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वक्फ कानून के विरोध के नाम पर बंगाल में हिंसा से सुप्रीम कोर्ट ‘व्यथित’: महिला आयोग ने गठित की जाँच टीम, पीड़ित महिलाओं से करेगी बात

वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को लेकर देश में बहस तेज़ हो हो गई। वहीं, इसके विरोध के नाम पर हो रहे प्रदर्शनों में जमकर हिंसा हो रही है। इन प्रदर्शनों ने कानून और व्यवस्था की गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। दरअसल, वक्फ संशोधन कानून की संवैधानिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। इस बीच पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा और इसके कारण हिंदुओं के हो रहे पलायन को सुप्रीम कोर्ट और महिला आयोग, दोनों ने गंभीरता से लिया है।

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (16 अप्रैल 2025) को मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अगुवाई में तीन सदस्यीय पीठ ने अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली 70 से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इस कानून के विरोध के नाम पर हो रही हिंसा पर गहरी चिंता जताई और कहा कि जब मामला अदालत में है, तब सड़कों पर हिंसा नहीं होनी चाहिए।

वहीं, सरकार का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने भी हिंसा को दबाव की रणनीति करार बताया। दरअसल, वक्फ कानून को लेकर पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे हैं और हिंसा को अंजाम दिया है। पिता-पुत्र सहित कई लोगों की हत्या कर दी गई है। लोग अपने घार-बार छोड़कर पड़ोसी झारखंड-बिहार में शरण ले रहे हैं।

इस बीच मुर्शिदाबाद और मालदा सहित कई जगहों पर जारी हिंसा में महिलाओं को निशाना बनाए जाने का राष्ट्रीय महिला आयोग ने संज्ञान लिया है। इसकी जाँच के लिए एक कमिटी गठित की गई है। आयोग की अध्यक्ष विजया राहतकर 18-19 अप्रैल को मालदा और मुर्शिदाबाद का दौरा करेंगी। आयोग की टीम स्थानीय प्रशासन, पीड़ित महिलाओं और उनके परिजनों से मुलाकात कर करेगी।

अब चलती ट्रेन में मिलेगी ATM सुविधा, मुंबई से नासिक के बीच चलने वाली पंचवटी एक्सप्रेस में पायलट प्रोजेक्ट शुरू: नकदी के लिए यात्रियों को नहीं पड़ेगा भटकना

भारतीय रेलवे ने यात्रियों की सुविधा के लिए एक अनोखा कदम उठाया है। मुंबई और मनमाड के बीच चलने वाली पंचवटी एक्सप्रेस में देश का पहला चलता-फिरता एटीएम लगाया गया है। यह पहल सेंट्रल रेलवे के भुसावल डिवीजन और बैंक ऑफ महाराष्ट्र के सहयोग से शुरू हुई है।

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपने एक्स अकाउंट पर इसका वीडियो साझा कर इस ऐतिहासिक शुरुआत की जानकारी दी। यह पहली बार है जब किसी भारतीय ट्रेन में यात्रा के दौरान नकद निकासी की सुविधा दी गई है।

सेंट्रल रेलवे (CR) द्वारा शुरू किए गए इस पायलट प्रोजेक्ट में, एक निजी बैंक द्वारा उपलब्ध कराया गया एटीएम एक वातानुकूलित कोच के अंदर स्थापित किया गया है।यह पहले अस्थायी पेंट्री के रूप में इस्तेमाल होने वाले क्यूबिकल में स्थापित है। सुरक्षा के लिए इसमें शटर डोर, रबर पैड, बोल्ट और दो अग्निशमन यंत्र लगाए गए हैं। मनमाड रेलवे वर्कशॉप में कोच में जरूरी बदलाव किए गए ताकि एटीएम चलती ट्रेन में भी सुचारू रूप से काम कर सके।

इस पायलट प्रोजेक्ट के तहत एटीएम को एसी चेयर कार कोच में लगाया गया है। सेंट्रल रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी स्वप्निल नीला ने बताया, “यह एक प्रयोग है। अगर यह सफल रहा, तो अन्य ट्रेनों में भी एटीएम लगाए जाएँगे।”

पंचवटी एक्सप्रेस रोजाना छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी), मुंबई से मनमाड जंक्शन, नासिक तक चलती है। यह ट्रेन 258 किलोमीटर की दूरी 4 घंटे 35 मिनट में तय करती है। इसके 22 कोच हैं, जिनमें रोजाना करीब 2,200 यात्री सफर करते हैं। सभी कोच वेस्टिब्यूल से जुड़े हैं, इसलिए हर यात्री एटीएम तक आसानी से पहुँच सकता है। एटीएम से नकद निकासी के अलावा चेकबुक ऑर्डर और अकाउंट स्टेटमेंट की सुविधा भी मिलेगी।

‘जिस तरह गुंडे औरतों पर हाथ रखते हैं, ये (मुस्लिम) जमीन पर रख देते हैं’: क्या है ‘वक्फ बाय यूजर’ जिसे MP ने बताया सबसे बड़ा हथियार, सुप्रीम कोर्ट में बहस उसी पर टिकी

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए वक्फ संशोधन अधिनियम के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। वक्फ संशोधन वक्फ में जिस विषय को लेकर सबसे अधिक चर्चा हो रही है, वह है ‘वक्फ बाय यूजर’ (Waqf by User)। यहाँ हम समझने की कोशिश करते हैं क्या है, वक्फ बाय यूजर और इसको लेकर मुस्लिमों को क्या है समस्या? सुप्रीम कोर्ट में इस क्या बहस हुई, इसकी भी बात करेंगे।

वक्फ बाय यूजर का साधारण भाषा में कहें तो इसका अर्थ है कि ऐसी संपत्ति जिसका उपयोग मुस्लिम समुदाय लंबे समय अपने मजहबी उद्देश्यों के लिए करता रहा है। ऐसी संपत्ति भले ही लिखित रूप से पंजीकृत करवाई गई हो या नहीं। यानी, जिसका वक्फ डीड नहीं होगा, उसका भी ऐसे मामलों में कोई अहमियत नहीं होगी और वह संपत्ति वक्फ बाय यूजर के तहत वक्फ संपत्ति मानी जाएगी।

कई बार कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति मुस्लिमों की हित के लिए या इस्लाम को फैलाने आदि के लिए दान कर देता है। इसके बाद वह संपत्ति मुस्लिमों के ईश्वर ‘अल्लाह’ की हो जाती है। अब उस संपत्ति को ना ही खरीदा जा सकता है और ना ही बेचा सकता है। उसे किराया पर दिया जा सकता है। वहीं, कुछ लोग अपने समाज के लिए मदरसा, अनाथालय आदि खुलवाते हैं। वह भी वक्फ बाय यूजर है।

किसी संपत्ति को मुस्लिमों द्वारा इस्तेमाल करने के नाम पर भी वक्फ बाय यूजर घोषित कर दिया जाता है। मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश कपिल सिब्बल ने सु्प्रीम कोर्ट में इस मुद्दे को सबसे पहले उठाया और बहस की शुरुआत की। सिब्बल ने कहा, “‘वक्फ बाय यूजर’ वक्‍फ की एक शर्त है।” उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा, “मान लीजिए मेरे पास एक प्रॉपर्टी है और मैं चाहता हूँ क‍ि वहाँ एक अनाथालय बनवाया जाए तो इसमें समस्‍या क्‍या है?”

वक्फ बाय यूजर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चर्चा

सिब्बल ने आगे दलील दी, “यह मेरी जमीन है, मैं उस पर अनाथालय बनवाना चाहता हूँ। ऐसे में सरकार मुझे रज‍िस्‍टर्ड कराने के ल‍िए क्‍यों मजबूर करेगी?” इस पर CJI संजीव खन्ना ने कहा, “अगर आप वक्‍फ का रज‍िस्‍ट्रेशन कराएँगे तो रिकॉर्ड रखना आसान होगा, लेकिन सरकार ने ‘वक्फ बाय यूजर’ ही खत्‍म कर द‍िया है।” वक्फ संशोधन अधिनियम में वक्फ बाय यूजर प्रावधान को खत्म कर दिया गया है।

वहीं, जस्‍टि‍स विश्वनाथन ने कहा, “कानून के मुताबिक फर्जी दावों से बचने के ल‍िए पंजीकरण कराना जरूरी है। इसल‍िए वक्‍फ डीड बनवाना होगा।” इस पर एडवोकेट सिब्‍बल ने तर्क द‍िया कि वक्फ डीड बनवाना इतना आसान नहीं है। उन्होंने कहा, “वक्फ सैकड़ों साल पहले किए गए थे। सरकार 300 साल पुरानी संपत्ति की वक्फ डीड माँगेगी तो लोग कहाँ से लाएँगे।”

CJI संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस विश्वनाथ की खंडपीठ ने कहा कि ब्रिटिश हुकुमत से पहले वक्फ रजिस्टेशन की व्यवस्था नहीं थी। बहुत-सी मस्जिदें 14वीं-15वीं-16वीं सदी की बनी हैं। इनके पास बिक्री विलेख (Sale Deed) कहाँ होगा? आप वक्‍फ बाय यूजर को कैसे रजिस्टर करेंगे? यह पहले से स्थापित किसी चीज को खत्म करने जैसा होगा।ठ

CJI ने कहा, “हम जानते हैं कि पुराने कानून का कुछ गलत इस्तेमाल हुआ, लेकिन कुछ वास्तविक वक्फ संपत्तियाँ भी हैं। उन संपत्तियों की पहचान लंबे समय से इस्तेमाल करने के कारण वक्फ संपत्ति के रूप में हुई है। वक्फ बाय यूजर मान्य किया गया है। अगर इसे खत्म किया गया तो समस्या होगी।” इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को खत्म करने को लेकर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखने के लिए प्रस्तुत सॉलिसीटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कहा कि वक्फ अधिनियम में किए गए संशोधन पूरी तरह संविधान सम्मत हैं। उन्होंने कहा कि वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण की बात वक्फ अधिनियम 1995 में है। उन्होंने कहा कि अगर वक्फ का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ तो मुतवल्ली जेल जाएगा, यह 1995 से है।

SG ने कहा कि इस कानून पर संयुक्त संसदीय कमिटी (JPC) ने लंबी बहस की है। उन्होंने कहा कि JPC ने इसके लिए 38 बैठकें की हैं। देश के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न समाज के लोगों से बातचीत और फिर 9 लाख से अधिक सुझावों पर चर्चा करके इस कानून को बनाया गया है। तुषार मेहता ने कहा कि इस कानून में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की कोई बात नहीं है।

संसद में ‘वक्फ बाय यूजर’ पर हुई थी चर्चा

दरअसल, वक्फ बाय यूजर का जिक्र करते हुए भाजपा सांसद राधा मोहन अग्रवाल ने इस महीने के शुरू में राज्यसभा में कहा था, “जिस तरह से फिल्मों में गुंडे जिस औरत पर हाथ रख देते थे वह उसकी हो जाती थी, उसी तरह से ये (मुस्लिम) जिस जमीन पर हाथ रख देते थे, वह जमीन इनकी हो जाती थी। वक्फ बाय यूजर इनका सबसे बड़ा हथियार था।”

उन्होंने आगे कहा था, “किसी की जमीन पर (मुस्लिमों ने) कुछ दिन नमाज पढ़ ली तो वक्फ बाय यूजर के तहत वो जमीन वक्फ बोर्ड की हो जाती थी। तमिलनाडु में 1500 साल पुराने मंदिर को भी वक्फ प्रॉपर्टी घोषित कर दिया गया था।” इसी तरह केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने राज्यसभा में वक्फ संशोधन बिल को प्रस्तुत करते हुए वक्फ बाय यूजर पर खड़ा किया था।

रिजिजू ने कहा था कि कोई भी प्रॉपर्टी हो उसके दस्तावेज होने चाहिए। उन्होंने कहा था, “वक्फ बाय यूजर के नाम पर हम मुँह से कह देंगे कि ये प्रॉपर्टी हमारी है, यह नहीं चलेगा। अभी सिर्फ इस्तेमाल के आधार पर किसी प्रॉपर्टी को वक्फ घोषित किया जा सकता था। इसे हमने हटा दिया है। वक्फ बाय यूजर में जो सैटल केस हैं या पहले से रजिस्टर्ड प्रॉपर्टी है, उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।”

वक्फ बाय यूजर को लेकर संयुक्त संसदीय कमिटी (JPC) के अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने भी स्पष्टीकरण दिया था। उन्होंने कहा था कि अब वक्फ बाय यूजर नहीं, वक्फ बाय डीड होगा। वह वक्फ संपत्ति भी रजिस्टर्ड होगा, जैसे कि सिविल प्रॉपर्टी रजिस्टर होती हैं। उन्होंने कहा था कि वक्फ संपत्ति को रजिस्टर कराने के बाद उसे पोर्टल पर 6 महीने के भीतर कराना होगा।

भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने इसका कारण बताते हुए कहा था, “इसका मकसद है कि अगर कोई जमीन वक्फ की है तो बाकी लोगों को भी पता होना चाहिए। इसके साथ ही उस जमीन के कानूनी दस्तावेज भी होने जरूरी हैं। अब तक वक्फ अधिनियम की धारा 40 में किसी भी प्रॉपर्टी पर अगर बोर्ड दावा कर देता था तो वह वक्फ की संपत्ति मानी जाती थी। इस धारा को अब खत्म कर दिया गया है।”

एक दिन यूँ ही भारत के लिए निकल पड़ी डेनमार्क की युवती, 10 महीने बाद लिखा- यह जीवन का सबसे अच्छा फैसला, यही है असली जिंदगी: जानिए क्यों कह रही- एक बार भारत जरूर आएँ?

डेनमार्क की एस्ट्रिड एस्मेराल्डा ने भारत में उनकी जिंदगी को बेहतरीन बताया है। उनका कहना है कि अपना देश छोड़कर भारत आना उनके जीवन का सबसे सही फैसला था। वे पिछले 10 महीने से यहाँ रह रही हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम पर वीडिया शेयर कर भारत में अपने अनुभवों को साझा किया। वीडियो के कैप्शन में लिखा, “पिछले दस महीनों से वो भारत में रह रही हैं और ये उनके जीवन का सबसे अच्छा फैसला रहा।”

एस्ट्रिड ने बताया कि वे डेनमार्क के कोपेनहेगन शहर में रहती थीं। उन्होंने लिखा, “मुझे बदलाव की जरूरत थी। ऐसा लगा जैसे कोपेनहेगन में मेरे लिए कुछ नहीं बचा है। मुझे अपनी नौकरी, अपना घर, अपने दोस्त बहुत पसंद थे। लेकिन मैँ शहर से बहुत ऊब गई थी…”

उन्होंने बताया कि कोपेनहेगन में वो गर्मियों के मौसम का इंतजार करती थीं। लिखा, “यहाँ सिर्फ गर्मियों में ही मज़ा आता है! बाकी समय, हम सभी बस गर्मियों का इंतजार कर रहे होते हैं और यह एक ऐसी जगह लगती है जहाँ नींद नहीं आती।”

कोपेनहेगन में आम जिंदगी से तंग, बिना प्लान के भारत आईं

एस्ट्रिड ने अपनी रोजमर्रा की आम जिंदगी से तंग आकर कोपेनहेगन शहर छोड़ दिया था और भारत आने का निर्णय लिया। वो बिना किसी प्लान के भारत आ गईं। शुरुआत में उन्हें सब कुछ नया लगा था लेकिन धीरे-धीरे उन्हें यहाँ का माहौल, लोग और जगहें बहुत पसंद आने लगीं।

सोशल मीडिया पर किए गए उनके पोस्ट से पता चला कि वे ऋषिकेश, गोवा, मुंबई जैसे शहरों की यात्रा कर चुकी हैं। इस दौरान उन्होंने भारत को देखा और खुद को भी बेहतर जाना। उन्होंने कहा कि भारत में उन्हें ऐसा लगा जैसे वो खुद से जुड़ रही हैं। हर दिन कुछ नया सीख रही हैं और असली जिंदगी को महसूस कर रही हैं

एस्ट्रिड को भारत की संस्कृति, रंग-बिरंगी ज़िंदगी और लोगों का अपनापन बहुत अच्छा लगा। उन्होंने कहा कि भारत ने उन्हें सिखाया कि ज़िंदगी में हर चीज़ का एक कारण होता है और हर अनुभव कुछ न कुछ सिखाता है। यहाँ उन्हें खुद पर भरोसा करना आया और अपने अंदर के सपनों को पहचानने का मौका मिला।

पोस्ट में उन्होंने लिखा, “मैं भारत में एक और महीना रुकूँगी और फिर यूरोप में गर्मियों की छुट्टियों के लिए रवाना हो जाऊँगी। लेकिन अगले मानसून में भारत फिर से जरूर लौटूँगी।”

भारत की यात्रा पर जरूर आएँ

इंस्टाग्राम पर वीडियो के माध्यम से उन्होंने लोगों को भारत की यात्रा करने के लिए जागरूक किया है। उन्होंने लिखा, “अगर आप भारत की यात्रा करने के बारे में सोच रहे हैं तो ज़रूर जाएँ! मेरे लिए यह जीवन बदलने वाला अनुभव रहा है। यात्रा से जुड़े सवालों के जवाब देने में मुझे हमेशा खुशी होती है! बस मुझसे संपर्क करें।”

उन्होंने अपनी पहली बार भारत जाने वाले अनुभवों को भी साझा किया। उन्होंने लिखा,”अपनी पहली यात्रा पर जाने से पहले मैं वाकई डरी हुई थी क्योंकि बहुत से लोग आपको चेतावनी देते हैं कि एक महिला के तौर पर वहाँ न जाएँ। इस बारे में मेरी राय अलग है और मैं अपनी प्रोफाइल पर सुरक्षा संबंधी सुझाव साझा करती हूँ।”

यूजर ने कहा – भारत में रहना ‘ब्लेसिंग’

इंस्टाग्राम पर एस्ट्रिट की इस वीडियो को लोग खूब पसंद कर रहे हैं। वीडियो पर लोगों की अलग-अलग टिप्पणियाँ देखने को मिल रही हैं। एक यूजर ने लिखा, “अद्भुत, शुभकामनाएँ और कृपया भारत आते रहें।”

वहीं, अन्य यूजर ने लिखा, “भारत का उत्तर पूर्वी भाग बहुत ही सुन्दर और अनोखा है…पूरी तरह से भिन्न संस्कृति और परिदृश्य…मेघालय, सिक्किम आदि कुछ नाम हैं।”

एक यूजर लिखते हैं, “अरे, भारत में रहना निश्चित रूप से एक ब्लेसिंग है… यह काफी सुंदर है।”

सोलो ट्रैवलर हैं एस्ट्रिड

मूलरूप से डेनमार्क की रहने वाली एस्ट्रिड एस्मेराल्डा खुद को सोलो ट्रैवलर बताती हैं। इंस्टाग्राम पर उनके 5,154 फॉलोवर्स हैं। वे अधिकतर ट्रैवलिंग और योगा से संबंधित कॉन्टेंट शेयर करती हैँ। पिछले 10 महीने से भारत में रह रही हैं। इस्टाग्राम पोस्ट के अनुसार, वे भारत के कई हिस्सों का भ्रमण कर चुकी हैं। उन्होंने कई धार्मिक पोस्ट भी डाली हैं, जिसमें वे माथे पर टीका लगाए हुए हैं। भारत की संस्कृति से वो खास प्रभावित हैं।

सुनवाई के पहले ही दिन वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिमों की एंट्री रोकने का सुप्रीम कोर्ट ने दिया प्रस्ताव, केंद्र से पूछा- क्या हिंदू संस्थाओं में मुस्लिमों को देंगे प्रवेश?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन कानून को लेकर कट्टरपंथी मुस्लिम देश भर में हंगामा कर रहे हैं। वहीं, इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लगभग 73 याचिकाएँ दाखिल की गई हैं, जिस पर बुधवार (16 अप्रैल) को सुनवाई हुई। सुनवाई के पहले दिन सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कई प्रावधानों पर रोक लगा दिया है।

सुनवाई के पहले दिन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना की अधक्षता वाली जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। हालाँकि, कोर्ट ने कानून के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन बेहद कठोर टिप्पणी की है। इस मामले की अगली सुनवाई 17 अप्रैल को होगी।

सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने आगे कहा कि वह वक्फ संशोधन अधिनियम 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं में कुछ अंतरिम आदेश पारित करने का प्रस्ताव कर रहा है। इसमें पहला ये है कि कोर्ट द्वारा वक्फ के रूप में घोषित की गई संपत्तियों को वक्फ संपत्ति से हटाया नहीं जाना चाहिए, चाहे वे वक्फ-बाय-यूजर हों या विलेख द्वारा वक्फ हों। हालाँकि, आदेश अभी पारित नहीं किया है।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने आगे आदेश दिया कि संशोधन अधिनियम के उस प्रावधान, जिसके अनुसार वक्फ संपत्ति को वक्फ के रूप में नहीं माना जाएगा, जब तक कि कलेक्टर यह जाँच ना करे कि संपत्ति सरकारी भूमि है या नहीं, को प्रभावी नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद के सभी सदस्य मुस्लिम होने चाहिए, सिवाय पदेन सदस्यों के।

सीजेआई संजीव खन्ना ने कहा, “हमारा अंतरिम आदेश समानता को संतुलित करेगा। हम कहेंगे कि जो भी संपत्तियाँ कोर्ट द्वारा वक्फ घोषित की गई हैं, उन्हें गैर-वक्फ नहीं माना जाएगा, चाहे वह उपयोगकर्ता द्वारा वक्फ हो या नहीं। कलेक्टर कार्यवाही जारी रख सकते हैं, लेकिन प्रावधान लागू नहीं होंगे। बोर्ड और परिषद के संबंध में पदेन सदस्य नियुक्त किए जा सकते हैं, लेकिन अन्य सदस्य मुस्लिम होने चाहिए।”

इस मामले में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने की। वहीं, वक्फ संशोधन कानून के खिलाफ विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी, सीयू सिंह ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के पहले दिन दोनों पक्षों ने विभिन्न मौकों पर अपनी बातें रखीं।

बहस के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा, “हम उस प्रावधान को चुनौती देते हैं, जिसमें कहा गया है कि केवल मुस्लिम ही वक्फ बना सकते हैं। सरकार कैसे कह सकती है कि केवल वे लोग ही वक्फ बना सकते हैं, जो पिछले 5 सालों से इस्लाम को मान रहे हैं? राज्य कैसे तय कर सकता है कि मैं मुस्लिम हूँ या नहीं और इसलिए वक्फ बनाने के योग्य हूँ या नहीं?”

एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि वक्फ सैकड़ों साल पहले बनाया गया है। अब ये 300 साल पुरानी संपत्ति की वक्फ डीड माँगेंगे तो समस्या आएगी। इस पर जस्टिस विश्वनाथन ने कहा कि जो अल्लाह का है, वो वक्फ है। कानून में झूठे दावों से बचने के लिए वक्फ डीड का प्रावधान है। वहीं, CJI ने कहा कि वक्फ रजिस्ट्रेशन मददगार साबित होगा।

सिब्बल ने कहा कि इस कानून के जरिए मुस्लिमों की आस्था में दखलअंदाजी की गई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 26 अपने धर्म के अनुसार काम करने की इजाजत देता है। इस पर CJI संजीव खन्ना ने कहा, “हिंदुओं के मामले में भी सरकार ने कानून बनाया है। संसद ने मुस्लिमों के लिए भी कानून बनाया है। आर्टिकल 26 धर्मनिरपेक्ष है। यह सभी कम्युनिटी पर लागू होता है।”

सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि नए कानून के तहत वक्फ बोर्ड में हिंदू भी सदस्य होंगे। यह अधिकारों का हनन है। इस पर केंद्र की ओर से पेश SG तुषार मेहता ने कहा कि यह एक वैधानिक कमिटी की बात है, जो नजर रखेगी। इसमें मुस्लिम भी सदस्य हो सकते हैं और नहीं भी हो सकते हैं। इस जस्टिस कुमार ने उनसे पूछा कि क्या तिरुपति बोर्ड में भी गैर-हिंदू हैं।

हालाँकि, CJI ने कहा कि हिंदुओं के दान कानून के मुताबिक कोई भी बाहरी व्यक्ति बोर्ड का हिस्सा नहीं हो सकता है। यहाँ तक कि कपिल सिब्बल ने यह तक कह दिया कि राज्य ये बताने वाला कौन होता है कि मुस्लिमों का उत्तराधिकार कैसे होगा। इस सीजेआई ने कहा कि हिंदुओं के मामले में भी उत्तराधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम संसद द्वारा बनाया गया है।

केंद्र की ओर से पेश SG ने कहा कि यह यह कानून जेपीसी द्वारा लंबे विचार-विमर्श के बाद आया है। इस पर संयुक्त संसदीय समिति ने  38 बैठकें कीं, विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और 98 लाख से अधिक मिले सलाहों पर विस्तृत चर्चा की। इसके बाद यह कानून बना। वक्फ के पंजीकरण को लेकर सिब्बल द्वारा उठाए गए सवाल पर भी मेहता ने कहा कि पंजीकरण 1995 के अधिनियम में भी अनिवार्य है।

CJI ने केंद्र सरकार से पूछा कि इस कानून में वक्‍फ बाई यूजर क्‍यों हटाया गया? 14वीं, 15वीं सदी की अधिकांश मस्जिदों में बिक्री डीड नहीं होगा। अधिकांश मस्जिदें वक्‍फ बाई यूजर होंगी। इस पर SG तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें (मुस्लिमों को) उन्हें पंजीकृत करवाने से किसने रोका? सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर सरकार कहने लगी कि ये जमीनें सरकारी हैं तो क्या होगा? सरकार की ओर से तुषार मेहता ने कहा कि वक्‍फ बोर्ड में पहले सिर्फ शिया और सुन्‍नी थे। अब सभी संप्रदाय के लोगों को इसमें जगह दी गई है।

नई ऊँचाई पर अमेरिका-चीन का ट्रेड वार: ट्रंप ने चीनी माल पर टैरिफ 100% और बढ़ाया, अब देने होंगे 245%… भारत के साथ ‘डील’ पर बातचीत शुरू होने के आसार

अमेरिका ने चीन पर टैरिफ एक बार फिर बढ़ा दिया है। अब चीन को आयात पर 245 फीसदी टैरिफ देना होगा। पहले ये 145 फीसदी था लेकिन जब चीन ने अमेरिका पर पलटवार करते हुए 125 फीसदी टैरिफ लगाया तो अमेरिका ने एक बार फिर टैरिफ में बढ़ोतरी कर दी। मंगलवार (16 अप्रैल 2025) को वाइट हाउस ने इसकी जानकारी दी। अमेरिका के इस सख्त रवैया से चीन-अमेरिका के बीच टैरिफ वार होने की आशंका बढ़ गई है।

अमेरिका ने कहा, “चीन को अब अपने जवाबी कदमों के परिणामस्वरूप अमेरिका में आयात पर 245% तक टैरिफ का सामना करना पड़ रहा है।” व्हाइट हाउस ने इस कदम को ट्रम्प की चल रही ‘अमेरिका फर्स्ट ट्रेड पॉलिसी’ का हिस्सा बताया।

ट्रंप प्रशासन ने चीन पर गैलियम, जर्मेनियम और एंटीमनी जैसे हाईटेक सामग्री पर जानबूझकर प्रतिबंध लगाया है क्योंकि इसका इस्तेमाल सैन्य, एयरोस्पेस और सेमीकंडक्टर से जुड़े उद्योगों के लिए होता है। हाल ही में चीन ने 6 हेवी रेयर मेटल्स के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे विश्वस्तर पर इन धातुओं की उपलब्धता पर असर पड़ा।

वाइट हाउस के बयान में कहा गया है, “कुछ महीने पहले, चीन ने संयुक्त राज्य अमेरिका को गैलियम, जर्मेनियम, एंटीमनी जैसे दुर्लभ धातुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था, इससे पहले चीन ने दुनिया भर में ऑटोमेकर्स, एयरोस्पेस निर्माताओं, सेमीकंडक्टर कंपनियों और सैन्य सामग्री के लिए जरूरी घटकों की आपूर्ति को रोकने के लिए 6 भारी दुर्लभ धातुओं के निर्यात को रोक दिया।”

इसके बाद अमेरिका के टैरिफ बढ़ाने की घोषणा की और चीन-अमेरिका आमने-सामने आ गए। जानकारों के मुताबिक टैरिफ लगाने से पहले अमेरिका बात करना चाहता था लेकिन चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसके लिए तैयार नहीं हुए। दरअसल जिंगपिंग खुद को बातचीत के टेबुल पर लाकर चीन को कमजोर दिखाना नहीं चाहते थे। इसलिए अमेरिका ने टैरिफ की घोषणा की और चीन ने इसका जवाब जब टैरिफ बढ़ा कर दिया तो राष्ट्रपति ट्रंप ने सख्त रवैया अपनाते हुए टैरिफ को बढ़ा कर अब 245 फीसदी कर दिया।

इससे पहले अमेरिका ने भारत समेत 75 देशों पर टैरिफ बढ़ोतरी को 90 दिनों के लिए रोक दिया था। ये देश अब ट्रेड डील के लिए अमेरिका के संपर्क में हैं। भारत और अमेरिका के बीच भी ट्रेड डील पर बातचीत मई में शुरू हो सकता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने जापान के साथ अमेरिका की बातचीत शुरू होने की जानकारी देते हुए खुशी जाहिर की है।

व्हाइट हाउस ने कहा, “75 से ज़्यादा देश पहले ही नए व्यापार सौदों पर चर्चा करने के लिए संपर्क कर चुके हैं।” “नतीजतन, इन चर्चाओं के दौरान व्यक्तिगत रूप से हाई टैरिफ़ फिलहाल रोक दिए गए हैं, सिर्फ चीन को छोड़ कर जिसने जवाबी कार्रवाई की है।”

उत्तराखंड की जिस सुरंग में 17 दिन तक फँसे रहे 41 श्रमिक, वहाँ बना बाबा बौखनाग का भव्य मंदिर: CM धामी ने की पूजा-अर्चना, स्थानीय लोग मानते हैं रक्षक

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित सिलक्यारा टनल के पास बाबा बौखनाग के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम का आयोजन हुआ। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बुधवार (16 अप्रैल 2025) को बाबा बौखनाग के मंदिर में पहुँचे और प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शामिल हुए और बाबा बौखनाग की विधि-विधान से पूजा अर्चना की।

सिलक्यारा वही टनल है जहाँ नवंबर 2023 में बड़ा हादसा हुआ था, जिसमें 41 श्रमिकों की जान बचाने के लिए पूरी दुनिया की नजर इस रेस्क्यू ऑपरेशन पर टिक गई थी। उस समय सीएम धामी ने सुरंग के पास मंदिर निर्माण का संकल्प लिया था, जिसे अब पूरा कर लिया गया है। इस दौरान सीएम धामी ने टनल के निर्माण कार्य का भी रिव्यू किया।

सिलक्यारा टनल हादसे के बाद मंदिर बनाने का किया था वादा

दरअसल, साल 2023 की दीपावली की सुबह निर्माणाधीन सिलक्यारा सुरंग में मलबा आने के चलते 41 श्रमिक अंदर फँस गए थे। तब बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर उनको बाहर निकाला गया था। इस पूरे ऑपरेशन में ऑस्ट्रेलियाई रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स की मदद ली गई थी। इस दौरान सुरंग के पास बाबा बौखनाग का एक मंदिर भी स्थापित किया गया था। जहाँ श्रमिकों की सलामती के लिए पूजा-अर्चना की गई थी। श्रमिकों को 17 दिन चले राहत-बचाव ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाल लिया गया था।

प्रदेश के सीएम पुष्कर धामी उस समय भी घटनास्थल पर लगातार नजर बनाए हुए थे और उन्होंने इस स्थान पर स्थायी मंदिर निर्माण का वादा किया था। अब यह वादा पूरा हो गया है। टनल के पास बाबा बौखनाग मंदिर बनकर तैयार हो गया है। यह मंदिर सुरंग के एकदम नजदीक बनाया गया है ताकि भविष्य में आने-जाने वाले लोग बाबा बौखनाग के दर्शन भी कर सकें।

स्थानीय लोगों की रक्षा करते हैं ‘खेत्रपाल’ देवता

बाबा बौखनाग को यहाँ के स्थानीय लोग खेत्रपाल देवता मानते हैं। उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में खेत्रपाल का अर्थ होता है, ‘क्षेत्र की रक्षा करने वाला देवता’। गढ़वाली भाषा में ‘क्ष’ को ‘ख’ बोला जाता है इसलिए क्षेत्रपाल को खेत्रपाल कहा गया है। बाबा बौखनाग को वासुकि नाग का रूप मानते हैं। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहाँ आए थे और फिर सेम मुखेम की ओर गए थे। सेम मुखेम में भी नागराजा का प्रसिद्ध मंदिर है।

गढ़वाल क्षेत्र में मुख्य हिन्दू देवी-देवताओं के साथ-साथ स्थानीय देवी-देवताओं की भी मान्यता है। यहाँ वन देवता, खेत्रपाल और ग्राम देवता जैसे अनेक रूपों में पूजा की जाती है। कई बार यह पूजा किसी भव्य मंदिर में नहीं बल्कि किसी चिह्न या पत्थर के रूप में भी होती है। जिस स्थान पर यह हादसा हुआ था, वहाँ पहले कोई बड़ा मंदिर नहीं था। लेकिन अब वहाँ एक भव्य मंदिर बन चुका है जो आस्था और राहत-बचाव के इतिहास का प्रतीक बन गया है।

ऑस्ट्रेलिया के रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स भी पहुँचे थे मंदिर

जब इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था, उसी दौरान बाबा बौखनाग के दर्शन करने ऑस्ट्रेलिया के रेस्कयू विशेषज्ञ अर्नाल्ड डिक्स पहुँचे थे। दरअसल सिलक्यारा सुरंग के रेस्क्यू ऑपरेशन के एक साल पूरा होने पर 25 नवंबर 2024 में उसी स्थान पर मेले का आयोजन किया गया था। इसमें रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अर्नाल्ड डिक्स को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। इससे पहले भी उन्हें 2023 में हादसे में रेस्क्यू के समय पर बाबा बौखनाग के मंदिर में पूजा-अर्चना करते देखा गया था। डिक्स ने रेस्क्यू ऑपरेशन खत्म होने के बाद मंदिर में बाबा बौखनाग को जाकर आभार व्यक्त किया था।

सुरंग बनने से गंगोत्री और यमुनोत्री की दूरी कम होगी

बता दें कि सिलक्यारा सुरंग अब भी निर्माणाधीन है। लगभग 853 करोड़ की लागत से बनाई जा रही टनल की लंबाई 4.531 किलोमीटर है। टनल को दो लेन और दो दिशा में बनाया जा रहा है। ये सुरंग चारधाम यात्रा के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। सुरंग बनने से गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के बीच की दूरी 26 किलोमीटर तक कम हो जाएगी, जिससे यात्रियों को बेहतर सुविधा मिलेगी और समय की बचत भी होगी।

वक्फ पर पाकिस्तान ने किया प्रलाप तो भारत ने लताड़ा, अपना घर देखने की दी सलाह: कहा- यह हमारा आंतरिक मामला

हाल ही में भारत में पारित हुए वक्फ संशोधन अधिनियम को लेकर पाकिस्तान की आलोचनात्मक टिप्पणियों पर भारत ने कड़ा विरोध जताया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पाकिस्तान के बयानों को ‘प्रेरित’ और ‘निराधार’ बताते हुए उन्हें दृढ़ता से खारिज किया है। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का कोई अधिकार नहीं है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार (15 अप्रैल, 2025) को कहा, “हम भारत की संसद द्वारा पारित वक्फ संशोधन अधिनियम पर पाकिस्तान द्वारा की गई टिप्पणियों को पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं। पाकिस्तान को दूसरों को उपदेश देने से पहले अपने ही देश में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार पर आत्ममंथन करना चाहिए।”

पाकिस्तान ने क्या कहा था?

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने वक्फ कानून को ‘भेदभावपूर्ण’ बताते हुए दावा किया था कि यह अधिनियम भारत में मुस्लिमों के मजहबी और आर्थिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शफकत अली खान ने कहा कि यह कानून भारतीय मुस्लिमों को मस्जिदों, दरगाहों और अन्य धार्मिक स्थलों से वंचित कर सकता है। उन्होंने इसे भारत में बढ़ते ‘बहुसंख्यकवाद’ का प्रतीक बताया था।

वक्फ कानून, संसद से सुप्रीम कोर्ट तक

भारत का नया वक्फ संशोधन अधिनियम संसद के दोनों सदनों में व्यापक बहस के बाद पारित हुआ था। लोकसभा ने 3 अप्रैल को और राज्यसभा ने 4 अप्रैल को इसे मंजूरी दी थी। लोकसभा में विधेयक के पक्ष में 288, जबकि विपक्ष में 232 वोट पड़े। वहीं राज्यसभा में 128 सदस्यों ने समर्थन किया जबकि 95 ने विरोध किया।

यह कानून 8 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की मंजूरी के बाद कानून बन गया था। इस कानून के विरोध में कई याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर बुधवार (16 अप्रैल, 2025) को सुनवाई की है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय की संपत्तियों और धार्मिक स्थलों पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश है, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। वहीं सरकार ने इसे पहले से वक्फ में होती आई अनियमितताओं को खत्म करने के लिए जरूरी बताया है।

उर्दू चलेगी, पर हिंदी नहीं… सुप्रीम कोर्ट वाले मी लॉर्ड हम क्या कहें आप खुद बुधियार हैं, फिर भारत की भाषाओं को स्वीकार करने में परेशानी क्या

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (15 अप्रैल 2025) को महाराष्ट्र में एक नगरपालिका के साइनबोर्ड में उर्दू के इस्तेमाल को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। उर्दू को गंगा-जमुनी या हिंदुस्तानी तहजीब का सबसे अच्छा नमूना बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा एक संस्कृति है और इसे लोगों को विभाजित करने का कारण नहीं बनना चाहिए। वहीं, शीर्ष न्यायालय ने अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बताया है।

महाराष्ट्र के मामले में दरअसल बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अकोला जिले के पातुर स्थित नगर परिषद की नई इमारत के साइनबोर्ड पर उर्दू के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुधांशु धूलिया और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने खारिज कर दिया।

बेंच ने कहा कि किसी अतिरिक्त भाषा का प्रदर्शन महाराष्ट्र स्थानीय प्राधिकरण (राजभाषा) अधिनियम 2022 का उल्लंघन नहीं है। इस अधिनियम में उर्दू के उपयोग पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि साइनबोर्ड पर उर्दू के प्रयोग का उद्देश्य सिर्फ ‘प्रभावी संचार’ है। इसलिए भाषा की विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति धूलिया ने अपने आदेश में कहा, ” नगर परिषद का काम क्षेत्र के स्थानीय समुदाय को सेवाएँ प्रदान करना और उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को पूरा करना है। अगर नगर परिषद के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में रहने वाले लोग या लोगों का समूह उर्दू से परिचित हैं तो कम से कम नगर परिषद के साइनबोर्ड पर आधिकारिक भाषा यानी मराठी के अलावा उर्दू का इस्तेमाल करने पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।”

न्यायाधीश धूलिया ने कहा, ठभाषा विचारों के आदान-प्रदान का एक माध्यम है, जो अलग-अलग विचारों और मान्यताओं वाले लोगों को करीब लाती है। यह उनके बीच विभाजन का कारण नहीं बननी चाहिए।आइए हम उर्दू और हर भाषा से दोस्ती करें। उर्दू भारत के लिए विदेशी नहीं है। इसका जन्म भारत में हुआ और यहीं इसका विकास हुआ है।”

कोर्ट ने कहा, “उर्दू के खिलाफ पूर्वाग्रह इस गलत धारणा से उपजा है कि उर्दू भारत के लिए विदेशी है। यह राय गलत है, क्योंकि मराठी और हिंदी की तरह उर्दू भी एक इंडो-आर्यन भाषा है। यह एक ऐसी भाषा है, जिसका जन्म इसी देश में हुआ है। उर्दू भारत में अलग-अलग सांस्कृतिक परिवेश से जुड़े लोगों की ज़रूरत के कारण विकसित और फली-फूली।”

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि देश के आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा उर्दू भाषा के शब्दों से भरी पड़ी है, भले ही किसी को इसकी जानकारी न हो। कोर्ट ने कहा, “हिंदी में रोज़मर्रा की बातचीत उर्दू के शब्दों या उर्दू से निकले शब्दों का इस्तेमाल किए बिना नहीं हो सकती। ‘हिंदी’ शब्द खुद फ़ारसी शब्द ‘हिंदवी’ से आया है!”

कोर्ट ने कहा कि शब्दावली का आदान-प्रदान दोनों तरफ़ होता है, क्योंकि उर्दू में संस्कृत समेत कई अन्य भारतीय भाषाओं से भी कई शब्द उधार लिए गए हैं। कोर्ट ने कहा, “भाषा धर्म नहीं है। भाषा धर्म का प्रतिनिधित्व भी नहीं करती। भाषा किसी समुदाय, क्षेत्र, लोगों की होती है किसी धर्म की नहीं। भाषा संस्कृति है। भाषा किसी समुदाय और उसके लोगों की सभ्यता की यात्रा को मापने का पैमाना है।”

शीर्ष न्यायालय ने आगे कहा, “उर्दू का मामला भी ऐसा ही है, जो गंगा-जमुनी तहजीब या हिंदुस्तानी तहजीब का बेहतरीन नमूना है। उत्तरी और मध्य भारत के मैदानी इलाकों की मिश्रित सांस्कृतिक प्रकृति है। हालाँकि, भाषा सीखने का साधन बनने से पहले, इसका सबसे पहला और प्राथमिक उद्देश्य हमेशा संचार ही रहेगा।”

न्यायालय ने कहा, “जब हम उर्दू की आलोचना करते हैं तो हम एक तरह से हिंदी की भी आलोचना कर रहे होते हैं, क्योंकि भाषाविदों और साहित्यिक विद्वानों के अनुसार उर्दू और हिंदी दो भाषाएँ नहीं, बल्कि एक ही भाषा हैं। हिंदी और उर्दू के बीच दोनों तरफ़ से कट्टरपंथियों द्वारा एक बाधा उत्पन्न हुई और हिंदी ज़्यादा संस्कृतनिष्ठ और उर्दू ज़्यादा फ़ारसी बन गई।”

कोर्ट ने आगे कहा कि औपनिवेशिक शक्तियों ने धर्म के आधार पर दोनों भाषाओं को विभाजित करके इस विभाजन का फ़ायदा उठाया। अब हिंदी को हिंदुओं की भाषा और उर्दू को मुस्लिमों की भाषा समझा जाने लगा। कोर्ट ने कहा कि वास्तविकता में विविधता में एकता और सार्वभौमिक भाईचारे की अवधारणा से अलग करने का यह प्रयास है।

अदालत ने यह भी बताया कि उर्दू किस तरह से अदालती कार्यवाही में भी प्रयोग होता है। इसको लेकर उच्चतम न्यायालय ने कहा, “उर्दू शब्दों का न्यायालय की भाषा पर बहुत प्रभाव है, चाहे वह फौजदारी हो या दीवानी कानून। अदालत से लेकर हलफ़नामा और पेशी तक, भारतीय न्यायालयों की भाषा में उर्दू का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।”

अदालती कार्यवाही में अंग्रेजी के इस्तेमाल को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की। उसने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों की आधिकारिक भाषा अंग्रेज़ी है, लेकिन आज भी इस न्यायालय में कई उर्दू शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें वकालतनामा, दस्ती आदि शामिल हैं।

अदालती कार्यवाही की भाषा अंग्रेजी: सुप्रीम कोर्ट

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कह दिया कि अदालती कार्यवाही की भाषा हिंदी नहीं, बल्कि अंग्रेजी है। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2024 में कही थी। इसके पहले मार्च 2023 में तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की अदालती कार्यवाही में क्षेत्रीय भाषाओं के इस्तेमाल करने पर सहमति नहीं दी थी।

दरअसल, पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिकाकर्ता द्वारा हिंदी में दलील पेश करने पर आपत्ति जताई थी। शीर्ष न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया था कि अदालत की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आदेश के खिलाफ दायर एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई कर रही थी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस रॉय ने कहा, “यह अदालत अपनी कार्यवाही अंग्रेजी में करती है। आपने व्यक्तिगत रूप से पेश किया, और हमने आपको अपनी बात पूरी तरह से कहने के लिए बाधित नहीं किया। दो जज मौजूद हैं। आप यह सुनिश्चित किए बिना हिंदी में दलीलें पेश नहीं कर सकते कि अदालत आपकी बात को समझती है।” इसके बाद, याचिकाकर्ता ने अंग्रेजी में अपनी दलीलें पेश की।

यह पहली बार नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट में भाषा को लेकर रोक लगाई। साल 2022 में एक याचिकाकर्ता ने हिंदी में दलीलें पेश करने का प्रयास किया तो जस्टिस केएम जोसेफ और हृषिकेश रॉय ने उन्हें याद दिलाया था कि सुप्रीम कोर्ट की भाषा अंग्रेजी है। उस मामले में याचिकाकर्ता को उचित भाषा में अपनी दलीलें पेश करने में सहायता करने के लिए एक वकील नियुक्त किया गया था।

मार्च 2023 में तत्कालीन केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक की सरकारों के उन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया, जिनमें इन राज्यों के हाई कोर्ट की कार्यवाही में तमिल, गुजराती, हिंदी, बंगाली और कन्नड़ के इस्तेमाल की अनुमति देने की बात कही गई है।

दरअसल, रिजिजू ने यह बात लोकसभा में विल्लुपुरम के सांसद डी रविकुमार के प्रश्न के लिखित उत्तर में दिया था। उन्होंने कहा था, “इन प्रस्तावों पर भारत के मुख्य न्यायाधीश की सलाह माँगी गई थी और यह बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्ण न्यायालय ने उचित विचार-विमर्श के बाद फैसले को अस्वीकार कर दिया।”

रिजिजू ने बताया था कि केंद्र सरकार आदेशों और अन्य कानूनी सामग्री का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद करके कानूनी मामलों को आम नागरिकों के समझने योग्य बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि कानून और न्याय मंत्रालय के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में ‘भारतीय भाषा समिति’ का गठन किया है।

कोर्ट की भाषा को लेकर क्या कहता है संविधान

भारत के संविधान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कार्यवाही की भाषा का जिक्र है। संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत, संसद द्वारा कोई दूसरा प्रावधान किए जाने तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सभी कार्यवाही अंग्रेजी में होगी। यह प्रावधान हाई कोर्ट की कार्यवाही में हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग की अनुमति देता है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति की आवश्यकता होती है।

अनुच्छेद 348 के अनुसार, कानूनों और निर्णयों के आधिकारिक पाठ भी अंग्रेजी में होने चाहिए। हालाँकि, पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्यायिक शिक्षा और कार्यवाही को क्षेत्रीय भाषाओं में आयोजित करने की वकालत की थी, ताकि न्याय प्रणाली को और अधिक सुलभ बनाया जा सके। उन्होंने वकीलों के लिए अपनी पसंदीदा भाषाओं में मामले पेश करने की संभावना पर जोर दिया था।

सेवानिवृत्ति के बाद पूर्व CJI ने चंद्रचूड़ ने आगे सुझाव दिया था कि स्थानीय भाषाएँ देश में न्याय वितरण को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालाँकि, जिस समय सरकार द्वारा हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में अदालती कार्यवाही के लिए सुप्रीम कोर्ट से राय माँगी गई थी, उस समय भारत के मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ही थे।

भाषा जोड़ने वाली है तो सुप्रीम कोर्ट अंग्रेजी क्यों नहीं छोड़ना चाहता?

महाराष्ट्र में उर्दू के साइनबोर्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने तमाम टिप्पणी की है, जिसमें भाषा को जोड़ने वाला बताया गया है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भाषा प्रभावी संचार का एक माध्यम है। ऐसे में स्थानीय राज्यों के हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी भाषा का इस्तेमाल आम आदमी को न्यायिक व्यवस्था से और अधिक जोड़ेगा।

माना जाता है कि भारत की कुल जनसंख्या का सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत लोग अंग्रेजी समझते हैं। ये संख्या भी शहरी क्षेत्रों की है। ग्रामीण इलाकों में स्थानीय भाषा, जैसे कि तमिल, बंगाली, कन्नड़, मराठी आदि ही अधिक समझी जाती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट प्रभावी संचार को महत्वपूर्ण मानता तो सरकार द्वारा साल 2022 में हाई कोर्ट में स्थानीय भाषा में कार्रवाई पर रोक नहीं लगाता।

कानून में साफ कहा गया है कि जब तक संसद कोई विकल्प नहीं देती, तभी तक अंग्रेजी अदालती कार्यवाही का माध्यम है। ऐसे में उर्दू को भारत में जन्मा और पनपा बताकर उसकी उसे जोड़ने वाली भाषा बताया जा रहा है, जबकि अंग्रेजी तो विदेशी भाषा है, जिसे अधिकांश लोग समझते भी नहीं, फिर सर्वोच्च न्यायालय इसे अदालतों में कार्यवाही का माध्यम क्यों बनाए रखना चाहता है, यह प्रमुख सवाल है।

दरअसल, भारत में एक भ्रम है कि जो लोग अंग्रेजी बोलते हैं वे अपने आपको एलीट वर्ग का समझते हैं। उन्होंने लगता है कि वे आम भारतीयों से बहुत ऊपर हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अंग्रेजी के प्रति दीवानगी भी इस भ्रम को और स्थापित करने की कोशिश करेगा। इस देश में हर भारतीय को न्यायिक व्यवस्था को अपनी भाषा में जानने और समझने का हक है। इसलिए इस पर सुप्रीम कोर्ट को फिर से विचार करना चाहिए।

मुंडन, गंगाजल से स्नान… अनवर शेख बने राधेश्याम, घर वापसी के बाद बोले- इस्लाम में महिलाओं का सम्मान नहीं, सनातन में देवियों की भी होती है पूजा

हिन्दू धर्म के वैभव से प्रभावित होकर अनवर शेख ने इस्लाम छोड़कर सनातन धर्म अपनाया। मध्यप्रदेश के खंडवा के रहने वाले शेख अनवर अब राधेश्याम बन गए हैं। इस दौरान उनका मुंडन हुआ और गंगाजल से स्नान कराया गया। इसके बाद पूरे विधि विधान से सनातन धर्म में शामिल कर राधेश्याम नाम दिया गया।

मंदिर पर हुए अनुष्ठान के दौरान भगवान शिव के जयकारे हुए। इस मौके पर लोगों ने राधेश्याम को बधाई दी। राधेश्याम ने हिन्दू धर्म की अच्छाईयों की चर्चा की।

राधेश्याम का कहना है कि हिन्दू धर्म में वैभव और परंपराएं हैं। सभी लोगों को समान भाव से देखा जाता है। सनातन धर्म में धार्मिक स्थलों और अनुष्ठान सभी के लिए एक जैसे हैं। राधेश्याम का कहना है कि बचपन से ही उसके मन में सनातन धर्म की परंपरा का असर पड़ने लगा था।

महिलाओं के प्रति हिन्दू धर्म में जितनी श्रद्धा है, देवी के रूप में महिलाओं की पूजा की जाती है। महिलाओं के प्रति जितनी श्रद्धा है वो दूसरे किसी धर्म में नहीं है। यहां तक कि धरती और नदियों को भी माँ का दर्जा दिया जाता है। राधेश्याम का पेड़-पौधों से भी गहरा लगाव है।

अनवर शेख यानी राधेश्याम ने लक्ष्मी नाम की हिन्दू लड़की से शादी किया। पत्नी का हिन्दू धर्म के प्रति लगाव ने भी अनवर को राधेश्याम बनने के लिए आकर्षित किया। हालाँकि 23 साल तक उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया था। इस बीच सनातन को समझा।

राधेश्याम का कहना है कि खंडवा के महादेवगढ़ में इससे पहले 5 अन्य लोग भी हिन्दू धर्म में शामिल हो चुके हैं। फिरोज राहुल बन गया था जबकि इमरान का नाम ईश्वर पड़ा। आदिल को आदित्य नाम दिया गया जबकि मुस्तफा को मारुति नंदन के नाम से अब जाना जाता है। इनलोगों ने जीवन की नई शुरुआत की। इस्लाम छोड़कर सनातन की शरण में आए इनलोगों के दिनचर्या में भी काफी परिवर्तन आ गया।