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‘किसान’ सड़क पर टेंट और ट्रॉली में, नेता थ्री स्टार होटल में फरमा रहे आराम; लाखों का बिल: रिपोर्ट

कथित किसान आंदोलन में खालिस्तानियों और कट्टरपंथियों की घुसपैठ से आप परिचित हैं। ट्रैक्टर रैली की आड़ में 26 जनवरी को हुई हिंसा और टूलकिट से इसकी आड़ में रची जा रही देश विरोधी साजिशों से भी आप परिचित हैं। हम यह भी बता चुके हैं कि खुद को किसानों का नेता बताने वाले नुमाइंदे कैसे कृषि कानूनों पर अपनी ही बात से पलटे हैं। इस आंदोलन की अगुआई कर रहे लोगों की संपत्ति को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। अब मीडिया रिपोर्ट से पता चला है कि ‘किसान’ जहाँ सड़क पर टेंट और ट्राली में समय व्यतीत कर रहे हैं, वहीं उनके कुछ नेता थ्री स्टार होटल में आराम फरमाते हैं, जिसका बिल लाखों में है।

जी न्यूज (zee News) की रिपोर्ट के अनुसार होटल में ठहरने वाले नेताओं में बलबीर सिंह राजेवाल और कुलवंत सिंह संधू हैं। ये प्रदर्शन स्थल के पास कुंडली में स्थित थ्री स्टार होटल टीडीआई क्लब रिट्रीट (TDI CLUB Retreat) में ठहरे हैं। किसानों के प्रदर्शन के करीब 40 नेता अगुआ बने हुए हैं। इनके समर्थक ठंड, बरसात, गर्मी की परवाह किए बिना ही सड़कों पर टेंट, ट्रॉली वगैरह में डेरा डाले हुए हैं।

जी न्यूज ने अपनी रिपोर्ट की प्रमाणिकता के लिए होटल के कुछ बिल भी सार्वजनिक किए हैं। इसके मुताबिक भारतीय किसान यूनियन-राजेवाल (BKU राजेवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल होटल के कमरा संख्या 206 में 12 दिसंबर 2020 से 3 मार्च 2021 के बीच रहते थे। फिलहाल वे कमरा संख्या 303 में रह रहे हैं। इसके लिए उन्होंने 12 दिसंबर से 28 जनवरी के बीच 1.30 लाख रुपए का भुगतान किया। इसमें नाश्ता और कपड़े धुलवाना जैसे खर्च शामिल थे।

होटल बिल, साभार: जी न्यूज

नाश्ते और लॉन्ड्री जैसे खर्च समेत कमरे का प्रतिदिन का खर्च 2500 रुपए है। इस हिसाब से राजेवाल अब तक करीब 2.40 लाख रुपए खर्च कर चुके हैं। बताया जाता है कि राजेवाल को डिस्काउंट भी मिला है और उन्होंने ज्यादातार पेमेंट नकद में ही किया है।

वहीं जमुहारी किसान सभा, पंजाब के महासचिव कुलवंत सिंह संधू इसी होटल के कमरा संख्या 201 में अपने बेटे दोसांझ के साथ 27 दिसंबर 2020 से ठहरे हुए हैं। हालाँकि उनके ठहरने और खाने-पीने का इंतजाम फ्री है। संधू पर इस मेहरबानी के पीछे होटल के मालिकों में से एक रवींद्र तनेजा को बताया जा रहा है। तनेजा मानेसर लैंड स्कैम का आरोपित है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने इस संबंध में साल 2020 में पंचकूला स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट दायर की थी। इसके मुताबिक रविंद्र तनेजा समेत 13 अन्य बिल्डरों ने किसानों के साथ 1500 करोड़ का गबन किया था।

‘सत्ता से बाहर हैं तब इतनी गुंडई’: सवाल से गुस्साए अखिलेश यादव, पत्रकारों पर टूट पड़े समर्थक-सुरक्षाकर्मी

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव की गुरुवार (मार्च 11, 2021) को मुरादाबाद में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में जमकर हंगामा हुआ। रिपोर्टों के अनुसार पूर्व मुख्यमंत्री के सामने ही उनके समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों की पिटाई की। इस घटना के कई वीडियो वायरल हुए हैं।

मिली जानकारी के अनुसार मुरादाबाद के एक होटल में सपा का ट्रेनिंग कैंप चल रहा था। इसी दौरान वहाँ गुरुवार को अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। पूर्व मुख्यमंत्री के सुरक्षा कर्मियों ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक प्रतिनिधि के साथ धक्का-मुक्की की। बताया जाता है कि अखिलेश यादव किसी सवाल से नाराज हो गए। इसके बाद वहाँ मौजूद उनके समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों ने मीडियाकर्मियों पर हमला बोल दिया। इस दौरान कई पत्रकारों को चोटें आई।

सुरक्षा कर्मियों ने कथित तौर पर मीडिया प्रतिनिधियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा। किसी तरह हॉल से भागकर मीडिया प्रतिनिधियों ने खुद को बचाया। घटना रात आठ बजे दिल्ली रोड स्थित एक होटल की है। पत्रकार को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि कभी सवाल बीजेपी से भी पूछ लिया करो? क्या बीजेपी के ही सवाल पूछोगे?

अखिलेश यादव की प्रेसवार्ता होटल हॉली डे रीजेंसी के हॉल में थी। बताया जाता है प्रेसवार्ता का समय साढ़े पाँच बजे रखा गया था, लेकिन तय समय से करीब दो घंटे देरी से प्रेस को संबोधित करने अखिलेश यादव पहुँचे। रात करीब आठ बजे प्रेसवार्ता समाप्त होने के बाद जब अखिलेश यादव जाने लगे, उसी दौरान एक चैनल के प्रतिनिधि ने उन्हें रोककर बात करने का प्रयास किया। सुरक्षा कर्मियों ने चैनल के प्रतिनिधि को धक्का दे दिया। इसी बात को लेकर पत्रकार और सुरक्षाकर्मियों के बीच बहस हो गई।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने एक पत्रकार की आपबीती का वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में मुरादाबाद के वरिष्ठ पत्रकार फरीद शम्सी ने बताया कि समाजवादी पार्टी के गुंडों ने महज सवाल पूछने पर बंदूक के कुंदों से पीटा। उन्होंने बताया कि सवाल पूछने पर रायफल मारा। सवाल पूछने पर सारे पत्रकारों को उठा-उठा कर फेंका। किसी के मोबाइल टूटे तो किसी का कैमरा टूटा।

उन्होंने घटना का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “एक बार फिर देखिए लाल टोपी वाले गुंडों की गुंडई। सवाल पूछने पर सपाई गुंडों ने पत्रकारों को बुरी तरह पीटा, धमकाया, अपमानित कर भगाया, कई घायल। गेस्ट हाऊस कांड के बाद यूपी के इतिहास का सबसे कलंकित दिन। अभी सत्ता से बाहर हैं, तब इतनी गुंडई, सोचिए सत्ता में रहते कितना नशा रहा होगा।”

वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार मृत्युंजय कुमार ने इसे शेयर करते हुए लिखा, “एक तो पत्रकारों को अपनी सभा में बुलाकर पिटवाते हो और फिर उनके शिकायत करने पर उन्हें भाजपा का एजेंट बताते हो! इतनी निर्दयता आख़िर कहाँ से लाते हो?”

बीजेपी की प्रदेश महामंत्री प्रियंका सिंह रावत ने इस घटना को निंदनीय बताते हुए लिखा, “मुरादाबाद में सवाल पूछने पर पत्रकार के साथ मारपीट निंदनीय है। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है। यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमला है। सपा मुखिया अखिलेश यादव यही प्रशिक्षण देने के लिए आए थे? इससे सपा का चरित्र उजागर हुआ है। इतनी निर्दयता आख़िर कहाँ से लाते हो?”

वामपंथियों-पाकिस्तानियों की शह पर काम करने वाली संस्था ने भारत में ‘लोकतंत्र’ का घटाया दर्जा, राहुल गाँधी ने लपका

स्वीडन स्थित वी-डेम (V-Dem) इंस्टीट्यूट ने अपनी हालिया रिपोर्ट में दावा किया है कि भारत अब ‘इलेक्टोरेल डेमोक्रेसी’ नहीं रहा, बल्कि ‘इलेक्टोरेल ऑटोक्रेसी’ बन गया है। सरल भाषा में समझें तो इस रिपोर्ट में भारत में लोकतंत्र के दर्जे को घटाकर इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी ‘चुनावी एकतंत्रता’ या चुनावी निरंकुशता कर दिया गया है।

इस भारत विरोधी रिपोर्ट को हवा देने का काम जो लोग कर रहे हैं उनमें कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी भी हैं। राहुल ने गुरुवार (मार्च 11, 2021) को स्वीडिश मीडिया का हवाला देकर ट्विटर पर लिखा कि इंडिया अब लोकतांत्रिक देश नहीं रह गया है। उन्होंने जो स्क्रीनशॉट शेयर किया उसमें लिखा था कि पाकिस्तान की तरह अब भारत भी ऑटोक्रेटिक है। भारत की स्थिति बांग्लादेश से भी खराब है।

मालूम हो कि ये पहली बार नहीं है कि जब राहुल गाँधी ने देश विरोधी एजेंडे को हवा दी है। वे पहले भी कई बार ऐसा कर चुके हैं। मसलन जब चीन के साथ विवाद बढ़ना शुरू हुआ था तो उन्होंने चीन के विरुद्ध कोई भी बयान देने की बजाय भारतीय सरकार को जमकर घेरा था। वीडियो रिलीज करके उन्होंने मोदी सरकार की आलोचना की थी। इसी प्रकार जब पुलवामा हमला हुआ था तब भी उनकी पार्टी ने पाकिस्तान की जगह अपनी सरकार पर सवाल उठाए थे।

दिलचस्प बात ये है कि राहुल गाँधी ने आज जिस रिपोर्ट का हवाला देकर भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाए हैं, उस रिपोर्ट को तैयार करने वालों में कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नफरत करने वाले भी हैं। इस संस्था के सदस्यों में दो भारतीय हैं।

V-Dem की वेबसाइट से लिया गया स्क्रीनशॉट

एक का नाम प्रताप भानू मेहता है, जो सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के अध्यक्ष हैं और दूसरे जेएनयू के प्रोफेसर नीरजा गोपाल जयाल। दोनों ही सीएए समेत मोदी सरकार की सभी नीतियों के हमेशा विरुद्ध रहते हैं और गौर करने वाली बात है कि वी-डेम की इस रिपोर्ट में भारत के ऑटोक्रेसी होने के पीछे सीएए को सबसे प्रमुख उदाहरण बताया गया है।

इन दोनों भारतीयों में से वी-डेम वेबसाइट ने आज किन्हीं कारणों से प्रताप भानू मेहता का नाम लिस्ट से हटा दिया है। पहले वह इस जगह बतौर एडवाइजर लिस्टेड थे, जिसे वेबपेज के आर्काइव में देखा जा सकता है। इनके अलावा एडवाइजरी बोर्ड में पाकिस्तानी वकील व राजनीतिज्ञ एतजाज एहसान भी शामिल है। सबसे बड़ी बात जो ध्यान देने वाली है वह यह कि स्वीडिश संस्था ने भारत के लोकतंत्र पर फैसला केवल दो दर्जन लोगों के विचार के आधार पर सुनाया है।

नंदीग्राम में ममता बनर्जी पर ‘हमले’ के क्या हैं मायने: बंगाल में TMC के लिए चुनावी अवसर या यूजर्स के लिए मीम

10 मार्च 2021 को नंदीग्राम में हुए ‘हमले’ को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किसी साजिश का नतीजा बताया था। उन्होंने कहा था कि वह चोट लगने से काफी दर्द में हैं और उनको बुखार भी हो गया है। हालाँकि, घटना के बाद वह पूरे 300 किलोमीटर का फासला तय करके SSKM अस्पताल में भर्ती हुईं। 

उनके कार्यकर्ता इस बीच लगातार इल्जाम लगाते रहे कि ये चुनाव प्रचार से उन्हें दूर रखने की साजिश हैं। यहाँ उन्होंने किसी का नाम लिए बिना भाजपा पर निशाना साधना चाहा। वहीं चश्मदीदों ने पूर्ण रूप से ममता के हर दावे को खारिज किया। सबने बताया कि किसी ने ममता बनर्जी को धक्का नहीं दिया, जो हुआ वो दुर्घटना थी।

चश्मदीद, ममता के इस दावे को भी नकारते हैं कि घटना के समय पुलिस वाले उनके साथ नहीं थे। लोगों का कहना है कि उस समय ममता बनर्जी पुलिस वालों से घिरी थीं।

घटना को विस्तार से बताते हुए चश्मदीदों ने कहा कि उस समय ममता बनर्जी की कार चल रही थी। कार के दरवाजे खुले थे और वह बाहर इंतजार कर रहे लोगों का हाथ जोड़कर अभिवादन कर रही थीं। नंदीग्राम के बिरुलिया बाजार में कार एक खंभे से टकराई और दरवाजा उनके पैर में जा लगा। इसी से उन्हें चोट भी आई। घटना के समय मौजूद लोगों का कहना है कि 4-5 लोगों द्वारा धक्का देने की बात सरासर गलत है।

अब ममता और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में ऐसी विसंगति ये सवाल उठाती है कि आखिर इस घटना के बाद बंगाल के मतदाता क्या सोचेंगे? बीजेपी ने तो इसे नौटंकी कहा है और ममता के दावों को मानने से इनकार किया है, जिसके कारण पार्टी को निष्ठुर व क्रूर तक कहा जा रहा है। ऐसे में यह जानना वाकई दिलचस्प है कि वोटरों का इस पर क्या असर होगा।

जैसी स्थिति है किसी को भी मानना ही होगा कि राजनेत्री की यह तस्वीर, जिसमें वह बिस्तर पर पड़ी हैं, चेहरे पर ऐसे एक्सप्रेशन हैं, पैरों में पट्टी बँधी है, वह बेहद ताकतवर है। भारत के पुरुषवादी समाज को ऐसी तस्वीरें पसंद आती हैं। ये आदर्श फिल्म के लिए बिलकुल सटीक है।

जैसा कि हम जानते हैं कि चुनाव भावनाओं पर जीते जाते हैं, लेकिन संभव है कि कुछ इस बात को मानने से मना करें और खुद को उस तार्किक व्यक्ति की तरह दिखाने की कोशिश करें, जो नेताओं को उनके ट्रैक रिकॉर्ड और निर्णयों के आधार पर आँकता है, लेकिन हकीकत में सच ये नहीं होता।  

लोग उन्हें वोट करते हैं जो उनके दिल में उतरें। राजनीति आसान काम नहीं है, चाहे कोई कितना भी तर्क दे। आपको वाकई समझना होता है कि लोग क्या चाहते हैं। फिर उन वादों को पूरा करना पड़ता है जो आपने उनके किए। और केवल वादे ही नहीं, आपको उन्हें मनाने वाला, उन्हें प्रेरित करने वाला और सबसे महत्वपूर्ण उनसे सहानुभूति रखने वाला बनना पड़ता है। यही सब आपको अच्छा राजनेता बनाता है कि लोग आप पर यकीन करें। इसी के बाद वो आपको अपना जवाब वोट के रूप में देते हैं, इस आशा से कि सिर्फ और सिर्फ़ आप उनके लिए लड़ेंगे।

अच्छे नेता की पहचान वास्तव में ईमानदारी के आधार पर होती है कि एक नेता अपने किए गए वादों में से कितनों को वोट पाने के बाद पूरा करता है।

हालाँकि, टीएमसी का इन सब गुणों से सरोकार नहीं है।

2011 में ममता बनर्जी जब सत्ता में आई तो उसका आधार माँ, माटी, मानुष था। उन्होंने कहा था कि माटी की बेटी हैं, जो इस माटी से संबंध रखने वालों के लिए अपनी आखिरी साँस तक काम करेंगी।

ममता ने उस बयान से सत्ता पाने तक एक कठिन यात्रा तय की। वह दंगों में बंगाली हिंदुओं की हत्या पर चुप रहीं। एनआरसी के लिए प्रदर्शन किया, पहले बांग्लादेशियों को वापस भेजने की बात कही, बाद में ये कह दिया कि वह भी बंगाल के नागरिक हैं।

जाहिर है टीएमसी ने सत्ता पाने के लिए हमेशा ही लोगों की भावनाओं के साथ खेला है। लेकिन इस बार उन्हें ऐसा क्यों लग रहा है कि बंगाल में बयानबाजी से काम चलेगा। क्यों ऐसा माना जा रहा है कि इस घटना से लोगों पर प्रभाव पड़ेगा?

नए लोगों के लिए ये अच्छी राजनीति है। यकीन नहीं होता! प्रशांत किशोर ने इसे लेकर एक इंटरव्यू में कहा भी था। किशोर ने बाकायदा ये कहा था कि अगर पैरामिलिट्री फोर्स पर कोई हमला हुआ तभी भाजपा 100 से ज्यादा सीट जीत पाएगी। वरना ये असंभव है। 

अब किशोर का ये बयान साफ तौर पर बताता है कि बंगाल में भावनाओं के दम पर चुनाव के फैसले होते हैं। तो क्या जो नंदीग्राम में ममता बनर्जी के साथ हुआ उसे इस लिस्ट का हिस्सा नहीं माना जाएगा।

ध्यान रहे कि आज पूरा दिन टीएमसी का यही दावा ठोकने में बीता है कि एक सुनियोजित ढंग से ममता बनर्जी पर हमला हुआ, जबकि पुलिस कह चुकी है कि ये एक्सीडेंट था।

सवाल है कि बंगाल में भावनाएँ चुनाव में कैसे काम करती है? इसके लिए हमें याद करना होगा 1977-2011 का वामपंथी शासन। जहाँ पाँच बार ज्योति बसु मुख्यमंत्री रहे और दो बार बुद्धदेव भट्टाचार्या। ज्योति बसु के राज में हिंदुओं ने तमाम नरसंहार देखा। मरीचझापी नरसंहार इसमें शामिल है। बुद्धदेव भट्टाचार्या के समय भी कई बार राजनीतिक हिंसा हुई।

बंगालियों ने वामपंथियों को 35 साल दिए। क्यों? क्योंकि उन्हें लगा वह कुछ करेंगे। लेकिन असल में लेफ्ट बंगालियों को हाशिए पर ले आया। पूरे 35 साल लग गए उन्हें ये एहसास करने में कि वामपंथी उनके लिए कुछ नहीं कर रहे। लेकिन फिर भी उन्होंने उन्हें ही वोट दिया, क्योंकि ममता बनर्जी ने दलितों के लिए कुछ करने का वादा नहीं किया था।

अनशन पर ममता बनर्जी

बंगाल की जनता ने ममता पर तब यकीन किया जब वह उनके साथ भूख हड़ताल पर बैठी। उन्होंने तब वोट दिया जब उन्हें वामपंथियों से पिटते देखा। उन्हें लगा कि ये ममता तो उन लोगों की बेहतरी के लिए लड़ रही हैं, जबकि कम्युनिस्ट सिर्फ़ सत्ता हथियाने के लिए।

जब ममता कॉन्ग्रेस में थीं तो उन पर जानलेवा हमला हुआ था

आप समझिए कि बंगाल के लोगों को अपने शानदार इतिहास पर गर्व है। वह उसे लेकर मंत्रमुग्ध हैं। उनके लिए बंगाली होने का मतलब अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति करने वाले, अत्याचारियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले और सभी बाधाओं के खिलाफ खड़े होने वाले बुद्धिजीवियों से है।

राजनीति उनके लिए सिर्फ़ एक सामान्य चर्चा का विषय नहीं है। इसे वह बस अड्डे, सुट्टे की दुकान, पान के खोखे, बस के भीतर, ट्रेन में हर जगह छेड़ सकते हैं। इस दौरान वह अपने पूर्वजों पर बात करना नहीं भूलते, उनकी शूरता की गाथा सुनाना नहीं भूलते। क्रांति यहाँ के लोगों के दिलों और खून में है।

ममता ने अपने हालिया ड्रामे के साथ इन्हीं भवनाओं को भड़काने की कोशिश की है, लेकिन अफसोस बाकियों के लिए वह मीम बन गया। माटी की बेटी ये दिखाना चाहती हैं कि उन्होंने अत्याचारियों से लड़कर सत्ता में वापसी की है ताकि वह लोगों से लड़ सकें। ये उनका परफेक्ट प्लान है। प्रशांत किशोर अपनी बात कह चुके हैं, क्योंकि उन्होंने बंगाल का अध्य्यन किया है। ममता ने ऐसा कर दिखाया, क्योंकि वो यहाँ रही हैं।

लेकिन, सिर्फ़ इस बार मुमकिन है कि ममता बनर्जी को क्रांतिकारी के तौर पर नहीं देखा गया, बल्कि एक ऐसे शख्स के तौर पर देखा गया जो क्रांतिकारियों को चुप कराए।

आज जैसे-जैसे जय श्री राम के नारे बुलंद होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कोई भी समझ सकता है कि ममता के हथकंडे काम नहीं कर रहे। ममता को याद रखना चाहिए ये वही बंगाल है जो अत्याचारियों को हर बार नकारता है। इन्होंने वामपंथियों को 35 साल दिए और आखिर में टीएमसी को तंग आकर सत्ता में लाई। इस बार बंगालियों की भावनाएँ फिर उन लोगों को देख आहत हुईं है, जिन्हें कभी बर्बरता से मारा गया, कभी पेड़ से लटकाया गया। शायद इस बार सूजे हुए टखने उन्हें पिछली बार की तरह जीत न दिला पाए।

नुपूर जे शर्मा द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया यह लेख आप यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं

बीफ और माता सीता में कनेक्शन बताने वाले TMC नेता ने ममता पर ‘हमले’ को RSS और गोधरा से जोड़ा

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेता मदन मित्रा ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ नंदीग्राम में हुई दुर्घटना को आरएसएस और गोधरा कांड से जोड़ा है। इसे ममता की हत्या की साजिश करार दिया है।

मित्रा वही नेता हैं जिन्होंने पिछले दिनों भगवान परशुराम और माता सीता के बारे में भ्रामक जानकारी फैलाकर हिंदुओं की भावना को ठेस पहुँचाने का प्रयास किया था। उन्होंने कहा था कि परशुराम भगवान कभी भी बिना बीफ के खाना नहीं खाते थे। माता सीता उनके लिए स्वयं बीफ पकाती थीं।

अब नंदीग्राम की घटना को ‘हमला’ बताते हुए मित्रा ने आरएसएस (RSS) पर निशाना साधते हुए कहा है कि इसके पीछे निक्कर पहन कर ट्रेनिंग लेने वाले लोग हैं। उन्होंने कहा, “अगर इस प्रकार की घटना किसी अन्य राज्य में होती, मान लीजिए गुजरात तो यह एक और गोधरा बन जाता। यह हत्या की साजिश थी।” उन्होंने कहा, “उम्मीदवार होने के नाते मैं आरोप लगा रहा हूँ, लेकिन पुलिस हमारी बात नहीं सुन रही है। यहाँ गुंडागर्दी चल रही है। जनता को मालूम है ये सब कौन कर रहा है? जिसके पास ताकत है।”

मालूम हो कि मदन मित्रा ने जिस गोधरा कांड का नाम गुस्से में लिया है, उसकी हकीकत ये है कि साल 2002 में मुस्लिम भीड़ ने ट्रेन के एक पूरे डब्बे में आग लगा दी थी। इसमें 59 कारसेवकों की मौत हुई थी। इसके बाद पूरा गुजरात साम्प्रदायिक दंगों की आग में जला था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे।

अब मित्रा भले ही ममता बनर्जी के साथ हुई दुर्घटना को गोधरा नरसंहार से सीधे नहीं जोड़ रहे। लेकिन यदि वे इस बात को मानते हैं कि ये सब कहीं और हुआ होता तो गोधरा जैसे दंगे हो जाते, उसका एक ही मतलब है कि ममता बनर्जी पर हमले को वह गोधरा कांड की तरह ही समझते हैं।

बता दें कि बंगाल सरकार में मंत्री व तृणमूल महासचिव पार्थ चटर्जी ने इस घटना के बाद विरोध का ऐलान किया है। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, उन्होंने कहा, “कल दोपहर 3 बजे से 5 बजे तक घटना की निंदा करने के लिए हम काला झंडा फहराते हुए काली पट्टी मुँह पर बाँधकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेंगे।”

उनका कहना है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति अच्छी थी, लेकिन चुनावों की घोषणा के बाद कानून-व्यवस्था निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी बन गई। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने राज्य पुलिस के डीजीपी को हटा दिया और अगले ही दिन उन पर (ममता बनर्जी) हमला हो गया।

गौरतलब है कि इस घटना को लेकर बंगाल पुलिस ने प्राथमिक जाँच के बाद चुनाव आयोग के समक्ष रिपोर्ट जमा की है। इसमें इसे दुर्घटना कहा गया है, न कि हमला। चश्मदीदों के बयान के आधार पर रिपोर्ट में कहा गया है कि ममता बनर्जी की कार छोटे से लोहे के खंभे से टकराई और वह चोटिल हुईं।

30-40 कुत्तों के साथ रेप कर चुका है 68 साल का अहमद शाह, कहा- मैं खाना देता था, यह क्राइम नहीं

मादा कुत्ते से रेप करने के आरोप में गिरफ्तार किए गए 68 वर्षीय अहमद शाह को लेकर कई चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। वह अब तक 30-40 कुत्तों के साथ रेप कर चुका है। वह अमूमन रात के 3-4 बजे के बीच इस घृणित कृत्य को अंजाम देता था।

मुंबई के जुहू गली में रहने वाला अहमद सब्जी विक्रेता है। वह कुत्तों और बिल्लियों को खाने का लालच देकर उनसे रेप करता था। ‘बॉम्बे एनिमल राइट्स’ नामक NGO से जुड़े 45 वर्षीय पशु अधिकार कार्यकर्ता विजय मोहनानी की शिकायत पर डीएन नगर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।

मिड डे ने बताया है कि पूछताछ के दौरान आरोपित ने कहा कि वह जानवरों को खाना देता है और उनके साथ रेप करता है। इसमें यदि जानवरों को कोई आपत्ति नहीं है तो यह क्राइम नहीं है। मोहनानी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है, मंगलवार को उन्हें अहमद के इस कृत्य को लेकर एक कॉल आया था। कॉल करने वाले ने बताया कि वह लगातार कुत्तों के साथ रेप करता है। जब उन्होंने कॉल करने वाले से इसके सबूत को लेकर पूछा तो उसने एक वीडियो भेजा। दिसबंर 2020 के इस वीडियो को देखकर वे चौंक गए और उन्होंने डीएन नगर पुलिस स्टेशन को इस बाबत सूचना दी।

मोहनानी ने बताया, “पूछताछ के दौरान आरोपित ने खाने का लालच देकर रात के 3-4 बजे के बीच 30-40 कुत्तों के साथ रेप करने की बात कहीं। फिलहाल मेरी टीम जुहू गली के सभी मादा कुत्तों की चिकित्सकीय जाँच कर रही है। हम पीड़ित कुत्तों की एक सूची सौंपेंगे। यह घृणित अपराध है और आरोपित में कोई मानवीयता नहीं है।”

सीनियर इंस्पेक्टर भरत गायकवाड़ ने बताया कि मंगलवार की रात शाह को उसके घर से गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने इस मामले में मंगलवार (मार्च 9, 2021) को IPC की धारा-377 (अप्राकृतिक अपराध), 429 (किसी सस्तन प्राणी की हत्या करना या उसे अपंग बनाना) और ‘प्रिवेंशन ऑफ क्रूएलिटी ऑन एनिमल्स एक्ट (PCA) की धारा-11 (पशु के साथ क्रूरता भरा व्यवहार) के तहत FIR दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि आरोपित ऐसे कुकृत्य करने का आदी है और उसे कई बार स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी थी।

जुलाई 2019 में इसी तरह की जघन्य वारदात की खबर आई थी, जब मंगलौर में मोहम्मद अंसारी नाम के एक शख्स को खेत में गाय के साथ अप्राकृतिक सेक्स करते हुए ग्रामीणों द्वारा देखा गया था। ग्रामीणों के मुताबिक अंसारी ने पहले गाय के पाँवों को रस्सी से बाँधा था और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया था। उससे दिन पहले मध्य प्रदेश में छोटू खान ने गाय के साथ दुष्कर्म किया था। हाल में भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

‘हमला’ चिल्लाने वाली ममता ने आज नंदीग्राम घटना को कहा- ‘एक्सीडेंट’: CM के यू-टर्न और पुलिस की रिपोर्ट ने खोली पोल

पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ कथिततौर पर हुई धक्का-मुक्की के आरोप को सीएम ने खुद वापस ले लिया है। उन्होंने खुद को लगी चोट के ऊपर आज एक नया बयान दिया। श्रीमती सुचेता कृपलानी अस्पताल के बेड से वीडियो मैसेज शेयर करते हुए उन्होंने अपने समर्थकों से शांत रहने की अपील की।

कल तक वह जहाँ इस बात को कह रही थीं कि कार में चढ़े रहने के दौरान कुछ लोगों ने उन्हें धक्का दिया और उनके पाँव पर गाड़ी का गेट मारा। आज वह ये बता रही हैं कि जब वह कार के बोनेट पर थीं और हाथ जोड़ कर लोगों का अभिवादन कर रहीं थीं तभी उन्हें अचानक बहुत भार महसूस हुआ, धक्का लगा और उनका पाँव कार से कुचल गया।

दोनों बयान सुनकर जाहिर है कि ममता बनर्जी अपने पहले वाले बयान को वापस ले रही हैं और सहमति व्यक्त करती हैं कि वह एक दुर्घटना का शिकार होने के बाद घायल हो गई थीं, उन पर कोई हमला नहीं हुआ था।

ममता बनर्जी कहती हैं कि उन्हें बुरी तरह चोट लगी है और अब भी उन्हें हाथ-पाँव में दर्द हो रहा है। उन्होंने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने को कहा है। साथ ही कुछ भी ऐसा न करने को कहा है जिससे आम जन को दिक्कतें हों। ममता बनर्जी ने यह भी बताया कि वह 3-4 दिन में ठीक होकर वापस प्रचार पर लौटेंगीं, लेकिन हो सकता है उनके पाँव की परेशानी कुछ समय रहे, जिसे वह मैनेज कर लेंगी और जरूरत पड़ने पर व्हीलचेयर का भी इस्तेमाल करेंगी।

बता दें कि सीएम ममता के बयान पलटने के बावजूद भी ये बयान चश्मदीदों के बयान से मैच नहीं हो रहे। कई स्थानीय उस समय उनके आस-पास थे जब वह कार का दरवाजा खोल कर लोगों का अभिवादन कर रही थीं। उनके पाँव बाहर थे। लोगों का कहना है कि इस दौरान उनकी कार लोहे के खंभे से टकराई जिससे दरवाजे पर धक्का लगा और वह जाकर ममता बनर्जी के पाँव में लग गया।

इसके अलावा राज्य पुलिस की प्राथमिक जाँच के बाद चुनाव आयोग के समक्ष जमा की गई रिपोर्ट में भी इसे दुर्घटना कहा गया है न कि हमला। स्थानीय पुलिस, चश्मदीदों के बयान के आधार पर रिपोर्ट यही कहती है कि ममता बनर्जी की कार छोटे से लोहे के खंभे से टकराई और वह चोटिल हुईं।

गौरतलब हो कि मामले की जाँच में जुटी अधिकारियों की उच्च स्तरीय टीम की प्राथमिक रिपोर्ट से कोई निष्कर्ष नहीं आया है। जाँच टीम अपना काम कर रही है। सारे चश्मदीदों से बात करके फाइनल रिपोर्ट दी जाएगी। अधिकारियों को फिलहाल भीड़ के इकट्ठा होने और हमले के सुराग नहीं मिले हैं।

सुषमा स्वराज का पूरा हुआ आखिरी सपना: 9 साल की उम्र में पाकिस्तान पहुँची गीता को 20 साल बाद मिला अपना परिवार

साल 2015 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के अथक प्रयासों के बाद पाकिस्तान से भारत लौटने वाली गीता अब आखिरकार महाराष्ट्र के परभानी में अपने परिवार से मिल चुकी हैं। 9 साल की उम्र में वह गलती से पाकिस्तान चली गईं थी। लेकिन 2014, मोदी सरकार के आने के बाद जब सुषमा स्वराज ने विदेश मंत्री का पद संभाला तो मात्र एक साल में उन्होंने गीता को वापस लाने की कोशिशें तेज कर दीं और एक दिन पता चला कि गीता भारत लौट चुकी हैं। लेकिन उनको अपने परिवार से मिलाने का सपना सुषमा जी के जीते जी पूरा नहीं हो पाया था। जो अब पूरा हुआ है।

गीता के परिवार को ढूँढने की शुरुआत

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2015 में 24 साल की गीता को भारत लाना शायद इतना चुनौतीपूर्ण काम नहीं था, जितना कि उसके परिवार को भारत में ढूँढना था। गीता सिर्फ़ सांकेतिक भाषा में बात कर सकती थीं। वह बचपन से ही सुनने व बोलने में असमर्थ थीं। घर छोड़े भी उन्हें इतना समय हो गया था कि बस ये याद था कि उनके घर के बाहर एक रेलवे स्टेशन था और गन्ने के खेत थे। गीता के घरवालों को ढूँढने में पिछले कई सालों से कई एनजीओ व कार्यकर्ता जुटे हुए थे।

शुरूआत में उनकी कहानी सुन कई लोग भिन्न-भिन्न राज्यों से संपर्क में आए। सबका दावा था कि वह गीता के रिश्तेदार हैं। हालाँकि, कोई अपने दावों को सत्यापित नहीं कर सका। दो बार तो बातें डीएनए टेस्ट तक भी पहुँची लेकिन रिजल्ट नेगेटिव आए। नतीजन गीता के परिवार को ढूँढने का प्रयास जारी रहा। इस बीच गीता ने भी समय का सदुपयोग किया। उन्होंने सांकेतिक भाषा और अन्य कौशल की ट्रेनिंग ली। 

जब वह भारत आईं तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनके परिवार को ढूँढने का वादा किया। साथ ही यहाँ तक कहा कि यदि परिवार नहीं भी मिला तो गीता का कन्यादान वह स्वयं करेंगे। दिलचस्प बात यह है कि उसके बाद से गीता 25 से ज्यादा रिश्तों के लिए मना कर चुकी है। टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि गीता की मदद करने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि गीता एक स्वतंत्र महिला हैं। उन्होंने शादी के सारे रिश्तों को मना कर दिया है।

इंदौर डेफ बाइलिंगुल एकेडमी ने सबसे पहले गीता की कस्टडी ली थी। वह उनके साथ 58 माह तक रही। जुलाई 2020 में उनकी कस्टडी ज्ञानेंद्र पुरोहित ऑफ आनंद सर्विस सोसाइटी को दे दी गई, जो उनके परिवार को खोजने का प्रयास कर रहे थे। पुरोहित को कुछ सुराग मिले जिनसे परिवार को खोज पाने में मदद हुई।

छिदी हुई नाक बनी सबसे अहम सुराग

गीता को परिवार से मिलाने की दिशा में सबसे अहम काम उनकी छिदी हुई नाक ने किया। हालाँकि, पहले ये देखा गया कि उलटी साइड नाक छिदाना महाराष्ट्र में बहुत सामान्य बात है, लेकिन गीता की नाक सीधी तरफ छिदी थी, जिससे पता चला कि ऐसा महाराष्ट्र के दक्षिणी इलाकों में होता है। इसके बाद मराठवाड़ा को केंद्र में रखा। जहाँ हैदराबाद में निजाम शासन से ही नाक छिदवाने को बढ़ावा दिया जाता है।

फिर, वहीं स्थानीय पुलिस के साथ, प्रशासन के साथ काम शुरू किया गया। इसके बाद गीता ने कहा था कि उनके घर के पास रेलवे स्टेशन और गन्ने के खेत हैं तो इस आधार पर छानबीन शुरू हुई। अंत में पारभानी वह अंतिम छोर था जहाँ गीता का परिवार मिल ही गया।

दरअसल, जब गीता की कहानी स्थानीय अखबार में छपी तो एक मीना दीनकर पंधारे ने परभानी जिला प्रशासन को संपर्क किया और कहा कि हो सकता है गीता उनकी बेटी हो। वह भी 1999-2000 में गायब हुई थी। मीना का पहला साक्षात्कार ही सफल रहा। उनकी बेटी की उम्र और गीता की उम्र एक पाई गई। फिर मीना व गीता में समानताएँ भी झलकीं। मीमा ने बताया कि उनकी बेटी के पेट पर एक जलने का दाग था, जो वाकई गीता के पेट पर निकला। ये चोट उसे बचपन में लगी थी।

DNA टेस्ट!

अब यहाँ तक पहुँच कर दोनों का डीएनए का टेस्ट लगभग हो ही चुका है। नाबालिग की कस्टडी भी डिसाइड हो चुकी है। गीता इस समय 29 साल की है। वह अपने भविष्य का फैसला लेने के लिए बिलकुल आजाद है। मध्य प्रदेश सोशल जस्टिस विभाग की ज्वाइंट डायरेक्टर सुचिता टिक्रे का कहना है कि वह गीता अपने परिवार से लगातार मिलती हैं और अपने आस-पास के वातावरण में घुल रही है।

परिवार से पहली बार मिली गीता, माँ ने बताया असली नाम

फिलहाल गीता पारभानी में पहल फाउंडेशन चलाने वाले अनिकेत सलगाँवकर के साथ हैं। गीता अपनी माँ से इसी फाउंडेशन के एक कमरे में मिली थीं। वह पल इतना भावुक करने वाला था कि दोनों एक दूसरे से लिपट कर बहुत रोए थे।

गीता को तसल्ली देते हुए उनकी माँ ने कहा, “आपका असली नाम राधा वाघमारे है और आपके पिता का नाम सुधाकर वाघमारे है। कुछ साल पहले उनका निधन हो गया।” हालाँकि, सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि गीता अब अपने परिवार के साथ आगे बढ़ने की इच्छुक नहीं है। वह सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से अपनी पढ़ाई और व्यावसायिक प्रशिक्षण जारी रख रही हैं।

गीता के लिए अब तक का सफर आसान नहीं था। ऐसे में वह गाँव जाने के लिए उत्सुक नहीं है। वह इस समय एक ऐसी जगह रहती हैं जहाँ उनकी हर जरूरत पूरी हो रही हैं। दूसरी ओर उनकी माँ हैं जो मिट्टी के घड़े बना कर किसी तरह गुजर बसर करती हैं।

गीता की प्राथमिकता दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से आठवीं कक्षा पास करना है। सालगाँवकर ने कहा, “एक बार जब वह कुछ बुनियादी योग्यता हासिल कर लेगी, तो हम महाराष्ट्र सरकार से उसे नौकरी दिलाने में मदद करने का अनुरोध करेंगे।”

टिक्रे ने कहा कि गीता नियमित रूप से अपने परिवार से मिल रही है, और जब वह उनके साथ घूमने में सहज महसूस करेंगी, तो उन्हें परिवार को सौंप दिया जाएगा। वह कहती हैं, “मेरी समझ से गीता, राधा होने से पहले आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहती है।”

गीता पाकिस्तान कैसे पहुँची ये अब तक साफ नहीं है

अब जबकि गीता अपने परिजनों को जान चुकी हैं तो सारी कहानी स्पष्ट हो गई है। गीता 20 साल पहले सीमा पार करके गलती से पाकिस्तान चली गई थी। इसके बाद कई थ्योरी सामने आई कि वो वहाँ कैसे पहुँची। उनमें से एक थी कि गीता की बचपन में घर से भागने की आदत थी। चूँकि उस समय सीसीटीवी कैमरे नहीं हुआ करते थे, तो ये तो नहीं पता कि असल में हुआ क्या। लेकिन माना जाता है कि वह सचखंड एक्सप्रेस से अमृतसर पहुँचीं। फिर शायद समझौता एक्सप्रेस पकड़ कर लाहौर चली गई।

जब पाकिस्तानी रेंजर्स ने उसे पकड़ा, उसे गुम हुए 4 साल बीत गए थे। उसे सोशल एक्टिविस्ट बिलकिस बानो इद्ही को सौंप दिया गया। वह कराची में संस्था चलाती थीं। दुर्भाग्यवश इस बात के कोई रिकॉर्ड नहीं है कि आखिर बानो को गीता की जिम्मेदारी कब मिली, क्योंकि उस संस्था में ऐसे तमाम बच्चे थे। आज भी कुछ सिरे हैं तो इस पूरी कहानी में छूटे हुए लगते हैं, लेकिन खुशी की बात ये हैं कि गीता अपने परिवार से मिल गई हैं और उम्मीद है वह उनके साथ रहने को एक दिन खुशी-खुशी तैयार भी हो।

अनुसूचित जाति की महिला MLA से कॉन्ग्रेसी भूपिंदर हुड्डा ने खिंचवाया ट्रैक्टर, खुद बैठे रहे सीट पर: सदन में रो पड़े CM खट्टर

हरियाणा में ‘किसान आंदोलन’ को मुद्दा बना कर सरकार गिराने के सपने देख रही कॉन्ग्रेस पार्टी को न सिर्फ सदन में झटका लगा, बल्कि अब एक नया विवाद भी शुरू हो गया है। बुधवार (मार्च 10, 2021) को सदन में आए अविश्वास प्रस्ताव को गिराने के लिए सरकार को 45 विधायकों का समर्थन चाहिए था। मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार के पक्ष में 55 वोट पड़े। अब भूपिंदर हुड्डा द्वारा महिलाओं से ट्रैक्टर खिंचवाने का मामला सामने आया है, जिससे NCW नाराज़ है।

इस पर बात करते हुए भावुक सीएम खट्टर ने सदन में कहा, “बहुत भारी मन से एक विषय को उठाना चाहता हूँ। सारी रात नींद नहीं आई मुझे। कल महिला दिवस था। पूरे देश-दुनिया ने महिला दिवस बहुत अच्छी तरह से मनाया। विधानसभा में भी पूरे सत्र का संचालन महिला विधायकों ने किया। लेकिन, यहाँ से जाने के बाद जब मैं टीवी देखता हूँ तो एक भौंडा दृश्य देखने को मिला। महिलाओं के साथ बंधुआ मजदूरों से भी ज्यादा बुरा व्यवहार हुआ।”

दरअसल, सीएम खट्टर उस विरोध प्रदर्शन की बात कर रहे थे, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री व कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा ट्रैक्टर पर बैठे हुए थे और कुछ लोग उस ट्रैक्टर को खींच रहे थे। इस दौरान एक महिला विधायक भी ट्रैक्टर को खींचने में शामिल थीं। सीएम खट्टर ने कहा कि हमारी बहनों से उस ट्रैक्टर को खिंचवाया गया। बता दें कि सीएम खट्टर रोहतक के कलानौर से विधायक शंकुन्तला खटक की बात कर रहे थे।

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अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्र से विधायक खटक तीसरी बार जीत कर विधानसभा पहुँची हैं। मुख्यमंत्री खट्टर ने कहा कि टीवी पर ये पूरा दृश्य चला है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर कॉन्ग्रेस नेता हुड्डा को प्रदर्शन करना ही था तो वो महिलाओं को ऊपर बिठाते और खुद नीचे आकर ट्रैक्टर खींचते। बकौल खट्टर, तब उन्हें विरोध प्रदर्शन का मजा भी आता। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं को शर्म आनी चाहिए।

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने भी इस मामले को संज्ञान में लिया है। NCW की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि अगर कोई महिला अपनी जीविका चलाने के लिए परिश्रम कर रही है तो ये समझ में आता है लेकिन एक नेता का ट्रैक्टर पर बैठना और महिलाओं द्वारा उसे खिंचवाने से महिलाओं और ट्रैक्टर पर बैठे नेता की प्रतिष्ठा को गिराता है। उन्होंने कहा कि भूपिंदर सिंह हुड्डा को इस बारे में सोचना चाहिए था।

NCW की मुखिया ने कहा, “अगर महिलाओं को लगता है कि उन पर दबाव बना कर ये सब करवाया गया, तो वो हमारे पास आ सकती हैं। लेकिन, अगर वो ये सब कुछ स्वेच्छा से कर रही हैं तो ट्रैक्टर पर बैठे व्यक्ति को सोचना चाहिए कि ऐसा नहीं किया जाना चाहिए था। अगर हमारे पास कोई शिकायत आती है तो हम कार्रवाई करेंगे। अगर कोई शिकायत नहीं भी आती है तो भी ये निंदनीय कृत्य है।”

नाबालिग हिंदू लड़की को अगवा कर धर्मपरिवर्तन-निकाह, मियाँ मिट्ठू ने कबूल करवाया इस्लाम; पैसे उड़ा रहे थे मौजूद लोग

पाकिस्तान में हिंदू लड़कियों के अपहरण और उनके धर्मांतरण की खबरें आम हैं। एक तय पैटर्न के तहत किसी भी अल्पसंख्यक नाबालिग लड़की को कोई अधेड़ उम्र का कट्टरपंथी अगवा करता है, फिर उसके साथ दुष्कर्म कर, उस पर दबाव बना कर उसका धर्म बदलवाता है और बाद में उससे निकाह कर लेता है। 

इस बार भी सिंध के कांडकोट में एक 13 साल की लड़की के साथ यही हुआ है। लड़की की पहचान काव्या (बदला हुआ नाम) के तौर पर हुई है। वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी के अनुसार, सिंध के कंधकोट में तखत कुमार की बेटी को अगवा करके जबरन उसका धर्म परिवर्तन करवाया गया। बाद में उसका अपहरण करने वाले से ही निकाह भी करवा दिया गया। अब उसका नया नाम उम्हीना है।

इस अकाउंट से लड़की के धर्मांतरण के समय की कुछ तस्वीरें, वीडियो आदि शेयर किए गए हैं। वीडियो में हम देख सकते हैं कि हिंदू लड़कियों के धर्म परिवर्तन करवाने के लिए कुख्यात मियाँ मिट्ठू पीड़िता को इस्लाम कबूल करवा रहा है।

उसके ईर्द-गिर्द सैंकड़ों मुसलमान खड़े हैं। सब तेज आवाज में इस्लाम से जुड़ा कुछ पढ़ रहे हैं। वहीं बाकी लोगों में कोई वीडियो बना रहा है। कोई खड़ा है। कोई हँस रहा है और कई लोग पैसे उड़ा रहे हैं। हिंदू लड़की है इस माहौल के बीचोंबीच बिलकुल चुप बैठी है। 

वॉयस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी के ट्विटर अकाउंट से कहा गया है कि इस माहौल में कोई कैसे कह सकता है उस पर दबाव बनाया गया। उसे जान जाने का डर होता है। 13 साल की लड़की हिंदू समुदाय से हैं। मियाँ मिट्ठू ने उससे इस्लाम कबूल करवाया। बाद में उसका निकाह करवा दिया गया।

गौरतलब है कि वीडियो में नजर आने वाला मियाँ मिट्ठू कोई नया चेहरा नहीं है। इसने सिंध क्षेत्र में तमाम हिंदू लड़कियों के जबरन धर्म परिवर्तन करवाए हैं। अभी हाल में उसने एक स्कूल टीचर एकता कुमारी का धर्म बदलवाया था। यह घटना 6 जनवरी 2021 को हुई थी। लड़की का नाम एकता से बदल कर आयशा कर दिया गया था। उससे पहले कविता, महक केसवानी जैसी हिंदू लड़कियों के धर्मांतरण के पीछे भी इसी मियाँ मिट्ठू का हाथ था।