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‘टिप्पणी के साथ समाचार मीडिया का अधिकार’: मलयाला मनोरमा के खिलाफ मानहानि का मामला खारिज

केरल उच्च न्यायालय ने आर चंद्रशेखरन और तीन अन्य द्वारा दायर मलयालम दैनिक समाचार पत्र मलयाला मनोरमा के खिलाफ मानहानि के मामले को खारिज कर दिया। बता दें कि मलयाला मनोरमा के मैनेजिंग संपादक, मुख्य संपादक और प्रकाशक के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी। मामले में जिला मजिस्ट्रेट द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बाद अखबार ने उच्च न्यायालय का रुख किया था।

केरल उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रेस को अपनी अभिव्यक्ति के साथ किसी भी समाचार को प्रकाशित करने का अधिकार है, जब तक कि वह गलत इरादे से नहीं किया जाता है या फिर इससे सार्वजनिक हित का नुकसान नहीं होता है। न्यायमूर्ति पी सोमराजन ने कहा कि इस तरह के समाचार को अगर जनता की भलाई के लिए सच्चाई के साथ दिखाया जा रहा हो, तो यह मानहानि के आरोपों के अधीन नहीं आता है।

न्यायालय ने माना कि मलयाला मनोरमा द्वारा प्रकाशित विजिलेंस रिपोर्ट में शिकायतकर्ता का उल्लेख मामले में आरोपित के रूप में किया गया था। यहाँ पर बता दें कि समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट घटना का वास्तविक संस्करण था और यह मानहानि की शिकायत को चौथे स्तम्भ में पीछे छोड़ देता है।

जस्टिस पी. सोमराजन ने कहा, “धारा 499/पीसी के तहत पहले नियम में लोकतांत्रिक प्रणाली में एक व्यापक प्रचार और उसकी आवश्यक टिप्पणियों के साथ समाचार प्रकाशित करने का अधिकार मिला है और कभी-कभी अवमानना ​​करने वाले विचारों को तब तक निष्फल नहीं किया जा सकता है, जब तक कि उसके खिलाफ कुछ गलत न लिखा गया हो। समाचार अगर सत्यता से जुड़ी है, जिसे सार्वजनिक सद्भावना के लिए प्रकाशित की गई हो तो वह अवमानना की श्रेणी में नहीं आता है।”

अदालत ने कहा, “सभी समाचार सामग्री को प्रकाशित करना चौथे स्तम्भ का कर्तव्य है, विशेष रूप से सार्वजनिक महत्व के मामले में और यह उनका कर्तव्य है कि वे समाचार आइटम पर टिप्पणी करें ताकि समाज को सतर्क कर सकें। यह सेक्शन 499 आईपीसी से जुड़े पहले अपवाद के तहत आता है। ”

अदालत ने कहा, “चौथे स्तम्भ से सार्वजनिक महत्व को नियंत्रित करने वाले मामलों से दूर रहने की उम्मीद नहीं की जाती है। यह उनका एकमात्र कर्तव्य है कि वे अपने पक्ष और विपक्षों के साथ समाज की सेवा करें ताकि समाज को अधिक कार्यात्मक और सतर्कता मिल सके। चौथा स्तम्भ लोकतांत्रिक समाज में सार्वजनिक हित/सार्वजनिक महत्व को नियंत्रित करने वाले प्रत्येक मामले को संबोधित करने और टिप्पणी करने के लिए एक शिलालेख की तरह है। आवश्यक टिप्पणी के साथ प्रकाशित समाचार सामग्री के खिलाफ अवमानना दर्ज नहीं किया जा सकता। तब तक मानहानि की राशि नहीं दी जा सकती जब तक कि धारा 499 आईपीसी के तहत यह परिभाषित नहीं किया जा सकता।”

PFI और अल-कायदा से जुड़े तुर्किश समूह IHH के बीच लिंक, सामने आई तस्वीरें: स्वीडिश संगठन का दावा

स्वीडिश रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन नॉर्डिक मॉनिटर ने तुर्की के कट्टरपंथी समूह आईएचएच (İnsan Hak ve Hürriyetleri ve İnsani Yardım Vakfı) और कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के बीच सॉंठगॉंठ का दावा किया है। रिपोर्ट के अनुसार दोनों कट्टरपंथी समूह के लोगों की 2019 के लोकसभा चुनाव से सात महीने पहले 20 अक्टूबर 2018 को मुलाकात हुई थी।

गुपचुप हुई यह बैठक दक्षिण-पूर्व एशिया में मजहब का उम्माह बनने की तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन की रणनीति का हिस्सा थी। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बैठक में भाग लेने वाले दो प्रमुख पीएफआई नेता ईएम अब्दुल रहमान और प्रोफेसर पी कोया थे। इसमें IHH के महासचिव डरमुस आयडिन (Durmuş Aydın) और IHH के उपाध्यक्ष हुसेन ओरुके (Hüseyin Oruç) ने भाग लिया और विभिन्न क्षेत्रों में साझेदारी पर चर्चा की गई।

नॉर्डिक मॉनिटर का कहना है कि IHH तुर्की की खुफिया सेवा MIT के साथ काम करता है, जिसका नेतृत्व एर्दोगन के वफादार और इस्लामी नेता हकन फिदान करते हैं। यह भी कहा गया कि पीएफआई को तुर्की की सरकार द्वारा संचालित मीडिया अनादोलु द्वारा एक नागरिक और सामाजिक समूह के रूप में प्रचारित किया गया था। आईएचएच पर आरोप लगा था कि उसने जनवरी 2014 में सीरिया में अल-कायदा से संबद्ध जिहादियों को हथियारों की तस्करी की थी।

IHH और PFI के बीच मुलाकात की तस्वीर (साभार: Nordic Monitor)

रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “IHH को रूस द्वारा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में 10 फरवरी 2016 को जमा किए गए खुफिया दस्तावेजों में सीरिया में जिहादी समूहों के लिए हथियारों की तस्करी करने वाला संगठन बताया गया था। रूसी खुफिया दस्तावेजों में IHH द्वारा भेजे गए ट्रकों की लाइसेंस प्लेट संख्या का भी जिक्र था और बताया गया था कि हथियारों से भरे ये ट्रक अल-कायदा से संबद्ध अल नुसरा फ्रंट को भेजे गए थे।”

नॉर्डिक मॉनिटर ने यह भी कहा कि तुर्की में एर्दोगन शासन अपने कूटनीतिक ताकत का उपयोग करके वैश्विक परिचालन में आईएचएच की मदद कर रहा है। भारत में पीएफआई पर हिंसा के कई मामलों में शामिल होने का आरोप है और उसके सदस्यों पर हत्या का भी आरोप है। प्रवर्तन निदेशालय ने पीएफआई पर देश भर में सीएए विरोधी दंगों के फंडिंग का आरोप लगाया था।

(From L to 2nd R) Prof. P Koya, Durmuş Aydın, Hüseyin Oruç, E. M. Abdul Rahiman (Image Credit: Nordic Monitor)

यूपी के पुलिस प्रमुख ओपी सिंह ने कहा था कि कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों- पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफआई) के सदस्य और उसके राजनीतिक मोर्चे, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (एसडीपीआई), जिसमें समाजवादी पार्टी जैसे राजनीतिक दल शामिल हैं, सीएए के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राज्य भर में हिंसा भड़काने के लिए लोगों को भड़काने और उकसाने में शामिल थे। यूपी पुलिस ने राज्य में व्यापक हिंसा के बाद पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की वकालत की थी।

‘हम पूर्वजों का कब्र भी ले जा रहे, वे उसे भी नहीं छोड़ेंगे’: जानिए, खुद का ही घर क्यों फूँक रहे अर्मेनियाई

कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान इस्लामी मुल्क अजरबैजान (Azarbaijan) और अर्मेनिया (Armenia) बीच चली जंग ने दुनिया को चौंका दिया। अब शांति समझौते के तहत अर्मेनिया अपने विवादित क्षेत्र नागोर्नो-कराबाख को अजरबैजान को सौंपने पर सहमत हो गया है। इससे पहले नागोर्नो कराबाख में अपने घर खाली करने से पहले लोग उनमें आग लगा रहे हैं

अर्मेनियाई अलगाववादियों द्वारा दशकों से नियंत्रित किए जा रहे अजरबैजान में कलाबाजार जिले के लोगों ने इस सप्ताह बड़े पैमाने पर पलायन शुरू किया। अर्मेनियाई सैनिकों द्वारा समर्थित अलगाववादियों और अजरबैजान सेना के बीच लड़ाई सितंबर के अंत में नागोर्नो-कराबाख क्षेत्र में शुरू हुई थी। यह जंग छह हफ्ते तक चली।

रिपोर्ट के अनुसार शनिवार (नवंबर 14, 2020) को अर्मेनियाई लोगों द्वारा कालबाजार गाँव में कम से कम 6 घरों में आग लगा दी गई, जबकि रविवार को 10 से अधिक घरों में आग लगाई गई। अपने घर को आग के हवाले करने के लिए मजबूर एक अर्मेनियाई निवासी ने कहा, “यह मेरा घर है, मैं इसे उनके लिए नहीं छोड़ सकता। आज हर कोई अपने घर को जलाने जा रहा है। हमें घर छोड़ने के लिए आधी रात तक का समय दिया गया था। हमने अपने माता-पिता की कब्रों को भी स्थानांतरित कर दिया, वे उसे भी नहीं छोड़ते। यह असहनीय है।”

एक अन्य अर्मेनियाई आर्सेन ने कहा कि वे अजरबैजानियों के लिए कुछ भी चीज उपयोग करने लायक नहीं छोड़ रहे हैं। उन्हें अपने घर को राख करना होगा। अर्मेनियाई लोग अपने घर जलाने से पहले जो कुछ भी अपने साथ ले जा सकते थे, उसे ट्रकों पर लोड किया। अधिकांश परिवारों ने अपने घरों से अधिकांश वस्तुओं को हटा दिया, कुछ ने  घरों को जलाने से पहले दरवाजों और खिड़कियों को भी हटा दिया और ट्रकों पर लोड कर लिया, जिसे वे अपने नए घरों में उपयोग कर पाएँगे।

संघर्ष की पृष्ठभूमि

तुर्की और अजरबैजान के पास कॉकेशस पहाड़ियों में बसा अर्मेनिया एक छोटा देश है। अजरबैजानियाई जातीय तुर्क हैं और तुर्की के समान धर्म और संस्कृति हैं। लंबे समय तक, ज्यादातर ईसाई अर्मेनियाई लोग ओटोमन साम्राज्य द्वारा उपनिवेश बनाए गए थे। सोवियत ने 1920 के दशक में जमीन पर कब्जा कर लिया था और अर्मेनिया को तीन सोवियत गणराज्य: जॉर्जिया, अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच बाँटा गया था।

1990 के दशक में जब सोवियत साम्राज्य का पतन हुआ, तब अर्मेनिया और अजरबैजान दोनों स्वतंत्र हो गए। लेकिन अर्मेनियाई लोगों की आबादी वाली भूमि का एक हिस्सा अजरबैजान का हिस्सा बना रहा। इस क्षेत्र को नागोर्नो-करबाख के नाम से जाना जाता है। तनाव भड़क गया और 1990 के दशक में इस क्षेत्र ने अर्मेनिया द्वारा समर्थित स्वतंत्रता की घोषणा की। गतिरोध लगभग तीन दशकों से है। अर्मेनियाई लोग जल्दी हार गए और अब उनमें से हजारों लोगों के पास अपने घरों को पीछे छोड़ने और पलायन करने के लिए एक सप्ताह से भी कम समय है।

‘कॉन्ग्रेस में न नेतृत्व, न दिशा’: गोवा कॉन्ग्रेस के मुल्ला ने दिया इस्तीफा, सोनिया गाँधी को भेजा खत

गाँधी परिवार की अगुवाई में कॉन्ग्रेस पार्टी को एक बाद एक झटके लग रहे है। बिहार विधानसभा में करारी हार के बाद, अब गोवा प्रदेश कॉन्ग्रेस अल्पसंख्यक कमेटी के अध्यक्ष, उरफान मुल्ला ने पार्टी में दिशा और नेतृत्व की कमी का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, उरफान मुल्ला ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक पत्र लिखकर अपना दर्द बताया है। मुल्ला ने सोनिया गाँधी को लिखे पत्र में कहा है, “कॉन्ग्रेस संगठन, दिशा और नेतृत्व की कमी से ग्रस्त है। गोवा में पार्टी के पुराने नेता निर्णय लेने में बुरी तरह विफल रहे हैं।”

गौरतलब है कि उरफान मुल्ला के इस्तीफा से पहले पार्टी के 23 सदस्यों ने भी सोनिया गाँधी को एक पत्र लिख पार्टी की स्थिति को लेकर चिंता और काम करने के तरीकों को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। पत्र में कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की तुरंत बैठक बुलाकर बिहार में चुनावी असफलता पर चर्चा करने और कथित तौर पर पार्टी में संगठनात्मक चुनाव की माँग की है।

रेडिफ पर प्रकाशित आर राजगोपालन की रिपोर्ट में बताया गया है कि सीडब्ल्यूसी के पाँच सदस्यों ने पत्र लिखे जाने की पुष्टि की है। कथित तौर पर पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि जब बिहार चुनाव प्रचार चरम पर था और यहाँ तक कि जिस दिन नतीजे आने थे, उस दिन भी पार्टी का नेतृत्व करने की बजाए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा शिमला में छुट्टियाँ मना रहे थे।

पत्र में बिहार की चुनावी असफलता के संदर्भ में कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा कई तरह की चिंता जताई गई है। साथ ही अहमद पटेल के कोरोना संक्रमण और महामारी के कारण नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय 24, अकबर रोड में राजनीतिक गतिविधियाँ ठप होने को लेकर भी चिंता जाहिर की गई है।

रेडिफ ने एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा, “क्या इस तरह की लापरवाही कोई और पार्टी दिखाई सकती है जिसका राष्ट्रीय प्रभव हो?” रिपोर्ट में एक अन्य नेता के हवाले से पार्टी में पैदा शून्य को लेकर कहा गया है, “कॉन्ग्रेस केवल प्रवक्ताओं के टेलीविजन बहस के आसरे चल रही है।”

बाहुबल+धनबल से बनेगी तेजस्वी सरकार? अनंत सिंह, रीतलाल यादव सहित कई को मोर्चे पर लगाया

10 नवंबर 2020 को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। 243 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 122 सीटों की जरूरत थी और एनडीए को 125 सीटें मिली। राजद, कॉन्ग्रेस और वामदलों के विपक्षी गठबंधन को 110 सीटें ही मिली। जनादेश के अनुरुप नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार बनाने भी जा रही है।

लेकिन मीडिया रिपोर्टों के अनुसार तेजस्वी यादव की अगुवाई में राजद बाहुबल और धनबल के दम पर जनादेश को अगवा कर सरकार बनाने की जोड़ तोड़ में जुटी है। यह सब तब हो रहा है जब लिबरल गैंग तेजस्वी यादव को ‘जंगलराज का युवराज’ कहे जाने पर आपत्ति जाहिर कर रहा है। लालू-राबड़ी के जंगलराज को आँकड़ों की बाजीगरी से छिपाने की कोशिश कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अब राजद साम-दाम-दंड-भेद सभी अपनाकर किसी तरह सत्ता हथियाना चाहती है। इसके लिए पार्टी को बाहुबलियों से हाथ मिलाने में भी कोई गुरेज नहीं है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो जेल में बंद बाहुबली अनंत सिंह और अपराध जगत से राजनीति में आकर पहली बार दानापुर से MLA बने रीतलाल यादव को बड़ी जिम्मेदारी दी गई है। तेजस्वी ने “महागठबंधन सरकार” के जुगाड़ के लिए जो टास्क फोर्स बनाई है, उसमें मनी और पॉलिटिक्स के हिसाब से भी काम दिया गया है। तीनों तरह के लोग इस मुहिम में जुट गए हैं। इसके अलावा बाहुबली सुनील सिंह को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इस तरह की जोड़-तोड़ की राजनीति करके राजद एक बार फिर से अपनी पुरानी छवि को जिंदा करना चाह रही है। अगर ऐसा नहीं है तो फिर राजद ने अनंत सिंह और रीतलाल यादव को जिम्मेदारी क्यों सौंपी है? क्या वे रणनीतिकार हैं। जिस अनंत सिंह को कल तक तेजस्वी यादव असामजिक तत्‍व कह कर नकार रहे थे, आज वही अनंत सिंह राष्‍ट्रीय जनता दल का ‘दुलारा’ बन गया है। 

वहीं अगर रीतलाल यादव की बात करें तो उन पर बीजेपी नेता सत्यनारायण सिन्हा की हत्या का संगीन आरोप है। इसके अलावा रीतलाल यादव के दूसरे अपराधों की फेहरिस्त काफी लंबी है जिस वजह से वो कई सालों से जेल में ही बंद हैं। तो क्या ऐसे ‘नेता’ अब बिहार की सत्ता की बागडोर सँभालेंगे?

राजद के वरिष्ठ नेता मनोज झा ने रविवार (नवंबर 15, 2020) की सुबह ट्वीट कर लोगों के मन में संशय पैदा कर दिया।

मनोज झा ने रविवार की सुबह अपने ट्वीट में लिखा, “जनता जनार्दन के ‘फैसले’ व प्रशासन की ओर से जारी ‘नतीजों’ के बीच फासला को समझने के लिए ज़रूरी है कि ‘जनादेश प्रबंधन’ की इस अद्भुत कला को समझा जाए। ये कला सबके लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए बिहार के युवा, संविदा कर्मी, नियोजित शिक्षक स्तब्ध हैं। बिहार अभी ‘खुला’ हुआ है।” ट्वीट की इस आखिरी पंक्ति का मतलब समझने की कोशिश में लोग लगे रहे। एक यूजर ने उनसे पूछा कि क्‍या वे सरकार बनाने की कोशिश जारी रखेंगे तो उन्‍होंने कहा, “बिहार जल्‍द ही अपना स्‍वत: स्‍फूर्त प्‍लान लाएगा।”

इसके अलावा मनोज झा ने कहा कि आखिर 40 सीट पाने वाला कोई व्यक्ति कैसे मुख्यमंत्री बन सकता है? बिहार विधानसभा चुनाव का जनादेश उनके खिलाफ है, उन्हें बुरी तरह परास्त किया गया है और उन्हें खुद इस बारे में सोचना चाहिए था, लेकिन बिहार अपना विकल्प खुद खोज लेगा, जो अचानक होगा। झा ने दावा किया कि यह हफ्ते, दस दिन या एक महीने के भीतर होगा।

मनोज झा के बयान से स्पष्ट है कि राजद सत्ता में आने के लिए पर्दे के पीछे से पूरी जुगत लगाने में जुटा है। मगर क्या बिहार की जनता ऐसा चाहती है? बिल्कुल नहीं और उन्होंने यह बात अपने मताधिकार के प्रयोग से साफ कर दिया। बिहार की जनता ने तेजस्वी यादव को अपना नेता नहीं माना, उन्होंने नीतीश को ही एक बार फिर से राज्य की बागडोर सँभालने के लिए बहुमत दिया। इसके पीछे कारण है। लोगों के मन में आज भी जंगलराज का खौफ कायम है। 

लोगों में वर्तमान सत्ता के प्रति यदि आक्रोश और असंतोष था तो जनता ने समूचे एनडीए को क्यों नहीं हराया? क्यों और कैसे भाजपा जदयू से ज्यादा सीटें जीती? तेजस्वी की अगुवाई में विपक्ष का महागठबंधन क्यों इस आक्रोश और असंतोष को भुनाने में असफल रहा? वो इसलिए क्योंकि जनता आज भी जंगलराज के दौर को भूली नहीं है। अब पर्दे के पीछे सरकार बनाने की यह रणनीति बताती है कि चुनाव के दौरान जंगलराज लौटने का जो डर लोग जता रहे थे वह बेजा नहीं था।

‘राम की पूजा के कारण रेप’: हिंदू घृणा से सनी महिला के आयुष मंत्रालय से जुड़े होने के दावे को मंत्री ने नकारा

हिंदू घृणा से पोस्ट लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अक्सर ऐसे पोस्ट को लोग नजरअंदाज करना ज्यादा पसंद करते हैं। यदि कोई इनके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे चुप करा दिया जाता है।

निहारिका सिंह उर्फ मिशा ठाकुर का भी मामला हिन्दूफोबिया से जुड़ा है। निहारिका की फेसबुक प्रोफाइल के अनुसार, वह भारत सरकार के आयुष मंत्रालय में पब्लिक स्पीकर और मीडिया सलाहकार है। दीवाली के मौके पर निहारिका ने ट्विटर पर एक पोस्ट साझा कर दावा किया कि भगवान राम ‘कायर’, ‘पितृसत्तावादी’ और ‘स्त्री द्वेषी’ थे।

उसने लिखा, “दीवाली एक ऐसा त्योहार है जब महिलाओं को यह याद दिलाना चाहिए कि सीता को राम से तलाक लेना चाहिए था, जब उन्होंने ‘अग्नि परीक्षा’ करके उन्हें पवित्रता साबित करने के लिए कहा। यह ठीक नहीं है कि कोई पुरुष किसी भी महिला से खुद को शुद्ध साबित करने के लिए जलने के लिए कहे।”

फेसबुक से लिया गया स्क्रीनशॉट

अग्निपरीक्षा या उस युग की सांस्कृतिक बारीकियों के पीछे के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ठीक से समझे बिना मनगढंत कहानी को जारी रखते हुए उसने कहा, “यह सेक्स और नैतिकता संबंधित नहीं हैं और यदि यह है तो दोनों पक्षों को यह साबित करने की आवश्यकता है कि वे दूसरे से क्या पूछ रहे हैं। राम एक डरपोक व्यक्ति था, एक पितृसत्तावादी और स्त्रियों से घृणा करने वाला। सीता ने अपने हक की लड़ाई नहीं लड़ी और उनकी शर्तें मानती चली गईं। इसका लेखक एक पुरुष था। ऐसे देवी और देवता, इनकी अवहेलना करनी चाहिए, न की पूजा। दीवाली पीरियड की शुभकामनाएँ।”

आयुष मंत्रालय की इस मीडिया सलाहकार को आपत्तिजनक पोस्ट को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर लताड़ लगी है। इसके बाद भी उसने खुशी जताते हुए फेसबुक पोस्ट की रीच बढ़ाने के लिए ‘बेरोजगार भक्तों’ का धन्यवाद दिया। निहारिका ने लिखा, “Woohoo, लगता है कि आप लोग मेरी आज्ञा का पालन कर रहे हैं, यहाँ मैं दोहराना चाहती हूँ: ओवरटाइम काम करो भक्तों, वैसे भी तुम बेरोजगार हो… मेरी पोस्ट पर सभी लोग टिप्पणी कर रहे हैं, इसकी पहुँच बढ़ाने के लिए अग्रिम धन्यवाद। मैं वास्तव में इस संदेश को अधिकतम लोगों तक पहुँचाना चाहती हूँ। ”

आलोचनाओं का जवाब देते हुए निहारिका सिंह ने लिखा, “भारत में 89 महिलाओं के साथ रोज बलात्कार और उत्पीड़न होता है, क्योंकि हम स्त्री से घृणा करने वाले जैसे कि राम की पूजा करते हैं। भौंकते रहो। मुझे राइट विंग को नीचा दिखाने के लिए राइट विंग से ही अग्रीमेंट मिला है।”

उल्लेखनीय है कि भारत सरकार के साथ काम करने वाली निहारिका सिंह का हिन्दू घृणा से भरा यह कोई पहला पोस्ट नहीं है। सिंह ने 23 अक्टूबर को एक पोस्ट शेयर किया था। जिसमें उसने ‘मार्क्सवादी’ ने बीआर अंबेडकर और हिंदू-विरोधी पेरियार के उदाहरणों का हवाला देते हुए, मनुस्मृति को फिर से जलाने की माँग की थी।

ट्विटर स्क्रीनशॉट

हाथरस मामले में भी उसने एक फर्जी खबर को हवा दी थी। जहाँ पीड़िता को कथित तौर पर संदीप नाम के युवक ने गला घोंट कर मार दिया था और बलात्कार किया था। उसने ट्वीट किया था, “हिन्दू राष्ट्र बलात्कारी है।” जबकि वह इसके बजाय आरोपित का नाम ले सकती थी, निहारिका ने जान-बूझकर हिन्दू घृणा से भरे संदेश को प्रचारित करने के लिए हिन्दू राष्ट्र शब्द का भी इस्तेमाल किया।

ट्विटर स्क्रीनशॉट

इसके अलावा सिंह ने भारत में वाम-उदारवादी इकोसिस्टम में फासीवाद और हिंदू आबादी के खिलाफ मुस्लिमों द्वारा किए अपराधों पर पर्दा डालने का काम भी किया है।

इंस्टाग्राम पर 17 अक्टूबर को किए गए एक पोस्ट में उसने अमेरिकी उपन्यासकार फिलिप रोथ को कोट करते हुए हिंदुओं पर जमकर हमला किया। एक तरफ उसने हिंदुत्ववादियों की आलोचना की वहीं देश के प्रति प्रेम का ढोंग भी रचा। उसने पोस्ट में दिल्ली दंगा साजिशकर्ता और कट्टरपंथी इस्लामी उमर खालिद की रिहाई की माँग करते हुए गैरकानूनी गतिविधियों (रोकथाम) अधिनियम को निरस्त करने की माँग की।

इंस्टाग्राम स्क्रीनशॉट

आयुष मंत्रालय की मीडिया सलाहकार भाजपा की मुखर आलोचक रही हैं। भाजपा सरकार को फासीवादी बताने के लिए वह अक्सर फर्जी समाचारों और वामपंथी प्रोपेगेंडा का सहारा लेती है। 22 अक्टूबर को साझा किए गए एक ट्विटर पोस्ट में उसने ’पत्रकार’ और फर्जी खबरों का प्रचार-प्रसार करने वाली रोहिणी सिंह का हवाला दिया कि मोदी सरकार वोट के लिए घातक कोरोनावायरस के वैक्सीन का इस्तेमाल कर रही हैं। उसने कहा, “वोट के बदले वैक्सीन? और कितना गिरोगे?”

ट्विटर स्क्रीनशॉट

निहारिका सिंह ने 19 जून को एक फेसबुक पोस्ट में भारत सरकार का विरोध करते हुए नजर आई थी। उन्होंने लिखा, ”मोदी मेरी समझ से बाहर हैं। 20 सैनिकों की मौत के बाद गलवान घाटी क्षेत्र में चीन की तरफ से कोई घुसपैठ न होने की बात कितनी बेशर्मी से कही गई है? चीन ने इस भाषण के बाद आधिकारिक रूप से गलवान घाटी में घुसने का दावा किया। कायर, बेदिमाग, बिका हुआ।” उसने आगे दावा किया,”भाजपा और उसका अस्तित्व इस देश और उसके भविष्य के लिए एक झूठ है।”

वहीं उसके फेसबुक पोस्ट से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि वह ’इतिहासकार’ रामचंद्र गुहा की कट्टर प्रशंसक हैं। गुहा के एक बयान का जिसमें कहा गया था कि मोदी सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था, नैतिक ताने-बाने, सामाजिक जीवन और संस्थानों को होने वाले नुकसान से उबरने के लिए भारत एक अपरिभाषित समय लेगा, सिंह ने इसे कोट करते हुए लिखा, “रिप डेमोक्रेसी।” इस पोस्ट ने असल में नेटिज़न्स को आश्चर्यचकित कर दिया है कि क्यों वह अभी भी अपनी कल्पना में अत्याचारी और फासीवादी सरकार के साथ काम करती है, क्योंकि नहीं वह इसे छोड़ देती है।

इन सब के अलावा निहारिका अर्णब की गिरफ्तारी पर भी बेहद खुश नजर आई थी, जब उन्हें 2 साल पुराने एक बंद मामले में गिरफ्तार किया गया था।

उल्लेखनीय है कि निहारिका सिंह के फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पोस्टों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह एक कट्टरपंथी हिन्दूफोबिक है, जो उमर खालिद जैसे इस्लामवादियों की सहानुभूति रखती है। वहीं दूसरी ओर प्रेस स्वतंत्रता को दरकिनार करते हुए अर्णब की गिरफ्तारी पर जश्न मनाती है।

सोशल मीडिया यूज़र्स अब केंद्र सरकार के हाई-प्रोफाइल मंत्रालयों में काम करने वाले व्यक्तियों की ’पृष्ठभूमि जाँच’ में लापरवाही पर सवाल उठा रहे हैं।निहारिका कोई अकेली ऐसी शख्स नहीं हैं। इससे पहले दूरदर्शन से जुड़ी ईरा त्रिवेदी नामक एक योग विशेषज्ञ ने हिंदू भावनाओं को ठोस पहुँचाते हुए गौमाँस को खाने की बात कहीं थी। सोशल मीडिया पर मामले के तूल पकड़ते उसे चैनल ने निकाल दिया था।

अपडेट: बता दें कि इस लेख के प्रकाशित होने के बाद केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री श्रीपद नाइक ने ट्वीट कर निहारिका के मंत्रालय का मीडिया सलाहकार होने के दावे को खारिज कर दिया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है, “इस तरह की कोई कंसल्टेंट आयुष मंत्रालय में नहीं है।”

हालाँकि मंत्री ने यह नहीं बताया है कि फेसबुक प्रोफाइल में खुद के आयुष मंत्रालय से जुड़े होने का दावा करने को लेकर कोई कार्रवाई की गई है या नहीं।

गौरतलब है कि निहारिका सिंह के एक फेसबुक पोस्ट के अनुसार, उन्हें आयुष मंत्रालय द्वारा 2019 में आयोजित योग महोत्सव में बोलने की अनुमति दी गई थी। इतना ही नहीं उसने कार्यक्रम में लोगों को संबोधित करते हुए एक तस्वीर भी पोस्ट की थी।

अब पेठा भी हुआ मुगलों का! वामपंथियों के अनुसार हम भारतीय सिर्फ घास-फूस खाते थे

लेखक और स्तंभकार शुनाली खुल्लर श्रॉफ ने सोशल मीडिया पर पेठा को लेकर एक आर्टिकल शेयर किया है। इस आर्टिकल में उन्होंने दावा किया कि इस मिठाई का आविष्कार मुगलों ने किया था, इसलिए इसका श्रेय उन्हें ही जाना चाहिए। उन्होंने यह आर्टिकल हिंदुओं पर कटाक्ष करने के स्पष्ट इरादे से शेयर किया, जो कि इस्लामी कट्टरता के कारण मुगलों से नफरत करते हैं।

शुनाली खुल्लर ने कहा, “शाहजहाँ ने अपने रसोइयों को ताजमहल की तरह कुछ शुद्ध और श्वेत बनाने का आदेश दिया और इस तरह से पेठा का अवतरण हुआ। क्या मुगल इतिहास को न मानने वाले अब पेठा छोड़ देंगे?” हालाँकि इसमें एक समस्या थी। रिपोर्ट में उन्होंने अपने दावे के सबूत के रूप में जिसे उद्धृत किया है, वह ठीक इसके विपरीत था।

Shunali Khullar Shroff on petha

रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रसिद्ध शिक्षाविद्, समीक्षक और इतिहासकार पुष्पेश पंत ने कहा है, “पेठा गरीब आदमी की मिठाई है और उसका कोई शाही संबंध नहीं है। इसमें दूध या मावा नहीं होता है। यह लौकी और बहुत सारी चीनी के साथ बनाया जाता है, जो कि शाही व्यंजन का संकेत नहीं है।” उन्होंने यह भी कहा कि पेठा झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड सहित आगरा से जोड़े जाने के बावजूद भारत के विभिन्न हिस्सों में मिलता है।

उन्होंने कहा, “भारत के कुछ हिस्सों के लोग फलों के ओला कहते हैं और ओला का मुरब्बा नामक कुछ तैयार करते हैं।” वे कहते हैं, “मुरब्बा का मतलब है एक संरक्षण। उन्होंने इसे चीनी सिरप में डुबोया और इसे महीनों तक संरक्षित रखा और इसलिए इसे ओला का मुरब्बा कहा।” 

आगे उन्होंने कहा, “आगरा वह स्थान था जहाँ लोग दूर-दूर की यात्रा के दौरान या रेलगाड़ियों को बदलते समय भोजन प्राप्त कर सकते थे। आज की तुलना में ट्रेनें धीमी और लंबी थीं। लोग पूड़ी और सूखी आलू की सब्जी खाते थे। पेठा बच्चों को खुश रखने और ऊर्जा के स्तर को उच्च रखने के लिए एक सर्वोत्कृष्ट नाश्ता बन गया। चूँकि इसमें खोआ नहीं होता, इसलिए इसे मथुरा के पेड़ा से ज्यादा पसंद किया जाता था। यह यात्रियों के लिए एक उपहार देने वाला विकल्प भी था।”

गौरतलब है कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ करके उसे आज की पीढ़ी के सामने रखना सोशल मीडिया पर एक प्रचलन की तरह है। संस्कृति, सभ्यता से लेकर खाने-पीने तक की चीजों में नैरेटिव घुसाने की कोशिश अक्सर यहाँ होती रहती है। ऐसे में तथ्य व तर्क ही इस नैरेटिव को धराशायी करने के कारगर तरीके हैं। हाल ही में कुछ ऐसा ही जलेबी को लेकर हुआ था। इससे पहले बिरयानी को लेकर भी इसी तरह का दावा किया गया था।

इसके अलावा कहा गया कि मुस्लिम भारत में चपाती बनाने की कला, कुल्फी, गुलकंद, गुलाब जामुन, जलेबी, पुलाव, फालुदा, बर्फी, बीरंज, मुरब्बो, हल्वो, शिरो और शक्कर पारा लेकर आए थे।

फार्म हाउस में आई 3 गायों को गोली मारने का आरोप, 1 की मौत: कॉन्ग्रेस नेता व हरियाणा के पूर्व मंत्री पर यूपी में मुकदमा

हरियाणा के पूर्व मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता निर्मल सिंह के खिलाफ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में गोहत्या का मामला दर्ज किया गया है। गाय को गोली मारे जाने के प्रकरण में निर्मल सिंह के खिलाफ बेहट कोतवाली थाने में मामला दर्ज किया गया। ये घटना 3 दिन पूर्व हुई थी, जिसके बाद हिन्दू संगठनों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया था। पुलिस ने पीड़ित द्वारा दी गई नामजद तहरीर को आधार बनाते हुए मामला दर्ज किया है।

‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, ये मामला गुरुवार (नवंबर 11, 2020) के शाम की है। पुलिस को तत्काल इस घटना की सूचना दे दी गई थी। घटना की अगली सुबह पुलिस ने घटनास्थल का दौरा किया। हालाँकि, उस समय पुलिस ने बताया था कि ये घटना हरियाणा क्षेत्र का है और मुकदमा नहीं दर्ज किया जा सकता। इसके बाद हिन्दू संगठनों ने मोर्चा सँभाला और सीएम योगी आदित्यनाथ तक इस मामले को पहुँचाया।

शनिवार को बजरंग दल व विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता पीड़ित के साथ कोतवाली पहुँचे और तहरीर देकर गोहत्या का मुकदमा दर्ज कराने की माँग उठाई। उनका आरोप है कि पुलिस ने इसे हरियाणा क्षेत्र का मामला बता कर मुकदमा दर्ज करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद हिन्दू संगठनों और पीड़ित को वापस लौटना पड़ा। लेकिन, सोशल मीडिया के माध्यम से और जमीन पर कार्यकर्ताओं ने विरोध जारी रखा और पुलिस पर दबाव बनाया।

अब इस मामले में ये संशय बना हुआ है कि पुलिस मुक़दमे को हरियाणा भेजेगी या फिर यूपी में ही कार्रवाई की जाएगी। पीड़ित पक्ष ने पुलिस को बताया है कि निर्मल सिंह का घोड़ों का फार्म हाउस है, जो हरियाणा-यूपी सीमा पर ही स्थित है। आरोप है कि घटना के दिन तीन गायें यमुना में पानी पीने के लिए मंत्री के फार्म हाउस चली गईं। उस समय निर्मल सिंह वहीं मौजूद थे। आरोप है कि उन्होंने एक गाय की हत्या कर दी, जबकि 2 अभी भी गायब हैं।

पत्रकार सचिन गुप्ता ने लिखा है कि पूर्व मंत्री निर्मल सिंह का यह फार्म हाउस विवादित है। दो साल पहले मासूम बच्ची की रेप के बाद हत्या कर दी गई थी। तीन साल पहले यमुना नदी से रेत खनन के विवाद में पूर्व मंत्री समेत 11 पर एफआईआर हुई थी। कुल मिलाकर यहाँ अवैध गतिविधियों के होने के आरोप लगते रहे हैं। कुछ ख़बरों में ये भी कहा जा रहा है कि दो गायों की हालत गंभीर है और उन्हें भी गोली लगी है।

ज्ञात हो कि इससे पहले गोहत्या के आरोपित 7 साल के कारावास की सज़ा के प्रावधान के कारण जमानत पाने में सफल हो जाते थे। इसे ध्यान में रखते जून 2020 हुए सज़ा को अधिकतम 10 साल कर दिया गया था। क़ानून में संशोधन कर गोहत्या पर लगने वाले जुर्माने को भी 3 लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दिया गया। उत्तर प्रदेश में अब जो भी गोहत्या या गोतस्करी में संलिप्त होगा, उसके फोटो भी सार्वजनिक रूप से चस्पा किए जाएँगे।

सरफराज ने नाबालिग छात्रा को मिलने के लिए बुलाया फिर साथी अमानुल्लाह के साथ गैंगरेप किया

देश में हो रहे बलात्कार की तमाम घटनाओं के बीच एक और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। नाबालिग छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार की यह घटना झारखंड की राजधानी रांची में हुई है। घटना को अंजाम देने वाले दो आरोपितों सरफराज और अमानुल्लाह को गिरफ्तार किया जा चुका है। दोनों आरोपितों की गिरफ्तारी शुक्रवार (13 नवंबर 2020) को हुई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ घटना रांची शहर के लोअर बाज़ार इलाके की है। 

इस मुद्दे पर जानकारी देते हुए रांची लोअर बाज़ार के थानाध्यक्ष सतीश कुमार ने कई अहम बातें बताई। उन्होंने बताया कि आरोपित सरफराज नाबालिग छात्रा के घर के नज़दीक स्थित एक मकान में काम कर रहा था। इस बीच उसकी नाबालिग छात्रा से बातचीत शुरू हुई, कुछ ही समय बाद उसने छात्रा को बहला-फुसला कर मिलने के लिए बुलाया। नाबालिग छात्रा रविवार को सरफराज से मिलने गई और फिर वह छात्रा को अपने दोस्त अमानुल्लाह के घर लेकर गया। अमानुल्लाह सदर थाना क्षेत्र के नज़दीक दीपाटोली का रहने वाला है। 

सरफराज और अमानुल्लाह ने उस घर में ही नाबालिग छात्रा के साथ बलात्कार किया। घटना की जानकारी मिलने के बाद पीड़िता के परिजनों ने लोअर बाज़ार थाने आरोपितों पर 12 नवंबर को मामला दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने घटना के संबंध में जाँच शुरू की और दोनों आरोपितों को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान दोनों आरोपितों ने सामूहिक बलात्कार की बात स्वीकार की। इसके बाद पुलिस ने पीड़िता का मेडिकल परीक्षण कराया और उसे परिजनों के हवाले कर दिया। 

पुलिस का इस मुद्दे पर यह भी कहना था कि परिजनों ने गुरुवार को इस घटना की जानकारी दी थी। जिसके बाद पुलिस ने सरफराज और अमानुल्लाह पर मामला दर्ज किया फिर पुलिस इन्हें गिरफ्तार करने इनके घर गई लेकिन यह दोनों वहाँ नहीं मौजूद थे। शुक्रवार को पुलिस को सूचना मिली कि आरोपित उस क्षेत्र में ही घूम रहे हैं तब पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार किया। फ़िलहाल पुलिस ने दोनों आरोपितों पर मामला दर्ज कर आगे की जाँच शुरू कर दी है।     

’25 साल BJP के शासन वाले गुजरात में मुस्लिम समृद्ध और बंगाल में पिछड़े’: पूर्व चांसलर जफर ने कहा – ‘कॉन्ग्रेस सेक्युलर नहीं’

मौलाना आज़ाद नेशनल यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलाधिपति जफर सरेशवाला ने देश में चल रही सांप्रदायिक और सेक्युलर राजनीति की बहस और भाजपा को लेकर बयान दिया है। उन्होंने कहा कि असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने बिहार में मात्र 20 सीटों पर चुनाव लड़ा। उन्होंने कहा कि एक बात मुस्लिम समुदाय में बहुत पहले से रहनी चाहिए थी और वो भी वर्षों से कहते आ रहे हैं कि देश में कोई पार्टी सेक्युलर नहीं है और न ही कोई कम्युनल है।

उद्योगपति जफर सरेशवाला ने कहा कि समय आने पर ये पार्टियाँ सेक्युलर बन जाती हैं और समय आने पर कम्युनल भी हो जाती हैं। उन्होंने मुस्लिमों को सलाह दी कि कॉन्ग्रेस पार्टी को सेक्युलर समझना सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी सेक्युलर नहीं है, ये बस मुस्लिमों के वोट लेना जानती है। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी ने बिहार में भी मुस्लिमों को ठीक से टिकट नहीं दिया और समुदाय के साथ बेईमानी की।

उन्होंने कहा कि बिहार में 243 सीटों पर मात्र 19 मुस्लिम विधायक ही चुन कर आए, जिनमें से 5 AIMIM और 1 उसके गठबंधन साथी बसपा के थे। उन्होंने पूछा कि अगर असदुद्दीन ओवैसी नहीं होते तो क्या एक भी मुस्लिम को टिकट दिया जाता? उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को सेक्युलर समझना बेवकूफी होगी। इसके बाद उन्होंने उदाहरण दिया कि समाजिक और आर्थिक रूप से मुस्लिम समुदाय सबसे ज्यादा समृद्ध गुजरात में है।

इसके बाद उन्होंने उदाहरण दिया कि इन मानकों पर मुस्लिम समुदाय सबसे ज्यादा पिछड़ा हुआ पश्चिम बंगाल एवं असम में है, जिसके बाद बिहार का नंबर आता है। उन्होंने याद दिलाया कि जहाँ गुजरात में पिछले 25 वर्षों से भाजपा का शासन है, वहीं पश्चिम बंगाल में तो आज़ादी से लेकर अब तक कभी भाजपा का शासन रहा ही नहीं। उन्होंने कहा कि असम में 2017 में पहली बार भाजपा का शासन आया, वहीं बिहार में नीतीश कुमार हैं।

उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस चाहती है कि उसके नेता इस्लामी टोपी पहन लें, मुशायरें कर लें और बिरयानी खिला दें तो मुस्लिम वोट उनका हो जाए, जो अब नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि अब मुस्लिम ये सोचते हैं कि भाजपा आए ही, उसकी 6 साल से शासन है, गुजरात में 25 साल से है, क्या बिगड़ गया? उन्होंने कहा कि मुस्लिम समझ गए हैं कि कोई पार्टी सेक्युलर नहीं है।

उन्होंने कहा कि यूपी में एक चुनाव के समय मायावती और बिहार में नीतीश कुमार को लेकर संशय था तो उन्होंने सीधा कहा कि वैसे भी ये भाजपा से जाकर मिलने वाले हैं तो भाजपा को ही क्यों न वोट दिया जाए? उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि जब डॉक्टर है तो कम्पाउंडर से इलाज क्यों? उन्होंने मुस्लिमों को सीधा भाजपा से बात करने की सलाह देते हुए कहा कि जैसे नोट का कोई रंग नहीं होता, वोट का भी नहीं होता – इसीलिए मुस्लिम समाज स्थानीय भाजपा नेताओं के साथ बैठे।

हाल ही में असदुद्दीन ओवैसी ने भी कहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ ये समस्या है कि वो सोचती है कि सभी उसके सामने झुकें लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि अब कॉन्ग्रेस के दिन लद गए हैं। उन्होंने याद दिलाया था कि कैसे कॉन्ग्रेस 70 सीटों पर चुनाव लड़ी और उसे मात्र 19 सीटें मिलीं। उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी चुनाव इसीलिए लड़ती है, ताकि कट्टरता हावी न हो। उन्होंने पूछा था कि राजीव गाँधी ने राम मंदिर का शिलान्यास किया, क्या वो कट्टरता नहीं थी?