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कानपुर लव जिहाद SIT रिपोर्ट: आखिर वामपंथियों को 14 साल की बच्चियों का समुदाय विशेष वालों द्वारा गैंगरेप क्यों नॉर्मल लगता है?

14 साल की चार, 16 साल की तीन बच्चियाँ कैसी दिखती हैं? हमने अपनी बहनों को देखा है, दोस्तों की बेटियों को देखा है, कितनी मासूम, अनजान और सामाजिकता से परे होती हैं ये बच्चियाँ। ये छः बच्चियाँ कानपुर SIT की उस रिपोर्ट का हिस्सा हैं जो 2019-20 के कुछ मामलों को आधार बना कर उसमें ‘लव जिहाद’ का पैटर्न खोजने के लक्ष्य से जारी की गई हैं।

इससे पहले की इसकी गंभीरता और वामपंथी मीडिया पोर्टलों द्वारा इसी रिपोर्ट को गलत तरीके से रिपोर्ट करने की बात पर बात हो, कुछ बातें स्पष्ट करना आवश्यक है। इस अन्वेषण के लिए कानपुर इलाके के मात्र 14 मामले ही लिए गए थे, वो भी सिर्फ 2019-20 से जो कि मीडिया में चर्चित हुए थे। तात्पर्य यह है कि इसमें कानपुर जैसे वृहद इलाके का हर मामला नहीं लिया गया था। अतः, इसे वैसे चश्मे से कोई दिखाना चाह रहा है, तो वो विशुद्ध धोखाधड़ी है।

दूसरी बात, ‘लव जिहाद’ को बार-बार समझना आवश्यक है क्योंकि कुछ लम्पट वामपंथी पोर्टल और बकैत एंकर (पढ़ें रवीश कुमार व अन्य) इसे ‘अंतरधार्मिक विवाह‘ का मसला और ‘प्रेम पर सरकार का पहरा’ मान कर स्थापित करने में सत्तू-पानी बाँध कर बैठ गए हैं।

‘लव जिहाद’ की प्रचलित या स्वीकार्य परिभाषा में निम्नलिखित में से एक या कई बिंदुओं का सत्य पाया जाना आता है:

  • प्रेम की शुरुआत में ही लड़के की पहचान का छुपाना, स्वयं को हिन्दू धर्म का बताना
  • दूसरे धर्म की लड़की को बहलाना, फुसलाना, बिना सहमति के निकाहनामे पर हस्ताक्षर लेना
  • कथित लड़की का जबरन मतपरिवर्तन करवाना, या ऐसा करने के लिए दवाब बनाना
  • निकाह/शादी के बाद उसे सिर्फ शारीरिक उपभोग की वस्तु मान कर अपने परिवार के मर्दों, दोस्तों के साथ जबरन सोने का मजबूर करना
  • लड़की को सबक सिखाने के लिए उसका बलात्कार, सामूहिक बलात्कार
  • लड़की को बदनाम करने के लिए प्रेम के ढोंग के बाद उसकी तस्वीरें, वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेलिंग
  • लड़के की धोखाधड़ी का हिस्सा न बनने पर, इस्लाम न अपनाने पर बलात्कार, हत्या
  • ऐसा कोई भी कुकृत्य जहाँ मकसद लड़की का धर्मांतरण हो, न कि प्रेम या शादी

तीसरी बात, यह है कि इस SIT को गठित करने का कारण ही ‘लव जिहाद’ जैसे अपराध को पहचानना था, न कि सिर्फ इसमें किसी के द्वारा फंडिंग हो रही है या नहीं। वामपंथी पोर्टलों ने इस बिंदु पर भी खूब हल्ला किया है कि SIT को फंडिंग के सबूत नहीं मिले। चौदह मामलों में फंडिंग का सबूत न मिलना, इसके (लव जिहाद के) संगठित अपराध न होने की पुष्टि नहीं करता, बल्कि सिर्फ इन मामलों में ऐसा न होने की बात कहता है।

अब बात करते हैं कि इन चौदह मामलों में क्या वाकई आठ मामलों में लड़कियों की सहमति थी, जैसा कि ‘द वायर‘ और NDTV आदि ने रिपोर्ट किया? जबकि उत्तर प्रदेश की पुलिस ने सामने आ कर कहा कि 14 में से 11 मामलों में ऐसे सबूत मिले हैं, जिनमें धोखाधड़ी, नाबालिग को भगाना, नाबालिग से रेप, नाबालिग से गैंगरेप, ब्लैकमेलिंग, नाम बदल कर दोस्ती का ढोंग, दूसरी पहचान से आधार कार्ड बनवाने, जबरन धर्मांतरण की बात, जबरन धर्मांतरण का दवाब से ले कर सहमति के बगैर जबरन संबंध बनाने जैसी बातें हैं।

इन ‘वायर‘ वालों का शायद फ्यूज उड़ गया होगा क्योंकि हमारे पास जो रिपोर्ट है उसमें तो बाकायदा टेबल बना कर ऐसे 11 मामलों में 13 लड़कियों के साथ जो-जो अपराध हुए, उनकी धाराएँ और केस की प्रगति का ब्यौरा दिया हुआ है जिसे ‘द वायर’ या NDTV के मंदबुद्धि पत्रकार भी उसे समझ सकें। इन दोनों संस्थाओं ने यहाँ तक लिख दिया कि आठ मामले में सहमति थी, और छः मामले में जाँच जारी है।

इनकी बात मान भी लें, तो भी ‘शारीरिक संबंध’ की सहमति हो और जबरन इस्लाम कबूल कराने की बात हो, तो क्या उसे अपराध नहीं मानेंगे क्योंकि लड़की ने सहमति से संबंध बनाए थे? सहमति प्रेम की हो सकती है, लेकिन क्या ‘द वायर’ यह मान कर चलता है कि लड़की ने लड़के से बातचीत की, और यह स्वीकारा कि वो उसके साथ सहमति से भागी थी, तो कालांतर में उसके साथ उस लड़के के दोस्त बलात्कार करेंगे तो उसे अपराध न माना जाए?

‘द वायर’ का तर्क बिलकुल ऐसा ही है क्योंकि हमने हर मामले को विस्तार से पढ़ा और पाया है कि भले ही कुछ मामलों में लड़कियों ने यह बयान दिया है कि वो अपनी सहमति से लड़के के साथ गई थीं, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह भारतीय दंड विधान की धाराओं में अपराध की ही श्रेणी में आता है। ऐसे मामले हैं जहाँ लड़की को पता भी नहीं है कि उससे जिस कागज पर वकील ने हस्ताक्षर कराया वो ‘निकाहनामा’ था।

ये वामपंथी इतने गिरे हुए और ज़लील हैं कि इन्हें ऐसे सात मामले नहीं दिखे जिसमें 14 और 16 साल की बच्चियों के बयान हैं कि उनके साथ या तो रेप हुआ या ब्लैकमेलिंग या जबरन धर्मपरिवर्तन का दवाब? इन बच्चियों में से कई बच्चियाँ दलित हैं। इनके साथ भागने वाले सारे लड़के बालिग हैं, और इनका रेप और गैंगरेप करने वाले भी। क्या घर के सामने रहने वाले लड़के को पता नहीं होगा कि लड़की की उम्र क्या है और नाबालिग को भगाना स्वतः एक अपराध है?

इतनी नीचता किस पत्रकार में होगी कि वो इन छः बच्चियों की हालत पर विचार करना तो दूर, उनके अस्तित्व को ही नकार रहा/रही है? ‘द वायर’ या NDTV अगर वाकई इस रिपोर्ट को पढ़ कर समझने की कोशिश न भी करते, तो भी एक कॉलम में ‘बालिग/नाबालिग’ लिखा होना उनकी रिपोर्ट के लिए काफी होना चाहिए था कि यहाँ मजहब विशेष के लड़के क्या कर रहे हैं।

किसी भी वामपंथी संस्था ने इस तथ्य को देखा ही नहीं कि न सिर्फ 14 मामलों में से 11 मामलों में 13 लड़कियों ने (दो मामलों में दो-दो लड़कियाँ पीड़िता हैं) स्वयं को पीड़िता बताया है, और इन सारे लड़कों पर एक से ज्यादा अपराधों की धाराएँ चल रही हैं। पता नहीं किस रिपोर्ट से ‘आठ मामलों में सहमति’ की बात ले आए। साथ ही, यह बात जानना भी आवश्यक है ‘छः मामले में जाँच जारी है’ कहने से वो छः मामले गायब नहीं हो जाते। वो आने वाले समय में सही भी साबित हो सकते हैं।

यह लिख देना कि योगी की SIT तो योगी के उन दावों को सही नहीं ठहरा पाया कि ‘लव जिहाद’ के मामले बढ़ रहे हैं, अलग स्तर की धूर्तता है। क्या इस SIT का उद्देश्य यह जाँचना था कि ‘लव जिहाद’ के मामले बढ़ रहे हैं या नहीं? जी नहीं। इस जाँच का एक उद्देश्य यह था कि कानपुर के एक ही इलाके से, जूही कॉलोनी, लगातार ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं, क्या इसमें कुछ सच्चाई है?

इसी रिपोर्ट के आखिरी पन्ने पर स्पष्ट तौर पर लिखा हुआ है कि ‘कई मामलों में अपना नाम बदल कर दूसरे समुदाय की लड़कियों से मित्रता कर, उनसे निकाहनामा किया गया’, ‘निकाहनामा में नाम परिवर्तन के अलावा और कोई विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, न ही किसी के द्वारा स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह किया गया है।’

साथ ही, आर्थिक सहयोग की बात को नकारते हुए स्पष्ट शब्दों में यह लिखा गया है कि ‘उक्त प्रकरण हिन्दू-मुस्लिम जैसे दो अलग-अलग समुदाय से संबंधित है जिसमें कानून एवम् शांति व्यवस्था बनाए रखने हेतु पर्याप्त सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।’

या तो इन कथित पत्रकारों को हिन्दी समझ में नहीं आती या ये लोग धूर्त और बेईमान हैं जो पहले तय करते हैं कि उन्हें क्या रिपोर्ट बनानी है, भले ही वास्तविकता कुछ और ही हो। एक तरफ तो यही गिरोह यह भी कहता है कि ‘लव जिहाद’ की कानूनी परिभाषा ही नहीं है, और दूसरी तरफ ये यह भी कह रहे हैं कि योगी का दावा खारिज हो गया कि ‘लव जिहाद’ के मामलों में वृद्धि हुई है। जब परिभाषा है ही नहीं, और दो साल के मात्र 14 चर्चित, मीडिया द्वारा ज्यादा रिपोर्ट की घटनाओं की ही जाँच हुई है, तो फिर यह किस हिसाब से साबित हो गया कि ‘लव जिहाद’ के मामले घट रहे हैं, या बढ़ रहे हैं?

चूँकि भाजपा-शासित राज्य कानून बना रहे हैं, इसलिए इनकी सुलगी हुई है

मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने ‘लव जिहाद’ पर न सिर्फ चर्चा शुरु की है, बल्कि योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट ने तो अध्यादेश भी पारित कर दिया है। जो नेता कल तक इस शब्द पर बात टाल देते थे, वो अब मुखर होकर मान रहे हैं और जन समर्थन जुटा रहे हैं कि हिन्दू बच्चियों को गलत मंशा वाले मजहबी लड़कों से बचाना उनका उद्देश्य है।

यह राजनीतिक बदलाव समाज के लिए नई धारा सदृश है जो कि देर से आई, पर आई तो है। इस मसले को देखने का दृष्टिकोण बदलना आवश्यक था क्योंकि अभी तक ऐसे मुद्दे लगातार उपेक्षित हो रहे थे, और इन्हें मौन सहमति मिली हुई थी। पिछले कुछ सालों से जब इस मुद्दे पर चर्चा होने लगी, तभी से वामपंथी गिरोह इसका उपहास वैसे ही करता था जैसे इस्लामी आतंक लिखने पर करता है।

2014 के आम चुनावों में इस मुद्दे को छुआ भर गया था और सोशल मीडिया के त्वरित प्रादुर्भाव ने ऐसे मामलों को आम जनता के सामने लाना शुरु किया। जब कानपुर में एक घटना रिपोर्ट होती तो पटना वाला कहता कि ऐसा तो उसकी गली में भी हुआ है, भोपाल वाला भी सहमति देता और लोकल मीडिया का लिंक भी। तब लोगों के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान ने वृहद् जनचेतना पर दस्तक दी और लोगों में इसकी स्वीकार्यता बढ़ी।

यह वही दौर था (2014-18) जब गैरवामपंथी मीडिया या तो शैशवावस्था में थी, या उन्हें लोगों ने पढ़ना शुरु ही किया था, अतः ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग स्थानीय अखबारों के भीतरी पन्नों में तीन इंच के कॉलम में, बिना ऐसी शब्दावली के हुआ करती थी। इस दौर के बाद इस घटना को प्रमुखता से डिजिटली रिपोर्ट किया जाने लगा, हेडलाइन में मोहसिनों, शाहरुखों, सलमानों, अब्दुलों के नाम के साथ कुकृत्यों को लिखा जाने लगा।

इसके बाद बाकी लोगों को लगा कि रिपोर्टिंग ऐसे भी होती है। अगर हमने ऐसा नहीं किया होता और इन पापियों के नाम छापने न शुरु किए होते तो ये अपराधी, जो हिन्दू बच्चियों के साथ तमाम दुष्कर्म करते रहते हैं, राहुल (बदला हुआ नाम) और आरोपित का समुदाय स्पष्ट रूप से लिखने की जगह ‘समुदाय विशेष से ताल्लुक रखते हैं’ लिख कर टाइम पास करते रहते।

अब समय यह है कि आम जनता अपने-अपने जन-प्रतिनिधियों पर लगातार दवाब बनाए और इन कानूनों के बनने की सिर्फ चर्चा न हो बल्कि वो कानून बनें और ऐसे राक्षसों को कड़ी से कड़ी सजा के प्रावधान हों।

वामपंथी गिरोह जैसे कि जानते हैं कि आतंकवाद का मजहब है, और इस्लामी आतंक से पूरा विश्व परेशान है, फिर भी ‘कोई मजहब नहीं होता है की डुगडुगी बजाते रहते हैं, वैसे ही वो जानते हैं कि मजहब विशेष के लड़के संगठित तरीके से ‘लव जिहाद’ को ले कर सक्रिय हैं, इसलिए ही वो अचानक से इस कानून की आहट सुन कर ही तत्पर हो उठे हैं। वो यह जानते हैं कि भाजपा को जनसमर्थन भी है, और आम बोल-चाल के विषयों में ‘लव जिहाद’ जगह पा चुका है।

ग्रूमिंग जिहाद अपने पैर पसार रहा है

अगर बेगूसराय के किसी गाँव में पचास साल का कोई व्यक्ति इस बात को देख कर आश्चर्यचकित होता है कि बगल के गाँव के लड़के शाम में, कान में फोन चिपकाए, हिन्दू गाँव में क्यों टहलते हैं, तो उन्हें यह परिभाषा मदद करती है इस अपराध को समझने में। वो यह पूछते हैं कि साप्ताहिक हाट पर मजहब विशेष के लड़के सब्जी खरीदते नहीं, तो वो आते क्यों हैं? वो यह पूछते हैं कि दुर्गा पूजा के मेले में मूर्तिपूजकों को अपना जन्मजात दुश्मन समझने वाले लौंडे लुंगी में टहलते हुए क्यों आते हैं?

ऐसा नहीं है कि उन्हें यह वास्तविकता पता नहीं कि आज के दौर में उनके गाँव में वो लड़के क्या करने आते हैं। वो जानते हैं कि उन्हीं के गाँव की लड़कियाँ ही उन्हें उधर आमंत्रित करती हैं। वो इस बात को ले कर भी चिंतित होते हैं कि उनके माँ-बाप क्यों नहीं इन बातों का संज्ञान लेते हैं कि उनके घरों कि नाबालिग लड़कियाँ फोन पर किन्हें बुला रही हैं, और क्यों एक मजहब विशेष का लड़का उनके घर के आस-पास मँडराता है।

ये प्रेम नहीं है, ये ‘ग्रूमिंग जिहाद‘ है जिसके दायरे के भीतर ‘लव जिहाद’ आता है। आपकी नाबालिग या बालिग लड़कियों को ये लड़के ब्रेनवॉश करते हैं, और वो कुछ ही दिनों में सर ढकने से ले कर खजूर खाने पर आ जाती है। आपको पता भी नहीं होता और आपकी बेटी व्रत की जगह दिन में एक बार खा कर रोजे रखने लगती है। कहने के लिए ये संवैधानिक मूल अधिकार, वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आता है, लेकिन इन अधिकारों का पटाक्षेप कई बार एक सूटकेस में बंद मुड़ी-तुड़ी लाश, या फिर नहर में बहते मानव मांस के टुकड़ों को रूप में भी होता है। इसकी परिणति अपने ससुर और देवर, पति के दोस्तों द्वारा बलात्कार किए जाने के रूप में भी होती है।

तब उसे याद नहीं आता कि उसने जो पिता के द्वारा दर्ज करवाई गई प्राथमिकी के विरोध में वीडियो बना कर कहा था कि ‘मैं सरताज के साथ अपनी इच्छा से रह रही हूँ और मेरे पिता ने हम पर झूठा केस किया है’ कितना बड़ा झूठ था। ‘ग्रूमिंग’ का मतलब है तैयार करना। इंग्लैंड में पिछले 50 सालों में हिन्दू, सिक्ख और वहीं की गोरी लड़कियों के बलात्कार के हजारों मामले सामने आए, लेकिन वहाँ की पुलिस स्वयं को नस्लभेदी कहलाने से बचने के चक्कर में इसे नकारती रही।

ये सारे मामले इसी तरह की ब्रेनवॉशिंग और खास कर नाबालिग बच्चियों के पाकिस्तानी मूल के समुदाय विशेष वालों द्वारा रेप या शारीरिक शोषण से जुड़े थे। इन सब में एक पैटर्न है और उसे स्वीकारना ही समय की माँग है वरना यह एक महामारी बन कर समाज के ताने-बाने को तोड़ देगा।

‘लव जिहाद’ पर सख्त कानून समय की माँग

अगर इस अपराध को वामपंथियों के चश्में से देखता रहा जाए, तो हम कभी भी इसे समझ भी नहीं पाएँगे। रवीश कुमार जैसों का कहना है कि जब धोखाधड़ी का कानून है ही तो नए कानून की क्या जरूरत है। कानून तो बलात्कार के लिए भी है, फिर निर्भया एक्ट की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या पॉकेटमारी और हजारों करोड़ के घोटाले को एक ही कानून से निपटाया जाना चाहिए?

जब एक अपराध में, कई अपराधों की छाप दिखने लगे, तो उसे वर्गीकृत करना अत्यावश्यक हो जाता है। अपराध विज्ञान को जानने वाले यह बात कहते हैं कि अपराधी की मंशा अपराध को सही आयाम देती है। जब कोई फतेह खान अपना नाम आर्यन मल्होत्रा बता कर एक चौदह साल की लड़की को भगाता है, रेप करता है, तो उसकी मंशा प्रेम की तो बिलकुल नहीं होती। इसलिए उसे नई कैटेगरी में डालना ही उचित है।

वामपंथी चाहे लाख बिलबिलाएँ, हमें पॉलिटिकली करेक्ट होना बंद करना पड़ेगा। जैसे इस्लामी आतंक को ‘रेडिकल इस्लामी आतंक’ कहने की जगह फ्रांस और जर्मनी की सरकारों ने सीधा इस्लामी आतंक कहना शुरु किया है, वैसे ही जहाँ मंशा काफिर लड़कियों को रेप, जबरन धर्म-परिवर्तन, धोखे से नाम बदल कर प्रेमजाल में फँसाने की हो, वहाँ हम ‘लव’ नहीं जता सकते।

बात साफ है कि नए अपराधों की नई परिभाषा न सिर्फ तय होनी चाहिए बल्कि उसे हर सामान्य नागरिक की बोल-चाल में शामिल कराने की मुहिम चलनी चाहिए। बेगूसराय के किसी गाँव के पचास साल के व्यक्ति के पास एक शब्द होना चाहिए इस संगठित अपराध को समझने की। बात यह है कि हर मामले में मजहब विशेष का लड़का ही क्यों होता है? ईसाई या सिक्ख लड़के आखिर किसी हिन्दू लड़की को अपना नाम हिन्दू वाला बता कर प्रेम करते क्यों नहीं पाए जाते?

जब हर बार एक खास मजहब वाला ही नाम बदल रहा है, हर ऐसी घटना में हिन्दू लड़की, पत्नी या कथित प्रेमिका को अपने बाप, भाई या दोस्तों के साथ सोने को मजबूर करने या सामूहिक बलात्कार के मामले में मजहबी नाम ही सामने आता है, तो फिर इसके लिए नई परिभाषा तो चाहिए ही। अगर यह परिभाषा सरकार तय करे तो बेहतर है, वरना मीडिया को और इस समाज को, जो कि सोशल मीडिया के दौर में स्वयं ही वैकल्पिक मीडिया बन कर उभरा है, यह बीड़ा उठाना होगा क्योंकि अब हमारे पास इसकी जड़ों में सघन अम्लवृष्टि के अलावा और कोई विकल्प बचा नहीं है।

2008 में फार्म हाउस में पार्टी, अब कर रहे इग्नोर: 26/11 पर राहुल गाँधी की चुप्पी 12 साल बाद भी बरकरार

26/11 की 12वीं बरसी पर आज कई भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उस मुंबई हमले की चर्चा कर रहे हैं, जिसमें 170 लोगों से ज्यादा की मौत हुई थी और 300 से अधिक घायल हुए थे। 26 नवंबर 2008 को 10 इस्लामी आतंकियों ने भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई में घुस कर 4 दिन तक भारी तबाही मचाई थी। उन्होंने कई इलाकों में गोलीबारी और बमबारी करते हुए खून की नदियाँ बहाई थी। 

इन आतंकियों ने 26 नवंबर से 29 नवंबर 2008 के बीच में पूरे देश को भयभीत कर दिया था। आज उसी दिन को याद करते जहाँ पूरा देश पाकिस्तान की आलोचना कर रहा है, मृतकों को श्रद्धांजलि दे रहा है, वहीं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने इस पर चुप्पी साधी हुई है। राहुल ने इस हमले को लेकर एक ट्वीट तक शेयर नहीं किया है। वहीं कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर अकाउंट से एक ट्वीट शेयर हुआ है।

हैरानी की बात यह है कि ऐसा नहीं है कि राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया से दूरी बनाने के कारण इस मामले पर कुछ टिप्पणी न की हो। वह सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव हैं। उन्होंने किसानों के प्रोटेस्ट पर पुलिस एक्शन की निंदा की है। लेकिन उन्होंने एक ट्वीट भी 26/11 पर नहीं किया। उनके अन्य ट्वीटों में उन्होंने फुटबॉलर डिएगो माराडोना, कॉन्ग्रेस नेता अहमद पटेल और शिया नेता डॉ. मौलाना कल्बे की मृत्यु पर अपनी संवेदना व्यक्त की है।

गौरतलब है कि राहुल गाँधी का ऐसा असंवेदनशील रवैया पहली दफा उजागर नहीं हुआ है। पिछले साल 2019 भी राहुल ने इस मौके पर कुछ नहीं कहा था और न ही आतंकी हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी थी। इसके अलावा साल 2008 में जब पाकिस्तान के आतंकी मुंबई के लोगों को सड़कों पर मार रहे थे, उसके कुछ दिन बाद ही गाँधी परिवार के युवराज दिल्ली में पार्टी कर रहे थे। 

इंडिया टुडे की खबर का स्क्रीनशॉट

मीडिया खबरों में बताया गया था कि उस समय दिल्ली के बाहरी इलाके में राहुल गाँधी अपने बचपन के दोस्त समीर शर्मा की संगीत रस्म में पहुँचे थे। वह राधे मोहन चौक पर स्थित फार्म हाउस में थे। इंडिया टुडे में, इस संगीत रस्म को लेकर लिखा गया था, “शनिवार की रात का संगीत ‘दिलकश’ था। इसे दुल्हन की बहन लीना मुसाफिर और उसके पति इंद्र द्वारा होस्ट किया गया था। पार्टी में 800 से अधिक मेहमानों ने भाग लिया, जिसमें पेज 3 लोग भी शामिल थे।”

इस आर्टिकल में कॉर्पोरेट वकील अजय बहल को कोट करके लिखा था, “राहुल गाँधी के इस रवैए ने भावी नेताओं पर हमारे यकीन को खो दिया है।” अजय बहल स्वयं 26/11 के दौरान ओबरॉय अस्पताल में फँस गए थे, लेकिन होटल स्टाफ की मदद से बच निकलने में सफल रहे थे।

बता दें कि आज राहुल गाँधी की असंवेदनशीलता इसलिए भी चौंकाने वाली नहीं है, क्योंकि उन्होंने जब 26/11 के दौरान ही कुछ नहीं बोला और पार्टी मनाते रहे, तो जाहिर है उन्हें 12 साल बाद क्यों लगेगा कि मुंबई में आतंकी हमले जैसा कुछ हुआ था। मगर शर्मनाक ये जरूर है कि कॉन्ग्रेस ऐसे लापरवाह नेता को यूथ का चेहरा बताती है और उनमें भावी प्रधानमंत्री के सारे गुण देखती है।

’26/11 RSS की साजिश’: जानें कैसे कॉन्ग्रेस के चहेते पत्रकार ने PAK को क्लिन चिट देकर हमले का आरोप मढ़ा था भारतीय सेना पर

पूरा देश जब 26/11 के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार मान रहा था उस समय केवल कॉन्ग्रेस के नेता ही ऐसे थे, जो मुंबई में हुए आतंकी हमले को RSS से जोड़ने में जुटे थे। हमले के 12 साल बाद आज ये किसी से छिपा नहीं है कि कॉन्ग्रेस नेताओं ने RSS को दोषी ठहराने के लिए काल्पनिक भगवा आतंक की कॉन्सपिरेसी थ्योरी को बढ़ावा दिया।

उस समय कॉन्ग्रेस की ऐसी ही थ्योरी को आगे बढ़ाने वालों में एक नाम हिंदू विरोधी अजीज़ बर्नी (Aziz Burney) का था। बर्नी, उस समय रोजनामा राष्ट्रीय सहारा, बज़्म-ए-सहारा, आलामी सहारा जैसे सहारा प्रकाशनों के समूह संपादक थे। उसने उस दौरान आरएसएस पर लग रहे आरोपों को साबित करने के लिए ‘26/11 RSS की साज़िश’ नाम से एक किताब प्रकाशित की थी।

इस किताब को प्रमाणिकता दिलवाने के लिए कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह खुद इसका लोकार्पण करने एक नहीं बल्कि दो बार समारोह में पहुँचे थे। एक दफा दिल्ली और दूसरी बार मुंबई में।

तस्वीर साभार: पोस्टकार्ड न्यूज

इस बुक की रिलीज में दिग्विजय सिंह ने महाराष्ट्र एटीएस चीफ हेमंत करकरे को लेकर बयान दिया था। उन्होंने दावा किया था कि मुंबई में हुए आतंकी हमले में वीरगति प्राप्त होने से 2 घंटे पहले महाराष्ट्र एटीएस चीफ करकरे ने उन्हें फोन पर बताया था कि चूँकि वह मालेगाँव विस्फोट मामले की जाँच कर रहे हैं, इसलिए उन्हें हिंदूवादी संगठनों से धमकी मिली है। और, इस तरह दिग्विजय ने मुंबई हमले को पाकिस्तान से जोड़े बिना सीधा हिन्दुओं व आरएसएस पर सारा इल्जाम मढ़ दिया था।

बर्नी की इस किताब में उसके उर्दू अखबार में प्रकाशित सैंकड़ों संपादकीय और लेख थे। इस किताब का अंग्रेजी नाम, “26/11: Biggest attack in India’s history” था। अपने लेखों में बर्नी ने मुंबई हमले से पाकिस्तान को क्लिन चिट देते हुए लिखा था कि इस हमले में आईएस या लश्कर-ए-तैयबा नहीं, बल्कि आरएसएस के लोग शामिल थे, जिन्हें Mossad और CIA का समर्थन प्राप्त था।

भारतीय सेना को बताया मुंबई हमले का जिम्मेदार

अपने एक लेख में तो अजीज़ ने भारतीय सेना को 26/11 के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया था। साल 2009 की शुरुआत में लिखे गए उस लेख में बर्नी का दावा था कि एटीएस चीफ हेमंत को भारतीय सेना ने मारा। इतना ही नहीं आगे बर्नी ने आरोप लगाए थे कि इस हमले में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का भी हाथ था।

एक अन्य लेख में बर्नी ने दावा किया था कि मुंबई पुलिस बल के कांस्टेबलों ने सीएसटी रेलवे स्टेशन पर गोलीबारी की थी और कुछ भाजपा स्वयंसेवक जिन्होंने कसाब को गिरफ्तार किया था, वह उसे सीसीटीवी कैमरे के सामने लेकर आए थे।

यहाँ बता दें कि कसाब की सबसे ज्यादा वायरल तस्वीर का सच यह है कि उसे श्रीराम वर्नेकर ने क्लिक किया था। वह टाइम्स ऑफ इंडिया के फोटो जर्नलिस्ट थे। वर्नेकर को उस तस्वीर के लिए बाद में अवार्ड भी मिला था। इस तस्वीर को खींचते वक्त एक आतंकी की नजर कैमरा फ्लैश पर भी पड़ी थी और उसने TOI की इमारत पर गोली दागी थी।

साभार: Befitting facts

हर ओर से 26/11 हमले में पाकिस्तान की भूमिका को दरकिनार करने वाले अजीज़ को कॉन्ग्रेस का बेहद करीबी माना जाता है, जिनके पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से काफी मैत्रीपूर्ण संबंध थे।

साल 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अजीज़ को उसके उर्दू भाषा अखबार रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के लिए उत्कृष्ट अवार्ड दिया था। कॉन्ग्रेस में अजीज़ को सेकुलरिज्म का चमचमाता प्रतीक माना जाता था। वह साल 2009 में डॉ मनमोहन सिंह के फ्रांस और मिस्र दौरे के दौरान प्रतिनिधि मंडल में शामिल होकर गए थे। इतना ही नहीं, कहा ये भी जाता है कि बर्नी ने यूपीए के कार्यकाल में राज्यसभा का नॉमिनेशन पाने का प्रयास किया था।

अजीज़ बर्नी को झूठा प्रॉपगेंडा फैलाने के लिए माँगनी पड़ी थी माफी

बता दें कि मुंबई हमले में आरएसएस को लेकर फैलाया जा रहा झूठ और अजीज़ का ये फर्जी प्रोपगेंडा ज्यादा दिन नहीं चल सका था। साल 2009 के अगस्त में उसे देश विरोधी लेख लिखने के लिए सत्र न्यायालय में घसीटा गया था। अपने लेखों में उसने मुंबई हमले में आरएसएस को जिम्मेदार बताने के लिए कई विवादित बातें लिखी थीं।

उसके ख़िलाफ मुंबई के एक सामाजिक कार्यकर्ता विनय जोशी ने शिकायत की थी और करीब एक साल बाद उसने आरएसएस को मुंबई हमले से जोड़ने के लिए एक पन्ने का माफीनामा लिखा था। हालाँकि, आरएसएस ने इसे खारिज कर दिया था और जब कोर्ट में भी साबित हो गया कि अजीज़ के पास अपने दावों को साबित करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं, तब उसने किताब का नाम तक बदलने का प्रस्ताव सामने रखा था।

नाबालिगों से गैंगरेप, जबरन मुस्लिम बनाना, नाम बदल कर दोस्ती… SIT की वह रिपोर्ट जिसे वामपंथी नकार रहे हैं

देशभर में सामने आ रहे ग्रूमिंग जिहाद या लव जिहाद के मामलों के बीच उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश-2020 को मंजूरी दे दी है। इसके लागू होने के बाद छल-कपट व जबरन धर्मांतरण के मामलों में एक से 10 वर्ष तक की सजा हो सकेगी। खासकर, किसी नाबालिग लड़की या अनुसूचित जाति/जनजाति की महिला का छल से या जबरन धर्मांतरण कराने के मामले में दोषी को तीन से 10 वर्ष तक की सजा भुगतनी होगी।

वहीं, वामपंथी मीडिया और लिबरल गैंग निरंतर ही ग्रूमिंग जिहाद की वास्तविकता को नकारने और इसे एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा का हथियार साबित करने की भी कोशिश करते देखा जा सकता है। ऑपइंडिया पर ही एक रिपोर्ट में हमने पिछले 112 दिनों में 43 लव जिहाद के मामलों के बारे में बताया था। वामपंथी मीडिया पोर्टल्स के अनुसार, मुस्लिम युवक का अपनी पहचान छुपकर किसी हिन्दू युवती का उत्पीड़न, उसका धर्मान्तरण और उसे प्रताड़ित करना लव जिहाद न होकर दो लोगों का निजी मसला है। लव जिहाद के ऐसे एक नहीं, बल्कि अनेकों मामले सामने आए हैं जब मजहब विशेष के किसी युवक ने धर्मांतरण कर हिन्दू (काफ़िर) युवती से निकाह करने का प्रयास और उनका शोषण किया।

‘लव जिहाद’ की प्रचलित या स्वीकार्य परिभाषा में निम्नलिखित में से एक या कई बिंदुओं का सत्य पाया जाना आता है:

  • प्रेम संबंध की शुरुआत में ही मुस्लिम लड़के की पहचान का छुपाना, स्वयं को गैरमुस्लिम बताना
  • गैरमुस्लिम लड़की को बहलाना, फुसलाना, बिना सहमति के निकाहनामे पर हस्ताक्षर लेना
  • कथित लड़की का जबरन मतपरिवर्तन कराकर मुस्लिम बनवाना, या ऐसा करने के लिए दवाब बनाना
  • निकाह/शादी के बाद उसे सिर्फ शारीरिक उपभोग की वस्तु मानकर अपने परिवार के मर्दों, दोस्तों के साथ जबरन सोने का मजबूर करना
  • लड़की को सबक सिखाने के लिए उसका बलात्कार, सामूहिक बलात्कार
  • लड़की को बदनाम करने के लिए प्रेम के ढोंग के बाद उसकी तस्वीरें, वीडियो वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेलिंग
  • लड़के की धोखाधड़ी का हिस्सा न बनने पर, इस्लाम न अपनाने पर बलात्कार, हत्या
  • ऐसा कोई भी कुकृत्य जहाँ मकसद लड़की को मुस्लिम बनाना हो, न कि प्रेम या शादी

इस प्रकार निकाह और धर्मांतरण की तमाम घटनाओं में एक ही बात सामने आई है कि ‘ग्रूमिंग जिहाद’ महज निकाह न होकर एक पूरा मजहबी जिहादी अजेंडा है। हिन्दू युवतियों का बलात्कार कर उन्हें ब्लैकमेल करना, धोखा देकर अवैध सम्बन्ध स्थापित करना, उनसे रुपए ठगना, नाबालिग युवतियों को बहला-फुसलाकर उनसे प्रेम का स्वांग रचना और फिर उन्हें घर से भागने के लिए उकसाना, विदेशों में नाबालिग हिन्दू युवतियों की तस्करी भी इस अजेंडा का ही हिस्सा है।

यह ग्रूमिंग जिहाद कितना तय और सुनिश्चित प्रोपेगेंडा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिन्दू युवतियों को धर्मांतरण और निकाह के लिए मजबूर करने के लिए मजहब विशेष के युवकों ने हिन्दू नाम रखे और खुद को हिन्दू साबित करने के लिए टीका लगाना और कलावा पहनना तक शुरू कर दिया।

इन्हीं प्रकरणों के चलते उत्तर प्रदेश के कानपुर में ग्रूमिंग जिहाद के मामलों पर बनाई गई एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट फाइल कर दी है। एसआईटी ने कुल 14 प्रकरणों की जाँच की, जिनमें से 11 में लव जिहाद का अपराध पाया गया है। इन 11 मामलों में SIT ने पाया कि अभियुक्तों ने धोखाधड़ी करके हिन्दू लड़कियों से ‘प्रेम संबंध’ बनाए। अन्य 3 मामलों में लड़कियों ने अपनी मर्जी से शादी करने की बात कही है। इन लड़कियों के शारीरिक शोषण में शामिल सभी 8 लोग जेल भेजे गए हैं।

इन सभी आँकड़ों के बावजूद, वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘दी वायर’ के लिए लव जिहाद के ये प्रत्यक्ष प्रमाण नाकाफी ही हैं। दी वायर ने उन सभी नाबालिग और बालिग़ पीड़िताओं को किनारे कर एक ऐसे उदाहरण का सहारा लिया है, जिनमें बालिग युवतियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी से ही दूसरे समुदाय के युवक से निकाह किया। हालाँकि उनके परिवार ने आरोप लगाया है कि उन्हें बहला-फुसलाकर या फिर धोखे से धर्मांतरण और निकाह के लिए मजबूर किया गया। लेकिन दी वायर के लिए लव जिहाद की वास्तविकता से मुँह मोड़ने और अपने अजेंडा को साबित करने के लिए यह काफी है।

दी वायर का मानना है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की रिपोर्ट सीएम आदित्यनाथ के लव जिहाद के दावे से मेल नहीं खाती
NDTV ने भी गुमराह करने वाले शीर्षक का सहारा लिया है

इन आँकड़ों के बावजूद वामपंथी मीडिया पोर्टल्स यह साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि ये मामले आपसी सहमति से किए गए निकाह या प्रेम सम्बन्धों के थे। जबकि ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट में यह स्पष्ट लिखा गया है कि जबकि ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट में यह स्पष्ट लिखा गया है कि यह ग्रूमिंग जिहाद के कुछ बेहद चर्चित मामले थे, जिनमें हिन्दू युवतियों को धोखा देकर उनके धर्मांतरण का प्रयास या उनका उत्पीड़न किया गया। इन अपराधों के विवरण से पता चलता है कि इन सबके पैटर्न समान थे और हिन्दू धर्म की युवतियों को ही लक्ष्य बनाकर किए गए सुनियोजित अपराध थे।

SIT के नेतृत्व में एक टीम ने कानपुर जिले की 14 अलग-अलग थानों में दर्ज ऐसे मामलों की जाँच की, जिनमें मुस्लिम युवकों ने धोखा देकर हिंदू लड़कियों (नाबालिग और बालिग) से निकाह किया। यह सभी सबसे प्रचलित मामले पिछले 2 साल के अंदर दर्ज कराए गए थे। पुलिस ने 11 मामलों में आऱोपितों के खिलाफ एक्शन लिया है। इन सभी पर आईपीसी की धारा 363, 366 समेत अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। जबकि, इनमें से 5 केस में यह भी पता चला है कि पीड़ित लड़की नाबालिग थीं।

SIT रिपोर्ट में 3 ऐसे मामलों का भी जिक्र है, जिनमें मुस्लिम आरोपितों ने अपने नाम बदले थे। इनमें फतेह खान आर्यन मल्होत्रा, ओवैस ने बाबू और मुख्तार अहमद ने अपना नाम राहुल सिंह रखा। यही नहीं, मुख्तार अहमद ने राहुल नाम से आधार कार्ड तक बनवा लिया था। पुलिस के अनुसार, जूही एरिया के 4 लड़के आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ये चारों आपस में फोन पर बात करते थे। लेकिन वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल दी वायर, स्क्रॉल आदि यही साबित करने का प्रयास करते देखे गए हैं कि इन सभी मामलों में कोई मजहबी साजिश नहीं थी।

इन सभी मामलों पर एक नजर –

1. फ़तेह खान उर्फ़ आर्यन मल्होत्रा

फतेह खान ने आर्यन मल्होत्रा बनकर खुद को हिंदू साबित करने के लिए वह सब किया, जो वह कर सकता था। जैसे, उसने अपने हाथ पर कलावा (हिंदू पवित्र धागा) बाँधा, तिलक लगाया और अक्सर मंदिर जाया करता था। फतेह खान ने आर्यन नाम से आधार कार्ड तक बना लिया था और 18 वर्ष की हिन्दू युवती से अवैध सम्बन्ध बनाए। फतेह खान पर थाना नौबस्ता में आईपीसी की धारा 376/467/468/471/420 और पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है।

मूल रूप से बंगलुरू के रहने वाले फतेह खान ने आर्यन मल्होत्रा बनकर नाबालिग लड़की को अपने जाल में फँसाया। वह कानपुर के गोपाल नगर में पीड़िता के घर में किराए पर रह रहा था। फतेह खान उर्फ़ आर्यन मल्होत्रा कथित तौर पर पिछले तीन वर्षों से हिंदू होने का नाटक कर रहा था।

2. बाबू उर्फ़ मोहम्मद ओवैस

मोहम्मद उवैश ने बाबू बन कर पहले लड़की को अपने प्रेमजाल में फँसाया फिर अपनी बहन के साथ मिल कर उस पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाया। मोहम्मद ओवैस पर धारा 363 और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज है। ओवैस ने अपना वास्तविक नाम छुपाकर पीड़िता से प्रेम का नाटक किया। यही नहीं, लव जिहाद के लिए मोहम्मद ओवैस ने अपनी बहन की मदद भी ली। पुलिस ने मामले में आरोपित मोहम्मद उवैश और उसकी बहन माही हयात को गिरफ्तार कर लिया है।

3. नाबालिग हिन्दू लड़की को घर से भगाया

नौबस्ता थाने में दर्ज मामले में एक नाबालिग हिन्दू लड़की को आरोपित युवक ने बहला-फुसलाकर प्रेम में फँसाया और उसे घर से भगा ले गया। आरोपित पर आईपीसी की धारा 363 और पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज है। पीड़िता की माँ ने थाना नौबस्ता में केस दर्ज करते हुए बताया कि उनकी 16 वर्षीय बेटी को शाहरुख़ अपने साथ भगाकर ले गया। FIR के बाद पुलिस ने नाबालिग पीड़िता को बरामद कर लिया और शाहरुख़ को जेल भेज दिया।

4. मोहम्मद आरिफ

मोहम्मद आरिफ पर 14 साल की एक अनूसूचित जाति की हिन्दू युवती से बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करने और शारीरिक सम्बन्ध बनाने का आरोप है। आरिफ ने पीड़िता से धोखे से अवैध सम्बन्ध भी बनाए। नाबालिग लड़की की माँ ने शिकायत दर्ज कराई कि आरिफ उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया। पुलिस ने लड़की की माँ की शिकायत के आधार पर आरोपित आरिफ को गिरफ्तार कर लिया है। लड़की ने बताया कि आरिफ उसे बॉम्बे गोहाटी ट्रांसपोर्ट के पास मिला था और वो उसे अपने साथ आजमगढ़ ले गया।

आरिफ ने लड़की को किसी को इस बारे में न बताने को लेकर धमकाया भी और अपने साथ दिल्ली ले गया जहाँ वो आरिफ के दोस्त के घर पर रुके। आरिफ का दोस्त और उसकी पत्नी जब घर पर नहीं थे, उस समय आरिफ ने लड़की का यौन शोषण किया और आखिर में उसे एक बस अड्डे पर छोड़ दिया। आरिफ को गिरफ्तार कर लिया गया है।

5. मुख़्तार अहमद उर्फ़ राहुल विश्वकर्मा

मुख्तार अहमद ने राहुल विश्वकर्मा बनकर हिंदू लड़की को फँसाया। वह पहले भी एक और हिंदू लड़की को बेगम बना चुका था। मुख्तार पर आईपीसी की धारा 420/467/468/47 के तहत केस दर्ज है।

32 साल के मुख्तार अहमद ने हिंदू लड़की से राहुल बन कर दोस्ती की थी। 22 वर्षीय लड़की से दोस्ती के बाद मुख्तार ने लड़की को झूठे दावे करते हुए अपने प्यार में फँसा लिया। अहमद ने लड़की का ब्रेनवाश किया और बिना किसी की जानकारी के 17 अप्रैल 2019 को कोर्ट मैरिज कर ली। जिसके बाद यह बात सबसे छिपाते हुए दोनों अपने-अपने घर रहने लगे गए।

शादी के बाद लड़की को हाल ही में पता चला कि जिस मुख्तार के प्यार में आकर उसने अपने परिजनों को बिना बताए शादी की थी और वह पहले से ही शादीशुदा है तथा उसके बच्चे भी हैं। इतना ही नहीं मुख्तार की पहली पत्नी भी दूसरे समुदाय की है। यह सच्चाई जानने के बाद युवती के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतने महीनों से बात करने के बावजूद मुख्तार ने उसे शादी और बच्चे की भनक भी नहीं लगने दी।

लड़की ने बताया मुख्तार ने निक़ाह करते समय बीवी-बच्चों की बात उससे नहीं बताई थी। उसने बाद में बताया कि वह शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं। लेकिन पहली बीवी से उसने तलाक ले लिया है और वह उसके साथ नहीं रहती। पिता ने मामले में पुलिस वालों से अनुरोध किया कि उन्हें उनकी बेटी वापस चाहिए और धोखाधड़ी से इस शादी को अंजाम दिया गया है। 

6. अपना मजहब छिपाकर नसीम ने धोखे से किया निकाह और धर्मान्तरण

आरोपित नसीम ने पीड़िता के साथ धोखे से निकाह किया, जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाए और उसे इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया। आरोपित पर धारा 366 के तहत गोविंदनगर थाने में मामला दर्ज है। नसीम ने 18 वर्षीय लड़की को बहला-फुसलाकर उसका शारीरिक शोषण किया। पीड़िता घरवालों से झगड़ा होने के बाद बाईपास पर बैठी हुई थी, जहाँ उसे नसीम मिला। नसीम उसे अपने घर ले गया और अपनी बहन से मुलाकात करवाई।

नसीम ने पीड़िता को यह यकीन दिलवाया कि वह भी हिन्दू ही है और उसके साथ निकाह कर लिया। पीड़िता ने आरोप लगाया कि नफीस ने उसके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध भी बनाए, उसे ताबीज पहनने को मजबूर किया और कहा कि उसे इस्लाम अपनाना होगा। पुलिस ने नसीम को गिरफ्तार कर कानपुर जेल भेज दिया है।

7. सद्दाम पर नाबालिग को बहला-फुसलाकर भगा ले जाने का आरोप

सद्दाम पर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। सद्दाम पर आरोप है कि उसने 16 वर्षीय हिन्दू लड़की को अपने प्रेम में फँसाकर घर से भगाया। सद्दाम को गिरफ्तार कर लिया गया है। हालाँकि, पीड़िता ने कहा कि वह अपनी मर्जी से सद्दाम के साथ गई थी और अपने घरवालों पर आरोप लगाया कि वह उसे बेच सकते हैं। नाबालिग युवती को बहला फुसलाकर अगवा करने के आरोप में सद्दाम को कानपुर जेल भेज दिया गया है।

8. सलमान ने शादी का झाँसा देकर शारीरिक सम्बन्ध बनाए

थाना बाबुपुरवा में सलमान के खिलाफ आरोप दर्ज किया गया कि उसने शादी का झाँसा देकर एक 14 वर्षीय लड़की से शारीरिक सम्बन्ध बनाए। बहला-फुसलाकर सलमान पीड़िता को दिल्ली ले गया। शादी का वादा कर शारीरिक सम्बन्ध बनाकर उसे छोड़ दिया। पीड़िता का कहना है कि उसका सलमान के साथ अफेयर था और वह इसी कारण उसके जाल में फँसी थी। सलमान को पॉक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया गया है।

9. आदिल ने धोखे से करवाया धर्मान्तरण

आदिल ने अनुसूचित जाति की एक 16 वर्षीय लड़की को अपने प्रेम में फँसाया और उसका धर्मांतरण कर निकाह किया। पीड़िता के भाई ने थाना चकेरी में आदिल के खिलाफ एससी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया। पीड़िता ने बताया कि उसका अपने पड़ोसी आदिल से प्रेम सम्बन्ध था और उन्होंने कोर्ट में कुछ पेपर पर साइन करवाकर निकाह किया। आदिल ने लड़की को शादी करने से मुकरने पर जान से मारने की भी धमकी दी।

आदिल पीड़िता को कचहरी से गुडगाँव ले गया और पत्नी की तरह रहने को कहा। आदिल ने उसके साथ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने के साथ ही उसे बाद में कानपुर लाकर कमरे में बंद कर दिया। पीड़िता ने कहा कि वह आदिल के साथ नहीं रहना चाहती और अपने घर वापस जाने की इच्छा प्रकट की।

10. एक 19 वर्षीय और एक 14 वर्षीय लड़कियों को प्रेम में फँसाया, घर से भगाया और शरीरिक सम्बन्ध बनाए

कानपुर स्थित थाना कल्याणपुर में जूही कॉलोनी निवासी शाहरुख़, पुत्र मोहम्मद खलील और मोहम्मद शाहरुख़, पुत्र मोहम्मद कमाल के खिलाफ एक 14 वर्षीय और एक 19 साल की लड़की को भगा ले जाने के चलते मामला दर्ज किया गया। दोनों युवतियों को जुलाई 20, 2020 को पुलिस ने बरामद कर लिया।

हालाँकि, युवतियों का कहना था कि वो अपनी मर्जी से शाहरुख़ के घर गईं थीं और उनके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं की गई। हालाँकि, पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार, पीड़िताओं ने पहले अपने साथ बलात्कार की बात का बयान दिया था।

11. दलित युवतियों को दोस्तों के साथ मिलकर प्रेम जाल में फँसाया, बहन पर बनाया निकाह का दबाव, ब्लैकमेलिंग

मोहम्मद मोहसिन खान, फैसल, नौशाद, शाहरुख़, आमिर, मोहम्मद शाहरुख़ पर दलित युवतियों के जबरन धर्मान्तरण, ब्लैकमेलिंग और निकाह का दबाव बनाने के आरोप में कानपुर स्थित थाना पनकी में धारा 295ए/386/504/506/507, 3(1), एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है।

मोहसिन और उसके साथियों पर आरोप है कि उन्होंने 25 वर्ष और 22 वर्ष की दो युवतियों उनके घर से उठाकर अगवा कर लिया था। युवतियों के साथ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उन्हें गाली दी गई और उन पर जबरन धर्म परिवर्तन करने का दबाव बनाया गया। अभियुक्त मोहसिन खान और आमिर को गिरफ्तार कर लिया गया है।

25 वर्षीय पीड़िता ने कहा कि उसने अपनी मर्जी से नवंबर 2018 में मोहसिन खान से मंदिर में शादी की थी लेकिन वह अपने ही घर में रह रही थी। जून 2020 में कानपुर कोर्ट में शादी करने पहुँचे लेकिन शादी नहीं हो सकी। युवती ने कहा कि एक महिला वकील ने उनसे निकाहनामे पर हस्ताक्षर करवाए और उसे और मोहसिन को इस बारे में जानकारी नहीं थी कि यह निकाहनामा है। आमिर और मोहसिन खान दोस्त हैं और आमिर ने ही युवती के पिता को उनकी शादी की जानकारी दी।

जब मोहसिन युवती को लेने उसके घर गया तो युवती के पिता ने मोहसिन के खिलाफ केस दर्ज कर दिया। युवती ने कहा कि वह मोहसिन के साथ रहना चाहती थी, लेकिन उसके पिता इसके खिलाफ़ थे।

वहीं, दूसरी 22 वर्षीय युवती ने बताया कि उसकी दोस्ती समीर खान से थी। समीर का दोस्त आमिर पीड़िता की बहन पर दबाव डालता था कि वो उसकी शादी पीड़िता से करवाए। बाद में पीड़िता को पता चला कि आमिर के सम्बन्ध और लड़कियों के साथ भी थे। जिसके बाद उन दोनों के बीच झगड़ा चलता रहता था। जिसके बाद से ही आमिर पीड़िता और उसकी बहन की जिन्दगी बर्बाद करने की धमकियाँ दे रहा था।

NOTE: FIR की कॉपी में बालिग/नाबालिग पीड़िताओं का नाम और पता छिपाए गए हैं

उत्तर प्रदेश के ये वो 14 प्रचलित मामले हैं, जिनमें पीड़िताओं को मुस्लिम समुदाय के युवकों द्वारा किसी न किसी तरह से इस्लाम कबूल करने, उनके धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न के प्रयास किए गए। कुछ ऐसे भी मामले हैं, जिनमें नाबालिगों ने अपनी मर्जी से आरोपित से साथ भागने की बातें भी कही हैं, जबकि उनके परिवार ने आरोप लगाए हैं कि उनकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर प्रेम में फँसाकर लव जिहाद का शिकार बनाया गया है।

‘कबीर असली अल्लाह, रामपाल अंतिम पैगंबर और मुस्लिम असल इस्लाम से अनजान’: फॉलोवरों के अजीब दावों से पटा सोशल मीडिया

यहाँ लिखी गई तमाम बातें भ्रमित कर सकती हैं या उनका शायद ही कोई मतलब निकल कर आए। हमने लगभग एक हफ्ते तक रामपाल की वेबसाइट और उनके भक्तों के ट्वीट खंगाले हैं। अपनी दिमागी हालत बचा पाने से पहले तक हम लगभग इतना ही समझ पाए।  

अगर आपने हाल फ़िलहाल में ट्विटर पर ‘अल्लाह-हू-अक़बर’, ‘कुरान’ या ‘पैगंबर’ ट्रेंड करते हुए देखा और यह सोचा कि ऐसा क्यों? तो यहीं ठहरिए! इसका श्रेय जाता है रामपाल को जो चार महिलाओं की हत्या करने के अपराध में आजीवन कारावास का दंड भुगत रहे हैं। रामपाल के फॉलोवरों ने उसे इस्लाम का नया ‘पैगंबर’ घोषित कर दिया है और वह जेल में बैठ कर इस्लाम के इतिहास को नए सिरे से लिख रहा है। हत्या-राजद्रोह और सरकार के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के आरोपित रामपाल के तमाम भक्तों का दावा है कि वह अंतिम पैगंबर हैं। 

रामपाल अंतिम पैगंबर है

रामपाल के भक्तों के अनुसार कबीर असली अल्लाह हैं और रामपाल अंतिम पैगंबर। पैगंबर मायने ऐसे दूत जिन्हें ऊपर वाला एक आदर्श मानव के उदाहरण के रूप में भेजता है। जिसमें पैगंबर मोहम्मद को इस्लाम का अंतिम पैगंबर माना जाता है, मुस्लिमों का मानना है कि अल्लाह ने खुद उन्हें कुरान की शिक्षा दी थी। रामपाल की वेबसाइट के मुताबिक़ मुस्लिमों ने सिर्फ उतनी कुरान शरीफ समझी है जितनी उन्हें काज़ी और मुल्लाओं ने सदियों तक समझाई है। 

रामपाल का कहना है कि मुस्लिम कुरान नहीं समझते हैं, इनके मुताबिक़ कबीर ही अल्लाह हैं। इसके बाद रामपाल ने तमाम आयतों का हवाला देते हुए साबित किया कि कबीर ही अल्लाह है बल्कि अल्लाह-हु-अकबर में अल्लाह ‘कबीर ही हैं। रामपाल के मुताबिक़ अल्लाह-हु-अकबर उर्फ़ अल्लाह कबीर 1400 साल पहले पैगंबर मोहम्मद से मिले थे।

रामपाल की वेबसाइट

क्योंकि पैगंबर मोहम्मद एक पवित्र इंसान थे इसलिए अल्लाह कबीर ने उन्हें सतलोक दिखाया (रामपाल के अनुसार)। अल्लाह कबीर इस दौरान मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक तैमूर लंग से भी मिले और आशीर्वाद दिया जिसकी वजह से तैमूर लंग इतना बड़ा शासक बना। रामपाल यह भी कहता है कि सिकंदर लोधी के जल कर घायल होने पर अल्लाह कबीर ने उसे आशीर्वाद दिया था। इसके बाद लोधी अल्लाह कबीर का भक्त बना क्योंकि वह सिर्फ उन्हें भक्ति के लायक मानता था। 

रामपाल का यह भी मानना है कि अल्लाह कबीर ने 12वीं शताब्दी के पंजाबी मुस्लिम धर्मगुरु शेख फरीद को मुक्ति के मंत्र भी दिए। रामपाल के मुताबिक़ अल्लाह-हू-अकबर कबीर मक्का को उस जगह पर ले आए जहाँ पवित्र मुस्लिम महिला राबिया बसरी बैठी हुई थीं। इसके अलावा अल्लाह कबीर ने ही इस महिला को आज़ाद भी किया। रामपाल का कहना है कि कलयुग में जन्म लेने वाली राबिया असल में सतयुग की दीपिका थी। दीपिका गंगाधर नाम के संत की पत्नी थी जिसने कबीर देव नाम की पवित्र संतान का पालन पोषण करके पुण्य कमाया। इसकी वजह से वह कलयुग में मुस्लिम के रूप में पैदा हुई थी। 

कलयुग में राबिया ने अल्लाह कबीर की पूजा की, जब राबिया 55-60 साल की थी तब वह हज करने गई थी। इसके बाद रामपाल ने कहा कि पिछले जन्म में दीपिका के अवतार में मौजूद भलाई की वजह से जब उसने रेगिस्तान के पास एक प्यासे कुत्ते को देखा तब उसे पानी दिया। अपनी भलाई की वजह से वह मक्का की तरफ आगे बढ़ी और तभी एक आकाशवाणी हुई, आकाशवाणी में उसे बताया गया कि मक्का उसके लिए 60 किलोमीटर आगे आ गई है। रामपाल का ऐसा मानना है मुस्लिम चेहरों को लेकर जबकि इसके भक्तों का मानना है कि रामपाल रक्षक है।   

रामपाल के भक्त यहाँ तक दावा कर रहे हैं कि मुस्लिम असली अल्लाह को नहीं जानते हैं। यह एक पोस्ट है जिसमें रामपाल का भक्त कह रहा है कि मुस्लिमों को अल्लाह के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 

मुस्लिम अल्लाह को नहीं जानते हैं (रामपाल के भक्तों के अनुसार)

इसके अलावा कई अन्य ट्विटर यूज़र्स ने मुस्लिमों और कुरान को लेकर इसी तरह के ट्वीट किए थे। इनके हिसाब से रामपाल अंतिम पैगंबर है जो पैगंबर मोहम्मद के बाद आए थे।

रामपाल अंतिम पैगंबर

रामपाल के भक्तों ने तो कट्टरपंथी इस्लामी जाकिर नाइक को चुनौती तक दे दी थी। इस मुद्दे पर कई कदम आगे बढ़ते हुए रामपाल के भक्तों ने दावा किया कि जाकिर नाइक रामपाल की जानकारी के सामने कुछ नहीं है। 

जाकिर नाइक को चुनौती देते रामपाल

वहीं रामपाल की तरफ से यह प्रचार जारी है कि कबीर ही अल्लाह हैं और वह आकार विहीन नहीं हैं। 

अल्लाह के आकार पर रामपाल

इस्लाम में ऐसी मान्यता है कि अल्लाह न तो आध्यात्मिक है और न ही वस्तुगत है और कोई भी दृष्टि उन्हें अपने दायरे में नहीं ला सकती है। क्योंकि इस्लाम के मुताबिक़ आकार और मूर्ति जैसा कुछ नहीं होता है इसलिए अल्लाह की न तो कोई मूर्ति है और न ही तस्वीर। इसलिए अल्लाह की तस्वीर या कार्टून बनाना ईशनिंदा कहा जाता है और कई इस्लामी मौलवी इसके लिए सज़ा की बात कहते हैं। रामपाल के भक्तों का कहना है कि अल्लाह ने जीव हत्या प्रतिबंधित की है इसलिए मुस्लिमों को शाकाहारी बन जाना चाहिए। 

मुस्लिमों से शाकाहारी बनने की अपील करते रामपाल

मज़े की बात है कि बकरीद के मौके पर मुस्लिम बकरे की कुर्बानी देते हैं। 

ईसाई धर्म पर रामपाल

रामपाल के अनुसार सिर्फ कबीर ही अल्लाह नहीं है बल्कि यीशु भी कबीर के ही अवतार हैं। रामपाल का इस मुद्दे पर कहना था, “वह यीशु नहीं थे जो मकबरे से बाहर आए बल्कि वह कबीर थे जो यीशु के अवतार में सामने आए और अपने भक्तों का भरोसा कायम रखा। अन्यथा सभी भक्तों का विश्वास उठ जाता और वह नास्तिक बन जाते।” यानी रामपाल के मुताबिक़ यह बात बाइबल में लिखी हुई है कि कबीर ही असली भगवान हैं। 

रामपाल ने कहा, “कबीर यीशु से मिले और उन्हें अपने साथ सतलोक लेकर गए। रास्ते से लेकर पितृ लोक पहुँचने तक कबीर ने यीशु को उनके पूर्वजों (डेविड, मोसेस, अब्राहम) के दर्शन कराए। इसके बाद कबीर उन्हें सतलोक लेकर गए लेकिन यीशु को कबीर पर भरोसा नहीं था। यीशु ने कबीर को पूरा भगवान नहीं माना लेकिन उन्होंने यह स्वीकार किया कि भगवान एक ही है। सतलोक से वापस आने पर कबीर ने यीशु को शिक्षा दी कि भगवान एक ही है और मोक्ष के बारे में भी बताया। क्रॉस पर लटकाए जाने के बाद कबीर ने ही याचना की कि भगवान अपने बच्चों के पापों को भूल जाए।” 

कबीर का परिचय 

कबीर का जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ था और आज वह सबसे ज़्यादा अपने दोहों और निर्गुण धारा की धार्मिक शिक्षा के लिए जाने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि उनका जन्म एक मुस्लिम बुनकर परिवार में हुआ था। कबीर की पुस्तक में यह बात स्पष्ट रूप से देखी और समझी जा सकती है कि कबीर हिंदुत्व और इस्लाम दोनों की रूढ़ियों के ही बड़े आलोचक थे। उनकी धार्मिक शिक्षाओं का ही नतीजा है कि दोनों धर्मों के लोग उन पर अपना अधिकार जताते हैं। ‘कबीर पंथ’ के अनुयायी उनकी शिक्षा को आगे बढ़ाते हैं।

कौन है रामपाल 

1951 में पंजाब में जन्मे रामपाल सिंह जतिन या स्वघोषित धर्मगुरु फ़िलहाल हत्या के आरोपों के चलते हिसार की जेल में कैद हैं। धर्मगुरु बनने के पहले रामपाल हरियाणा सरकार के सिंचाई विभाग में बतौर जूनियर अभियंता कार्यरत थे और 1996 में उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया था। इसके पहले उसने अपनी पहचान ‘जगतगुरु’ के रूप में स्थापित की थी। स्वामी रामदेवानंद से मुलाक़ात के बाद रामपाल ने हिन्दू धर्म त्याग कर खुद को कबीर का अनुयायी घोषित कर दिया। 

साल 2006 में रामपाल के भक्तों और पुलिसकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 5 महिलाओं और 1 बच्चे की मृत्यु हुई थी और लगभग 200 लोग घायल हुए थे। इसके बाद नवंबर 2014 में उसे गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद रामपाल को राजद्रोह, हत्या, सरकार के विरुद्ध जंग छेड़ना और दंगे भड़काने का आरोपित पाया गया था। हरियाणा पुलिस की एसआईटी टीम ने रामपाल की गिरफ्तारी के बाद उसके सतलोक आश्रम में छापा मारा था जहाँ भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए थे। 

पेट्रोल बम, एसिड सीरिंज, ग्रेनेड के अलावा आश्रम से प्रेगनेंसी जाँचने वाली स्ट्रिप भी बरामद की गई थी। पुलिस को जाँच में यह भी पता चला था कि रामपाल के पास लगभग 300 प्रशिक्षित कमांडो तक उपलब्ध थे जिनका प्रशिक्षण संभावित तौर पर एनएसजी या एसपीजी के रिटायर्ड अधिकारियों ने की थी। रामपाल के नए दावे के अनुसार वह अल्लाह का उत्तराधिकारी है जो कि असल में अल्लाह है यानी इस्लाम और क्रिश्चियानिटी दोनों का ईश्वर।       

26/11 की नाकामी छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस चाटुकारों की फौज के साथ किसानों को भड़काने में जुटी, शेयर की पुरानी तस्वीरें

पूरा देश आज जब 26 नवंबर के मौके पर 26/11 हमले में मारे गए तुकाराम ओम्बले जैसे बहादुर जवानों को याद करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, उस समय कॉन्ग्रेस अब भी अपना प्रोपगेंडा फैलाने में व्यस्त है। कॉन्ग्रेस की कोशिश है कि बस किसी तरह लोगों का ध्यान इस दिन किसी दूसरे मुद्दे की ओर भटक जाए और कोई उनकी नाकामयाबी व कायरता पर बात न करे।

इसी क्रम में पार्टी के नेताओं ने आज अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर किसानों को उकसाने के लिए पुरानी तस्वीरें एक साथ शेयर करनी शुरू की। यूथ कॉन्ग्रेस की ओर से तस्वीरों को शेयर करते हुए लिखा गया, “भारत कभी ऐसी सरकार को माफ नहीं करेगी जिसने राष्ट्र का पेट भरने वालों के साथ आतंकियों सा बर्ताव किया।”

कॉन्ग्रेसियों का झूठ

वरुण चौधरी ने लिखा, “हम हैं भारत के मजदूर किसान, हमसे रोटी पाता है पूरा हिंदुस्तान, आज हम ही पर लाठियाँ, गोलियाँ और पानी का बौछार डाला जा रहा है, हम ही बुनियाद का पत्थर हैं लेकिन हमें ही पानी और पत्थर से मारा जा रहा है।”

तहसीन पूनावाला लिखते हैं, “हड्डी कड़कड़ाने वाली इस ठंड और कोरोना की दूसरी लहर में देखिए कैसे ये सरकार हमारे पेट भरने वालों के साथ बर्ताव कर रही है। अगर मेरे बाबा साहेब जिंदा होते तो संविधान दिवस पर ये सरकार उन्हें जेल में डाल देती।”

अब दिलचस्प बात यह है कि जिन तस्वीरों के आधार पर उक्त कॉन्ग्रेस नेताओं व समर्थकों द्वारा भाजपा सरकार के प्रति किसानों को उकसाया जा रहा है, वो तस्वीर साल 2018 की हैं, वो भी अक्टूबर महीने की। ऐसे में तहसीन पूनावाला जैसे कॉन्ग्रेसियों के यह ट्वीट कितने तथ्यात्मक है, इसकी पोल अपने आप ही खुलती है।

2018 की किसान रैली की तस्वीर
टाइम्स की पुरानी खबर

इन लोगों का कहना है कोरोना काल में भाजपा सरकार ने किसानों पर यह अत्याचार किया है जबकि ये सबको मालूम है कि कोरोना महामारी का असर भारत में साल 2020 में देखने को मिला था और इसका पहला केस चीन में भी साल 2019 में आया था।

@BefittingFacts के ट्विटर अकॉउंट पर इस फर्जी प्रोपगेंडा की पोल खोली गई है। उन्होंने लिखा, “जब पूरा भारत आज 26/11 मुंबई हमले के बहादुरों को याद कर रहा है, कॉन्ग्रेस और उसके कुलीन लोग भारत के किसानों को भड़काने और आतंकवादी हमले को रोकने में अपनी विफलता से ध्यान हटाने के लिए पुरानी तस्वीर का इस्तेमाल कर रहे हैं।”

केरल: राहुल गाँधी ने बाढ़ पीड़ितों के लिए भेजी थी राहत किटें, बंद दुकान में लावारिस मिलीं

लॉकडाउन के दौरान प्रभावित लोगों की मदद के नाम पर यूथ कॉन्ग्रेस ने ‘राहुल किट’ जारी किया था। पर पीड़ितों की मदद को लेकर कॉन्ग्रेस कितनी गंभीर है, इसका एक नमूना केरल से सामने आया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यहाँ एक दुकान में बाढ़ राहत किटें लावारिस मिली हैं। ये किट केरल के वायनाड से सांसद और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की तरफ से बाढ़ प्रभावितों के लिए भेजी गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार मल्लपुरम के नजदीक स्थित नीलम्बूर में जब एक दुकान को किराए पर लेने के लिए कुछ लोग पहुँचे तो भीतर सैकड़ों किट पड़ी मिली। यह देखकर स्थानीय लोगों का विरोध फूट पड़ा। इन किटों में खाद्य सामग्री, कपड़े और अन्य सामान शामिल हैं।

सत्ताधारी सीपीएम की युवा इकाई डीवाईएफआई ने कॉन्ग्रेस के खिलाफ विरोध मार्च निकालते हुए माफी की माँग की। नीलम्बूर के निर्दलीय विधायक पीवी अनवर जो सरकार को समर्थन भी दे रहे हैं ने जिला कलेक्टर के गोपालाकृष्णन से इस मामले की जाँच की माँग की है। उन्होंने दावा किया कि मामला सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने पूरे विधानसभा क्षेत्र से इस प्रकार के सामान को नष्ट कर दिया।

अनवर ने वीडियो संदेश के जरिए पत्रकारों से कहा, “यह नीलम्बूर में इकलौता मामला नहीं है। आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए कॉन्ग्रेस ने कई अन्य जगहों पर भी खाद्य सामग्री जमा की थी। इस मामला के सामने आने के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं ने अन्य स्थानों से खाद्य पदार्थों की किट को या तो हटा दिया या उन्हें नष्ट कर दिया।”

अनवर ने कहा, “जिला कलेक्टर को इस मामले की जॉंच करनी चाहिए। फूड किट प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों के लिए थे। केरल प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष एम रामचंद्रन को इसका जवाब देना चाहिए।”

जिला कॉन्ग्रेस का कहना है कि उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं है। कॉन्ग्रेस के जिला उपाध्यक्ष वीवी प्रकाश ने कहा कि मामले की जाँच कराई जाएगी। पार्टी के राज्य नेतृत्व ने अभी इस मामले पर प्रतिक्रिया नहीं दी है। किटों के कवर पर ‘MP Wayanad (सांसद वायनाड)’ लिखा था।

दिल्ली के बेगमपुर में शिवशक्ति मंदिर में दर्जनों मूर्तियों का सिर कलम, लोगों ने कहते सुना- ‘सिर काट दिया, सिर काट दिया’

दिल्ली के बेगमपुर थानांतर्गत कैलाश विहार पंसारी के एक मंदिर में तोड़फोड़ का मामला सामने आया है। घटना को अंजाम देने वाले विधर्मी ने हिंदू देवी-देवताओं की दर्जन भर मूर्तियों पर हमला करके उन्हें खंडित किया। तस्वीरों को यदि देखें तो यह साफ पता चलता है कि उसने मुख्य रूप से मंदिर में स्थापित मूर्तियों के सिर को धड़ से अलग किया है जैसे उसकी नियत ही सिर कलम करने की रही हो।

खंडित की गई मूर्ति

ऑपइंडिया के संज्ञान में जब यह मामला आया तो हमने मंदिर के ट्रस्टी विभूति शर्मा से बात की। उनका घर मंदिर से 500 मीटर की दूरी पर है। उन्होंने इस मामले की पुष्टि करते हुए यह बताया कि वह शिवशक्ति मंदिर के ट्रस्टी हैं। उन्हें कल यानी 25 नवंबर 2020 को सुबह करीब 7 बजे इस घटना की जानकारी मिली थी। मंदिर में साफ सफाई करने वाली महिला ने उन्हें इस बारे में घर आकर बताया था और फिर उन्होंने खुद जाकर देखा तो वाकई वहाँ हर मूर्ति का सिर अलग हो रखा था। 

शिवशक्ति मंदिर

कैलाश विहार के ए ब्लॉक के शिवशक्ति मंदिर में लक्ष्मी नारायण की मूर्ति, कृष्ण-राधिका की मूर्ति, दुर्गा माता की मूर्ति, बगलामुखी माता की मूर्ति और पूरे शिव परिवार की मूर्तियाँ थी। विभूति शर्मा के अनुसार, “मंदिर में साफ-सफाई के लिए लगाई एक महिला सफाई कर्मी ने मुझे घर आकर बताया, ‘भैया किसी ने मूर्तियाँ तोड़ दी हैं।’ मैंने जाकर देखा तो सारी मूर्तियाँ क्षत-विक्षत हो रखी थीं। मैंने तुरंत पुलिस को फोन किया और कुछ देर में प्रशासन की टीम भी वहाँ पहुँची।”

मंदिर के ट्रस्टी के मुताबिक प्रशासन ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वह उन्हें मंदिर में स्थापित करने के लिए नई मूर्तियाँ देंगे। उनके मुताबिक, खंडित की गई मूर्तियों का कल विसर्जन हो चुका है, लेकिन प्रशासन ने उन्हें अभी (खबर लिखने तक) नई मूर्तियाँ नहीं दी हैं।

मामले में कराई गई एफआईआर

सीसीटीवी आदि के बारे में पूछे जाने पर विभूति कहते हैं कि आम आदमी पार्टी की ओर से गली में सीसीटीवी लगा तो था, लेकिन जब घटना हुई और उसे चेक करने की बात उठी, तब पता चला कि उसका डीवीआर कोई 3-4 दिन पहले तोड़ चुका था।

उनके अनुसार, स्थानीयों ने 24 की रात एक लड़के को इलाके में भागते देखा था जो चिल्ला रहा था, “सिर काट दिया, सिर काट दिया।” मगर कोई उस लड़के का चेहरा नहीं देख पाया। ट्रस्टी के अनुसार, मंदिर का दरवाजा बंद रहता है लेकिन परसों किसी ने जब ध्यान नहीं दिया तो दरवाजा खुला रह गया और यह घटना हुई।

इस मामले में विभूति शर्मा ने पुलिस में एफआईआर दर्ज करवाई है और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए अज्ञात आरोपित के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई की माँग की है। इस मामले को पुलिस ने आईपीसी की धारा 457 और 295 के तहत दर्ज किया है। बेगमपुर थाने की पुलिस का इस संबंध में कहना है कि वो इस मामले में अभी पड़ताल कर रहे हैं। बाकी इलाके में शांति हैं। आगे की कोई जानकारी पड़ताल होने के बाद ही दी जाएगी।

VHP ने उठाया मंदिर में तोड़फोड़ का मामला

मंदिर में हुई इस निंदनीय घटना को विश्व हिंदू परिषद ने भी उठाया है। विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल लिखते हैं, “दिल्ली के बेगमपुर थानांतर्गत कैलाश विहार पंसाली में शिव शक्ति मंदिर में लगभग दर्जन भर देवी-देवताओं का सर कलम करने वाले विधर्मी दुष्ट का दूसरे दिन भी कोई अता-पता नहीं। हिंदुओं की सहिष्णुता की कृपया और परीक्षा ना लें।”

आगे उन्होंने बताया कि इस मामले में एफआईआर हुई है लेकिन बहुत सीमित धाराओं के साथ। भगवान का सिर कलम करने के लिए अभी तक कोई गिरफ्तारी भी नहीं हुई है।

मेवात में भी उखाड़ी गई थी माता की मूर्ति

इस घटना से पूर्व नवरात्रि के अवसर पर हरियाणा के मेवात में हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने का प्रयास हुआ था। वहाँ मेवात के नगीना खंड के माँडीखेड़ा गाँव में दुर्गा माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी लेकिन मात्र दो ही दिन में मंदिर की मूर्ति को पूरी तरह तोड़ दिया गया। दुर्गा माँ के मंदिर में इस घटना के बाद मूर्ति की जगह सिर्फ़ शेर के पंजे बचे थे। स्थानीय लोगों ने घटना का आरोप मंदिर के पास बने मदरसे के मुफ्ती पर लगाया था। उन्होंने कहा था कि वही यह सब काम करवाता है।

मेवात में दुर्गा माता की मूर्ति को उखाड़ कर किया गया गायब

शादी के लिए धर्म-परिवर्तन की धमकी पर 10 साल, कराने वाले मौलवियों/पुजारियों को 5 साल सजा: MP में सख्त विधेयक

हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘लव जिहाद’ को लेकर अध्यादेश को मंजूरी दी। इसी कड़ी में भाजपा शासित मध्य प्रदेश सरकार ने भी एक बड़ा ऐलान किया है। बुधवार (25 नवंबर 2020) को मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने कहा कि शादी में धर्मांतरण का दबाव बनाने का दोषी पाए जाने पर पूरे 10 वर्ष की सज़ा का प्रावधान होगा। ‘धर्म स्वतंत्रता विधेयक’ 2020 का उल्लेख करते हुए मध्य प्रदेश के गृह मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इस विधेयक के संबंध में विस्तार से जानकारी दी। 

गृह मंत्री ने इस विधेयक की जानकारी देते हुए कहा कि प्रदेश सरकार ने शादी में धर्मांतरण का लालच देने, धमकाने और दबाव बनाने पर 10 साल की सज़ा का प्रावधान होगा। इस विधेयक का मसौदा दिसंबर के दूसरे हफ्ते के दौरान मंत्रिपरिषद के सामने रखा जाएगा, जिसे 28 दिसंबर 2020 से शुरू होने वाले सत्र के दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश किया जाना है। 

इसके बाद गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “विधेयक के अंतर्गत उन मौलवियों, काज़ियों, पादरियों और पुजारियों के लिए 5 साल की सज़ा का प्रस्ताव पेश किया जाएगा, जो इस तरह के विवाह संपन्न कराते हैं। इसके अलावा ऐसे विवाहों का आयोजन कराने वाली संस्थाओं का पंजीयन और डोनेशन भी रद्द हो जाएगा। इस विधेयक के तहत शादी में धर्मांतरण का लालच देने, धमकाने और दबाव बनाने पर 10 साल की सज़ा का प्रावधान होगा। ऐसे मौलवी, पादरी या धर्म गुरु जो विवाह कराते हैं, उनके लिए इस विधेयक के मसौदे के तहत 5 साल की सज़ा का प्रावधान होगा, जो जिला दंडाधिकारी (कलेक्टर) की अनुमति के बिना ऐसे आयोजन कराते हैं।”

गृह मंत्री ने यह भी कहा कि विधेयक के तहत संबंधित पक्षों को शादी के लिए धर्मांतरण करने के पहले जिलाधिकारी को एक आवेदन देना होगा। शादी के लिए धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति (महिला-पुरुष) और इस प्रक्रिया से जुड़े धार्मिक व्यक्ति को एक महीने पहले कलेक्टर से अनुमति लेनी होगी।

इस विधेयक के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन पूरी तरह गैर जमानती और संज्ञेय होगा। ऐसे व्यक्ति जो इस तरह की शादियों में मदद करते हैं, उन्हें भी दोषी माना जाएगा। अभियुक्त को खुद सिद्ध करना होगा कि उसने बिना किसी दबाव या धमकी के धर्मांतरण किया है। यह अध्यादेश के रूप में नहीं जाएगा, सबसे पहले इसे मंत्रिपरिषद के सामने प्रस्तुत किया जाएगा और वहाँ से पास होने के बाद इसे विधानसभा में विधेयक के रूप में लाया जाएगा।                  

इसके पहले बुधवार (नवंबर 25, 2020) को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक सभा में राज्य में लव जिहाद के कानून पर बड़ा बयान दिया था। उमरिया में जन-जातीय गौरव सम्मान समारोह में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लव-जिहाद के मुद्दे पर आक्रोश दिखाया था। उन्होने कड़े शब्दों में कहा था, “मैं मध्यप्रदेश की धरती पर ‘लव जिहाद’ किसी भी कीमत पर नहीं चलने दूँगा। उसके लिए हम कानून बना रहे हैं। यह देश को तोड़ने का षड्यंत्र है, इसे किसी भी कीमत पर हम कामयाब नहीं होने देंगे।”

ट्विटर ने सुशील मोदी का ट्वीट किया डिलीट: लालू यादव को एक्सपोज़ करने में नियमों के उल्लंघन को बताया वजह

बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री व बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने बुधवार (नवंबर 25, 2020) को लालू प्रसाद यादव पर भाजपा विधायकों को लालच देकर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) की सरकार को गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया था। इसके लिए लालू से बीजेपी MLA ललन पासवान की बातचीत का ऑडियो सहित एक के बाद एक कई ट्वीट किए थे। इसी क्रम में उन्होंने एक ट्वीट में लालू यादव का नंबर शेयर भी कर दिया था, जिस नंबर से फोन आया था। अब मामला यह है कि भाजपा नेता द्वारा किए गए इस ट्वीट को ट्विटर ने हटा दिया है।

सुशील मोदी ने अपने ट्वीट में कहा था कि जब उन्होंने वापस उस नंबर को मिलाया तो लालू प्रसाद यादव ने सीधे फोन उठाया था। जिसके बाद उन्होंने जवाब दिया था कि यह गंदा खेल सफल नहीं होगा। नीचे स्क्रीनशॉट में आप देख सकते हैं कि इस ट्वीट को डिलीट करते हुए ट्विटर ने क्या टिप्पणी की है।

साभार -न्यूज़ 18

ऐसा करने की वजह ट्विटर ने यह बताया है कि, इस ट्वीट में मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर नियमों का उल्लंघन किया गया है, इसलिए इसे हटा दिया गया है। बता दें कि सुशील कुमार मोदी ने राँची जेल में सजा काट रहे राजद सुप्रीमो लालू यादव का मोबाइल नंबर शेयर करते हुए कहा था कि वह इसी नंबर से फोन कर एनडीए विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

गौरतलब है कि बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू यादव पर विधायकों को मंत्री पद का प्रलोभन देने का आरोप लगाया था। कल बिहार विधानसभा में स्पीकर के चुनाव से पहले उन्होंने यह दावा किया था। बता दें कि स्पीकर पद के लिए राजग की तरफ से विजय कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया था, वहीं महागठबंधन ने अवध बिहारी को उम्मीदवार बनाया था।

सुशील कुमार मोदी ने बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट भी जारी किया था जिसे आप नीचे देख सकते हैं। ट्वीट में सुशील मोदी ने दावा किया था कि लालू प्रसाद यादव ने बीजेपी MLA को मंत्री पद का लालच देकर स्पीकर के चुनाव से पीछे हटने की सलाह दी और उनका समर्थन करने को कहा था।

वहीं बाद में बीजेपी विधायक ललन पासवान ने भी दावा किया था कि उऩके पास लालू यादव का फोन आया था। भागलपुर की पीरपैंती सीट से चुनकर आए ललन पासवान ने ऑडियो के आधार पर दावा किया था कि लालू यादव ने उन्‍हें फोन कर मंत्री पद का ऑफर देते हुए सरकार गिराने की बात कही थी। हालाँकि, मामला वायरल होने के बाद राजद ने इस दावे को गलत बताया था।

तमाम व्यवधानों के बीच बीजेपी उम्मीदवार के चयनित होने पर बाद में सुशील मोदी ने बधाई देते हुए ट्वीट किया, “लालू प्रसाद की साज़िश को NDA ने नाकाम कर दिया। बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद के चुनाव में श्री विजय कुमार सिन्हा के निर्वाचित होने पर बधाई।