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‘मैं J&K पुलिस और सेना का शुक्रगुजार हूँ, उन्होंने मुझे जिंदगी जीने का एक और मौका दिया’: सरेंडर के बाद बोला आतंकी, देखें Video

जम्मू कश्मीर के पंपोर में एक आतंकी के सरेंडर की वीडियो सामने आई है। वीडियो में देख सकते हैं कि आतंकी अपने पास से सारी चीजें जमीन पर फेंक कर सुरक्षाबल की ओर आगे बढ़ा चला आ रहा है। वीडियो को लेकर दावा किया जा रहा है कि दक्षिणी कश्मीर में सुरक्षाबलों के ऑपरेशन के दौरान आतंकी ने यह सरेंडर किया। इससे पहले उसके एक साथी को भारतीय सुरक्षाबल ढेर कर चुकी थी। पुलिस का कहना है कि घाटी में अब तक 9 आतंकी सरेंडर कर चुके हैं।

सरेंडर के वीडियो में हम देख सकते हैं कि सुरक्षाकर्मी बड़े आराम से आतंकी को आश्वस्त करके अपने पास बुला रहे हैं। वह उसके पास जाकर उससे पिस्टल आदि बरामद करते हैं और फिर उसे आगे लेकर आते हैं।

आतंकी वीडियो में अपना नाम खाबिर सुल्तान मीर बताते हुए कहता है, “मैने आतकी संगठन सितंबर में ज्वाइन किया था। अभी मैं शुक्रगुजार हूँ जम्मू-कश्मीर पुलिस का और यहाँ की आर्मी का क्योंकि उन्होंने मुझे मौका दिया अपनी लाइफ जीने के लिए। फिर से जीने के लिए। ये लोग मुझे जिंदा लेकर आए और मुझे कोई टॉर्चर नहीं किया। मुझे अच्छे से अपने भाई की तरह ही लेकर आए। जो हथियार मेरे पास थे। वो सभी मैंने वहीं पर रख दिए हैं।”

आतंकी खाबिर सुल्तान को वीडियो के आखिर में कहते सुना जा सकता है, “मैं सब भाइयों से अपील करता हूँ कि ये खून खराबा फरेब है, झूठ है, बहकावा है, इसमें कुछ भी नहीं है।” 

उल्लेखनीय है कि इस वीडियो को देखने के बाद कई नेटिजन्स की भिन्न भिन्न प्रकार की प्रतिक्रिया आई है। लोगों का कहना है कि ऐसे लोगों के लिए भारतीय सुरक्षाबल कितनी भी आत्मीयता दिखा लें लेकिन यह लोग कभी नहीं बदलते। हालाँकि, कुछ का कहना यह भी है कि ऐसा करके सुरक्षाबल ने उस आतंकी को सही रास्ते पर लाने का काम किया है।

बता दें कि जम्मू कश्मीर में पिछले साल से आतंकियों के सफाए का काम सुरक्षाबल ने तेज कर दिया है। ऐसे में गुरुवार को उन्हें पुलवामा के मीज पंपोर में दो आतंकियों के छिपे होने की बात पता चली। इसके बाद फौरन स्थानीय पुलिस व सीआपीएफ के जवानों ने इन्हें पकड़ने के लिए ऑपरेशन शुरू किया। इस ऑपरेशन में एक आतंकी को मौके पर ढेर कर दिया गया। वहीं दूसरे ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस एनकाउंटर में सेना का एक जवान और दो अन्य नागरिक घायल हुएए हैं।

याद दिला दें अभी कुछ दिनों पहले ऐसे ही एक आतंकी के सरेंडर करते हुए वीडियो बडगाम से सामने आई थी। वीडियो में सुरक्षाबल के लहजे ने सभी के दिलों को जीत लिया था। वहीं सरेंडर के बाद आतंकी भी सहज होकर सुरक्षाकर्मियों को सभी बात बताते नजर आया था।

CM केजरीवाल ने दीवाली से पहले पटाखों के इस्तेमाल व बिक्री पर लगाया बैन: उल्लंघन पर ₹1 लाख तक का जुर्माना

दिल्ली में दीवाली से पहले केजरीवाल सरकार ने पटाखों को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। दिल्ली सरकार में पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने शुक्रवार (नवंबर 6, 2020) को इसकी जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि पटाखे जलाने और पटाखे बेचने वालों पर ₹1 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री का यह बयान दिल्ली सीएम की उस घोषणा के एक दिन बाद आया है जिसमें सीएम केजरीवाल ने ग्रीन क्रैकर समेत किसी भी प्रकार के पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया था। 

इसी घोषणा के बाद गोपाल राय ने कहा कि पटाखे बेचने या फोड़ने वाले लोगों पर वायु प्रदूषण (नियंत्रण) अधिनियम (1981) के तहत 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। गोपाल राय ने बताया कि आरोपित के खिलाफ एयर एक्ट के तहत केस बनाया जाएगा, जिसमें 1 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। 

आगे उन्होंने सोमवार (नवंबर 9, 2020) को होने वाली एक बैठक के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वह पर्यावरण विभाग, दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) और दिल्ली पुलिस के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा करेंगे ताकि प्रतिबंध को लागू करने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना तैयार की जा सके।

उनका कहना है कि वैसे तो दिल्ली में प्रदूषण के स्रोत साल भर लगातार बने रहते हैं लेकिन दीवाली में पटाखे फोड़ने और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने से दिल्ली का प्रदूषण बढ़ जाता है। आगे उन्होंने कोरोना के बढ़ते मामलों का भी हवाला दिया और कहा कि लोगों की जान बचाने के लिए यह कदम जरूरी है।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल ने गुरुवार को पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर घोषणा की थी कि दिल्ली में 7 नवंबर से 30 नवंबर तक पटाखे आदि बैन रहेंगे। इसके बाद कई लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी। पटाखा कारोबारियों ने भी इस पर अपना गुस्सा जाहिर किया।

एएनआई समाचार एजेंसी के अनुसार, दिल्ली के एक पटाखा विक्रेता ने इस प्रतिबंध पर कहा, “दिल्ली सरकार को पटाखों पर बैन लगाना ही था तो पहले बता देती और हमें लाइसेंस जारी न करती। हम कोई और काम कर लेते। हमने जो माल उठा रखा है जो बुकिंग कर रखी है वो तो वेस्ट हो गई। हमें कम से कम 15 लाख का नुकसान हो रहा है।”

वहीं भाजपा के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष ने भी केजरीवाल सरकार के इस फैसले पर बयान दिया है। उन्होंने कहा, “दिल्ली में प्रदूषण की समस्या को लेकर केजरीवाल जी अगर आप कुछ ठोस कदम उठाते तो आज ये पटाखे बैन करने की नौबत नहीं आती। ग्रीन पटाखों को बैन कर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाकर मुख्यमंत्री जी आपने गलत किया है और धार्मिक भावनाओं को आहत करने का काम किया है।”

2017 से अब तक 279 लोग शिरडी से लापता: बॉम्बे HC ने मानव तस्करी की आशंका में महाराष्ट्र पुलिस से माँगा जवाब

बॉम्बे हाईकोर्ट (Bombay High Court) ने महाराष्ट्र के शिरडी शहर से पिछले कुछ सालों से गायब हो रहे लोगों के बढ़ते मामलों को देखते हुए महाराष्ट्र पुलिस को मामले में संज्ञान लेने का निर्देश दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, बॉम्बे हाईकोर्ट ने महसूस किया कि लापता हो रहे लोगों का पता लगाने में महाराष्ट्र पुलिस का प्रयास काफी असंतोषजनक रहा है। कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस महानिदेशक (DGP) से इस मुद्दे पर गौर करने और सख्त कदम उठाने के लिए कहा है। उच्च न्यायालय ने डीजीपी से, गुमशुदगी के पीछे (मानव) तस्करी या अंग तस्करी रैकेट की संभावना की जाँच करने और इस पर से पर्दा हटाने का आदेश भी दिया है

शिरडी पुलिस द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट को सौंपे गए आँकड़ों के अनुसार 2017 से 27 अक्टूबर, 2020 के बीच अहमदनगर के शिरडी से लगभग 279 लोगों के लापता होने की सूचना है। इनमें से 67 लापता लोगों को अभी तक ट्रेस नहीं किया जा सका हैं।

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने पाया कि 2017 में शिरडी से 20 लोग लापता हो गए थे, जिनका अभी पता नहीं चल पाया है। वहीं इस साल मार्च में हुए लॉकडाउन से पहले 20 अन्य लोगों के लापता होने की सूचना है।

बता दें इंदौर निवासी मनोज सोनी द्वारा कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। मनोज 10 अगस्त, 2017 को अपने परिवार के साथ साईंबाबा मंदिर में दर्शन करने के लिए शिरडी आए थे। उनकी 35 वर्षीय पत्नी दीप्ति एक शाम मंदिर में दर्शन करने के बाद गायब हो गई थी, जिनका अभी तक पता नहीं लग पाया है।

न्यायमूर्ति रवींद्र वी. घुघे और न्यायमूर्ति बीयू देबदवार की खंडपीठ ने 26 अक्टूबर को अहमदनगर के एसपी को दीप्ति मामले में पुलिस द्वारा किए गए प्रयासों को लेकर अदालत को एक रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा था।

इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा मानव तस्करी करने वाले गिरोहों की संलिप्तता पर संदेह किया जा रहा है।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत आँकड़ों में कहा गया है कि 2017 में शिरडी से लापता 71 लोगों की रिपोर्ट दर्ज की गई थी। जिनमें से 51 लोग वापस मिल गए थे जबकि दीप्ति सहित 20 लोग अभी भी लापता हैं। वहीं 2018 में गुम हुए 82 व्यक्तियों में से 13 का पता अभी तक नहीं चल पाया है और 2019 में लापता हुए 88 में से 14 के लापता होने की सूचना है। इस साल 2020 में 38 लोग लापता हुए, जिनमें केवल 18 लोगों का ही पता चला है।

मानव-तस्करी के मद्देनजर अदालत को जवाब देते हुए अभियोजक ने अदालत से कहा कि, शिरडी पुलिस को अभी तक किसी भी मानव तस्करी या अंग तस्करी समूह का लिंक इस मामले में नहीं मिला है। जिसके लिए लोगों का अपहरण या उन्हें गायब किया जा रहा है।

न्यायाधीशों ने कहा कि 26 अक्टूबर को अदालत के आदेश के बाद पुलिस को गहरी नींद से उठाया गया। कोर्ट ने कहा कि इंसान झूठ बोल सकता है लेकिन दस्तावेज झूठ नहीं बोलेंगे। 22 नवंबर, 2019 को कोर्ट के आदेश के अनुसार, शिरडी पुलिस द्वारा जाँच के लिए गठित विशेष यूनिट का इस मामले में किया गया प्रयास संतोषजनक नहीं है।

अदालत ने आगे कहा, “हम आश्वस्त हैं कि शिरडी पुलिस स्टेशन ने शायद ही कोई प्रयास किया हो। और यह इस तरफ इशारा किया कि अहमदनगर पुलिस विभाग के प्रमुख भी अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहे हैं।”

बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच ने यह भी कहा कि वह 24 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में डीजीपी के जवाब का इंतजार करेगी।

उमर खालिद और शरजील इमाम पर चलेगा UAPA के तहत मुकदमा: गृह मंत्रालय ने दिया ग्रीन सिग्नल

उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों और हिंसा को लेकर गृह मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। ऐलान के मुताबिक़ जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरलीज इमाम पर गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमा चलाने को हरी झंडी दिखा दी गई है। यानी उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी। 

कुछ महीनों पहले ही उमर खालिद पर फरवरी के दौरान राजधानी दिल्ली के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में दंगों का षड्यंत्र रचने, भड़काऊ भाषण देने और हिंसा भड़काने का आरोप लगाया गया था। इन आरोपों की जाँच होने के बाद उमर खालिद को यूएपीए अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। 

क़ानूनी प्रक्रिया को मद्देनज़र रखते हुए किसी भी व्यक्ति पर यूएपीए के तहत मामला चलाने के लिए गृह मंत्रालय की स्वीकृति अनिवार्य होती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गृह मंत्रालय ने लगभग एक हफ्ते पहले इस पर स्वीकृति जारी की थी। बहुत जल्द दिल्ली पुलिस उमर खालिद और शरजील इमाम के विरुद्ध अदालत में चार्जशीट दायर करने जा रही है। 

इसके अलावा कड़कड़डूमा अदालत ने उमर खालिद की न्यायिक हिरासत 20 नवंबर तक के लिए बढ़ा दी है। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में उमर खालिद की न्यायिक हिरासत 30 दिन तक बढ़ाने के लिए अर्जी लगाई थी। उमर खालिद के अधिवक्ता ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वह पुलिस को जाँच के दौरान पूरा सहयोग प्रदान कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में दिल्ली पुलिस की तरफ से इस तरह का आरोप लगाना कि उमर पुलिस की जाँच प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रहा है, यह आरोप निराधार है। उमर की न्यायिक हिरासत बढ़ाने के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा लगाई गई अर्जी सरासर गलत है। 

वहीं दिल्ली पुलिस ने भी इस पूरे प्रकरण पर अपना पक्ष रखा था। दिल्ली पुलिस का कड़कड़डूमा अदालत के समक्ष कहना था कि मामले की जाँच हो रही है इस बात को मद्देनज़र रखते हुए उमर खालिद को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत ने उमर खालिद की न्यायिक हिरासत 20 नवंबर तक के लिए बढ़ा दी है। फ़िलहाल उमर खालिद न्यायिक हिरासत में ही है और पुलिस इस मामले से जुड़े अहम पहलुओं की जाँच कर रही है। 

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने रविवार (13 सितंबर 2020) को गिरफ्तार किया था। फरवरी में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोध के दौरान दिल्ली के कई इलाकों में दंगे हुए थे और उमर खालिद पर उन दंगों का षड्यंत्र रचने का आरोप है। दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने उमर खालिद पर गैर क़ानूनी गतिविधि (नियंत्रण) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया था। 

वहीं शरजील इमाम ने पिछले साल सीएए विरोधी प्रोटेस्ट के दौरान भड़काऊ बयान देकर असम को भारत से अलग करने की बात की थी। मामला तूल पकड़ने के बाद शरजील ने कई दिनों तक पुलिस से बचने का प्रयास किया। मगर बाद में उसकी गिरफ्तारी बिहार के जहानाबाद से हुई थी। पूछताछ में पता चला था कि शरजील भारत को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता था। अपने इस काम के लिए उसने मस्जिदों में भड़काऊ पर्चे बँटवाए थे।

अपने घृणित विवादित बयान शरजील इमाम ने कहा था, “हमारे पास संगठित लोग हों तो हम असम से हिंदुस्तान को हमेशा के लिए अलग कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो एक-दो महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से कट कर ही सकते हैं। रेलवे ट्रैक पर इतना मलबा डालो कि उनको एक महीना हटाने में लगेगा… जाना हो तो जाएँ एयरफोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।”

जिस अमान हयात खान को विनय गुप्ता ने दी मार्ट में नौकरी, उसी ने साजिश रच कर पत्नी सहित उतारा मौत के घाट

दिल्ली एनसीआर ग्रेटर नोएडा में मंगलवार (नवंबर 3, 2020) की देर रात एक विनय गुप्ता नाम के कारोबारी और उनकी पत्नी नेहा की हत्या को बेहद सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया। आरोपित की पहचान अमान हयात खान बताई जा रही है। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज में रात के 12:15 बजे उसे फ्लैट तक आते और वारदात के बाद हाथ में विनय की दुकान/मार्ट का थैला लेकर जाते देखा। 

पुलिस का कहना है कि उन्होंने अपनी जाँच में मार्ट के कई कर्मचारियों से बात की। उन्होंने बताया कि दुकान में कपड़े, गहने आदि के अलग-अलग स्टॉल काउंटर हैं। इनमें कपड़े का स्टॉल विनय के भांजे सौरभ मित्तल का है। वह गाजियाबाद रामप्रस्थ का निवासी है। कर्मचारियों की मानें तो सौरभ के स्टॉल पर कुछ समय तक कमल नाम का लड़का काम करता था। लेकिन कुछ समय पहले उसके काम छोड़ने के कारण वहाँ हयात को बैठाया गया।

पुलिस को जाँच में पता चला है कि आरोपित सभी को अपना नाम अमन बताता था लेकिन उसके हाथ में हयात गुदा हुआ था। सभी पहलुओं को जोड़ते हुए आशंका जताई जा रही है कि अमन का पूरा नाम अमान हयात खान था और स्पेलिंग एक जैसी होने की वजह से वह अमान नाम को ही अमन की तरह इस्तेमाल करने लगा था। 

इसी अमान ने पैसों के लालच में मार्ट के मालिक विनय गुप्ता को मारने का प्लान बनाया और घटना को अंजाम देने से कुछ दिन पहले ही छुट्टी लेकर अपना मोबाइल फोन बंद कर दिया। इसके बाद ग्रेनो वेस्ट की हाई सेक्योरिटी से लैस टेकजोन-5 चेरी काउंटी सोसायटी निवासी विनय के आवास पहुँचा और मौका पाते ही उन पर ताबड़तोड़ वार किए। वारदात को अंजाम देने में उसके जूते भी खून से बुरी तरह सन गए थे। इसलिए वह फ्लैट में अपने जूते उतार कर और विनय के जूते पहन कर फरार हुआ। उसकी तलाश में पुलिस की कई टीमें दबिश दे रही हैं।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि घटनास्थल पर पहुँचने पर उन्हें नेहा का शव रसोई के पास पड़ा मिला और वहीं करीब में पराठा रखा था। इसे देखकर अंदाजा लगाया गया कि शायद करवाचौथ से एक दिन पहले नेहा रात का भोजन करने जा रही थीं, तभी आरोपित ने उन पर हमला किया। नेहा के शव से ही 20 कदम दूर विनय का शव पड़ा था और कमरे में टीवी चला हुआ था।

पुलिस को अभी तक की जाँच में अमान हयात खान द्वारा की जा रही धोखाधड़ी की बात भी पता चली है। अन्य कर्मचारियों ने बयान में बताया कि अमान अपने स्टॉल से कपड़े बिक्री के रुपयों में धोखाधड़ी करता था। उसने कुछ दिन से बीमारी का बहाना बनाकर छुट्टी ली हुई थी। जब हत्या के मामले का खुलासा हुआ तभी इस हेरफेर का भी पता चला।

यहाँ बता दें कि अभी दो महीने पहले इसी सोसायटी के अंदर ऐसी ही वारदात को अंजाम दिया गया था। इसके कारण पुलिस सोसायटी में तैनात सुरक्षाकर्मियों से भी गहनता से पूछताछ कर रही है। सीसीटीवी खराब पाए जाने पर सुरक्षा एजेंसी का लाइसेंस भी रद्द करने की अपील डीजीपी को रिपोर्ट भेज कर की गई है।

इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत पटेल उमरांव ने ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा, “ग्रेटर नोयडा में विनय गुप्ता नें अपनी दुकान में अमान हयात खान को नौकरी दी थी। हयात नें पैसों के लालच में विनय के फ्लैट में घुसकर 12 से अधिक वार करके विनय व उनकी पत्नी की बेरहमी से हत्या कर दी। अगर जीवन सुरक्षित चाहते हैं तो ऐसे लोगों को नौकरी देने या घर में प्रवेश देने से बचें।”

अर्णब की गिरफ्तारी में इंदिरा के निरंकुश शासन की झलक है, प्रेस की आजादी बचाने के लिए विरोध जरूरी

देश के ख्याति प्राप्त पत्रकारों में शीर्ष में शुमार रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी ने एक बार फिर देश को आपातकाल की याद दिला दी है। निर्भीक पत्रकारिता के अग्रणी नामों में शामिल अर्णब की आवाज को दबाने के लिए स्टेट मशीनरी का जैसा इस्तेमाल महाराष्ट्र में हो रहा है, ठीक वैसा ही इंदिरा के शासन में भी देखने को मिला था।

ये संकेत किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक हैं। प्रेस को किसी भी लोकतांत्रिक देश में समाज का आइना माना जाता है। प्रेस के माध्यम से लोग देश दुनिया में घटित गतिविधियों से अवगत हो, अपना ज्ञान बढ़ाते तथा साथ ही साथ जागरूक भी होते हैं।

लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक बुनियादी जरूरत है, जो एक दबाव समूह के रूप में कार्य करते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के साथ मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। प्रेस की आजादी का मतलब है कि किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक तौर अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार हो।

अभिव्यक्ति की आजादी ने स्वतंत्रता आंदोलन को भी दी थी धार

बात जब भारत जैसे लोकतांत्रिक देश की हो रही हो तो प्रेस की स्वतंत्रता की अपनी महती भूमिका है। आजादी के समय से ही भारत में प्रेस की अहम भूमिका रही है। आजादी के आंदोलन में प्रेस ने बिना डरे, बिना रुके, बिना थके अपनी जिम्मेदारी का पूर्ण निर्वहन किया।

महात्मा गाँधी से लेकर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, डॉ राजेंद्र प्रसाद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, पंडित मदन मोहन मालवीय और डॉ राम मनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों ने अपनी लेखनी के जरिए भारतवासियों में आजादी के आंदोलन का जज्बा जगाया था।

भारत में जनमत जागृत करने का कार्य नागरिक समाज के महत्वपूर्ण अंग के रूप में ‘मीडिया’ ही करती है। साथ ही साथ, राजनीतिक दलों और नेताओं को कई बार राह दिखाने का काम भी बहुधा मीडिया ही करती है। वह अलग बात है कि कभी-कभी सत्ता की नाराजगी का दंश भी इन्हें ही झेलना पड़ता है।

1975 में जनता के हक की लड़ाई लड़ने वाले विपक्ष का समर्थन करने पर आपातकाल के नाम पर मीडिया का गला घोट दिया गया था। भारतीय प्रेस को सेंसरशिप का सामना करना पड़ा था। अनेक अखबारों पर सरकारी छापे पड़ने के साथ-साथ विज्ञापन तक रोके गए। बहुत से पत्रकारों को जेलों में भी डाला गया। इसके बावजूद भी भारत का मीडिया वर्ग घबराया नहीं, बल्कि इस अघोषित संकट का डटकर मुकाबला किया। यह प्रेस की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने का ही फल था कि एक सरकार का लोकतांत्रिक तरीके से तख्ता पलट हुआ।

आज फिर से 1975 के आपातकाल की याद आ रही है जब महाराष्ट्र में भारत के एक चर्चित एवं वरिष्ठ पत्रकार अर्णब गोस्वामी के साथ महाराष्ट्र सरकार और वहाँ की पुलिस द्वारा जिस तरह दुव्यर्वहार किया गया है, यह बेहद निंदनीय है। यह ठीक उसी तरीके से है जब 1975 में आपातकाल लगाकर लोकतंत्र की हत्या की गई थी। उस समय भी लेखनी और आवाज को दबाने का भरपूर प्रयास किया गया था। ये और बात है कि वह प्रयास असफल रहा।

अर्णब गोस्वामी की जिस तरह से गिरफ्तारी हुई, वह पूरी तरह से अलोकतांत्रिक व अमानवीय है। प्रेस की आजादी पर यह हमला किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। भारतीय संविधान और लोकतंत्र ने मीडिया को स्वतंत्रता दी है। इसलिए पत्रकारों को स्वतंत्रता और सुरक्षा मिलनी ही चाहिए। अर्णब गोस्वामी का जिस तरह से गिरफ्तारी हुई, यह महाराष्ट्र सरकार का कौन सा लोकतांत्रिक तरीका था?

इस मामले को लेकर देश-विदेश से बहुत लोगों ने विभिन्न माध्यमों से अपनी-अपनी नाराजगी प्रकट की और अमानवीय घटना का विरोध किया। इसी क्रम में राज्य सभा सांसद और बीजेपी के शीर्ष नेता डॉ विनय सहस्रबुद्धे जी ने इस समूचे घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए बिलकुल ठीक कहा कि यह घटना बदले की भावना से प्रेरित है। उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की इस अमानवीय घटना पर प्रश्न करते हुए कहा कि क्या लोकतंत्र में लोगों को समाज में अपनी बात रखने का अधिकार नहीं है? अगर किसी ने आलोचना की तो आप उस पर अटैक करेंगे, यह बहुत ही दु:खद बात है। उन्होंने बल देकर कहा कि इस घटना पर पत्रकार बुद्धिजीवियों को बोलना चाहिए।

महाराष्ट्र सरकार एवं पुलिस की यह कार्रवाई केवल एक पत्रकार के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह समूचे मीडिया वर्ग की आजादी के साथ-साथ अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है। सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना कोई जुर्म तो नहीं है। यह तो स्वस्थ लोकतंत्र के चिह्नित लक्षण हैं। और अगर कोई सरकार से प्रश्न करते वक्त उचित मर्यादा का पालन नहीं करता है तो उसका भी जवाब देने का एक तरीका होता है, जो मर्यादा के भीतर होनी चाहिए। वरना भविष्य में अगर चीन और पाकिस्तान के साथ हमारी तुलना होने लगेगी, तो कोई बड़ी बात नहीं होगी।

आज एक गलत उदाहरण स्थापित होता नजर आ रहा है। इसलिए आज हमें सचेत होने की जरूरत है। अभिव्यक्ति की आजादी के साथ साथ प्रेस की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने, लोकतांत्रिक परंपरा को मजबूत बनाए रखने और भविष्य में ऐसा किसी भी पत्रकार के साथ ना हो, इसलिए महाराष्ट्र सरकार की इस अमानवीय कार्रवाई का पुरजोर विरोध होना चाहिए।

यूपी की जेल से छूटते ही सपा नेता नदीम फारुखी हुए बेलगाम, कहा- ‘पुलिस को अपने जूते की नोक पर रखता हूँ’

समाजवादी पार्टी के एक नेता ने जेल से छूटने के बाद ही विवादित बयान दे दिया। फ़िलहाल उनका बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा की वजह बना हुआ है। सपा नेता नदीम अहमद फारुखी ने अपने बयान में कहा है कि वह पुलिस को हमेशा अपने जूते की नोक पर रखते हैं। सपा नेता इतने पर ही नहीं रुके, इसके बाद उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है जो मुख्यमंत्री (योगी आदित्यनाथ) ने उन्हें गिरफ्तार कराया। 

विवादित बयान देने वाले नदीम अहमद फारुखी उत्तर प्रदेश स्थित फर्रुखाबाद जिले के सपा, जिलाध्यक्ष हैं। उन पर एक महिला ने छेड़छाड़, जानलेवा हमला और धमकी देने का आरोप लगाया था। जिसके बाद उन पर लगाए गए आरोपों के आधार पर संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज करके उन्हें जेल भेज दिया गया था। यह घटना बीते रविवार (1 नवंबर 2020) की बताई जा रही है।

जेल से बाहर आते ही एक जनसभा को संबोधित करते हुए सपा नेता नदीम अहमद फारुखी ने कहा- 

“हिम्मत नहीं थी किसी की बात करने के लिए। गर्व की बात है कि मुख्यमंत्री ने हमें अरेस्ट कराया। आप लोगों, बुजुर्गों की दुआएँ थीं और नौजवानों हौसला, वकीलों का साथ था। आज पहली बार शुक्रिया करता हूँ कि पुलिस ने भी हमारा बहुत सम्मान रखा 3 दिन तक। ऐसा पहली बार हुआ नहीं तो मैं पुलिस को अपने जूते की नोक पर रखता हूँ। एक ही डर था जेल जाने का अब वह डर भी ख़त्म हो गया।” इस बयान के बाद मौके पर मौजूद भीड़ नारे लगाते हुए सपा नेता का समर्थन भी करती है। 

पुलिस ने सपा जिलाध्यक्ष को रविवार को गिरफ्तार करने के बाद सोमवार को कड़ी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया था। इसके बाद उन्हें जेल भेज दिया गया था और फिर उनकी जमानत के लिए न्यायालय में याचिका दायर की गई थी। अंततः बुधवार को जिला न्यायाधीश राजेश कुमार राय ने जमानत के लिए दायर की गई उनकी याचिका पर सुनवाई की थी। दोनों पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश ने समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष नदीम अहमद फारुखी की जमानत याचिका को स्वीकार कर लिया था। 

स्थानीय समाचार समूहों की रिपोर्ट्स के अनुसार सितारा बेगम नाम की महिला ने सपा नेता के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस अधीक्षक को लिखे गए पत्र में सितारा बेगम का कहना था कि नदीम अहमद फारुखी उनके घर के ठीक पीछे प्लाटिंग करा रहे हैं। इतना ही नहीं, रास्ता उनके घर से निकालने की योजना बना रहे हैं। महिला ने आरोप में यहाँ तक दावा किया था कि सपा नेता ने अपने साथियों के साथ मिल कर हथियारबंद होकर उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा करने का प्रयास किया था।               

अर्णब की गिरफ्तारी के विरोध में बैठे BJP विधायक को मुंबई पुलिस ने लिया हिरासत में, थाने में की भूख हड़ताल

भाजपा विधायक राम कदम शुक्रवार (6 नवंबर, 2020) को रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठे थे। मंत्रालय के आगे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे भाजपा नेता राम कदम को मुंबई पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इस दौरान राम कदम ने अपने पद और दायित्व के बारे में बताते हुए पुलिस से कहा, “मैं विधायक हूँ और किसी चीज़ का विरोध करना और उसके खिलाफ अनशन करना मेरा अधिकार है।”

भाजपा विधायक ने पुलिस के इस रवैये को शर्मनाक बताते हुए कहा कि, हिरासत में लिया जाना मेरे अधिकार का हनन है। मुंबई पुलिस ने उन्हें मंत्रालय से उठा कर मरीन ड्राइव थाने ले गई। जिस पर राम कदम ने ट्वीट कर लिखा है कि, “महाराष्ट्र सरकार की ओर से हम पर भूख हड़ताल तोड़ने के दबाव बनाया जा रहा है। मरीन ड्राइव पुलिस थाने में भूख हड़ताल जारी”

उन्होंने एक और ट्वीट करते हुए बताया कि, “महाराष्ट्र सरकार ने मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में हमें डिटेन किया, भूख हड़ताल से रोका पर .. पुलिस स्टेशन में भी भूख हड़ताल जारी।” बता दें कि विरोध प्रदर्शन में उनके साथ सुशांत सिंह राजपूत के कोरियाग्राफर दोस्त गणेश हिवाड़कर भी मौजूद हैं।

मुंबई पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने पर राम कदम ने कहा, “मैं कानून के अनुसार सभी नियमों का पालन कर रहा था, जब मैं यहाँ पर विरोध में बैठा था। मेरे साथ कोई भीड़ नहीं मौजूद थी। हम सिर्फ तीन लोग यहाँ बैठे थे। मैं पुलिस के खिलाफ विरोध नहीं कर रहा हूँ। यह सरकार डरी हुई है। कितनी आवाजें वे (सरकार) दबा सकते हैं?”

भाजपा विधायक ने आगे कहा, उच्च न्यायालय से अर्णब गोस्वामी को जमानत मिलने के बाद, मैं विधानसभा में वापस जाऊँगा और उन सभी मंत्रियों को मिठाई बाटूँगा, जो अर्णब की गिरफ्तारी पर हँस रहे थे।”

मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन करते वक्त राम कदम ने रिपब्लिक भारत से बात करते हुए कहा कि अर्णब की गिरफ्तारी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता पर हमला है। यह पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला है। उन्होंने कहा कि वो अर्णब गोस्वामी को तुरंत रिहा करने और बदले की भावना से उन पर लगाए गए आरोपों को खत्म करने, और उनके साथ बदसलूकी करने वाले 9 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने की माँग करते हैं। इसके बाद पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लिया गया था।

गौरतलब है कि अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के विरोध में बृहस्पतिवार को भाजपा के विधायक राम कदम ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा। जिसके बाद कदम ने बताया कि, “महाराष्ट्र में ये तानाशाही ज्यादा नहीं चलेगी। अर्नब गोस्वामी कौन से आतंकवादी है, उनको गिरफ्तार करने के लिए एनकाउंटर स्पेशलिस्ट क्यों भेजा गया। महाराष्ट्र सरकार अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंट रही है।”

SC ने अर्णब को दी गिरफ्तारी से राहत, महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार, पूछा- आप किसी को कैसे धमका सकते हैं?

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी मामले पर आज (नवंबर 6, 2020) सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को फटकार लगाई है। कोर्ट ने पूरे मामले पर उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके उनके पत्र पर उनसे दो हफ्तों में जवाब माँगा है।

इसके साथ ही कोर्ट ने अर्णब को राहत प्रदान करते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने कहा है कि उन्हें वर्तमान कार्यवाही के बाद गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।

लाइव लॉ के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सीजेआई ने महाराष्ट्र विधानसभा के सचिव को शीर्ष न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने का नोटिस जारी किया और इसमें उनसे कारण बताने को कहा गया कि आखिर क्यों उनके द्वारा लिखे पत्र के विरुद्ध कार्यवाही नहीं शुरू की जानी चाहिए।

बता दें कि आज सुप्रीम कोर्ट में अर्णब की गिरफ्तारी का पूरा मामला वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने उठाया और अर्णब को किसी भी प्रकार की कार्रवाई से बचाने की अपील की। उन्होंने अर्णब की ओर से बताया कि उन्हें धमकी दी जा चुकी थी, “तुमने हमें गाली दी है। ये दीवाली तुम जेल में बिताओगे।”

कोर्ट ने सारा पक्ष सुनकर पूरे मामले पर हैरानी जताई कि आखिर किसी नागरिक को कोर्ट जाने से कैसे रोका सकता है। उसे कैसे धमकाया जा सकता है। सीजेआई ने नाराजगी महाराष्ट्र विधानसभा सचिव पर जाहिर करते हुए कि आखिर अनुच्छेद 32 किसलिए है?

सीजेआई ने कहा, “हमारे पास पत्र लिखने वाले के लिए गंभीर सवाल है और हमारे लिए इसे अनदेखा करना बेहद मुश्किल है।” सीजेआई विधानसभा सचिव के पत्र पर बोले, “ये न्याय की प्रक्रिया में व्यवधान है, पत्र लिखने वाले की भाषा अर्णब को धमकाने वाली है। ऐसा लगता है जैसे पत्र लिखने वाली की मंशा याचिकाकर्ता को डराने वाली थी क्योंकि उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया।”

बता दें कि अर्णब गोस्वामी को बुधवार को बिना समन जारी किए जबरदस्ती घर से उठाया गया था। कुछ पुलिस अधिकारी उनके घर पहुँचे थे और उनके साथ मारपीट करते हुए उन्हें एक पुराने केस में गिरफ्तार किया था।

इसके बाद अर्णब की कई वीडियोज सामने आई थी। वीडियो में उनके शरीर पर मारपीट के निशान साफ नजर आए थे, जिसे देख जगह-जगह मुंबई पुलिस के रवैये की आलोचना हुई थी।

देर रात तक अदालत की सुनवाई चलने के बाद अर्णब को कल 18 नवंबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा गया जबकि मुंबई पुलिस लगातार 14 दिन की हिरासत का अनुरोध कर रही थी। अदालत ने पुलिस से कहा कि हिरासत में लेकर पूछताछ करने की जरूरत नहीं है।

CAA-NRC विरोधी हिंसक प्रदर्शन: मौलाना सहित 14 आरोपितों के लखनऊ में फिर लगे पोस्टर, इनाम घोषित

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार एक बार फिर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ सख्त नजर आई है। मौलाना सैफ अब्बास सहित 14 अन्य आरोपितों के पोस्टर सड़कों पर लगाए गए हैं। सरकार ने प्रदर्शन करने वाले 8 लोगों को भगोड़ा घोषित किया है। इसके साथ ही इनकी गिरफ्तारी पर 5000 नकद इनाम की घोषणा की है।

जानकारी के मुताबिक, प्रदेश सरकार ने सीएए के खिलाफ हुए प्रदर्शन में शामिल 8 प्रदर्शनकारियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए उनको भगोड़ा और मोस्ट वांटेड घोषित कर दिया गया है। इन प्रदर्शनकारियों घरों के बाहर नोटिस लगाए गए हैं। इसके अलावा, कई जगह पोस्‍टर चस्‍पा किए गए हैं। पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों की सूचना देने वाले को 5 हजार रुपए का इनाम की भी घोषणा की है।

जारी किए गए पोस्टर पर पुलिस अधिकारियों के नंबर भी हैं, जिनपर इसकी जानकारी दी जा सकती है। पुलिस द्वारा दो अलग-अलग पोस्टर जारी किए गए हैं। एक में वह प्रदर्शनकारी हैं, जिन पर गैंगस्टर एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हुआ है, दूसरे में वह प्रदर्शनकारी हैं, जो फरार तो हैं, लेकिन उन पर गैंगस्टर एक्ट नहीं लगा है।

वहीं इस मामले में ज्वाइंट कमिश्नर ऑफ पुलिस नवीन अरोड़ा ने पहले बताया था कि सीएए और एनआरसी की आड़ में उपद्रव मचाने वालों के खिलाफ ठाकुरगंज थाने में 27 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इनमें 11 लोगों को अरेस्ट किया जा चुका है और एक आरोपित ने सरेंडर कर दिया था। हालाँकि, 7 आरोपितों ने कोर्ट से गिरफ्तारी का स्टे ले लिया था जिसके बाद बचे हुए 8 आरोपितों के खिलाफ गुंडा एक्ट की कार्रवाई करते हुए धारा 82 की कार्रवाई की गई है जिसमें उनके घर के बाहर डुगडुगी बजाकर नोटिस चस्पा किया गया।

इन आरोपितों पर लखनऊ में सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान आगजनी करने, सांप्रदायिक वैमनस्यता फैलाने और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने का आरोप है। जिनके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट लगा है उन में मोहम्मद अलाम, मोहम्मद तहिर, रिजवान, नायब उर्फ रफत अली, अहसन, हसन और इरशाद शामिल है।

पुलिस के अनुसार, पोस्टर में शामिल हसन, इरशाद और आलम ने गुरुवार को कोर्ट में सरेंडर कर दिया। वहीं दूसरे पोस्टर में चौक निवासी मौलाना सैफ अब्बास, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ उपाध्यक्ष मौलाना क़ल्बे सादिक के बेटे कल्बे सिब्तैन “नूरी”, ठाकुरगंज के सलीम चौधरी, कासिफ, हलीम, नीलू, मानू, इस्लाम, आसिफ, तौकीर, जमाल और शकील अभी फरार हैं। इन सभी आरोपितों की धर पकड़ के लिए इनाम घोषित किया गया है। साथ ही इनको पकड़ने के लिए पुलिस की एक टीम का भी गठन हुआ है।

गौरतलब है कि लखनऊ में पिछले साल 19 दिसंबर को सीएए-एनआरसी की आड़ में उग्र और बेहद हिंसक प्रदर्शन किया गया था। इस मामले में यूपी पुलिस ने 287 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। तोड़फोड़, आगजनी, मारपीट, लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम व सरकारी कार्य में बाधा समेत अन्य धाराओं में कुल 63 मुकदमे दर्ज किए गए थे।

वहीं योगी सरकार ने राजधानी लखनऊ में सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वाले दंगाइयों के चेहरे सार्वजनिक करते हुए उनके पोस्टर चौराहों पर लगवा दिए थे। हिंसा के बाद ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि नुकसान की भरपाई दंगाइयों से की जाएगी।