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‘अश्लीलता और पोर्नोग्राफी भी दिखाते हैं’: सुप्रीम कोर्ट ने ‘तांडव’ मामले में कहा- रिलीज से पहले हो स्क्रीनिंग

सुप्रीम कोर्ट ने अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) की कंटेंट हेड अपर्णा पुरोहित की याचिका पर सुनवाई की। वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू देवी-देवताओं के अपमान के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद अपर्णा ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इस दौरान अदालत ने अश्लीलता और पोर्नोग्राफी दिखाए जाने की बात कहते हुए कहा कि ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर रिलीज से पहले कंटेंट की स्क्रीनिंग होनी चाहिए।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने कहा, “वास्तव में कुछ प्लेटफॉर्म अश्लीलता भी दिखाते हैं।” पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को नए सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 को प्रसारित करने का निर्देश भी दिया। इसे पिछले सप्ताह अधिसूचित किया गया था।

सुनवाई के दौरान अपर्णा पुरोहित की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह चौंकाने वाला मामला है। याचिकाकर्ता अमेजन में काम करती हैं फिर भी उन्हें निर्माता और अभिनेता के साथ आरोपित बनाया गया है। जबकि कंपनी अभियुक्त नहीं है। रोहतगी ने कहा कि ऐसा करने वाले लोग प्रचार के इच्छुक हैं।

पीठ ने पूछा, “पारंपरिक फिल्म देखना पुराना हो गया है। इंटरनेट पर सिनेमा देखना आम हो गया है। हमारा सवाल यह है कि इनको स्क्रीन किया जाए?” जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने बताया कि ओटीटी प्लेटफार्मों के कंटेंट की निगरानी के लिए नियम बनाए गए हैं। इसके लिए एक बोर्ड का गठन किया जाएगा।

पीठ ने इन नियमों को प्रसारित करने का निर्देश देते हुए कहा, “हमारा विचार है कि कुछ स्क्रीनिंग होनी चाहिए। वास्तव में कुछ प्लेटफॉर्म पोर्नोग्राफ़ी भी दिखाते हैं।”

इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 25 फरवरी को 20 पन्नों के आदेश में कहा था कि कई फिल्मों में हिंदू देवी-देवताओं के नाम का इस्तेमाल कर उन्हें अपमानजनक तरीके से दिखाया गया है। कोर्ट ने राम तेरी गंगा मैली, सत्यम शिवम सुंदरम, पीके, ओह माय गॉड जैसी कुछ फिल्मों के नाम भी लिए थे। साथ ही कहा था, “ऐतिहासिक और पौराणिक व्यक्तित्वों (पद्मावती) की छवि को नष्ट करने का प्रयास किया गया है। धन कमाने के लिए बहुसंख्यक समुदाय की आस्थाओं और प्रतीकों का इस्तेमाल किया गया है (गोलियों की रासलीला राम लीला)।” हाई कोर्ट ने कहा था कि हिंदी फिल्म उद्योग में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है और समय रहते इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले अमेजन प्राइम ने ‘तांडव’ को लेकर माफी माँगी थी। आधिकारिक बयान में कहा गया था, “अमेजन प्राइम वीड‍ियो को अत्यंत खेद है कि दर्शकों को हाल ही में लॉन्च की गई काल्पनिक सीरीज तांडव के कुछ दृश्य आपत्तिजनक लगे। किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना हमारा ध्येय नहीं था, और इस बात से अवगत कराए जाने पर, उन आपत्तिजनक दृश्यों को या तो हटा दिया गया या फिर संपादित किया गया। हम अपने दर्शकों की विविध आस्थाओं का सम्मान करते हैं और उन दर्शकों से क्षमा याचना करते हैं, जिन्हें ठेस पहुँची है।”

इस वेब सीरिज को लेकर सोशल मीडिया में दर्शकों ने सीधे आरोप लगाया था कि इसमें भगवान शिव और भगवान राम का अपमान किया गया है। इसके बाद इसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर से ‘तांडव’ को बैन करने की अपील की गई थी। 17 जनवरी 2021 (रविवार) को केंद्रीय सूचना मंत्रालय ने अमेजन प्राइम वीडियो के अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था।

विवाद के बाद वेब सीरिज के मेकर्स ने भी स्टेटमेंट जारी कर माफी माँगी थी और कहा था कि वे जल्द ही सीरीज में बदलाव करेंगे। सीरीज के डायरेक्टर अली अब्बास जफर ने ट्वीट कर कहा था, “हमारे मन में देश के लोगों की भावनाओं के प्रति बहुत सम्मान है। हमारा इरादा किसी व्यक्ति, जाति, समुदाय, नस्ल, धर्म, धार्मिक समुदाय, राजनीतिक दल, जीवित या मृत व्यक्ति की भावनाओं को चोट पहुँचाना नहीं था। तांडव के कास्ट और क्रू ने सीरीज के कंटेंट में बदलाव करने का फैसला लिया है।” हाल ही में इसको लेकर अमेजन अमेज़न प्राइम की नेशनल हेड अपर्णा पुरोहित से यूपी पुलिस ने लंबी पूछताछ की थी।

किसान आंदोलन राजनीतिक, PM मोदी को हराना मकसद: ‘आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने कबूली सच्चाई

जब से नरेंद्र मोदी, 2014 में प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आए, वामपंथी, कॉन्ग्रेसी समूहों से लेकर पूरे विपक्ष ने उनके खिलाफ लगातार घृणा और आक्रोश का एक खतरनाक चक्रव्यूह रचा है, जिसका समापन अक्सर हिंसा के रूप में होता आया है। इसी कड़ी में ताजा घटनाक्रम तथाकथित किसानों के विरोध के रूप में जारी है, जो केंद्र सरकार द्वारा तीन कानूनों को पारित करने के बाद भड़क गया था या सुनियोजित रूप से भड़काया गया था। वैसे तीनों कृषि कानूनों की सच्चाई यही है कि वास्तव में यह कानून किसानों को लाभान्वित करेंगे और उन्हें बिचौलियों की घातक जकड़ से मुक्त करेंगे।

किसान आंदोलन में विरोध के नाम पर कॉन्ग्रेस, कम्युनिस्ट संगठनों और दलों, खालिस्तानियों और यहाँ तक ​​कि भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप कर यहाँ के आम लोगों को भड़काने में लगे असामाजिक तत्वों की भी ज़बरदस्त भागीदारी देखने को मिल रही थी। सबसे लंबे समय तक इस आंदोलन को देश के अन्नदाताओं द्वारा जारी विरोध प्रदर्शनों का दावा करते हुए, इसे ऑर्गेनिक और गैरराजनितिक बताने की कोशिश भी लिबरल्स की दूरगामी विध्वंशक योजना का हिस्सा ही है। जिसका पता पहले भी कई बार मिल चुका है।

अब जब किसानों के विरोध प्रदर्शन के लगभग 4 महीने बीत चुके है। यहाँ तक कि गणतंत्र दिवस की अराजक हिंसा के भी एक महीने गुजर चुके हैं, तब यह प्रायोजित आंदोलन, अपने पुराने ढकोसलों से बाहर आता हुआ नजर आ रहा है। ‘आन्दोलनजीवी’ प्रदर्शनकारी योगेंद्र यादव, जो संभवतः हर आंदोलन में इच्छाधारी प्रदर्शनकारी नेता के रूप में अलग-अलग किरदार में मौजूद रहते हैं, ने यह खुलकर स्वीकार किया है कि किसानों का यह विरोध, वास्तव में राजनीतिक है। इसका एक मात्र उद्देश्य मोदी सरकार को हराना और सत्ता से हटाना है।

योगेंद्र यादव ने द प्रिंट में एक लेख लिखा, जिसकी हेडलाइन है, ”Farmers’ movement can’t and shouldn’t be apolitical. That’s not a democracy” अर्थात “किसानों का आंदोलन गैरराजनीतिक नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहिए। ऐसा करना लोकतान्त्रिक नहीं है।

प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ में छपा योगेंद्र यादव का लेख

लेख में, योगेंद्र यादव स्पष्ट रूप से दावा करते हैं कि किसानों का विरोध गैरराजनीतिक अर्थात अराजनीतिक नहीं है। वह इसी लेख में आगे यह भी दावा करते हैं कि इसे गैरराजनीतिक होना भी नहीं चाहिए और इसका गैरराजनीतिक होना लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

जैसा कि अब तक स्पष्ट हो चुका है कि इस लेख को संयुक्त किसान-मोर्चा (एसकेएम) के उस राजनीतिक निर्णय के बचाव के स्पष्ट इरादे के साथ लिखा गया है, जिसका उद्देश्य है कि अब तथाकथित ‘अराजनीतिक’ किसान चुनावी राज्यों में भाजपा के खिलाफ चुनावी मोर्चाबंदी करते नजर आएँगे। तथाकथित देश के अन्नदाता चुनावी राज्यों में वोटबैंक की राजनीति करते नजर आएँगे। इसका मतलब और उद्देश्य जो भी है, वो आपको साफ नजर आ रहा होगा कि अब ये किसकी भूमिका बनाने की कोशिश हो रही है।

योगेंद्र यादव ने संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के फैसले की बात करते हुए लेख में कहा कि चुनावी राज्यों में जाकर बीजेपी के खिलाफ हमें प्रचार करना चाहिए। वह लिखते हैं, “हमने बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी में मतदाताओं से अपील करने का निर्णय लिया है कि वे किसान विरोधी कानूनों के लिए भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चुनावी तौर पर सज़ा दें। बीजेपी द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए, अपने राज्य मशीनरी का उपयोग कर आंदोलन को ख़त्म करने या उसका अपराधीकरण करने और भाजपा के अतिरंजित अहंकार के लिए उसे दण्डित करें। अब यह मतदाताओं को तय करना है कि वे इस सजा को भाजपा को कैसे देना चाहते हैं। इसके लिए SKM आपको यह सुझाव नहीं दे रहा है कि आप किसे वोट दें।”

अनिवार्य रूप से, यहाँ ‘आन्दोलनजीवी’ योगेंद्र यादव यह बचाव करते हुए कहने की कोशिश कर रहे हैं कि किसानों का राजनीतिकरण केवल ‘सही’ उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। इस बात के लिए पूरे आंदोलन को बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। वे केवल बीजेपी को हराना चाहते हैं बाकी उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है कि कौन जीतता है। यहाँ तक कि अब्बास सिद्दीकी के बंगाल जीतने पर भी वे खुश हैं। उनका दावा है कि जब तक मोदी और भाजपा को अनिवार्य रूप से सत्ता से बाहर रखा जाता है। तब तक ही सही मायने में लोकतंत्र है।

वह कहते हैं कि राजनेता किस कदर राजनीति को एक गंदा शब्द बना रहे हैं, यह माँग करके कि किसानों को ‘अराजनीतिक’ होना चाहिए। इच्छाधारी आंदोलकारी योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसान स्वयं अपने संगठनों को ‘अराजनीतिक’ कहकर अपना नुकसान कर रहे हैं। वह आगे स्वीकार करते हैं कि अधिकांश किसान संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े हैं और यह संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के लिए भी उतना ही सत्य है, जिसमें स्वयं के भीतर कई ऐसे संगठन संयुक्त हैं जो विभिन्न राजनीतिक दलों से संबद्ध हैं।

यहाँ यह जानना भी दिलचस्प है कि वह जो साफ-साफ़ उल्लेख करने से बच रहे हैं। यह भी हो सकता है कि वह यह मान कर चल रहे हों कि हर कोई उनके बारें में जानता होगा, क्योंकि वह खुद एसकेएम की समन्वय समिति के एक सदस्य हैं। यहाँ तक कि योगेंद्र यादव, स्वराज अभियान नामक एक राजनीतिक पार्टी भी चलाते हैं। बाकी अन्य किसान नेता भी कॉन्ग्रेस और अन्य दूसरे कम्युनिस्ट दलों से जुड़े हैं।

इसके अलावा, SKM द्वारा बनाए गए कानूनी सेल में भी 4 सदस्य हैं – कॉलिन गोंसाल्विस (Colin Gonsalves), दुष्यंत दवे (dushyant Dave), प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) और एच एस फूलका (SH Phoolka)।

ये लोग कौन हैं? कोई पूछ सकता है? प्रशांत भूषण एक ‘कुख्यात’ वकील हैं जो AAP के संस्थापकों में से एक थे। एचएस फूलका खुद AAP नेता हैं जिन्होंने हाल ही में पद छोड़ दिया है। दुष्यंत दवे खुद कई प्रसिद्द मामलों के वकील रहे हैं, उनमें से एक राम जन्मभूमि पर हिंदू अधिकारों के खिलाफ लड़ने का मामला भी है और कॉलिन गोंसाल्विस एचआरएलएन (HRLN) के संस्थापक हैं, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पेश होकर जामिया में पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जाँच की माँग की थी। यहाँ यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि HRLN को जॉर्ज सोरोस ओपन सोसाइटी इंस्टीट्यूट से भी भारी मात्रा में धन प्राप्त होता है। यही PUCL और HRLN की संयुक्त जोड़ी अक्षय पात्र पर ‘सिविल सोसायटी’ अटैक के नाम पर हमले में भी शामिल था।

अब आखिर बचता ही क्या है? बीकेयू के राकेश टिकैत, जिन्होंने खुद रालोद के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन अभी आराम से ‘अराजनीतिक’ किसान नेता बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस के सहयोगी रहे, दर्शन पाल जो माओवादी पीडीएफआई के संस्थापक थे और योगेंद्र यादव जैसे ‘आन्दोलनजीवी’ तत्वों की भागीदारी बहुत कुछ स्पष्ट कर चुका है। जब ये किसान नेता लोग पहले से ही कॉन्ग्रेस, CPI, आम आदमी पार्टी आदि से जुड़े हैं तो तथाकथित किसानों का यह प्रायोजित विरोध प्रदर्शन शुरू से ही अराजनीतिक कैसे रह सकता है। राजनीतिक तो अपने आरम्भ के समय से ही है।

योगेंद्र यादव का कहना है कि ‘राजनीतिक’ होना लोकतंत्र का एक हिस्सा है, ठीक है- इससे कोई भी सहमत होगा। लेकिन यह भी सच है कि जब इस तरह के हर विरोध-प्रदर्शन में यही समान आन्दोलनजीवी तत्व दिखाई देते हैं। और जब वे इधर-उधर की फालतू बातें करते हुए खुलेआम झूठ बोलते हैं, दूसरे आम और मासूम लोगों को भड़काते हैं, जो उनका राजनीतिक एजेंडा है। और यही उनके किसी भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने का केंद्रीय कारण है न कि तथाकथित असंतोष या मूल्यों की लड़ाई। वो कोई भी झूठा दावा करें लेकिन मूल कारण राजनीति ही होती है। बाकी सभी मुद्दे उनके लिए महज राजनीतिक हथकंडा है।

एंटी-सीएए दंगों के दौरान भी आपने देखा होगा कि किस तरह से यही लोग यह झूठा दावा करते हुए नजर आ रहे थे कि यह कानून मुस्लिम विरोधी था। जबकि ऐसा कुछ नहीं था। किसानों के विरोध के दौरान भी वही तत्व फिर से यह दावा करते हैं कि किसान कानून किसानों के हितों के खिलाफ हैं। जबकि जिसने भी उन तीनों कानूनों को पढ़ा और जाना है उसमें किसानों के अहित की कोई बात उसे नजर नहीं आई है। दोनों ही मामलों में, वैश्विक वामपंथियों का अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भारत और विशेष रूप से, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में शामिल हो गया था। दोनों ही मामलों में राजधानी दिल्ली में हिंसा भड़क उठी थी।

यहाँ योगेंद्र यादव यह कहते हुए गलत नहीं है कि हर विरोध और वास्तव में, प्रत्येक व्यक्ति की एक राजनीतिक प्राथमिकता होती है और वास्तव में लोकतंत्र का फायदे उठाते हुए निहित राजनीतिक हितों के लिए केंद्रित यह समूह देश को जलाना शुरू कर देता है क्योंकि अपने इन प्रयोगों से वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को हिंसा और प्रोपेगेंडा द्वारा सत्ता से बाहर किया जा सकता है या नहीं। यह तो लोकतंत्र नहीं है बल्कि यह उन राजनीतिक दलों के निजी राजनीतिक हित हैं, जिनकी वे वर्षों सेवा करते आ रहे हैं।

तथाकथित किसान आंदोलन, योगेन्द्र यादव जैसे लोगों का झूठ पर आधारित निहित राजनीतिक स्वार्थ है जो हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर देश के आम लोगों में भ्रम फैलाकर, भड़काकर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने के लिए ऐसे प्रायोजित विद्रोह के षणयन्त्र का नेतृत्व कर रहे हैं। जिसमें देश-विरोधी वो तमाम देशी-विदेशी ताकतें भी शामिल है जो कि भारत को आगे बढ़ता हुआ, समृद्ध होता नहीं देखना चाहतीं। यह सब निश्चित रूप से लोकतंत्र तो नहीं है।

द प्रिंट में लिखें इस ओपिनियन पीस में योगेंद्र यादव ने एक बात बहुत स्पष्ट कर दी है कि तथाकथित किसानों का विरोध, जिसके दम पर एक लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के खिलाफ विद्रोह और उसे अस्थिर करने का प्रयास किया गया और जा रहा है; अब राज्यों के विधानसभा चुनावों में एक पार्टी यानी बीजेपी के खिलाफ राजनीतिक अभियान के रूप में, बड़े पैमाने पर जिस तैयारी के साथ नजर आ रहा है, उसका कृषि कानूनों से कोई लेना-देना नहीं है। बल्कि यह लोकतान्त्रिक शक्ति को क्षीण कर हिंसा और प्रोपेगेंडा के बल पर न सिर्फ एक सरकार को बल्कि समूचे देश को अस्थिर और कमजोर करने की गहरी साजिश है। इसके लिए राष्ट्र-विरोधी ताकतें हर हथकंडा अपनाने को तैयार हैं।

70 नहीं, अब 107 एकड़ में होंगे रामलला विराजमान: 7285 वर्ग फुट जमीन और खरीदी गई

अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण अब 70 एकड़ की जगह 107 में एकड़ में किया जाएगा। ताजा जानकारी के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने परिसर के आसपास की 7,285 वर्ग फुट ज़मीन खरीदी है। यह जमीन अशर्फी भवन के बगल में स्थित है।

भव्य राम मंदिर के निर्माण का जिम्मा पाने वाले राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने 1 करोड़ रुपए में 7, 285 स्क्वॉयर फीट जमीन खरीदी है। इस भूमि के लिए प्रति फुट 1, 373 रुपए दिए गए हैं। ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने बताया, “हमने जमीन खरीदी क्योंकि भव्य मंदिर निर्माण के लिए हमें इसकी जरूरत थी”

पूरी डेवलपमेंट के बारे में बात करते हुए, फैजाबाद के उप-पंजीयक एसबी सिंह ने बताया कि जमीन के मालिक दीप नरैन ने ट्रस्ट के सचिव चंपत राय के पक्ष में 7,285 वर्ग फुट भूमि की रजिस्ट्री के दस्तावेजों पर 20 फरवरी को हस्ताक्षर किए। मिश्रा और अपना दल के विधायक इंद्र प्रताप तिवारी ने गवाह के तौर पर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। फैजाबाद के उप-पंजीयक एसबी सिंह के कार्यालय में ही यह रजिस्ट्री की गई। तिवारी ने कहा, “मै सौभाग्यशाली था कि मुझे राम मंदिर ट्रस्ट की पहली खरीद का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला।”

खबरों के अनुसार, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र की और अधिक भूमि अधिग्रहण करने की योजना है। इसके लिए वह राम मंदिर परिसर से सटे मंदिरों, घरों और खुली भूमि के मालिकों के साथ बातचीत कर रहे हैं।

हाल में खबर आई थी कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए श्री राम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र के खाते में 1,511 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं, जिसे श्रीराम मंदिर निधि समर्पण अभियान के तहत इकट्ठा किया गया था। इस अभियान को 15 जनवरी को ट्रस्ट ने शुरू किया था। इस पूरे अभियान में ट्रस्ट को सभी ने अपने-अपने सामर्थ्य अनुसार चंदा दिया था। इस दौरान कई जगहों पर विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल कार्यकर्ताओं पर हमला भी भी हुआ।

तिरंगे पर थूका, कहा- पेशाब पीओ; PM मोदी के लिए भी आपत्तिजनक बात: भारतीयों पर हमले के Video आए सामने

प्रवासी भारतीयों ने ब्रैम्प्टन (Brampton) में भारत-कनाडाई संबंधों के मद्देनजर सोमवार को तिरंगा और मैपल कार रैली का आयोजन किया। रैली में 100 से ज्यादा कारें भारत और कनाडा के ध्वज के साथ शामिल थीं। यह खुशनुमा माहौल तब बिगड़ गया जब कुछ खालिस्तानी समर्थकों ने रैली में शामिल लोगों से गाली-गलौच की। भारत की वाहवाही देख ट्रैफिक जाम कर रैली में शामिल लोगों को प्रताड़ित किया।

इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। इसमें खालिस्तानी समर्थक भारत के समर्थन में रैली करने वालों को तंग कर रहे हैं, उन्हें परेशान कर रहे हैं और तिरंगे का अपमान करते हुए कह रहे हैं कि जाकर वे पेशाब पिएँ।

एक वीडियो में देख सकते हैं कि खालिस्तानी जोर से भारतीय समर्थक को धक्का देता है और वीडियो बनाने वाला कहता है कि वह जाकर पेशाब (मूत) पिए। धक्का देने के बाद खालिस्तानी समर्थक पूछता है अब तो खुश है? जाकर पेशाब पी, पेशाब तुझे ताकतवर नहीं बनाएगा %^$।

एक अन्य वीडियो में खालिस्तानी गुंडे शांतिपूर्ण रैली में न केवल भारतीयों के लिए अपमानजनक शब्द बोल रहे हैं बल्कि नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ भी आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग कर रहे हैं। इस वीडियो को REACH नाम के अकाउंट ने शेयर किया है, जिसमें दर्शाया कि कैसे हिंदू, कनाडाई सांसद व खालिस्तानी समर्थक जगमीत सिंह के क्षेत्र में रहते हैं। वीडियो में देख सकते हैं कि भारतीयों को गालियाँ, धमकियाँ खुलेआम मिल रही हैं।

इस हमले को लेकर कहा जा रहा है कि इसे एनडीपी नेता व खालिस्तानी समर्थक जगमीत सिंह के करीबियों ने करवाया है। ऐसा क्यों? दरअसल, इस पूरी घटना के पीछे मास्टरमाइंड का नाम जोधवीर धालीवाल है। धालीवाल कोई और नहीं बल्कि जगमीत सिंह का रिश्तेदार है। सिंह की पत्नी की बहन का पति यानी उसका साढू है।

जगमीत सिंह और उसकी पत्नी के साथ जोधवीर धालीवाल (साभार: REACH)

REACH के अनुसार, जोधवीर भी खालिस्तानी समर्थक है जो अक्सर जरनैल सिंह भिंडरावाले का महिमामंडन करता रहता है। एक तस्वीर में उसका जरनैल सिंह के प्रति प्रेम देख सकते हैं कि उसने खालिस्तानी आतंकी का टैटू अपने हाथ में बनवाया हुआ है।

जरनैल सिंह के टैटू के साथ जोधवीर (साभार: REACH)

रीच के अनुसार, भारतीयों पर हुए हमले के पीछे धालीवाल का सबसे बड़ा हाथ था। जगमीत सिंह के समर्थकों ने उसका पूरा पूरा साथ दिया। एक वीडियो है जिसमें जोधवीर को भारत के राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे पर थूकते देखा जा सकता है। वीडियो में उसकी पत्नी मंजोत भी तिरंगे को गाली दे रही है। साथ ही पीएम मोदी को भी उलटा-सीधा कह रही है।

REACH के मुताबिक वीडियो में नजर आया कार नंबर बताता है कि कार धालीवाल की ही थी। इसके अलावा धालीवाल वीडियो में लोगों पर हमला करता भी दिख रहा है। भारतीय समर्थक को धक्का देकर गिराते उसे वीडियो में स्पष्ट देखा जा सकता है।

इन सभी सबूतों से ये बात साफ है कि जगमीत सिंह के समर्थकों ने ब्रैम्प्टन में हुई रैली में हिंसा फैलाई। भारतीयों और तिरंगे को अपमानित किया। ये सब तब हुआ जब कई भारतीय मिल कर कनाडा में जगमीत सिंह का विरोध कर रहे हैं, उस पर इल्जाम लगा रहे हैं कि वह कनाडा के लोगों को भड़का रहा है।

जगमीत सिंह ने फैलाई रैली में हिंसा?

पिछले हफ्ते की बात करें तो कई भारतीयों ने जगमीत सिंह के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन किया था। उनका कहना था कि किसान आंदोलन के कारण खालिस्तानी उन्हें निशाना बना रहे हैं। विरोध-प्रदर्शन के दौरान सबके हाथों में कनाडाई झंडा था और वह समुदायों में नफरत फ़ैलाने का विरोध कर रहे थे।

बता दें कि भारत में चल रहे किसान आंदोलन के मद्देनजर कनाडा में सिखों को भड़काने का काम हो रहा है। जगमीत सिंह खुद इस मुद्दे में घुस-घुस कर भारतीय सरकार के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रोपेगेंडा चलाने का काम कर रहा है। उस पर न केवल भारत में चल रहे किसान आंदोलन को फंड करने का इल्जाम है, बल्कि उसे लेकर ये भी कहा जा रहा है कि उसी के कारण रिहाना ने भारत विरोधी ट्वीट किया।

अब संभव है कि अपने ख़िलाफ़ उठ रही आवाजों के विरोध में जगमीत सिंह ने ब्रैम्प्टन में हुई रैली पर भारतीयों के ऊपर हमला करवाया हो, क्योंकि कई NRI लंबे समय से उसके कार्यालय के बाहर खड़े होकर उसका विरोध करते रहे हैं।

कौन है जगमीत सिंह?

जगमीत सिंह को जिम्मी धालीवाल के नाम से भी जाना जाता है। भारत से कनाडा में जाकर बसने वाले इस खालिस्तानी समर्थक का जन्म 1979 में हुआ था। वहाँ वकालत के बाद इसने राजनीति शुरू की। साल 2017 में नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़ा। 2019 में इसे वहाँ का सांसद चुना गया। 

जगदीप को उसकी खालिस्तानी विचारधारा के कारण पहचाना जाता है। वह अक्सर भारत के विरोध में और खालिस्तान के समर्थन में आवाज उठाता रहता है। साल 2014 में भारत सरकार ने उसे वीजा देने से मना किया था। भारत सरकार का कहना था कि वह अपने मानवाधिकारों का इस्तेमाल अपना एजेंडा चलाने के लिए करता है। जगदीप सिंह पहला ऐसा पश्चिमी सांसद है, जिसे देश में आने से रोका गया। इसके बाद साल 2015 में एनडीपी सदस्य ने सैन फ्रांसिस्को में खालिस्तान रैली की थी, जिसमें जरनैल सिंह के पोस्टर दिखे थे। साल 2016 में जगमीत सिंह ने खालिस्तानी समर्थन में सेमिनार में भाग लिया था। 

अंदर शाहिद-बाहर असलम, दिल्ली दंगों के आरोपित हिंदुओं को तिहाड़ में ही मारने की थी साजिश

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में पिछले साल हुए दंगों के आरोपितों को दिल्ली के तिहाड़ जेल में ही मारने की बड़ी साजिश का खुलासा हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दो हिंदू आरोपितों को मर्करी (पारा) देकर मारने की साजिश रची गई थी। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने पूरी साजिश का भंडाफोड़ किया है।

पत्रकार राजशेखर झा ने ट्वीट कर बताया है कि शाहिद नाम का एक सजायाफ्ता कैदी इसे अंजाम देने वाला था। आज तक ने स्पेशल सेल के सूत्रों के हवाले से बताया है कि शाहिद ने जेल में रहते प्लान बनाया था। उसने जेल के बाहर मौजूद असलम से मरकरी की डिमांड की थी। साजिश की भनक लगने पर स्पेशल सेल ने टेक्निकल सर्विलांस रखना शुरू किया और साजिश को नाकाम किया। मरकरी के साथ आरोपित को दबोच लिया।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शाहिद ने 2015 में दिल्ली के ख्याला में महिला से बलात्कार किया था। उसके बाद महिला और उसके 2 बच्चों की हत्या कर दी थी। राजशेखर झा के मुताबिक जिनकी हत्या की जानी थी उन्हें दंगों के दौरान एक हत्या और मस्जिद को निशाना बनाने की घटना में गिरफ्तार किया गया था। उन्होंने बताया है कि मर्करी जब्त कर पुलिस ने दोनों आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 23 से 25 फरवरी के दौरान हिंदू विरोधी दंगों में करीब 53 लोग मारे गए थे। 200 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। मारे गए लोगों में 15 साल के लड़के से लेकर आईबी के कॉन्स्टेबल तक थे। कुछ ने अपनी आँखों के सामने जीवन भर की कमाई को स्वाहा होते देखा। दंगाइयों ने न हिंदुओं की संपत्ति को छोड़ा था न उनके धार्मिक स्थलों को।

दंगों की अब तक की जॉंच से यह बात सामने आई है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में हिंसा को अंजाम देने की पूरी प्लानिंग की गई थी। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के दौरान दंगों को लेकर पहले से ही तैयारी की गई थी। ताहिर हुसैन, उमर खालिद, खालिद सैफी सहित 18 के खिलाफ दंगों के सिलसिले में पिछले दिनों ही दिल्ली की एक अदालत ने यूएपीए के तहत आरोपों का संज्ञान लिया था।

100 मदरसे-50 हजार छात्र, गीता-रामायण की करनी ही होगी पढ़ाई: मीडिया के दावों की हकीकत

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने 2 मार्च 2021 को नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (NIOS) के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा पाठ्यक्रमों की अध्ययन सामग्री जारी की। इसके बाद कुछ मीडिया रिपोर्टों में भ्रामक जानकारी फैलाए जाने का काम धड़ल्ले से किया गया।

सोशल मीडिया पर तो कुछ लोगों ने NIOS की नई कोशिश पर ऊँगली उठाई ही, लेकिन कुछ मीडिया संस्थान भी झूठ फैलाने में पीछे नहीं रहे। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें बताया कि NIOS गीता, रामायण को मदरसों में पहुँचा रही है। हालाँकि खबर अपना असर दिखाती, इससे पहले ही सरकार ने इसकी हकीकत बता दी। पीआईबी फैक्टचेक के अनुसार सरकार ने इस खबर को पूर्ण रूप से भ्रमित करने वाला बताया है।

पीआईबी ने लिखा, टाइम्स ऑफ इंडिया का दावा गलत है और इसे गलत तरह से पेश किया गया है। NIOS द्वारा उपलब्ध कराए गए विषयों में से शिक्षार्थी के पास यह चयन करने का हक है कि उसे उतने विषयों में से कौन से सब्जेक्ट का कॉम्बिनेशन पढ़ना है।

शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी प्रेस रिलीज में कहा किया गया कि टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा सच्चाई से छेड़छाड़ की गई और तथ्य को गलत तरह से पेश किया गया, ये सब दुर्भावनापूर्ण इरादा जान पड़ता है। इसमें यह भी साफ किया गया कि NIOS मदरसों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए विशेष प्रावधान देता है। 

इस प्रावधान के तहत शिक्षार्थी को आधिकारिक एजुकेशन सिस्टम की तरह तमाम विषय ऑफर किए जाते हैं। इसमें से वे अपनी सुविधा के अनुसार कोई भी कॉम्बिनेशन चुन सकते हैं।

प्रेस रिलीज में कहा गया कि लगभग 100 मदरसों के 50 हजार छात्र NIOS से जुड़े हैं। प्लान किया जा रहा है कि NIOS से 500 और मदरसे जोड़े जाएँ और ये भी पूर्ण रूप से सिर्फ़ मदरसों की माँग पर होगा।

अब शिक्षा मंत्रालय के बयान के बाद ये तो साफ है कि NIOS ने शिक्षा प्रणाली में कुछ बदलाव जरूर किए हैं लेकिन इतने भी नहीं कि मदरसों के छात्रों पर उनकी मर्जी के बिना कोई विषय थोपा जाए। नए विषय वैकल्पिक हैं। ये जरूरी नहीं कि मदरसे के छात्र इन्हें पढ़ें ही। इसलिए ये दावा कि उन्हें गीता महाभारत पढ़ने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, बिलकुल गलत है।

बता दें कि NIOS उन दो राष्ट्रीय बोर्डों में से एक है, जो प्राथमिक, माध्यमिक और वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर ओपन और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से पाठ्यक्रम संचालित करता है। NIOS ने ,भारतीय ज्ञान परंपरा को लेकर 15 कोर्स तैयार किए हैं, जिसमें वेद, योग, विज्ञान, संस्कृत भाषा, व्यावसायिक कौशल, रामायण, गीता और पाणिनि-प्रवर्तित महेश्वरा सूत्र शामिल हैं। ये पाठ्यक्रम प्राथमिक शिक्षा के क्लास 3, 5 और 8 के बराबर हैं।

केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ने मंगलवार को नोएडा स्थित एनआईओएस के केंद्रीय मुख्‍यालय में इसका स्‍टडी मैटिरियल जारी करते हुए कहा था, “भारत प्राचीन भाषाओं, विज्ञान, कला, संस्‍कृति और परंपरा की खान है। अब देश अपनी प्राचीन परंपरा को पुनर्जीवित करके ज्ञान के क्षेत्र में सुपरपावर बनने को तैयार है। हम इन कोर्सों के लाभ को मदरसों और विश्‍व में मौजूद भारतीय समाज तक पहुँचाएँगे।”

अनुराग कश्यप, तापसी पन्नू और अन्य के ठिकानों पर लगातार दूसरे दिन रेड, ED का भी कस सकता है शिकंजा

फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप, अभिनेत्री तापसी पन्नु और अन्य के यहाँ लगातार दूसरे दिन 4 मार्च को भी आयकर विभाग की छापेमारी जारी है। कश्यप, पन्नू, विकास बहल और मधु मंटेना के मुंबई, पुणे सहित अन्य जगहों पर 22 ठिकानों पर 3 मार्च को छापेमारी की कार्रवाई शुरू हुई थी।

बुधवार को अधिकारियों ने छापेमारी के दौरान इन फ़िल्मी हस्तियों से पूछताछ करते हुए कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और दस्तावेजों की जाँच की थी। विभाग के अधिकारी जानना चाहते थे कि आखिर टैक्स चोरी की रकम का बँटवारा कैसे हुआ। इससे क्या-क्या खरीदा गया और कहीं इस रकम को मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए देश से बाहर तो नहीं भेजा गया।

अधिकारियों ने जाँच के दौरान कुछ इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों को कब्जे में लिया है। कहा जा रहा है कि तापसी और अनुराग के घर प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी छापा मार सकता है। इसके साथ ही छापेमारी में हाथ आए दस्तावेजों और सबूतों के आधार पर जाँच और बढ़ सकती है। संभव है कि अनुराग और तापसी की व्हॉट्सएप चैट भी खँगाली जाए और जिन लोगों ने उनकी फिल्मों में निवेश किया उनसे भी पूछताछ हो।

बता दें कि कल आईटी विभाग ने मुंबई और पुणे में 22 ठिकानों में छापेमारी की थी। इनमें अनुराग कश्यप का फ्लैट और फैंटम फिल्म, जिसकी कमाई पर पूरी जाँच केंद्रित है, उसके दफ्तर पर भी रेड पड़ी। वहीं मधु के आवास पर भी 6 अधिकारी पहुँचे। साथ ही उनकी कंपनी पर भी 8 लोगों ने छापेमारी कर 4 लोगों के अकाउंट सीज कर दिए।

इस रेड की खबर आते ही सोशल मीडिया पर हड़कंप मच गया। वहीं कॉन्ग्रेस और एनसीपी ने इस कार्रवाई को केंद्र सरकार का बदला कहा। जबकि केंद्र की मानें तो आईटी रेड कानून के मुताबिक हुई है। प्रशांत भूषण इस रेड से इतना आहत हुए कि उन्होंने केंद्रीय एजेंसियों को सरकार की ए टीम करार दे दिया।

उन्होंने बीबीसी का कार्टून शेयर करते हुए लिखा, “अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू ने अपने ट्विटर अकाउंट से सरकार के खिलाफ एक-दो ट्वीट क्या किए, कि इनकम टैक्स विभाग उनका अकाउंट देखने पहुँच गया! इनकम टैक्स, एनफोर्समेंट विभाग, एनआईए और पुलिस इस सरकार की ए टीम है।”

वहीं तेजस्वी यादव ने कहा कि पहले तो केवल राजनीतिक प्रतिद्वंदियों का चरित्र हनन किया गया। अब नाजी सरकार सोशल कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और, कलाकारों को भी धमका रही है।

मालूम हो कि अनुराग कश्यप के समर्थन में महाराष्ट्र सरकार को बोलते देख पायल घोष ने भी तीखी टिप्पणी की है। पायल ने लिखा, “पूरी महाराष्ट्र सरकार अनुराग कश्यप के समर्थन में आ गई है। अब सब स्पष्ट है कि मुंबई पुलिस द्वारा अनुराग कश्यप के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई और मुझे पर्याप्त सबूत उपलब्ध करवाने को कहा।”

गौरतलब है अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू पहले ऐसे बॉलीवुड के जाने-माने चेहरे नहीं है जिन पर आईटी विभाग ने शिकंजा कसा हो। इससे पूर्व एकता कपूर के घर पर भी आईटी ने रेड मारी थी। ये मामला शूटआउट एट वडाला के रिलीज से पहले का है। इसी प्रकार कटरीना कैफ के घर पर भी साल 2011 में छापा पड़ा था। प्रियंका चोपड़ा के घर भी 2011 में छापेमारी हुई थी। इसी तरह 90 के दशक की मशहूर अदाकारा माधुरी दीक्षित के घर भी सालों पहले आईटी रेड पड़ी थी।

मारा गया शार्प शूटर अमजद, साथी भी ढेर: मुख्तार अंसारी के लिए किया था काम, UP पुलिस से एनकाउटंर में काम तमाम

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में बुधवार (मार्च 3, 2021) को यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने दो शार्प शूटरों को मुठभेड़ में ढेर कर दिया। पड़ताल में पता चला कि इनका संबंध बाहुबली माफिया मुख्तार अंसारी से था। इन्होंने 8 साल पहले उसके साथ काम किया था। हाल में ये माफिया मुन्ना बजरंगी से भी जुड़े थे।

दोनों बदमाशों ने साल 2013 में अपने साथियों के साथ बनारस के तत्कालीन डिप्टी जेलर अनिल कुमार त्यागी की हत्या की थी। दोनों पर ₹50000 का इनाम था। ये प्रयागराज में किसी राजनीतिक व्यक्ति की हत्या करने के इरादे से आए थे।

यूपी पुलिस के साथ इन बदमाशों की मुठभेड़ नैनी थाना क्षेत्र के अरैल इलाके में उस समय हुई, जब एसटीएफ सोमेश्वर नाथ मंदिर तिराहा के पास चेकिंग कर रही थी।

सीओ एसटीएफ नवेन्दु सिंह ने बताया कि मुख्तार अंसारी और मुन्ना बजरंगी गैंग के लिए काम करने वाले दो सुपारी किलर के बारे में उन्हें सूचना मिली थी। इसके बाद दोनों को पकड़ने के लिए नाकेबंदी की गई। जब उन्होंने पुलिस के चंगुल में खुद को फँसा पाया तो दोनों ने भागने की कोशिश की और पुलिस ने इन्हें पकड़ने के लिए पीछा किया।

इसी बीच दोनों ने पुलिस पर फायरिंग कर दी। जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने भी गोली चलाई, जिसमें दोनों घायल हो गए। पुलिस फौरन उन्हें अस्पताल लेकर पहुँची, पर डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस को इनके पास से 30 और 9MM की पिस्टल, जिंदा कारतूस और एक मोटरसाइकल मिली है।

घटना के बाद एसटीएफ के एडीजी अमिताभ यश ने बताया कि एनकाउंटर में मारे गए दोनों बदमाशों के नाम राजीव पांडे उर्फ वकील पांडे और एसएच अमजद उर्फ अंगद हैं। ये दोनों आजकल मुन्ना बजरंगी और दिलीप मिश्रा गैंग के लिए काम कर रहे थे।

एसटीएफ के एडीजी ने यह भी जानकारी दी कि पिछले 28 मई को 1 लाख रुपए का इनामी नीरज सिंह गिरफ्तार हुआ था। उसने, मुठभेड़ में मारे गए वकील पांडे के साथ मिल कर आरएसएस के सुजीत सिंह और प्रयागराज के सपा नेता नन्हें खान के दामाद समील अहमद को मारने के लिए रेकी की थी। हालाँकि, नीरज को वारदात अंजाम देने से पहले पकड़ लिया गया था।

चोरी करके बनाया गया दीपिका पादुकोण का Levi’s जीन्स वाला विज्ञापन? Yeh Ballet के डायरेक्टर ने लगाया आरोप

JNU में पीआर स्टंट करने के बाद तमाम आरोपों से घिरी दीपिका पादुकोण एक बार फिर चर्चा में हैं। दरअसल, इस बार नेटफ्लिक्स फिल्म ‘Yeh Ballet’ के निर्देशक सूनी तारापोरवाला (Sooni Taraporevala) ने लेवाइस जींस के उस विज्ञापन पर प्लेगरिज्म पर आरोप लगाया है, जिसमें दीपिका पादुकोण स्टार चेहरा हैं।

इंस्टाग्राम पर अपनी बात रखते हुए तारापोरवाला ने लिखा, “हाल ही में मेरा ध्यान इस एड की तरफ गया। मैं इसमें अपनी फिल्म Yeh Ballet का सेट देख कर चौंक गई। इस एड का क्रिएशन शैलजा शर्मा ने किया था और शूट खत्म होने के बाद इस सेट को तोड़ दिया गया था। एड में हमारे इस सेट को ही कॉपी करने की कोशिश की गई है।”

सूनी तारापोरवाला (Sooni Taraporevala) ने बताया कि ऐसा कोई स्टूडियो मुंबई में नहीं था, इसलिए इस विज्ञापन के डायरेक्टर ने इसे देखा और हमारे सेट को प्लेगराइज किया।

वह कहती हैं कि क्या ब्रांड और इस एड के डायरेक्टर विदेशों में बिना परमिशन के ऐसा करने की सोच सकते हैं। क्या अगर उनके खुद के क्रिएटिव वर्क के साथ ऐसा किया जाएगा, तो वे इसे बर्दाश्त करेंगे? ये एक बौद्धिक चोरी है। शैलजा शर्मा को अपने क्रिएटिव वर्क का ऐसा हश्र देख, पता नहीं कैसा लग रहा होगा।

सूनी लिखती हैं कि भारत में कॉपी-कैट कल्चर समाप्त होना चाहिए, इसे निरस्त किया जाना चाहिए। उन्होंने गुस्से में पूछा – “आप सोचते हैं कि एक विदेशी प्रोडक्शन कंपनी और निर्देशक बेहतर जानते होंगे। क्या आपके पास रचनात्मकता नहीं है? क्या सोच रहे थे आप?”

बता दें कि दीपिका पादुकोण का एड 26 फरवरी 2021 को रिलीज हुआ था और नेटफ्लिक्स पर Yeh Ballet पिछले साल आ चुकी है। इस विवाद पर लिवाइस जींस के लिए इस एड की प्रोडक्शन डिजाइनर रुपिन सूचक ने कहा है कि एड के डायरेक्टर नाडिया मर्कार्ड ओटजेन Yeh Ballet जैसा ही सेट चाहते थे। इसलिए ये सेट बनाया गया। इस मामले पर दीपिका पादुकोण की ओर से अभी कोई रिएक्शन नहीं आया है।

‘मुगलों-औरंगजेब ने करवाई मंदिरों की मरम्मत’ – NCERT बिना सबूत के पूरे देश को पढ़ा रहा था, भेजा गया लीगल नोटिस

किताबों में मुगलों का महिमामंडल करने वाली NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एड्यूकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) को भरतपुर के एक RTI कार्यकर्ता ने लीगल नोटिस भेजा है। NCERT को ये नोटिस मुगलों पर अप्रमाणित कंटेंट छापने को लेकर भेजा गया है।

दरअसल, NCERT की कक्षा-12 की इतिहास की पुस्तक में यह दावा किया गया है कि जब (हिंदू) मंदिरों को युद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया था, तब भी उनकी मरम्मत के लिए शाहजहाँ और औरंगजेब द्वारा अनुदान जारी किए गए।

अब इसी दावे को लेकर भरतपुर के एक्टिविस्ट दपिंदर सिंह ने एनसीईआरटी के विरुद्ध ये कदम उठाया है। इससे पहले उन्होंने एक RTI लगाई थी, जिसमें उन्होंने सवाल किया था कि कक्षा 12 की इतिहास की पुस्तक में जो दावे किए गए हैं, उसके स्रोत और उसके पीछे के तथ्य क्या हैं, जिनके आधार पर ये पढ़ाया जा रहा है?

NCERT कक्षा-12 की पुस्तक का हिस्सा, पेज -234 (हिंदी)

इस आरटीआई के जवाब में जब NCERT ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया और कहा कि उनके पास इसका कोई रेफरेंस मौजूद नहीं है, तो दपिंदर सिंह ने उन्हें यह नोटिस भेजा। उनका मत है कि आखिर क्यों गलत इतिहास बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। क्यों स्पष्ट तौर पर न केवल बच्चों को खुलेआम बरगलाने का काम हो रहा है बल्कि उनके साथ भी खिलवाड़ हो रहा है, जो किसी प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

NCERT कक्षा-12 की पुस्तक का हिस्सा, पेज -234

दपिंदर ने किताब में पढ़ाए जाने वाले कंटेंट में संशोधन की माँग की है। उनका मानना है कि बिना प्रमाण कैसे मुगल शासक जैसे औरंगजेब व शाहजहाँ को महान दिखाया गया। इतिहास तो तथ्यों व सूचनाओं पर आधारित होता है, यदि ऐसे जानकारी दी जाएगी तो ये इतिहास से खिलवाड़ होगा।

गौरतलब है कि इस पूरे मामले में जनवरी में एक आरटीआई लगाई गई थी। याचिकाकर्ता की पहली माँग थी कि वह सोर्स बताया जाए, जिसमें ये बातें कही गई हैं और उन मंदिरों की संख्या बताई जाए, जिन्हें औरंगजेब और शाहजहाँ ने मरम्मत करवाई। NCERT का दोनों सवालों के जवाब में कहना है कि इसकी जानकारी उनके विभाग के पास नहीं है।

इस पर एक एक्टिविस्ट संजीव वकील कहते हैं कि छात्रों को कल्पना आधारित इतिहास पढ़ाया जा रहा है। वह कहते हैं, ” शिक्षा लिहाज से NCERT किताबों को बेंचमार्क समझा जाता है। इन्हें सिविल परीक्षा की तैयारी करने वाले भी पढ़ते हैं और अन्य परीक्षा की तैयारी करने वाले भी। आगामी पीढ़ी को गलत दिशा में ढकेला जा रहा है और इसके परिणाम बहुत भयानक हो सकते हैं।”