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असम: पेड़ से बँधे थे 5 बच्चे, खजाने की चाह में आधी रात कुर्बानी देने की तैयारी में थे जमील और ​सरिफुल हुसैन

असम से एक भयावह घटना सामने आ रही है। यहाँ पर दो भाइयों ने छिपे हुए खजाने को पाने के लिए अपने पाँच बच्चों की कुर्बानी देने की कोशिश की। घटना शनिवार (नवंबर 14, 2020) आधी रात की है। जमील हुसैन और उसके भाई सरिफुल हुसैन ने आयशा बेगम के साथ मिलकर आधी रात 12 बजे अपने पाँच बच्चों को जान से मारने की तैयारी की थी। लेकिन स्थानीय लोगों को इसकी भनक लग गई और उन्होंने सतर्कता दिखाते हुए आखिरी समय में बच्चों को बचा लिया।

घटना असम में शिवसागर जिले के डिमू मुख क्षेत्र में बमबारी में हुई, जहाँ जादू-टोना करने वाली एक महिला ने जमील और सरिफुल को सलाह दी कि वे जमीन में दबे हुए सोने और अन्य खजाने को पाने के लिए अपने बच्चों की कुर्बानी दें। इसके साथ ही उन्होंने दोनों भाइयों से यह भी कहा कि ऐसा करने से उनके परिवार की सारी समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। इतना सुनने के बाद जमील और सरिफुल अपने पाँचों बेटों की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए।

बच्चों को जमील के घर के पीछे एक आम के पेड़ से बाँधा गया था। काली पूजा के दौरान आधी रात को उनकी कुर्बानी दी जानी थी। लेकिन पिछले कुछ दिनों में दोनों भाइयों के गतिविधियों ने स्थानीय लोगों के बीच संदेह पैदा कर दिया था, जिसकी वजह से वह उनकी गतिविधियों पर नजर रख रहे थे। शनिवार आधी रात को उन्होंने देखा कि बच्चे आम के पेड़ से बँधे थे और रो रहे थे। यह देखकर उन्होंने तुरंत पुलिस को सूचित किया। स्थानीय लोगों ने बच्चों के पिता को पकड़ लिया और फिर उन्हें पुलिस को सौंप दिया। इसके साथ ही उन्होंने उस महिला को भी पुलिस के हवाले कर दिया, जो उनके साथ अपराध में शामिल थी।

पुलिस ने स्थानीय लोगों की मदद से बच्चों को छुड़ाया और थाने ले आई। पुलिस ने जमील हुसैन, सरिफुल हुसैन और आयशा बेगम को गिरफ्तार किया। पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि वे आरोपितों से पूछताछ कर रहे हैं और जल्द ही FIR दर्ज की जाएगी। उन्होंने कहा कि यद्यपि स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया हैं कि यह मानव कुर्बानी का प्रयास था, फिर भी वे उस एंगल से घटना की जाँच कर रहे हैं। पुलिस ने बच्चों को पेड़ से बँधा हुआ पाया, हालाँकि उनका कहना है कि अभी तक मानव कुर्बानी के प्रयास का कोई सबूत मौके पर नहीं मिला है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, जब उन्होंने इस घटना के बारे में पिता से सवाल किया, तो उन्होंने स्वीकार किया कि बच्चों की कुर्बानी दी जानी थी, लेकिन वे खुद ऐसा नहीं करने वाले थे। उन्होंने कहा कि इसके लिए कोई और आने वाला था। साथ ही यह भी पता चला है कि पाँच बच्चों को कुर्बानी की तैयारी में पिछले कई दिनों से एक कमरे में बंद रखा गया था। जमील ने पास के मोरान के एक जादू-टोना करने वाले का नाम भी लिया है, जिसने उन्हें अपने बच्चों की कुर्बानी देने की सलाह दी थी।

पश्चिम बंगाल बना आतंकियों का गढ़: अलकायदा की ऑनलाइन भर्ती सेंटर, स्लीपर सेल करेंगे हमला – दिलीप घोष का आरोप

पश्चिम बंगाल के भाजपा प्रमुख दिलीप घोष ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि राज्य ‘आतंकवादियों का गढ़’ बन गया है और इसकी स्थिति ‘कश्मीर से भी बदतर’ है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में हाल ही में अलकायदा के सदस्यों की पहचान हुई है और उनके नेटवर्क का यहाँ पर विस्तार हुआ है।  

गौरतलब है कि कूचबिहार उत्तर बंगाल में आता है। उत्तर बंगाल के ही अलीपुरद्वार जिले में दिलीप घोष के काफिले पर हमला हुआ था, जब वे एक कार्यक्रम में शामिल होकर दूसरे कार्यक्रम में जा रहे थे। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के काफिले पर हुए हमले में विधायक विल्सन चंपामारी का वाहन क्षतिग्रस्त हो गया था। यह घटना हाल ही में हुई थी।

इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कहा कि राज्य में राजनीतिक हिंसा के नियंत्रण का कोई संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य में राजनीतिक हिंसा और प्रतिशोध का माहौल व्याप्त है। धनखड़ ने कूचबिहार में संवाददाताओं से कहा, ‘‘राजनीतिक हिंसा के नियंत्रण का कोई संकेत नहीं है। इसका कारण यह है कि लोकसेवक राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए हैं।”

पिछले साल पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में पहली बार अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यक अतिवाद के ख़िलाफ़ चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था, “मैं देख रही हूँ कि यहाँ अल्पसंख्यकों में कुछ अतिवादी हैं, जिनकी जमीन हैदराबाद से जुड़ी है। ऐसे लोगों की बिलकुल भी मत सुनिए।”

बता दें कि हाल ही में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक अलकायदा के आतंकी पश्चिम बंगाल में हमले को अंजाम देने की तैयारी में हैं। आईबी की रिपोर्ट में कहा गया कि आतंकियों की योजना पश्चिम बंगाल में मौजूद अलकायदा मॉड्यूल और स्लीपर सेल की मदद से आतंकी हमले को अंजाम देने की तैयारी है।

इसके लिए ग्लोबल जिहाद और विदेशी हैंडलर्स के जरिए रेडिक्लाइज करने की कोशिश भी हो रही है। पश्चिम बंगाल के कई नेता भी अलकायदा आतंकियों के निशाने पर हैं। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान के कराची और पेशावर में अलकायदा ने आतंकियों की भर्ती के लिए नया ऑनलाइन भर्ती सेंटर शुरू किया है।

एनआईए के सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक हाल ही में इस मामले में अलकायदा के 11 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। इन्हें मुर्शिदाबाद, केरल और कर्नाटक पकड़ा गया। सूत्रों के अनुसार सीमावर्ती जिले मुर्शिदाबाद और मालदा में कई युवाओं को बरगला कर आतंकी संगठन से जोड़ा गया है। इनमें विशेष तौर पर गरीब तबके के युवा हैं। सुरक्षा एजेंसियाँ उन्हें रडार पर रख रही है। 

मुर्शिदाबाद अलकायदा का गढ़ बन चुका है। मालदा और उत्तर 24 परगना (North 24 Paragana) में भी यही हालात हैं। यहाँ इनके स्लीपर सेल बहुत हैं। बंगाल और केरल के स्लीपर सेल आपसी साँठगाँठ से काम करते हैं। बांग्लादेश के जरिए बंगाल में घुसपैठ के साथ संगठन विस्तार के लिए फंड भेजे जा रहे हैं। हाल ही में मुर्शिदाबाद से गिरफ्तार मदरसा शिक्षक अब्दुल मोमिन सहित अन्य आतंकियो ने पूछताछ के बाद कई खुलासे किए हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में एनआईए को अलकायदा मॉड्यूल से पूछताछ के दौरान कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिली थीं। एनआईए से पूछताछ में अलकायदा मॉड्यूल ने खुलासा किया था कि पाकिस्तान में बैठा अलकायदा का हैंडलर पश्चिम बंगाल के युवाओं की ऑनलाइन भर्ती कर रहा है। इस खुलासे के बाद एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं।

एनआईए ने पिछले दिनों आतंकी गतिविधियों में संलिप्तता के इनपुट के आधार पर पिछले दिनों कई लोगों को गिरफ्तार किया था। एनआईए गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ कर रही है।

अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को समर्पित संग्रहालय बनवाएगी मोदी सरकार, ASI ने शुरू किया काम

भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट कहे जाने वाले पृथ्वीराज चौहान के सम्मान में अब भारत सरकार ने कदम उठाया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) दिल्ली में उनके नाम पर संग्रहालय बनाने जा रहा है। बता दें कि वो दिल्ली से ही शासन किया करते थे। किला राय पिथौरा में ये संग्रहालय बनाया जाएगा। किले में पहले से बनी इमारत का विस्तार करते हुए इसके निर्माण के लिए योजना तैयार कर ली गई है। ये संग्रहालय मुख्य रूप से सम्राट पृथ्वीराज चौहान को समर्पित होगा।

‘दैनिक जागरण’ में प्रकाशित मंगल यादव और वीके शुक्ला की खबर के अनुसार, ASI ने अपने अधिकारियों को निर्देश जारी किया है कि जहाँ कहीं भी पृथ्वीराज चौहान से सम्बंधित दस्तावेज हों, या फिर कोई सामग्री हो- उन्हें एकत्रित किया जाए, ताकि संग्रहालय में रखा जा सके। अगले एक वर्ष में इस संग्रहालय के तैयार हो जाने की सम्भावना है। जगमोहन के केंद्रीय शहरी विकास मंत्री के कार्यकाल में किला राय पिथौरा का कायाकल्प किया गया था। 

पहले यह एक उपेक्षित टीले की तरह था, जहाँ आसपास काफी सारी झुग्गियाँ थीं। दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को सक्रिय करते हुए जगमोहन ने यहाँ गन्दगी हटा कर इलाके के विकास के लिए कार्य किया। उन्होंने केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री बनने के बाद न सिर्फ इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया, बल्कि खुदाई की भी व्यवस्था की। यहाँ संरक्षण केंद्र भवन का निर्माण हुआ, जहाँ पृथ्वीराज चौहान की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई।

अब इस संरक्षण केंद्र का विस्तार किया जा रहा है। प्रदूषण के कारण इस पर रोक लगी हुई थी, लेकिन अब इसके आसपास हरा-भरा और सुंदर पार्क विकसित किया जाएगा। 2002 में ही इस पार्क को DDA ने ASI को सौंप दिया था। जगमोहन ने अपनी पुस्तक में बताया है कि किस तरह दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठने वाले चौहान ने लालकोट का विस्तार करते हुए एक विशाल किला बनाया। यहाँ कई मंदिर भी थे, जिसे इस्लामी आक्रांताओं ने ध्वस्त कर दिया।

कुव्वतुल इस्लाम मस्जिद के लिए मुख्यतः इन्हीं ध्वस्त मंदिरों के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। कुतुबुद्दीन तथा इल्तुतमिश ने राय पिथौरा के दुर्ग को ही अपना निवास स्थान बनाया और अमीर खुसरो ने भी अनंगपाल महल का वर्णन किया है। किला राय पिथौरा दिल्ली के 7 शहरों में प्रथम है और इसका निर्माण 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुआ था। राय पिथौरा की दिल्ली के 12 दरवाजे हुआ करते थे।

ज्ञात हो कि मोईनुद्दीन चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए थे। कई बार हारने के बाद गोरी ने चौहान को हरा दिया था।

हम हार रहे, राहुल-प्रियंका छुट्टी मना रहे: बिहार पर कॉन्ग्रेस के 23 नेताओं ने सोनिया को लिखा पत्र

गाँधी परिवार की मिल्कियत कॉन्ग्रेस के लिए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे बड़ी मुसीबत बनकर उभरे हैं। खुद को देश की सबसे पुरानी पार्टी बताने वाली कॉन्ग्रेस की हैसियत अब उसके क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए वोटकटुवा जैसी हो गई है।

बिहार चुनावों में विपक्षी गठबंधन जिसमें राजद, कॉन्ग्रेस और वामपंथी दल शामिल थे, को 110 सीटें मिली है। 15 साल की सत्ता विरोधी नाराजगी के बावजूद एनडीए 125 सीटों के साथ सरकार में वापसी करने में सफल रही है। इसकी एक वजह कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन भी माना जा रहा जो 70 सीटों पर लड़कर केवल 19 ही जीत पाई।

इस प्रदर्शन के बाद से न केवल सहयोगी कॉन्ग्रेस से उखड़े है, बल्कि पार्टी के भीतर कलह तेज हो गई है। पहले विधायक दल का नेता बनने के लिए दो विधायकों के समर्थक बैठक में भिड़ गए थे। अब कहा जा रहा है कि पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि कॉन्ग्रेस कार्यसमिति की तुरंत बैठक बुलाकर बिहार में चुनावी असफलत पर चर्चा की जाए। कथित तौर पर पत्र में पार्टी में संगठनात्मक चुनाव की भी माँग की गई है।

वहीं अब मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि 23 वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को एक पत्र लिख बिहार में हुए चुनाव पर चर्चा के लिए तत्काल सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाने की माँग की है। उन्होंने कथित तौर पर चुनाव को मद्देनजर पार्टी अध्यक्ष पद के लिए संगठनात्मक चुनावों की माँग भी की है।

रेडिफ पर प्रकाशित आर राजगोपालन की रिपोर्ट में बताया गया है कि सीडब्ल्यूसी के पाँच सदस्यों ने इस पत्र के लिखे जाने की पुष्टि की है। कथित तौर पर पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि जब बिहार चुनाव प्रचार चरम पर था और यहाँ तक कि जिस दिन नतीजे आने थे, उस दिन भी पार्टी का नेतृत्व करने की बजाए राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा शिमला में छुट्टियॉं मना रहे थे।

पत्र में बिहार की चुनावी असफलता के संदर्भ में कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा कई तरह की चिंता जताई गई है। साथ ही अहमद पटेल के कोरोना संक्रमण और महामारी के कारण नई दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय 24, अकबर रोड में राजनीतिक गतिविधियाँ ठप होने को लेकर भी चिंता जाहिर की गई है।

पत्र में राहुल और प्रियंका के नेतृत्व में भरोसे की कमी भी दिखाई पड़ती है। हालाँकि सीडब्ल्यूसी ने संगठनात्मक चुनाव के संकेत दिए हैं, पर पार्टी से जुड़े लोगों को आशंका है कि फिर से सब कुछ सर्वसम्मति का हवाला देकर निपटा दिया जाएगा।

रेडिफ ने एक वरिष्ठ नेता के हवाले से कहा, “क्या इस तरह की लापरवाही कोई और पार्टी दिखाई सकती है जिसका राष्ट्रीय प्रभव हो?” रिपोर्ट में एक अन्य नेता के हवाले से पार्टी में पैदा शून्य को लेकर कहा गया है, “कॉन्ग्रेस केवल प्रवक्ताओं के टेलीविजन बहस के आसरे चल रही है।”

रिपोर्ट के अनुसार, पिछली बार की तरह इस बार भी गुलाम नबी आज़ाद ने पत्र तैयार करने और उसे पहुँचाने का बीड़ा उठाया है। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने कहा, “हम युवा नेताओं के पास कोई रास्ता नहीं बचा है, सिर्फ विचारधारा की वजह से हम कॉन्ग्रेस के साथ है।”

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब असंतुष्ट नेताओं ने सोनिया गाँधी को राहुल गाँधी के नेतृत्व को लेकर पत्र लिखा है। इसी तरह का एक पत्र अगस्त में भी लिखा गया था।

2019 के आम चुनावों में हार और पार्टी के लगातार गिरते स्तर को देखते हुए 1 साल बाद पूर्व मुख्यमंत्रियों, कई कॉन्ग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, सांसदों और कई पूर्व केंद्रीय मंत्रियों सहित 23 वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं ने अंतरिम पार्टी प्रमुख सोनिया गाँधी को पत्र लिख पूरी पार्टी में निचले से ऊपरी स्तर पर बदलाव की माँग की थी।

इस पत्र ने कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर हंगामा मचा दिया था। जिसके बाद पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कथित तौर पर कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेताओं पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगा दिया था। हालाँकि बाद में उन्होंने इस बात से इनकार कर दिया था।

अगस्त में कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा लिखा गया पत्र यहाँ पढ़ें।

आशीर्वाद अगरबत्ती: गोरखनाथ मंदिर के फूलों से बनेगी अगरबत्ती, कूड़े या नदियों में नहीं जाएगी – CM योगी का ऐलान

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार (15 नवंबर 2020) को गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर स्थित हिन्दू आश्रम में अगरबत्ती का निर्माण किया। इस अगरबत्ती का नाम ‘आशीर्वाद’ है। यह अगरबत्ती मंदिर में अर्पित और इस्तेमाल की गई फूल मालाओं से तैयार की गई है। इस दौरान योगी आदित्यनाथ ने इस पहल के संबंध में कई अहम बातें भी कहीं। उनका कहना था कि मंदिर में चढ़ाई जाने वाली फूल मालाएँ कुछ समय बाद व्यर्थ हो जाती थीं। अब इनकी मदद से अगरबत्ती और इत्र बनाया जाएगा। 

यह अगरबत्ती भारत सरकार के केन्द्रीय औषधि एवं सुगंध पौधा संस्थान (सीमैप), लखनऊ और महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञान केंद्र, गोरखपुर के द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई है। यानी गोरखनाथ मंदिर में जितनी पुष्प और मालाएँ अर्पित की जाएँगी, अब वो व्यर्थ नहीं जाएगी।

इस अवसर पर लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान अपने विचार रखते हुए योगी आदित्यनाथ ने भी कई अहम जानकारी दी। उन्होंने कहा, “मंदिरों में लोग पुष्प चढ़ाते थे, मालाएँ लेकर जाते थे। 12, 14, 20 या 24 घंटे के बाद उन मालाओं को फिर से फेंक दिया जाता था। नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता था, कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता था और उसका परिणाम क्या होता था? आस्था भी आहत होती थी और कचरा भी इकट्ठा होता था।” 

इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने कहा, “सीमैप और महायोगी गोरखनाथ कृषि विज्ञान केंद्र मिल कर एक बड़ा कार्यक्रम आगे बढ़ा रहे हैं। वह कार्यक्रम है कि जितने भी ऐसे पुष्प आएँगे, जो मंदिरों में चढ़े होंगे, किसी तीर्थ स्थल पर चढ़े होंगे, किसी ने अपने घर में पूजा के लिए उपयोग किए होंगे, शादी विवाह जैसे कार्यक्रमों में उनका उपयोग हुआ होगा। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि पुष्प की खेती की और पुष्प सूख गए, हम इस तरह के पुष्पों को एक जगह एकत्रित करके उसकी मदद से धूप, अगरबत्ती और इत्र बनाने का कार्य भी कर सकते हैं।”

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह भी कहना था कि यह कार्यक्रम धर्म और पर्यावरण दोनों को मद्देनज़र रखते हुए शुरू किया जा रहा है। इससे उपयोग किए जा चुके फूलों को व्यर्थ होने से बचाया जा सकेगा और कचरा भी इकट्ठा नहीं होगा।

दरअसल गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में प्रतिदिन भारी मात्रा में पुष्प अर्पित किए जाते हैं और यह पुष्प कुछ ही समय बाद व्यर्थ हो जाते हैं। उन पुष्पों का सदुपयोग करने के लिए यह योजना शुरू की गई है, जिसके तहत ‘आशीर्वाद अगरबत्ती’ का निर्माण किया जा रहा है। यह अगरबत्ती गोरखपुर समेत आस-पास के अन्य शहरों में भी उपलब्ध होगी।      

बीफ और पोर्क के पैकेट्स पर मिल रहा नए किस्म का कोरोना वायरस: चीन के कई हिस्सों में आयात बंद, जाँच जारी

चीन में कोरोना वायरस को लेकर खबरें दबाए जाने के बावजूद कुछ ऐसी जानकारियाँ सामने आ रही हैं, जिनसे कई अन्य देशों की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। चीन के पूर्वी हिस्से में स्थित शहर जिनान में एक नए क़िस्म का कोरोना वायरस मिला है। हैरत की बात ये है कि ये कोरोना वायरस बीफ और ट्राइप (गाय-भैंस इत्यादि का आँत, जिसे खाद्य पदार्थ के रूप में कई लोग प्रयोग करते हैं) में पाया गया है।

बीफ और ट्राइप की पैकेजिंग और ऐसे अन्य प्रोडक्ट्स के पैकेट्स पर भी कोरोना वायरस पाए गए हैं। ब्राजील, न्यूजीलैंड और बोलीविया से ये प्रोडक्ट्स आते हैं, जिसके बाद चीन ने अब फ्रोजन फ़ूड आइटम्स की जाँच करनी शुरू कर दी है। जिनान म्युनिसिपल हेल्थ कमीशन ने शनिवार (नवंबर 14, 2020) को बताया है कि ‘Guotai इंटरनेशनल समूह’ और ‘संघाई झोंगील डेवलपमेंट ट्रेड’ जैसे इम्पोर्टर्स के फ़ूड पैकेट्स पर ये पाया गया

ये प्रोडक्ट्स शंघाई के यांगशन पोर्ट और अन्य आउटर पोर्ट्स से होकर चीन में घुसे थे। हालाँकि, शान्डोंग प्रान्त के शहर ने ये नहीं बताया है कि किन कंपनियों के प्रोडक्ट्स पर ये नए किस्म का कोरोना वायरस पाया गया है। इन प्रोडक्ट्स का प्रयोग करने वाले और इसके संपर्क में आने वाले लोगों की टेस्टिंग की गई है, जिनमें से 7500 नेगेटिव पाए गए हैं। इससे पहले सऊदी से आने वाले झींगा के माँस पर ये कोरोना वायरस पाया गया था।

ब्राजील और अर्जेंटीना से आने वाले बीफ पैकेट्स पर भी जाँच के दौरान यही पाया गया है। शुक्रवार को हेनान प्रान्त के झेंगझोउ शहर में अर्जेंटीना से आई बीफ पैकेट्स पर कोरोना वायरस पाया गया। वहाँ के प्रशासन ने ‘WeChat’ के माध्यम से ये जानकारी खुद की सार्वजनिक की है। साथ ही कोल्ड स्टोरेज से निकाले गए पोर्क के पैकेट्स पर इसे पाए जाने के बाद लोगों को जाँच के बाद ही ये सब प्रोडक्ट्स बेचे जा रहे हैं। बीफ और पोर्क की चीन में खासी खपत है, ऐसे में उनमें कोरोना वायरस का पाया जाना लोगों को आशंकित कर रहा है।

हालाँकि, WHO का कहना है कि फ्रोजन फूड प्रोडक्ट्स पर कोरोना वायरस के पाए जाने से किसी व्यक्ति के कोविड-19 से संक्रमित होने की सम्भावना नहीं है। चीन ने कई प्रोडक्ट्स के इम्पोर्ट पर प्रतिबंध भी लगा रखा है और इस सम्बन्ध में लोगों को चेतावनी जारी करता रहा है। जिन प्लांट्स में ये मामले आए हैं, उन्हें बंद कर के सारे कर्मचारियों की टेस्टिंग की प्रक्रिया चालू है। कई अन्य देश भी इस तरह की जाँच में लगे हैं।

कोरोना वायरस के पैदा होने से लेकर फैलने तक चीन की भूमिका हमेशा से संदिग्ध रही है। इस मुद्दे पर चीन हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। 2 महीने पहले ही खबर आई थी कि चीन अपने देश के लोगों को कोविड 19 की वैक्सीन शॉट्स दे रहा है, जबकि इस वैक्सीन का परीक्षण पूरा नहीं हुआ है। यानी, वैक्सीन कितनी असरदार है या उसके दुष्प्रभाव क्या हो सकते हैं, इस बात की पुष्टि भी नहीं हुई है। 

घर से स्कूल की दूरी और लौटते वक्त अंधेरा… छोड़नी न पड़े स्कूल इसलिए J&K में अब गर्ल्स हॉस्टल

केंद्र सरकार जम्मू कश्मीर में आम लोगों की सुविधा की दृष्टि से कई बड़े कदम उठा रही है। इसी कड़ी में घाटी के गांदरबल जिले में 100 बेड का छात्रावास (महिला) बनाया जा रहा है। इस छात्रावास के निर्माण का उद्देश्य जनजातीय समुदाय से आने वाले छात्राओं को सुविधा प्रदान कराना है, जो पढ़ाई के लिए सुदूर क्षेत्रों से आती हैं। 

इस प्रोजेक्ट से दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाली छात्राओं (विशेष रूप से गुज्जर और बकरवाल समुदाय की छात्राएँ) को बड़ा लाभ होगा, जो शहरों में ठहरने का खर्च नहीं उठा सकती हैं। यह नया छात्रावास केंद्र सरकार की राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत बनाया जा रहा है। जम्मू कश्मीर प्रशासन का सड़क और इमारत विभाग इस परियोजना को क्रियान्वित कर रहा है। 

परियोजना के अभियंता इश्फ़ाक रथर ने इस बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया, “यह छात्रावास दो तल का होगा, जिसे राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान ने पारित किया है। छात्रावास का निर्माण 306 लाख रुपए की लागत से 597 स्क्वायर मीटर की जगह में किया जाएगा। हर तल पर वाशरूम की सुविधा है, इसके अलावा वार्डेन के लिए अलग कमरा और चिकित्सा कक्ष भी मौजूद होगा।”  

इसके बाद उन्होंने बताया कि छात्रावास का लगभग 80 फ़ीसदी निर्माण कार्य पूरा हो चुका है, जिसमें इमारत का ढाँचा और आकार शामिल हैं। निर्माण के बाद सिर्फ सजावट और सफाई का कार्य बचा हुआ है। कुछ महीनों में वह भी पूरा हो जाने की उम्मीद है। इसके बाद वुसान और छत्तरगुल की छात्राएँ अगले साल के मार्च महीने से यहाँ पढ़ने के लिए आ सकती हैं। वहाँ के स्थानीय लोगों ने इस कार्य की सराहना की है और कहा है इससे छात्राओं को काफी बड़े पैमाने पर मदद मिलेगी। 

मुजफ्फर अहमद नाम के स्थानीय निवासी ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा, “सुदूर क्षेत्रों से आने वाली छात्राएँ कई किलोमीटर की दूरी तय करके अपने शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई करने के लिए आती हैं। सरकार की तरफ से उठाया गया यह कदम सराहनीय है, इसकी वजह से लड़कियाँ पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित कर पाएँगी।”

इसके अलावा आसिफ अहमद नाम के स्थानीय छात्र ने भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। उसने कहा कि सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है, गुज्जर और बकरवाल समुदाय से आने वाली तमाम लड़कियों को इस कदम से लाभ होगा।  

इसके बाद अहमद ने कहा कि छात्राओं को अपनी पढ़ाई के लिए घंटों की यात्रा करनी पड़ती थी और ठंड के वक्त में अंधेरा हो जाने की वजह से सबसे ज़्यादा प्रभाव लड़कियों पर ही पड़ता था। इसकी वजह से बहुत सी लड़कियों को अपनी पढ़ाई तक छोड़नी पड़ी थी। 100 बेड का हॉस्टल छात्राओं के लिए मददगार साबित होगा और इससे गुज्जर-बकरवाल समुदाय के लोगों का विकास होगा।”   

जिससे बच्चे दीवाली की खुशियाँ मनाना न भूलें: 2021 की दीवाली को अद्भुत बनाने के लिए ऑपइंडिया का रोडमैप

इस साल की दीवाली हम में से ज्यादा के जीवनकाल की सबसे असामान्य दीवाली थी। कोरोना महामारी और पटाखों पर प्रतिबंध के कारण इसके खामोशी से बीत जाने की उम्मीद की जा रही थी। अधिकांश लोगों की तरह हम (ऑपइंडिया) भी इस बात से निराश थे, इसलिए हमने साल 2021 में धमाकेदार और दीप्तिमान दीवाली के अभियान का ऐलान किया। 

हमारा ऐलान जितना वैचारिक प्रतिबद्धता से प्रेरित था, लगभग उतना ही भावनात्मक उतार-चढ़ाव से भी। इस तरह की तमाम ख़बरें मौजूद हैं जिनमें त्योहार के वक्त आजीविका बुरी तरह प्रभावित हुई है। लेकिन इस बात पर बहुत कम प्रतिक्रियाएँ सामने आई कि ऐसा कुछ आने वाले समय में नहीं हो। हम में से काफी लोग उस तस्वीर से प्रेरित थे जिसमें एक बच्ची पुलिस की गाड़ी के दरवाज़े पर अपना सिर लगा कर रो रही थी, क्योंकि पुलिस ने उसके पिता को पटाखे बेचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। 

दीवाली के मौके पर किसी भी बच्चे की मुस्कुराहट इस तरह नहीं छीनी जानी चाहिए, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसके पिता पटाखे बेच रहे थे। यह भयावह, अमानवीय और नैतिक रूप से निंदनीय है। ठीक इसी तरह हमने उस वक्त भी लाचार महसूस किया था जब पटाखा कारोबार से जुड़े लोगों में इस साल हुए नुकसान की वजह से काफी ज्यादा निराशा थी। इन बातों को समझते हुआ हमें ऐसा महसूस हुआ कि इस संबंध में कुछ पहल तो करनी ही पड़ेगी। हमारी घोषणा में नज़र आने वाले शब्द हमारे प्राथमिक विचार हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस नीति तैयार नहीं हुई है। 

समय के साथ योजना में बदलाव होते रहेंगे और इसके अलावा हम सुझावों के लिए अपने शुभचिंतकों पर भी निर्भर रहेंगे। फ़िलहाल हमारे पास कुछ आइडिया है कि हम कैसे आगे बढ़ेंगे और हमें किन क्षेत्रों में आगे बढ़ने की ज़रूरत है। इस अभियान को सफल बनाने के लिए लोगों और सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी। यहाँ हम उन क्षेत्रों का उल्लेख कर रहे हैं जिन पर हमें ध्यान देने की ज़रूरत है। 

विद्यालय 

बड़े पैमाने पर होने वालों कार्यों को लेकर प्रोपेगेंडा और ब्रेनवाशिंग विद्यालयों में ही शुरू हो जाती है। बीते कुछ सालों से पटाखे नहीं फोड़ने के लिए बच्चों का ब्रेनवाश किया जा रहा है और यही बच्चे आने वाले समय में नियम-कायदे बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे। इसलिए यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि हम विद्यालय प्रशासन और वहाँ पढ़ने वाले बच्चों से पटाखों के मुद्दे पर सीधा संपर्क करें। 

इतनी सी दुनिया में हमें परम्पराओं का अस्तित्व बनाए रखने के लिए बहुत लंबी दूरी तय करने की ज़रूरत नहीं है,  लेकिन हम इतनी सी दुनिया में रह भी नहीं रहे हैं। इसलिए हम विद्यालय प्रशासन से संवाद करने के लिए प्रयास जारी रखेंगे जिससे यह सुनिश्चित हो कि पटाखों और हिन्दू परम्पराओं के विरुद्ध इस तरह का दुष्प्रचार नहीं किया जा सके। इसी दौरान यह भी देखना होगा कि विद्यालय के साथ साथ माता-पिता भी इस बात का ध्यान रखें कि उनका बच्चा किसी दूषित विचारधारा से प्रभावित नहीं हो। 

व्यापारियों के साथ संबंध 

हम पटाखा निर्माताओं, उत्पादकों और व्यापारियों से भी बात करने का प्रयास करेंगे जिससे हम इस प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझ पाएँ। इसके अलावा जिस तरह पटाखों को प्रदूषण से जोड़ा जाता है, उसके लिए भी शोध और अनुसंधान के माध्यम से बेहतर विकल्प पर काम किया जा सके। जहाँ तक हमारी जानकारी है इस तरह का कोई भी शोध उपलब्ध नहीं है, जिसके आधार पर ऐसा कहा जा सके कि देश के अनेक शहरों में हवा की गुणवत्ता खराब होने के लिए पटाखे ही जिम्मेदार हैं।  

देश की तमाम सरकारों के लिए प्रदूषण पर कोई ठोस कदम उठाने की जगह पटाखे पर पाबंदी लगाना आसान हो गया है। यह सरकारों के लिए राष्ट्रीय अनुष्ठान जैसा बन गया है कि वह पटाखों पर पाबंदी लगा कर यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वह प्रदूषण के मुद्दे पर कितने सक्रिय हैं। जबकि प्रदूषण के मूल कारणों को ख़त्म करने के लिए कोई प्रयास नहीं हो रहे हैं। पटाखों पर लगी पाबंदी की वजह से इस क्षेत्र से जुड़े तमाम लोग बुरी तरह प्रभावित हुए हैं, उनकी आजीविका खतरे में है। हम उनसे भी लगातार संपर्क में रहेंगे जिससे 2021 में इस तरह की स्थिति दोबारा नहीं पैदा हो। 

कानूनी दांवपेंच 

इस मुद्दे का सबसे अहम सन्दर्भ है कानूनी पक्ष। हम उन लोगों के साझेदारी करते हुए आगे आएँगे जो इस मुद्दे पर पहले से ही काम कर रहे हैं। इसके अलावा ध्यान रखेंगे कि कैसे हम उस अभियान में अपना सहयोग दे सकते हैं। दीवाली को सुरक्षित रखने की लड़ाई अदालत में लड़ी जाएगी और अदालत में लड़ी जानी चाहिए, इसके अलावा हम सुनिश्चित करेंगे कि हिन्दू समुदाय इस लड़ाई में अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी करे। भले बहुत कुछ हमारे पक्ष में नहीं हो, लेकिन प्रयास तो किसी भी सूरत में जारी रखने होंगे। 

हमारा मानना है कि पटाखों पर पाबंदी अन्याय है और हम ऐसा अब तक किए गए शोध की दलीलों के आधार पर कह रहे हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि सरकार द्वारा पटाखों (इंडस्ट्री) पर लिया गया निर्णय किसी भी तरह बदला जा सके। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दीवाली के मौके पर देश के तमाम शहरों में प्रदूषण को रोकने के लिए पटाखों पर पाबंदी लगाई थी, तमाम राज्य सरकारों ने भी यही किया था। कुछ राज्यों में न्यायपालिका ने यह निर्णय लिया था, इसलिए हमें एकजुट होकर प्रयास करना होगा कि इस निर्णय को पलटा जा सके। 

हम पूरी तरह आप पर निर्भर हैं आत्मीय पाठकों

ऑपइंडिया पाठकों के मामले में बेहद भाग्यशाली रहा है जो हर तरह के हालात में हमारे साथ खड़े होते हैं। तमाम उतार-चढ़ावों के बीच पाठकों ने हमें प्रेरित किया, मज़बूत किया और संवेदनशील मौकों पर समर्थन भी किया, जिसकी वजह से ऑपइंडिया सफल हो पाया। इस रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए हमें सुझावों की सख्त ज़रूरत है और यह ई मेल के माध्यम से हमें भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा लोगों की ज़रूरत होगी और इस मुद्दे पर मिलने वाला सहयोग भी सराहनीय होगा। 

हम क्यों लड़ रहे हैं? 

पटाखों पर इस तरह पाबंदी लगाना सांस्कृतिक संवेदनाओं का अपमान है। बतौर नागरिक हम सरकार से इस बात उम्मीद करते हैं कि वह रोज़गार के नए अवसर बनाए न कि उन्हें ख़त्म करे। हम सरकार से यह भी उम्मीद करते हैं कि वह प्रदूषण के मुद्दे पर अर्थपूर्ण कदम उठाए न कि पटाखों पर पाबंदी जैसे तात्कालिक कदम उठाए, जिससे प्रदूषण पर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता है। हम नहीं चाहते कि त्योहार मनाते समय हिन्दुओं के मन में इस बात का भय हो कि उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। 

हम नहीं चाहते कि इतने बड़े पर्व के मौके पर पुलिस हिन्दुओं को प्रताड़ित करे। हम नहीं चाहते कि पुलिस पटाखे बेचने वालों को अपराधी साबित करे। हम नहीं चाहते कि कोई छोटी बच्ची पुलिस की गाड़ी से इसलिए अपना सिर लड़ाए, क्योंकि उसके पिता को पटाखे बेचने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया है। हम नहीं चाहते कि हिन्दुओं को पटाखे बेचने के लिए अपराधियों की तरह देखा जाए। हम नहीं चाहते हैं कि रौशनी के महापर्व के मौके पर अँधेरा हावी हो जाए। 

हम सिर्फ इतना चाहते कि सरकार बहुसंख्यक समाज के रीति-रिवाजों के विरुद्ध अपनी लड़ाई बंद कर दे। हम चाहते कि सरकार अपने ही नागरिकों (बहुसंख्यक) के विरुद्ध जारी लड़ाई बंद कर दे। हम चाहते हैं कि बच्चे ठीक वैसे ही दीवाली मनाएँ जैसे हमने अपने बचपन में दीवाली मनाई है। हम चाहते हैं कि बच्चे हमारे पूर्वजों की परम्पराओं को आगे लेकर जाएँ। यही असल मायनों में विरासत कही जाती है, जिसे आगे लेकर जाने के लिए हम बच्चों से उम्मीद करते हैं। इसलिए हमें प्रतिकार करना होगा। अभी तक हमारे पास कोई तय योजना नहीं है, लेकिन बहुत जल्द वह भी होगा। हमारी पूरी कोशिश होगी कि 2021 की दीवाली सबसे अद्भुत और दिव्य हो।        

‘सुबह के साढ़े 4 बजे कौन पटाखे फोड़ता है?’: दीपावली से भड़के शाहिद, लोगों ने दिलाई अजान की याद

पूर्व सांसद शाहिद सिद्दीकी ने रविवार (नवंबर 15, 2020) की सुबह तड़के 4:53 बजे ट्वीट कर के हिन्दुओं द्वारा दीपावली मनाने को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने पूछा कि सुबह के साढ़े 4 बजे किस किस्म के लोग पटाखे उड़ाते हैं? उन्होंने दावा किया कि उन्हें तब भी तेज़ आवाज़ में पटाखे छोड़ने की गूँज सुनाई दे रही थी। साथ ही उन्होंने पूछा कि जब कोई फैसला लागू ही नहीं किया जा सकता है तो पटाखों को प्रतिबंधित करने का क्या फायदा?

शाहिद सिद्दीकी ने दावा किया कि जो दिल्ली पहले से ही एक ‘जहरीला नरक’ बनी हुई थी, वो अब दीपावली की अगली सुबह अपने अधिकतर निवासियों के लिए मौत का एक जाल बन जाएगी। शाहिद सिद्दीकी द्वारा दीपावली और पटाखों को लेकर इस तरह ज्ञान दिए जाने के बाद कई लोगों ने उनकी आलोचना भी की और पूछा कि सुबह-सुबह अजान की जो आवाज़ आती है, क्या उससे किसी की तन्द्रा नहीं भंग होती है?

‘बेचैन बैंकर’ नामक ट्विटर यूजर ने लिखा कि वो शाहिद सिद्दीकी की चिंताओं से सहमत हैं और सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिदों में साउंड सिस्टम को लेकर भी कई नियम-कायदे लगाए हुए हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए। साथ ही पूछा कि जब फैसला लागू ही नहीं हो सकता तो सुनाने का क्या फायदा? आदित्य भारद्वाज ने पूछा कि वो कौन से लोग हैं, जो ‘सेक्युलर राष्ट्र भारत’ में अजान के नाम पर दिन में कई बार लोगों को परेशान करते हैं।

एक व्यक्ति ने अपने निजी अनुभव से समय गिनाते हुए कहा कि सबसे पहले तो तड़के 4 बजे और फिर 8 बजे, फिर दोपहर 1 बजे और फिर 4 बजे, इसके बाद शाम के 6 बजे करोड़ों लोगों को साल के 365 दिन नमाज सुनने के लिए बाध्य किया जाता है, इससे हमारा दिमाग बीमार हो रहा है। एक अन्य यूजर ने लिखा कि जो शहरों को नहीं जलाते, वो सुबह में पटाखे छोड़ना पसंद करते हैं। वो सार्वजनिक संपत्ति को नहीं जलाते। शाहिद सिद्दीकी ने पीएम मोदी के ‘9 बजे 9 मिनट’ को लेकर भी आपत्ति जताई थी।

शहीद सिद्दीकी को लोगों ने दिया करारा जवाब

जब लोगों ने मस्जिद में नमाज की बात की तो शाहिद सिद्दीकी भड़क गए और एक यूजर से कहा कि तुम अपने भाइयों से कहो कि वो रोज सुबह पटाखे छोड़ें और तुम इसका बचाव करो। उन्होंने सलाह दी कि वो इसे नियमित क्रियाकलाप बना लें। लोगों ने उन्हें कहा कि वो एक दिन के पटाखे से इतने परेशान हैं, लेकिन साल भर 5 वक़्त के नमाज को लेकर उन्हें कोई दिक्कत नहीं है? दीपावली पर पटाखे उड़ाने वालों को भला-बुरा कहने वाले शाहिद सिद्दीकी ने इन तर्कों पर चुप्पी साध ली।

ऐसे ही पत्रकार रूपा सुब्रमण्या ने ऑपइंडिया की ‘मिशन ब्राइट एंड लाउड दीवाली 2021’ का विरोध करते हुए कुछ ऐसा कह दिया, जिससे कॉन्ग्रेस के एक नेता ही उनसे नाराज़ हो गए और जम कर फटकार लगा दी। रूपा ने कहा कि उन्होंने ऐसा कोई अभियान नहीं देखा, जिसमें इससे ज्यादा प्रदूषण को प्रमोट किया गया हो, या फिर ऐसे इंडस्ट्री का समर्थन किया गया हो, जो ‘बाल मजदूरी’ पर आश्रित है। उन्होंने ऑपइंडिया के लिए ‘पूप इंडिया’ शब्द का प्रयोग करते हुए कहा कि ये रोज नई गहराई की ओर जा रहा है।

‘हिंदुओं को सबक सिखाने’ और ‘देश की गर्दन काटने’ वालों को TheWire क्यों कह रहा – एक्टिविस्ट, स्कॉलर?

अर्णब गोस्वामी को महाराष्ट्र सरकार ने जम कर प्रताड़ित किया। भारत के सबसे बड़े मीडिया नेटवर्क्स में एक के संस्थापक को 2 साल पुराना केस खोल कर लगभग 10 दिन अपने शिकंजे में रखने के बाद तभी रिहा किया गया, जब तक सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी नहीं की। इसके बाद वामपंथियों का नया नाटक शुरू हो गया और ‘The Wire’ ने जेल में बंद सारे भीमा-कोरेगाँव और दिल्ली दंगों के चार्जशीटेड लोगों को लेकर रोना शुरू कर दिया। इसी क्रम में ‘The Wire’ ने तो पूरी सूची ही तैयार कर दी।

‘The Wire’ ने अपनी सूची में जामिया के मीरान हैदर और जेएनयू के उमर खालिद से लेकर ‘पिंजरा तोड़’ की नताशा-देवांगना और भीमा-कोरेगाँव के अर्बन नक्सलियों तक को हीरो बना कर पेश किया। यहाँ सोचने वाली बता है कि क्या एक पत्रकार की तुलना अपराधियों से हो सकती है? जिनके गुनाह पब्लिक डोमेन में हैं, जिनके बारे में पुलिस से लेकर जाँच एजेंसियों तक के पास कई सबूत हैं, उनकी तुलना एक ऐसे पत्रकार से हो सकती है, जिसे सिर्फ बोलने की वजह से प्रताड़ित किया गया?

‘The Wire’ ने जब सूची तैयार ही की है तो उसने इसमें ताहिर हुसैन का नाम भी डाला है, जो चौंकाने वाला है? शायद नहीं! यही तो इनका प्रोपेगेंडा है। दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों का मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन के खिलाफ इतनी गवाहियाँ और सबूत हैं कि वो शायद ही जेल से बाहर निकले! और फिर उसने तो जाँच में यह कबूल भी कर लिया कि वो हिंदुओं को सबक सिखाना चाहता था, इसलिए प्लानिंग के तहत दंगों से पहले सारे CCTV कैमरे तुड़वा दिए थे। ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि अर्णब गोस्वामी पर शिकंजा कसने के लिए दो साल पुराने मामले को बिना कोर्ट की अनुमति से खोला गया, जबकि इस सूची में जो भी हैं, उन्हें पूरी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तार किया गया।

आइए, उमर खालिद का ही उदाहरण लेते हैं। दिल्ली में फरवरी 2020 के अंतिम हफ़्तों में हिन्दू-विरोधी दंगे हुए। जिस तरह से उमर खालिद ने घूम-घूम कर भड़काऊ बयान दिए थे, सभी को पता था कि इन दंगों को भड़काने में उसका हाथ हो सकता है। लेकिन, दिल्ली पुलिस ने जाँच और पूछताछ में समय लिया। सबूत जुटाए गए। ताहिर हुसैन ने पूछताछ में उसका नाम लिया। घटना के लगभग 7 महीने बाद उसे गिरफ्तार किया गया।

आखिर जामिया से लेकर दिल्ली दंगों तक, ऐसा कौन सा मामला है, जहाँ सरकार को सुप्रीम कोर्ट तक नहीं घसीटा गया? हर मामले में उन्हें बचाने के लिए पहले से सुप्रीम कोर्ट में वकील खड़े थे। खोज-खोज कर जाँच एजेंसियों और पुलिस की कार्यप्रणाली में खामियाँ खोजने का दावा किया गया। उन्हें निराशा हाथ लगी। तो हर वैधानिक प्रक्रिया में गलत साबित होने के बाद उनके पास सिर्फ यही रास्ता बचता है कि वो उन्हें लेखक, विद्वान और एक्टिविस्ट बताएँ?

भीमा-कोरेगाँव के अर्बन नक्सली और दिल्ली दंगों के इस्लामी कट्टरवादी ‘The Wire’ की नजर में हीरो

कारोबारी तो ताहिर हुसैन भी था। उसके लिए भी कहा जा रहा है कि एक कारोबारी और नेता को जबरदस्ती जेल में बंद कर के रखा गया है? पेंटर और लेखक तो अडोल्फ हिटलर भी था। उसके बारे में ‘The Wire’ क्यों नहीं लिखता कि उसे आत्महत्या को मजबूर कर दिया गया? लादेन के बारे में भी तो कहें कि एक इंजीनियर को अमेरिका ने मार डाला? फिर भारत में ही नक्सलियों-अपराधियों को लेखक और एक्टिविस्ट बता कर ये प्रपंच क्यों रचा जाता है?

भीमा-कोरेगाँव और दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगों के मामले में जितने भी आरोपित गिरफ्तार किए गए हैं, उन सभी के बारे में एक से बढ़ कर एक सबूत हैं और उनकी करतूतों का कच्चा चिट्ठा पुलिस तो दूर, सार्वजनिक डोमेन में भी है। दोनों ही मामलों में लाशें गिरते हुए किसने नहीं देखी? स्टेन स्वामी और वरवरा राव जैसों के प्रतिबंधित हिंसक नक्सली संगठनों से सम्बन्ध किससे छिपा हुआ है? इस्लामी कट्टरवादियों की करतूतों को कौन नहीं जानता?

आखिर भारत के टुकड़े-टुकड़े कर के पूर्वोत्तर के राज्यों को शेष देश से अलग करने की धमकी देने वाला शरजील इमाम क्यों जेल से बाहर होना चाहिए? जिन महात्मा गाँधी की लिबरल्स पूजा करने वाला दावा करते हैं, उन्हें फासिस्ट बताने वाले व्यक्ति के लिए आज वो क्यों सरकार का विरोध कर रहे हैं और वैधानिक प्रक्रिया को ठेंगा दिखा रहे हैं? शाहीन बाग़ के माध्यम से 3 महीने तक दिल्ली को बंधक बना कर रखने वाले नायक कैसे हुए?

‘The Wire’ ने वामपंथियों की उसी पुरानी तकनीक का इस्तेमाल किया है, जिसके माध्यम से वो किसी आतंकी-अपराधी के पुराने पेशे या फिर उम्र की बातें करते हुए लोगों को इमोशनल फूल बनाने की कोशिश करते हैं। वरवरा राव 80 साल का है। उस पर आरोप है कि उसने हिंसक नक्सलियों को एल्गार परिषद के कार्यक्रम में बुलाया। यूएपीए के आरोपित के लिए आखिर ‘The Wire’ क्यों इतना बेचैन हो रहा है?

असल में जितने भी अर्बन नक्सली हैं, उनके आवरण वाला पेशा एक्टिविज्म और लेखन का ही है, क्योंकि इन दोनों कार्यों ने उन्हें न सिर्फ अपना एजेंडा फैलाने में मदद मिलती है, बल्कि ये वामपंथियों के एक बड़े वर्ग द्वारा समाज के नायक भी कहे जाते हैं। बाद में इन्हीं पेशा का हवाला देकर उन्हें मासूम बना कर पेश किया जाता है कि फलाँ तो कलाकार है, उसे झूठ का फँसा दिया। क्या अर्णब गोस्वामी की उनसे तुलना हो सकती है?

अर्णब गोस्वामी ने तो पालघर में साधुओं की भीड़ द्वारा हत्या और सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत के मामले में न्याय की माँग की थी? सरकार के रवैये और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए थे। उनके साथ कई नेता और इस मामले से जुड़े लोग थे। उन्होंने कब भड़काऊ भाषण दिया? कब नक्सलियों के साथ साँठगाँठ किया? जब इस्लामी आतंकियों के साथ मिल कर दंगे की साजिश रची? कब घूम-घूम कर लोगों को हिंसा के लिए भड़काया?

ऐसे ही असम में सीएए विरोधी हिंसक प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले अखिल गोगोई भी किसानों के हितैषी संगठन का नेता होने का दावा करता है और उसके लिए भी अभियान चलाया जा रहा है। क्या किसानों के हितैषी होने का दावा करने से आपको हिंसा करने की अनुमति मिल जाती है? अगर ऐसा है तो जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकी भी खुद को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ कहते हैं। तो क्या उनकी भी पूजा होनी चाहिए?

सौ बात की एक बात ये है कि हिंसा करने वाला चाहे कलाकार होने का दावा करे या फिर स्वतंत्रता सेनानी, उसे जेल में होना ही चाहिए और इसीलिए दिल्ली दंगों और भीमा-कोरेगाँव के आरोपित आज जेल में हैं। जाति और मजहब के आधार पर लोगों को लड़ाने वाले और हिंसा के लिए उकसा कर बाद में सरकार को दोष देने वालों का यही होना भी चाहिए। चाहे उसकी उम्र 20 साल हो या फिर 80 साल, अपराधी तो अपराधी है।