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‘असली’ हार्वर्ड प्रोफेसर श्रीकांत दातार को मोदी सरकार ने दिया पद्मश्री, अभी हैं बिजनेस स्कूल के डीन

हार्वर्ड बिजनेस स्कूल (Harvard Business School) के 11वें डीन के तौर पर 1 जनवरी 2021 को नियुक्त होने वाले श्रीकांत दातार आज उन 119 लोगों की सूची में शामिल हैं जिन्हें 2021 के पद्म अवार्ड्स से सम्मानित किया गया। मोदी सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान में उनके अलावा दो अन्य भारतीय अमेरिकियों को भी यह पुरस्कार दिया।

‘फाइबर ऑप्टिक्स के जनक’ के रूप में जाने जाने वाले नरिंदर सिंह कपानी को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने का ऐलान हुआ। वहीं अमेरिका के भारतीय मूल के नागरिक रतन लाल ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में मृदा विज्ञान के प्रोफेसर हैं, जिन्हें इस साल पद्म श्री से सम्मानित किया गया है।

दातार की उपलब्धियों पर यदि बात करें तो उन्होंने विश्वविद्यालय में वरिष्ठ एसोसिएट डीन के तौर पर काम करने के अलावा, अनुंधान, एक्जिक्यूटिव एज्यूकेशन, फैकल्टी डेवलपमेंट और हार्वर्ड प्रोफाइल में फैकल्टी भर्ती के लिए के लिए काम किया है।

उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक किया है और IIM, अहमदाबाद और इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद स्वर्ण पदक भी प्राप्त किया है। वह एक चार्टर्ड एकाउंटेंट भी हैं और स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय से दो मास्टर्स डिग्री और पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं।

बता दें कि दातार से पहले हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का नाम एनडीटीवी की पूर्व कर्मचारी निधि राजदान के कारण चर्चा में आया था। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें यूनिवर्सिटी ने पत्रकारिता पढ़ाने के लिए नियुक्त कर लिया है। बाद में पता चला कि वह तो फिशिंग अटैक का शिकार हुई थीं और वह ऑफर असली नहीं था।

राजदान के बारे में मालूम हो कि वह न्यूज़ एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (PTI) के पूर्व एडिटर-इन-चीफ़, महाराज कृष्ण राज़दान की बेटी हैं और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। साथ ही भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की है।

तेज रफ्तार ट्रैक्टर से मरा ‘किसान’, राजदीप ने कहा- पुलिस की गोली से हुई मौत, फिर ट्वीट किया डिलीट

गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों का प्रदर्शन उग्र होता जा रहा है। इस बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

दरअसल, राजदीप सरदेसाई ने तिरंगे में लिपटी मृतक की लाश की तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर करते हुए लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। राजदीप ने ट्विटर पर लिखा, “पुलिस फायरिंग में आईटीओ पर 45 साल के नवनीत की मौत हो गई है। किसानों ने मुझे बताया कि उसका ‘बलिदान’ व्यर्थ नहीं जाएगा।”

लेकिन हकीकत ये है कि आज ट्रैक्टर रैली और उपद्रव के दौरान जिस व्यक्ति की मौत हुई, वह पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि ट्रैक्टर पलटने से मारा गया। दरअसल, ड्राइवर ने काफी तेज रफ्तार से चल रहे ट्रैक्टर को अचानक से मोड़ दिया, जिसकी वजह से संतुलन बिगड़ गया और ट्रैक्टर पलट गया। इस दौरान किसान की मौत हो गई। सोशल मीडिया पर लोग ‘ट्विटर’ से सवाल कर रहे हैं कि क्या फेक न्यूज़ फ़ैलाने और राजधानी में दंगे भड़काने का प्रयास कर रहे राजदीप सरदेसाई का अकाउंट प्रतिबंधित किया जाएगा या नहीं?

सत्ता विरोधी षड्यंत्रों पर गिद्ध की तरह नजर रखने वाले राजदीप सरदेसाई ने आदतन इसे अपने प्रोपेगेंडा के लिए इस्तेमाल किया और इस व्यक्ति की मौत का आरोप पुलिस के सर थोप दिया। लेकिन इस खबर की वास्तविकता सामने आते ही राजदीप सरदेसाई ने बिना माफ़ी माँगे अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया।

वहीं, राजदीप सरदेसाई की पत्नी और पत्रकार सागरिका घोष मंगलवार सुबह से ही प्रदर्शन कर रहे किसानों को भड़काने का काम कर रही हैं। गणतंत्र दिवस (रिपब्लिक डे) की सुबह ही आन्दोलन कर रहे किसानों की तारीफ करे हुए सागरिका ने एक ट्वीट किया और लिखा कि आखिरकार ‘रिपब्लिक’ में ‘पब्लिक’ वापस लौट चुकी है।

महज एक दिन पहले ही राजदीप सरदेसाई और उनकी बीवी समेत तमाम निष्पक्ष और लिबरल पत्रकारों ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की एक तस्वीर को लेकर जमकर फजीहत कमाई और फेक न्यूज़ फैलाई।

उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली पुलिस की ओर से किसानों को कुछ जगहों पर ट्रैक्टर रैली निकालने की इजाजत दी गई थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर हजारों की संख्या में प्रदर्शन कर रहे किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ दिल्ली में धावा बोल दिया।

प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड्स को तोड़ा और आईटीओ, लाल किले पर उत्पात मचाया। दिल्ली के आईटीओ पर किसानों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष भी हुआ है। किसानों ने दिल्ली में घुसने के लिए कुछ बैरिकेड्स तोड़ दिए थे।

केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान अपनी ट्रैक्टर परेड लेकर नई दिल्ली के लाल किले तक घुस चुके हैं और उन्होंने लाल किले पर अपना झंडा भी फहरा दिया है। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की कोशिश भी कीं।

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। वहीं, एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

रिपब्लिक डे पर ये कौन से किसानों की तस्वीरें शेयर कर रही कॉन्ग्रेस? फिर हिंसा पर उतारू वो कौन हैं जो पुलिस को मार रहे?

कॉन्ग्रेस की राजनीति अब सिर्फ़ विरोध पर टिकी है। पार्टी का सरोकार न नैतिकता से रहा है और न ही जनता के हित से। साल पहले भी स्थितियाँ यही दिखा रही थीं। आज भी यही कह रही हैं। एक ओर गणतंत्र दिवस जैसे पावन अवसर पर जहाँ पूरी दिल्ली का माहौल खराब कर उपद्रवी राजधानी में घुस आए हैं। कोने-कोने में हल्ला काट रहे हैं। पुलिस पर तलवार भाँज रहे हैं। उस समय कॉन्ग्रेस ने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया है कि गणतंत्र की शक्ति को हल्के में मत लो।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि किसानों के उपद्रव की तस्वीरें सिर्फ़ ऑपइंडिया ने नहीं देखी हैं। इन्हें पूरा देश देख रहा है। हर मीडिया चैनल इसे अलग-अलग एंगल से कवर कर रहा है। बावजूद इसके कॉन्ग्रेस एक बढ़िया क्वालिटी से कैप्चर की गई ट्रैक्ट्रर की तस्वीर शेयर करके ये दर्शा रही है कि किसान सैंकड़ों ट्रैकट्रों के साथ किस तरह पंक्तिबद्ध होकर हाथ में झंडा लेकर मार्च निकाल रहे हैं।

इस हरकत को यदि घटिया राजनीति का उत्तम उदाहरण न समझा जाए तो फिर क्या समझा जाए! ऐसे वक्त में ऐसा पोस्ट करने के दो ही मतलब हैं कि या तो कॉन्ग्रेस मानती ही नहीं है कि वह कल तक जिस किसान आंदोलन के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होने के दावे कर रही थी, वो अब दिल्ली की सार्वजनिक संपत्तियों को तबाह कर रहे है। पुलिस की जान लेने पर आमादा हैं। या फिर ये उनके प्रोटोकॉल में नहीं है कि वो निम्न क्वालिटी वाली उन तस्वीरों को अपने सोशल मीडिया हैंडल से शेयर करें जिसमें साफ दिख रहा है कि कैसे लाठी, डंडो सहित हिंसा को अंजाम दिया जा रहा है।

जो तस्वीरें आज दिल्ली के कई कोनों से देखने को मिल रही हैं। उसका थोड़ा साभार कॉन्ग्रेस के हिस्से में भी जाना चाहिए। जिस तरह पिछले दिनों उन्होंने इस आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया। उसी का नतीजा है कि राजधानी में एक बार फिर पुलिस न्याय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है।

अब गौर दीजिए, एक ओर कॉन्ग्रेस का आधिकारिक अकॉउंट है जिसमें इस उपद्रव की निंदा करने तक की हिम्मत नहीं है। दूसरी ओर इसी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी हैं जो इस मुद्दे पर ‘बस सब बोल रहे हैं इसलिए बोलना है’ की तर्ज पर ट्वीट करते हैं। मगर यह नहीं लिख पाते कि प्रदर्शन के नाम पर हो रही हिंसा किस हद तक देश की छवि को मलिन कर रही है और इससे स्पष्ट तौर पर क्या पता चल रहा है।

बैलेंस छवि बनाए रखने के लिए राहुल गाँधी लिखते हैं, “हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है। चोट किसी को भी लगे, नुक़सान हमारे देश का ही होगा।” यहाँ तक आपको लगेगा कि राहुल बाबा सही तो कह रहे हैं आखिर नुकसान देश का ही होगा। लेकिन ट्वीट के आखिर में पढ़िए। जहाँ राहुल ने आज के दिन की सभी घटनाओं को दरकिनार करते हुए सरकार से ये कहना नहीं भूले कि देशहित के लिए कृषि विरोधी कानून वापस लो।

मंथन करिए इस बात पर कि राहुल गाँधी कौन से देश हित बात कर रहे हैं और अपने ट्वीट में वह हिंसा के लिए किसे जिम्मेदार मान रहे हैं? आज पूरा देश सवाल कर रहा है कि दिल्ली में अराजकता पैदा करने वाले ये अन्नदाता कैसे हो सकते हैं? मगर, कॉन्ग्रेस अब भी अपने प्रोपगेंडे को चलाने में ही प्रतिबद्ध है। उन्हें दिल्ली में तमाम क्षतिग्रस्त सार्वजनिक संपत्तियाँ नहीं दिख रहीं। लाल किला पर हुआ प्रदर्शनकारियों का कब्जा नहीं दिख रहा। पुलिसकर्मियों को घेरने वालों की मंशा नहीं दिख रही।

और ये सब क्यों? क्योंकि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए आज अस्तित्व बचाने का मतलब यही है कि भाजपा के विरोध में उठी हर आवाज का समर्थन करें। चाहे तो वो आवाज कभी कट्टरपंथियों के रूप में जामिया हिंसा और दिल्ली दंगों को अंजाम दे जाएँ। चाहे तो किसान प्रदर्शन के नाम पर खालिस्तानियों की छाप छोड़ जाएँ।

लौंडा नाच को जीवनदान देने वाले रामचंद्र मांझी, डायन प्रथा के खिलाफ लड़ रही छुटनी देवी: दोनों को पद्मश्री सम्मान

गणतंत्र दिवस के अवसर पर 7 हस्तियों को पद्म विभूषण, 10 को पद्म भूषण और 102 को पद्मश्री पुरस्कार देने का ऐलान हुआ है। कुल 119 नामों की इस सूची में कई ऐसे नाम हैं, जिनके संघर्ष की कहानी लंबी है। इन्हीं में दो नाम रामचंद्र मांझी और छुटनी देवी के हैं। 

दोनों को सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। इनमें से एक ने लौंडा नाच के नाम पर समाज में एक गायब होती परंपरा को जीवनदान दिया है और दूसरी ने डायन जैसी कुरीति की भुक्तभोगी होने के बाद उसके ख़िलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है। 

आइए आज जब मोदी सरकार ने 26 जनवरी के इस अवसर पर इन्हें सम्मान से नवाजने के लिए कदम बढ़ाया है, तो इन दोनों के संघर्षों के बारे में बात करें और समझें कि कैसे एक सामान्य नागरिक से सम्मानित नागरिक का सफर इन्होंने तय किया।

94 साल में लौंडा नाच करने वाले रामचंद्र मांझी

भोजपुरी के मशहूर लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के साथ काम करने वाले रामचंद्र मांझी स्वयं एक समय के बेहद चर्चित कलाकार हैं। वह 94 साल की उम्र में भी मंच पर जमकर थिरकते हैं। ऐसे में जब उन्हें पता चला कि सरकार ने उनके काम के लिए उन्हें पद्मश्री देने का ऐलान किया है, तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। लोग उनके आवास पर उन्हें बधाई देने जाने लगे।

उन्होंने पद्मश्री मिलने की बात जानकर सरकार का आभार व्यक्त किया। वहीं लौंडा नाच के बारे में बताया कि भिखारी ठाकुर द्वारा चर्चित लोक नृत्य आज हाशिए पर खड़ा है। गिनी-चुनी मंडलियाँ ही बची हैं, जो इस विधा को जिंदा रखे हुए हैं, लेकिन उनका भी हाल खस्ता ही है। नाच मंडली में अब बहुत कम ही कलाकार बचे हैं। जबकि बिहार में आज भी लोग इसे पसंद करते हैं।

बता दें कि इससे पूर्व मांझी को संगीत नाटक अकादमी अवार्ड 2017 से भी नवाजा जा चुका है।  राष्ट्रपति ने उन्हें प्रशस्ति पत्र के साथ एक लाख रुपए की पुरस्कार राशि भी प्रदान की थी। वह बताते हैं कि मात्र 10 वर्ष की उम्र में ही वह भिखारी ठाकुर के दल में शामिल हुए थे। 1971 तक उन्होंने ठाकुर के नेतृत्व में काम किया और उनके मरणोपरांत गौरीशंकर ठाकुर, शत्रुघ्न ठाकुर, दिनकर ठाकुर, रामदास राही और प्रभुनाथ ठाकुर के नेतृत्व में काम किया।

डायन कह छुटनी देवी को गाँव ने खिलाया था मल, आज सैंकड़ों महिलाओं की उम्मीद

झारखंड की छुटनी देवी को जब इस सम्मान के मिलने की बात पता चली, तब उन्हें यही नहीं पता था कि आखिर ‘पद्मश्री’ क्या होता है। उन्हें जब प्रधानमंत्री कार्यालय से बार-बार फोन आया तो उन्हें पता चला कि ये कोई बड़ी चीज जरूर है, तभी फोन आ रहा है।

उन्होंने कहा कि उन्हें एक दिन दोपहर के 11 बजे फोन आया और बताया गया कि उन्हें पद्मश्री मिलने वाला है। उन्हें कुछ समझ नहीं आया, बस उन्होंने यह कह कर फोन काट दिया कि उनके पास टाइम नहीं है, एक घंटे बाद फोन करें। इसके बाद दोबारा 12:15 फोन आया। फोन करने वाले ने उन्हें समझाया कि उनका नाम, फोटो, सभी अखबार टीवी में आएगा। वह कहती हैं कि उनके गाँव वालों को जबसे यह पता चला है, तब से उनके गाँव के सभी लोग खुश हैं।

झारखंड के सरायकेला खरसावाँ जिले के भोलाडीह गाँव निवासी छुटनी महतो आज 62 साल की हैं। एक समय था कि घर वालों ने डायन के नाम पर न सिर्फ उन्हें प्रताडि़त किया, बल्कि घर से बेदखल भी कर दिया था। 8 महीने के बच्चे के साथ पेड़ के नीचे रहने वाली छुटनी के लिए वो समय इतना कठिन था कि न पति ने उनका साथ दिया और न घरवालों ने।

इसी के बाद वह अपने जैसी कई महिलाओं की ताकत बनीं। आज वह एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेयरनेस (आशा) के सौजन्य से संचालित पुनर्वास केंद्र चलाती है, जहाँ वह बतौर आशा की निदेशक (सरायकेला इकाई) कार्यरत हैं।

वह बताती हैं कि साल 1995 में एक तांत्रिक के कहने पर उन्हें उनके गाँव ने डायन मानकर वहाँ से निकाल दिया था। उनकी गलती बस ये थी कि उन्होंने अपनी भाभी के गर्भवती होने पर कहा था कि बेटा होगा, जबकि हुई बेटी। इसके बाद ही उन्हें डायन करार देकर मल खिलाने की कोशिश हुई और उन्हें पेड़ से बाँध कर अर्धनग्न करके उनकी पिटाई की गई।

एक दिन जब लोग उनकी हत्या की योजना बनाने लगे तो वह पति को छोड़ कर चारों बच्चों के साथ गाँव छोड़ कर भाग गईं। इसके बाद आठ महीने वह जंगल में रहीं। जब आरोपितों के खिलाफ वह केस करने गईं, तो पुलिस ने भी उनकी मदद नहीं की।

अपनी दुर्गति के बाद वह अपने जैसी महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए खुद खड़ी हुईं। उन्होंने अपनी जैसी पीड़ित 70 महिलाओं का एक संगठन बनाया। आज ये संगठन इतना सशक्त है कि उन्हें जैसे ही सूचना मिलती है, उनकी टीम मौके पर पहुँच जाती है।

आरोपितों और अंधविश्वास फैलाने वाले तांत्रिकों पर प्राथमिकी दर्ज कराती हैं और पीड़िता को अपने साथ ले आती हैं। कानूनी कार्रवाई के बाद सशर्त घर वापसी कराती हैं। अब तक कुल 100 से अधिक महिलाओं की घर वापसी हो चुकी है। उनका संगठन आरोपितों के खिलाफ कोर्ट में भी लड़ाई लड़ता है। 

‘किसान’ रैली में 1 की मौत: तेज रफ़्तार ट्रैक्टर के पलटने से हुआ हादसा

किसानों के हिंसक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली के डीडीयू मार्ग पर एक ट्रैक्टर के पलट जाने से एक ‘किसान’ की मौत हो गई है। दरअसल, ड्राइवर ने काफी तेज रफ्तार से चल रही ट्रैक्टर को अचानक से मोड़ दिया। जिसकी वजह से संतुलन बिगड़ गया और ट्रैक्टर पलट गया। इस दौरान किसान की मौत हो गई।

उल्लेखनीय है कि सीमावर्ती इलाकों में पुलिस बैरिकेड तोड़ने और प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली के कई हिस्सों में पुलिस के साथ भिड़ंत के बाद किसानों के विरोध प्रदर्शन ने एक हिंसक रूप ले लिया है। दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में मंगलवार (जनवरी 26, 2021) को हिंसा हुई है।

दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर उत्पात

बता दें कि गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टर रैली निकालने की बात कही थी। लेकिन मंगलवार सुबह से ही दिल्ली की अलग-अलग सीमाओं पर उत्पात की स्थिति देखने को मिली है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर, आईटीओ समेत अन्य कई इलाकों में पुलिस और प्रदर्शनकारियों में भिड़ंत हुई है। प्रदर्शनकारियों की ओर से दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में तोड़फोड़ भी की गई है। इतना ही नहीं मंगलवार को प्रदर्शनकारियों ने लालकिले पर लाल-पीला झंडा भी फहरा दिया है। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की कोशिश भी कीं।

दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर परेड जारी है, लेकिन हिंसक प्रदर्शनों के साथ। मिली जानकारी के मुताबिक, ट्रैक्टर परेड के दौरान आइटीओ समेत दिल्ली में कई जगहों पर किसान अराजक हो चुके हैं। गाड़ियों में तोड़फोड़ के साथ पुलिसकर्मियों को भी पीटने की खबरें आ रही हैं।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली में घुसे किसान प्रदर्शनकारियों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय राजधानी का माहौल बिगाड़ दिया है। भारी भीड़ के साथ ट्रैक्टर लेकर घुसे ये कथित किसान प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली में जगह-जगह तोड़-फोड़, हल्ला-हंगामा और अराजकता फैला रहे हैं। आईटीओ के पास इन्होंने एक डीटीसी बस को क्षतिग्रस्त किया है।

इसके अलावा सिंघु बॉर्डर पर ढाई महीने से जमे किसानों ने संजय गाँधी ट्रांसपोर्ट नगर में हंगामा किया, जिसके बाद उन्हें नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इस दौरान प्रदर्शनकारी पुलिस के एक वज्र वाहन पर चढ़ गए और वहाँ जम कर तोड़-फोड़ मचाई।

एक पुलिसकर्मी के साथ कुछ किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली स्थित आईटीओ में मारपीट और हाथापाई का वीडियो सामने आया है। हाथ में डंडे लिए इन किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मी को सड़क पर घेर लिया गया और उनका कॉलर पकड़कर उनके साथ लाठी-डंडों से मारपीट और हाथापाई करने लगे। तभी उन्हीं प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों ने आकर बीच-बचाव कर पुलिसकर्मी को सुरक्षित खींचकर निकाला।

महिला पुलिस कॉन्स्टेबल को जबरन घेर कर कोने में ले गए ‘अन्नदाता’, किया दुर्व्यवहार: एक अन्य जवान हुआ बेहोश

दिल्ली में गणतंत्र दिवस के दिन ट्रैक्टर रैली के नाम पर पहुँचे किसान प्रदर्शनकारियों ने अब मर्यादा की सभी हदें लाँघनी भी शुरू कर दी है। एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है, जिसमें देखा कि सड़क पर प्रदर्शनकारियों ने एक महिला पुलिस को घेर कर पकड़ लिया और उसे एक कोने में लेकर चले गए। महिला पुलिस को किसान प्रदर्शनकारी चारों ओर से घेरे हुए थे। कोने में ले जाकर महिला कॉन्स्टेबल के साथ दुर्व्यवहार किया गया।

दिल्ली पुलिस के जवानों को किसानों की इस अराजकता के कारण उन्हें नियंत्रित करने में खासी परेशानी हो रही है। दिलशाद गार्डन में ड्यूटी के दौरान ही एक पुलिस का जवाब बेहोश होकर गिर पड़ा, जिसके बाद बाकी पुलिसकर्मियों ने उसे वहाँ फर्स्ट एड दिया। होश में आने के बाद उक्त पुलिस के जवान को अस्पताल ले जाया गया। वहीं ITO सेंटर में तो बसों को भी नुकसान पहुँचाया गया। किसान तोड़फोड़ कर आगे बढ़ते चले गए।

वहीं लाल किला पर किसान प्रदर्शनकारियों की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है। वहाँ झंडे के साथ अब तक हजारों प्रदर्शनकारी जुट चुके हैं। दिल्ली पुलिस बार-बार अपील कर रही है कि किसान शांति-व्यवस्था बनाए रखते हुए प्रदर्शन करें। पुलिस ने लाठीचार्ज और आँसू गैस का भी सहारा लिया है। लाल किला और ITO मेट्रो स्टेशनों की एंट्री-एग्जिट गेट्स भी बंद कर दिए गए हैं। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी तत्व उन्हें लगातार भड़का रहे हैं।

ये भी ध्यान देने वाली बात है कि दो सप्ताह पहले प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ)’ ने ऐलान किया था कि जो भी दिल्ली के लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराएगा, उसे 2.5 लाख डॉलर (1.83 करोड़ रुपए) इनाम के रूप में दिए जाएँगे। अब किसानों की ट्रैक्टर रैली लाल किला पर पहुँच गई है।

रस्सी से लाल किला का गेट तोड़ा, जहाँ से देश के PM देते हैं भाषण, वहाँ से लहरा रहे पीला-काला झंडा

केंद्र के तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान अपनी ट्रैक्टर परेड लेकर नई दिल्ली के लाल किले तक घुस चुके हैं और उन्होंने लाल किले पर लाल-पीला झंडा भी फहरा दिया है। प्रदर्शनकारी किसानों ने लाल किले के फाटक पर रस्सियाँ बाँधकर इसे गिराने की कोशिश भी कीं।

मंगलवार (जनवरी 26, 2021) दोपहर लाल किले पर पहुँचे किसानों को एक गुंबद के शीर्ष पर एक झंडा लगाते हुए देखा गया। वहीं, एक अन्य प्रदर्शनकारी ने उस जगह पर अपना झंडा लगा दिया, जहाँ पर प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर तिरंगा फहराते आए हैं।

किसानों की ट्रैक्टर परेड ने आखिरकार अब हिंसक मोड़ ले लिया है। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस बैरिकेड्स को तोड़ दिया, जिसके कारण किसानों पर आँसू गैस छोड़ी गई। एक पुलिसकर्मी के साथ कुछ किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा दिल्ली स्थित आईटीओ में मारपीट और हाथापाई का वीडियो सामने आया है। हाथ में डंडे लिए इन प्रदर्शनकारियों द्वारा पुलिसकर्मी को सड़क पर घेर लिया गया और उनके साथ हाथापाई की गई। तभी उन्हीं प्रदर्शनकारियों में से कुछ लोगों ने आकर बीच-बचाव कर पुलिसकर्मी को सुरक्षित खींच निकाला।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा शेयर किए गए इस वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिसकर्मी की वर्दी खींचकर उसे कुछ लोगों ने घेर लिया और उनके साथ झड़प की। तभी पीछे से कुछ और लोग भी वहाँ पर इकट्ठे हो गए, जिनके हाथों में लाठी-डंडे भी थे और वो पुलिसकर्मी के साथ हाथापाई करने लगे।

देखते ही देखते सड़क पर भीड़ जमा हो गई और कुछ और लोगों ने आकर बीच बचाव किया। बताया जा रहा है कि पुलिसकर्मी को बचाने वाले ये लोग भी उन्हीं प्रदर्शनकारियों के ही साथ थे, जो आज गणतंत्र दिवस के मौके पर दिल्ली में नए कृषि कानूनों के विरोध में रैली निकाल रहे हैं।

आज गणतंत्र दिवस के मौके पर ऐसे कई वीडियो सामने आ चुके हैं, जिनमें देखा जा सकता है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा बैरिकेड तोड़ दिए गए, पुलिसकर्मियों पर हमला किया गया और सेन्ट्रल दिल्ली में आईटीओ में पुलिस वाहन में तोड़फोड़ की गई।

मीलॉर्ड! आज खुश तो बहुत होंगे आप: ऑपइंडिया एडिटर के चंद सवाल

शायद अब सुप्रीम कोर्ट को लगेगा कि औरों के भी संवैधानिक अधिकार हैं, लिब्रांडू मीडिया गिरोह इसे सफल आंदोलन करार देगा, जबकि पुलिस पर तलवारों से हमले हुए हैं!

पूरा वीडियो यहाँ देखें

उपद्रवी ‘अन्नदाता’ को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस जान-जोखिम में डालकर बैठी सड़क पर: जगह-जगह हो रहे भयंकर तोड़-फोड़

कृषि कानून के नाम पर विरोध करने निकले कथित किसान प्रदर्शनकारी दिल्ली की सड़कों पर मनमानी कर रहे हैं। स्थिति ये है कि सुरक्षा व्यवस्था का पूरा प्लान पहले से तैयार होने के बावजूद दिल्ली पुलिस को अराजकता रोकने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। कई जगह किसानों का हुड़दंग रोकने के लिए पुलिसकर्मी सड़क पर बैठ गए हैं। 

ताजा तस्वीरें नांगलोई से सामने आई हैं। समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, ट्रैक्टर परेड करने वाले किसानों के क्षेत्र में पहुँचने के बाद पुलिस अधिकारी नांग्लोई क्षेत्र को ब्लॉक करने के लिए सड़क पर बैठ गए हैं।

बता दें कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली में घुसे किसान प्रदर्शनकारियों ने गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रीय राजधानी का माहौल बिगाड़ दिया है। भारी भीड़ के साथ ट्रैक्टर लेकर घुसे ये कथित किसान प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली में जगह-जगह तोड़-फोड़, हल्ला-हंगामा और अराजकता फैला रहे हैं। आईटीओ के पास इन्होंने एक डीटीसी बस को क्षतिग्रस्त किया है।

इसके अलावा सिंघु बॉर्डर पर ढाई महीने से जमे किसानों ने संजय गाँधी ट्रांसपोर्ट नगर में हंगामा किया, जिसके बाद उन्हें नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इस दौरान प्रदर्शनकारी पुलिस के एक वज्र वाहन पर चढ़ गए और वहाँ जम कर तोड़-फोड़ मचाई।

इसी प्रकार पुलिस के वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। साथ ही पुलिस के साथ प्रदर्शनकारी किसानों ने जम कर हाथापाई भी की। इस दौरान पुलिस को हिंसा पर उतारू किसानों को रोकने के लिए हल्का बल प्रयोग भी करना पड़ा। मुबारक चौक पर भी किसान प्रदर्शनकारी पुलिस की गाड़ी पर चढ़ गए और बैरिकेडिंग को तोड़ डाला। गाजीपुर सीमा पर भी किसान हिंसक हो गए और उन्होंने तोड़फोड़ मचाई, जिसके बाद पुलिस को उन्हें खदेड़ना पड़ा। 

दिल्ली की सड़कों पर किए जा रहे उपद्रव को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस जहाँ जान को जोखिम में डालकर सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है। वहीं वामपंथी गिरोह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पुलिस को नेगेटिव दिखाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा। दर्शाया जा रहा है कि पुलिस किसानों पर आंसू गैस के गोले छोड़ रही है, उन पर लाठी भाँज रही है, जबकि हकीकत यह है कि अभी तक न जाने कितने पुलिसकर्मी इस संघर्ष में घायल हो गए हैं। उन पर तलवार से हमले हो रहे हैं। लाठी लेकर उन्हें दौड़ाया जा रहा है।

लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराने पर SFJ देगा ₹1.83 करोड़, पहुँच गई ‘किसानों’ की ट्रैक्टर रैली

दिल्ली में जगह-जगह जारी ‘किसानों’ का विरोध प्रदर्शन अब हिंसा और अराजकता में बदल गया है। लाल किला तक किसानों की ट्रैक्टर रैली का जत्था पहुँच चुका है और वहाँ पर उन्हें नियंत्रित करने में पुलिस को खासी परेशानी हो रही है। लाल किला पुरानी दिल्ली का एक महत्वपूर्ण स्थल है और वहाँ प्रदर्शनकारियों के पहुँचने से कानून-व्यवस्था के लिए संकट पैदा हो गया है। ये गाजीपुर सीमा से निकले किसान हैं, जिन्होंने दो पुलिस बैरिकेड्स भी तोड़ डाले हैं।

ये भी ध्यान देने वाली बात है कि दो सप्ताह पहले प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ)’ ने ऐलान किया था कि जो भी दिल्ली के लाल किला पर खालिस्तानी झंडा फहराएगा, उसे 2.5 लाख डॉलर (1.83 करोड़ रुपए) इनाम के रूप में दिए जाएँगे। अब किसानों की ट्रैक्टर रैली लाल किला पर पहुँच गई है। उधर ITO तक भी किसानों की ट्रैक्टर रैली पहुँच गई है। उन्होंने अचानक से रूट बदल दिए हैं।

किसानों की पूरी कोशिश है कि वो लुटियंस दिल्ली में पहुँच कर अराजकता फैलाएँ। नंगलोई में तो दिल्ली पुलिस के जवानों को सड़क पर बैठना पड़ा, ताकि वो किसी तरह प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोक सकें। गाजीपुर में बैरिकेड्स तोड़ कर किसानों ने जश्न भी मनाया। दिल्ली मेट्रो के अधिकतर स्टेशनों को बंद कर दिया गया है। एंट्री-एग्जिट गेट्स बंद कर दिए गए हैं। हर ट्रैक्टर पर 10 लोग हैं और कइयों के साथ ही ट्रेलर भी लगे हुए हैं।

दिल्ली में ही प्रदर्शन के दौरान एक अन्य जगह में किसान तलवार लेकर पिल पड़े और पुलिसकर्मियों को खदेड़ने लगे। पुलिस उन्हें पीछे हटने के लिए कहती रही और किसान तलवार भाँजते हुए आगे बढ़ते रहे। इस दौरान वो धमकियाँ भी दे रहे थे।