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2 ट्रैक्टर ट्रॉली पराली (पुआल) के बदले 1 ट्रॉली ‘सबसे बढ़िया खाद’ Free में: UP में योगी सरकार ऐसे रोक रही धुएँ की समस्या

दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश। ये चाक राज्य हैं, जो दिवाली से एक महीने पहले से मीडिया की चर्चाओं में आ जाते हैं। कारण होता है प्रदूषण, फोटो-वीडियो में दिखता है धुआँ और धुंध। इसके पीछ असल वजह होती है इन राज्यों में किसानों द्वारा पराली (खेत में खड़ी फसल से अनाज निकाल लेने के बाद बचा हुआ हिस्सा, पुआल) जलाने की प्रक्रिया।

असल वजह मतलब पराली जलाने की प्रक्रिया और किसान को कोसने के बजाय उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इसके बदले वस्तु-विनिमय (Barter System) को लागू किया है। इसके तहत किसानों से पराली (पुआल) लेकर उसके बदले गोबर की खाद देने का निर्णय राज्य सरकार ने लिया है।

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में जिला प्रशासन ने इसी वस्तु-विनिमय प्रणाली के तहत किसानों से 2 ट्रॉली पराली लेकर उन्हें 1 ट्रॉली गोबर की खाद दे रहा है – निःशुल्क। ठीक इसी प्रकार कानपुर देहात के प्रशासन ने किसानों को सहायता उपलब्ध कराई।

पराली (पुआल) दो, खाद लो योजना

उन्नाव में 1675 क्विंटल से ज्यादा पराली वस्तु-विनिमय प्रणाली के तहत किसानों से ली गई है। जबकि कानपुर देहात में 3000 क्विंटल से ज्यादा पराली ली गई। इसके एवज में किसानों को इसके आधे के बराबर गोबर की खाद दी गई।

योगी सरकार की वो योजना जो किसानों के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी है वरदान!

उन्नाव के जिलाधिकारी रविंद्र कुमार ने बताया कि उनके जिले में 125 गोशालाएँ हैं। इनमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद उपलब्ध है। ऐसे में प्रशासन 2 ट्रॉली पराली देने पर एक ट्रॉली गोबर की खाद किसानों को निशुल्क दे रहे हैं। वहीं कानपुर देहात के जिलाधिकारी डॉ दिनेश चंद्र ने बताया कि पराली की समस्या को देखते हुए प्रशासन किसानों को जागरूक कर रहा है।

किसानों के संरक्षण के लिए CM योगी का सख्त आदेश

राज्य के CM योगी आदित्यनाथ ने किसानों से पराली न जलाने का आग्रह किया था। लेकिन प्रशासन को भी सख्त हिदायत देते हुए उन्होंने पराली जलाने से संबंधित कार्रवाई में किसानों के साथ दुर्व्यवहार या उत्पीड़न स्वीकार नहीं करने पर बल दिया था।

लोकतंत्र और नोटतंत्र के बीच उलझे दिग्विजय सिंह, कार्ति चिदंबरम ने EVM को बता दिया भरोसेमंद प्रणाली

मध्यप्रदेश में उपचुनाव के नतीजे पक्ष में न आने के कारण कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर अपना पुराना ढर्रा अपना लिया है। पार्टी के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह जो कुछ समय पहले तक खुद दूसरे नेताओं को पार्षदी का लालच देकर चुनाव से अपना नाम वापस लेने को कह रहे थे वो अब लोकतंत्र की दुहाई दे रहे हैं।

मध्यप्रदेश उपचुनाव के नतीजों पर दिग्विजय सिंह का कहना है, “मैंने आपसे सुबह कहा था कि चुनाव लोकतंत्र और नोटतंत्र के बीच है। जनता और प्रशासन के बीच है। नोटतंत्र जीत गया, लोकतंत्र हार गया।” उल्लेखनीय है कि यहाँ पर कॉन्ग्रेस नेता का मतलब लोकतंत्र से उनकी पार्टी है जबकि नोटतंत्र से भाजपा पार्टी।  

बता दें कि इससे पहले दिग्विजय सिंह ने दावा करते हुए कहा था, “EVM से चयनात्मक छेड़छाड़ की जाती है। ऐसी सीटें हैं जो हम किसी भी परिस्थिति में नहीं हारे होंगे लेकिन हमने हजारों वोटों से हारे हैं। हम कल एक बैठक करेंगे और परिणामों का विश्लेषण करेंगे।”

3 नवंबर को भी दिग्विजय सिंह ने ईवीएम पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने कहा था तकनीकी युग में विकसित देश ईवीएम पर भरोसा नहीं करते, लेकिन भारत और कुछ छोटे देशों में ईवीएम से चुनाव होते हैं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा था कि विकसित देश क्यों नहीं कराते। क्योंकि उन्हें ईवीएम पर भरोसा नहीं है, क्योंकि जिसमें चिप है, वह ‘हैक’ हो सकती है।

वहीं कार्ति चिदंबरम ने बिहार और मध्यप्रदेश में कॉन्ग्रेस को पिछड़ता देखने के बावजूद ईवीएम पर अपना विश्वास दिखाया है। उन्होंने कहा, ”चाहे चुनाव के रिजल्ट कुछ भी आएँ। ये समय है कि ईवीएम को दोष देना बंद किया जाए। मेरे अनुभव के हिसाब से ईवीएम मजबूत, सटीक और भरोसेमंद प्रणाली है।”

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में उपचुनाव के रुझानों ने कॉन्ग्रेस को नाउम्मीद कर दिया है। अभी तक की मतगणना में भाजपा 21 सीटों पर और कॉन्ग्रेस केवल 6 सीटों पर आगे चल रही है। 

कॉन्ग्रेस को उपचुनावों में कम से कम 20 सीटें जीतने की उम्मीद थी, लेकिन उपचुनाव के नतीज़े कॉन्ग्रेस के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं। 12 मंत्रियों सहित कुल 355 उम्मीदवारों ने 3 नवंबर को उपचुनाव लड़े।

मध्य प्रदेश में 28 सीटों पर हुए उपचुनाव में आ रहे रुझानों के बाद ये साफ हो गया है कि अब कॉन्ग्रेस के लिए उम्मीदें समाप्त हैं। 21 सीटों पर बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है और मांधाता में पहला नतीजा भी बीजेपी के खाते में गया है। दोपहर होते-होते भाजपा को जो बढ़त मिलती देखी जा रही थी, उनका नतीजों में तब्दील होना लगभग तय माना जा रहा है।

‘बिहार की जनता ने आज आपसे स्टूडियो में डांस करने का मौका छीन लिया’: राजदीप सरदेसाई के लिए ‘दुःखी हुए’ अमित मालवीय

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई भाजपा से किस कदर घृणा करते हैं और उसे लेकर कैसी-कैसी बातें फैलाते रहते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब अरविन्द केजरीवाल ने 5 साल सरकार चलाने के बाद दोबारा वापसी की थी, तब उन्होंने स्टूडियो में मतगणना के कवरेज के दौरान ‘एक्सिस माय इंडिया’ के प्रदीप गुप्ता के साथ डांस किया था। अब अमित मालवीय ने उन पर तंज कसा है।

बिहार विधानसभा चुनाव की मतगणना चालू है और खबर लिखे जाने तक भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभर रही है। 77 सीटों पर आगे चल रही भाजपा अपने प्रतिद्वंद्वी राजद से 10 सीटें ज्यादा लाती हुई दिख रही है। ऐसे में जब राजग बहुमत के लिए ज़रूरी 122 सीटों से आगे चल रही है,’ इंडिया टुडे’ पर राजदीप सरदेसाई ने भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय से पूछा कि क्या वो यहाँ से भाजपा को जीतते हुए देख रहे हैं?

उन्होंने पूछा कि क्या अमित मालवीय मानते हैं कि भाजपा की जीत की सम्भावना है, या फिर उन्हें लगता है कि अभी भी ऐसा बोलना ठीक नहीं है। हालाँकि, अमित मालवीय ने उनसे कहा कि जवाब देने से पहले वो ये जानना चाहते हैं कि सरदेसाई इस परिणाम को स्वीकार कर रहे हैं या फिर उन्हें अभी भी आशा है कि राजग के अलावा कोई अन्य गठबंधन बिहार में जीतने जा रहा है। उन्होंने राजदीप सरदेसाई के चिर-परिचित भाजपा विरोध रुख की ओर इशारा किया।

इसके बाद उन्होंने कहा, “माफ़ कीजिए, लेकिन बिहार की जनता ने आपसे आज स्टूडियो में डांस करने का मौका छीन लिया है। न तो आपके एग्जिट पोल्स सही हुए और न ही आप चुनाव परिणामों को ठीक तरीके से ले सकते हैं।” इसके बाद अमित मालवीय ने तंज कसते हुए सहानुभूति जताई और कहा कि राजदीप सरदेसाई को आज इन चीजों से गुजरना पड़ रहा है, ये बातें उन्हें बुरी लग रही है। इसके बाद राजदीप का चेहरा देखने लायक था।

बता दें कि ऑपइंडिया को पता चला था कि मोदी-विरोध को लेकर सहमति न जताने के कारण ख़ुद को सबसे तेज़ बताने वाला मीडिया ग्रुप ऐसे आवाज़ों को दबाने में सबसे आगे है। पता चला था कि यहाँ पर लोकसभा चुनावों के पहले ही दक्षिणपंथी पत्रकारों की लिस्ट तैयार कर ली गई थी और माना जा रहा था कि चुनाव में नरेंद्र मोदी के हारते ही इन लोगों की नौकरी जानी तय है। 2019 लोकसभा के नतीजों वाले दिन एक पत्रकार ने न्यूज़रूम में मिठाई बाँटी तो उन्हें बुलाकर कह दिया गया था कि आपका कॉन्ट्रैक्ट रीन्यू नहीं होगा।

‘हम, रउआ आ बउआ’: सिन्हा के परिवार के 3 सदस्यों ने 2 साल में 3 सीटों से हार कर रचा इतिहास

अब जब बिहार विधानसभा चुनावों के रुझान पुष्ट होते जा रहे हैं, बिहार के एक परिवार के बारे में बात करना आवश्यक है। बिहार के ‘बिहारी बाबू’ का ये वो परिवार है, जिसके 3 लोग पिछले दो सालों में चुनाव हार कर अब घर में बैठेंगे। भाजपा में रहते पीएम मोदी को गाली देने से लेकर वहाँ से निकल कर कॉन्ग्रेस में जाने और अप्रासंगिक होने तक, शत्रुघ्न सिन्हा की कहानी ने पिछले दो सालों में कई मोड़ लिए हैं।

यहाँ आपके सामने हम सिर्फ आँकड़े पेश करेंगे, बाकी तथ्यों का अंदाज़ा आप खुद ही लगा सकते हैं। खबर लिखे जाने तक पटना के बाँकीपुर सीट से कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार लव सिन्हा भाजपा के नितिन नवीन से आधे से भी कम वोट ला सके हैं। सिटिंग विधायक नितिन नवीन के 19920 (65.1%) वोटों के मुकाबले उन्हें मात्र 7784 (25.44%) मत आए थे। इस तरह से वो 12136 (39.66%) के भारी अंतर से पीछे चल रहे हैं।

अब जरा पीछे चलते हैं 2019 के लोकसभा चुनाव की तरफ। उस चुनाव में जहाँ बॉलीवुड के वरिष्ठ अभिनेता रहे शत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब से ताल ठोक रहे थे और उनकी पत्नी पूनम सिन्हा लखनऊ से समाजवादी प्रत्याशी के रूप में उतरी थीं। दोनों ही सीटों पर भाजपा के केंद्रीय मंत्रियों रविशंकर प्रसाद और राजनाथ सिंह ने क्रमशः उन्हें हराया। जो शत्रुघ्न सिन्हा कॉन्ग्रेस से पटना साहिब में उतरे थे, उनकी पत्नी लखनऊ में कॉन्ग्रेस के खिलाफ लड़ रही थीं।

पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा को 3,22,849 (32.87%) मत मिले, जो रविशंकर प्रसाद को मिले 6,07,506 (61.85%) से काफी कम था। इसी तरह लखनऊ में पूनम सिन्हा को 2,85,724 (25.59) वोट मिले थे, जो उनके प्रतिद्वंद्वी राजनाथ सिंह को मिले 6,33,026 (56.70%) वोटों का आधा भी नहीं था। इस तरह से 2019 लोकसभा चुनाव से लेकर बिहार विधानसभा चुनाव तक परिवार के 3 लोग 3 अलग-अलग सीटों से चुनाव हार चुके हैं।

बाँकीपुर में चुनाव प्रचार के दौरान अपने बेटे और कॉन्ग्रेस उम्मीदवार लव सिन्हा के साथ शत्रुघ्न सिन्हा

2009-19 में सांसद रहे शत्रुघ्न सिन्हा कि सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उन्होंने दो बार जीतने के बाद भी अपने संसदीय क्षेत्र की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। इससे जनता में यह संदेश गया कि वह अपने आप को किसी भी बड़े नेता से भी ऊपर समझते हैं। वो भाजपा की बैठकों में शामिल नहीं होते थे, कार्यकर्ताओं से मिलते-जुलते नहीं थे और सिर्फ़ पार्टी की बड़ी रैलियों में ही हिस्सा लेते थे। सिन्हा द्वारा इस तरह के सौतेले व्यवहार से भाजपा के कार्यकर्ताओं के भीतर ही उन्हें लेकर असंतोष फ़ैल गया।

UN का मूल लक्ष्य अभी अधूरा.. कुछ देश समिट में बेवजह ले आते हैं द्विपक्षीय मुद्दे: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (नवम्बर 10, 2020) को SCO समिट (Shanghai Cooperation Organisation Summit) की वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया। इस बैठक में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान समेत विश्व के अन्य बड़े नेता शामिल हुए। वर्चुअल बैठक में बोलते हुए पीएम मोदी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने अपने 75 साल पूरे किए हैं, लेकिन अनेक सफलताओं के बाद भी संयुक्त राष्ट्र (UN) का मूल लक्ष्य अभी अधूरा है।

पीएम मोदी ने कहा, “महामारी की आर्थिक और सामाजिक पीड़ा से जूझ रहे विश्व की अपेक्षा है कि UN की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन आए हैं। अभूतपूर्व कोरोना महामारी के इस अत्यंत कठिन समय में भारत के फार्मा उद्योग ने 150 से अधिक देशों को आवश्यक दवाएँ भेजी हैं। दुनिया के सबसे बड़े वैक्सीन उत्पादक देश के रूप में भारत अपनी वैक्सीन उत्पादन और वितरण क्षमता का उपयोग इस संकट से लड़ने में पूरी मानवता की मदद करने के लिए करेगा।”

PM मोदी ने चीन और पाकिस्तान को पूरे समिट में नजरअंदाज किया और उन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एससीओ एजेंडा में बार-बार अनावश्यक रूप से द्विपक्षीय मुद्दों को लाने के प्रयास हो रहे हैं, जो कि एससीओ चार्टर और शंघाई स्प्रिट का उल्लंघन करते हैं। इस तरह के प्रयास एससीओ को परिभाषित करने वाली सर्वसम्मति और सहयोग की भावना के विपरीत हैं दरअसल, उनका इशारा पाकिस्‍तान की तरफ था, जो अक्सर SCO में कश्‍मीर का मुद्दा उठाने की कोशिश कर चुका है।

पीएम मोदी ने कहा कि यह एक रेफॉर्म्ड मल्टीलेटरलिस्म है जो आज की वैश्विक वास्तविकताओं को दर्शाए, जो सभी स्टॉकहोल्डर्स (Stakeholders) की अपेक्षाओं, समकालीन चुनौतियों, और मानव कल्याण जैसे विषयों पर चर्चा करें। इस प्रयास में हमें एससीओ सदस्य राष्ट्रों का पूर्ण समर्थन मिलने की अपेक्षा है।

पीएम मोदी ने कहा, “हमने हमेशा आतंकवाद, अवैध हथियारों की तस्करी, ड्रग्स और मनी लॉन्ड्रिंग के विरोध में आवाज उठाई है। भारत एससीओ चार्टर में निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार SCO के तहत काम करने की अपनी प्रतिबद्धता में दृढ़ रहा है। परन्तु, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एससीओ एजेंडा में बार-बार अनावश्यक रूप से द्विपक्षीय मुद्दों को लाने के प्रयास हो रहे हैं, जो एससीओ चार्टर और शंघाई स्पिरिट का उल्लंघन करते हैं। इस तरह के प्रयास SCO को परिभाषित करने वाली सर्वसम्मति और सहयोग की भावना के विपरीत हैं।”

उल्लेखनीय है कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के इस सम्‍मेलन का आयोजन इस बार रूस कर रहा है। भारत और रूस के अलावा इस ग्रुप में चीन, कजाकिस्‍तान, किर्गिस्‍तान, तजाकिस्‍तान, पाकिस्‍तान और उज्‍बेकिस्‍तान शामिल हैं।

देश के ‘Wheat Belt’ का फरमान: मोदी के कृषि कानूनों से खुश हैं किसान, व्यर्थ गया ट्रैक्टर पर सोफे लगा अराजकता फैलाना

मध्य प्रदेश और गुजरात में भाजपा की जीत बहुत कुछ कहती है। इसमें सबसे पहली बात तो ये है कि कृषि कानूनों पर कॉन्ग्रेस ने जो विरोध प्रदर्शन किया था और किसानों को उकसाया था, वो पूरी तरह फेल रहा। मध्य प्रदेश उन राज्यों में से है, जहाँ सबसे ज्यादा गेहूँ की खेती होती है। वहाँ की 28 सीटों में से 20 भाजपा के खाते में जाती दिख रही है और इससे स्पष्ट है कि कृषि कानूनों के अंतर्गत किसानों को केंद्र सरकार ने कहीं भी अपनी फसल बेचने की छूट दी थी, उससे वो खुश हैं।

सबसे पहले तो बाते करते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस ने मध्य प्रदेश के किसानों को गुमराह करने का प्रयास किया। सितम्बर में नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ ने मध्य प्रदेश में कृषि कानूनों को लेकर राजनीति शुरू की। उन्होंने इसे किसान विरोधी बिल करार दिया और कहा कि ये इतिहास में काले दिन के रूप में दर्ज होगा। उन्हें लगता था कि मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार राज्य में इसे स्वीकार करने में असहज होगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

तभी तो उन्होंने सीएम से जवाब माँगा कि मध्य प्रदेश की सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट करे। हालाँकि, वहाँ की भाजपा सरकार खुल कर इस बिल के समर्थन में आई और कृषि मंत्री कमल पटेल खुल कर इसके समर्थन में सामने आए और कहा कि इससे किसानों को स्वतंत्रता मिलेगी और ‘असंभव को संभव करने वाले मोदी’ ने किसान हित में ये कदम उठाया है। अकाली दल के राजग से अलग होने और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के इस्तीफे के बाद विरोध ने जोर पकड़ा।

राहुल गाँधी ने पंजाब में जाकर ट्रैक्टर रैलियाँ की। इधर मध्य प्रदेश में भाजपा कृषि कानूनों के फायदों को लेकर किसानों तक जाने में सफल रही। ग्वालियर-चम्बल बेल्ट में गेहूँ और धान बड़ी मात्रा में होते हैं। चम्बल के बीहड़ के क्षेत्रों को भी कृषि के लिए उपयुक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार लगातार प्रयास कर रही है। ऐसे में अगर कृषि कानूनों से किसानों को सचमुच में यहाँ नुकसान हुआ होता तो वो भाजपा को वोट नहीं देते और नाराजगी जताते।

ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ है और उन्होंने ही कॉन्ग्रेस छोड़ कर कई मंत्रियों-विधायकों के साथ भाजपा का दामन थामा था, इसीलिए ये चुनाव उनकी विश्वसनीयता के लिए भी परीक्षा का विषय था। उनकी सभाओं में लगने वाले ‘महाराजा-महाराजा’ के नारे क्या वोटों में तब्दील होंगे, ये उन्हें देखना था। उन्होंने कई रैलियाँ की और युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक से संपर्क साधा और उन्हें विश्वास में लिया।

आइए, कुछ ही दिनों पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया द्वारा दिए गए एक इंटरव्यू को देखते हैं, जिसमें कैसे उन्होंने कृषि को ही मुद्दा बनाया था और गिनाया था कि कैसे केंद्र और राज्य सरकार ने किसानों के लिए कई अहम फैसले लिए। ज्योतिरादित्य सिंधिया को पता था कि कॉन्ग्रेस किसानों को गुमराह करने में लगी हुई है, तभी उन्होंने TOI के रोहन दुआ से बात करते हुए ‘सीएम किसान सम्मान निधि’ की बात की थी।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ के तहत किसानों को प्रतिवर्ष 6000 रुपए देने का निर्णय लिया। जहाँ पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ये रुपए भी किसानों तक न पहुँचाए जाने और केंद्र को किसानों के नाम न मुहैया कराने के आरोप ममता बनर्जी की नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार पर लग रहा है, चौहान सरकार ने इस धनराशि में 4000 रुपए सालाना अपनी तरफ से जोड़ा और किसानों के लिए 10,000 रुपए प्रतिवर्ष का इंतजाम किया।

सिंधिया ने इसी की चर्चा की थी। इसके बाद सिंधिया ने गिनाया कि कैसे शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने किसानों से 1.3 लाख मीट्रिक टन गेहूँ का क्रय किया है। अब मध्य प्रदेश के ‘Wheat Belt’ में गेहूँ के खरीदने की बात तो असर करेगी ही। क्या कृषि कानूनों, पीएम-सीएम किसान सम्मान निधि और गेहूँ का सरकारी क्रय – ये तीनों मुद्दे भाजपा के पक्ष में गए? ताज़ा चुनाव परिणाम तो यही कह रहे हैं।

अगर भाजपा के वोट प्रतिशत की बाते करें तो ये मध्य प्रदेश उपचुनाव में 50% के भी पार दिख रहा है, जो बताता है कि उसे जनता का भी बहुमत मिल रहा है। राहुल गाँधी ट्रैक्टर में सोफा लगा कर विरोध करते दिखे थे। चुनाव प्रचार के दौरान मौके पर चौका मारते हुए चौहान ने इसे उठाया। उन्होंने तंज कसा कि राहुल गाँधी को ये तक नहीं पता कि प्याज को जमीन के भीतर उगाया जाता है या फिर जमीन के अंदर। उन्होंने जनता को ये बताने का प्रयास किया कि राहुल को कृषि के बारे में कुछ नहीं पता।

मध्य प्रदेश के लोग किसानों की कर्जमाफी के कॉन्ग्रेस के वादे को भुगत चुके थे, इसीलिए उन्होंने राहुल गाँधी पर भरोसा नहीं रहा। जिस तरह से कई किसानों को बिना कर्ज लिए कर्जमाफी के मैसेज आ गए तो कइयों के हजारों में मात्र एकाध रुपए माफ़ हुए, जिस तरह से तत्कालीन ‘सुपर सीएम’ दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह ही इस मुद्दे पर धरने पर बैठ गए – उसने राज्य के किसानों के मन से सारे संशय को मिटा दिया।

हाँ, एक और बात याद रखने वाली ये है कि देश के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री मध्य प्रदेश के हैं और उसी ग्वालियर क्षेत्र से आते हैं, जहाँ चुनाव हुए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा में लाने में उनकी भी भूमिका थी। वो पहले ग्वालियर से और फिर मोरेना से सांसद चुने गए। इसीलिए, ये उनके लिए भी प्रतिष्ठा का विषय था कि उनके क्षेत्र में किसान मोदी सरकार पर पूरा विश्वास जताएँ और हुआ भी यही।

गुजरात में भाजपा क्लीन-स्वीप कर रही है और मोदी-शाह के गृह राज्य में हुए उपचुनाव में उसे 8 की 8 सीटें मिलती दिख रही हैं। कृषि कानूनों को लेकर कॉन्ग्रेस ने वहाँ भी जम कर गेम खेला, क्योंकि उन्हें लगता था कि पिछले चुनाव में जिस तरह का करीबी मुकाबला हुआ था और मीडिया ने दावा किया था कि मोदी-शाह को गुजरात की जनता ने ‘डराया’ है, उसे ध्यान में रखते हुए गुजरात में कृषि कानूनों का मुद्दा उठाना उनके लिए ठीक रहेगा।

सितम्बर के अंतिम हफ़्तों में गुजरात में विरोध प्रदर्शन तेज़ किया गया, ताकि किसानों को बरगलाया जा सके। भाजपा पर किसानों की आवाज़ दबाने के आरोप लगाते हुए राज्यपाल को ज्ञापन दिए गए। अहमदाबाद में विरोध प्रदर्शन किया गया। गुजरात विधानसभा ने भी कृषि बिल पारित किया था, इसीलिए राज्य सरकार को भी किसान विरोधी बता कर दुष्प्रचारित किया गया। गुजरात कॉन्ग्रेस के लिए ये कदम बैकफायर कर गया। कृषि कानूनों का विरोध मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस को ले डूबा।

कॉन्ग्रेस को अभी ऐसे कई परिणाम देखने हैं क्योंकि उसने असहिष्णुता और राफेल से लेकर सीएए और कृषि कानूनों तक जो भी मुद्दे उठाए हैं, भाजपा जनता को ये समझाने में कामयाब रही कि ये उनके लिए सही है और कॉन्ग्रेस सिर्फ मोदी का विरोध करने के लिए उनका विरोध करने लगी। जनता को बार-बार की ये अराजकता पसंद नहीं आई और उसने इन प्रयासों को पूरी तरह नकार दिया है, ऐसा अभी लगता है।

ज्ञात हो कि इन तीनों बिलों ने 5 जून 2020 को ही अधिनियम का रूप ले लिया था, लेकिन तब से लेकर संसद में लाए जाने तक किसी भी राजनीतिक दल, किसान संगठन अथवा राज्य सरकार ने कोई विरोध नहीं जताया। क्यों? क्योंकि राष्ट्रीय स्तर के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक पतन होने वाली पार्टियाँ संसद में नौटंकी कर के अस्तित्व में रहने की कोशिश करते हैं। अब किसान अपनी इच्छा के मुताबिक कहीं भी फसल बेच सकता है।

हार दिखते ही EVM का रोना शुरू: कॉन्ग्रेसी नेता के साथ-साथ बिहार की ‘केजरीवाल’ ने BJP पर साधा निशाना

बिहार चुनाव में मतगणना के दौरान आँकड़ों में हुई उलट फेर ने दोबारा से ईवीएम को ‘हैक’ करवा दिया है। एनडीए को दोपहर होते-होते सीटों में बढ़त क्या मिली, ट्विटर पर ईवीएम के ऊपर इल्जाम लगने शुरू हो गए। कॉन्ग्रेस नेता उदित राज ने तो इस ईवीएम हैक को सही बताने के लिए पूरे चुनाव को मंगल ग्रह और चांद तक से जोड़ दिया। वहीं पुष्पम प्रिया ने सीधे तौर पर भाजपा पर इसका आरोप मढ़ा।

उदित राज ने रुझानों में महागठबंधन के पिछड़ते ही लिखा, “जब मंगल ग्रह और चांद की ओर जाते उपक्रम की दिशा को धरती से नियंत्रित किया जा सकता है तो ईवीएम हैक क्यों नहीं की जा सकती? अमेरिका में अगर ईवीएम से चुनाव होता तो क्या ट्रंप हार सकते थे?”

वह ईवीएम से असंतुष्ट हो कर कहते हैं कि ईवीएम से वोटिंग खत्म होनी चाहिए चाहे कॉन्ग्रेस ही क्यों न जीत जाए। अगर धरती से मंगल और चांद की सैटेलाइट को कंट्रोल किया जा सकता है तो फिर ईवीएम क्या है उनके सामने। हरियाणा इलेक्शन में कुछ लड़के ब्लूटूथ के जरिए ईवीएम हैक करते पकड़े गए थे। वह कहते हैं कि उनका मत हर चुनाव के लिए है, सिर्फ बिहार के लिए नहीं है।

डॉ उदित राज की तरह प्लूरल्स पार्टी की पुष्पम प्रिया चौधरी ने भी रुझान बदलने पर ट्विटर पर सीधे तौर पर ईवीएम व भाजपा के ऊपर सारा इल्जाम मढ़ते हुए कहा कि प्लूरल्स पार्टी के वोट को भाजपा ने अपने हिस्से कर लिया। उनके इन ट्विट्स को देखकर लोगों ने जम कर चुटकी ली है।

नवीन शर्मा ने लिखा, “पुष्पम प्रिया को दोनों सीट से जितना वोट मिला है, उससे ज्यादा तो हमारे यहाँ वार्ड पार्षद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार को मिल जाता है। एक सीट पर- 389। दूसरी सीट पर- 243।

दिवाकर तिवारी लिखते हैं, “हमारे भी चाचा जी खड़े थे, वे चुनाव हार गए हैं। हमने तो कोई सा ब्लेम नहीं लगाया EVM को लेकर। हमारी विचारधारा में कहीं ना कहीं कमी है। ”

इसी प्रकार नेटिजन्स पहले डॉ उदित राज की हिंदी सुधारते हुए लिखते हैं कि उपक्रम नहीं होता उपग्रह होता है। एक यूजर लिखता है कि आरक्षण लागू कर दिया जाए तो ईवीएम भी हैक किया जा सकता है।

एक महिला यूजर लिखती हैं, “आप कॉन्ग्रेस द्वारा हैक हो गए, इसका मतलब यह तो नहीं है कि सब कुछ हैक हो सकता है?“

यहाँ बता दें कि दोपहर 2:30 बजे तक सभी विधानसभा चुनावों पर रुझान आ चुका है। एनडीए को इसमें 127 सीटें मिली हैं, वही महागठबंधन को 106 सीटे मिली हैं। लोजपा 3 पर है और अन्य 7 सीटों पर हैं।

पार्टी के लिहाज से देखें तो भाजपा इस समय सभी पार्टियों से सबसे आगे चल रही है। दूसरे नंबर पर राजद है। तीसरे में जदयू और फिर आखिर में कॉन्ग्रेस। कुछ देर में नतीजे साफ हो जाएँगे, तभी पता चल पाएगा कि बिहार में अगले 5 साल के लिए किस सरकार का शासन रहेगा।

इस बीच ईवीएम पर लगाए जा रहे इल्जामों पर चुनाव आयोग का बयान आया है। आयोग ने कहा है, “इस बात को कहने की जरूरत नहीं है कि अब तक वोटों की गिनती बिल्कुल गड़बड़ रहित रही है। बिहार में लगभग 1 करोड़ से अधिक मतों की गणना की गई है यानी अभी और भी कवर किया जाना शेष है।”

MP उपचुनाव: 21 सीटों पर BJP आगे, मायूस कमलनाथ ने हार स्वीकार कर कहा- कबूल है

मध्य प्रदेश में उपचुनाव के रुझानों ने पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता कमलनाथ की उम्मीदों को धराशायी कर दिया है क्योंकि भाजपा 21 सीटों पर और कॉन्ग्रेस केवल 6 सीटों पर आगे चल रही है। कॉन्ग्रेस को उपचुनावों में कम से कम 20 सीटें जीतने की उम्मीद थी, लेकिन उपचुनाव के नतीज़े कॉन्ग्रेस के पक्ष में नजर नहीं आ रहे हैं। 12 मंत्रियों सहित कुल 355 उम्मीदवारों ने 3 नवंबर को उपचुनाव लड़े।

मध्य प्रदेश में 28 सीटों पर हुए उपचुनाव में आ रहे रुझानों के बाद ये साफ हो गया है कि अब कॉन्ग्रेस के लिए उम्मीदें समाप्त हैं। 21 सीटों पर बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है और मांधाता में पहला नतीजा भी बीजेपी के खाते में गया है। दोपहर होते-होते भाजपा को जो बढ़त मिलती देखी जा रही है, उनका नतीजों में तब्दील होना लगभग तय माना जा रहा है।

इस तस्वीर के बाद पूर्व सीएम कमलनाथ ने कहा है कि उन्हें जनादेश स्वीकार्य है। कमलनाथ ने कहा कि लोकतंत्र में जनता का फैसला हमेशा स्वीकार होता है। हालाँकि उनके चेहरे पर मायूसी साफ देखी जा सकती थी। उन्होंने मतदाताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि वो इस फैसले का सम्मान करते हैं।

वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट करके कहा कि राज्य की जनता ने एक बार फिर विकास और जनकल्याण के लिए संकल्पित बीजेपी को मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपने का निर्णय ले लिया है। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

मालवा-निमाड़ अंचल में कोरोनाकाल में 3 नवंबर को हुए विधानसभा उपचुनाव की मतगणना मंगलवार (नवंबर 10, 2020) सुबह 8 बजे से जारी है। भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों के लिए ही ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं। मांधाता से भाजपा प्रत्याशी नारायण पटेल 21,999 मतों से विजयी हुई। 22 वें राउंड की गणना में नारायण पटेल को 80004 तथा कॉन्ग्रेस के उत्तम पाल सिंह को 58013 और मिले हैं। अभी डाक मतपत्रों की गिनती के परिणाम आना बाकी है।

साँवेर विधानसभा सीट के साथ ही आगर, बदनावर, हाटपीपल्‍या, सुवासरा, मांधाता और नेपानगर सीट के लिए वोटों की गिनती हो रही है। आगर मालवा से कॉन्ग्रेस हाटपीपलिया, नेपानगर, बदनावर व सुवासरा में भाजपा प्रत्याशी आगे चल रहे हैं।

मांधाता उप चुनाव में भाजपा ने परचम लहरा दिया है। इसके साथ ही, भाजपा को घेरने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा बनाई गई रणनीति मैदान में दम तोड़ गई। कॉन्ग्रेस द्वारा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त और प्रजातंत्र की हत्या जैसे आरोप लगाकर कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया गया था। इससे कॉन्ग्रेस को चुनाव में मतदाताओं का पूरा समर्थन मिलने की उम्मीद थी, लेकिन चुनाव में बिकाऊ-बिकाऊ का मुद्दा धराशायी होने के साथ ही कॉन्ग्रेस प्रत्याशी उत्तमपाल सिंह के हाथों से मांधाता का ताज फिसल गया।

चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश के उपचुनाव के 28 में से 28 सीटों के रुझान जारी कर दिए हैं। बिहार चुनाव के रुझानों के बीच ईवीएम पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसे में डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर सुदीप जैन ने कहा, “वक्त वक्त पर ये साफ किया जाता रहा है कि ईवीएम मज़बूत है और टैम्पर प्रूफ है। सुप्रीम कोर्ट ने एक से ज्यादा बार ईवीएम की प्रमाणिकता को बरकरार रखा। चुनाव आयोग ने भी साल 2017 में ईवीएम चैलेंज का ऑफर दिया था। ईवीएम की प्रमाणिकता बिना किसी संदेह के है और आगे कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाएगा।”

मंगलसूत्र = कुत्ते की चेन: धार्मिक भावनाएँ आहत करने के लिए गोवा की प्रोफेसर पर FIR

हिंदू धर्म में मंगलसूत्र को सुहाग की निशानी माना जाता है, लेकिन गोवा के लॉ कॉलेज की एक सहायक प्रोफेसर की नजर में मंगलसूत्र ‘कुत्ते के गले बँधी चेन’ के समान है। प्रोफसेर ने अपनी फेसबुक पोस्ट में इसका जिक्र भी किया है। इसको लेकर गोवा में विवाद खड़ा हो गया।

अब राष्ट्रीय हिंदू युवा वाहिनी की शिकायत पर पुलिस ने प्रोफेसर के खिलाफ धार्मिक भावनाएँ भड़काने का मामला दर्ज किया है। ये FIR राष्ट्रीय हिंदू युवा वाहिनी के गोवा यूनिट के राजीव झा ने दर्ज करवाई है।

पणजी पुलिस ने बताया कि वीएम सलगांवकर कॉलेज ऑफ लॉ में राजनीति विज्ञान की सहायक प्रोफेसर शिल्पा सिंह ने अप्रैल में अपनी फेसबुक पोस्ट में पितृसत्ता को चुनौती देने के लिए हिंदू परंपराओं की आलोचना की थी। इस दौरान उन्होंने हिंदू धर्म में महिलाओं के पवित्र मंगलसूत्र की तुलना कुत्ते के गले में बाँधी जाने वाली चेन से की थी।

इस मामले में पहले तो कॉलेज की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) शाखा ने विरोध प्रदर्शन किया और कॉलेज प्रशासन को शिकायत देकर प्रोफेसर सिंह को बर्खास्त करने की माँग की।

ABVP ने प्रोफेसर पर विशेष धर्म के बारे में सामाजिक रूप से घृणास्पद विचारों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया था। इसके बाद हिंदू युवा वाहिनी इकाई ने भी इसका विरोध शुरू कर दिया और इकाई के राजीव झा ने प्राफेसर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दे दी।

मामले में प्रोफेसर शिल्पा सिंह ने भी राजीव झा के खिलाफ 30 अक्टूबर से उनके लिए अपमानजनक टिप्पणी करने और डराने-धमकाने की शिकायत दे दी। उन्होंने आरोप लगाया कि झा ने उनकी पोस्ट को लेकर उनके खिलाफ कई अभद्र टिप्पणियाँ की और उन्हें माफी नहीं माँगने पर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

उत्तरी गोवा के पुलिस अधीक्षक (SP) उत्कर्ष प्रसून ने बताया कि झा और सिंह की शिकायतों के आधार पर मामले दर्ज किए गए हैं। झा की शिकायत पर प्रोफेसर सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295a (जानबूझकर धार्मिक भावनाएँ भड़काने) का मामला दर्ज किया है। इसी तरह सिंह की शिकायत पर पोंडा निवासी राजीव झा के खिलाफ IPC की धारा 504 (जानबूझकर अपमान करना), 506 और 509 के तहत मामला दर्ज किया है।

हालाँकि, अपनी फेसबुक पोस्ट पर बवाल मचने के बाद प्रोफेसर शिल्पा सिंह ने माफी भी माँगी है। उन्होंने लिखा, “मेरी बातों को गलत तरीके से लिया गया, मैं उन सभी महिलाओं से खेद प्रकट करती हूँ जिन्हें मेरी पोस्ट से दुख हुआ। मैं हमेशा सोचती थी कि शादी के बाद मैरिटल स्टेटस का सिम्बल सिर्फ महिलाओं के लिए क्यों जरूरी है, पुरुषों के लिए क्यों नहीं। ये देखकर निराश हूँ कि मेरे बारे में गलत विचार फैलाए गए। मैं अधार्मिक और नास्तिक नहीं हूँ।”

‘मेरे पिता ने तालिबानियों को दिया था ID कार्ड’: जॉब छुड़ाने के लिए अफगान महिला की आँख में घोपा गया चाकू, चली गोलियाँ

अफगानिस्तान के काबुल में तालिबानियों ने एक मुस्लिम महिला की आँख में चाकू मारकर उन्हें हमेशा के लिए अंधा बना दिया। उनकी गलती बस ये थी कि वो घर से निकल कर जॉब करने जाती थीं। तालिबानियों को उनकी यही आत्मनिर्भरता नागवार गुजरी और एक दिन उनके दफ्तर से घर लौटते हुए उनपर हमला बोल दिया।

पूरी घटना अफगानिस्तान के गजनी प्रांत की है। खटेरा नाम की 33 वर्षीय महिला ने कुछ समय पहले क्राइम ब्रांच में एक अधिकारी के तौर पर काम करना शुरू किया था। एक दिन पुलिस थाने से काम पूरा करके वह घर लौट रही थीं तभी तालिबानियों ने उन्हें पकड़ा और उनपर गोली चला दी। इसके बाद उनकी आँख में चाकू घोपे गए।

जब महिला को होश आया तो वह अस्पताल में थीं। उन्होंने होश आने पर डॉक्टरों से पूछा कि आखिर वह देख क्यों नहीं पा रहीं? इस पर डॉक्टर्स का जवाब था कि आँख में चोट लगने के कारण बैंडेज लगी हुई है इसलिए वह देखने में असमर्थ हैं। हालाँकि, खटेरा को एहसास हो चुका था कि उनकी आँखें निकाल ली गई हैं।

उन्होंने अपने साथ हुई इस बर्बरता के लिए तालिबानियों को जिम्मेदार ठहराया। मगर तालिबानी इसमें अपनी संलिप्ता को खारिज करते रहे और इन सबके लिए महिला के पिता को आरोपित बताया। उन्होंने कहा कि महिला के पिता के कहने पर उस पर हमला हुआ क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि खटेरा बाहर काम करे।

अब यह हमला चाहे किसी के कारण भी हुआ है मगर इसने खटेरा की न केवल जिंदगी खराब की है बल्कि उसके सपनों को भी तोड़ दिया है। इस हमले के कारण सिर्फ़ उनकी आँखे नहीं गईं बल्कि उन्होंने जो आत्मनिर्भर होने के सपने देखे थे वह भी चकनाचूर हो गए। घटना से कुछ दिन पहले ही उन्होंने अपने सपने को साकार करने के लिए क्राइम ब्रांच में काम करना शुरू किया था। लेकिन वह वहाँ एक साल भी अपनी सेवा नहीं दे पाईं।

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, वह कहती हैं, “काश मैं पुलिस में कम से कम एक साल काम कर पाती। अगर ऐसा होता तो ये सब मुझे कम दुख देता। ये सब बहुत जल्दी हुआ। मुझे सिर्फ़ काम मिला था और सपने साकार करते हुए सिर्फ़ 3 महीने हुए थे।”

इस हमले पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी अपना विरोध प्रकट किया। उन्होंने तालिबानियों के ख़िलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया। उनका मानना है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा सेना वापस बुलाए जाने के बाद से अफगानिस्तान के रूढिवादी और तालिबानी फायदा उठा रहे हैं।

खटेरा का बचपन से सपना था कि वह घर से निकल कर दफ्तर जाएँ और काम करें। लेकिन उसके पिता हमेशा से इसका इंकार करते थे। शादी के बाद उसने अपने शौहर का समर्थन पाया मगर पिता तब भी उसके घर से बाहर निकलने का विरोध करते रहे।

वह बताती हैं, “कई बार जब मैं ड्यूटी पर जाती थी तो मेरे पिता मेरा पीछा करते थे। उन्होंने आसपास के इलाके में तालिबान से संपर्क रखना शुरू कर दिया था और उनसे कहने लगे थे कि वह मुझे मेरी जॉब करने से रोकें।”

खटेरा के मुताबिक उनके पिता ने ही तालिबानियों को उनकी आईडी कार्ड की कॉपी दी थी ताकि यह साबित कर सकें कि वो पुलिस में काम करती हैं। जिस दिन हमला हुआ उस दिन भी महिला के पिता उसे लगातार कॉल कर रहे थे और उससे उसकी लोकेशन पता कर रहे थे।

गजनी पुलिस ने भी यह माना है कि इस हमले के पीछे तालिबानियों का ही हाथ था। उन्होंने खटेरा के पिता को कस्टडी में भी लिया। वहीं तालिबान प्रवक्ता ने कहा कि उनके समूह को पूरे मामले का पता था लेकिन उनका इसमें कोई हाथ नहीं है क्योंकि यह पारिवारिक मामला था।

खटेरा अब अपने परिवार के साथ काबुल में छिपी हुई हैं। वह पहले से बेहतर हैं लेकिन करियर खत्म होने का दुख उनसे बर्दाश्त नहीं हो पाता। अपने पिता की गिरफ्तारी के कारण उन्हें अपनी माँ की उलाहनाओं को झेलना पड़ रहा है जिसके कारण उन्हें रातों में नींद तक नहीं आती। उन्हें बस यही उम्मीद है कि डॉक्टर किसी तरह उन्हें उनकी दृष्टि लौटा दें।

वह कहती हैं, “अगर ऐसा मुमकिन हुआ और मुझे दोबारा दिखने लगा तो मैं अपनी जॉब दोबारा शुरू करूँगी।” वह आय की आवश्यकता पर बात जरूर करती हैं, लेकिन साथ में यह भी कहती हैं कि घर के बाहर जाकर नौकरी उनका जुनून है।