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माँ लक्ष्मी और गणेश जी की विसर्जन यात्रा पर मस्जिद के पास ईंट-पत्थर-धारदार हथियारों से हमला: UP पुलिस ने किए 11 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में शोभायात्रा पर हमले की घटना सामने आई है। पूरा मामला अकबरपुर थाना क्षेत्र के पंहितीपुर बाजार का है। यहाँ रविवार (नवंबर 15, 20020) को लक्ष्मी-गणेश मूर्ति के विसर्जन से पहले समुदाय विशेष के लोगों ने मस्जिद के सामने डीजे बजाने पर अपने घरों की छत से शोभायात्रा पर पथराव किया। साथ ही लाठी-डंडे व धारदार हथियार से यात्रा में शामिल लोगों पर हमला भी किया।

इस पूरी घटना में 2 लोग गंभीर रूप से घायल हुए जबकि 10-12 लोगों को हल्की चोटें आई। पुलिस ने जुबेर, शेरू, शहजादे, शादान खान, फहीम, शब्बर, जीशान खान व अरमान खान समेत 8 को नामजद करके कई लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा दायर किया है। अभी तक 11 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।

दैनिक जागरण की खबर के मुताबिक, पंहितीपुर बाजार से सटे औरंगनगर पुरवा में कुछ दिन पहले लक्ष्मी गणेश जी की मूर्ति स्थापित की गई थी। रविवार को श्रद्धालु शोभायात्रा के बाद नदी में इन्हीं मूर्तियों को विसर्जन करने जा रहे थे, तभी शाम करीब 6:30 बजे यह यात्रा पंहितीपुर बाजार पहुँची।

यह इलाका मुस्लिम बाहुल्य है। यहाँ शोभायात्रा में बज रहे डीजे पर समुदाय विशेष ने पहले आपत्ति जताई और जब श्रद्धालुओं ने इसका कारण पूछा तो इस पर विवाद शुरू कर दिया। थोड़ी देर में यात्रा को घेर लिया गया। फिर उन पर ईंट, पत्थर, लाठी, डंडे और धारदार हथियारों से भी हमला किया गया।

घटना की सूचना मिलते ही डीएम, एसपी, एएसपी, एसडीएम, सीओ समेत कई आला अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे। फौरन हालात नियंत्रित करने के लिए अकबरपुर, बेवाना, महरुआ, अहिरौली समेत 7-8 थानों की फोर्स बुलवाई गई और इलाकों को छावनी में तब्दील किया गया। अब पुलिस 11 उपद्रवियों को पकड़ कर उनसे पूछताछ कर रही है व सीसीटीवी के जरिए साक्ष्य जुटा रही है।

गंभीर रूप से घायल लोगों की पहचान राज ताड़मली और सचिन गुप्ता के रूप में हुई है। पुलिस ने इन दोनों को जिला अस्पताल में भर्ती करवाया था लेकिन हालत गंभीर होने के कारण राज ताड़माली को लखनऊ रेफर कर दिया गया।

एएसपी अवनीश कुमार मिश्रा ने मीडिया को बताया कि दो समुदायों के बीच पूरा बवाल डीजे बजाने को लेकर हुआ। अभी हालात सामान्य है। एहतियातन पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है। वरिष्ठ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हालत पर नजर बनाए हुए हैं।

किष्किंधा में बनेगी भगवान हनुमान की दुनिया की 215 मीटर की सबसे ऊँची प्रतिमा: ₹1200 करोड़ का आएगा खर्च

कर्नाटक में भगवान हनुमान की दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति का निर्माण होने वाला है। 215 मीटर की इस मूर्ति को बनाने में 1200 करोड़ रुपए का खर्च आने वाला है। ये मूर्ति कर्नाटक के किष्किंधा स्थित पम्पापुर में बनाई जाएगी, जिसे भगवान हनुमान का जन्मस्थल भी माना जाता है। ‘हनुमद जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के अध्यक्ष स्वामी गोविन्द आनंद सरस्वती ने इसकी घोषणा की। उन्होंने सोमवार (नवंबर 16, 2020) को ये ऐलान किया।

पम्पापुर, बेल्लारी जिले में स्थित है। इस मूर्ति को बनवाने के लिए लोगों से भी दान लिया जाएगा। ट्रस्ट ने बताया कि पूरे देश में लोगों से दान लेने के लिए रथयात्रा भी निकाली जाएगी। इसके साथ ही ‘हनुमद तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ ने अयोध्या के ‘राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को राम मंदिर के निर्माण के क्रम में एक भव्य रथ का दान देने का भी निर्णय लिया है। हम्पी के इस प्राइवेट ट्रस्ट ने निर्णय लिया है कि अगले 6 वर्षों में इसका निर्माण पूरा कर लिया जाएगा

इसके अलावा उत्तर प्रदेश की सरकार ने भी अयोध्या में भगवान श्रीराम की 221 मीटर की प्रतिमा के निर्माण का फैसला लिया है। चूँकि, हनुमान की मूर्ति को उनके इष्ट भगवान श्रीराम की मूर्ति से ऊँचा नहीं रखा जा सकता, इसीलिए इसकी ऊँचाई उससे कम, यानी 215 मीटर तय की गई है। दोनों विशाल मूर्तियों के बीच 6 मीटर का अंतर होगा। हम्पी के बाहरी हिस्से में स्थित किष्किंधा ‘यूनेस्को हेरिटेज साइट’ है।

किष्किंधा रामायण काल में दण्डकारण्य का हिस्सा था, जो विंध्य से लेकर दक्षिण भारत तक में फैला हुआ था। तब वहाँ वानरराज सुग्रीव का शासन हुआ करता था। फ़िलहाल वहाँ हनुमान जी की एकमात्र प्रतिमा अंजनाद्रि पर्वत पर स्थित है, जहाँ जाने के लिए श्रद्धालुओं को 550 सीढियाँ चढ़नी होती है, तब जाकर वो मंदिर तक पहुँचते हैं। स्वामी गोविंदानंद सरस्वती ने कहा कि वो इस स्थल को और भव्य और सबकी पहुँच में रखते हुए बनाना चाहते हैं, जो हमारी संस्कृति को भी प्रदर्शित करे।

इसके लिए राज्य सरकार भी ट्रस्ट की सहायता करेगी। सरकार के साथ इस निर्माण कार्य का प्रस्ताव भी शेयर किया गया है। कर्नाटक के संस्कृति मंत्री सीटी रवि ने बताया कि सरकार ने इस सम्बन्ध में रिपोर्ट माँगी है। किष्किंधा को ‘रामायण सर्किट’ से जोड़ कर इसे बड़े धार्मिक स्थल के रूप में पहचान देने की भी तैयारी चल रही है। किष्किंधा के अलावा गोकर्ण का महाबलेश्वर मंदिर और चिक्कमंगलुरु का चंद्रद्रोण पर्वत रेंज भी है।

जिस दिन भगवान राम के नाम पर ट्रस्ट का ऐलान हुआ, उसी दिन भगवान हनुमान के नाम पर भी ट्रस्ट रजिस्टर कराया गया था। राम जन्मभूमि के शिलान्यास के दिन किष्किंधा से पाँच धातुओं से निर्मित प्रतिमाएँ भी वहाँ भेजी गई थी, जो 140 किलो की थी। अंजनाद्रि पर्वत के पत्थरों का भी इस्तेमाल राम मंदिर में किया जाना है। साथ ही ट्रस्ट कर्नाटक की सरकार से 10 एकड़ जमीन भी खरीदने की कोशिश में लगा हुआ है।

जहाँ तक दुनिया के सबसे लम्बे प्रतिमाओं की बात है, गुजरात के केवड़िया में स्थित सरदार पटेल की 182 मीटर की ‘स्टेचू ऑफ यूनिटी’ पहले नंबर पर है। इसके बाद चीन के ‘स्प्रिंग टेम्पल ऑफ बुद्धा’ का स्थान आता है, जो 128 मीटर का है। चीन, जापान, म्यांमार और थाईलैंड में स्थित बुद्ध की कई मूर्तियाँ दुनिया की सामबे ऊँची मूर्तियों की श्रेणी में आते हैं। भगवान हनुमान और श्रीराम की नई मूर्तियाँ उन सबसे काफी ऊँची होंगी।

बता दें कि अयोध्या में भगवान राम की भव्य मूर्ति लगाने और पर्यटन विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने 447 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी है। यह मूर्ति गुजरात में स्थापित सरदार पटेल की स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की तर्ज पर बनेगी। भगवान राम की यह मूर्ति विश्व की सबसे ऊँची मूर्ति होगी। अयोध्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धार्मिक पर्यटन केन्द्र के तौर पर स्थापित करने की कवायद के तहत उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इससे संबंधित प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।

26/11 के बाद Pak पर हमले का विरोध… मुस्लिम विरोधी भावना से BJP को फायदा: मनमोहन सिंह को लेकर बराक ओबामा

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने संस्मरण में कुछ भारतीय नेताओं, उनसे हुई बातचीत व उनसे संबंधित घटनाओं का उल्लेख किया है। इस संस्मरण में उन्होंने भारत में यूपीए कार्यकाल की प्रमुखता से चर्चा की है। उन्होंने राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी पर अपनी राय रखने के साथ मनमोहन सिंह से हुई मुलाकात को भी याद किया है।

उन्होंने अपनी किताब ‘ए प्रॉमिस्ड लैंड (A Promised Land)’ में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा कि मनमोहन सिंह ने 26/11 के बाद पाकिस्तान पर हमला करने की माँग का विरोध किया, लेकिन उनका यह निर्णय उन्हें राजनीतिक तौर पर महंगा पड़ गया। 

बराक ओबामा ने बतौर राष्ट्रपति साल 2010 में अपने भारत दौरे को याद करते हुए लिखा कि उस दौरान मनमोहन सिंह ने उनसे इस बात का जिक्र किया था कि मुस्लिमों के ख़िलाफ बन रही भावना ने भाजपा को मजबूत किया है।

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार वह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हुई अपनी मुलाकात पर लिखते हैं, “उन्हें (मनमोहन सिंह) डर था कि मुस्लिमों के ख़िलाफ बन रही भावना ने भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के प्रभाव को मजबूती दी है।” उन्होंने यह भी कहा था कि धार्मिक और एकजुटता का आह्वान जहरीला हो सकता है। ऐसे में राजनेताओं द्वारा इसका गलत लाभ उठाना भारत या किसी अन्य देश में मुश्किल नहीं है।

अपनी इस किताब में आगे ओबामा ने मनमोहन सिंह के लिए कई विशेषणों का इस्तेमाल करके उनकी तारीफ की, लेकिन साथ ही यह भी लिखा कि वह ये नहीं बता सकते कि मनमोहन सिंह के सत्ता में उदय ने भारत के लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व किया या यह केवल एक भ्रम था।

उन्होंने अपनी किताब में मनमोहन सिंह के पीएम बनने के पीछे की वजह पर भी अपनी राय रखी। ओबामा ने लिखा कि एक से अधिक राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गाँधी ने मनमोहन सिंह को सोच-समझ कर चुना होगा क्योंकि बुजुर्ग सिख होने के नाते उनके पास कोई राजनीतिक आधार नहीं था। इसके अलावा उनके 40 वर्षीय बेटे राहुल को भी उनसे कोई डर नहीं था, जिसे सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस पार्टी को संभालने के लिए तैयार कर रही थीं। 

उल्लेखनीय है कि आज यानी 17 नवंबर को इस संस्मरण के बाजार में आने से पहले इस पर एक समीक्षा NYT में प्रकाशित हुई थी। इस समीक्षा में राहुल गाँधी को लेकर जो बातें कही गई थीं, उसे पढ़ने के बाद हर जगह उनका मजाक बना था। इसके अनुसार, ओबामा ने उन्हें एक घबराए हुए और अनगढ़ छात्र जैसा बताया था।

उन्होंने राहुल गाँधी के लिए लिखा था, “उनमें एक ऐसे ‘घबराए हुए और अनगढ़ (Unformed- जो तराशा न गया हो)’ छात्र के गुण हैं, जिसने अपना पूरा पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है और वह अपने शिक्षक को प्रभावित करने की चाहत रखता है, लेकिन उसमें ‘विषय में महारत हासिल’ करने की योग्यता या फिर जूनून की कमी है।”

अगस्ता-वेस्टलैंड घोटाला: गवाह ने लिया कमलनाथ के बेटे-भतीजे, सलमान खुर्शीद और अहमद पटेल का नाम

3000 करोड़ रुपए के अगस्ता-वेस्टलैंड VVIP हेलिकॉप्टर घोटाले के मामले में गवाह राजीव सक्सेना ने कई बड़े खुलासे किए हैं। पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राजीव सक्सेना ने इस मामले में मध्य प्रदेश के पूर्व-मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे बकुल नाथ और उनके भतीजे रतुल पुरी के अलावा पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद और सोनिया गाँधी के विश्वस्त अहमद पटेल का नाम भी लिया है। इससे इन सभी कॉन्ग्रेस नेताओं की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

राजीव सक्सेना को जुलाई 2019 में दुबई से प्रत्यर्पित कर लाया गया था। वो फ़िलहाल जमानत पर बाहर हैे। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने उनकी 385 करोड़ रुपए की संपत्ति को अटैच करने के साथ-साथ उनसे पूछताछ भी की थी। अब ED सुप्रीम कोर्ट में राजीव सक्सेना को मुख्य अप्रूवर से हटाने के लिए गई है क्योंकि जाँच एजेंसी का कहना है कि वो अगस्ता-वेस्टलैंड मामले में खुल कर सारे फैक्ट्स पेश नहीं कर रहा है।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने राजीव सक्सेना के बयानों पर आधारित 1000 पेज के सरकारी दस्तावेज, बैंक स्टेटमेंट्स, ईमेल चैट्स और फर्जी कंपनियों के विवरणों के अध्ययन के बाद खुलासा किया है कि हवाला कारोबार और फर्जी कंपनियों का एक बड़ा नेटवर्क था, जिससे इस मामले के सभी आरोपित जुड़े हुए थे। राजीव सक्सेना ने बताया कि किस तरह यूपीए-2 द्वारा कैंसिल कर दिए गए इस करार के किकबैक रकम को अन्य कंपनियों में निवेश किया गया था।

इनमें राजीव सक्सेना की इंटरस्टेलर टेक्नोलॉजीज और क्रिस्चियन मिशेल की ग्लोबल सर्विसेज प्रमुख हैं। मिशेल को दिसंबर 2018 में भारत लाया गया था और वो तभी से जेल में है। सक्सेना ने खुलासा किया है कि इनमें से बड़ी रकम कई ऐसे नेताओं और अधिकारियों को भी दी गई, जो उस वक्त सरकारी निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखते थे। इन्हें निवेश के माध्यम से भारत में लाया गया और अवैध लेनदेन का एक नेटवर्क बन गया।

सीबीआई ने सितम्बर 17, 2020 को दायर की गई चार्जशीट में बताया है कि 2000 में सक्सेना के पास इंटरस्टेलर टेक्नोलॉजीज के 99.9% शेयर्स थे। उसने गौतम खेतान के साथ मिल कर अपनी कम्पनी के बैंक खाते में अगस्ता-वेस्टलैंड से 12.4 मिलियन यूरो प्राप्त किए थे। इसके बाद इस रकम को आगे दलालों, नेताओं और अधिकारियों में बाँटे गए। उसने रक्षा मामलों के दलाल सुषेण मोहन गुप्ता और कमलनाथ के भतीजे रतुल पुरी की इस लेनदेन में प्रमुख भूमिका बताई।

इन दोनों को भी कस्टडी में लिया गया, लेकिन फ़िलहाल वो जमानत पर बाहर हैं। गुप्ता और खेतान की ‘खासियत’ ये थी कि वो किसी भी बातचीत में बड़े-बड़े नेताओं और अधिकारियों के नाम इस तरह से लेते थे, जैसे उनकी इन दोनों से काफी बनती हो। वो सलमान खुर्शीद और ‘कमल अंकल’ का नाम लिया करता था। सक्सेना का कहना है कि ये अंकल कमलनाथ ही हैं। इसके अलावा वो बार-बार किसी AP का नाम लेते थे, जो उसके हिसाब से अहमद पटेल हैं।

इसके अलावा उसने एक ‘प्रिस्टिन रिवर इन्वेस्टमेंट्स’ नामक कम्पनी का भी नाम लिया है। उसने और गुप्ता ने इसी कम्पनी के माध्यम से ‘ब्रिज फंडिंग’ प्राप्त किया। उसका कहना है कि इस कम्पनी का प्रबंधन जॉन डोचर्टी द्वारा किया जाता है, जो बकुल नाथ के लिए काम करता है। वहीं कमलनाथ का कहना है कि उनके भतीजे के लेनदेन से उनका कोई लेनादेना नहीं है और उनका बेटा दुबई में रह रहा NRI है, और उसने बताया है कि उसे भी इन कंपनियों के बारे में कुछ नहीं पता।

वहीं सलमान खुर्शीद ने इस मामले में अपना नाम आने पर आश्चर्य जताया और कहा कि सुषेण के पिता देव मोहन गुप्ता उनके दोस्त हैं और उनका आरोपितों से क्या सम्बन्ध है, इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। सक्सेना ने बताया कि रतुल पुरी कह रहे थे कि उनके भाई या चाचा से सम्बंधित कोई भी दस्तावेज किसी को न दिए जाएँ। जबकि पुरी का कहना है कि वो किसी रक्षा समझौते में शामिल ही नहीं रहे हैं।

2019 में पुरी को बैंक धोखाधड़ी धोखाधड़ी के लिए प्रिवेंशन ऑफ मनी लांड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत गिरफ़्तार किया गया था। हेलिकॉप्टर घोटाले में पुरी जाँच एजेंसी के सामने पेश हुए थे, जिसके बाद जुलाई 2019 में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। इसके बाद सीबीआई की FIR का संज्ञान लेते हुए उनके और अन्य के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। एक मामला मामला सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा अपने साथ ₹354 करोड़ की धोखाधड़ी (फ्रॉड) किए जाने के आरोप का था।

100 अस्पतालों के मालिक अरुण की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत: मनी लॉन्ड्रिंग में कार्ति चिदंबरम के साथ जुड़ा था नाम

तमिलनाडु के वसन आई केयर अस्पताल के संस्थापक एएम अरुण की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई है। उन्होंने त्रिची में एक फार्मेसी की दुकान से अपना सफर शुरू किया था। सोमवार (नवंबर 16, 2020) को 52 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। जहाँ कुछ खबरों में इसे आत्महत्या बताया जा रहा है, वहीं कुछ इसे कार्डियक अरेस्ट से हुई मौत बता रहे हैं। वसन आई केयर का नाम कार्ति चिदंबरम के साथ भी जुड़ा था।

उन्होंने 1991 में त्रिची में स्थित अपने पारिवारिक कारोबार ‘वसन मेडिकल हॉल’ का संचालन अपने हाथों में लिया था। 2002 में उन्होंने आई केयर बिजनेस में कदम रखा और त्रिची का सबसे बड़ा आँखों का अस्पताल खोला। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक 100 अस्पताल खोल कर दक्षिण भारत में आँखों के हॉस्पिटल का सबसे बड़ा नेटवर्क बनाया। उनके अस्पतालों में न सिर्फ 5 करोड़ लोगों का इलाज हुआ, बल्कि 1 करोड़ मरीजों की सफल सर्जरी भी हुई थी।

हालाँकि, ये हैल्थकेयर समूह तब विवादों में जुड़ा, जब कार्ति चिदंबरम के साथ इसका नाम न सिर्फ मनी लॉन्ड्रिंग, बल्कि फोरेक्स एक्सचेंज के नियमों के उल्लंघन के मामले में आया। 2015 में अर्थशास्त्री एस गुरुमूर्ति ने आरोप लगाया था कि देश के वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम के बेटे कार्ति ने मनी लॉन्ड्रिंग के लिए ‘वसन आई केयर हॉस्पिटल’ को ही माध्यम बनाया था। इसके बाद इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय ने समूह के कई अस्पतालों पर छापेमारी की

टैक्स चोरी से लेकर अन्य वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों तक, ‘नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT)’ ने 2017 में समूह की संपत्ति बेच कर उसके द्वारा लिए गए ऋण को चुकाने का आदेश दिया था। समूह के एक सप्लायर ‘एल्कॉन लैबोरेट्रीज’ की याचिका पर ये आदेश दिया गया था। हालाँकि, मद्रास हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को रोक दिया था। इसकी आंतरिक समिति में एकमत न होने के कारण ये विवाद लम्बे समय तक चलता रहा था।

कार्ति और वसन पर एस गुरुमूर्ति के आरोप

कभी 100 करोड़ डॉलर का ‘वसन आई केयर’ अब अपनी सम्पत्तियों को खरीदने वाले की बाट जोह रहा है। कार्ति चिदंबरम के नियंत्रण वाली कम्पनी ASCPL (Advantage Strategic Consultancy Pvt Ltd) पर आरोप लगा था कि उसने 3.09 करोड़ रुपए का निवेश ‘वसन आई केयर’ में किया और फिर उसे बेच कर 41 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। आईएनएक्स मीडिया घोटाला मामले में ED की चार्जशीट में भी इस तथ्य का खुलासा हुआ था।

एम अरुण के परिचितों ने उनकी मौत को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उन्हें कावेरी हॉस्पिटल में मृत घोषित किया गया। पुलिस ने संदिग्ध मौत का मामला दर्ज किया है। हालाँकि, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया है कि ये एक प्राकृतिक मौत थी। फ़िलहाल इस समूह के पास 600 से अधिक आँखों के डॉक्टर हैं और 6000 कर्मचारी हैं। उनकी डेड बॉडी को उनके परिजनों को सौंप दिया गया है और मामले की जाँच जारी है।

चिदंबरम पिता-पुत्र का नाम कई घोटालों में आया है। दरअसल, INX मीडिया घोटाले में कार्ति पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने अपने पिता के पद का दुरुपयोग करते हुए इस घोटाले को अंजाम दिया। आईएनएक्स मामले में पी चिदंबरम को भी सीबीआई ने कस्टडी में लिया था। ईडी द्वारा इस मामले में कार्ति पर शिकंजा कसने के लिए उनकी जमानत खारिज किए जाने की याचिका कोर्ट में लगाई गई थी। ईडी उनकी गिरफ्तारी पर से रोक हटाने की माँग करता रहा है।

बेंगलुरु दंगा: कॉन्ग्रेसी नेता संपत राज गिरफ्तार, कोविड-19 इलाज के दौरान हुए थे अस्पताल से फरार

बेंगलुरु में हुई हिंसा मामले में फरार चल रहे कॉन्ग्रेस नेता व पूर्व मेयर संपत राज को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। यह जानकारी क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट कमिश्नर संदीप पाटील ने दी। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक उन्होंने बताया, “कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व बेंगलुरु मेयर संपत राज को डीजे हल्ली और केजी हल्ली में हुई हिंसा मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है।”

संपत राज को बेंगलुरु से गिरफ्तार किया गया है। उन पर हिंसक भीड़ को उकसा कर दंगे भड़काने का आरोप है। पिछले दिनों कोरोना के इलाज के दौरान संपत एक निजी अस्पताल में भर्ती होने के बाद फरार हो गए थे। इसके बाद से पुलिस लगातार इनकी तलाश कर रही थी।

13 नवंबर को कर्नाटक हाई कोर्ट ने संपत राज के लिए गैर जमानती वारंट भी जारी किया था। वहीं गृह मंत्री बसवराज बोम्मई ने वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता से अपील की थी कि वो आत्मसमर्पण कर दें नहीं तो फिर कानून अपना रास्ता अपनाएगा।

मालूम हो कि इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता संपत राज के नज़दीकी सहयोगी रियाजुद्दीन को गिरफ्तार करके न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। रियाजुद्दीन पर आरोप था कि उसने संपत राज को छुपने और फरार होने में मदद की। वह कॉन्ग्रेसी नेता को पहले नगरहोले स्थित एक फ़ार्महाउस लेकर गया था और उसने उसे कुछ दिनों तक संपत राज को वहीं छुपाया था। 

उल्लेखनीय है कि बेंगलुरू दंगे मामले में कॉन्ग्रेस नेता संपत राज को मुख्य षड्यंत्रकर्ताओं में एक माना जाता है। बेंगलुरु दंगों के मामले में केंद्रीय अपराध शाखा (CCB) द्वारा दायर की गई चार्जशीट के अनुसार कॉन्ग्रेस नेता संपत राज ने अपनी ही पार्टी के दलित विधायक अखंडा श्रीनिवास मूर्ति को निशाना बनाने के लिए एसडीपीआई (SDPI) जैसे कट्टर इस्लामी संगठनों से हाथ मिलाया था। 

850 पन्नों की चार्जशीट में CCB ने 52 लोगों को घटना का मुख्य आरोपित बताया था। इसके अलावा 30 से अधिक चश्मदीदों के बयान भी शामिल किए गए हैं, जाँच एजेंसी ने कॉन्ग्रेस के पूर्व मेयर संपत राज और जाकिर हुसैन को 51वाँ और 52वाँ आरोपित बताया है। 

नेहरू से मतभेद, कॉन्ग्रेस में बढ़ता मुस्लिम तुष्टीकरण… ‘पंजाब केसरी’ ने ऐसे बढ़ाया हिन्दू महासभा को

“मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।”

ये लाला लाजपत राय के आखिरी शब्द थे और यही भारत में अंग्रेजी हुकूमत के अंत की शुरुआत भी।

एक दौर था जब ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था। पूरी दुनिया में अंग्रेजों की तूती बोलती थी। सर्वशक्तिमान ब्रिटिश राज के खिलाफ 1857 में भारत में हुए बहुत बड़े सशस्त्र आंदोलन को बेहद निर्ममता के साथ कुचल दिया गया था। अंग्रेज भी यह मानते थे अब उन्हें भारत से कोई हिला भी नहीं सकता। फिर साल 1928 में भारत में एक शख्स की ब्रिटिश पुलिस की लाठियों से मौत हुई। और इस मौत ने ब्रिटिश साम्राज्य की चूलों को हिला दिया।

30 अक्टूबर 1928 को पंजाब में महान स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय पर बरसीं ब्रिटिश लाठियाँ दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील साबित हुईं। 17 नवंबर 1928 को हुई उनकी मौत के 20 साल के भीतर ही भारत को आजादी मिल गई।

1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश राज ने बड़ी चतुराई के साथ अपनी जड़ों को भारत में मजबूत किया था। लेकिन इन जड़ों को खोदकर भारतीय राष्ट्रवाद की परिभाषा को गढ़ने में जिन महान स्वतंत्रता सेनानियों ने भूमिका निभाई थी, उनमें लाल लाजपत राय अगली कतार के नेता थे।

एक साथ निभाई कई भूमिकाएँ

पंजाब के मोंगा जिले में 28 जनवरी 1865 को उर्दू के अध्यापक के घर में जन्मे लाला लाजपत राय बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। एक ही जीवन में उन्होंने विचारक, बैंकर, लेखक और स्वतंत्रता सेनानी की भूमिकाओं को बखूबी निभाया था। पिता के तबादले के साथ हिसार पहुँचे लाला लाजपत राय ने शुरुआत के दिनों में वकालत भी की। स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ जुड़कर उन्होंने पंजाब में आर्य समाज को स्थापित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

लाजपत राय एक बुद्धिमान बैंकर भी थे। उन्होंने ही देश को पहला स्वदेशी बैंक दिया। पंजाब नेशनल बैंक (PNB) की स्थापना की पहल लाजपत राय ने ही की थी। एक शिक्षाविद के तौर पर उन्होंने दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालयों का भी प्रसार किया। आज देश भर में डीएवी के नाम से जिन विद्यालयों को हम देखते हैं, उनके अस्तित्व में आने का बहुत बड़ा कारण लाला लाजपत राय ही थे।

कॉन्ग्रेस में गरम दल के नेता थे लाला लाजपत राय

वह देश के उन अग्रणी नेताओं में से थे, जो ब्रिटिश राज के खिलाफ बेखौफ होकर सामने आए और देशवासियों के बीच राष्ट्रवाद की भावना का प्रसार किया। उस दौर में भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस किसी भी मसले पर सरकार के साथ सीधे टकराव से बचती थी। मगर उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर कॉन्ग्रेस के भीतर ‘गरम दल’ की मौजूदगी दर्ज कराई। इन तीनों को उस वक्त ‘लाल-बाल-पाल’ की त्रिमूर्ति के तौर पर जाना जाता था।

ब्रिटिश राज के विरोध के चलते उनको बर्मा की जेल में भी भेजा गया। जेल से आकर वह अमेरिका भी गए, जहाँ सामाजिक अध्ययन करने के बाद वापस आकर भारत में गाँधी जी के पहले बड़े अभियान यानी असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने।

चौरी-चौरा के बाद बनाई कॉन्ग्रेस इंडिपेंडेंस पार्टी

1920 में जब अमेरिका से लौटे तो लाजपत राय को कोलकाता में कॉन्ग्रेस के खास सत्र की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया गया। जलियाँवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ उन्होंने पंजाब में ब्रिटिश शासन के खिलाफ उग्र आंदोलन किया। जब गाँधीजी ने 1920 में असहयोग आंदोलन छेड़ा तो उन्होंने पंजाब में आंदोलन का नेतृत्व किया। जब गाँधी जी ने चौरी चौरा घटना के बाद आंदोलन को वापस लेने का फैसला किया तो उन्होंने इस फैसले का विरोध किया। इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस इंडिपेंडेंस पार्टी बनाई।

साइमन कमीशन के विरोध में हुए शहीद

ब्रिटिश राज के खिलाफ लालाजी की आवाज को पंजाब में पत्थर की लकीर माना जाता था। जनता के मन में उनके प्रति इतना आदर और विश्वास था कि उन्हें ‘पंजाब केसरी’ यानी ‘पंजाब का शेर’ कहा जाता था। साल 1928 में ब्रिटिश राज ने भारत में वैधानिक सुधार लाने के लिए साइमन कमीशन बनाया। इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। बॉम्बे में जब इस कमीशन ने भारत की धरती पर कदम रखा तो इसके विरोध में ‘साइमन गो बैक’ के नारे लगे।

पंजाब में इसके विरोध का झंडा लाजपत राय ने उठाया। जब यह कमीशन लाहौर पहुँचा तो लाजपत राय के नेतृत्व में इसे काले झंडे दिखाए गए। बौखलाई ब्रिटिश पुलिस ने शांतिपूर्ण भीड़ पर लाठीचार्ज कर दिया। लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और इन लाठियों की चोट के चलते ही 17 नवंबर 1928 को उनका देहांत हो गया।

लाला लाजपत राय की मौत का भगत सिंह कनेक्शन

लाजपत राय की मौत पर एक ओर जहाँ पूरे देश में शोक की लहर दौर गई वहीं ब्रिटिश राज के खिलाफ आक्रोश भी फैलने लगा। क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू ने लाला की मौत का बदला लेने के लिए अंग्रेज पुलिस अधिकारी सांडर्स को 17 दिसंबर 1928 को गोली से उड़ा दिया

बाद में भगत सिंह और उनके साथी गिरफ्तार होकर फाँसी पर भी चढ़े। इन तीनों क्रांतिकारियों की मौत ने पूरे देश के करोड़ो लोगों को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ खड़ा करके एक ऐसा आंदोलन पैदा कर दिया, जिसे दबा पाना अंग्रेज सरकार के बूते से बाहर की बात थी।

लाजपत राय पूरे जीवन भर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूती से खड़ा करने की कोशिश में जुटे रहे, उनकी मौत ने इस आंदोलन को और मजूबत कर दिया। लाला ने ब्रिटिश लाठियों से घायल होते वक्त सही कहा था। उनके जिस्म पर पड़ी एक-एक लाठी वाकई ब्रिटिश राज के ताबूत की कील साबित हुई।

लाला लाजपत राय आजादी के मतवाले ही नहीं, बल्कि एक महान समाज सुधारक और महान समाजसेवी भी थे। यही कारण था कि उनके लिए जितना सम्मान गाँधीवादियों के दिल में था, उतना ही सम्मान उनके लिए भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों के दिल में भी था। 

समाज सेवी

लालाजी ने यूँ तो समाज सेवा का कार्य हिसार में रहते हुए ही आरम्भ कर दिया था, जहाँ उन्होंने लाला चंदूलाल, पण्डित लखपतराय और लाला चूड़ामणि जैसे आर्य समाजी कार्यकर्ताओं के साथ सामाजिक हित की योजनाओं के कार्यान्वयन में योगदान किया, किन्तु लाहौर आने पर वे आर्य समाज के अतिरिक्त राजनैतिक आन्दोलन के साथ भी जुड़ गए। 1897 और 1899 के देशव्यापी अकाल के समय लाजपत राय पीड़ितों की सेवा में जी जान से जुटे रहे। जब देश के कई हिस्सों में अकाल पड़ा तो वो राहत कार्यों में सबसे अग्रिम मोर्चे पर दिखाई दिए। देश में आए भूकंप, अकाल के समय ब्रिटिश शासन ने कुछ नहीं किया। उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ मिलकर अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा की। 

उनके व्यक्तित्व के बारे में तत्कालीन मशहूर अंग्रेज लेखक विन्सन ने लिखा था, “लाजपत राय के सादगी और उदारता भरे जीवन की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। उन्होंने अशिक्षित गरीबों और असहायों की बड़ी सेवा की थी। इस क्षेत्र में अंग्रेजी सरकार बिल्कुल ध्यान नहीं देती थी।” 1901-1908 की अवधि में उन्हें फिर भूकम्प एवं अकाल पीड़ितों की मदद के लिए सामने आना पड़ा।

बंगाल विभाजन का विरोध

लाला लाजपत राय ने देशभर में स्वदेशी वस्तुएँ अपनाने के लिए अभियान चलाया। अंग्रेजों ने जब 1905 में बंगाल का विभाजन कर दिया तो लालाजी ने सुरेंद्रनाथ बनर्जी और विपिनचंद्र पाल जैसे आंदोलनकारियों से हाथ मिला लिया और अंग्रेजों के इस फैसले का जमकर विरोध किया। 3 मई, 1907 को ब्रितानिया हुकूमत ने उन्हें रावलपिंडी में गिरफ्तार कर लिया। रिहा होने के बाद भी लाजपत राय आजादी के लिए लगातार संघर्ष करते रहे।

कॉन्ग्रेस में उग्र विचारों का प्रवेश

1924 में लालाजी कॉन्ग्रेस के अन्तर्गत ही बनी स्वराज्य पार्टी में शामिल हो गए और ‘केन्द्रीय धारा सभा’ के सदस्य चुन लिए गए। जब उनका पंडित मोतीलाल नेहरू से कतिपय राजनैतिक प्रश्नों पर मतभेद हो गया तो उन्होंने ‘नेशनलिस्ट पार्टी’ का गठन किया और पुनः असेम्बली में पहुँच गए। अन्य विचारशील नेताओं की भाँति वो भी कॉन्ग्रेस में दिन-प्रतिदिन बढ़ने वाली मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति से अप्रसन्नता अनुभव करते थे, इसलिए स्वामी श्रद्धानन्द तथा मदनमोहन मालवीय के सहयोग से उन्होंने ‘हिन्दू महासभा’ के कार्य को आगे बढ़ाया। 

1925 में उन्हें ‘हिन्दू महासभा’ के कलकत्ता अधिवेशन का अध्यक्ष भी बनाया गया। ध्यातव्य है कि उन दिनों ‘हिन्दू महासभा’ का कोई स्पष्ट राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था और वह मुख्य रूप से हिन्दू संगठन, अछूतोद्धार, शुद्धि जैसे सामाजिक कार्यक्रमों में ही दिलचस्पी लेती थी। इसी कारण कॉन्ग्रेस से उसे थोड़ा भी विरोध नहीं था। यद्यपि संकीर्ण दृष्टि से अनेक राजनैतिक कर्मी लालाजी के ‘हिन्दू महासभा’ में रुचि लेने से नाराज़ भी हुए, किन्तु उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और वे अपने कर्तव्यपालन में ही लगे रहे।

लेखन कार्य

उन्होंने ‘तरुण भारत’ नामक एक देशप्रेम तथा नवजागृति से परिपूर्ण पुस्तक लिखी, जिसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। उन्होंने ‘यंग इंण्डिया’ नामक मासिक पत्र भी निकाला। इसी दौरान उन्होंने ‘भारत का इंग्लैंड पर ऋण’, ‘भारत के लिए आत्मनिर्णय’ आदि पुस्तकें लिखीं, जो यूरोप की प्रमुख भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं। लालाजी परदेश में रहकर भी अपने देश और देशवासियों के उत्थान के लिए काम करते रहे थे। अपने चार वर्ष के प्रवास काल में उन्होंने ‘इंडियन इन्फ़ॉर्मेशन’ और ‘इंडियन होमरूल’ दो संस्थाएँ सक्रियता से चलाईं। लाला लाजपत राय ने जागरूकता और स्वतंत्रता के प्रयास किए। ‘लोक सेवक मंडल’ स्थापित करने के साथ ही वह राजनीति में आए।

ओजस्वी लेखक

लाला लाजपत राय जीवनपर्यंत राष्ट्रीय हितों के लिए जूझते रहे। वे उच्च कोटि के राजनीतिक नेता ही नहीं थे, अपितु ओजस्वी लेखक और प्रभावशाली वक्ता भी थे। ‘बंगाल की खाड़ी’ में हजारों मील दूर मांडले जेल में लाला लाजपत राय का किसी से भी किसी प्रकार का कोई संबंध या संपर्क नहीं था। अपने इस समय का उपयोग उन्होंने लेखन कार्य में किया। 

उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण, अशोक, शिवाजी, स्वामी दयानंद सरस्वती, गुरुदत्त, मेत्सिनी और गैरीबाल्डी की संक्षिप्त जीवनियाँ भी लिखीं। ‘नेशनल एजुकेशन’, ‘अनहैप्पी इंडिया’ और ‘द स्टोरी ऑफ़ माई डिपोर्डेशन’ उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं। उन्होंने ‘पंजाबी’, ‘वंदे मातरम्‌’ (उर्दू) और ‘द पीपुल’ इन तीन समाचार पत्रों की स्थापना करके इनके माध्यम से देश में ‘स्वराज’ का प्रचार किया। 

लाला लाजपत राय ने उर्दू दैनिक ‘वंदे मातरम्‌’ में लिखा था, “मेरा मज़हब हक़परस्ती है, मेरी मिल्लत क़ौमपरस्ती है, मेरी इबादत खलक परस्ती है, मेरी अदालत मेरा ज़मीर है, मेरी जायदाद मेरी क़लम है, मेरा मंदिर मेरा दिल है और मेरी उमंगें सदा जवान हैं।” 

लाजपत राय के प्रभावी वाक्य 

“राजनीतिक प्रभुत्व आर्थिक शोषण की ओर ले जाता है। आर्थिक शोषण पीड़ा, बीमारी और गंदगी की ओर ले जाता है और ये चीजें धरती के विनीततम लोगों को सक्रिय या निष्क्रिय बगावत की ओर धकेलती हैं और जनता में आज़ादी की चाह पैदा करती हैं।”

“सब एक हो जाओ, अपना कर्तव्य जानो, अपने धर्म को पहचानो, तुम्हारा सबसे बड़ा धर्म तुम्हारा राष्ट्र है। राष्ट्र की मुक्ति के लिए, देश के उत्थान के लिए कमर कस लो, इसी में तुम्हारी भलाई है और इसी से समाज का उपकार हो सकता है।”

लाजपत राय ने एक बार देशवासियों से कहा था, “मैंने जो मार्ग चुना है, वह गलत नहीं है। हमारी कामयाबी एकदम निश्चित है। मुझे जेल से जल्द छोड़ दिया जाएगा और बाहर आकर मैं फिर से अपने कार्य को आगे बढ़ाऊँगा, ऐसा मेरा विश्वास है। यदि ऐसा न हुआ तो मैं उसके पास जाऊँगा, जिसने हमें इस दुनिया में भेजा था। मुझे उसके पास जाने में किसी भी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं होगी।”

SC/ST और OBC का ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा ने उड़ाया मजाक, संजय राउत के इंटरव्यू में बताया ‘चूहा’

कॉमेडियन कुणाल कामरा एक बार फिर विवादों में घिर गया है। कुणाल कामरा द्वारा किए गए संजय राउत के एक साक्षात्कार की क्लिप सोशल मीडिया पर काफी सुर्ख़ियाँ बटोर रही है। इसमें वह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (SC, ST, OBC) के लोगों की रैट्स (चूहों) से तुलना करता है। साक्षात्कार के दौरान वह एक कैरिकेचर दिखाता है जिसमें लाल कृष्ण आडवाणी को ‘विचित्र बांसुरी वाले’ की तरह बनाया गया है, जो कई चूहों की अगुवाई कर रहे हैं और उन पर SC, ST, OBC लिखा हुआ है।

इस दौरान मंदिर वहीं बनाएँगे की धुन भी बज रही है। कुणाल कामरा के यूट्यूब चैनल पर यह एपिसोड 13 नवंबर को साझा किया गया था। 

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में हिस्सा लेने वाले हिंदुओं को चूहे की तरह दर्शाने के लिए सोशल मीडिया पर लोग जम कर नाराज हुए और उन्होंने इस अपमानजनक चित्रण के लिए कुणाल कामरा को खूब लताड़ लगाई। लोग बस इतना जानना चाहते थे कि क्या शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस SC, ST, OBC के इस घृणित चित्रण से सहमत है। 

पूरे साक्षात्कार के दौरान कुणाल कामरा ने संजय राउत का मज़ाक उड़ाने का प्रयास किया। शिवसेना सांसद इस बात से बेख़बर नज़र आ रहे थे कि उनके दल के नेताओं द्वारा अतीत में दिए गए बयानों और साक्षात्कार के दौरान दिए गए उनके बयानों की तुलना की जा रही थी। संभावित तौर पर ऐसा साक्षात्कार रिकॉर्ड करने के बाद किया गया होगा। 

मसलन अतीत में शिवसेना, उद्धव ठाकरे, संजय राउत द्वारा हिंदुत्व, संविधान और राजनीति में धर्म पर की गई टिप्पणी की, शिवसेना नेता द्वारा साक्षात्कार के दौरान की गई टिप्पणी से तुलना की गई। कुणाल कामरा ने इस बात का भी मज़ाक बनाया कि शिवसेना महाराष्ट्र में मंदिरों को खोलने की अनुमति नहीं दे रही थी। 

इस साक्षात्कार के एक और हिस्से में एडोल्फ हिटलर को भाषण देते हुए सुना जा सकता है, लेकिन पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आवाज़ सुनाई देती है। यानी इसके माध्यम से कुणाल कामरा दिखाना चाहता है कि मोदी हिटलर जैसे हैं। इसके बाद सुशांत सिंह राजपूत के मामले पर चर्चा करते हुए संजय राउत ने कहा कि मुंबई पुलिस ‘बेस्ट पुलिस’ है। 

इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय को भगवा रंग में दिखाया गया है और उसके ऊपर भाजपा का झंडा है। उल्लेखनीय है कि ट्विटर पर सर्वोच्च न्यायालय के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी करने के बाद कुणाल कामरा पर न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया जा चुका है। इस साक्षात्कार की शुरुआत में देखा जा सकता है कि संजय राउत और कुणाल कामरा ने एक खिलौने वाला बुलडोजर लिया है और फिर शिवसेना सांसद बॉलीवुड अभिनेत्री पर अपरोक्ष रूप से टिप्पणी करते हैं। 

इसके बाद कंगना रनौत के दफ्तर पर की गई महाराष्ट्र प्रशासन की कार्रवाई को लेकर डींग भी मारते हैं। एक जगह संजय राउत कहते हैं कि महाराष्ट्र सरकार जानकारी देते-देते थक गई थी। बुलडोजर अपने आप सही समय पर निर्धारित पते पर जाता है, इसके बाद स्क्रीन पर गूगल मैप पर रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के पूरे पते का पॉपअप (जानकारी) आता है।  

जीत आपकी: हारने के 101 फायदे बताने वाली वीडियो देखते पकड़े गए महागठबंधन के सदस्य, तेजस्वी यादव ने बताई वजह

“किसी को कुर्सी मिली किसी के हिस्से सत्ता आई, मैं महागठबंधन था मेरे हिस्से EVM आई”

बिहार चुनावों की चकल्लस को आखिरकार नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही पूर्णविराम लग गया। इस सबके बीच जो चर्चा कहीं नहीं हुई, वह चर्चा थी महागठबंधन और लिबरल्स की नई उम्मीद चाराभक्षी लालू पुत्र तेजस्वी यादव की। उनके हिस्से मशहूर शायर मुनव्वर काणा की ये शायरी ही आ सकी है।

राग EVM, लोकतंत्र की हत्या, और फासीवादी नारों के बावजूद बिहार की सत्ता से दूर रहने के बाद महागठबंधन के नेता निष्पक्ष पत्रकारों के ट्वीट्स और अखबारों की हेडलाइन से अचानक गायब हो गए हैं। लेकिन एक खोजी पत्रकार ने हमें महागठबंधन के बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी दी है।

नाम न बताने की शर्त पर महागठबंधन के एक अंदर के ही आदमी ने हमें बताया है कि चुनावी नतीजों के बाद चल रही सर फुटव्वल के बीच तेजस्वी यादव ने समस्त महागठबंधन के नेताओं को महान मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक शिव खेड़ा की पुस्तक ‘जीत आपकी’ पढ़ने के सख्त निर्देश दिए हैं। इसके अलावा, संदीप माहेश्वरी की यूट्यूब वीडियो भी रोजाना देखने की सलाह महागठबंधन की बैठक में सर्वसहमति से ली गई। यह फैसला पाँच साल बाद बिहार में अपनी सत्ता स्थापित करने के प्रयासों में पहला कदम बताया जा रहा है।

बिहार के मतदाताओं को हल्के में ना लेते हुए शुरू से ही विभिन्न रूप धरकर मतदाताओं के प्रत्येक वर्ग को रिझाने में कामयाब रहे तेज प्रताप यादव ने भी संदीप माहेश्वरी की मोटिवेशनल वीडियो रोजाना देखने की बात स्वीकार की है।

तेजस्वी यादव ने कहा कि उन्होंने 9वीं से आगे न पढ़ने का मन ही महान मोटिवेशनल स्पीकर संदीप माहेश्वरी की वो वीडियो देखकर बनाया था, जिनमें उन्होंने 10वीं में फेल होने के 101 फायदों के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने कहा कि फेल होने वाले लोगों का मनोबल बढ़ाने और फेल होने के फायदे गिनने वाले इन भाषणों के बीच में बजने वाली भावुक धुन उन्हें फेल होने के लिए विवश करती आई हैं।

वहीं, तेज प्रताप यादव का कहना है कि उनके पिता लालू प्रसाद यादव भी शिव खेड़ा की पुस्तक ‘जीत आपकी’ ही पढ़ा करते थे, और उन्होंने भारतीय राजनीति में एक बड़ी जगह बनाई। जब महान राजनीतिज्ञ और दूरदर्शी नेता अनंत सिंह जी से प्रश्न किया गया कि क्या उन्होंने भी चुनाव जीतने के लिए कभी किसी मोटिवेशनल स्पीकर की वीडियो का सहारा लिया है? इस पर अनंत सिंह जी ने जवाब दिया – “$#@ का मोटिवेशनल स्पीकर!”

कुछ ख़ुफ़िया रिपोर्टर ने यह जानकारी भी हासिल करने की कोशिश की कि क्या लालू पुत्रों की ही तरह कॉन्ग्रेस के युवराज राहुल गाँधी भी किसी मोटिवेशनल स्पीकर की मदद से ही हर चुनाव हार रहे हैं। इस पर जब राहुल गाँधी से उनके इंटरव्यू का समय माँगा तो उस समय वो चुनाव की तैयारियों के तनाव को दूर करने के लिए चंपक का अध्ययन कर रहे थे।

खबर लिखे जाने तक शिव खेडा की पुस्तक ‘जीत आपकी’ की कुछ प्रतियाँ महागठबंधन के आधे सदस्यों के बीच बाँट दी गई और संदीप माहेश्वरी की वीडियो की कैसेट के ऑर्डर जारी कर दिए गए थे। महागठबंधन के के लिए इनके स्वाध्याय और रीविजन का लक्ष्य 2025 तय किया गया है।

ओडिशा: भद्रक में दीवाली के दिन मिला प्राचीन शिवलिंग, पार्क बनाने के लिए हो रही थी खुदाई

दीवाली के दिन ओडिशा के भद्रक जिला स्थित गोरामाटी गाँव के मैदान में प्राचीन शिवलिंग खुदाई के दौरान मिली। रिपोर्टों के अनुसार, मैदान में एक पार्क बनाने के लिए खुदाई चल रही थी। इसी दौरान एक ट्रैक्टर किसी चट्टान से टकराकर क्षतिग्रस्त हो गया।

जब कर्मियों ने चट्टान को ज़मीन से उखाड़ने की कोशिश की, तो पाया कि वह एक शिवलिंग है। मौके पर कई अन्य कलाकृतियाँ भी पायी गईं। कर्मियों ने तुरंत सरपंच तथा स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी दी।

स्थानीय लोग पूजा-अर्चना करने पहुँचे

निकटवर्ती गाँवों में शिवलिंग की खबर पहुँचते ही लोग भारी संख्या में मौके पर पहुँचे और पूजा-अर्चना की। हालाँकि यह शिवलिंग प्राचीन मालूम तो होता है, परन्तु विशेषज्ञों ने अब तक कोई परीक्षण नहीं किया है, जिससे इसकी सही उम्र का पता लगता हो। स्थानीय लोगों का मानना है कि अमावस्या के दिन शिवलिंग का मिलना काफी शुभ है। ओडिशा पोस्ट के अनुसार कुछ गाँववालों ने बताया, “कल अमावस्या का दिन था। ऐसे शुभ दिन में शिवलिंग और मूर्ति का मिलना और कुछ नहीं, बल्कि ईश्वर का आशीर्वाद है।”