हाल ही में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘लव जिहाद’ को लेकर अध्यादेश को मंजूरी दी। इसी कड़ी में भाजपा शासित मध्य प्रदेश सरकार ने भी एक बड़ा ऐलान किया है। बुधवार (25 नवंबर 2020) को मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने कहा कि शादी में धर्मांतरण का दबाव बनाने का दोषी पाए जाने पर पूरे 10 वर्ष की सज़ा का प्रावधान होगा। ‘धर्म स्वतंत्रता विधेयक’ 2020 का उल्लेख करते हुए मध्य प्रदेश के गृह मंत्री और संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इस विधेयक के संबंध में विस्तार से जानकारी दी।
गृह मंत्री ने इस विधेयक की जानकारी देते हुए कहा कि प्रदेश सरकार ने शादी में धर्मांतरण का लालच देने, धमकाने और दबाव बनाने पर 10 साल की सज़ा का प्रावधान होगा। इस विधेयक का मसौदा दिसंबर के दूसरे हफ्ते के दौरान मंत्रिपरिषद के सामने रखा जाएगा, जिसे 28 दिसंबर 2020 से शुरू होने वाले सत्र के दौरान मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश किया जाना है।
धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के ड्राफ्ट में बहला-फुसलाकर,डरा-धमकाकर धर्मांतरण के लिए विवाह करने पर 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया है।इस तरह की शादी-निकाह कराने वाले धर्म गुरु,काजी-मौलवी,पादरी को भी 5 साल की सजा होगी। ऐसी शादियां कराने वाली संस्थानों का पंजीयन भी निरस्त किया जाएगा। pic.twitter.com/UYztUzdaF1
इसके बाद गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा, “विधेयक के अंतर्गत उन मौलवियों, काज़ियों, पादरियों और पुजारियों के लिए 5 साल की सज़ा का प्रस्ताव पेश किया जाएगा, जो इस तरह के विवाह संपन्न कराते हैं। इसके अलावा ऐसे विवाहों का आयोजन कराने वाली संस्थाओं का पंजीयन और डोनेशन भी रद्द हो जाएगा। इस विधेयक के तहत शादी में धर्मांतरण का लालच देने, धमकाने और दबाव बनाने पर 10 साल की सज़ा का प्रावधान होगा। ऐसे मौलवी, पादरी या धर्म गुरु जो विवाह कराते हैं, उनके लिए इस विधेयक के मसौदे के तहत 5 साल की सज़ा का प्रावधान होगा, जो जिला दंडाधिकारी (कलेक्टर) की अनुमति के बिना ऐसे आयोजन कराते हैं।”
गृह मंत्री ने यह भी कहा कि विधेयक के तहत संबंधित पक्षों को शादी के लिए धर्मांतरण करने के पहले जिलाधिकारी को एक आवेदन देना होगा। शादी के लिए धर्मांतरण कराने वाले व्यक्ति (महिला-पुरुष) और इस प्रक्रिया से जुड़े धार्मिक व्यक्ति को एक महीने पहले कलेक्टर से अनुमति लेनी होगी।
इस विधेयक के किसी भी प्रावधान का उल्लंघन पूरी तरह गैर जमानती और संज्ञेय होगा। ऐसे व्यक्ति जो इस तरह की शादियों में मदद करते हैं, उन्हें भी दोषी माना जाएगा। अभियुक्त को खुद सिद्ध करना होगा कि उसने बिना किसी दबाव या धमकी के धर्मांतरण किया है। यह अध्यादेश के रूप में नहीं जाएगा, सबसे पहले इसे मंत्रिपरिषद के सामने प्रस्तुत किया जाएगा और वहाँ से पास होने के बाद इसे विधानसभा में विधेयक के रूप में लाया जाएगा।
इसके पहले बुधवार (नवंबर 25, 2020) को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक सभा में राज्य में लव जिहाद के कानून पर बड़ा बयान दिया था। उमरिया में जन-जातीय गौरव सम्मान समारोह में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लव-जिहाद के मुद्दे पर आक्रोश दिखाया था। उन्होने कड़े शब्दों में कहा था, “मैं मध्यप्रदेश की धरती पर ‘लव जिहाद’ किसी भी कीमत पर नहीं चलने दूँगा। उसके लिए हम कानून बना रहे हैं। यह देश को तोड़ने का षड्यंत्र है, इसे किसी भी कीमत पर हम कामयाब नहीं होने देंगे।”
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री व बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने बुधवार (नवंबर 25, 2020) को लालू प्रसाद यादव पर भाजपा विधायकों को लालच देकर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए (NDA) की सरकार को गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया था। इसके लिए लालू से बीजेपी MLA ललन पासवान की बातचीत का ऑडियो सहित एक के बाद एक कई ट्वीट किए थे। इसी क्रम में उन्होंने एक ट्वीट में लालू यादव का नंबर शेयर भी कर दिया था, जिस नंबर से फोन आया था। अब मामला यह है कि भाजपा नेता द्वारा किए गए इस ट्वीट को ट्विटर ने हटा दिया है।
सुशील मोदी ने अपने ट्वीट में कहा था कि जब उन्होंने वापस उस नंबर को मिलाया तो लालू प्रसाद यादव ने सीधे फोन उठाया था। जिसके बाद उन्होंने जवाब दिया था कि यह गंदा खेल सफल नहीं होगा। नीचे स्क्रीनशॉट में आप देख सकते हैं कि इस ट्वीट को डिलीट करते हुए ट्विटर ने क्या टिप्पणी की है।
साभार -न्यूज़ 18
ऐसा करने की वजह ट्विटर ने यह बताया है कि, इस ट्वीट में मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर नियमों का उल्लंघन किया गया है, इसलिए इसे हटा दिया गया है। बता दें कि सुशील कुमार मोदी ने राँची जेल में सजा काट रहे राजद सुप्रीमो लालू यादव का मोबाइल नंबर शेयर करते हुए कहा था कि वह इसी नंबर से फोन कर एनडीए विधायकों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
लालू राजग विधायकों को फोन कर मंत्री पद का लोभ दे रहे, मैंने रिंग बैक कर कहा गंदा खेल बंद करें… pic.twitter.com/h64OSl4Mah
गौरतलब है कि बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने लालू यादव पर विधायकों को मंत्री पद का प्रलोभन देने का आरोप लगाया था। कल बिहार विधानसभा में स्पीकर के चुनाव से पहले उन्होंने यह दावा किया था। बता दें कि स्पीकर पद के लिए राजग की तरफ से विजय कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया था, वहीं महागठबंधन ने अवध बिहारी को उम्मीदवार बनाया था।
लालू यादव ने दिखाई अपनी असलियत
लालू प्रसाद यादव द्वारा NDA के विधायक को बिहार विधान सभा अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव में महागठबंधन के पक्ष में मतदान करने हेतु प्रलोभन देते हुए। pic.twitter.com/LS9968q7pl
सुशील कुमार मोदी ने बातचीत का ट्रांसक्रिप्ट भी जारी किया था जिसे आप नीचे देख सकते हैं। ट्वीट में सुशील मोदी ने दावा किया था कि लालू प्रसाद यादव ने बीजेपी MLA को मंत्री पद का लालच देकर स्पीकर के चुनाव से पीछे हटने की सलाह दी और उनका समर्थन करने को कहा था।
वहीं बाद में बीजेपी विधायक ललन पासवान ने भी दावा किया था कि उऩके पास लालू यादव का फोन आया था। भागलपुर की पीरपैंती सीट से चुनकर आए ललन पासवान ने ऑडियो के आधार पर दावा किया था कि लालू यादव ने उन्हें फोन कर मंत्री पद का ऑफर देते हुए सरकार गिराने की बात कही थी। हालाँकि, मामला वायरल होने के बाद राजद ने इस दावे को गलत बताया था।
तमाम व्यवधानों के बीच बीजेपी उम्मीदवार के चयनित होने पर बाद में सुशील मोदी ने बधाई देते हुए ट्वीट किया, “लालू प्रसाद की साज़िश को NDA ने नाकाम कर दिया। बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद के चुनाव में श्री विजय कुमार सिन्हा के निर्वाचित होने पर बधाई।
लालू प्रसाद की साज़िश को NDA ने नाकाम कर दिया ।बिहार विधान सभा के अध्यक्ष पद के चुनाव में श्री विजय कुमार सिन्हा के निर्वाचित होने पर बधाई ।@ZeeBiharNews@News18Bihar@ANI
तारीख थी: 26 अक्टूबर 2020। बिहार में घूमते हुए मुझे एक पखवाड़ा हो गया था। पहले चरण का चुनाव नहीं हुआ था। लेकिन, समझ में आ गया था;
पहले चरण में एनडीए को खासा नुकसान हो रहा है
महागठबंधन बहुमत से पीछे रह जाएगी
हालाँकि, ऐसा कोई सूत्र हाथ नहीं लगा था, जिससे दिमाग के साथ-साथ दिल को भी यह सुकून हो कि मैं जो सोच रहा हूँ, वही सत्य है। अब तक की यात्रा में मुझे श्रेयसी सिंह, एकमात्र ऐसी उम्मीदवार मिली थीं जिनकी जीत के लिए मैं 110 फीसदी आश्वस्त था। दामोदर रावत, सुमित सिंह, विजय सिन्हा, प्रह्लाद यादव, चेतन आनंद जैसों की जीत के लिए 80 से 90 फीसदी आश्वस्त था। अब तक की यात्रा में मात्र एक उम्मीदवार मिले थे जो खुद अपनी जीत के प्रति 110 फीसदी आश्वस्त थे। ये थे गया शहर से बीजेपी के उम्मीदवार प्रेम सिंह। इसके अलावा जितने भी एनडीए, खासकर बीजेपी के उम्मीदवार मिले सबने ऑफ द रिकॉर्ड कहा कि इस बार मुकाबला कड़ा है। मोदी जी की सभा के बाद माहौल बदलने की उम्मीद है।
ऐसे माहौल में मैं 26 अक्टूबर 2020 को दरभंगा शहर से बीजेपी के उम्मीदवार संजय सरावगी से मिला था। वे भी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं थे। मोदी की रैली के आसरे थे। दरभंगा में घूमने पर आपको भी एहसास हो जाता कि सरावगी का डर हवा-हवाई नहीं था।
दरभंगा से मैं उसी दिन दोपहर बाद हसनपुर के लिए निकला। हाइवे पर डेढ़-दो किमी चलने के बाद हमने गाड़ी दाईं तरफ नीचे की एक सड़क पर उतार दी। यह हमारे प्लान का हिस्सा नहीं था। असल में केवटी सीट पर जाना कभी भी हमारे प्लान में नहीं था। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि यह सीट बीजेपी को मिली है। मेरे पास जो जानकारी थी, उसके हिसाब से बीजेपी ने यह सीट वीआईपी को दे दी है। वीआईपी की तरफ से हरि सहनी जो दरभंगा बीजेपी के अध्यक्ष भी रहे हैं, उम्मीदवार होंगे।
इस सीट से पिछली बार राजद के फराज फातमी विधायक चुने गए थे। वे चुनाव से पहले जदयू में आ गए थे और अपनी सीट बदल ली थी। असल में फातमी ने जब राजद को आँखें दिखानी शुरू की, तब से ही यहाँ राजद के बड़े नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी सक्रिय हो चुके थे। सिद्दीकी की छवि अली अशरफ फातमी की तरह कट्टर भी नहीं है। सो, राजनीति की सामान्य समझ कहती थी कि अब्दुल बारी सिद्दीकी ही जीतेंगे।
वैसे भी इस सीट से गैर मुस्लिम तीन बार ही जीते थे। बीजेपी का उम्मीदवार तो एक बार केवल 29 वोट से जीत पाया था। इस सीट के समीकरण भी ऐसे हैं कि एक ब्राह्मण उम्मीदवार के जीतने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में मेरे पास यह जानकारी आई कि बीजेपी ने यहाँ से एक ब्राह्मण उम्मीदवार उतारा है। यह भी कि दरभंगा से किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं देने को लेकर नाराजगी की खबर जब बीजेपी शीर्ष नेतृत्व को मिली तो उसने वीआईपी से यह सीट वापस ले ली। हरि सहनी को चुनाव लड़ने से मना कर दिया और मुरारी मोहन झा को उतारा। यह भी पता चला कि सीट वापस लेने से लेकर मुरारी मोहन झा को उम्मीदवार बनाने तक का फैसला खुद अमित शाह ने किया है।
इस जानकारी के बाद पहला सवाल दिमाग में आया यह मुरारी मोहन झा कौन हैं? मधुबनी-दरभंगा के एक नेता जिस मुरारी मोहन झा के बारे में मुझे पता था वह कॉन्ग्रेस में थे। जब मधुबनी के सांसद रहे शकील अहमद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हुआ करते थे तो एक बार दिल्ली यात्रा के दौरान उनके आवास पर ही झा जी को देखा था। मुझे बहुत प्रभावशाली नहीं लगे थे। उसके बाद मैंने उनके बारे में कभी सुना भी नहीं और उनमें ऐसा कुछ खास लगा भी नहीं था, जिससे आप किसी से मिलने के बाद उसके संपर्क में रहना चाहें या उसके बारे में सूचनाएँ जुटाते रहें।
इस सवाल का जवाब फौरन मिल गया। पता चला ये वही मुरारी मोहन झा हैं। करीब 5 साल पहले ही बीजेपी में आए हैं। यह भी पता चला कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उन्हें ही मधुबनी सीट का प्रभारी बनाया था और अशोक यादव रिकॉर्ड अंतर से जीते थे। इतना कुछ जानने के बाद ‘झा प्रेम’ में मैंने आधे घंटे के लिए केवटी जाने और मुरारी मोहन झा से मिलने का फैसला रास्ते में ही किया था। इसलिए हसनपुर जाते वक्त हमने अपनी गाड़ी हाइवे से उतार ली थी।
हाइवे से उतरते ही एक सड़क पर कुछेक सौ मीटर चलने पर बीजेपी का कार्यालय है। यूँ तो बीजेपी के दफ्तर अब आलीशान होते हैं, लेकिन इस दफ्तर की हालत से पता चल रहा था कि अभी निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। यहाँ तक कि हाइवे से कार्यालय तक जाने की कुछेक सौ मीटर का रास्ता भी दुरुस्त नहीं था। कार्यालय से पता चला कि मुरारी मोहन झा क्षेत्र में जनसंपर्क कर रहे हैं और कार्यालय वापस नहीं आएँगे। हमने उन्हें क्षेत्र में ही फटाक से पकड़ने, फटाफट एक इंटरव्यू कर वापस हसनपुर लौटने का फैसला किया।
उनकी तलाश में हम हाजीपुर चौक की तरफ गए। पता चला कि वहाँ वे एक बैठक के लिए आने वाले हैं। हमारे पहुँचने के थोड़ी देर बाद उनका भी काफिला आया। बैठक शुरू हुआ। झा जी मुझे किसी भी तरह से प्रभावशाली नहीं लग रहे थे। मैं बैठक से दूर हटकर सड़क किनारे खड़ा हो गया। मन ही मन केवटी आने के अपने फैसले को कोस रहा था।
इसी दौरान नशे में धुत दो-तीन लोग जहाँ हम खड़े थे वहीं बगल में आकर खड़े हो गए। वे आपस में बात करने लगे- ललुआ के सब आदमी अकरा संगे लाइग गेल छै। यानी, लालू के सभी लोग इसके साथ लगे हुए हैं। शराबबंदी वाले राज्य में नशे में धुत लोगों की बात पर भरोसा कर लेना या उन्हें ज्यादा कुरेदना सही नहीं लगा। मैं वहाँ से आगे बढ़ गया। चौक पर कुछ लोगों से बात की। कुछ दुकानदारों को भी टटोला। इससे पता चला कि नशे में धुत लोग गलत नहीं थे। पता चला कि मुरारी मोहन झा ट्रांसपोर्ट का व्यवसाय करते हैं। सज्जन आदमी हैं। मुसीबत के वक्त इलाके के लोगों के सालों से काम आते रहे हैं। यह भी कि उस बैठक में मौजूद ज्यादातर लोग कॉन्ग्रेस और राजद के ही स्थानीय नेता-कार्यकर्ता हैं।
इतनी सूचना हाथ लगने के बाद अब ‘झा प्रेम’ के अलावा एक और दबाव काम करने लगा। राजनीति में ऐसे कम ही लोग दिखते हैं जिनकी सज्जनता की जमीन पर इतनी चर्चा हो। सो, दोबारा से फैसला किया कि इस आदमी का एक इंटरव्यू तो कर ही लेंगे। लेकिन, तब तक अँधेरा हो चुका था। हम जहाँ खड़े थे वहाँ इतनी रोशनी नहीं थी कि इंटरव्यू शूट किया जा सके। बैठक समाप्त होने के बाद हमने झा जी से समय का आग्रह किया। बातचीत से लगा कि वे बहुत इच्छुक नहीं हैं। शायद बोलने की अपनी क्षमता को वे बखूबी जानते होंगे, इसलिए सवाल-जवाब से बचना चाह रहे हों। हमारे काफी आग्रह करने और यह बताने पर कि हमें रोशनी की जरूरत होगी वे अपना जनसंपर्क पूरा कर वापस कार्यालय आने के लिए राजी हो गए।
मैं भी बीजेपी दफ्तर लौट आया। मच्छरों के बीच झा जी का इंतजार हो रहा था। झा जी आए। दफ्तर में रोशनी तो थी, लेकिन बैकग्राउंड सही नहीं था। हमारे साथी मुरली जी ने तय किया कि कैंपस में ही शूट करेंगे, मच्छरों को थोड़ी देर बर्दाश्त करना पड़ेगा। इंटरव्यू शुरू हुआ तो लाइट चली गई। जेनरेटर शुरू किया गया तो इतना शोर होने लगा कि शूट करना संभव नहीं था। जेनरेटर बंद करवा कर मुरली जी ने गाड़ियों की हेडलाइट जलवाई। अब सारे कीड़े-मकोड़ों के टार्गेट पर मैं और झा जी थे। मुँह खोलते ही दो-चार प्रवेश कर जाते। एक लाइन भी पूरा नहीं कर पाया। धैर्य जवाब दे गया। झा जी के साथियों ने कहा कि आप सुबह इंटरव्यू कर लीजिएगा। लेकिन, छह घंटे से ज्यादा बर्बाद करने के बाद हम और समय जाया नहीं करना चाहते थे, एक ऐसी सीट और एक ऐसे उम्मीदवार पर जिसका नतीजा हमें पहले से पता था। इसलिए कार्यालय के अंदर एक कमरा जिसमें खाना बनता था वहाँ हमने दो कुर्सी रखने की जगह बनाई। पीछे कार्यालय में लगे कुछ पोस्टर डाल दिए। किसी तरह इंटरव्यू खत्म किया।
रात के 12 बज चुके थे। हम हाइवे पहुँचे। रहने का ठिकाना खोजा। खाने का जुगाड़ किया। इन सब चक्कर में डेढ़ बज गए। सुबह 5 बजे हसनपुर के लिए निकलना था। मुरली जी और सूरज जी सो गए। मैं बार-बार उस इंटरव्यू को देख रहा था जिसे हम शूट करके लाए थे।
अब मैं एक नए सवाल से जूझ रहा था। इसे अपने संपादक अजीत भारती के पास दिल्ली भेजूँ या नहीं? यह इंटरव्यू किसी भी लिहाज से प्रभावशाली नहीं था। मेरा दावा था कि यह सीट और यह उम्मीदवार अमित शाह ने विशेष रूप से चुना है, लेकिन उम्मीदवार के जवाब अमित शाह की प्रभावशाली छवि से मेल नहीं खा रहे थे। एक तरफ कागज पर केवटी के समीकरण थे और यहाँ आने से पहले मैं भी उसे ही सत्य मान रहा था और अब यहाँ सुनी सज्जनता की कहानियाँ, दिल्ली में बैठा आदमी शायद ही जिस पर विश्वास करें। यह डर था कि संपादक इसे मेरा ‘झा प्रेम’ समझेंगे, जिसके कारण मैं अक्सर भावुक हो जाता हूं और जिससे वे भली-भाँति परिचित भी हैं। लेकिन जितनी बार इस इंटरव्यू को देखता बार-बार अहसास होता कि इसमें एक ईमानदारी तो है। एक सज्जन व्यक्तित्व को केवल इसलिए ही अनदेखा नहीं किया जा सकता, क्योंकि आज मेरे पास अपनी बात साबित करने के लिए कोई तथ्य नहीं है। इसी उधेड़बुन में सुबह के 5 बज गए। मुरली जी और सूरज जी को उठाया। हम हसनपुर निकलने की तैयारियों में लग गए। गाड़ी में बैठते ही मुरली जी से कहा कि इसे एडिट कर रास्ते से ही भेज देना है।
हमने उसे दिल्ली भेज दिया। वह इंटरव्यू हमारे संपादक ने बिना किसी सवाल-जवाब के जारी भी कर दिया। मेरी यात्रा भी चलती रही। लेकिन, मुरारी मोहन झा की सज्जनता के बारे में सुनी कहानियाँ मेरे दिमाग से नहीं निकल रही थी। मन कह रहा था कि इस सीट पर चमत्कार होगा। दिमाग कह रहा था अब्दुल बारी सिद्दीकी भारी अंतर से जीतेंगे। तय किया कि आखिरी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले इस सीट पर दोबारा जाऊँगा (अपनी पूरी यात्रा में मैं किसी भी सीट पर दोबारा नहीं गया)। हालाँकि केवटी सीट तब भी लिखकर विपक्ष के खाते में ही रखा था।
31 अक्टूबर को केवटी के कुछ गाँव में घूमा। हर जगह एक सी बातें। दिल और दिमांग में द्वंद्व चलता रहा। अब मैं इस उम्मीदवार और इस सीट के बारे में खूब बात करना चाहता था। फेसबुक पर लिखना चाहता था। लेकिन डर रहा था। उम्मीदवार के नाम में ‘झा’ होना मुझे डरा रहा था। मुझे डर लग रहा था कि लोग मेरे काम में मेरी जाति खोजने लगेंगे। मन में द्वंद्व चलता रहा। लेकिन यह सीट मेरे नोटबुक में अब भी राजद के ही खाते में थी।
दूसरे जगहों पर घूमता रहा पर केवटी दिमाग से निकल नहीं रहा था। 2 नवंबर की सुबह निकला जाले के लिए पर चला गया केवटी। पता चला कि नित्यानंद राय की एक सभा होनी है। उधर के लिए ही निकल गया। रास्ते में एक जगह रास्ता पूछने उतरा। बगल के खेत में बाँस-बल्ली लग रहे थे। एक यादव जी मिले। राजद के स्थानीय नेता थे। बताया कि कल तेजस्वी यादव की रैली होनी है उसकी तैयारी चल रही है। उनसे बतियाने लगा। चुनावी माहौल पूछने लगा। इधर-उधर की बातें काफी देर तक होती रही। जब चलने के लिए उठा तो यादव जी बोले- “यहाँ से झा जी जीत जाएँगे। जादव (यादव) का भी वोट उनको मिलेगा।” पैर थम गए। कारण पूछा तो जवाब मिला- “आप भी तो इधरे के ही हैं न। आदमी केतना बढ़िया हैं जानते ही होंगे। वे तो केवटी से टिकट भी नहीं चाहते थे। ये उनका इलाका भी नहीं है। लेकिन, इधर के लोगों को भी जब संकट में मदद का जरूरत पड़ा है वे किए हैं। पूरा इलाका में कोई आदमी नहीं मिलेगा जिसको मुरारी मोहन झा ने दिक्कत-परेशानी में मदद नहीं किया हो।”
अब एक और सवाल था यह दरभंगा के भाजपाइयों से बात करके खड़ा हुआ था। भाजपा के इन नेताओं का दावा था कि बढ़िया छवि के बावजूद मुरारी मोहन झा नहीं जीतेंगे। वे इसका कारण मधुबनी के सांसद अशोक यादव को बता रहे थे। इन नेताओं का कहना था कि अशोक यादव को मुरारी मोहन झा हर जगह आगे रखते हैं, इसके कारण यादव लोग उनके साथ नहीं आ रहा है। असल में अशोक यादव केवटी से दो बार विधायक रहे थे और यहाँ पर उनको लेकर एक नाराजगी खासकर उनके स्वजातीय मतदाताओं में हमें भी दिखी थी। कई जगहों पर उनका प्रचार के दौरान विरोध भी हुआ था।
यही सवाल मैंने राजद वाले यादव जी से किया। उनका जवाब था- “हाँ, अशोक जादव का विरोध है। कल भी खूब बवाल हुआ है। इसलिए तो झा जी का जीतना जरूरी है। एक बार दूसरा आदमी जीत गया तो हुकुमदेव (अशोक यादव के पिता और पूर्व सांसद हुकुमदेव नारायण यादव) के बाल-बच्चा को पता चल जाएगा कि केवटी का जादव लोग उसका गुलाम नहीं है। हम लोग दो बार उसको जिताए माथा पर चढ़कर #@ने लगा। जब से सांसद बना है ज्यादा हवा में रहता है। इस बार उसको बिसरा देंगे कि अब केवटी से उसके खानदान का कभी कोई विधायक बनेगा। इस बार झा जी जीत गए तो बीजेपी बाला उसके परिवार के किसी को टिकटो देगा? ई सीट उसके हाथ से निकल गया है, बुझ जाइए।”
इसके बाद यादव जी ने अपना एक कार्यकर्ता भी हमारी गाड़ी में बिठा दिया। कहा ले जाइए इसको वहाँ तक पहुँचा देगा। यादव लोगों का एकाध गाँव भी घूमा देगा। खुद समझ जाइएगा कि हवा किधर है। हम ने वह सभा कवर की। काफी लोगों से बात की। उस छोटी सी सभा से एहसास हो गया कि यादव जी सही कह रहे हैं। माई समीकरण टूट चुका है। योगी की सभा होनी बाकी थी, जिससे गोलबंदी और मजबूत होने की उम्मीद थी।
अब मैं एनडीए के आगे होने को लेकर 110 फीसदी आश्वस्त था। केवटी से निकलकर जाले पहुँचते- पहुँचते रात हो गई। वह रात जैसे-तैसे काटी। सोने का न समुचित ठिकाना मिला और न खाना। ज्यादा दूर नहीं जाना चाहता था, क्योंकि एक ही शख्स के पास दोबारा टाइम से नहीं पहुँच पाने का खतरा होता। अगले दिन यानी 3 नवंबर को जाले में पूरा दिन काम कर हम शाम में मधुबनी पहुँचे। दूसरे चरण का मतदान हो चुका था। अलग-अलग जगहों से सूचनाएँ इकट्ठा कर रहा था। सबसे हैरान करने वाली जानकारी मेरे लिए राजनगर से थी। जिस रामप्रीत पासवान को कल तक हारा हुआ मान रहा था, वह जीत रहे थे। मधुबनी सीट से सुमन महासेठ अचानक फाइट में मतदान के बाद दिखने लगे थे। सोने से पहले केवटी सीट राजद के खाते से काटकर एनडीए में डाल दी थी।
उस रात मुझे गहरी नींद आई थी। 4 तारीख को मैं होटल से भी बाहर नहीं निकला (यात्रा शुरू होने के बाद पहला दिन था जब मैं कहीं नहीं गया)। मैं आश्वस्त हो चुका था कि एनडीए को ही बहुमत मिलेगी। मैं महसूस कर रहा था कि एक मुश्किल चुनाव के सारे सूत्र पकड़ में आ चुके हैं। मुश्किल सीटें केवटी, बिस्फी और जाले से बीजेपी जीत रही है। दरभंगा और मधुबनी में मोदी-योगी फैक्टर काम कर चुका है। तेजस्वी को नतीजों के बाद ही अहसास होगा कि वे बाजी 28 के बाद ही हार गए थे। कुल मिलाकर वे सभी बिंदू जिनकी चर्चा 4 नवंबर की शाम संपादक अजीत भारती के साथ लाइव चर्चा में की थी।
केवटी नहीं जाता तो शायद एग्जिट पोल के बाद मैं भी बदल जाता। लेकिन, जब भी मन में कोई संदेह पैदा होता केवटी नाचने लगता। मैंने केवटी में जो महसूस किया उसे शब्दों में बता पाना संभव नहीं है।
उत्तर प्रदेश में राजनीतिक रूप से पिछड़ गई कॉन्ग्रेस के लिए एक बुरी खबर है। लखनऊ स्थित कॉन्ग्रेस ऑफिस में वहाँ काम करने वाले कर्मचारियों ने ही ताला लटका दिया है। इसके पीछे जो वजह मीडिया रिपोर्टों में बताई जा रही है, वो है – कर्मचारियों को कई महीनों से वेतन नहीं मिलना।
कॉन्ग्रेस के लखनऊ ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारियों ने न सिर्फ कार्यालय में ताला लटकाया है बल्कि वो सभी धरने पर भी बैठ गए हैं। अपने ही ऑफिस के सामने धरने पर बैठे इन कर्मचारियों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
इस मामले पर फजीहत से बचने के लिए पार्टी ने फटाफट अपने कार्यकर्ताओं और प्रभारी को इन कर्मचारियों के पास भेजा है। राजनीतिक अफरातफरी देखते हुए मौके पर बड़ी संख्या में पुलिसबल भी तैनात किया गया है।
कॉन्ग्रेस के लखनऊ ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारी फिलहाल अपनी माँगों पर अड़े हुए हैं। कर्मचारियों का प्रदर्शन जारी है। इस प्रदर्शन को लेकर राजनीति होनी तय है। क्योंकि कुछ मीडिया रिपोर्ट में इसे ऑफिस के बिजली-पानी काटे जाने के खिलाफ किया जा रहा प्रदर्शन भी बताया जा रहा है।
यह भी बताया जा रहा है कि कॉन्ग्रेस के लखनऊ ऑफिस में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है, जिसकी वजह से ताला लगाया गया है। लेकिन कर्मचारियों का कहना है कि यह मामला वेतन कटौती से ही जुड़ा है।
वैसे तो सुशील मोदी पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव थे। लालू प्रसाद यादव अध्यक्ष। लेकिन, सुशील मोदी की सियासी हैसियत को नीचा दिखाने के लिए अपने पूरे राजनीतिक जीवन में लालू यादव सार्वजनिक मंचों से उन्हें अपना सेक्रेटरी और जूनियर बताते रहे। पर दिलचस्प यह है कि लालू के सियासी जीवन की हर बड़ी मुश्किलों की वजह सुशील मोदी ही रहे हैं।
चाहे वह ताजा मामला जेल से बीजेपी विधायकों को फोन करने का आरोप लगाने का हो या 2017 में लालू परिवार की बेनामी संपत्ति को लेकर लगातार 44 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का (जिसकी परिणति महागठबंधन सरकार गिरने के रूप में हुई) या फिर 1996 में चारा घोटाले की सीबीआई जॉंच को लेकर पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर करना (जिस मामले की वजह से न केवल लालू की मुख्यमंत्री कुर्सी गई, बल्कि आज भी वे जेल की सजा काट रहे हैं)। अब एक बार फिर बीजेपी उनके खिलाफ हाईकोर्ट में पीआईएल दाखिल करने जा रही है।
सुशील मोदी के ताज़ा दावे ने न केवल उन्हें बिहार की राजनीति में अचानक प्रासंगिक बना दिया है, बल्कि इससे जमानत हासिल करने की लालू यादव की उम्मीदों को भी झटका लगा है। वैसे बिहार की सियासत में नतीजों के आने से बाद ही दबी जुबान यह चर्चा चल रही थी कि लालू यादव ने समर्थन के लिए मुकेश सहनी और जीतनराम मांझी को फोन किया है। लेकिन, सच यह भी है कि सुशील मोदी द्वारा आरोप लगाए जाने से पहले तक यह बहस का मुद्दा नहीं बन पाया था।
लालू यादव ने दिखाई अपनी असलियत
लालू प्रसाद यादव द्वारा NDA के विधायक को बिहार विधान सभा अध्यक्ष के लिए होने वाले चुनाव में महागठबंधन के पक्ष में मतदान करने हेतु प्रलोभन देते हुए। pic.twitter.com/LS9968q7pl
जेपी आंदोलन ने बिहार को जो राजनीतिक सितारे दिए उनमें से चार के इर्द-गिर्द ही बिहार की राजनीति 1990 से घूमती रही है। ये हैं- लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, हाल ही में दिवंगत हुए रामविलास पासवान और सुशील मोदी। इनमें लालू प्रसाद यादव और सुशील मोदी इन तीन दशकों में हमेशा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ही रहे। नीतीश और रामविलास कभी लालू के साथ रहे तो कभी उनके खिलाफ रहे।
2015 के विधानसभा चुनावों से पहले जब लालू और नीतीश साथ आ गए थे तब सुशील मोदी को खारिज करने के लिए लालू उन्हें नीतीश कुमार का स्टेपनी बताते थे। 2017 में प्रवेश करते ही इसी स्टेपनी ने राजद का टायर पंचर कर वह रास्ता तैयार किया था कि नीतीश लालू को झटका दे फिर से एनडीए में लौट आएँ। बिहार में लालू के एकछत्र राज्य को समाप्त करने में नीतीश कुमार के जमीनी आधार का जितना योगदान माना जाता है, उससे कम सुशील मोदी के सियासी कौशल का भी योगदान नहीं रहा है।
अब भले बिहार बीजेपी ने सुशील मोदी के चेहरे से अलग होकर राज्य की सियासत में आगे बढ़ने का फैसला किया हो, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी से लेकर नीतीश के कैबिनेट तक हर जगह उनकी छाप आज भी दिखती है। विधानसभा अध्यक्ष चुने गए विजय सिन्हा वही नेता हैं जिनके विरोध में बीजेपी के पटना कार्यालय में टिकट वितरण से पहले कार्यकर्ताओं ने सुशील मोदी की गाड़ी घेर ली थी। मीडिया में इस घटना के छाने के बावजूद न तो विजय कुमार सिन्हा का टिकट कटा और न टिकट वितरण में सुशील मोदी का प्रभाव कम हुआ।
सुशील मोदी के इस असर को लालू ने भले कभी नहीं माना हो पर नीतीश कुमार इसकी ताकत खूब समझते हैं।
संविधान दिवस के मौके पर आज (नवंबर 26, 2020) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया। उन्होंने गुजरात के केवड़िया में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपना संबोधन देते हुए कई मुद्दों पर राय रखी। इस दौरान उन्होंने 26/11 हमले में मारे गए जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही उन सभी सम्मानित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया जिन्होंने संविधान को बनाने में योगदान दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस संबोधन में एक राष्ट्र और एक चुनाव (One Nation, One Election) पर बात की। उन्होंने कहा कि यह केवल विमर्श का विषय नहीं है बल्कि देश की जरूरत है। इससे विकासात्मक कार्य बाधित होता है, जिसके बारे में सब जानते हैं। उन्होंने कहा कि लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों के लिए एक लिस्ट का इस्तेमाल होना चाहिए। अब क्यों पैसा और समय इन पर बर्बाद कर रहे हैं?
Only one voter list should be used for Lok Sabha, Vidhan Sabha and other elections. Why’re we wasting time and money on these lists?
उन्होंने पूर्ण डिजिटाइजेशन पर जोर देते हुए कहा कि आम आदमी के पास हर सदन के कामकाज का डाटा होना चाहिए और देश के हर सदन के पास भी ऐसा डाटा होना चाहिए। उन्होंने इस विषय पर सोचने को कहा कि कैसे युवा विधानसभा की चर्चा में बात कर सकता है।
The time for complete digitization is here.
The common man must have data for the functioning of every House and every House in the country should also have such data.
उन्होंने संविधान और कानून को लेकर भी अपने विचार रखे। पीएम ने कहा कि हमारे यहाँ बड़ी समस्या ये भी रही है कि संवैधानिक और कानूनी भाषा, उस व्यक्ति को समझने में मुश्किल होती है जिसके लिए वो कानून बना है। मुश्किल शब्द, लंबी-लंबी लाइनें, बड़े-बड़े पैराग्राफ, क्लॉज-सब क्लॉज, यानि जाने-अनजाने एक मुश्किल जाल बन जाता है।
हमारे यहां बड़ी समस्या ये भी रही है कि संवैधानिक और कानूनी भाषा, उस व्यक्ति को समझने में मुश्किल होती है जिसके लिए वो कानून बना है।
मुश्किल शब्द, लंबी-लंबी लाइनें, बड़े-बड़े पैराग्राफ, क्लॉज-सब क्लॉज, यानि जाने-अनजाने एक मुश्किल जाल बन जाता है।
प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे कानूनों की भाषा इतनी आसान होनी चाहिए कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी उसको समझ सके। हम भारत के लोगों ने ये संविधान खुद को दिया है। इसलिए इसके तहत लिए गए हर फैसले, हर कानून से सामान्य नागरिक सीधा कनेक्ट महसूस करे, ये सुनिश्चित करना होगा।”
उन्होंने बताया कि समय के साथ जो कानून अपना महत्व खो चुके हैं, उनको हटाने की प्रक्रिया भी आसान होनी चाहिए। बीते सालों में ऐसे सैकड़ों कानून हटाए जा चुके हैं।
इस संबोधन की शुरुआत में पीएम मोदी ने संविधान दिवस पर अधिकारियों की अध्यक्षता पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा आप सभी कानूनविद के रूप में, लोगों और राष्ट्र के बीच एक महत्तवपूर्ण कड़ी हैं। आप कार्यकारी, न्यायपालिका और विधायिका के बीच समन्वय को बेहतर बनाने में महत्तवपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
आज डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद और बाबा साहेब अंबेडकर से लेकर संविधान सभा के सभी व्यक्तित्वों को भी नमन करने का दिन है, जिनके अथक प्रयासों से देश को संविधान मिला है।
आज का दिन पूज्य बापू की प्रेरणा को, सरदार पटेल की प्रतिबद्धता को प्रणाम करने का दिन है।
अपनी बात रखते हुए पीएम ने डॉ राजेंद्र प्रसाद और बाबा अंबेडकर से लेकर सभा के सभी व्यक्तियों को नमन किया और इस दिन को महात्मा गाँधी की प्रेरणा और सरदार पटेल की प्रतिबद्धता को प्रणाम करने का दिन बताया। उन्होंने 26/11 में मारे गए जवानों को याद करते हुए आज आतंकी साजिश नाकाम करने के लिए सुरक्षाबल का वंदन किया।
आगे वैश्विक महामारी के समय में किस प्रकार जनता ने परिपक्वता का परिचय दिया, उसके लिए भी पीएम ने भारतीय संविधान के तीनों के अंगों को श्रेय दिया और कहा कि भारतीयों का संविधान के तीनों अंगों पर पूर्ण विश्वास है। इस विश्वास को बढ़ाने के लिए निरंतर काम भी हुआ है।
हमारे निर्णय का आधार एक ही मानदंड होना चाहिए और वो है राष्ट्रहित।
राष्ट्रहित ही हमारा तराजू होना चाहिए।
हमें ये याद रखना है कि जब विचारों में देशहित और लोकहित की बजाय राजनीति हावी होती है तो उसका नुकसान देश को उठाना पड़ता है।
वे बोले, “हमारे निर्णय का आधार एक ही मानदंड होना चाहिए और वो है राष्ट्रहित। राष्ट्रहित ही हमारा तराजू होना चाहिए। हमें ये याद रखना है कि जब विचारों में देशहित और लोकहित की बजाय राजनीति हावी होती है तो उसका नुकसान देश को उठाना पड़ता है।”
इस मौके पर पीएम मोदी ने सरदार सरोवर डैम पर बात की और कहा कि केवड़िया प्रवास के दौरान आपने विशालता देखी है, भव्यता देखी है, उसकी शक्ति देखी है। लेकिन इस डैम का काम बरसों तक अटका रहा। आजादी के कुछ वर्षों बाद शुरु हुआ था, अभी कुछ वर्ष पहले ये पूरा हुआ। जनहित का ये प्रोजेक्ट लंबे समय तक अटका रहा।
इसी बांध से पैदा हुई बिजली से मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र को लाभ हो रहा है।
ये सब बरसों पहले भी हो सकता था। लेकिन बरसों तक जनता इनसे वंचित रही।
जिन लोगों ने ऐसा किया, उन्हें कोई पश्चाताप भी नहीं है।
मनी लॉन्ड्रिंग केस की जाँच में जुटी प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने शिवसेना नेता प्रताप सरनाईक के सबसे करीबी दोस्त अमित चंदोल को गिरफ्तार कर लिया है। अमित की गिरफ्तारी टॉप्स ग्रुप सिक्योरिटी कंपनी में गलत तरीके से निवेश करने के मामले में कल देर शाम को हुई है। आज उन्हें पीएमएलए कोर्ट में पेश किया जाएगा। उनकी गिरफ्तारी से पहले उनसे 12 घंटे पूछताछ हुई थी। उनके घर से ईडी टीम ने कई दस्तावेज, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट भी जब्त किए। इस पूरे मामले में यह पहली गिरफ्तारी है।
#NewsAlert | ED arrests close aid of Shiv Sena MLA Pratap Sarnaik.
ED finds Rs 7 Crore traces of cash leading to Sarnaik.@Ashish_Mehrishi with the details.
टाइम्स नाऊ की खबर के अनुसार, साल 2014 में टाइम्स ग्रुप ने MMRDA (मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी ) को सुरक्षा गार्ड मुहैया करवाए थे। ईडी का कहना है कि नंदा की टॉप्स ग्रुप सिक्योरिटी से यह कॉन्ट्रैक्ट रिश्वत लेने के बाद हुआ था। कॉन्ट्रैक्ट 35 करोड़ रुपए का था और ईडी को सरनाईक से संबंधित 7 करोड़ रुपए की जानकारी मिली है, जिसे फिलहाल अवैध माना जा रहा है और अधिकारी इस पर जाँच कर रहे हैं।
रिपोर्ट बताती है कि इस डील में कुछ फायदा प्रताप सरनाईक को जाना तय हुआ था। इसके अलावा खास बात ये है कि टॉप्स ग्रुप और प्रताप सरनाईक के बीच इस डील को लेकर कोई लिखित कॉन्ट्रैक्ट नहीं हुआ था। केवल नियमित रूप से कैश की लेन-देन चल रही थी।
गौरतलब है कि ED ने मंगलवार को प्रताप सरनाईक के घर, उनके दफ्तरों और उनके कारोबारी सहयोगियों समेत 10 ठिकानों पर छापा मारा था। 175 करोड़ रुपए के मनी लॉन्ड्रिंग घोटाले में छापेमारी के बाद ED ने सरनाईक को पूछताछ के लिए तलब किया था। हालाँकि, मंगलवार की दोपहर उन्होंने राज्य सरकार के नियमों का हवाला देकर खुद को क्वारंटाइन कर लिया और पेश होने के लिए समय माँगा। इसके बाद उनके बेटे विहंग को हिरासत में लिया गया, जिनसे आज भी पूछताछ होनी है।
यहाँ बता दें कि पिछले दिनों मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा द्वारा टॉप्स ग्रुप के पूर्व कर्मचारियों की शिकायत पर कंपनी के प्रमोटर राहुल नंदा और दूसरे लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी।
इसी FIR के आधार पर ED ने ECIR दर्ज की थी। 28 अक्टूबर को दर्ज की गई FIR के मुताबिक टॉप्स ग्रुप ने मुंबई मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MMRDA) के साथ 175 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी की।
सरनाईक पर आरोप है कि नंदा का पुराना दोस्त होने के कारण उन्होंने इस कॉन्ट्रैक्ट को उन्हें दिलाने में मदद की और यह भी संदेह है कि सरनाईक की कंपनियों ने टॉप्स ग्रुप के जरिए पैसे विदेश भेजे।
ऑटो चालक से सरनाईक बने रियल स्टेट डेवलपर, संपत्ति में हुआ 800% की बढ़त
सरनाईक के बारे में बता दें कि 56 साल के शिवसेना नेता ठाणे में एक रियल एस्टेट डेवलपर हैं और मुंबई व आस-पास के होटल और क्लबों के हॉस्पिटलिटी इंडस्ट्री में भी कारोबार करते हैं। 1980 के दशक में वह ठाणे में ऑटोरिक्शा चलाते थे। उन्होंने 1984 से 1989 तक रिक्शा चलाकर अपना जीवन-यापन किया था। उस समय उन्होंने अपनी संपत्ति 16 करोड़ बताई थी। लेकिन 2019 विधानसभा चुनावों से पहले दायर अपने हलफनामे में उन्होंने 143 करोड़ रुपए की संपत्ति घोषित की। यानी कि 10 साल में उनकी संपत्ति में 800% की बढ़ोतरी हुई।
मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में हिस्ट्रीशीटर गुंडे ने सीतामऊ थाने के टाउन इंस्पेक्टर (टीआई) अमित सोनी पर गोली चलाई थी। जिसके बाद पुलिस ने उसके विरुद्ध कार्रवाई तेज कर दी, इसी कड़ी में मध्य प्रदेश पुलिस ने उसके कुछ रिश्तेदारों और साथियों (गुलशेर, गुलनवाज़ और युसूफ) को गिरफ्तार किया था। इसके बाद पुलिस ने इन अपराधियों का जुलूस निकाला, उनसे उठक बैठक लगवाई और जुलूस निकालने के दौरान उन पर डंडे भी बरसाए।
अमजद लाला मादक पदार्थों की तस्करी सहित विभिन्न अपराधों का आरोपित और 15 हज़ार का ईनामी बदमाश है। सोमवार (23 नवंबर 2020) को सीतामऊ पुलिस अमजद लाला को गिरफ्तार करने के लिए बेलारी गाँव पहुँची थी जहाँ अमजद अपने चचेरे भाई इमरान के घर के सामने ही खड़ा था।
टीआई अमित सोनी ने उसे पकड़ने का प्रयास किया जिससे बचने के लिए अमजद लाला ने मारपीट करने का प्रयास किया और बंदूक निकाल कर गोली चला दी। हालाँकि, इस घटना में टीआई अमित सोनी को मामूली खरोचें ही आई थीं। घटना के दौरान अमजद के साथियों ने भी हमला कर दिया जिसकी वजह से अमजद मौके से भागने में कामयाब हुआ था।
टीआई अमित सोनी की शिकायत के आधार पर बेलारी निवासी अमजद लाला, असगर, गुलशेर खान, कयूम खान, इमरान खान, युसूफ खान, समसू खान, बाबू खान, लतीफ़ खान, शाहनवाज़ खान, नीलोफर खान और एक अज्ञात के विरुद्ध मामला दर्ज किया था। इस घटना के बाद अमजद पर ईनाम की राशि बढ़ा कर 20 हज़ार कर दी गई थी।
पुलिस की इस कार्रवाई पर कई सवाल भी खड़े किए गए थे क्योंकि टीआई सिर्फ एक पुलिस आरक्षक के साथ दबिश देने पहुँचे थे। इस मामले पर एसडीओपी शेरसिंह भूरिया का कहना था कि अक्सर ऐसे मामले में तत्काल कार्रवाई करनी होती है, यह घटना ऐसी ही थी। इस घटना के बाद पुलिस ने अमजद लाला और उसके साथियों की खोजबीन का अभियान तेज़ कर दिया था।
तभी पुलिस को सूचना मिली कि अमजद लाला के 8 साथी दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस वे के नज़दीक एक कुँए पर छुपे हुए हैं। पुलिस ने उस जगह पर दबिश दी तो गुलशेर, गुलनावाज़ और युसूफ मौजूद थे और फिर पुलिस ने तीनों का जुलूस निकाला। उनसे उठक बैठक कराई और इस बीच लाठियों से पिटाई भी की। पुलिस की इस कार्रवाई के दौरान तीनों नारे भी लगा रहे थे, ‘अपराध करना पाप है पुलिस हमारी बाप है।’
पुलिस फ़िलहाल अमजद के तमाम ठिकानों पर लगातार छापे मार रही है। इस कार्रवाई में पुलिस ने भारी मात्रा में हथियार बरामद किए हैं, अमजद के रिश्तेदारों और और साथियों के ठिकानों पर की गई कार्रवाई के दौरान पुलिस को भारी मात्रा में अवैध हथियार और 18 लाख रुपए मिले। पुलिस अमजद की गिरफ्तारी के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है, इस घटनाक्रम के संबंध में पुलिस का कहना है कि आरोपित अमजद लाला को बहुत जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हिंसा का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। बीजेपी (BJP) ने दक्षिण दिनाजपुर में अपने बूथ अध्यक्ष स्वाधीन राय की हत्या का आरोप सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों पर लगाया है। बीरभूम जिले में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की सभा में शामिल होने जा रहे पार्टी कार्यकर्ताओं पर फायरिंग का आरोप भी टीएमसी पर लगा है। साथ ही काँचरापाड़ा में अपने कार्यकर्ता बाप्पा घोष की दुकान में आग लगाने का आरोप भी बीजेपी ने सत्ताधारी दल पर लगाया है।
Swadhin Roy, Booth President of Dakshin Dinajpur was brutally murdered by TMC goons. Mamata Banerjee's bloodthirsty crave for political power has lost control and murder is a ‘normal’ part of the political process for TMC! But this will not stop BJP from winning! pic.twitter.com/1tp2FHo6zZ
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दक्षिणी दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर में स्वाधीन राय एक सुनसान जगह पर मृत मिले। 45 साल के राय सब्जी कारोबारी और बीजेपी के बूथ अध्यक्ष थे। उनके शव के पास ही उनकी बाइक भी मिली। पुलिस ने उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है।
बलुराघाट के बीजेपी सांसद सुकांता मजूमदार ने स्थानीय टीएमसी गुंडों पर राय की हत्या का आरोप लगाया है। टीएमसी के जिला नेताओं ने इस आरोप को खारिज कर दिया है। टीएमसी के जिला संयोजक सुभाष चाकी ने बीजेपी पर गंदी राजनीति का आरोप लगाते हुए कहा कि किसी की भी मौत दुखद है। लेकिन इन दिनों बीजेपी नेता ऐसी हर घटना को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करते है। मामले की जाँच हो रही है और हम चाहते हैं कि सच सामने आए।
সিউড়ি বিধানসভায় গতকাল রাজ্য সভাপতি শ্রী দিলীপ ঘোষের সভায় যোগদান দিতে যাওয়ার সময় তৃণমূলের দুষ্কৃতী বাহিনী অতর্কিতে বিজেপি কর্মীদের উপর গুলি চালায়, আশঙ্কাজনক অবস্থায় অনেক হাসপাতালে ভর্তি।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार बीरभूम जिले में आयोजित एक सभा में शामिल होने जा रहे बीजेपी कार्यकर्ताओं की नानूर के शिमुलिया गॉंव के पास टीएमसी कार्यकर्ताओं से झड़प हो गई। इस दौरान बीजेपी कार्यकर्ताओं के वाहन पर कथित तौर पर पत्थर और देसी बम फेंके गए। पार्टी ने टीएमसी गुंडों की फायरिंग में अपने दो कार्यकर्ताओं के जख्मी होने की बात भी कही है।
उसी मुर्शिदाबाद में जहां मेरी गाड़ी को कुछ विशेष वर्ग के असामाजिक लोगों ने घेर लिया था। वही आज @BJP4Bengal के अध्यक्ष श्री @DilipGhoshBJP जी की गाड़ी पर भी पथराव हुआ।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने एक ट्वीट कर बताया है कि मुर्शिदाबाद में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की गाड़ी को कुछ विशेष वर्ग के असामाजिक लोगों ने घेर कर उस पर पथराव किया। बकौल विजयवर्गीय जब यह घटना हुई तब घोष की गाड़ी के पीछे ही एसपी की गाड़ी थी।
काँचरापाड़ा नगरपालिका के 12 नम्बर वार्ड में TMC के गुंडों ने कायरों की तरह आधी रात को बीजेपी कर्मी बाप्पा घोष की दुकान में आग लगा दी।
वहीं बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने पार्टी कार्यकर्ता बाप्पा घोष की दुकान में आग लगाए जाने का आरोप लगाया है। उन्होंने ट्वीट किया है, “काँचरापाड़ा नगरपालिका के 12 नम्बर वार्ड में TMC के गुंडों ने कायरों की तरह आधी रात को बीजेपी कर्मी बाप्पा घोष की दुकान में आग लगा दी। बीजपुर, भाटपाड़ा, नैहाटी, बैरकपुर, जगद्दल, नोआपाड़ा सब जगह TMC के गुंडे सत्ता हाथ से निकलते देख पागल हो रहे हैं।”
गौरतलब है कि पिछले कुछ महीनों से टीएमसी के गुंडों पर लगातार बीजेपी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के आरोप लग रहे हैं। कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए बीजेपी नेता राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर विधानसभा चुनाव करवाने की मॉंग भी कर चुके हैं।
पाकिस्तान को आए दिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत का सामना करना पड़ता है। आगामी 27 और 28 नवंबर को दुनिया के कई मुस्लिम आबादी वाले देशों के संगठन ‘आर्गेनाईजेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) की बैठक होनी है। इन देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक के पहले ही पाकिस्तान को बड़ा झटका देते हुए संगठन ने तय किया है कि वह ‘कश्मीर मुद्दे’ को अपने एजेंडे में शामिल नहीं करेंगे।
क्योंकि पाकिस्तान भारत के अंदरूनी मसलों में दखल देकर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बनाने का प्रयास करता रहा है। इस बात को मद्देनज़र रखते हुए यह ख़बर पाकिस्तान के लिए काफी निराशाजनक है। पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी की इस दो दिवसीय बैठक में मौजूदगी को लेकर बुधवार (25 नवंबर 2020) को पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की तरफ से आधिकारिक बयान जारी किया गया था।
बयान के मुताबिक़ पाकिस्तानी विदेश मंत्री की तरफ से उन तमाम चुनौतियों पर चर्चा की जाएगी, जिनका सामना मुस्लिम समुदाय को करना पड़ता है, जिसमें से एक विवाद ‘जम्मू कश्मीर मुद्दा’ भी है। बयान के अगले हिस्से में लिखा था कि जब से भारत ने जम्मू कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाया है, तब से वहाँ मानवाधिकार हनन जारी है, शाह महमूद कुरैशी इस पहलू पर सबसे ज़्यादा जोर देंगे।
OIC के एजेंडे में ‘जम्मू कश्मीर मुद्दे’ का ज़िक्र तक नहीं
अफ़सोस पाकिस्तान की तरफ से जम्मू कश्मीर मुद्दे की चर्चा को लेकर किए गए दावे पूरी तरह झूठ हैं क्योंकि OIC की ओर से अंग्रेज़ी और अरबी में जारी किए गए आधिकारिक बयान में जम्मू कश्मीर मुद्दे पर कोई उल्लेख ही नहीं है। बयान में संगठन के सचिव (सेक्रेट्री जनरल) युसूफ अल ओथाईमीन का हवाला देते हुए कहा गया है कि बैठक की थीम, शांति और विकास के लिए आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट (United against terrorism for peace and development) होगी। इस बैठक के एजेंडे में उन चुनौतियों को शामिल किया गया है, जिनका सामना मुस्लिम समुदाय के लोग कर रहे हैं।
बयान के मुताबिक़, “फ़लीस्तीनी मुद्दा, हिंसा, कट्टरपंथ, आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई, मज़हबी दुष्प्रचार और इस्लामोफ़ोबिया को शामिल करते हुए काउंसिल अल्पसंख्यक मुस्लिमों, अन्य देशों में मौजूद मुस्लिमों और रोहिंग्या के लिए आर्थिक सहयोग (ICJ की मदद से) के मुद्दों पर चर्चा करेगी। इसके अलावा बैठक के दौरान संगठन का प्रयास होगा कि संस्कृतियों, धर्मों, सामाजिक विषयों और समुदायों के बीच संवाद की गुंजाइश बने।” जैसा कि इस पूरे बयान में पढ़ा जा सकता है कि कहीं भी जम्मू कश्मीर मुद्दे का उल्लेख तक नहीं है। अरबी भाषा में जारी किए गए बयान में भी जम्मू कश्मीर मुद्दे का कोई उल्लेख नहीं मौजूद है।
पाकिस्तान ने गैरकानूनी रूप से कश्मीर के कई क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया है और पिछले काफी समय से प्रयास कर रहा था कि OIC की बैठक में जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा हो। OIC के सदस्यों ने इस मुद्दे पर पाकिस्तान को नज़रअंदाज़ करते हुए इस पर कोई बात नहीं कही है। पाकिस्तान के संबंध सऊदी अरब और यूएई से तनावपूर्ण हैं और यह दोनों देश 57 सदस्यों वाले OIC में बेहद प्रभावशाली हैं। सऊदी अरब ने वर्चुअल वीटो का इस्तेमाल करते हुए 57 मुस्लिम देशों के इस ब्लॉक में इस्लामाबाद के इस कदम का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।
अरब से बदतर होते पाकिस्तान के रिश्ते
कुछ सालों पहले तक सऊदी अरब और पाकिस्तान एक दूसरे के करीबी देशों में गिने जाते थे लेकिन पाकिस्तान के रवैये की वजह से दोनों देशों के रिश्ते बदतर हुए हैं। पूर्व में लंबे समय तक एक दूसरे के सहयोगी रहे पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पहली बार दरार तब आई, जब सऊदी अरब ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का समर्थन करने से मना कर दिया। इसके बाद दोनों देशों के रिश्ते लगातार बदतर हुए हैं।
इसके बाद फरवरी 2020 में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब सऊदी अरब ने पाकिस्तान के उस निवेदन को ठुकरा दिया था, जिसके तहत पाकिस्तान जम्मू कश्मीर मुद्दे पर भारत की कार्रवाई का प्रतिरोध करने के लिए OIC देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक करवाना चाहता था। जब से भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म किया है, तब से पाकिस्तान इस प्रयास में है कि इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाए और OIC में इस मुद्दे पर चर्चा हो।
पाकिस्तान के उकसाने के बावजूद सऊदी का मत स्पष्ट
पाकिस्तान ने सऊदी के सामने भारत के लिए जम कर जहर उगला लेकिन सऊदी अरब ने इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया। अपने स्तर से नीचे गिरते हुए पाकिस्तान ने सऊदी अरब को धमकी दी थी कि उसकी बात नहीं सुने जाने पर वह OIC में फूट डाल सकता है। ऐसी दोयम दर्जे की धमकियों के बाद सऊदी ने निर्णय लिया कि वह पाकिस्तान को दिए जाने वाले आर्थिक सहयोग पर भी रोक लगाएगा।
इस साल अगस्त में सऊदी ने पाकिस्तान को दिया हुआ 3 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ जल्द लौटाने की बात कही थी, जो उन्होंने साल 2018 के दौरान इमरान सरकार को दिया था। कश्मीर मुद्दे पर इतने तिरस्कार का सामना करने के बाद पाकिस्तानी पीएम इमरान खान ने तुर्की और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों को सऊदी के विरुद्ध एकजुट करने का असफल प्रयास किया था। इसके पहले सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ किए गए उस समझौते को ‘रिन्यू’ करने से मना कर दिया था, जिसके तहत पाकिस्तान को सऊदी से कच्चा तेल मिलना था। समझौते के मुताबिक़ हर साल लगातार भुगतान करने पर 3.2 बिलियन डॉलर के कच्चे तेल का प्रावधान था।
सऊदी अरब का रवैया देखते हुए उसके पड़ोसी मुल्क यूएई ने भी पाकिस्तान के विरुद्ध कई बड़े कदम उठाए। हाल ही में यूएई ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पाकिस्तान और अफगानिस्तान के नागरिकों को वीज़ा देने से अस्थाई तौर पर मना कर दिया था। इसके अलावा यूएई ने भी कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को नज़रअंदाज़ ही किया है। उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार की सक्रिय कूटनीति और सकारात्मक छवि की वजह से भारत को काफी लाभ हुआ है। पिछले कुछ समय में भारत के संबंध पश्चिम एशियाई देशों से बेहतर हुए हैं जो कि अपने आप में ऊर्जा का बहुत बड़ा स्रोत हैं और वहाँ 90 लाख अप्रवासी भी मौजूद हैं।