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‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सज़ा, सिर तन से जुदा, सिर तन से जुदा’: फ्रांस के खिलाफ सड़क पर हिंसक प्रदर्शन

पाकिस्तान में एक बार फिर तनाव का माहौल है, तहरीक-ए-लब्बैक (TLP) के हज़ारों समर्थक फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के विरोध में रावलपिंडी की सड़कों पर उतरे हैं। उनका विरोध इस मुद्दे पर था कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने पैगंबर मोहम्मद का कार्टून बनाने के अधिकार का बचाव किया था। खादिम हुसैन रिज़वी ने फ्रांस में हुई ईशनिंदा का विरोध करने के लिए प्रदर्शन आयोजित किया था, जिसके बाद प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतरे थे। 

रविवार (15 नवंबर 2020) को शुरू हुआ प्रदर्शन सोमवार (16 नवंबर 2020) तक जारी रहा। इस विरोध-प्रदर्शन के दौरान कई नारे भी लगाए गए, “गुस्ताख-ए-रसूल की एक ही सज़ा, सिर तन से जुदा सिर तन से जुदा।”

सोमवार को प्रदर्शनकारियों और पुलिसकर्मियों के बीच टकराव की ख़बरें भी सामने आई थी। पाकिस्तानी समाचार समूह Dawn में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया, “प्रदर्शन के दौरान काफी मात्रा में आँसू गैस के गोले छोड़े गए थे, जिससे वहाँ के स्थानीय लोग बुरी तरह प्रभावित हुए थे और बहुत से लोगों को साँस लेने में परेशानी होने लगी थी।” TLP से संबंधित दर्जनों प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी इस विरोध-प्रदर्शन के दौरान घायल हुए थे, जिन्हें बाद में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 

प्रदर्शन और टकराव के तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर काफी सुर्ख़ियों में बने हुए थे। TLP ने इस कार्रवाई को पैगंबर मोहम्मद के चाहने वालों पर पूरे इतिहास का सबसे घटिया और भीषण अत्याचार बताया है।     

TLP ने इस तरह के तमाम वीडियो में जारी किए हैं जिसमें प्रदर्शनकारी कह रहे हैं कि इमरान खान की ‘बदमाश’ सरकार कलमा पढ़ने वाली पुलिस का इस्मेताल राव​लपिंडी के कलमा पढ़ने वाले लोगों पर कर रही है। जबकि श्रीनगर और कश्मीर के मजहबी लोग इस बात की उम्मीद कर रहे हैं कि यही ताकतें उनका बचाव करेंगी। यह बात भी सामने आ गई है कि पाकिस्तानी सेना हिंदुओं से नहीं लड़ रही है, बल्कि नमाज़ पढ़ने वालों पर सख्ती से कार्रवाई कर रही है।

वीडियो में बात करने वाले व्यक्ति को कहते हुए सुना जा सकता है कि ‘ईशनिंदा की एक ही सज़ा हो सकती है, सिर को शरीर से अलग कर दिया जाए।’

TLP का यह भी कहना था कि बंदूकें रावलपिंडी के लोगों की जगह फ्रांसीसियों की तरफ होनी चाहिए। 

साझा किए गए वीडियो में आस-पास काफी ज्यादा धुआँ भी देखा जा सकता है।  

प्रदर्शनकारियों की माँग के अनुसार पाकिस्तान में स्थित फ्रांस का दूतावास बंद कर देना चाहिए और फ्रांस से तमाम कूटनीतिक रिश्ते ख़त्म कर दिए जाने चाहिए। प्रदर्शनकारी फैजाबाद (इंटरचेंज) पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं जो रावलपिंडी और इस्लामाबाद को जोड़ता है। इसके अलावा प्रदर्शनकारी इसे बंद करने की योजना भी बना रहे हैं। इसी बीच मिलेनियल फेमिनिस्ट पत्रकार ग़रीदाह फारूखी ने सोशल मीडिया पर हल्ला मचाते हुए कहा, “कहाँ है सरकार? कहाँ है प्रशासन, इसका तंत्र और ताकत? कुछ हज़ार कट्टरपंथियों, उपद्रवियों और क़ानून के विरोधियों ने पिछले दो दिनों से इस्लामाबाद और रावलपिंडी के नियम-कायदे से बंधे नागरिकों का जीवन मुश्किल कर दिया है। सरकार सिर्फ तमाशा देख रही है, उसे शर्म आनी चाहिए। जो खुद को इस्लाम का ठेकेदार कहते थे, वह अब विदेश नीति के ठेकेदार बन कर रह गए हैं।” 

पाकिस्तान के लोगों का फ्रांस के विरुद्ध प्रदर्शन 

पाकिस्तान के लोग पिछले काफी समय से फ्रांस का विरोध कर रहे हैं। पिछले महीने के अंत में इस्लामी भीड़ को फ्रांस दूतावास पहुँचने से रोकने के लिए पुलिस को उन पर आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे और लाठी चार्ज भी करना पड़ा था। इस बीच तमाम प्रदर्शनकारियों को चोट भी लगी और अंत में पुलिस ने उन्हें दूतावास पहुँचने से रोक दिया। इसके अलावा अन्य लोग पाकिस्तानियों को इमैनुएल मैक्रों का विरोध करने के लिए ‘डिजिटल जिहाद’ का सहारा लेने का सुझाव दे रहे हैं।   

बिहार को बढ़ना है तो धर्मांतरण, कट्टरपंथ और वामपंथ के कैंसर को हराना ही होगा…

बिहार में आज (16 नवंबर 2020) नई सरकार का गठन हो गया। नीतीश कुमार ने सातवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ 14 मंत्रियों ने भी शपथ ली।

इस कैबिनेट की उसी तरह अलग-अलग व्याख्या होगी, जैसे बिहार के जनादेश की हो रही है। जब तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं होता, आकलन का दौर भी उसी तरह चलेगा जैसा नतीजों और फिर डिप्टी सीएम को लेकर मीडिया में चल रहा था।

जैसा कि नतीजों के आने से पहले भी ऑपइंडिया ने कहा था कि बिहार में कोई भी सरकार नीतीश कुमार के जदयू के बिना नहीं बन सकती और मुख्यमंत्री बनना या नहीं बनना नीतीश कुमार के विवेक पर ही निर्भर करेगा। हालाँकि नीतीश कुमार का दावा है कि उन्होंने बीजेपी से अपना मुख्यमंत्री बनाने को कहा था, लेकिन उनका यह आग्रह नहीं माना गया। पर एक सच यह भी है कि राजनीति उतनी भी सीधी रेखा में नहीं चलती, जितनी वह ​नीतीश कुमार के इस ‘निर्दोष बयान’ में दिखती है। लिहाजा, यह सरकार कब तक चलेगी, बीजेपी ने ज्यादा सीटें होते हुए भी अपना मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया या धनबल और बाहुबल के बल पर राजद इस सरकार को गिरा देगी, इन सारे सवालों के जवाब भविष्य में छिपे हैं।

पर क्या बाढ़, बदहाली और बेरोजगारी की पहचान के साथ घिसट रहे बिहार के सामने असल चुनौतियॉं इन्हीं सवालों का जवाब तलाशना है? नहीं, बिलकुल नहीं। उसके सामने तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं। इनसे निपटे बिना बिहार आगे नहीं बढ़ सकता है। ये हैं,

  1. वामपंथ
  2. कट्टरपंथ
  3. धर्मांतरण

बिहार में बीजेपी की चुनावी सफलता और एनडीए के सरकार बचा ले जाने के पीछे भी इन खतरों का बढ़ता प्रभाव ही है। भले वामपंथी दलों को 16 सीटें मिल जाना उनका पुनर्भव नहीं हो, लेकिन इसने उन्हें राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में लौटने का अवसर जरूर उपलब्ध करा दिया है। राजद के कोर वोटर की बदौलत उन्होंने यह सफलता तब हासिल की है, जब गिनती के जिलों में माले के प्रभाव को छोड़ दें तो राज्य में वामपंथ का नामलेवा नहीं बचा था। तमाम प्रोपेगेंडा के बावजूद 2019 के लोकसभा चुनाव में बिहार की जनता ने वामपंथ के पोस्टर बॉय कन्हैया कुमार को नकार दिया था। बाद में यात्रा के जरिए सियासी जमीन तलाशने की उसकी कोशिश का भी जगह-जगह विरोध हुआ था।

वामपंथी राजनीति पर अंकुश इसलिए भी जरूरी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो बिहार एक बार फिर से जातीय हिंसा के उस दौर में पहुँचा सकता है, जिसके जख्म अब भी गहरे हैं। खतरा यह भी है कि एक बार फिर उनके साथ बिहार को ‘जंगलराज’ देने वाले भी हैं।

इसी तरह चुनाव के आखिरी चरण में जिस तरह सीमांचल, तिरहुत और मिथिलांचल के लोगों ने एनडीए को समर्थन दिया वह कहीं न कहीं इन इलाकों में कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव से लोगों की चिंता को दिखाता है। ऑपइंडिया की चुनावी कवरेज के दौरान उम्मीदवार भले आचार संहिता का हवाला देकर इसका जवाब देने से कन्नी काट रहे थे, लेकिन लोग खुलकर इस मुद्दे को उठा रहे थे। यही कारण है कि उन सीटों पर भी बीजेपी जीती है जो उसके लिए कभी आसान नहीं रही। राज्य में असदुद्दीन ओवैसी की ‘जहरीली राजनीति’ को लेकर भी लोग मुखर थे। सीमांचल में उनके पाँच उम्मीदवारों का जीतना चिंताजनक है। वैसे भी किशनगंज और नेपाल की सीमा से सटे बिहार के इलाकों में तेजी से बदलती जनसांख्किीय और घुसपैठ अरसे से बड़ी समस्या बनी हुई है।

इनके साथ बिहार के सुदूर इलाकों में ईसाई मिशनरियों को बढ़ता प्रभाव भी चिंताजनक है। मधुबनी के देहात में लोगों को बहला-फुसलाकर जब हमने धर्मांतरण किए जाने की रिपोर्ट की थी, उसके बाद से बिहार का कोई जिला नहीं बचा है, जहाँ के लोगों ने हमें संदेश भेजकर यह नहीं बताया हो कि उनके यहाँ भी यह खेल चल रहा है। जबकि अब तक माना जाता था कि यह झारखंड से सटे इलाकों की ही समस्या है।

बिहार के लिए अच्छी बात यह है कि इन मुद्दों पर बीजेपी गंभीर दिखती है। उसने नीतीश की नई कैबिनेट में जीवेश मिश्र जैसे लोगों को जगह भी दी है जो इन मुद्दों को लेकर मुखर है। लेकिन, ज्यादा चिंता की बात नेतृत्व की भूमिका में उस नीतीश कुमार का होना है, जिनकी जमीन पर छवि एक खास मजहब के प्रति झुकाव रखने वाली की है। इस बार भी कई जगहों पर प्रशासन ने दुर्गा मूर्ति तोड़ दी थी, लेकिन सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की। चुनाव के दौरान मुंगेर की घटना हुई और उस पर भी सख्त प्रतिक्रिया देने से सरकार में शामिल लोग बचते रहे।

इस बार जैसे-तैसे सरकार बचाने में सफल रही एनडीए के लिए जनादेश स्पष्ट है। जनता यह स्वीकार कर सकती है कि राजनैतिक मजबूरियों की वजह से बीजेपी नीतीश कुमार की सदारत स्वीकार कर ले। लेकिन, उसे इन मुद्दों की अनदेखी कबूल नहीं होगी। बीजेपी को वह रास्ता तलाशना ही होगा जिससे वह इन तीन मोर्चों पर बिहार में लड़ती नजर आए। सरकार के तौर पर भी और संगठन के तौर पर भी।

नीतीश कुमार ने 7वीं बार सीएम पद की शपथ ली, धर्मांतरण पर सख्ती का वादा करने वाले जीवेश मिश्र भी मंत्री बने

आज (16 नवंबर 2020) नीतीश कुमार ने सातवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उनके साथ 14 मंत्रियों ने भी शपथ ली। बीजेपी कोटे से शपथ लेने वाले तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को उप मुख्यमंत्री बनाया गया है।

शपथ लेने वालों में जाले से बीजेपी के विधायक चुने गए जीवेश मिश्र भी शामिल हैं। जीवेश मिश्र ने चुनाव के दौरान ऑपइंडिया से बात करते हुए मिथिलांचल में कट्टरपंथ और ईसाई मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता जताई थी। धर्मांतरण से सख्ती से निपटने की बात कही थी।

शपथ ग्रहण समारोह में गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा, देवेंद्र फडणवीस (Devendra सहित एनडीए के कई नेता शामिल हुए। राजद और उसके सहयोगी दलों ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया था।

शपथ ग्रहण का यह कार्यक्रम सोमवार की शाम 4:30 बजे से राज्यपाल फागू चौहान की अगुवाई में शुरू हुआ था। तारकिशोर प्रसाद और रेणु चौधरी के अलावा जदयू नेता विजय कुमार चौधरी, विजेंद्र प्रसाद यादव, अशोक चौधरी और मेवा लाल चौधरी ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इसके अलावा हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के मुखिया जीतन राम मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन और विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी ने भी मंत्री पद की शपथ ली। चुनाव से ठीक पहले एनडीए में शामिल हुए सहनी खुद चुनाव हार गए हैं।

भाजपा नेता मंगल पाण्डेय और अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इनके अलावा जदयू की शीला मंडल और भाजपा के रामप्रीत पासवान और राम सूरत राय ने मंत्री पद की शपथ ली।       

उल्लेखनीय है कि तारकिशोर प्रसाद कटिहार विधानसभा क्षेत्र से 4 बार विधायक रह चुके हैं। उनके अलावा रेणु चौधरी भी 5 बार विधायक रह चुकी हैं। बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए ने 243 सीटों में से 125 सीटें हासिल की है। भाजपा ने कुल 110 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से 74 पर जीत हासिल की थी। वहीं जदयू ने कुल 115 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें से उसने 43 सीटों पर ही जीत दर्ज की थी।

जम्मू-कश्मीर में ‘गुपकार’ पर सियासत गर्म: बीजेपी ने बताया- गुप्तचर गठबंधन, कॉन्ग्रेस को भी घेरा

भाजपा ने जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दलों के ‘गुपकार गठबंधन’ पर जबरदस्त हमला बोलते हुए पूछा है कि ये ‘गुपकार गठबंधन’ है या ‘गुप्तचर गठबंधन’? भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने सोमवार (नवंबर 16, 2020) को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जम्मू-कश्मीर के पर्व मुख्यमंत्रियों फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के साथ-साथ कॉन्ग्रेस पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि ये ‘गुप्तचर गठबंधन’ वही चाहता है, जो पाकिस्तान की इच्छा होती है।

उन्होंने गुपकार गठबंधन के साथ हाथ मिलाने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि ऐसी ताकतों के साथ हाथ मिला कर कॉन्ग्रेस ने अपना असली रंग दिखा दिया है। उन्होंने याद दिलाया कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने से पहले वहाँ विकास नहीं पहुँचा था और कुछ ऐसे राजनीतिक दल हैं, जो हमेशा देश का अहित सोचते हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस और गुपकार गठबंधन का एक ही लक्ष्य है – जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 के प्रावधानों को वापस लाना।

उन्होंने अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के फैसले के बारे में पूछा कि ये निर्णय किसका है? साथ ही जवाब देते हुए कहा कि ये पूरे देश का निर्णय है, क्योंकि भारत का कोई भी कानून लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर संसद भवन में विचार-विमर्श के बाद ही बनता है। संबित पात्रा ने कहा, ‘मै राहुल गाँधी और सोनिया जी से पूछता हूँ कि इस गठबंधन की एक पार्टी चीन के साथ अनुच्छेद 370 को वापस लाने की बात कहती है, वहीं महबूबा मुफ्ती तिरंगा नहीं उठाना चाहतीं। चिदंबरम ने कहा था की हम 370 को वापस लाना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि ये गठबंधन वही करता है, जो पाकिस्तान चाहता है। जिस तरह से पाकिस्तान इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म पर गया, वैसे ही ये गठबंधन कर रहा है। उन्होंने कहा कि ये लोग देश के दुश्मनों की भाषा बोलते हैं, क्योंकि इन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाया था और पीएम मोदी को बदनाम करने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि ये सभी बयान राहुल-सोनिया के साथ साँठगाँठ में दिए गए।

जम्मू-कश्मीर में गुपकार गठबंधन पर निशाना साधने के क्रम में बिहार विधानसभा चुनाव और देश भर में हुए उपचुनावों में कॉन्ग्रेस की हार पर भाजपा प्रवक्ता कहा कि गुपकार समूह के साथ कॉन्ग्रेस का ये गठबंधन देशहित में नहीं है और कॉन्ग्रेस को पहले अपने घर का अलायंस सही रखना चाहिए, उसके बाद कहीं ओर गठबंधन पर विचार करना चाहिए। उन्होंने कपिल सिब्बल द्वारा उठाए गए सवालों को भी याद किया। सिब्बल ने कहा है कि पार्टी नेतृत्व इस हार को हल्के में ले रहा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

कुछ ही दिनों पहले ‘पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन’ ने डॉ. फारूक अब्दुल्ला को अपना अध्यक्ष और महबूबा मुफ्ती को 6 पार्टी समूह का उपाध्यक्ष घोषित किया था। यह निर्णय पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के गुपकार रोड पर स्थित निवास पर आयोजित अलायंस में शामिल घाटी के शीर्ष नेताओं की दो घंटे तक चली बैठक में लिया गया था। सज्जाद लोन को गठबंधन का प्रवक्ता बनाया गया है।

जम्मू-कश्मीर में कट्टरवादियों की नजर में आतंकवादियों और अलगाववादियों की तरह उन्हें भी प्रदेश का ‘सच्चा हिमायती’ समझा जाए, इसीलिए सीनियर अब्दुल्ला चीन को इधर आकर जम्मू-कश्मीर को अपने में मिला लेने का देश-विरोधी आइडिया देते हैं है और मुफ़्ती परिवार भारत और भारत के झंडे के खिलाफ बयान तो दे रहा है, लेकिन साथ ही भारत के संविधान और सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा भी जता रहा है। ये दल फ़िलहाल कन्फ्यूजन की स्थिति में हैं। चुनाव नहीं लड़े तो सत्ता जाएगी और चुनाव लड़े तो कट्टरपंथियों की नजरों में गिरेंगे।

6 दलों– नेशनल कॉन्फ्रेंसराष्ट्रीय सम्मेलन (नेकां), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पीपुल्स सम्मेलन (पीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीआई-एम), पीपुल्स मूवमेंट (पीएम) और अवध नेशनल कॉन्फ्रेंस (एएनसी) – इस महीने की शुरुआत में एक साथ आए थे ताकि गठबंधन का गठन किया जा सके और राज्य की विशेष स्थिति की बहाली के लिए शांति से काम किया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने ‘क्षेत्र के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने’ की कसम खाई थी।

बेंगलुरु में दंगे करवाने वाले आरोपित कॉन्ग्रेसी नेता संपत राज को जिसने कराया फरार, वो रियाजुद्दीन गिरफ्तार

बेंगलुरु दंगे मामले में आरोपित फ़रार कॉन्ग्रेस नेता संपत राज के नज़दीकी सहयोगी रियाजुद्दीन को गिरफ्तार करके न्यायिक हिरासत में भेजा जा चुका है। रियाजुद्दीन पर आरोप है कि उसने मुख्य आरोपित को छुपने और फरार होने में मदद की। 

रियाजुद्दीन खुद फरार चल रहा था। उसे कॉन्ग्रेस नेता संपत राज की मदद करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह संपत राज को नगरहोले स्थित एक फ़ार्महाउस लेकर गया था और उसने आगामी कुछ दिनों तक संपत राज को वहीं छुपाया था। 

केंद्रीय अपराध शाखा के मुखिया संदीप पाटिल ने इस मुद्दे पर बात करते हुए कहा कि वह उस दौरान जाकिर हुसैन (मामले का अन्य आरोपित) और संपत राज को खोज रहे थे। रियाजुद्दीन बीबीएमपी (बृहत बेंगलुरु म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन) में ठेकेदार है। 

बेंगलुरु दंगे

11 अगस्त 2020 को रात 8:30 बजे डीजे हल्ली और केजे हल्ली पुलिस थाने के अंतर्गत पूर्वी बेंगलुरु में दंगों जैसे हालात पैदा हो गए थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कॉन्ग्रेस विधायक अखंडा श्रीनिवास मूर्ति के आवास के ठीक सामने लगभग 1000 लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी। इकट्ठा होने वाले लोग विधायक के रिश्तेदार नवीन पर कार्रवाई की माँग कर रहे थे। नवीन पर आरोप था कि उसने फेसबुक पर पैगम्बर मोहम्मद से संबंधित विवादित कंटेंट साझा की थी। 

हालात 12 अगस्त की रात 1 बजे के आस पास नियंत्रण में आए थे। इस घटना में कुल 3 लोगों की मृत्यु हुई थी और लगभग 60 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इसके अलावा दंगों के दौरान लगभग 300 वाहन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए थे। 

दंगों में संपत राज की भूमिका 

कॉन्ग्रेस नेता संपत राज को इस साल अगस्त महीने के दौरान हुए दंगों के मामले में मुख्य षड्यंत्रकर्ताओं में एक माना जाता है। बेंगलुरु दंगों के मामले में केंद्रीय अपराध शाखा (CCB) द्वारा दायर की गई चार्जशीट के अनुसार कॉन्ग्रेस नेता संपत राज ने अपनी ही पार्टी के दलित विधायक अखंडा श्रीनिवास मूर्ति को निशाना बनाने के लिए एसडीपीआई (SDPI) जैसे कट्टर इस्लामी संगठनों से हाथ मिलाया था। 

850 पन्नों की चार्जशीट में CCB ने 52 लोगों को घटना का मुख्य आरोपित बताया था। इसके अलावा 30 से अधिक चश्मदीदों के बयान भी शामिल किए गए हैं, जाँच एजेंसी ने कॉन्ग्रेस के पूर्व मेयर संपत राज और जाकिर हुसैन को 51वां और 52वां आरोपित बताया है।    

‘सनसनी फैलाने से बचे टीवी मीडिया, उनके लिए स्व-नियामक संस्था जल्द’: जावड़ेकर ने कहा- स्वतंत्रता के साथ आती है जिम्मेदारी

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि टीवी मीडिया के पास अपनी एक स्व-नियामक संस्था होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि जस्टिस एके सिकरी के नेतृत्व में एक एजेंसी का गठन किया गया है, जो टीवी मीडिया न्यूज़ चैनलों के नियम तय करेगी। उन्होंने कहा कि कई टीवी चैनल इसके सदस्य भी नहीं हैं। उन्होंने बताया कि इन टीवी मीडिया चैनलों के लिए ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ बनाने हेतु कई प्रस्ताव आए हैं।

उन्होंने ‘फ्री प्रेस’ को लोकतंत्र की आधारशिला बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता अपने साथ कुछ जिम्मेदारी भी लाती है और न्यूज़ चैनल सनसनी फैलाना बंद करें। वो राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक वेबिनार में बोल रहे थे। सोमवार (नवंबर 16, 2020) को इस कार्यक्रम में बोलते हुए जावड़ेकर ने फ्री प्रेस को लोकतंत्र की आत्मा बताया और मीडिया चैनलों को समझाया कि एक ‘जिम्मेदार स्वतंत्रता’ होनी चाहिए।

उन्होंने मीडिया चैनलों को याद दिलाया कि कोई खबर जान-बूझकर किसी को बदनाम करने के लिए नहीं चलाई जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि आज जिस तरह से मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला किया जा रहा है, वो निंदनीय है। कुछ चैनलों द्वारा टीआरपी में घपले के आरोपों पर उन्होंने बताया कि मंत्रालय द्वारा गठित समिति इसकी जाँच कर जल्द ही रिपोर्ट देगी। उन्होंने इससे निराशा जताई कि टीवी चैनलों के लिए कोई नियामक संस्था नहीं है।

उन्होंने PCI के बारे में कहा कि यहाँ कई मीडिया संस्थानों के अलावा संसद से भी प्रतिनिधित्व है। उन्होंने कहा कि PCI को और शक्ति देने के लिए विचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि टीवी चैनलों के लिए ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ बनाने को लेकर प्रक्रिया विचाराधीन है। इसी तरह उन्होंने OTT प्लेफॉर्म्स के लिए भी कोई नियामक संस्था न होने की बात पर निराशा व्यक्त की और कहा कि इस पर विचार चल रहा है।

उन्होंने कहा कि OTT प्लेटफॉर्म्स को लेकर कई शिकायतें आई हैं कि वहाँ भ्रामक तथ्य फैलाए जा रहे हैं और फेक न्यूज़ को जमकर बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही उनके द्वारा धार्मिक भावनाओं को आहत किए जाने की शिकायतें भी मिल रही हैं। प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि मीडिया इंडस्ट्री में आज ‘फेक न्यूज़’ सबसे बड़ी समस्या है और इससे निपटने के लिए लगातार विचार हो रहा है। जल्द ही इनके लिए ‘कॉमन कोड ऑफ कंडक्ट’ आएगा।

हाल ही में ऑपइंडिया के सम्पादक अजीत भारती ने भी केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का इंटरव्यू लिया था, जिसमें उनसे इस विषय में सवाल पूछे गए थे। केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि डिजिटल मीडियम में फिलहाल किस तरह की चुनौतियाँ हैं? तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा था कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है और उनका मानना है कि डिजिटल मीडिया सेल्फ रेग्युलेट करे, लेकिन अगर उन्हें मदद चाहिए, तो वो मदद करने के लिए भी तैयार हैं।

चुनावी जीत पर ट्रंप का ‘फैक्टचेक’ करते हुए ट्विटर ने भी किया गुमराह, जानिए कैसे?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक अपने सम्बोधन में हार नहीं मानी है। रविवार (नवंबर 15, 2020) को ये भी स्पष्ट हो गया कि वे अपनी हार स्वीकार करते हुए सम्बोधन नहीं देंगे और कम से कम अगले कुछ दिनों में तो ऐसा नहीं होने वाला है। ट्रंप ने जनता से कहा है कि उन्होंने अभी हार नहीं मानी है और अभी लंबा रास्ता तय करना है। ट्विटर उनकी हर ट्वीट पर चेतावनी जारी करता जा रहा है कि ‘ये दावा विवादित है’ या ‘इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है’, जैसे कि जनता को कुछ पता ही न हो।

ट्विटर पिछले कुछ समय से ट्रंप के ट्वीट पर पाबंदी लगाता रहा है, लेकिन मतगणना के बाद यह बात सामने आई कि वह किस हद तक जा सकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हर जगह ट्रंप पर सेंसर लगा रहा था।

इस प्रक्रिया में ट्विटर खुद झूठी और गलत जानकारी का स्रोत बन गया। डोनाल्ड ट्रंप ने एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने लिखा था, “मैं चुनाव जीत गया” (I won the election)। इसके बाद सोशल मीडिया मंचों ने दावा किया था कि ‘आधिकारिक सूत्रों’ ने चुनाव के नतीजे अलग बताए हैं। इस पर क्लिक करने के बाद ट्विटर एक मीडिया रिपोर्ट पर ले जाता है जिसमें जो बिडेन को 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों का विजेता बताया गया था। 

ट्विटर का दावा, आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक़ जो बिडेन विजेता

यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि मीडिया आधिकारिक स्रोत नहीं है और न ही चुनाव परिणाम में इसकी कोई भूमिका है। ट्विटर का रवैया मुख्यधारा मीडिया के लिए बेहद सकारात्मक था, जबकि मीडिया ने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान डोनाल्ड ट्रंप का प्रतिकार ही किया था। वही मीडिया प्रतिदिन डोनाल्ड ट्रंप से जुड़ी फेक न्यूज़ का भी प्रचार करता था, ‘बतौर आधिकारिक सूत्र’ यह खुद में बेहद चिंता का विषय है। 

जैसा कि वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञ जॉनथन तुर्ले (jonathan turley) ने इस महीने की शुरुआत में कहा था, “हम अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की चार स्टेज में से दो ही पूरी कर रहे हैं। वोटिंग स्टेज के बाद प्रान्तों ने टैबुलेशन (tabulation) स्टेज शुरू की। बहुत जल्द हम कैनवास (canvass) स्टेज में प्रवेश करेंगे, जिसमें स्थानीय जिले या शहर गिनती की पुष्टि करते हैं और पुनः गिनती शुरू करते हैं। अंत में आती है सर्टिफिकेशन (certification) स्टेज जिसमें अंतिम चुनौतियाँ उठाई जाती हैं। यानी, ट्रंप की उम्मीदें अभी ख़त्म नहीं हुई है।”

यह 8 दिन पहले लिखा गया था, फ़िलहाल कई राज्यों में मतों की दोबारा गिनती जारी है और कई राज्यों में इसे लेकर क़ानूनी प्रक्रिया जारी है। यह बात लगभग तय है कि संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद आधिकारिक चुनाव परिणाम सामने आएँगे। चुनाव के परिणाम अभी तक विवादित हैं ऐसे में मीडिया समूहों को ‘आधिकारिक सूत्र’ कहना किसी भी सूरत में वैधानिक नहीं होगा। 

यहाँ साल 2000 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों का उल्लेख करना बेहद ज़रूरी है, जिसमें रिपब्लिक के प्रत्याशी जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने डेमोक्रेटिक प्रत्याशी अल गोर के विरुद्ध चुनाव लड़ा था। यह चुनाव पूरी तरह विवादित था और महीनों तक इसके परिणाम सामने नहीं आए थे और अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने जॉर्ज बुश के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसलिए ट्रंप द्वारा चुनाव परिणामों को स्वीकार नहीं किया जाना अप्रत्याशित नहीं है। जबकि मुख्यधारा मीडिया और डेमोक्रेटिक पार्टी सोशल मीडिया की मदद से ऐसा ही दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। हालाँकि इस बात की संभावना बहुत कम है कि डोनाल्ड ट्रंप दूसरी बार भी राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन आधिकारिक तौर पर वह  रेस से बाहर नहीं हुए हैं।    

21 दिन बाद समीत ठक्कर को मिली जमानत, CM उद्धव और उनके मंत्रियों पर किया था ट्वीट

सोशल मीडिया यूजर समीत ठक्कर को अंततः आज जमानत मिल गई। समीत की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट से संपर्क करने के लिए कहा। इसके बाद निचली अदालत में मजिस्ट्रेट द्वारा समीत ठक्कर को जमानत दी गई। वो 21 दिनों से पुलिस हिरासत में थे।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, उनके बेटे आदित्य ठाकरे और महाराष्ट्र के एक मंत्री के खिलाफ ट्वीट के मामले में सुप्रीम कोर्ट में समीत ठक्कर की गिरफ्तारी और हिरासत के खिलाफ वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी द्वारा दायर याचिका दायर की गई थी। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (16 नवंबर 2020) को इस मामले पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश वकील राहुल चिटनिस ने बताया किया कि वे निचली अदालत में लंबित जमानत याचिका का विरोध नहीं करेंगे क्योंकि हिरासत में पूछताछ खत्म हो गई है। इसके बाद समीत ठक्कर के वकील जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट से चिटनिस के बयान को रिकॉर्ड पर रखने का अनुरोध किया।

समीत ठक्कर मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने उनके वकील (जेठमलानी) से कहा कि महाराष्ट्र सरकार के वकील के अनुसार अब वो निचली अदालत में जमानत का विरोध नहीं करेंगे, इसलिए वो जमानत याचिका वापस ले लें और निचली अदालत में इसके लिए जाएँ।

आदित्य ठाकरे को ‘बेबी पेंगुइन’ कह अपमानजनक पोस्ट

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे के खिलाफ कथित आलोचनात्मक टिप्पणियाँ करने के आरोप में सोशल मीडिया यूजर समीत ठक्कर को पुलिस हिरासत में भेज दिया गया था।

उन पर सीएम ठाकरे, आदित्य ठाकरे और नितिन राउत के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक सामग्री पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था। उन्होंने ठाकरे के खिलाफ 1 और 30 जून को ट्वीट किया था। जबकि 1 जुलाई को उन्होंने संजय राउत के खिलाफ एक ट्वीट किया था।

चेहरा ढके, हाथ रस्सी से बंधे… समीत का वायरल हुआ था वीडियो

इससे पहले सोशल मीडिया पर पुलिस के अधिकारियों की गिरफ्त में समीत का एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में समीत ठक्‍कर को अदालत ले जाते समय काले कपड़े पहनाए, चेहरा ढके और दोनों हाथ रस्सी से बँधा हुआ देखा गया था।

‘भाजपा ने जो बलात्कार किया है… उसी की पैदाइश हैं नीतीश कुमार’: शपथ ग्रहण से पहले RJD के बिगड़े बोल

बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सोमवार (नवंबर 16, 2020) को शाम साढ़े 4 बजे होने वाले नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह के बहिष्कार का ऐलान किया है और तेजस्वी यादव ने भी उसमें हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है। इधर बौखलाए राजद (RJD) के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने नीतीश कुमार और भाजपा को लेकर विवादित बयानबाजी की है। नवंबर 2019 में उन्हें RJD का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था।

जगदानंद सिंह ने कहा कि नीतीश कुमार पहले तो धोखाधड़ी से मुख्यमंत्री बन जाते थे, लेकिन इस बार तो वो मुख्यमंत्री हैं ही नहीं। उन्होंने नीतीश कुमार को ‘भाजपा की गोद में पलने वाला’ बताया। साथ ही कहा, “पूरे बिहार की जनता और मतदाताओं के साथ भाजपा ने जो बलात्कार किया है, जनादेश की जो डकैती भाजपा ने की है, उसी की पैदाइश हैं नीतीश कुमार।” उन्होंने बिहार में गठित होने वाली नई सरकार को भी अवैध करार दिया।

जगदानंद सिंह ने कहा कि जब जनादेश राजद के पास है तो फिर समारोह का सवाल ही कहाँ उठता है। उन्होंने इसे ‘नीतीश कुमार के अंत’ का समारोह करार दिया। राजद के नक्शेकदम पर चलते हुए कॉन्ग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने भी इस शपथ ग्रहण समारोह का बहिष्कार करने की बात कही है। चुनाव के समय इसी तरह अब्दुलबारी सिद्दीकी ने पीएम मोदी के लिए अपशब्द का प्रयोग किया था। हालाँकि, वो चुनाव हार गए।

राजद (RJD) ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि पार्टी शपथ ग्रहण का बायकॉट करती है, क्योंकि बदलाव का जनादेश NDA के विरुद्ध है। पार्टी ने आरोप लगाया कि जनादेश को ‘शासनादेश’ से बदल दिया गया। साथ ही सलाह दी कि बिहार के बेरोजगारों, किसानों, संविदाकर्मियों और नियोजित शिक्षकों से पूछे कि उन पर क्या गुजर रही है। राजद ने दावा किया कि NDA के फर्ज़ीवाड़े से जनता आक्रोशित है और उसके नेता जनप्रतिनिधि होने के नाते जनता के साथ खड़े हैं।

75 साल के जगदानंद सिंह बिहार के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं और राजद का राजपूत चेहरा माने जाते हैं। कहा जाता है कि बिहार में चुनाव के दौरान तेजस्वी यादव के हर फैसले के पीछे इनकी राय ज़रूर होती थी। वे 2009 में बक्सर से सांसद चुने गए थे। उससे पहले उन्होंने लगातार 4 बार कैमूर के रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी। उनसे पहले रामचंद्र पूर्वे एक दशक तक राजद के प्रदेश अध्यक्ष रहे थे।

गौरतलब है कि बिहार में तीसरे चरण के मतदान से पहले अब्दुलबारी सिद्दीकी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘दंगेवाला सीएम’ के रूप में संदर्भित किया था। उन्होंने कहा था, “मोदी जी को यह अहसास नहीं हो रहा है कि वह देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्हें अब भी लग रहा है कि वह गुजरात के वही दंगेवाले सीएम हैं।” सोशल मीडिया पर लोगों ने उनके इस बयान का जमकर विरोध किया था।

बता दें कि बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में राजद सब बड़ी पार्टी बन कर तो उभरी, लेकिन राजग गठबंधन ने बहुमत का आँकड़ा पार किया। तमाम बड़े चैनलों के एग्जिट पोल्स के उलट NDA ने सत्ता में वापसी की। राजग गठबंधन में भाजपा को 74 और जदयू को 43 सीटें आईं। गठबंधन के छोटे दलों ‘हम’ और वीआईपी 4-4 सीटें जीतीं। अब ये चारों दल मिल कर सरकार बनाने जा रहे हैं। भाजपा ने तारकिशोर प्रसाद को विधानमंडल का नेता और रेणु देवी को उपनेता चुना है।

14 साल की हिन्दू लड़की का अपहरण: कुरान की आयतें पढ़वाता था आरोपित सोहिदुल रहमान, जबरन कर लिया था निकाह

पश्चिम बंगाल में करीब एक महीने पहले एक 14 वर्ष की लड़की के अपहरण की खबर आई थी। नाबालिग हिन्दू लड़की का उससे उम्र में काफी बड़े एक व्यक्ति ने अपहरण किया था। हाल ही में उसे गुजरात से बरामद किया गया। अब पीड़िता ने खुलासा किया है कि आरोपित ने उसे बंदी बना कर रखने के दौरान जबरन कुरान पढ़वाया। साथ ही वो उससे जबरन नमाज भी पढ़वाता था। उसे इस्लामी तौर-तरीके अपनाने को बाध्य किया गया। आरोपित का नाम सोहिदुल रहमान है।

‘स्वराज्य’ में प्रकाशित स्वाति गोयल शर्मा की खबर के अनुसार, एक NGO ने लड़की को बरामद करने में मदद की और संगठन के कार्यकर्ता को लड़की ने जो कुछ भी बताया, उससे काफी बातें पता चलती हैं। आरोपित सोहिदुल रहमान उसे अरबी में कुरान की आयतें पढ़ने के लिए बाध्य करता था। उसने बताया कि वो मस्जिद में उसे लेकर तो नहीं गया था, लेकिन घर पर ही एक व्यक्ति को बुला कर ‘निकाहनामा’ पढ़ा और उससे भी पढ़वाया।

सोहिदुल रहमान ने उससे कहा कि वो अब से उसका शौहर है और साथ ही शारीरिक सम्बन्ध भी कई बार बनाने की बात सामने आई है। पीड़िता साउथ 24 परगना जिले के हमीरपुर गाँव की रहने वाली है। वो 6 अक्टूबर 2020 को गायब हो गई थी। इसके अगले दिन जीबनताला पुलिस थाने में FIR दर्ज कराई गई थी। अपहरण और नाबालिग लड़की से जबरदस्ती के मामले दर्ज किए गए थे। नई दिल्ली के NGO ‘मिशन मुक्ति फाउंडेशन’ को घटना के 5 दिन बाद इसके बारे में पता चला।

इसके बाद संगठन ने पश्चिम बंगाल के उच्चाधिकारियों के समक्ष इस मामले को उठाया। NGO के डायरेक्टर वीरेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि पुलिस ने सोहिदुल रहमान के 3 दिनों के कॉल रिकार्ड्स खँगाले और उससे NGO को अवगत कराया। ये कॉल रिकार्ड्स अक्टूबर 7 से अक्टूबर 11 तक के थे। इससे खुलासा हुआ कि रहमान अक्टूबर 8 को बिहार में था। इसके अगले दिन उसने राजस्थान को ठिकाना बनाया। इसके अगले दिन वो गुजरात चला गया।

हालाँकि, इन विवरणों से बहुत कुछ पता नहीं चल पाया। टॉवर लोकेशन नहीं मिल रही थी और NGO को आशंका थी कि इस दौरान रहमान लड़की को लेकर कहीं और निकल गया हो। तत्पश्चात NGO ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा। इसके बाद एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) और पश्चिम बंगाल की CID ने इस मामले की जाँच शुरू की।

नाबालिग के अपहरण मामले में दर्ज की गई FIR

बुधवार (नवंबर 11, 2020) को राजकोट में सोहिदुल रहमान के होने की सूचना मिली और AHTU की टीम ने वहाँ जाकर लड़की को बरामद किया। वीरेंद्र सिंह भी उसी दिन राजकोट के लिए निकल गए। बाल आयोग ने पहले ही राजकोट पुलिस को सहयोग करने का निर्देश दे दिए थे। दीपावली के 2 दिन पहले 12 नवंबर को लड़की बरामद हुई। बाल आयोग के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने इस अभियान की सफलता को ‘लक्ष्मी पूजा’ माना।

28 वर्षीय आरोपित पहले से ही शादीशुदा है। अगर लड़की अपने साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाए जाने की बार मजिस्ट्रेट को दिए गए बयान में कहती है तो आरोपित के खिलाफ पॉस्को एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया जाएगा। लड़की फ़िलहाल पश्चिम बंगाल CID की कस्टडी में है और उसके इच्छानुसार उसे उसके अभिभावकों को सौंप दिया जाएगा।

‘स्वराज्य’ ने सूत्रों के हवाले से ये भी बताया है कि सोहिदुल रहमान पीड़िता की एक रिश्तेदार महिला से बात करता था, जो उसके साथ घर में ही रहती थी। एक दिन जब उसका फोन आया तो नाबालिग ने वो फोन उठा लिया। इसके बाद सोहिदुल रहमान ने उसे बताया कि वो अगला कॉल कब करेगा और उससे बात भी करने लगा। कुछ सप्ताह बाद उसने पीड़िता के समक्ष निकाह का प्रस्ताव भी रख दिया था।

बता दें कि हरियाणा के फरीदाबाद में बीकॉम की छात्र निकिता तोमर की हत्या के बाद से देश भर में ‘लव जिहाद’ को लेकर बहस तेज़ हो गई थी। मृतका निकिता ने घटना के एक माह पहले ही आरोपित तौसीफ के खिलाफ छेड़खानी और उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की थी। मेवात के रहने वाले तौसीफ नाम के युवक पर आरोप लगा था कि उसने छात्रा निकिता तोमर (Nikita Tomar) की हत्या की। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हिन्दू लड़कियों के उत्पीड़न के कई मामले सामने आए हैं।