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दिल्ली पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कबूली जज के घर कैश मिलने की बात: नहीं किया जब्त, ऊपर से वीडियो भी डिलीट करवा दिया – अब आया जवाब

इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर 14 मार्च को आग की घटना के बाद पाए गए कैश को लेकर कई सवाल उठे थे। इसके बाद मामले की जाँच के लिए बनी कमेटी की उपस्थिति में घटनास्थल पर उस दौरान मौजूद रहे पुलिसकर्मियों से पूछताछ की गई।

पूछताछ के दौरान सबसे मुख्य प्रश्न यह था कि आवास पर मिली नकदी को जब्त क्यों नहीं किया गया और घटना के तुरंत बाद पहुँचे पुलिसकर्मियों के फोन से वीडियो क्यों डिलीट किया गया। इसपर जवाब देते हुए अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में कोई FIR ही दर्ज नहीं हुई थी।

यही कारण है कि नकदी जब्त नहीं की गई लेकिन इस मामले की जानकारी उनके द्वारा सीनियर अधिकारियों को दी गई थी, जिन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी घटना के बारे में सूचना दी थी। वहीं वीडियो डिलीट करने के बारे में उनका कहना है कि वीडियो गलत हाथों तक न जाए इसलिए सीनियर अधिकारियों के निर्देश पर वीडियो डिलीट कराया गया था।

FIR और जब्ती पर उठे सवाल

दिल्ली पुलिस ने इस मामले में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की। पुलिस अधिकारियों ने जाँच समिति को बताया कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श आवश्यक होता है। इसीलिए, बिना FIR के नकदी की जब्ती नहीं की गई। इसके अलावा, घटनास्थल पर मौजूद कर्मचारियों के मोबाइल फोन से वीडियो क्लिप वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर हटा दिए गए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे गलत हाथों में न जाए।

वही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने, एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “उन्होंने जब्ती में शून्य दर्ज किया। चूँकि हम एफआईआर दर्ज नहीं कर सकते, तो जब्ती कैसे हो सकती है? एफआईआर केवल मुख्य न्यायाधीश की अनुमति से ही दर्ज की जा सकती है, हमें समिति के निर्णय का इंतजार करना चाहिए।”

न्यायमूर्ति वर्मा का बयान

जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने आवास पर किसी भी नकदी की मौजूदगी से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि आग लगने के समय वो और उनकी पत्नी दिल्ली में नहीं थे, और उनकी बेटी और निजी सचिव ने दमकल सेवा को सतर्क किया था। उन्होंने यह भी कहा कि आग बुझने के बाद उनके परिवार के सदस्यों और कर्मचारियों को कोई नकदी नहीं दिखाई दी।

जाँच समिति की कार्रवाई

जाँच समिति ने 30, तुगलक क्रीसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के आवास का दौरा किया और उस कमरे का निरीक्षण किया जहाँ आग लगी थी। समिति ने दिल्ली पुलिस आयुक्त, डीसीपी (नई दिल्ली जिला), अतिरिक्त डीसीपी, और अन्य संबंधित अधिकारियों के बयान दर्ज किए। इन सभी ने अपने बयानों में उल्लेख किया कि आग में जले हुए बैग में नकदी थी।

भाजपा MP निशिकांत दुबे पर चले अवमानना का मुकदमा, वकील अनस तनवीर ने अटॉर्नी जनरल को लिखा पत्र: कहा- उनके बयान भड़काऊ

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मुकदमा चलाने के लिए देश के अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी को पत्र लिखा गया है। यह पत्र सुप्रीम कोर्ट के एक वकील ने लिखा है। वकील ने कहा है कि सांसद दुबे के यह बयान भड़काऊ और अपमानजनक हैं। AG वेंकटरमणी से निशिकांत दुबे के खिलाफ यह मामला चलाने की अनुमति माँगी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पत्र सुप्रीम कोर्ट में वकील अनस तनवीर ने लिखा है। इस पत्र में लिखा गया है, “उन्होंने लापरवाही से देश में अशांति के लिए CJI को जिम्मेदार ठहराया है और इस प्रकार उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत को बनाम किया है। उन्होंने इससे जनता में गुस्सा और असंतोष भड़काने का प्रयास किया है।”

AG वेंकटरमणी को भेजे गए गए पत्र में कहा गया है कि सांसद निशिकांत दुबे का बयान निराधार है और यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर हमला है। यही दावे करते हुए निशिकांत दुबे के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए AG वेंकटरमणी से मंजूरी माँगी गई है।

अनस तनवीर ने का अवमानना का यह पत्र दुबे के हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पर दिए गए बयानों को लेकर लिखा है। निशिकांत दुबे हाल के दिनों में सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन सेट करने और वक्फ कानून के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश देने को लेकर मुखर रहे हैं।

उन्होंने राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन सेट करने के मुद्दे पर कहा था, “क़ानून यदि सुप्रीम कोर्ट ही बनाएगा तो संसद भवन बंद कर देना चाहिये।” इसके अलावा ANI को दिए एक बयान में उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियाँ राष्ट्रपति करता है, ऐसे में अदालत उन्हें आदेश कैसे दे सकती है।

निशिकांत दुबे ने इसके अलावा वक्फ मुद्दे के कुछ प्रावधानों पर रोक लगाने के चलते सुप्रीम कोर्ट को लेकर कहा था, “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़े तो संसद और विधानसभाएँ बंद कर देनी चाहिए।”

निशिकांत दुबे के इन बयान के बाद न्यायिक दखल को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। हालाँकि, उनके इन दोनों बयानों से भाजपा ने किनारा कर लिया है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि यह निशिकांत दुबे की निजी राय है और इससे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है।

उर्दू साइनबोर्ड में ‘गंगा-जमुनी तहजीब’, हिजाब में ‘मुस्लिम लड़कियों की सुरक्षा’: मिलिए जस्टिस सुधांशु धूलिया से, परिचित होइए उनकी न्यायिक भावुकता से

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उर्दू को गंगा-जमुनी तहजीब का सबसे अच्छा नमूना बताते हुए महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइनबोर्ड में उसके इस्तेमाल की अनुमति दी थी। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा था कि कहा था कि भाषा एक संस्कृति है और इसे लोगों को विभाजित करने का कारण नहीं बनना चाहिए। जस्टिस धूलिया के कई निर्णयों में यह परिलक्षित है।

दरअसल, भारत के विशाल लेकिन विविधता से वंचित न्यायपालिका में जस्टिस सुधांशु धूलिया जैसे नाम कानूनी पहलू से कम, आदर्शवाद के आइने में फैसले के लिए अधिक चर्चित हैं। जस्टिस धूलिया का कर्नाटक हिजाब विवाद और अकोला नगर परिषद के उर्दू साइनबोर्ड मामले में भावनात्मक विश्वासों और चयनात्मक धर्मनिरपेक्षता की ओर झुकाव स्पष्ट तौर पर परिलक्षित हुआ।

महाराष्ट्र का उर्दू साइनबोर्ड मामले में भावनात्मक बहाव

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2025 को महाराष्ट्र अकोला नगर परिषद के भवन में उर्दू साइनबोर्ड लगाने की रोकने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। जस्टिस धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए उर्दू की शान में कसीदे पढ़े। पीठ ने तो यहाँ तक कह दिया कि अलग-अलग भाषा सीखने से ‘हम अधिक उदार, सहिष्णु और दयालु’ बनते हैं।

न्यायाधीश धूलिया ने कहा था, “भाषा विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है, जो अलग-अलग विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को करीब लाती है। यह उनके बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।आइए हम उर्दू और हर भाषा से दोस्ती करें। उर्दू भारत के लिए विदेशी नहीं है। इसका जन्म भारत में हुआ और यहीं इसका विकास हुआ है।”

कोर्ट ने आगे कहा था, “उर्दू के खिलाफ पूर्वाग्रह इस गलत धारणा से उपजा है कि उर्दू भारत के लिए विदेशी है। यह राय गलत है, क्योंकि मराठी और हिंदी की तरह उर्दू भी एक इंडो-आर्यन भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उर्दू भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश से जुड़े लोगों की ज़रूरत के कारण विकसित और फली-फूली।”

न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने फैसले की शुरुआत मौलूद बेन्ज़ादी के एक कथन से की। उन्होंने कहा था, “जब आप कोई भाषा सीखते हैं, तो आप सिर्फ़ एक नई भाषा बोलना और लिखना ही नहीं सीखते। आप खुले विचारों वाले, उदार, सहिष्णु, दयालु और सभी मानव जाति के प्रति विचारशील होना भी सीखते हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “हमारी अवधारणाएँ स्पष्ट होनी चाहिए। भाषा धर्म नहीं है। भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती। भाषा किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है, किसी धर्म की नहीं। भाषा विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम है जो विभिन्न विचारों और विश्वासों वाले लोगों को करीब लाती है और यह उनके विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मसले पर भाषाई एकता पर निर्णय देने के बाद इसे उर्दू के महत्व को बताने में बदल दिया। न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने फैसले को प्रशासनिक या कानूनी तर्क की कसौटी पर कसने के बजाय इसे भाषाई बहुलता और सांस्कृतिक एकता की बात करने लगे। इस तरह की टिप्पणी कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा नजर आती है।

कर्नाटक हिजाब मामले में जस्टिस धूलिया की असहमति

साल 2022 में कर्नाटक के स्कूलों में हिजाब पहनकर जाने को लेकर विवाद उभरा हुआ था। आखिरकार यह मामला कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचा। उस समय कर्नाटक हाई कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में समान ड्रेस कोड लागू करने के राज्य सरकार के आदेश बरकरार रखा था। कर्नाटक हाई कोर्ट के इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस धूलिया ने असहमति जाहिर की थी।

उस दौरान जस्टिस धूलिया ने शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का पहनकर जाने के पूरे विमर्श को मुस्लिम बालिकाओं की सुरक्षा के इर्द-गिर्द घूमा दिया। उन्होंने संविधान में दिए गए समान अधिकार के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक प्रतीकवाद एवं उसके दूरगामी परिणामों पर विचार करने से इनकार कर दिया। इस तरह छूटों को देश में अक्सर मुस्लिम तुष्टीकरण के रूप में देखा जाता है।

दरअसल, साल 2022 में भाजपा की नेतृत्व वाली तत्कालीन कर्नाटक सरकार ने स्कूल-कॉलेज की परिक्षाओं में मुस्लिम लड़कियों को बुर्का-हिजाब पहनकर आने पर रोक लगा दिया था। तब मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया था। उनकी शह पर कुछ मुस्लिम लड़कियों ने सरकार के इस निर्णय का विरोध किया था और हिजाब पहनकर जाने पर अड़ी रहीं।

यह पूरा मामला स्कूल-कॉलेज में विद्यार्थियों के बीच एकरूपता और अनुशासन लाने की कोशिश की कवायद थी। हालाँकि, कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला बता दिया और राजनीतिक मौका देखकर विपक्ष और वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवियों ने इसे राजनीतिक रंग दे दिया। वे भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता खतरे में’ है का राग अलापने लगे। हर तरफ से सरकार पर दबाव बनाया जाने लगा।

इतना ही नहीं, शैक्षणिक अनुशासन को मौलिक अधिकारों से जोड़ दिया गया। हर तरफ से एक दबाव बनाने की कोशिश की जाने लगी। इसके विरोध में मुस्लिम कर्नाटक हाई कोर्ट पहुँचे, लेकिन उन्हें वहाँ राहत नहीं मिली। हाई कोर्ट ने स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर सरकार के लगाए प्रतिबंध को बरकरार रखा। इसके बाद मुस्लिमों ने हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों वाली पीठ ने सुनवाई की और आखिरकार विभाजित फैसला सुनाया। इसमें जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध को बरकरार रखा, जबकि न्यायमूर्ति धूलिया ने इसके खिलाफ फैसला दिया। जस्टिस धूलिया ने कहा था कि मुस्लिम लड़कियों से हिजाब उतारने के लिए कहना उनकी निजता एवं गरिमा पर हमला और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा से वंचित करना है।

जस्टिस धूलिया ने कहा था, “हमारे स्कूल, खासकर प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज आदर्श संस्थान हैं, जहाँ हमारे बच्चों को… देश की समृद्ध विविधता को समझने की आवश्यकता है, उन्हें सलाह और मार्गदर्शन की आवश्यकता है, ताकि वे सहिष्णुता और समायोजन के हमारे संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करें, खासकर उन लोगों के प्रति जो अलग भाषा बोलते हैं, अलग भोजन खाते हैं या यहाँ तक कि अलग कपड़े या परिधान पहनते हैं!”

जस्टिस धूलिया ने आगे कहा था, उन्होंने कहा, “यही वह समय है जब उन्हें हमारी विविधता से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इस विविधता का आनंद लेना चाहिए और इसका जश्न मनाना चाहिए। यही वह समय है जब उन्हें यह एहसास होना चाहिए कि विविधता में ही हमारी ताकत है। हमारी संवैधानिक स्कीम के तहत हिजाब पहनना केवल एक विकल्प का मामला होना चाहिए।”

जस्टिस धूलिया ने हाई कोर्ट के इस निष्कर्ष पर भी आपत्ति जताई कि मुस्लिम विद्यार्थी कक्षा के भीतर अपने मौलिक अधिकारों का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा था, “स्कूल सार्वजनिक स्थान है, फिर भी स्कूल और जेल या सैन्य शिविर के बीच समानता स्थापित करना सही नहीं है। अगर हाई कोर्ट द्वारा उठाया गया मुद्दा स्कूल में अनुशासन के बारे में था तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए, लेकिन यह स्वतंत्रता और गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा था, “एक प्री यूनिवर्सिटी स्कूली छात्रा से उसके स्कूल गेट पर हिजाब उतारने के लिए कहना, उसकी निजता और गरिमा पर आक्रमण है। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 21 के तहत उसे दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। अपनी गरिमा और निजता का यह अधिकार वह अपने निजी जीवन में रखती है, यहाँ तक कि अपने स्कूल गेट के अंदर या अपनी कक्षा में भी।”

इसके परिणामों पर चर्चा करते हुए जस्टिस धूलिया ने कहा था कि हिजाब पर प्रतिबंध के कारण कुछ छात्राएँ बोर्ड परीक्षाओं में शामिल नहीं हो पाई हैं और कई अन्य को संभवतः मदरसों में आवेदन करना पड़ा है, जहाँ शिक्षा का समान मानक नहीं मिल सकता है। उन्होंने पूछा था, “स्कूल प्रशासन और राज्य को जवाब देना चाहिए कि उनके लिए क्या अधिक महत्वपूर्ण है- एक बालिका की शिक्षा या ड्रेस कोड लागू करना!”

उन्होंने फैसले में उन्होंने विस्तार से लिखा था, “आज भारत में सबसे अच्छी चीजों में से एक है एक लड़की का अपनी पीठ पर स्कूल बैग लटकाए हुए सुबह स्कूल के लिए निकलना। वह हमारी उम्मीद है, हमारा भविष्य है। यह भी एक सच्चाई है कि एक लड़की के लिए अपने भाई की तुलना में शिक्षा प्राप्त करना आज बहुत मुश्किल है।”

उन्होंने आगे कहा था, “भारत के गाँवों और अर्ध शहरी क्षेत्रों में, एक लड़की के लिए अपने स्कूल बैग को पकड़ने से पहले अपनी माँ के दैनिक कामों जैसे सफाई और कपड़े धोने में मदद करना आम बात है… इसलिए इस मामले को एक लड़की द्वारा अपने स्कूल पहुँचने में पहले से ही सामना की जाने वाली चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि हिजाब पहनना धार्मिक प्रथा का मामला हो सकता है या नहीं भी हो सकता है, लेकिन यह अभी भी विवेक, विश्वास और अभिव्यक्ति का मामला है। अगर लड़की कक्षा में भी हिजाब पहनना चाहती है तो उसे रोका नहीं जा सकता। जस्टिस धूलिया ने कहा था, “इससे उसका रूढ़िवादी परिवार उसे स्कूल जाने की अनुमति देगा। उन मामलों में उसका हिजाब ही उसकी शिक्षा का टिकट है।”

जस्टिस धूलिया अपने फैसले के जरिए बताना चाह रहे थे कि स्कूल में अनुशासन बनाए रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण एक रूढ़ीवादी परिवार की लड़की के विश्वास एवं उसकी अभिव्यक्ति को बनाए रखना है, क्योंकि उसका परिवार उसे स्कूल भेज रहा है। यह एक सामाजिक एवं व्यवहारिक सोच हो सकती है, लेकिन न्यायिक सोच इससे इतर संविधान एवं कानून पर टिका होता है। उनका तर्क इस्लामवादियों की सोच के बेहद करीब है।

जस्टिस धूलिया का अलग रूख

जस्टिस धूलिया का कुछ ऐसा ही रूख संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के मामले को लेकर भी था। दरअसल, अनुच्छेद 39(बी) पर एक महत्वपूर्ण फैसले में पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने दिग्गज न्यायाधीश कृष्ण अय्यर की लंबे समय से चली आ रही व्याख्या को पलट दिया था। अय्यर के 1978 में अपनी व्याख्या में कहा था कि निजी संपत्ति को ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों’ का हिस्सा माना जा सकता है।

तत्कालीन सीजेआई चंद्रचूड़ ने इस पर असहमति जताई थी। उन्होंने कहा था, “न्यायमूर्ति अय्यर ने अपनी महान विरासत के बावजूद संविधान की व्यापक और अनुकूलनीय भावना के साथ अन्याय किया।” चंद्रचूड़ ने संवैधानिक लचीलेपन को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया था। CJI चंद्रचूड़ की टिप्पणियों को जस्टिस धूलिया ने ‘कठोर और अनुचित’ कह दिया था। ये कुछ एक ही ढर्रे पर चलने वाली बात जैसी थी।

कानून के बजाय भावना पर जोर

जस्टिस सुधांशु धूलिया ने अपने कई निर्णयों में संविधान की व्याख्या सार्वभौमिक न्यायिक के सिद्धांतों के बजाय भावानात्मक एवं मानवतावाद को ध्यान में रखकर दिया। ये कुछ ऐसा ही है जैसे युद्धग्रस्त सीरिया का कोई समूह भारत में आ जाए और उसके जीवन के परवाह करते हुए उसे भारत में अवैध रूप से रहने एवं जीवकोपार्जन के लिए अनुमति दे दी जाए।

जस्टिस धूलिया के निर्णयों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं निजी गरिमा की आड़ में हिजाब का बचाव करना हो या सार्वजनिक भवन के साइनबोर्ड पर उर्दू का लिखा होना सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बताना हो, उनके फैसले संवैधानिक पहलू के बजाय विश्व दृष्टिकोण एवं मानवतावाद को अधिक दर्शाते हैं, जो एक संप्रभु देश के लिए हर समय उपयुक्त नहीं होता है।

न्यायपालिका में सहानुभूति का आधार उसके परिणामों के परिप्रेक्ष्य में न्यायिक व्यवस्था के इर्द-गिर्द बने कानून सीमा के अंदर संतुलित रहना चाहिए। यह न्याय का सिद्धांत भी है। निर्णयों में कानून की व्याख्या, संबंधित केस की विवरण के बजाय अगर सामाजिक बहसों को शामिल किया जाता रहा तो अदालतों के निर्णय बाहरी जनप्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।

मध्य प्रदेश में फर्जीवाड़ा गैंग चला रहे थे 2 कॉन्ग्रेस नेता, FIR दर्ज होते ही हुए फरार: जमीनों के जाली कागज बनाकर ऊँचे दामों पर बेचते थे, जानिए कैसे हुआ खुलासा

मध्य प्रदेश के जबलपुर में कॉन्ग्रेस के 2 नेता जमीन फर्जीवाड़ा गैंग चला रहे थे। यह गिरोह खाली जमीनें देख कर उनके उत्तराधिकारी के कागज बनवाता था और उन्हें बेच देता था। इस फर्जीवाड़े का खुलासा जबलपुर विकास प्राधिकरण (JDA) ने किया है। अब पुलिस इसके मास्टरमाइंड दो कॉन्ग्रेस नेताओं को तलाश रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने मामले के उजागर होते ही कयाज उर्फ शुभम ठाकुर को गिरफ्तार किया था। कयाज जबलपुर विकास प्राधिकरण में एक जमीन के उत्तराधिकार के लिए पहुँचा था। लेकिन शक के बाद उसके खिलाफ जाँच हुई और इसमें गड़बड़ी पकड़ में आई। कयाज ने इसके बाद पूरा मामला बयान किया।

कयाज ने बताया कि मनोज नामदेव और जतिन राज नाम के दो कॉन्ग्रेस नेता इस पूरे गैंग को चला रहे हैं। कयाज को भी यह कागज इन्हीं दोनों ने बना कर दिए थे। इनमें से जतिन राज यूथ कॉन्ग्रेस का नगर अध्यक्ष रह चुका है। पुलिस ने इस मामले में शनिवार (19 अप्रैल 2025) को पुलिस ने दोनो कॉन्ग्रेस नेता के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है।

फर्जीवाड़े का खुलासा होने के बाद पुलिस ने इन कॉन्ग्रेस नेताओं को पकड़ने के लिए प्रयास किए लेकिन यह फरार हो चुके हैं। उन्हें यह मामला खुलने का पता ही चल गया था। अब उनकी तलाश के लिए छापेमारी हो रही है। इस फर्जीवाड़े की भी और जानकारी जुटाई जा रही है।

रिहायशी इलाकों की जमीन होती थी निशाने पर

पुलिस पूछताछ में शुभम ने बताया कि दोनों कॉन्ग्रेस नेता जबलपुर शहर के रिहायशी इलाकों में खाली जमीनों की रेकी करते थे और पता करते थे कि इनकी स्थिति क्या है। जिन जमीनों का कोई उत्तराधिकारी नहीं होता था, उनके फर्जी कागज तैयार करवाते थे।

इन कागजों में यह खुद को उत्तराधिकारी बनवा लेते थे। इसके बाद यह JDA से उस जमीन का मालिकाना हक़ ले लेते थे। कुछ दिन बाद जमीन बेच दी जाती थी और इससे होने वाले मुनाफे को बाँट दिया जाता था। हालाँकि, इस बार यह खेल खुल गया।

फर्जीवाड़ा करते हुए ही हुआ खुलासा

यह मामला भी कयाज के फर्जीवाड़ा करते हुए ही खुला। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, कयाज ने JDA में बताया कि योजना क्रमांक 5-14 में पाँच हज़ार स्क्वायर फिट का प्लॉट है, जिसके स्वामी केपी लटोरिया हैं। उसने यहाँ जानकारी दी कि कुछ महीने पहले उनका और उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया।

इसके बाद कयाज ने दावा किया कि वह केपी लटोरिया का बेटा है। उसने इसके बाद उत्तराधिकारी बनाए जाने की माँग की। उसने यहाँ आधार कार्ड और पैन कार्ड भी दिखा दिए। लेकिन अफसर को दस्तावेज़ कुछ संदिग्ध लगे। इसीलिए सभी दस्तावेजों की जाँच कराई गई और वे फर्जी निकले।

जाँच में सामने आया कि केपी लटोरिया को कई बार नोटिस जारी किया जा चुका है। परंतु जवाब नहीं मिलने पर पता लगा कि उनकी कोई संतान ही नहीं थी। इसके बाद JDA ने पुलिस को मामले की शिकायत की। पुलिस ने फर्जीवाड़े समेत कई धाराओं में उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

मंदिरों के बाद अब कनाडा का ऐतिहासिक गुरुद्वारा भी खालिस्तानियों की घृणा का शिकार, दीवारों पर लिखे- खालिस्तान जिंदाबाद, किल मोदी: कमिटी बोली- वे खौफ पैदा करना चाहते हैं

कनाडा के वैंकूवर में एक बड़े गुरुद्वारे खालिस्तानी आतंकियों ने हमला कर दिया। उन्होंने रात के अँधेरे में गुरुद्वारे पर भारत विरोधी नारे लिखे। वैंकूवर के ही एक हिन्दू मंदिर पर भी ऐसे ही भड़काऊ नारे लिखे गए। आरोप है कि कुछ दिन पहले इस गुरुद्वारे ने खालिस्तानियों को अपने नगर कीर्तन में शामिल नहीं होने दिया था, इसलिए यह घटना हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वैंकूवर के रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे पर शनिवार (19 अप्रैल, 2025) को सुबह तीन बजे हमला हुआ। इस दौरान एक ट्रक में बैठ कर आए कुछ लोगों ने गुरुद्वारे की दीवाल पर ‘किल मोदी’, ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ समेत बाकी भारत विरोधी नारे लिखे। यह लोग इसके बाद भाग गए।

डराने के लिए किया हमला

सुबह गुरुद्वारे का प्रबन्धन करने वाल खालसा दीवान सोसायटी को इस विषय में पता चला। उसने पुलिस को इस मामले में सूचना दी है। पुलिस अब इस घटना की जाँच कर रही है। खालसा दीवान सोसायटी ने इसे कट्टरपंथियों का काम बताया है।

सोसायटी ने हमले के बाद जारी एक बयान में कहा, “खालिस्तान की वकालत करने वाले सिख अलगाववादियों के एक छोटे समूह ने ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ जैसे विभाजनकारी नारे लिखकर हमारे गुरुद्वारे की पवित्र दीवारों को खराब कर दिया।” सोसायटी ने कहा कि यह घटना ऐसे समय में तब और दुखद है जब वह खालसा सजना दिवस मनाने वाले हैं।

गुरुद्वारे से जुड़े लोगों ने कहा कि खालिस्तानी यह काम इसलिए कर रहे हैं ताकि वह लोगों के दिमाग में डर बैठा सकें और सिखों में विभाजन पैदा कर सकें। बताया गया है कि इस हमले से एक सप्ताह पहले बैसाखी के मौके पर इस गुरुद्वारे ने नगर कीर्तन का आयोजन किया था, इसमें खालिस्तानियों को आने से रोक दिया गया था। यह गुरुद्वारा 1906 में स्थापित किया गया था।

मंदिर पर भी हमला

माना जा रहा है कि इसी के चलते खालिस्तानी भड़के हुए थे। वैंकूवर में सिर्फ गुरुद्वारा ही नहीं बल्कि एक मंदिर पर भी ऐसा ही हमला शनिवार को ही किया गया। मंदिर से जुड़े लोगों ने बताया है कि यह हमले पूर्व नियोजित हो सकते हैं ताकि सिख और हिन्दू आपस में बंट जाएँ।

मामले में पुलिस को भी सूचना दे दी गई है। वैंकूवर पुलिस के प्रवक्ता स्टीव एडिसन ने कहा है कि अभी वह किसी की पहचान इस मामले में नहीं कर पाए हैं। उन्होंने कहा है कि पुलिस इस मामले में जाँच कर रही है और जल्द ही इस विषय में सूचना देगी।

लगातार हो रहे हमले

कनाडा में मंदिर और गुरुद्वारों पर हमले का यह कोई पहला मामला नहीं है। 4 नवम्बर को भी कनाडा के ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर में श्रद्धालुओं पर खालिस्तानी समर्थकों की भीड़ द्वारा हमला किया गया था। इस दौरान, मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं पर लाठी-डंडे बरसाए गए और महिलाओं व बच्चों को भी नहीं बख्शा गया था।

इससे पहले जुलाई 2024 में भी कनाडा के एडमॉन्टन के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर में तोड़-फोड़ की गई थी। यहाँ के बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर पर सुबह-सुबह भारत विरोधी नारे लिखे गए थे। अगस्त, 2023 कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में खालिस्तानियों द्वारा एक बार फिर हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया था।

सितम्बर, 2023 में कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में दुर्गा मंदिर पर खालिस्तानी हमला हुआ था। कनाडा में इससे पहले रही जस्टिन ट्रूडो की सरकार लगातार खालिस्तानियों को इन हमलों के बाद बचाती आई थी। वर्तमान में भी उनकी ही पार्टी की सरकार है और खालिस्तानियों को प्रश्रय मिला हुआ है, जिससे ऐसी घटनाएँ हो रही हैं।

भारत ने लगातार ऐसे मामलों को कनाडा के सामने उठाया है। हालाँकि, सिख वोटों के लिए पार्टियों के दबाव में पुलिस भी कार्रवाई नहीं करती है।

सवाल- इस्लाम की नजर में मूर्ति पूजा और बच्ची के रेप में से बड़ा गुनाह क्या? जवाब: मूर्ति पूजा… वायरल Video में जो बता रहा कल का हाफिज, मुफ्ती भी वही बताते हैं

सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम व्यक्ति की वीडियो वायरल है। इस वीडियो में वह पत्रकार को बता रहा है कि इस्लाम में रेप इतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना बड़ा गुनाह मूर्ति पूजा है। अगर एक शख्स रेप करे तो अल्लाह उसे माफ कर देगा, मगर अगर कोई मूर्ति पूजा करके शिर्क करे तो अल्लाह उसे माफ नहीं करेगा।

इस वीडियो को देखने के बाद सवाल उठने लगे कि ये व्यक्ति किस तरह की तालीम दे रहा है। लोग पूछने लगे कि क्या इस्लाम का सच यही है कि उनके लिए रेप गुनाह नहीं है।

हमने इस मुस्लिम व्यक्ति की ओरिजनल वीडियो खोजी तो पता चला कि वायरल वीडियो में दिख रहे व्यक्ति का नाम एहसान है, और उसका दावा है कि वह ‘हाफिज’ रह चुका है। ‘द राष्ट्रनीति’ के पत्रकार सुमित तिवारी इनसे वक्फ पर राय लेने गए थे। जहाँ बातों-बातों में इन्होंने इस्लाम की आलोचना करते हुए ये टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इस्लामी तालीम के साथ बाकी पढ़ाई भी जरूरी है ताकि सही-गलत पता चले।

वीडियो में 9:00 मिनट से 9:50 तक में सुन सकते हैं कि मुस्लिम व्यक्ति बताता है कि इस्लाम की नजर में एक तरफ अगर रेप हो रहा हो और एक तरफ मूर्ति पूजा हो रही हो तो इस्लाम मूर्ति पूजा को ज्यादा गलत मानता है। आगे मुस्लिम व्यक्ति इसका कारण बताते हुए कहता है कि ऐसा इसलिए होता है कि अल्लाह ने कहा है- “अगर एक तरफ शख्स ने कोई भी गुनाह किया हो और वो माफी माँग ले तो मैं माफ कर दूँगा, लेकिन अगर शिर्क किया हो, जैसे दूसरे को खुदा मानता हो, तो वो ज्यादा बड़ा गुनाह है।”

इस वीडियो में ‘हाफिज’ ने कई और मुद्दों पर भी बात की है। उन्होंने जगह-जगह पर इस्लाम की आलोचना की है। उन्होंने बताया कि उन्हें हमेशा सिखाया गया कि जितने बच्चे हो जाएँ ठीक, लेकिन जब उनके 8 से 6 बच्चे हुए और उन्होंने अपनी बीवी की हालत देखी तो उन्हें पता चला कि बच्चे करने से कुछ नहीं होता, उन्हें पालने की भी व्यवस्था होनी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने वक्फ बोर्ड को लेकर भी कहा कि उन्हें आज तक इससे कोई फायदा नहीं हुआ।

रही बात गुनाह वाले बयान की तो गौरतलब हो कि कुछ दिन पहले ऐसा ही सवाल दारुल उलूम के डायरेक्टर व इस्लामी स्कॉलर डॉक्टर मुफ्ती यासिर नदीम अल वजीदी से भी किया गया था। पूछा गया था कि मूर्ति पूजा ज्यादा बड़ा गुनाह या रेप। इस पर उस मुफ्ती ने बिन दो मिनट भी सोचे ये कहा था कि बलात्कार से बड़ा गुनाह मूर्ति पूजा है। इंसानी नजरिए से रेप बड़ा गुनाह लग सकता है, लेकिन हकीकत में मूर्ति पूजा गुनाह है।

तमंचे वाली ‘जिकरा डॉन’ के इशारे पर चाकुओं से गोद दिया गया था 17 साल का कुणाल, सीलमपुर मर्डर में दिल्ली पुलिस ने 7 को किया गिरफ्तार: हत्या के बाद से दहशत में हैं हिंदू

दिल्ली के सीलमपुर में हिन्दू लड़के कुणाल की हत्या मामले में पुलिस ने 7 लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए जाने वालों में मुख्य आरोपित लेडी डॉन जिकरा भी है। पुलिस को पता चला है कि जिकरा के भाई पर 6 महीने पहले हुए हमले का बदला लेने के लिए कुणाल की हत्या की गई थी। पुलिस अब इन आरोपितों की उम्र का सत्यापन कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस की पूछताछ में जिकरा ने बताया है कि उसके भाई साहिल पर दीवाली के समय हमला हुआ था। जिकरा ने बताया है कि यह हमला कुणाल के 2 दोस्तों ने किया था। उनके नाम शंभू और लाला है। इस हमले के बाद से लाला फरार चल रहा है।

जिकरा से पूछताछ में पुलिस को मालूम हुआ है कि हमले से पहले उसके भाई साहिल ने कुणाल से लाला का पता पूछा था। साहिल को जब कुणाल ने लाला के विषय में नहीं बताया तो उसी की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गई। यह भी पता चला है कि इस हत्या की साजिश जिकरा ने खुद ही रची थी और भाइयों को इसके लिए उकसाया था।

वहीं इस मामले की जाँच की कड़ी में पुलिस ने 7 लोगों को पकड़ा है। मुख्य आरोपित जिकरा और साहिल को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। आशंका जताई जा रही है कि गिरफ्तार हुए कुछ लोग अभी नाबालिग हो सकते हैं, इसलिए उनकी आयु का सत्यापन हो रहा है।

दिल्ली पुलिस को जिकरा की रिमांड 19 अप्रैल, 2025 को मिली थी। उसे 2 दिन की रिमांड पर भेजा गया था। अब उसके भाई साहिल को भी रिमांड पर लेकर पूछताछ की जाएगी। यह भी सामने आया है कि जिकरा आर्म्स एक्ट के मामले में जेल भी जा चुकी है। घटना से 15 दिन पूर्व ही वो जेल से बाहर आई थी। 

रील बनाने की शौक़ीन जिकरा सीलमपुर की ही रहने वाली है। अपने साथ तमंचा लेकर चलती रही है। इंस्टाग्राम पर भी उसके 15,000 से अधिक फॉलोवर्स हैं। पुलिस को यह भी पता चला है कि जिकरा एक और गैंगस्टर हाशिम बाबा की बीवी के साथ रहती थी। इस दौरान वह अपना गैंग भी बना रही थी।

गौरलतब है कि 16 अप्रैल, 2025 को घर से बाहर दूध लेने के लिए निकले कुणाल की हत्या चाकुओं से गोद कर दी गई थी। इसके बाद सीलमपुर में काफी विरोध प्रदर्शन भी हुए थे। लोगों ने आरोप लगाया था कि यहाँ हिन्दुओं का जीना मुहाल है। अब इस मामले में जाँच और कार्रवाई चल रही है।

‘हिंदुओं की आबादी 50% से भी कम, अब बचाव के लिए मिले लाइसेंसी हथियार’ : मुर्शिदाबाद में BJP विधायक ने निकाली ‘हिंदू बचाओ’ रैली, गवर्नर भी बोले- ‘यहाँ हालात बर्बर’

मुर्शिदाबाद हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने बंगाली हिंदुओं के लिए एक ‘हिंदू बचाओ’ रैली निकाली। इस दौरान उन्होंने ग्राम रक्षा कमेटी बनाने की माँग की और साथ ही ये भी कहा कि हिंदुओं को उनकी सुरक्षा के लिए लाइसेंसी हथियार दिए जाने चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “मेरे ख्याल में ग्राम रक्षा समिति का गठन किया जाना चाहिए और उसके बाद आम लोगों को उनकी सुरक्षा के लिए लाइसेंसी हथियार मुहैया कराए जाने चाहिए, क्योंकि वहाँ बांग्लादेश की सीमा है।”

भाजपा नेता ने जोर देकर कहा, “मेरी दूसरी माँग यह है कि चुनाव के दौरान वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए, क्योंकि मुर्शिदाबाद में हिंदुओं की आबादी अब 50 प्रतिशत से कम है।”

उन्होंने हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में रोके जाने को लेकर कहा, “मैं जमीनी हकीकत जानता हूँ। वे केवल विपक्ष के नेता को मुर्शिदाबाद जाने से रोक रहे हैं, जबकि बाकी सभी को अनुमति है। मैंने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। मामले की जल्द ही सुनवाई होगी।”

इस माँग के अलावा अपने ट्वीट में सुवेंदु अधिकारी ने मुर्शिदाबाद के पीड़ितों की व्यथा बताते हुए दो घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कैसे समशेरगंज के धूलियान में गणेश घोष और छाया सिंह के परिवार को निशाना बनाया गया और उनकी जमापूँजी में आग लगा दी गई। किसी ने नया घर बनाने के लिए पैसा इकट्ठा किया था तो किसी ने बेटी की शादी के लिए

सुवेंदु अधिकारी ने बताया कि उन्होंने दोनों परिवार की मदद कर दी है। एक को पाँच लाख और एक को डेढ़ लाख रुपए दे दिए हैं। लेकिन ये सोचने वाली बात है कि ये दोनों परिवार का वक्फ से संबंध नहीं था। इनका अपराध बस ये था कि ये हिंदू हैं।

बता दें कि बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने भी 18 अप्रैल को मुर्शिदाबाद में हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया था। हालात देखने के बाद उन्होंने मुर्शिदाबाद के हालातों को ‘अजीब और बर्बर’ बताया।

उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा के लिए उन्होंने अपनी माँगे रख दी हैं। जल्द ही रिपर्ट राज्य सरकार और केंद्र सरकार को दी जाएगी। अभी हाल ये है कि लोगों का भरोसा टीएमसी से उठ गया है। चुनाव से पहले हिंसा बंगाल में आम हो गई है। एक समुदाय अपनी ताकत दूसरे पर थोपने की कोशिश कर रहा है।

‘सीमाओं को लाँघ रहा है सुप्रीम कोर्ट, धार्मिक युद्ध भड़काने का जिम्मेदार’: MP निशिकांत दुबे-दिनेश शर्मा के बयान से BJP ने किया किनारा, नड्डा बोले- ये उनके निजी विचार

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा के सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान से पार्टी ने किनारा कर लिया है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि दोनों के बयान उनके निजी विचार हैं और इनसे पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है। निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर न्यायिक दखल का आरोप लगाया था।

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने एक्स (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट में लिखा, “भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा का न्यायपालिका एवं देश के चीफ जस्टिस पर दिए गए बयान से भारतीय जनता पार्टी का कोई लेना–देना नहीं है। यह इनका व्यक्तिगत बयान है, लेकिन भाजपा ऐसे बयानों से ना तो कोई इत्तेफाक रखती है और ना ही कभी भी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयान को सिरे से खारिज करती है।”

गौरतलब है कि झारखंड के गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने वक्फ कानून और राष्ट्रपति को दिए गए फैसले को लेकर बयान दिया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना साधते हुए कहा था कि अगर शीर्ष अदालत को ही कानून बनाना है तो संसद और राज्य विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि कोर्ट कैसे राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है।

सांसद निशिकांत दुबे ने ANI को दिए बयान में कहा, “देश में धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है। सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर बात के लिए सुप्रीम कोर्ट जाना ही पड़े तो संसद और विधानसभाएँ बंद कर देनी चाहिए।”

उन्होंने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना पर भी तंज कसा था। उन्होंने कहा था कि चीफ जस्टिस संजीव खन्ना इस देश में गृह युद्ध के लिए जिम्मेदार हैं। उनके साथ ही इस पर उत्तर प्रदेश के पूर्व डिप्टी सीएम और वर्तमान में राज्यसभा सांसद दिनेश शर्मा ने भी कहा था कि संसद को कोई चुनौती नहीं दे सकता, यह बात संविधान में साफ़ लिखी हुई है।

दिनेश शर्मा ने कहा, “लोगों में यह आशंका है कि जब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखा था, तो उसमें विधायिका और न्यायपालिका के अधिकार स्पष्ट रूप से लिखे गए थे… भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी लोकसभा और राज्यसभा को निर्देश नहीं दे सकता है और राष्ट्रपति पहले ही इस पर अपनी सहमति दे चुके हैं। कोई भी राष्ट्रपति को चुनौती नहीं दे सकता, क्योंकि राष्ट्रपति सर्वोच्च हैं।”

भाजपा के इन सांसदों के बयान से किनारा करने के बाद भी विपक्ष उस पर हमलावर है। AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने न्यापालिका को धमकी देने का आरोप लगाया है। वहीं AAP ने भी भाजपा सांसदों पर कार्रवाई की माँग की है।

क्यों हो रहा विवाद?

हाल ही में तमिलनाडु के राज्यपाल के विधेयकों को रोकने से जुड़े एक मामले में फैसला सुनाते हुए राष्ट्रपति की ‘जेबी वीटो’ से जुड़ी शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। अदालत ने राष्ट्रपति से कहा था कि वह राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयकों पर तीन माह के भीतर फैसला लें। इस फैसले के कुछ दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ कानून को लेकर कई टिप्पणियाँ की। इसके बाद से ही न्यायपालिका के दखल को लेकर चर्चा चालू हो गई। 

बलात्कारियों से सहानुभूति और रेप पीड़िताओं को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति: भारत की अदालतें खोज रहीं नए-नए तरीके, अपराधियों की जमानत के कई खतरे

न्यायपालिका को हिंसा और दुर्व्यवहार के शिकार लोगों की रक्षा करने का काम सौंपा गया है। हालाँकि, भारतीय अदालतों ने कई मौकों पर यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ितों को दोषी ठहराकर और अपराधियों को शादी या राखी बाँधने जैसे बेहद बेतुके कारणों से ज़मानत देकर इस भरोसे को तोड़ दिया है। इसके कई मामले सामने आ चुके हैं। इस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो आदेश बेहद चिंतनीय हैं।

इसी हाई कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि किसी लड़की का स्तन दबाना, उसके पायजामे का नाड़ा खींचना और लड़की को खींचकर ले जाना रेप का प्रयास नहीं है। उसके बाद नोएडा की एक युवती के साथ रेप के मामले में इस हाई कोर्ट ने कहा था कि पीड़िता ने खुद ही ‘मुसीबत को आमंत्रित किया’। अदालत ने आरोपित को जमानत भी दे दी। मेडिकल रिपोर्ट में युवती के हाइमन फटने की बात थी, लेकिन रेप की नहीं।

दरअसल, नोएडा की एक छात्रा ने सितंबर 2024 में अपने साथ हुए बलात्कार की शिकायत की थी। इस फैसले की हर तरफ आलोचना हुई। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई ने कहा, “इस हाईकोर्ट में क्या हो रहा है? अब उसी हाईकोर्ट के दूसरे जज ऐसी बातें कह रहे हैं। इस तरह की टिप्पणियाँ क्यों की जा रही हैं? ये मामले बहुत संवेदनशील है, इन मामलों में सावधान रहने की जरूरत है।”

हालाँकि, मुसीबत आमंत्रित करने वाली टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस संजय कुमार सिंह ने दी थी। इससे पहले जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने कासगंज यौन उत्पीड़न मामले में कहा था कि किसी लड़की के स्तन को पकड़ना, उसके पायजामे के नाड़े को तोड़ना और पुलिया के नीचे खींचना… रेप या रेप के प्रयास का अपराध नहीं है। ऐसी टिप्पणियाँ देश भर की अदालतों से आती रहती हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर विवाद

मार्च 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर मिश्रा की एकल पीठ ने एक नाबालिग के रेप के मामले में फैसला दिया कि उसका स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना ‘बलात्कार का प्रयास’ नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में बलात्कार के प्रयास का आरोप नहीं बनता, क्योंकि अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होता है कि आरोपितों की कार्रवाई अपराध करने की तैयारी से आगे बढ़ चुकी थी, जो कि साबित नहीं हुआ।

अदालत ने कहा था कि बलात्कार के प्रयास और अपराध की तैयारी के बीच अंतर को सही तरीके से समझना चाहिए। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन आदेश को संशोधित करते हुए निचली अदालत को निर्देश दिया कि वह आरोपितों के खिलाफ धारा 376 (बलात्कार) के बजाय धारा 354-बी (निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला) और पॉक्सो अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत नया आदेश जारी करे।

बाद में बवाल हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट के इस फैसले पर संवेदनहीन और घिनौना बताते हुए इस पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने आदेश में कहा, “हमें यह कहते हुए कष्ट हो रहा है कि (इलाहाबाद हाई कोर्ट की) विवादित आदेश में की गई कुछ टिप्पणियाँ निर्णय लिखने वाले जज की ओर से संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाती हैं।”

कल्पना कीजिए कि आरोपित ने पीड़ित एक नाबालिग लड़की को घसीटा, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ा और फिर भी अदालत के लिए यह बलात्कार का प्रयास नहीं माना जाता। प्रवेशात्मक यौन हमला बलात्कार है और जिसे अदालत ने ‘तैयारी’ कहा है उसे बलात्कार का प्रयास माना जाना चाहिए। हालाँकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे ‘गंभीर यौन हमला’ माना।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाबालिग से बलात्कार के आरोपित को दी जमानत

इसी तरह बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी एक फैसला दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 17 फरवरी 2025 को 14 वर्षीय लड़की से बलात्कार के आरोपित 24 वर्षीय एक युवक को जमानत दे दी थी। जस्टिस मिलिंद जाधव की पीठ ने कहा था कि पीड़िता ‘स्वेच्छा से’ आरोपित के साथ चार दिन रही और उसे ‘अपने कृत्यों के परिणाम’ की समझ थी।

कोर्ट ने पीड़िता के बयान को आधार बनाया, जिसमें उसने सहमति से संबंध होने की बात कही थी। हालाँकि, कानून कहता है कि18 साल से कम उम्र की सहमति मान्य नहीं होती। कोर्ट ने कहा था कि पॉस्को की धाराएँ गंभीर हैं, लेकिन न्याय के उद्देश्य से जमानत दी जा सकती है। इस फैसले की भी आलोचना हुई, क्योंकि नाबालिग का ब्रेनवॉश या दबाव में बयान देने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।  

रेप का आरोपित बेल पर बाहर आने के बाद फिर किया रेप

अक्टूबर 2023 में आसिफ उर्फ ​​छोटे बाबू नामक 22 वर्षीय व्यक्ति ने एक 17 वर्षीय लड़की का अपहरण किया और फिर उसका बलात्कार किया। आरोपित जमानत पर बाहर आने के बाद उसने 5 फरवरी 2025 को उत्तर प्रदेश के भदोही में एक लड़की का फिर से अपहरण किया और उसका रेप किया। इससे पहले वह 8 महीने जेल में रह चुका था।

ठाणे की पॉस्को कोर्ट ने दिया बेल

महाराष्ट्र के ठाणे स्थित पॉक्सो कोर्ट ने अप्रैल 2025 में 15 वर्षीय एक लड़की के अपहरण और उसका यौन शोषण के आरोपित को ज़मानत दे दी थी। जज डीएस देखमुख ने माना था कि पीड़िता और आरोपित के बीच सहमति से प्रेम संबंध बने थे और लड़की इसके परिणामों को समझने के लिए ‘काफी परिपक्व’ थी।

ओडिशा में बलात्कार के आरोपित ने जेल से बाहर आकर पीड़िता की हत्या की

ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले में पुलिस ने एक नाबालिग लड़की की हत्या के आरोप में कुनू किशन नामक व्यक्ति को 11 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। आरोपित ने उसी लड़की के साथ बलात्कार के किया था और उस मामले में वह अगस्त 2023 में गिरफ्तार किया गया था। जमानत पर रिहा होने के बाद उसने लड़की पर अपने पक्ष में बयान देने का दबाव डाला।

हालाँकि, लड़की ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया। इसका बदला लेने के लिए आरोपित कुनू किशन ने पीड़िता की हत्या कर दी। इतना ही नहीं, आरोपित ने पीड़िता के शव के टुकड़े करके जिले के अलग-अलग हिस्सों में फेंक दिए। पुलिस का कहना है कि जेल में रहते हुए ही उसने हत्या की योजना बना ली थी।

केरल हाईकोर्ट ने पॉक्सो केस खारिज की

साल 2021 में केरल के एक व्यक्ति पर 17 वर्षीय लड़की के अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज हुआ था। बाद में दोनों ने शादी कर ली और अब उनके दो बच्चे हैं। जुलाई 2024 में केरल हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति ए. बदरुद्दीन ने आरोपित के खिलाफ दर्ज पॉक्सो के मामले को रद्द कर दिया था।

इसके पीछे तर्क देते हुए जस्टिस बदरुद्दीन ने कहा था कि बलात्कार और पॉस्को मामलों में समझौता कानूनन स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इस मामले में मानवीय आधार पर केस खारिज किया गया, ताकि पारिवारिक जीवन और बच्चों की भलाई प्रभावित न हो। इस तरह अदालत बलात्कार की पीड़िता से शादी करना बलात्कारी के अपराध को माफ कर देता है।

बलात्कार के आरोपित ने पीड़िता के पिता और भाई की हत्या की

मार्च 2024 में हरियाणा के 19 वर्षीय मुकुल कुमार नाम के रेप के आरोपित ने 14 वर्षीय बलात्कार पीड़िता के रेलकर्मी पिता और 8 वर्षीय भाई की धारदार हथियार से हत्या कर दी। इन हत्याओं के बाद पीड़िता ने पिता के फोन से अपने दादा को वॉयस मैसेज भेजकर घटना की जानकारी दी। आरोपित पीड़िता का पड़ोसी था और उस पर पहले से बलात्कार का आरोप था।

बेल के लिए MP हाईकोर्ट ने आरोपित को पीड़िता से ‘राखी’ बँधवाई

जुलाई 2020 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने यौन उत्पीड़न के आरोपित को जमानत देने की शर्त पर पीड़िता से राखी बँधवाने का आदेश दिया। इस फैसले ने न्याय की मर्यादा तोड़ते हुए आरोपित को ‘भाई’ के रूप में पेश किया और यौन हमले को महत्वहीन बना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 में इस फैसले पर रोक लगाते हुए इसे ‘अपमानजनक’ बताया था।

‘क्या आप पीड़िता से शादी करेंगे?‘: रेप के आरोपित से सुप्रीम कोर्ट का सवाल

मार्च 2021 में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) एसए बोबडे की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने बलात्कार के आरोपित एक सरकारी कर्मचारी से पूछा था, “क्या आप पीड़िता से शादी करेंगे?” पीड़िता आरोपित की रिश्तेदार थी और जब वह नाबालिग थी, तब आरोपित ने उसका बलात्कार किया था। बेंच बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा आरोपित को अग्रिम जमानत दिए जाने के खिलाफ़ याचिका पर सुनवाई की थी।

तब तत्कालीन CJI ने पूछा था, “क्या आप उससे (पीड़िता से) शादी करेंगे? हम आपको शादी करने के लिए मजबूर नहीं कर रहे हैं। अगर आप करेंगे तो हमें बताएँ। अन्यथा, आप कहेंगे कि हम आपको उससे शादी करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।” इस टिप्पणी पर देशभर में भारी विरोध हुआ था। इसके बाद CJI बोबडे ने सफाई दी थी कि उनकी पूछताछ न्यायिक रिकॉर्ड पर आधारित थी।

जस्टिस बोबड़े ने कहा था कि आरोपित ने यह वचन दिया था कि वह नाबालिग लड़की (पीड़िता) के 18 वर्ष की हो जाने के बाद उससे विवाह करेगा। आरोपित ने बताया था कि वह पीड़िता से शादी करना चाहता था, लेकिन पीड़िता ने इनकार कर दिया था। इसके बाद उसने कहीं और विवाह कर लिया। इसके बाद शीर्ष अदालत ने आरोपित को गिरफ्तारी से अंतरिम राहत दे दी थी।

कर्नाटक हाईकोर्ट का विवादित फैसला: ‘पीड़िता का व्यवहार आदर्श नहीं’

जुलाई 2020 में राकेश बी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपित  को जमानत दे दी। जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित ने पीड़िता की गवाही पर सवाल उठाते हुए कहा कि उसका व्यवहार एक “आदर्श” बलात्कार पीड़िता जैसा नहीं था। कोर्ट ने पूछा कि पीड़िता रात 11 बजे आरोपित से मिलने क्यों गई, शराब पीने पर आपत्ति क्यों नहीं जताई, और उसे सुबह तक क्यों रुकने दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के जज ने कहा कि उसका यह कहना कि वह थक गई थी और सो गई, “भारतीय महिला के लिए अनुचित” है। इस फैसले ने पीड़ितों से ‘भावनात्मक रूप से आदर्श’ प्रतिक्रिया की अपेक्षा और उनके आचरण पर न्याय को टालने की मानसिकता को उजागर किया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश ने पीड़िता पर की थी टिप्पणी

जुलाई 2020 में कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महिला के साथ बलात्कार के आरोपित व्यक्ति राकेश बी. को जमानत दे दी थी। न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित ने पीड़िता की गवाही को ‘विश्वास करने में थोड़ा मुश्किल’ माना था कहा था कि पीड़िता का व्यवहार किसी भी तरह से एक अनिच्छुक, भयभीत और पीड़ित के व्यवहार के जैसा नहीं था।

जज ने पीड़िता से यह भी पूछा कि वह रात 11 बजे अपने अधिकारी से क्यों मिलने गई और उसने आरोपित के साथ शराब पीने पर आपत्ति क्यों नहीं जताई। इसके अलावा, कोर्ट ने पीड़िता से यह भी पूछा कि उसने आरोपित को सुबह तक अपने साथ क्यों रहने दिया।

जज ने पूछा, “उसने (पीड़िता ने) स्पष्टीकरण दिया था कि वह इस कृत्य के बाद थक गई थी और सो गई थी। यह एक भारतीय महिला के लिए अनुचित है… यह उस तरह नहीं है जिस तरह से हमारी महिलाएँ बलात्कार के बाद प्रतिक्रिया करती हैं।”

दरअसल, न्यायालय ने सुझाव दिया कि बलात्कार पीड़ितों को विश्वसनीय दिखने के लिए भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के अनुरूप होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो उन पर ‘विश्वास करना कठिन’ है और आरोपित को उसके साथ रहने या शराब पीने की अनुमति देने के लिए पीड़िता को दोषी ठहराना उचित है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर महिलाएँ देर रात तक पुरुषों को अपने आसपास रहने देती हैं तो यह बलात्कार का जोखिम उठाने जैसा है।

निष्कर्ष

न्यायपालिका के बयान और उनके द्वारा की गई विवादित टिप्पणियाँ उन पर सवाल खड़े करती हैं। उदाहरण के तौर पर ‘पर्याप्त परिपक्व’ जैसी टिप्पणियाँ और बलात्कारियों को पीड़ितों से शादी की अनुमति देना नाबालिगों को खतरे में डालता है। अदालतें जब ‘प्रेम संबंध’ का हवाला देकर फैसले सुनाती हैं या बलात्कारियों को जमानत देती हैं तो न केवल असंवेदनशीलता दिखाती हैं बल्कि पीड़ितों की सुरक्षा को भी खतरे में डालती हैं।

जमानत पर छूटे अपराधियों द्वारा दोबारा बलात्कार और हत्या जैसे मामले पीड़ितों में डर और अविश्वास पैदा करते हैं। इससे पता चलता है कि न्यायपालिका अक्सर अभियुक्तों के ‘पुनर्वास’ या महिलाओं के प्रति सामाजिक पूर्वाग्रहों (नकारात्मक सोच) को न्याय से ऊपर रखती हैं, जिससे यौन हिंसा के मामलों में सजा की जगह दंड से मुक्ति की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।

न्यायपालिका जब पीड़ितों को उनके मित्रों से मिलने या ‘पर्याप्त’ प्रतिरोध नहीं करने के लिए दोषी ठहराती हैं तो स्थिति और भी खराब हो जाती है। इस तरह अदालतें अपराधियों की जवाबदेही को कम करके न्याय प्रणाली पर भरोसे को कम करती हैं। साल 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फिल्म निर्देशक महमूद फारूकी को संदेह का लाभ देकर बरी करते हुए कहा था कि ‘कमज़ोर ‘ना’ भी ‘हाँ’ हो सकती है’।

कोर्ट ने कहा था, “महिलाओं के व्यवहार के उदाहरण अज्ञात नहीं हैं कि एक कमज़ोर ‘नहीं’ का मतलब ‘हाँ’ हो सकता है।” दरअसल, अदालतें बलात्कार पीड़ितों से कमज़ोर दिखना, विनम्र होना, दुर्व्यवहार का ‘काफी मजबूती से’ विरोध करना जैसे व्यवहार या इससे भी ज्यादा की उम्मीद करती हैं। अगर ऐसा नहीं होता है तो ‘मुसीबत को आमंत्रित किया’ जैसी टिप्पणियाँ की जाती हैं।

अदालतें जब पीड़िता को ही ‘आदर्श पीड़िता’ साबित करने की कोशिश करती हैं तो उनके लिए न्याय पाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि इससे न्याय की गंभीरता कम हो जाती है। इसका परिणाम ये होता है कि आरोपित को जमानत मिल जाती है और फिर वे बाहर आकर कभी पीड़ित एवं उसके परिवार की हत्या कर देते हैं तो कभी फिर से अपराध को अंजाम देते हैं।

POCSO के मामलों में, जहाँ पीड़ित नाबालिग होती हैं, ज़मानत देने में नरमी और भी गंभीर हो जाती है। ऐसे मामलों में कानून मानता है कि आरोपित तब तक दोषी है, जब तक कि वह अन्यथा साबित न हो जाए। इसके बावजूद अदालतों ने कई मामलों में अवास्तविक सबूत या पीड़िता के प्रतिरोध के सबूतों की माँग की है। इससे बलात्कारी हतोत्साहित नहीं होंगे।

भारतीय न्यायिक प्रणाली में एक समस्या है और यह समस्या पुरुष वर्चस्व की हो सकती है। केवल 14% उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और कुल केवल 9.3% न्यायाधीश महिलाएँ हैं। दरअसल, पितृसत्तात्मक सोच पितृसत्तात्मक परिणामों को जन्म देती है। इस सोच से न्यायिक व्यवस्था भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती है।

साल 2021 में अपर्णा भट बनाम मध्य प्रदेश राज्य केस में सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के दौरान पीड़िता के पहनावे, व्यवहार या नैतिकता पर टिप्पणी करने से मना किया और संवेदनशील रवैया अपनाने की बात कही थी। हालाँकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट सहित कई हालिया फैसले दिखाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की ये गाइडलाइंस आज तक प्रभावी नहीं हो पाई हैं। इसलिए न्यायाधीशों की संवेदनशीलता का प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि पीड़िता को दोषी ठहराने की मानसिकता समाप्त होनी चाहिए और अदालतों को निर्णय केवल तथ्यों और सबूतों के आधार पर देना चाहिए, न कि पीड़िता के चरित्र पर। जब तक न्यायपालिका में गंभीर सुधार नहीं होते, तब तक इलाहाबाद हाईकोर्ट जैसे अपमानजनक आदेश सामने आते रहेंगे। महिलाओं को निर्णय नहीं, न्याय मिलना चाहिए।

(इस रिपोर्ट को श्रद्धा पांडेय ने मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा है। पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक करें)