घर से बरामद हुई हैं। कथित तौर पर टैक्स बचाने के लिए यह पेमेंट कैश के तौर पर ली गई। यही नहीं फिल्म प्रोडक्शन हाउस फैंटम फिल्म्स ने बॉक्स ऑफिस पर जितने कलेक्शन की बात कही थी, उससे ज्यादा रकम की जानकारी मिली है।
कंपनी के अधिकारी 300 करोड़ रुपए का हिसाब नहीं दे पाए हैं। यह भी बताया है कि फैंटम फिल्म्स की हिस्सेदारी बेचने के लिए उसका अंडरवैल्यूएशन किया गया। फैंटम फिल्म्स को 2018 में डिजॉल्व कर दिया गया था। शेयरों की कीमत कम दिखाई और लेनदेन में गड़बड़ी की। विभाग के अनुसार कुल 350 करोड़ की टैक्स अनियमितता से यह मामला जुड़ा हुआ है।
छापे के दौरान फर्जी खर्च के भी सबूत मिले हैं। इस दौरान 20 करोड़ की टैक्स चोरी का मामला सामने आया है। करीब इतनी ही टैक्स चोरी के दायरे में तापसी भी हैं। जाँच चलने तक 7 बैंक लॉकर्स के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई है।
आयकर विभाग की कार्रवाई की गाज अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू के अलावा विकास बहल और मधु मंटेना पर भी गिरी है। अनिल अंबानी की रिलायंस एंटरटेनमेंट के सीईटो शुभाशीष सरकार, अफसर जैदी (CEO Exceed) और विजय सुब्रमण्यम (CEO Kwan talent management agency) भी कार्रवाई की जद में हैं।
बुधवार को अधिकारियों ने छापेमारी के दौरान इन फ़िल्मी हस्तियों से पूछताछ करते हुए कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और दस्तावेजों की जाँच की थी। विभाग के अधिकारी जानना चाहते थे कि आखिर टैक्स चोरी की रकम का बँटवारा कैसे हुआ। इससे क्या-क्या खरीदा गया और कहीं इस रकम को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए देश से बाहर तो नहीं भेजा गया।
अधिकारियों ने जाँच के दौरान कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों को कब्जे में लिया है। कहा जा रहा है कि तापसी और अनुराग के घर प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी छापा मार सकता है। संभव है कि अनुराग और तापसी की व्हॉट्सएप चैट भी खँगाली जाए और जिन लोगों ने उनकी फिल्मों में निवेश किया उनसे भी पूछताछ हो।
इस रेड की खबर आते ही सोशल मीडिया पर हड़कंप मच गया। वहीं कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने इस कार्रवाई को केंद्र सरकार का बदला कहा। जबकि केंद्र की मानें तो आईटी रेड कानून के मुताबिक हुई है।
गौरतलब है अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू पहले ऐसे बॉलीवुड के जाने-माने चेहरे नहीं है जिन पर आईटी विभाग ने शिकंजा कसा हो। इससे पूर्व एकता कपूर के घर पर भी आईटी ने रेड मारी थी। ये मामला शूटआउट एट वडाला के रिलीज से पहले का है। इसी प्रकार कटरीना कैफ के घर पर भी साल 2011 में छापा पड़ा था। प्रियंका चोपड़ा के घर भी 2011 में छापेमारी हुई थी। इसी तरह 90 के दशक की मशहूर अदाकारा माधुरी दीक्षित के घर भी सालों पहले आईटी रेड पड़ी थी।
पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव ऐलान के साथ ही पश्चिम बंगाल में सियासी गर्मी बढ़ गई है। अलग-अलग दलों के नेता एक दूसरे के ऊपर जमकर हमले कर रहे हैं, इन सबके बीच टीएमसी के एक विधायक हमीदुल रहमान का धमकी भरा बयान चर्चा में है जिसके खिलाफ बीजेपी के बड़े नेताओं ने चुनाव आयोग से मिलकर शिकायत की है। इसके लिए टीएमसी विधायक रहमान ने धमकी भरे अंदाज में क्या कुछ कहा था उसे जान लेते हैं।
टीएमसी विधायक हमीदुल रहमान ने खुले मंच से विवादित भाषण के क्रम में वोटरों को खुलेआम धमकी देते हुए कहा कि जिसका नमक खाते हैं, उसकी नमकहरामी नहीं करते हैं। चुनाव बाद हम उन लोगों से निपट लेंगे, जो हमें धोखा देंगे। बेईमान लोगों के साध खेला होबे। हम सभी चाहते हैं राज्य में ममता बनर्जी एक बार फिर मुख्यमंत्री बनें।
A BJP delegation reaches the Election Commission office in New Delhi to lodge a complaint against TMC MLA Hamidul Rehman over his remark at a public meeting made on March 2. pic.twitter.com/TVymusLmvR
दरअसल, टीएमसी विधायक हमीदुल रहमान ने कहा, “हमारे पूर्वजों का कहना है कि जिसका नमक खाते हैं उसके साथ नमकहरामी नहीं करते हैं। चुनावों के बाद, हमें उन लोगों से मिलना होगा जो हमें धोखा देंगे। बेईमान लोगों के साथ खेला होबे (खेल खेला जाएगा)। हम सभी दीदी को हमारे सीएम के रूप में देखना चाहते हैं।” यहाँ पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का लम्बा इतिहास देखते हुए लोग ‘खेला होबे’ को किसी संभावित हिंसा भरे धमकी के रूप में देख रहे हैं।
टीएमसी विधायक ने इसके साथ ही कहा, “इस महागठबंधन (कॉन्ग्रेस, लेफ्ट) को वोट देना, बीजेपी को रास्ता देने के समान है। अपना वोट खराब मत करना। हर घर ने दीदी (ममता बनर्जी) के विकास के विज़न को महसूस किया है।”
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने टीएमसी विधायक हमीदुल रहमान के खिलाफ चुनाव आयोग पर शिकायत दर्ज कराई है। भाजपा के धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, ओम पाठक, नीरज कुमार और डॉ संजय मयूख आदि कई बड़े नेता शिकायत दर्ज कराने शाम करीब पाँच बजे चुनाव आयोग के पास पहुँचे थे।
A BJP delegation met EC today. Term of 125 municipal corps in West Bengal incl Kolkata Municipal Corp needed a year ago. But State Govt appointed TMC leaders as administrators of these local bodies. These administrators should be removed to ensure free& fair polls: B. Yadav, BJP pic.twitter.com/xeuOOlxzX8
बंगाल बीजेपी के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ममता बनर्जी के विधायक की धमकियों का जवाब देते हुए कहा, “हुबली में ममता बनर्जी ने कहा कि हम तो खेला करेंगे, खेला क्या होता है मतलब पोलिंग बूथ पर कब्जा, मतदाताओं को डराना, निष्पक्ष चुनाव न होना। ये सब खेला करने की कोशिश टीएमसी करना चाहती है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने सारी जानकारियों से चुनाव आयोग को अवगत कराया।”
हुबली में ममता बनर्जी ने कहा कि हम तो खेला करेंगे, खेला क्या होता है मतलब पोलिंग बूथ पर कब्जा, मतदाताओं को डराना, निष्पक्ष चुनाव न होना। ये सब खेला करने की कोशिश TMC करना चाहती है और इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने सारी जानकारियों से चुनाव आयोग को अवगत कराया: कैलाश विजयवर्गीय pic.twitter.com/ODaTV1hsaf
यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि इस तरह के बयान सिर्फ टीएमसी की तरफ से ही नहीं दिए जा रहे हैं। सभी दलों के नेता समय-समय पर ऐसे जहरीले बोल बोल रहे हैं। लेकिन जानकार की माने तो यह कहा जा रहा है कि ममता बनर्जा को लगता है- इस दफा चुनावी मुकाबले में सिर्फ बीजेपी है। लेफ्ट और कॉन्ग्रेस हारी हुई जंग लड़ रहे हैं। लिहाजा बीजेपी और टीएमसी के कार्यकर्ताओं के बीच एक तरफ सड़क पर झड़प होती है तो नेता जुबानी जंग के जरिए एक दूसरे को नीचा दिखाने में जुट जाते हैं। इसके अलावा भी हम सभी बंगाल की राजनीति में हिंसा की खबरें लम्बे समय से देखते सुनते आ रहे हैं। ऐसे में किसी भी तरह की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों पर आठ चरणों में विधानसबा चुनाव होंगे। पहले चऱण के मतदान 27 मार्च को शुरू होगा। इसके बाद 1 अप्रैल, 6 अप्रैल, 10 अप्रैल, 17 अप्रैल, 22 अप्रैल, 26 अप्रैल और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी। नतीजे 2 मई को घोषित किए जाएँगे।
फ्रांसीसी चर्चों में शोषण के शिकार हुए बच्चों की संख्या 10 हजार के करीब हो सकती है। यह आशंका चर्चों में बाल शोषण के मामलों की जाँच के लिए गठित स्वतंत्र आयोग के अध्यक्ष जीन मार्क सेवे (Jean-Marc Sauve) ने जताई है।
इस जाँच आयोग का गठन कैथोलिक चर्च की ओर से किया गया था। सेवे ने मंगलवार को कहा कि 1950 से अब तक कम से कम 10 हजार बच्चे चर्च में शोषण का शिकार हो सकते हैं।
रिपोर्टों के अनुसार सेवे ने कहा कि पिछले साल जून में तीन हजार बच्चों के पीड़ित होने का अनुमान लगाया गया था। यकीनी तौर पर असल पीड़ितों के मुकाबले यह संख्या काफी कम है। आयोग के कार्यों के बारे में जानकारी देते हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा, “आशंका है कि यह संख्या कम से कम 10 हजार हो सकती है।”
जून 2019 में एक हॉटलाइन शुरू की गई थी ताकि पीड़ित और चश्मदीद मामलों की जानकारी दे सकें। बताया जा रहा है कि शुरू होने के बाद 17 महीनों में इस नंबर पर 6,500 कॉल आए। सेवे ने कहा कि आयोग के समक्ष सवाल यह था कि कितनी संख्या में पीड़ित आगे आएँगे और अपने साथ हुए शोषण के बारे में बताएँगे। उन्होंने कहा, “हमारे सामने बड़ा सवाल यह है कि कितने पीड़ित आगे आएँगे? क्या यह 25 फीसदी होगा? 10 फीसदी? 5 फीसदी या उससे भी कम?”
2018 में चर्चों में बच्चों के शोषण के लगातार मामले सामने आने के बाद उसी साल नवंबर में इस स्वतंत्र जाँच आयोग का गठन किया गया था। बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ फ्रांस की सहमित से इसका गठन किया गया। इस फैसले को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली थी। कुछ लोगों ने इसका समर्थन करते हुए पीड़ितों से आगे आकर आपबीती बताने की अपील की थी। वहीं, कुछ लोग इसकी सफलता को लेकर सशंकित थे।
20 सदस्यीय आयोग के सदस्य कानूनी, शैक्षणिक, चिकित्सकीय सहित अन्य पृष्ठभूमि से चुने गए थे। आयोग को 2020 के अंत तक अपनी अंतिम रिपोर्ट देनी थी। लेकिन, अब इसकी नई मियाद सितंबर 2021 तय की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) की कंटेंट हेड अपर्णा पुरोहित की याचिका पर सुनवाई की। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अपर्णा ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस दौरान अदालत ने अश्लीलता और पोर्नोग्राफी दिखाए जाने की बात कहते हुए कहा कि ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर रिलीज से पहले कंटेंट की स्क्रीनिंग होनी चाहिए।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा, “वास्तव में कुछ प्लेटफॉर्म अश्लीलता भी दिखाते हैं।” पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को नए सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 को प्रसारित करने का निर्देश भी दिया। इसे पिछले सप्ताह अधिसूचित किया गया था।
सुनवाई के दौरान अपर्णा पुरोहित की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह चौंकाने वाला मामला है। याचिकाकर्ता अमेजन में काम करती हैं फिर भी उन्हें निर्माता और अभिनेता के साथ आरोपित बनाया गया है। जबकि कंपनी अभियुक्त नहीं है। रोहतगी ने कहा कि ऐसा करने वाले लोग प्रचार के इच्छुक हैं।
पीठ ने पूछा, “पारंपरिक फिल्म देखना पुराना हो गया है। इंटरनेट पर सिनेमा देखना आम हो गया है। हमारा सवाल यह है कि इनको स्क्रीन किया जाए?” जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि ओटीटी प्लेटफार्मों के कंटेंट की निगरानी के लिए नियम बनाए गए हैं। इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया जाएगा।
पीठ ने इन नियमों को प्रसारित करने का निर्देश देते हुए कहा, “हमारा विचार है कि कुछ स्क्रीनिंग होनी चाहिए। वास्तव में कुछ प्लेटफॉर्म पोर्नोग्राफ़ी भी दिखाते हैं।”
इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 25 फरवरी को 20 पन्नों के आदेश में कहा था कि कई फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं के नाम का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानजनक तरीके से दिखाया गया है। कोर्ट ने राम तेरी गंगा मैली, सत्यम शिवम सुंदरम, पीके, ओह माय गॉड जैसी कुछ फिल्मों के नाम भी लिए थे। साथ ही कहा था, “ऐतिहासिक और पौराणिक व्यक्तित्वों (पद्मावती) की छवि को नष्ट करने का प्रयास किया गया है। धन कमाने के लिए बहुसंख्यक समुदाय की आस्थाओं और प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है (गोलियों की रासलीला राम लीला)।” हाई कोर्ट ने कहा था कि हिंदी फिल्म उद्योग में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है और समय रहते इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले अमेजन प्राइम ने ‘तांडव’ को लेकर माफी माँगी थी। आधिकारिक बयान में कहा गया था, “अमेजन प्राइम वीडियो को अत्यंत खेद है कि दर्शकों को हाल ही में लॉन्च की गई काल्पनिक सीरीज तांडव के कुछ दृश्य आपत्तिजनक लगे। किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा ध्येय नहीं था, और इस बात से अवगत कराए जाने पर, उन आपत्तिजनक दृश्यों को या तो हटा दिया गया या फिर संपादित किया गया। हम अपने दर्शकों की विविध आस्थाओं का सम्मान करते हैं और उन दर्शकों से क्षमा याचना करते हैं, जिन्हें ठेस पहुँची है।”
इस वेब सीरिज को लेकर सोशल मीडिया में दर्शकों ने सीधे आरोप लगाया था कि इसमें भगवान शिव और भगवान राम का अपमान किया गया है। इसके बाद इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से ‘तांडव’ को बैन करने की अपील की गई थी। 17 जनवरी 2021 (रविवार) को केंद्रीय सूचना मंत्रालय ने अमेजन प्राइम वीडियो के अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था।
विवाद के बाद वेब सीरिज के मेकर्स ने भी स्टेटमेंट जारी कर माफी माँगी थी और कहा था कि वे जल्द ही सीरीज में बदलाव करेंगे। सीरीज के डायरेक्टर अली अब्बास जफर ने ट्वीट कर कहा था, “हमारे मन में देश के लोगों की भावनाओं के प्रति बहुत सम्मान है। हमारा इरादा किसी व्यक्ति, जाति, समुदाय, नस्ल, धर्म, धार्मिक समुदाय, राजनीतिक दल, जीवित या मृत व्यक्ति की भावनाओं को चोट पहुँचाना नहीं था। तांडव के कास्ट और क्रू ने सीरीज के कंटेंट में बदलाव करने का फैसला लिया है।” हाल ही में इसको लेकर अमेजन अमेज़न प्राइम की नेशनल हेड अपर्णा पुरोहित से यूपी पुलिस ने लंबी पूछताछ की थी।
जब से नरेंद्र मोदी, 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आए, वामपंथी, कॉन्ग्रेसी समूहों से लेकर पूरे विपक्ष ने उनके खिलाफ लगातार घृणा और आक्रोश का एक खतरनाक चक्रव्यूह रचा है, जिसका समापन अक्सर हिंसा के रूप में होता आया है। इसी कड़ी में ताजा घटनाक्रम तथाकथित किसानों के विरोध के रूप में जारी है, जो केंद्र सरकार द्वारा तीन कानूनों को पारित करने के बाद भड़क गया था या सुनियोजित रूप से भड़काया गया था। वैसे तीनों कृषि कानूनों की सच्चाई यही है कि वास्तव में यह कानून किसानों को लाभान्वित करेंगे और उन्हें बिचौलियों की घातक जकड़ से मुक्त करेंगे।
किसान आंदोलन में विरोध के नाम पर कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट संगठनों और दलों, खालिस्तानियों और यहाँ तक कि भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर यहाँ के आम लोगों को भड़काने में लगे असामाजिक तत्वों की भी ज़बरदस्त भागीदारी देखने को मिल रही थी। सबसे लंबे समय तक इस आंदोलन को देश के अन्नदाताओं द्वारा जारी विरोध प्रदर्शनों का दावा करते हुए, इसे ऑर्गेनिक और गैरराजनितिक बताने की कोशिश भी लिबरल्स की दूरगामी विध्वंशक योजना का हिस्सा ही है। जिसका पता पहले भी कई बार मिल चुका है।
अब जब किसानों के विरोध प्रदर्शन के लगभग 4 महीने बीत चुके है। यहाँ तक कि गणतंत्र दिवस की अराजक हिंसा के भी एक महीने गुजर चुके हैं, तब यह प्रायोजित आंदोलन, अपने पुराने ढकोसलों से बाहर आता हुआ नजर आ रहा है। ‘आन्दोलनजीवी’ प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव, जो संभवतः हर आंदोलन में इच्छाधारी प्रदर्शनकारी नेता के रूप में अलग-अलग किरदार में मौजूद रहते हैं, ने यह खुलकर स्वीकार किया है कि किसानों का यह विरोध, वास्तव में राजनीतिक है। इसका एक मात्र उद्देश्य मोदी सरकार को हराना और सत्ता से हटाना है।
योगेंद्र यादव ने द प्रिंट में एक लेख लिखा, जिसकी हेडलाइन है, ”Farmers’ movement can’t and shouldn’t be apolitical. That’s not a democracy” अर्थात “किसानों का आंदोलन गैरराजनीतिक नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए। ऐसा करना लोकतान्त्रिक नहीं है।
प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ में छपा योगेंद्र यादव का लेख
लेख में, योगेंद्र यादव स्पष्ट रूप से दावा करते हैं कि किसानों का विरोध गैरराजनीतिक अर्थात अराजनीतिक नहीं है। वह इसी लेख में आगे यह भी दावा करते हैं कि इसे गैरराजनीतिक होना भी नहीं चाहिए और इसका गैरराजनीतिक होना लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।
जैसा कि अब तक स्पष्ट हो चुका है कि इस लेख को संयुक्त किसान-मोर्चा (एसकेएम) के उस राजनीतिक निर्णय के बचाव के स्पष्ट इरादे के साथ लिखा गया है, जिसका उद्देश्य है कि अब तथाकथित ‘अराजनीतिक’ किसान चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ चुनावी मोर्चाबंदी करते नजर आएँगे। तथाकथित देश के अन्नदाता चुनावी राज्यों में वोटबैंक की राजनीति करते नजर आएँगे। इसका मतलब और उद्देश्य जो भी है, वो आपको साफ नजर आ रहा होगा कि अब ये किसकी भूमिका बनाने की कोशिश हो रही है।
योगेंद्र यादव ने संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के फैसले की बात करते हुए लेख में कहा कि चुनावी राज्यों में जाकर बीजेपी के खिलाफ हमें प्रचार करना चाहिए। वह लिखते हैं, “हमने बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में मतदाताओं से अपील करने का निर्णय लिया है कि वे किसान विरोधी कानूनों के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चुनावी तौर पर सज़ा दें। बीजेपी द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए, अपने राज्य मशीनरी का उपयोग कर आंदोलन को ख़त्म करने या उसका अपराधीकरण करने और भाजपा के अतिरंजित अहंकार के लिए उसे दण्डित करें। अब यह मतदाताओं को तय करना है कि वे इस सजा को भाजपा को कैसे देना चाहते हैं। इसके लिए SKM आपको यह सुझाव नहीं दे रहा है कि आप किसे वोट दें।”
अनिवार्य रूप से, यहाँ ‘आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव यह बचाव करते हुए कहने की कोशिश कर रहे हैं कि किसानों का राजनीतिकरण केवल ‘सही’ उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। इस बात के लिए पूरे आंदोलन को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। वे केवल बीजेपी को हराना चाहते हैं बाकी उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि कौन जीतता है। यहाँ तक कि अब्बास सिद्दीकी के बंगाल जीतने पर भी वे खुश हैं। उनका दावा है कि जब तक मोदी और भाजपा को अनिवार्य रूप से सत्ता से बाहर रखा जाता है। तब तक ही सही मायने में लोकतंत्र है।
वह कहते हैं कि राजनेता किस कदर राजनीति को एक गंदा शब्द बना रहे हैं, यह माँग करके कि किसानों को ‘अराजनीतिक’ होना चाहिए। इच्छाधारी आंदोलकारी योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसान स्वयं अपने संगठनों को ‘अराजनीतिक’ कहकर अपना नुकसान कर रहे हैं। वह आगे स्वीकार करते हैं कि अधिकांश किसान संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं और यह संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के लिए भी उतना ही सत्य है, जिसमें स्वयं के भीतर कई ऐसे संगठन संयुक्त हैं जो विभिन्न राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं।
यहाँ यह जानना भी दिलचस्प है कि वह जो साफ-साफ़ उल्लेख करने से बच रहे हैं। यह भी हो सकता है कि वह यह मान कर चल रहे हों कि हर कोई उनके बारें में जानता होगा, क्योंकि वह खुद एसकेएम की समन्वय समिति के एक सदस्य हैं। यहाँ तक कि योगेंद्र यादव, स्वराज अभियान नामक एक राजनीतिक पार्टी भी चलाते हैं। बाकी अन्य किसान नेता भी कॉन्ग्रेस और अन्य दूसरे कम्युनिस्ट दलों से जुड़े हैं।
इसके अलावा, SKM द्वारा बनाए गए कानूनी सेल में भी 4 सदस्य हैं – कॉलिन गोंसाल्विस (Colin Gonsalves), दुष्यंत दवे (dushyant Dave), प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) और एच एस फूलका (SH Phoolka)।
ये लोग कौन हैं? कोई पूछ सकता है? प्रशांत भूषण एक ‘कुख्यात’ वकील हैं जो AAP के संस्थापकों में से एक थे। एचएस फूलका खुद AAP नेता हैं जिन्होंने हाल ही में पद छोड़ दिया है। दुष्यंत दवे खुद कई प्रसिद्द मामलों के वकील रहे हैं, उनमें से एक राम जन्मभूमि पर हिंदू अधिकारों के खिलाफ लड़ने का मामला भी है और कॉलिन गोंसाल्विस एचआरएलएन (HRLN) के संस्थापक हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर जामिया में पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जाँच की माँग की थी। यहाँ यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि HRLN को जॉर्ज सोरोस ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट से भी भारी मात्रा में धन प्राप्त होता है। यही PUCL और HRLN की संयुक्त जोड़ी अक्षय पात्र पर ‘सिविल सोसायटी’ अटैक के नाम पर हमले में भी शामिल था।
अब आखिर बचता ही क्या है? बीकेयू के राकेश टिकैत, जिन्होंने खुद रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन अभी आराम से ‘अराजनीतिक’ किसान नेता बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस के सहयोगी रहे, दर्शन पाल जो माओवादी पीडीएफआई के संस्थापक थे और योगेंद्र यादव जैसे ‘आन्दोलनजीवी’ तत्वों की भागीदारी बहुत कुछ स्पष्ट कर चुका है। जब ये किसान नेता लोग पहले से ही कॉन्ग्रेस, CPI, आम आदमी पार्टी आदि से जुड़े हैं तो तथाकथित किसानों का यह प्रायोजित विरोध प्रदर्शन शुरू से ही अराजनीतिक कैसे रह सकता है। राजनीतिक तो अपने आरम्भ के समय से ही है।
योगेंद्र यादव का कहना है कि ‘राजनीतिक’ होना लोकतंत्र का एक हिस्सा है, ठीक है- इससे कोई भी सहमत होगा। लेकिन यह भी सच है कि जब इस तरह के हर विरोध-प्रदर्शन में यही समान आन्दोलनजीवी तत्व दिखाई देते हैं। और जब वे इधर-उधर की फालतू बातें करते हुए खुलेआम झूठ बोलते हैं, दूसरे आम और मासूम लोगों को भड़काते हैं, जो उनका राजनीतिक एजेंडा है। और यही उनके किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने का केंद्रीय कारण है न कि तथाकथित असंतोष या मूल्यों की लड़ाई। वो कोई भी झूठा दावा करें लेकिन मूल कारण राजनीति ही होती है। बाकी सभी मुद्दे उनके लिए महज राजनीतिक हथकंडा है।
एंटी-सीएए दंगों के दौरान भी आपने देखा होगा कि किस तरह से यही लोग यह झूठा दावा करते हुए नजर आ रहे थे कि यह कानून मुस्लिम विरोधी था। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। किसानों के विरोध के दौरान भी वही तत्व फिर से यह दावा करते हैं कि किसान कानून किसानों के हितों के खिलाफ हैं। जबकि जिसने भी उन तीनों कानूनों को पढ़ा और जाना है उसमें किसानों के अहित की कोई बात उसे नजर नहीं आई है। दोनों ही मामलों में, वैश्विक वामपंथियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत और विशेष रूप से, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में शामिल हो गया था। दोनों ही मामलों में राजधानी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी।
यहाँ योगेंद्र यादव यह कहते हुए गलत नहीं है कि हर विरोध और वास्तव में, प्रत्येक व्यक्ति की एक राजनीतिक प्राथमिकता होती है और वास्तव में लोकतंत्र का फायदे उठाते हुए निहित राजनीतिक हितों के लिए केंद्रित यह समूह देश को जलाना शुरू कर देता है क्योंकि अपने इन प्रयोगों से वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को हिंसा और प्रोपेगेंडा द्वारा सत्ता से बाहर किया जा सकता है या नहीं। यह तो लोकतंत्र नहीं है बल्कि यह उन राजनीतिक दलों के निजी राजनीतिक हित हैं, जिनकी वे वर्षों सेवा करते आ रहे हैं।
तथाकथित किसान आंदोलन, योगेन्द्र यादव जैसे लोगों का झूठ पर आधारित निहित राजनीतिक स्वार्थ है जो हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर देश के आम लोगों में भ्रम फैलाकर, भड़काकर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ऐसे प्रायोजित विद्रोह के षणयन्त्र का नेतृत्व कर रहे हैं। जिसमें देश-विरोधी वो तमाम देशी-विदेशी ताकतें भी शामिल है जो कि भारत को आगे बढ़ता हुआ, समृद्ध होता नहीं देखना चाहतीं। यह सब निश्चित रूप से लोकतंत्र तो नहीं है।
द प्रिंट में लिखें इस ओपिनियन पीस में योगेंद्र यादव ने एक बात बहुत स्पष्ट कर दी है कि तथाकथित किसानों का विरोध, जिसके दम पर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के खिलाफ विद्रोह और उसे अस्थिर करने का प्रयास किया गया और जा रहा है; अब राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक पार्टी यानी बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक अभियान के रूप में, बड़े पैमाने पर जिस तैयारी के साथ नजर आ रहा है, उसका कृषि कानूनों से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि यह लोकतान्त्रिक शक्ति को क्षीण कर हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर न सिर्फ एक सरकार को बल्कि समूचे देश को अस्थिर और कमजोर करने की गहरी साजिश है। इसके लिए राष्ट्र-विरोधी ताकतें हर हथकंडा अपनाने को तैयार हैं।
अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण अब 70 एकड़ की जगह 107 में एकड़ में किया जाएगा। ताजा जानकारी के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने परिसर के आसपास की 7,285 वर्ग फुट ज़मीन खरीदी है। यह जमीन अशर्फी भवन के बगल में स्थित है।
भव्य राम मंदिर के निर्माण का जिम्मा पाने वाले राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने 1 करोड़ रुपए में 7, 285 स्क्वॉयर फीट जमीन खरीदी है। इस भूमि के लिए प्रति फुट 1, 373 रुपए दिए गए हैं। ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने बताया, “हमने जमीन खरीदी क्योंकि भव्य मंदिर निर्माण के लिए हमें इसकी जरूरत थी”
Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra has purchased 7,285 square feet land adjacent to Ram Janmabhoomi premises in UP’s Ayodhya, in accordance with its plan to expand temple complex area to 107 acres from 70 acres: Trust official
पूरी डेवलपमेंट के बारे में बात करते हुए, फैजाबाद के उप-पंजीयक एसबी सिंह ने बताया कि जमीन के मालिक दीप नरैन ने ट्रस्ट के सचिव चंपत राय के पक्ष में 7,285 वर्ग फुट भूमि की रजिस्ट्री के दस्तावेजों पर 20 फरवरी को हस्ताक्षर किए। मिश्रा और अपना दल के विधायक इंद्र प्रताप तिवारी ने गवाह के तौर पर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। फैजाबाद के उप-पंजीयक एसबी सिंह के कार्यालय में ही यह रजिस्ट्री की गई। तिवारी ने कहा, “मै सौभाग्यशाली था कि मुझे राम मंदिर ट्रस्ट की पहली खरीद का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला।”
खबरों के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र की और अधिक भूमि अधिग्रहण करने की योजना है। इसके लिए वह राम मंदिर परिसर से सटे मंदिरों, घरों और खुली भूमि के मालिकों के साथ बातचीत कर रहे हैं।
हाल में खबर आई थी कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र के खाते में 1,511 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं, जिसे श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान के तहत इकट्ठा किया गया था। इस अभियान को 15 जनवरी को ट्रस्ट ने शुरू किया था। इस पूरे अभियान में ट्रस्ट को सभी ने अपने-अपने सामर्थ्य अनुसार चंदा दिया था। इस दौरान कई जगहों पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल कार्यकर्ताओं पर हमला भी भी हुआ।