बिहार के लखीसराय में एक मुस्लिम ने एक हिन्दू लड़की का यौन शोषण किया। उससे निकाह करने के लिए धर्मांतरण करने को कहा गया। उसने हिन्दू युवती से गोमांस खाने को भी कहा। यह सिलसिला 14 वर्ष तक चलता रहा। आरोपित मुस्लिम सरकारी कर्मचारी है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लव जिहाद के आरोपित का नाम अशरफ है जो कि खुद को सुमित बताता था। इसी सहारे उसने एक हिन्दू युवती को प्रेमजाल में फंसाया। हिन्दू लड़की 16 वर्ष की उम्र से उसके साथ है। उसे बाद में अशरफ की सच्चाई का पता चला है। अब इस मामले में लखीसराय पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है।
बच्चे के जन्म के बाद सुमित ने ‘अशरफ’ का सच उगला
मामला वर्ष 2012 से शुरू होता है। जब पीड़िता 16 साल की थी। उसे अशरफ ने खुद को राजस्थान निवासी सुमित कुमार बताकर लड़की को जबरदस्ती प्रेमजाल में फँसाया। उस समय अशरफ जनता उच्च विद्यालय अलीनगर में कार्यरत था। इसके बाद कथित सुमिल उसे बहला-फुसलाकर अपने साथ भगा ले गया।
वह हिन्दू पीड़िता के साथ बालिग होने तक जमुई, आसनसोल और मुंगेर में रखकर उसका लगातार यौन शोषण करता रहा। पीड़िता को लिपिक के मुस्लिम होने की जानकारी तब मिली जब वह बालिग हो गई। पीड़िता के मुताबिक, 2014 में पीड़िता गर्भवती हुई लेकिन वो ये बच्चा नहीं चाहती थी।
पीड़िता ने गर्भपात करने की बात अशरफ को बताई लेकिन उसने इनकार कर दिया। पीड़िता के बालिग़ होने के बाद अशरफ ने लखीसराय न्यायालय ले जाकर धारा 164 के तहत उसका बयान दर्ज कराया। जिसमें पीड़िता से शादी करने की बात स्वीकार की। इसके बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया।
जनवरी 2015 में पीड़िता बिन शादी के माँ बन गई। 19 वर्ष की आयु में उसने बेटे को जन्म दिया। अब पीड़िता ने शादी की बात कही तो अशरफ ने उसे पूरा सच बताया। उसने कहा कि वह सुमित नहीं बल्कि कमाल अशरफ है। उसने के इसके बाद युवती पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला।
अशरफ ने बेरहमी से पीटा, पूजा पाठ करने से मना किया : पीड़िता
पीड़िता ने बताया कि कमाल अशरफ हिंदू लड़कियों को सिर्फ भोग की वस्तु समझता है। उसने हिन्दू लड़की से कहा कि बीवी का दर्जा पाने के लिए उसे धर्म बदलना होगा। कमाल ने हिन्दू युवती को हिंदू रीति-रिवाजों को छोड़ने, इस्लाम अपनाने, गोमाँस खाने और यहाँ तक कि अन्य लोगों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए भी मजबूर किया।
जब उसने इन माँगों का विरोध किया तो अशरफ ने उसके साथ गलत सलूक किया। आए दिन उसके साथ मारपीट करता। 12 सितंबर 2024 को अशरफ ने उसे इतनी बेरहमी से पीटा, जिससे उसके हाथ और पैर में फ्रैक्चर हो गया। हालाँकि उत्पीड़न झेलने के बाद भी पीड़िता ने इस्लाम कबूल नहीं किया।
पीड़िता के मुताबिक, 20 फरवरी 2025 को लिपिक कमाल अशरफ उस पर प्राथमिक विद्यालय मकतब बालगुदर के शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम के साथ शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाल रहा था। इसके साथ ही उसे पूजा-पाठ सहित बाकि सनातनी परंपराओं का विरोध करने के लिए भी मजबूर करता था।
पुलिस ने चार लोगों पर मामला दर्ज किया
पुलिस अधीक्षक अजय कुमार ने बताया कि पीड़िता के बयान के आधार पर लिपिक कमाल अशरफ, शिक्षक इब्राहिम अहमद उर्फ शमशाद आलम और दो अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है और जल्द कार्रवाई की जाएगी।
प्रवर्तन निदेशालय ने कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी समेत कई नेताओं पर चार्जशीट दाखिल की है. ये चार्जशीट नेशनल हेराल्ड मामले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग का है। इस मामले की अगली सुनवाई 25 अप्रैल को होगी। चार्जशीट में कई अहम बातें कही गई है।
पहला आरोपित सोनिया गाँधी, दूसरा आरोपित राहुल गाँधी, तीसरा आरोपित सुमन दूबे, चौथा आरोपित सैम पित्रोदा और पाँचवाँ आरोपित यंग इंडिया को बनाया गया है।
दरअसल इस मामले में ईडी की जाँच, पटियाला हाउेस कोर्ट में 26.06.2014 के आदेश के आधार पर शुरू की गई है। 2013 में सुब्रमण्यम स्वामी ने सोनियागाँधी, राहुल गाँधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और मेसर्स यंग इंडियन के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगाया था। मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस का निधन हो चुका है इसलिए उनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं है।
ईडी की जाँच को आरोपियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। हालाँकि दोनों अदालतों ने मुकदमे की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
आरोप के मुताबिक 2010 में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल), यंग इंडियन (वाईआई) के प्रमुख अधिकारियों और कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों ने मिल कर एजेएल की 2,000 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ हड़पने के लिए 99% शेयर यंग इंडियन नामक एक निजी कंपनी को सिर्फ 50 लाख रुपये में स्थानांतरित कर दिए। यंग इंडिया में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के पास कुल मिलाकर 76% शेयर थे।
ईडी का कहना है कि आरोपियों ने एआईसीसी द्वारा एजेएल को दिए गए 90.21 करोड़ रुपए के बकाया कर्ज को 9.02 करोड़ इक्विटी शेयरों में बदल दिया और इन सभी शेयरों को यंग इंडियन के पक्ष में सिर्फ 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिया। इस तरह से एजेएल की हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियों को सोनिया गांधी और राहुल गांधी को ट्रांसफर कर दिया गया।
यंग इंडिया पर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी का नियंत्रण था क्योंकि इनके पास 76% शेयर थे। बाकी 24% शेयर दिवंगत मोतीलाल वोरा और दिवंगत ऑस्कर फर्नांडीस के पास थे, जो सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के करीबी माने जाते थे।
चार्जशीट में कहा गया है कि प्रवर्तन निदेशालय ने 20.11.2023 को अंतरिम कुर्की आदेश जारी करके एजेएल की 752 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ कुर्क की।
एजेंसी का कहना है कि पीएमएलए के तहत ईडी ने जो जाँच में पाया है वो 27.12.2017 के आयकर विभाग के मूल्यांकन की तरह ही है। आयकर विभाग ने इस मामले में 414 करोड़ रुपए टैक्स में धोखाधड़ी पाया था।
ईडी ने इस मामले में कमाई के रूप में 988 करोड़ रुपए और संपत्तियों की मौजूदा कीमत 5000 रुपए बताया है। ईडी के मुताबिक यंग इंडिया को 23.11.2010 को एसपीवी के रूप में शामिल किया गया था। एजेएल ने 2008 में अपनी प्रकाशन गतिविधि बंद कर दी । ईडी का कहना है कि आरोपियों ने यंग इंडिया के मालिकों सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को एजेएल की सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्तियों का नियंत्रण देने के लिए एक आपराधिक साजिश रची थी। वाईआई यानी यंग इंडिया ने एजेएल से एआईसीसी द्वारा उसे सौंपे गए 90.21 करोड़ रुपए के ऋण को चुकाने या इस ऋण को इक्विटी में बदलने के लिए कहा। एजेएल, वाईआई और एआईसीसी में एक ही लोगों की नियुक्ति हुई। जांच एजेंसी का कहना है कि इन तीनों संस्थाओं में पदों पर बैठे लोगों के एक ही समूह द्वारा प्रस्ताव पारित करके वाईआई को 50 लाख रुपए की मामूली राशि के लिए 90.21 करोड़ रुपए का ऋण सौंपा गया था। ईडी का आरोप है कि यंग इंडियन को एजेएल के 9.021 करोड़ शेयर आवंटित किए गए।
यंग इंडिया कथित तौर पर एजेएल की होल्डिंग कंपनी बन गई, जिसके पास 99% शेयर थे और अन्य शेयरधारकों की इक्विटी घटकर 1% रह गई। जाँच में मिले कई दस्तावेज, अभियुक्तों और गवाहों के बयान की रिकॉर्डिंग के आधार पर ईडी ने 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के मौजूदा बाजार मूल्य के आधार पर आरोप पत्र तय किया गया।
सहारा ग्रुप के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ये कार्रवाई ED की कोलकाता शाखा की तरफ की गई है। ED ने महाराष्ट्र के लोनावला में मौजूद एंबी वैली की 707 एकड़ जमीन को जब्त कर लिया है, जिसकी अनुमानित कीमत ₹1460 करोड़ बताई जा रही है। यह कार्रवाई सहारा समूह के निवेशकों को उनकी धनराशि वापस करने में विफल रहने के चलते की गई है।
सहारा ने लगाया लोगों को चूना
मामले की छानबीन में पता चला है कि सहारा ग्रुप ने लोगों को पैसे इन्वेस्ट करने के लिए मजबूर किया था, इस काम में लोगों की सहमति नहीं ली गई थी। जब लोगों ने अपनी जमा पूँजी माँगी, तो पैसे वापस नहीं किए गए।
बताया गया है कि सहारा समूह पोंजी स्कीम चला रहा था, इसमें सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा इंडिया कमर्शियल कॉर्पोरेशन लिमिटेड, सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, सहारा समूह , सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसाइटी आदि कम्पनियाँ शामिल थीं।
ED का कहना है कि सहारा ग्रुप ने पैसा वापस तो नहीं किया बल्कि जमाकर्ताओं की अपना पैसा फिर से जमा करने के लिए मजबूर किया और एक योजना से दूसरी योजना में लगाया। खातों की कॉपी को छुपाने में हेराफेरी भी की। कई ऐसे ऑफर देकर निवेश का नाम देकर लोगों के पैसों की ठगी की।
ED, Kolkata has attached lands in the name of various individuals measuring 707 Acres having approximate market value of Rs. 1460 Crore in the Amby Valley City, Lonavala of Sahara Group under the provisions of PMLA, 2002 in a money laundering case against Sahara India and its…
सहारा समूह ने 2007-2008 में ऑप्शनली फुली कन्वर्टिबल डिबेंचर्स (OFCD) के माध्यम से लगभग 3 करोड़ निवेशकों से ₹17400 करोड़ की राशि जुटाई थी। हालाँकि, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने इन योजनाओं को अवैध घोषित किया और निवेशकों को पैसा वापस करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में सहारा को ₹24000 करोड़ निवेशकों को लौटाने का निर्देश दिया था, जिसमें से अब तक केवल ₹11000 करोड़ ही वापस किए गए हैं।
नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में मामला दर्ज हुआ था। ED की जाँच 4 FIR के आधार पर हुई थी, जिसमें ओडिशा, बिहार और राजस्थान की पुलिस ने हमारा इंडिया क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाईटी लिमिटेड और अन्य के खिलाफ दर्ज की थी। 500 से ज्यादा मामले इस केस में दर्ज किए जा चुके है, जिसमें 300 से ज्यादा मामले मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर है।
क्यों की गई कानूनी कार्रवाई?
सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को निवेशकों की बकाया राशि चुकाने के लिए एंबी वैली की संपत्तियों को अटैच करने का आदेश दिया था। बॉम्बे हाईकोर्ट के ऑफिशियल लिक्विडेटर ने एंबी वैली की नीलामी प्रक्रिया शुरू की, जिसका रिजर्व प्राइस 37392 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया। ईडी को पता चला है कि ये भूखंड बेनामी नामों से खरीदने के लिए सहारा समूह की कंपनियों से पैसे निकाले गए थे। यह फैसला निवेशकों को उनकी धनराशि वापस दिलाने के प्रयासों का हिस्सा है।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में एक पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए 3 भारतीय हिन्दू कामगारों पर हमला कर दिया। उसने तलवार से 2 भारतीयों को काट दिया, इस हमले में उनकी मौत हो गई। 1 घायल का इलाज चल रहा है। मृतक तेलंगाना के रहने वाले थे। हत्या का कारण मजहबी विवाद बताया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घटना दुबई की एक बेकरी में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को हुई है। यहाँ काम करने वाले अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास की हत्या एक पाकिस्तानी ने कर दी। प्रेमसागर तेलंगाना के निर्मल जिले के जबकि श्रीनिवास निजामाबाद के रहने वाले थे।
पाकिस्तानी के हमले में एक और भारतीय गंभीर रूप से घायल हो गया, उसका नाम सागर है। बताया गया कि किसी छोटी बात से विवाद चालू हुआ और फिर पाकिस्तानी ने मजहबी नारे लगाते हुए इन लोगों पर हमला बोल दिया। उसने अष्टपु प्रेमसागर और श्रीनिवास को कई बार चाकुओं से गोदा।
हमलावर पाकिस्तानी इन भारतीयों का सहकर्मी था। मृतक प्रेमसागर के घर में 2 छोटी बेटियाँ और पत्नी हैं। वह आखिरी बार 2 वर्ष पहले घर आए थे। प्रेमसागर 5 वर्ष पूर्व दुबई काम करने गए थे। वह जल्द ही घर लौटने वाले भी थे। उनके परिवार का तेलंगाना में बुरा हाल है।
प्रेमसागर के भाई संदीप ने मीडिया से बताया, “मेरे भाई की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वो एक भारतीय थे, मैं इस मामले में विदेश मंत्रालय से जल्द एक्शन लिए जाने की माँग करता हूँ।” उन्होंने बताया कि हत्या से पहले प्रेमसागर ने पाकिस्तानी से छोड़ देने की गुहार लगाई और अपने परिवार के विषय में भी बताया लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।
पीड़ितों के परिवार ने बताया है कि उन्हें अभी दुबई की पुलिस या सरकारी एजेंसियों की तरफ से कोई जानकारी नहीं मिली है। उन्होंने बताया है कि किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए वह अपने रिश्तेदारों पर निर्भर हैं। दोनों मृतकों के शवों के लाने के लिए प्रयास चल रहे हैं।
मामले में केन्द्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार और जी किशन रेड्डी ने भी दुख जताया है। उन्होंने विदेश मंत्रालय से पूरी सहायता दिए जाने का आश्वासन दिया है। जी किशन रेड्डी, “दुबई में तेलंगाना के दो तेलुगु युवकों, निर्मल जिले के अष्टपु प्रेमसागर और निजामाबाद जिले के श्रीनिवास की नृशंस हत्या से मैं स्तब्ध हूँ।”
Deeply shocked by the brutal killing of two Telugu youth from Telangana in Dubai, Ashtapu Premsagar from Nirmal Dist. and Srinivas from Nizamabad Dist.
Spoke to Hon’ble External Affairs Minister Shri @DrSJaishankar ji on the matter and he has assured full support to the bereaved…
उन्होंने आगे लिखा, “इस मामले में विदेश मंत्री श्री डॉक्टर जयशंकर जी से बात की और उन्होंने शोक संतप्त परिवारों को पूर्ण सहायता और पार्थिव शरीर को तत्काल वापस भारत भेजने का आश्वासन दिया है। विदेश मंत्रालय भी इस मामले में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेगा। मैं जयशंकर जी के समर्थन और सहायता के लिए उनका आभार व्यक्त करता हूँ।”
मामले में अभी हत्यारे पाकिस्तानी पर क्या कार्रवाई हो रही है, इसकी कोई जानकारी सामने नहीं आई है।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में हिन्दुओं पर लगातार हिंसा के मामले सामने आए। इस बीच ‘अल जज़ीरा’ और AFP जैसे विदेशी मीडिया पोर्टलों ने हिंसक मुस्लिम भीड़ का बचाव किया है। इन्होंने हिन्दुओं के खिलाफ हुई हिंसा को प्रदर्शन करार दिया। इन पोर्टल ने ‘गोएबल्स’ जैसे प्रचार का सहारा लिया, जिसमें झूठ को दोहराने, जनता को गुमराह करने और दुश्मनी पैदा करने जैसे पैंतरे शामिल हैं।
ऑपइंडिया ने मामले को विस्तार से रिपोर्ट किया कि कैसे यहाँ हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। हिंसा में उनके घर, दुकानों और हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया। 11 अप्रैल, 2025 को जुमे की नमाज़ के तुरंत बाद नए वक्फ कानून के खिलाफ ‘विरोध’ के नाम पर नरसंहार शुरू हुआ। ये अगले दिन भी जारी रहा।
हालत यहाँ तक खराब हो गए कि हज़ारों हिंदुओं को मुर्शिदाबाद में अपने घरों को छोड़कर भागना पड़ा। लोग नावों के जरिए पास के मालदा जिले में पलायन को मजबूर हो गए।
‘अल जज़ीरा’ ने मुस्लिमों को दर्शाया ‘पीड़ित’
13 अप्रैल, 2025 को ‘अल जज़ीरा’ ने ‘मुस्लिम बंदोबस्ती बिल पर घातक विरोध के बाद भारत ने सेना तैनात की’ शीर्षक से एक रिपोर्ट पब्लिश की। रिपोर्ट में असल हिंदू पीड़ितों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, कतर से फंड लेने वाली इस वेबसाइट ने मुस्लिम अपराधियों को ‘पीड़ित’ के रूप में दर्शाया। बड़े पैमाने में हुए दंगों को हाल ही में पारित ‘विवादित विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन’ बताकर इसे मामूली करार दिया।
‘अल जज़ीरा’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
यहाँ तक की मुस्लिम भीड़ द्वारा की गई हिंसा को ये सुझाव देकर मामूली बताया कि वक्फ संशोधन अधिनियम में ‘धार्मिक बंदोबस्त (वक्फ) के प्रबंधन के लिए मुस्लिमों के अधिकारों को कमजोर कर दिया गया है।’ इस जानलेवा हिंसा को रिपोर्ट करने के लिए ‘विरोधों का बढ़ना’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है।
‘अल जजीरा’ ने अपनी रिपोर्ट में वक्फ में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने पर भी ध्यान केंद्रित किया और कथित ‘धार्मिक भेदभाव’ के खिलाफ मुर्शिदाबाद में मुस्लिमों द्वारा दंगे भड़काने का समर्थन किया।
रिपोर्ट में हिंदू समुदाय के खिलाफ हिंसा को सही बताते हुए कहा गया है, “मुस्लिमों को डर है कि 1995 के कानून में बदलाव से ऐतिहासिक मस्जिदों, दुकानों, दरगाहों, कब्रिस्तानों और हजारों एकड़ जमीन सहित वक्फ संपत्तियों पर कब्ज़ा, विवाद और विध्वंस का खतरा हो सकता है।”
‘अल जज़ीरा’ ने ‘गोएबल्स’ जैसे प्रोपेगेंडा का सहारा लिया। मुर्शिदाबाद में हुए नरसंहार के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कसूरवार ठहराने की कोशिश की। जबकि दंगाई मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं के घरों को आग लगा दी, आजीविका को नष्ट कर दिया, मौत और बलात्कार को धमकियाँ दी और पानी की टंकियों में जहर डाल दिया।
‘अल जज़ीरा’ ने दावा किया है, “प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी के एक दशक के कार्यकाल में उन्होंने देश के बहुसंख्यक हिंदू धर्म के आक्रामक चैंपियन के तौर पर अपनी छवि बनाई है और रिपोर्ट बताती है कि धार्मिक ध्रुवीकरण से उनकी पार्टी को चुनावी लाभ हासिल करने में मदद मिली है।”
कतर से फंड लेने वाले इस आउटलेट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के पक्ष में तर्क देने की कोशिश की, जिन्होंने हिन्दुओं को निशाना बनाने के लिए चरमपंथियों को अनुकूल माहौल दिया। और कहा कि राज्य में वक्फ संशोधन अधिनियम लागू नहीं किया जाएगा और टीएमसी नेता प्रदेश में मुस्लिमों को सक्रिय रूप से शांत करने में लगे हुए हैं।
AFP ने दंगाइयों के अपराध को ‘घातक विरोध’ करार दिया
समाचार ‘एजेंसी फ़्रांस प्रेस’ (AFP) ने भी एक वायर कॉपी प्रकाशित की थी, जिसमें नए वक्फ कानून का विरोध करने वाली उन्मादी मुस्लिम भीड़ द्वारा मुर्शिदाबाद में हिंदुओं के खिलाफ की गई हिंसा की भयावहता को कम करके दिखाया।
मुर्शिदाबाद के सुनियोजित दंगों को ‘घातक विरोध’ की तरह पेश किया। हिंसा को उचित ठहराने के लिए एक आधार तैयार किया गया, जिसमें दावा किया गया कि विरोध प्रदर्शन एक ऐसे कानून के खिलाफ थे, जिसने ‘मुस्लिमों के स्वामित्व वाली संपत्तियों के प्रबंधन के तरीके’ को बदल दिया।
AFP की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
न्यूज एजेंसी ने रिपोर्ट में दावा किया, “वक्फ संशोधन अधिनियम के चलते विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे, जिसे इसी महीने बहस के बावजूद पारित किया गया था।”
विपक्षी नेताओं का हवाला देते हुए AFP ने वक्फ संशोधन अधिनियम की एक गलत छवि प्रस्तुत की, जिससे ‘विरोध प्रदर्शन’ करना जरूरी हो गया और कानून के अधिनियम के बाद हुई हिंसा के लिए एक आधारभूत तर्क को और अधिक प्रासंगिक बना दिया गया।
एजेंसी ने दावा किया, “पुलिस ने मुर्शिदाबाद जिले में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को हज़ारों प्रदर्शनकारियों पर आँसू गैस के गोले भी फेंके गए। पुलिस ने शनिवार (12 अप्रैल, 2025) को AFP को बताया कि एक बच्चे सहित तीन लोगों की मौत हो गई।” एजेंसी ने ये गलत धारणा दी कि कानून प्रवर्तन अधिकारी केवल ‘प्रदर्शनकारियों (वास्तव में दंगाइयों)’ के खिलाफ घातक बल को इस्तेमाल कर रहे हैं।
AFP की रिपोर्ट में मुर्शिदाबाद में हिंसा को लेकर मोदी सरकार पर भी निशाना साधा गया। एजेंसी ने दावा किया,”प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के एक दशक ने उन्हें देश के बहुसंख्यक हिंदू धर्म के चैंपियन के रूप में अपनी छवि बनाने का मौका दिया है। उनकी सरकार ने भारत के मुस्लिम बहुल भारतीय अवैध रूप से कब्जे वाले जम्मू और कश्मीर की संवैधानिक स्वायत्तता को रद्द कर दिया और उस जमीन पर मंदिर के निर्माण का समर्थन किया, जहाँ सदियों से एक मस्जिद खड़ी थी, जिसे 1992 में हिंदू चरमपंथियों ने गिरा दिया था।”
AFP की यह रिपोर्ट पाकिस्तान के कई बड़े मीडिया पोर्टलों जैसे डॉन, जियो और ‘द न्यूज इंटरनेशनल‘ में भी हूबहू प्रकाशित हुई। इन पोर्टलों ने भी मुर्शिदाबाद की हिंसा को ‘प्रदर्शन’ कहकर पेश किया और हिन्दुओं पर हुए हमलों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया।
मुर्शिदाबाद में हिंदूओं के साथ हुई हिंसा
मुर्शिदाबाद जिले के सूटी और शामशेरगंज इलाकों में शुक्रवार (11 अप्रैल, 2025) को जुमे की नमाज के बाद बड़े पैमाने पर हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और हिन्दू समुदाय के लोगों पर हमले की घटनाएँ सामने आईं। यह सब वक्फ संशोधन कानून के विरोध के नाम पर हुआ लेकिन इसके पीछे सुनियोजित हिंसा की आशंका जताई जा रही है।
प्रदर्शन के नाम पर उग्र भीड़ ने पहले शांतिपूर्ण नारेबाज़ी की लेकिन जल्द ही हालात बेकाबू हो गए। हिंसक भीड़ ने एक हिन्दू दंपति की मिठाई की दुकान को पूरी तरह से तहस-नहस कर डाला। दुकान का नाम था ‘सुभा स्मृति होटल’। दुकान मालिक आँसू बहाते हुए बस इतना ही कह सके, “यहीं मेरी मिठाई की दुकान थी…” उनकी पत्नी ने रोते हुए कहा, “सारा सामान, दुकान में रखे पैसे, सब लूट लिया… अब हम खाएँगे क्या?”
इतना ही नहीं, ‘श्री हरि हिन्दू होटल एंड लॉज’ नामक एक और प्रतिष्ठान को भी निशाना बनाया गया। समाचार एजेंसी ANI ने इसके नुकसान की तस्वीरें साझा की हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, हिंसक तत्वों ने कई हिन्दू मंदिरों को भी नुकसान पहुँचाया और मूर्तियों को खंडित किया। ‘रिपब्लिक बांग्ला’ चैनल द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में तृणमूल कांग्रेस के सांसद खलीलुर रहमान यह स्वीकार करते नजर आए कि जंगीपुर इलाके में एक मंदिर तोड़ा गया है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, “अल्पसंख्यक बहुल इस जिले में कई हिन्दू परिवारों के घरों और दुकानों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया, “हिंसा के दौरान एक एम्बुलेंस को भी नहीं बख्शा गया। उसे आग के हवाले कर दिया गया और उसके ड्राइवर की बेरहमी से पिटाई की गई।” एक प्रत्यक्षदर्शी ने कहा, “हम डर के मारे अपने घरों में छुपे हुए थे। मैंने अपने माता-पिता, पत्नी और बच्चों को अंदर ही बंद कर रखा था।”
उन्होंने साफ तौर पर बताया कि हमला करने वाले कोई बाहरी नहीं बल्कि आसपास के ही लोग थे। इसी बीच एक सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है, जिसमें एक दंगाई को एक हिन्दू परिवार की गाड़ी तोड़ते हुए देखा जा सकता है।
ANI से बात करते हुए एक और पीड़ित ने बताया, “इन्होंने बाइक जला दी, हमारा सामान लूट लिया और दुकानों में आग लगा दी।” उन्होंने कहा कि पूरी रात वे सो नहीं पाए। “हम जागते रहे, डरते रहे। जब हिंसा हो रही थी, तब इलाके में कोई पुलिस नहीं थी। जो पुलिस आई भी वो अपनी जान बचाकर भाग रही थी। अब देखना है कि सरकार हमें मुआवजा देती है या नहीं।”
आज तक से बातचीत में एक व्यापारी की पत्नी मनजू भगत नाम की महिला ने बताया, “वे लोग सामने के दरवाज़े से अंदर आने की कोशिश कर रहे थे। जब नहीं आ पाए तो पीछे के दरवाज़े से घुसने लगे।” उन्होंने बताया, “हमारे घर में बाइक तोड़ दी गई, सामान फेंका गया और कुर्सी, गद्दा, टीवी जैसे कीमती सामान तक लूट ले गए।”
मनजू ने अपने दर्द को साझा करते हुए कहा, “हम पूरा परिवार ऊपर छत पर छुपा हुआ था। भगवान का नाम ले रहे थे कि कैसे भी ये लोग हमारे घर से चले जाएँ। उस वक्त मेरी बेटी के साथ कुछ हो जाता तो मैं क्या करती?”
शिमला के संजौली इलाके में बनी पाँच मंजिला मस्जिद की तीन मंजिलें टूटनी हैं। अक्टूबर 2024 में नगर निगम आयुक्त कोर्ट ने इस मस्जिद की ऊपरी तीन मंजिलों को अवैध घोषित कर उन्हें गिराने का आदेश दिया था। सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन ये मंजिलें अब तक पूरी तरह नहीं टूटीं। मस्जिद कमेटी हर सुनवाई में नए-नए बहाने पेश कर रही है। ताजा सुनवाई में कोर्ट ने कमेटी को 26 अप्रैल, 2025 तक का आखिरी समय दिया है। लेकिन सवाल वही है – क्या इस बार आदेश का पालन होगा, या फिर मामला और लंबा खिंचेगा?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नगर निगम आयुक्त कोर्ट की ताजा सुनवाई में मस्जिद कमेटी ने दावा किया कि अवैध निर्माण को हटाने का काम चल रहा है, लेकिन अभी तक केवल 50 फीसदी हिस्सा ही टूट पाया है। कमेटी का कहना है कि रिहायशी इलाके में मस्जिद होने की वजह से तेजी से काम करना मुश्किल है। कोर्ट ने इस दलील को सुनने के बाद भी सख्त रुख अपनाया और 26 अप्रैल तक बाकी बचे निर्माण को पूरी तरह हटाने का आदेश दिया। आयुक्त ने साफ कहा कि हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इस मामले को जल्द निपटाने के निर्देश दिए हैं।
स्थानीय निवासी राम लाल बताते हैं, “पिछले साल से सुन रहे हैं कि मस्जिद की मंजिलें टूटेंगी, लेकिन काम इतना धीमा है कि लगता है सालों लग जाएँगे।” वहीं, मस्जिद कमेटी के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम कोर्ट के आदेश का सम्मान कर रहे हैं, लेकिन आसपास घर होने की वजह से सावधानी बरतनी पड़ रही है। मलबा हटाने में भी समय लग रहा है।”
इस बीच, कोर्ट ने मस्जिद की निचली दो मंजिलों की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। आयुक्त ने वक्फ बोर्ड से इन मंजिलों के नक्शे और राजस्व रिकॉर्ड माँगे हैं। अगर ये दस्तावेज पेश नहीं किए गए, तो इन दो मंजिलों को भी अवैध घोषित कर हटाने का आदेश जारी हो सकता है। सुनवाई में मस्जिद कमेटी के अध्यक्ष मोहम्मद लतीफ मौजूद नहीं थे, जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई। वक्फ बोर्ड ने रिकॉर्ड अपडेट करने के लिए और समय माँगा है।
संजौली के स्थानीय निवासियों में इस मामले को लेकर गुस्सा साफ दिखता है। देवभूमि संघर्ष समिति के संयोजक भारत भूषण का कहना है, “मस्जिद कमेटी जानबूझकर देरी कर रही है। पहले कहा था कि फंड की कमी है, अब कह रहे हैं कि मलबा हटाने में समय लग रहा है। ये सब बहाने हैं।” समिति ने यह भी दावा किया है कि मस्जिद जिस जमीन पर बनी है, वह सरकार की है, न कि वक्फ बोर्ड की। उन्होंने आशंका जताई कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में अब छेड़छाड़ हो सकती है।
दूसरी ओर ऑल हिमाचल मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन ने इस मामले में हाईकोर्ट का रुख करने की बात कही है। संगठन के एक सदस्य ने कहा, “हम चाहते हैं कि मामला कानूनी तरीके से सुलझे। अगर निचली मंजिलों को भी हटाने का आदेश आया, तो हम उसका जवाब कोर्ट में देंगे।”
बता दें कि यह विवाद 2010 से चला आ रहा है, जब मस्जिद के निर्माण पर पहली बार सवाल उठे थे। 2012 में वक्फ बोर्ड ने दो मंजिलों को मंजूरी दी थी, लेकिन 2018 तक बिना अनुमति के पाँच मंजिलें बन गईं। पिछले साल सितंबर में दो समुदायों के बीच झगड़े के बाद यह मामला फिर गरमाया। तब से कोर्ट में 46 से ज्यादा सुनवाइयाँ हो चुकी हैं। नगर निगम ने 35 बार नोटिस जारी किए, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
हिंदू जागरण मंच के कमल गौतम का कहना है कि सरकार की हीला-हवाली की वजह से मामला तेज गति से नहीं बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो ये काम जल्द से जल्द हो सकता है। हालाँकि उन्होंने समस्या भी बता कि मस्जिद ऐसी जगह पर है, जहाँ बुलडोजर या कोई बड़ी मशीनरी नहीं ले जाई जा सकती और पूरी मस्जिद को हाथ से ही तोड़ा जा सकता है।
नगर निगम कोर्ट ने इस सुनवाई में संजौली मस्जिद के अलावा शिमला के सात अन्य भवन मालिकों को भी अवैध निर्माण हटाने के आदेश दिए। इनमें माल रोड, कच्चीघाटी, लाल पानी, और छोटा शिमला जैसे इलाकों के मकान शामिल हैं। कोर्ट ने साफ किया कि बिना मंजूरी के बनाए गए छज्जे, सीढ़ियाँ या अतिरिक्त निर्माण को तुरंत हटाना होगा।
संजौली में मस्जिद के आसपास रहने वाली शांति देवी कहती हैं, “हमें कोई झगड़ा नहीं चाहिए। बस कोर्ट का आदेश पूरा हो, ताकि शांति बनी रहे।” लेकिन जिस रफ्तार से काम चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि 26 अप्रैल की समयसीमा भी शायद पूरी न हो। स्थानीय लोग अब हाईकोर्ट की अगली सुनवाई का इंतजार कर रहे हैं, जहाँ इस मामले में बड़ा फैसला आ सकता है।
कॉन्ग्रेस मुखपत्र ‘नेशनल हेराल्ड’ से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पार्टी के पूर्व अध्यक्षों सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के विरुद्ध ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने चार्जशीट दायर की है। कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने इसे बदले की राजनीति करार दिया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई गुरुवार (25 अप्रैल, 2025) को होगी। YIL (यंग इंडिया लिमिटेड) नामक कंपनी ‘नेशनल हेराल्ड’ को संचालित करती है। इस कंपनी में 76% शेयर सोनिया व राहुल गाँधी के हैं। दोनों के इसमें 38-38% शेयर हैं।
क्या है ‘नेशनल हेराल्ड’ का मामला, जिसमें सोनिया-राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ चार्जशीट
इससे पहले ‘नेशनल हेराल्ड’ का स्वामित्व AJL (एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड) के पास था, लेकिन YIL ने इसका अधिग्रहण कर लिया। 11 फरवरी को ED ने इस मामले से जुड़ी 661 करोड़ रुपए की संपत्तियों की ज़ब्ती की कार्रवाई शुरू की थी। ये संपत्तियाँ दिल्ली, मुंबई और लखनऊ जैसे बड़े शहरों में था। इसमें दिल्ली में बहादुरशाह ज़फर मार्ग स्थित ‘हेराल्ड हाउस’ भी शामिल है। YIL के बचे हुए 24% शेयर कॉन्ग्रेस नेताओं मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस के नाम था।
अब ये दोनों ही नेता इस दुनिया में नहीं हैं। उनके निधन के बाद उनके शेयरों पर किसी ने दावा नहीं ठोका। ED का कहना है कि ये शेयर भी सोनिया और राहुल के पास ही चले गए, यानी दोनों माँ-बेटे 100% शेयरों के मालिक बन गए। YIL का गठन 23 नवंबर, 2010 को हुआ था। कॉन्ग्रेस ने AJL को 90 करोड़ रुपए का ऋण दे रखा था, जिसे मात्र 50 लाख रुपए में सेटल करते हुए YIL ने संस्था के 2000 करोड़ रुपए की संपत्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
जाँच एजेंसी का कहना है कि मनी लॉन्ड्रिंग के लिए फर्जी डोनेशन और फर्जी रेंट अग्रीमेंट्स का जुगाड़ किया गया। करोड़ों रुपयों की हेराफेरी हुई। 2012 में सुब्रमण्यन स्वामी द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर इस मामले की जाँच शुरू की गई थी। 2022 में राहुल गाँधी इस मामले में पूछताछ के लिए 5 बार ED के समक्ष उपस्थित हुए थे। CBI भी इस मामले की जाँच कर रही है, इसका मनी लॉन्ड्रिंग वाला हिस्सा ED के पास है। पूरा मामला आपराधिक साजिश का भी बताया गया है।
भोपाल से भी जुड़ा है YIL और AJL का झोल
बता दें कि भोपाल के प्रेस कॉम्प्लेक्स में AJL को 1981 में 1.14 एकड़ जमीन महज 1 लाख रुपए में 30 साल के लिए लीज पर आवंटित की गई थी। AJL ने उस समय अंग्रेजी दैनिक ‘नेशनल हेराल्ड’, हिंदी दैनिक ‘नवजीवन’ और उर्दू दैनिक ‘कौमी आवाज़’ प्रकाशित की थी। 2011 में लीज समाप्त होने के बाद ‘भोपाल विकास प्राधिकरण’ (BDA) यहाँ मालिकाना हक लेने पहुँचा तो पाया कि इसका इस्तेमाल समाचार पत्रों के प्रकाशन के बजाय व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा था।
ED files chargesheet against Sonia & Rahul Gandhi in money laundering case linked to National Herald based on complaint by Dr Subramanian Swamy. #NationalHeraldpic.twitter.com/ziyPasEwLK
समाचार पत्रों का प्रकाशन तो 1992 में ही बंद हो चुका था और उसके बाद से इसका कॉमर्शियल इस्तेमाल हो रहा था। प्रेस को दिए गए प्लॉट पर व्यवसायिक कॉम्प्लेक्स बनने का पता चलने के बाद भोपाल विकास प्राधिकरण ने इसे अपने कब्जे में लेने की कार्रवाई शुरू की लेकिन इसी बीच कई खरीददार सामने आ गए और मामला अदालत पहुँच गया। इस वजह से कार्रवाई बीच में ही अटक गई। हालाँकि, 2012 में भोपाल विकास प्राधिकरण ने इस प्लॉट की लीज को रद्द कर दिया था लेकिन तब से लेकर अब तक इस प्लॉट के अलग-अलग खरीददार और भोपाल विकास प्राधिकरण के बीच मालिकाना हक को लेकर मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
‘जीजा जी’ रॉबर्ट वाड्रा से भी ED ने की है पूछताछ
हरियाणा के गुरुग्राम के एक जमीन घोटाले के मामले में सोनिया गाँधी के दामाद और राहुल गाँधी के बहनोई रॉबर्ट वाड्रा से भी प्रवर्तन निदेशालय ने पूछताछ की है। रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी केरल के वायनाड से सांसद हैं, ये सीट उनके भाई राहुल गाँधी ने उनके लिए छोड़ दी थी। उनसे 6 घंटे पूछताछ हुई है। इससे पहले 8 अप्रैल को उन्हें समन भेजा गया था लेकिन वो पेश नहीं हुए थे। दूसरे समन के बाद वो पेश हुए। उन्हें बुधवार को फिर से पूछताछ के लिए बुलाया गया है।
रॉबर्ट वाड्रा ने केंद्र सरकार पर बदले की राजनीति व जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि वो हमेशा से सारे सवालों के जवाब देते रहे हैं और आगे भी देंगे। 2008 में गुरुग्राम के शिकोहपुर रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी ‘स्काइलाइट हॉस्पिटैलिटी’ ने जमीन ख़रीदी थी। 7.5 करोड़ में क़रीब 3 एकड़ की जमीन ली गई। हरियाणा की तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने कॉलोनी बनाने की अनुमति दी। इसके बाद ये जमीन रॉबर्ड वाड्रा की कंपनी ने DLF को 58 करोड़ रुपए में बेच दी।
करीब 14,000 करोड़ के PNB घोटाले का आरोपित भगोड़ा मेहुल चोकसी को बेल्जियम में गिरफ़्तार किए जाने के बाद उसे भारत लाने की तैयारी चल रही है। वहीं हीरा व्यापारी ने प्रत्यर्पण से बचने के लिए बीमारी का बहाना बनाना शुरू कर दिया है।
मेहुल चोकसी की गिरफ़्तारी के बाद बारबरा जबारिका नामक महिला एक बार फिर से चर्चा में आ गई है। बता दें कि चोकसी को लेकर ये बात सुर्ख़ियों में आई थी कि उसे ‘हनी ट्रैप’ में फँसाया गया था और उसका अपहरण किया गया था। इसी दौरान उसने बारबरा जबारिका नामक हंगरी की एक महिला का नाम भी लिया था।
दरअसल, 2018 में चोकसी भारत से फरार हो गया और बैंक धोखाधड़ी के बाद कार्रवाई से बचने के लिए एंटीगुआ और बारबुडा में उतरा। उसने कुछ निवेश करके वहाँ की नागरिकता हासिल की। 2021 में वह डोमिनिका में दिखाई दिया और अवैध तरीके से प्रवास के लिए गिरफ्तार किया गया। हालाँकि कुछ दिनों तक जेल में रहने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।
तभी बारबरा जबारिका का मामला सामने आया था। चोकसी ने दावा किया था कि उसे अगवा किया गया, प्रताड़ित किया गया और एक नाव पर बिठाया गया जो उसे एंटीगुआ से डोमिनिका ले गई और बारबरा पूरी साजिश का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी।
कौन है बारबरा जबारिका?
जानकारी के मुताबिक हंगरी की नागरिक बारबरा जबारिका एक ‘प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट एजेंट’ है। खुद को सेल्स नेगोशिएटर बताती है। बारबरा रियल एस्टेट और डायरेक्ट सेल्स के क्षेत्र में काम कर चुकी है।
मेहुल चोकसी ‘हनी ट्रैप’ में फँसा था
मेहुल चोकसी ने खुद को ‘हनी-ट्रैप’ और अपहरण की साजिश का शिकार बताया था। इस दौरान उसने बारबरा जबारिका का नाम लिया। चोकसी ने कहा, ” हंगरी की रहने वाली बारबरा जबारिका ने हनी-ट्रैप में फँसाया।” वहीं 2020 में मेहुल चौकसी की पत्नी प्रीति चौकसी के दावा किया था कि बारबरा जबारिका के प्यार में मेहुल चोकसी फँस गए हैं।
मैं चौकसी की गर्लफ्रेंड नहीं- बारबरा
मेहुल चोकसी ने दावा किया था कि बारबरा जबारिका ने उससे झूठी दोस्ती की और उसकाअपहरण करवाया। चौकसी के मुताबिक अपहरण से ठीक पहले उसे रात के डिनर पर बुलाया गया और जबरन पकड़ कर ले जाया गया। हालाँकि बारबरा ने इन दावों को खारिज कर दिया और कहा कि वह चौकसी की गर्लफ्रेंड नहीं है।
‘राज’ बन कर मिला चौकसी- बारबरा
बारबरा ने दावा किया कि उसके पास नौकरी है, पैसे है। उसे किसी की मदद की कोई जरूरत नहीं है। उसने आगे दावा किया कि मेहुल चोकसी ने अपनी पहचान को गलत बताया और खुद को ‘राज’ कहा।
बारबरा ने ये भी दावा किया, “राज ने ही सबसे पहले मुझसे संपर्क किया था। उसने मेरा नंबर माँगा और मुझसे दोस्ती की। उसकी पत्नी जो कह रही हैं, वो सच नहीं है।”
कर्नाटक में जाति जनगणना रिपोर्ट लीक होने के बाद राज्य की राजनीति में हलचल मच गई है। ख़ासकर वोक्कालिगा और लिंगायत जैसी प्रभावशाली समुदायों के नेताओं और विधायकों ने रिपोर्ट पर गहरी नाराजगी जताई है। लिंगायत समुदाय की प्रमुख संस्था अखिल भारतीय वीरशैव लिंगायत महासभा ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और नयी जनगणना कराने की मांग की है।
क्या है पूरा मामला?
कर्नाटक सरकार को गुरुवार (10 अप्रैल, 2025) को जाति आधारित जनगणना रिपोर्ट सौंपी गई थी, लेकिन इसे अभी आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया है। इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक हो गए हैं, जिससे कई समुदायों में असंतोष पैदा हो गया है।
लीक हुई रिपोर्ट के अनुसार, वोक्कालिगा समुदाय की आबादी 61.6 लाख (कुल आबादी का 10.3%) बताई गई है। इनके लिए 7% आरक्षण की सिफारिश की गई है। वहीं लिंगायत समुदाय की आबादी 66.3 लाख (11%) बताई गई है। इनके लिए 8% आरक्षण की सिफारिश की गई है। जबकि मुस्लिम समुदाय की आबादी 75.2 लाख (12.6%) बताई गई है और उनके आरक्षण को 4% से बढ़ाकर 8% करने की सिफारिश की गई है।
क्या है लिंगायत समुदाय की आपत्ति?
‘अखिल भारतीय वीरशैव लिंगायत महासभा’ के अध्यक्ष और पूर्व DGP शंकर बिदरी ने रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा कि लिंगायतों की संख्या 35% के करीब है। उनका दावा है कि राज्य के 31 में से लगभग 15 जिलों में लिंगायतों की संख्या 10 लाख से अधिक है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में लिंगायत समुदाय को विभिन्न उप-समुदायों में बाँटकर उनकी संख्या को जानबूझकर कम करके दिखाया गया है। महासभा ने माँग की है कि एक नई, निष्पक्ष और पारदर्शी जाति जनगणना कराई जाए।
वोक्कालिगा नेताओं का विरोध
वोक्कालिगा समुदाय के कई नेता और संत इस रिपोर्ट का खुलकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी जनसंख्या को कम आँककर उनके साथ अन्याय किया गया है। डिप्टी सीएम DK शिवकुमार, जो स्वयं वोक्कालिगा समुदाय से हैं, ने कॉन्ग्रेस पार्टी के वोक्कालिगा विधायकों की मंगलवार (15 अप्रैल, 2025) शाम 6 बजे बैठक बुलाई है। उनका कहना है कि उन्होंने अभी रिपोर्ट पूरी तरह नहीं पढ़ी है, लेकिन सभी की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए आगे की रणनीति तय की जाएगी।
सरकार ने क्या दी प्रतिक्रिया?
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मुद्दे पर अब तक चुप्पी साधी हुई है और कहा है कि इस पर फैसला विशेष कैबिनेट बैठक में लिया जाएगा। वहीं गृहमंत्री G परमेश्वर ने बताया कि गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) को होने वाली कैबिनेट बैठक में सिर्फ जाति जनगणना रिपोर्ट पर ही चर्चा होगी। उन्होंने कहा, “यह केवल एक शुरुआत है। अभी इस पर विचार किया जाएगा।”
इधर, वन मंत्री ईश्वर खांड्रे, जो लिंगायत समुदाय से हैं, ने कहा कि वह अपने समुदाय के नेताओं से राय लेकर कैबिनेट बैठक में साझा करेंगे। BJP से निष्कासित विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल ने कहा कि अगर मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा है, तो उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा क्यों दिया जाए? उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को भी अल्पसंख्यक दर्जा देने की माँग की, जिनकी संख्या मात्र 2% बताई गई है।
Vijayapura MLA @BasanagoudaBJP rejected the caste census survey, alleging it was not conducted properly.
“We are not going to accept the report,” Yatnal said, questioning how Muslims could be classified as minorities when their population was the highest after Scheduled Castes.… pic.twitter.com/qk0XIPgU5x
लुब्ब-ए-लुबाब ये कि कर्नाटक की राजनीति में जाति जनगणना रिपोर्ट एक बड़ा मुद्दा बन गई है। वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय की नाराज़गी ने कॉन्ग्रेस सरकार को मुश्किल में डाल दिया है। आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक बयानबाज़ी और गहराएगी या सरकार किसी आम सहमति पर पहुँचेगी।
यह गुरुवार (17 अप्रैल, 2025) की बैठक के बाद साफ हो सकेगा। यदि सरकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करती है और सभी समुदायों की राय लेकर संतुलन बनाती है, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक मजबूत क़दम माना जा सकता है। लेकिन, अगर असंतोष और विरोध ऐसे ही चलता रहा, तो यह राज्य में जातीय ध्रुवीकरण को भी बढ़ा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल 2025) को इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले पर कड़ा ऐतराज जताया, जिसमें हाई कोर्ट ने रेप पीड़िता को ही जिम्मेदार ठहराते हुए आरोपित को जमानत दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत देना जज का अधिकार है, लेकिन पीड़िता को दोषी बताने वाली टिप्पणी गलत है। कोर्ट ने जजों से संवेदनशीलता बरतने और अपने शब्दों पर ध्यान देने को कहा।
रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की टिप्पणी को असंवेदनशील बताया। जस्टिस गवई ने कहा कि जमानत देना अलग बात है, लेकिन पीड़िता पर ऐसी टिप्पणी क्यों? उन्होंने जजों से सावधानी बरतने को कहा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ आम लोगों के बीच गलत संदेश देती हैं। लोगों को लगता है कि न्याय नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को चार हफ्ते बाद सुनवाई के लिए टाल दिया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ पीड़िताओं के लिए न्याय की राह को और मुश्किल बना देती हैं।
बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस संजय कुमार सिंह ने इस मामले की सुनवाई की थी। उन्होंने कहा कि अगर पीड़िता के आरोप सही भी मान लिए जाएँ, तो भी वह खुद इस घटना के लिए जिम्मेदार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता एमए की छात्रा है, इसलिए उसे अपने कदमों की नैतिकता और परिणाम समझने चाहिए थे। मेडिकल जाँच में पीड़िता का हाइमन टूटा हुआ पाया गया, लेकिन डॉक्टर ने यौन हिंसा की पुष्टि नहीं की। इस आधार पर कोर्ट ने आरोपित को जमानत दे दी थी।
यह मामला सितंबर 2024 का है, जब नोएडा की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एमए की छात्रा ने अपने पुरुष मित्र पर रेप का आरोप लगाया था। पीड़िता ने बताया कि वह अपनी सहेलियों के साथ दिल्ली के हौज खास में एक बार में गई थी। वहाँ शराब पीने के बाद वह नशे में थी। सुबह तीन बजे तक बार में रहने के बाद वह आरोपित के साथ चली गई, जो उसे अपने घर ले जाने की बात कह रहा था।
पीड़िता का आरोप है कि आरोपित उसे नोएडा के बजाय गुरुग्राम में अपने रिश्तेदार के फ्लैट में ले गया। वहाँ उसने पीड़िता के साथ दो बार रेप किया। पीड़िता ने 23 सितंबर 2024 को नोएडा के सेक्टर-126 थाने में शिकायत दर्ज की। इसके बाद पुलिस ने 11 दिसंबर 2024 को आरोपित को गिरफ्तार किया।
यह पहला मौका नहीं है जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर सवाल उठे हैं। इससे पहले मार्च 2025 में हाई कोर्ट ने कहा था कि एक नाबालिग लड़की का स्तन पकड़ना और उसका पायजामा तोड़ना रेप की कोशिश नहीं है। उस फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी।