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जमानत चाहिए तो 2 साल तक सोशल मीडिया से दूर रहना होगा: जानिए इलाहबाद HC ने क्यों दिया ऐसा फैसला

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सोमवार (नवंबर 02, 2020) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोपित एक शख्स को इस शर्त पर जमानत दी कि वह दो साल तक सोशल मीडिया इस्तेमाल नहीं करेगा। आरोप है कि देवरिया के अखिलानंद राव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य जनप्रतिनिधियों के बारे में सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट किया। साथ ही अपने बारे में गलत जानकारियाँ देकर भी अनुचित लाभ उठाने का प्रयास किया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य सार्वजनिक हस्तियों के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए अखिलानंद राव नामक एक व्यक्ति को जमानत देने का आदेश पारित किया था। अखिलानंद के खिलाफ देवरिया में मामला दर्ज किया गया था।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ ने आरोपितों को जमानत देते हुए कहा, “आवेदक सोशल मीडिया का उपयोग दो साल की अवधि के लिए या ट्रायल कोर्ट के समक्ष, जो भी पहले हो, मुकदमे के समापन तक नहीं करेगा।”

आरोपित अखिलानंद राव पर अनुचित लाभ हासिल करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने का प्रयास करने का भी आरोप है। उत्तर प्रदेश पुलिस ने उस पर भारतीय दंड संहिता की धारा 419, 420, 120 बी और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 डी के तहत मामला दर्ज किया था।

हालाँकि, आरोपित का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता विमल कुमार पांडे ने आरोप लगाया कि आवेदक अखिलानंद पर लगाए गए आरोप पुलिस द्वारा झूठे निहितार्थ का मामला थे। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आवेदक 12 मई से जेल में था। जमानत याचिका में दायर हलफनामे के अनुसार, आरोपित का 11 मामलों का आपराधिक इतिहास रहा है।

उच्च न्यायालय ने पूर्व की शर्तों को निर्धारित करते हुए अदालत द्वारा उल्लिखित राशि और कुछ अन्य शर्तों के अनुसार व्यक्तिगत बांड और प्रत्येक के लिए दो जमानतें प्रस्तुत करने पर जमानत पर आवेदक को रिहा करने का आदेश दिया।

आदेश में यह भी कहा कि किसी भी शर्त का उल्लंघन जमानत रद्द करने का आधार होगा और आवेदक, जाँच या मुकदमे के दौरान गवाहों को डराकर अभियोजन पक्ष के सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करेगा।

महाराष्ट्र के गृह मंत्रालय ने बनाई थी अर्णब की गिरफ्तारी के लिए 40 पुलिसकर्मियों की टीम, नाम दिया- ऑपरेशन अर्णब

अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के मामले में एक हैरान करने वाली बात सामने आई है। महाराष्ट्र सरकार के गृहमंत्री और एनसीपी नेता अनिल देशमुख की अगुवाई में 2018 के एक आत्महत्या के लिए उकसाने वाले मामले में अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के लिए 40 सदस्यों की उच्च स्तरीय टीम का गठन किया था और इस टीम की अगुवाई कोकण रेंज के इंस्पेक्टर जनरल संजय मोहिते को सौंपी गई। 

रायगढ़ पुलिस ने साल 2018 में आर्किटेक्ट अन्वय नाइक की आत्महत्या के मामले की फ़ाइल को दोबारा खोलने की अनुमति दी। इसके कुछ ही दिन बाद ‘ऑपरेशन अर्णब’ की शुरुआत हुई। इस ऑपरेशन के लिए रायगढ़ और मुंबई पुलिस के लगभग 40 पुलिसकर्मी शामिल किए गए थे। संजय मोहिते ने इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम देने की योजना बनाई और वहीं इसे क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी एनकाउंटर विशेषज्ञ सचिन वाज़ को सौंपी गई थी। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया‘ से बात करते हुए महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री ने इस प्रकरण में विस्तार से जानकारी दी। 

उन्होंने कहा, “संजय मोहिते की अगुवाई वाली टीम के लिए अर्णब जैसे ताकतवर व्यक्ति को गिरफ्तार करना चुनौतीपूर्ण था। फिर भी हमने पूरी सावधानी के साथ एक एक कदम उठाया, टीम के हर सदस्य ने तमाम प्रकार की विपरीत प्रतिक्रिया झेलने के बावजूद धैर्य और संयम से काम लिया। इन बातों की वजह से ही हम इस पूरे ऑपरेशन को सही से अंजाम देने में सफल हो पाए।” 

खुफ़िया ऑपरेशन, गिरफ्तारी के पहले पुलिसकर्मियों ने लगाए घर के चक्कर

महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट सदस्य ने यह भी कहा कि प्राथमिक जाँच के बाद एक बात स्पष्ट हो चुकी थी कि अर्णब पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप तय है। उन्होंने कहा, “टीम के लोगों ने उस इमारत के कई चक्कर लगाए जहाँ अर्णब का घर है, यह एक खुफ़िया ऑपरेशन था। हमें शुरुआत से ही इस बात का डर था कि कहीं कोई जानकारी बाहर न आ जाए। वह पूरे मामले में एक बड़ी चूक साबित होती।” 

महाराष्ट्र कैबिनेट के एक वरिष्ठ सदस्य ने इस ऑपरेशन की जानकारी ऐसे दी जैसे यह किसी बड़े अपराधी को पकड़ने की योजना हो। उन्होंने कहा कि अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी बुधवार (4 नवंबर 2020) को सुबह हुई थी, पुलिसकर्मियों ने यह समय इसलिए चुना जिससे अर्णब घर पर मौजूद हो। इसकी जानकारी देते हुए मंत्री ने बताया कि यह एक सुनियोजित ऑपरेशन था, हर कदम पूरी सावधानी के साथ उठाया गया था। यह तक पहले से तय किया गया था कि कौन दरवाजे पर आहट करेगा और कौन अर्नब और उनके परिवार वालों से बात करेगा। 

इसके अलावा, अगर कार्रवाई के दौरान विपरीत हालात पैदा होते हैं तो मौके पर क्या कदम उठाया जाएगा यह भी तय किया गया। ऐसा हुआ भी, अर्णब ने मौके पर प्रतिक्रिया दी जिसके बाद सचिन वाज़ ने उन्हें जाँच में सहयोग ना करने के हालात में न्यायिक प्रक्रिया से अवगत कराया। गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कहा, “देवेंद्र फडणवीस की सरकार में इस मामले को पूरी तरह दबाने का प्रयास किया गया था। जैसे ही मैंने मृतक की पत्नी और उनकी बेटी का पक्ष सुना मुझे बहुत ज़्यादा हैरानी हुई। मुझे भरोसा नहीं हुआ कि महाराष्ट्र में ऐसा भी हो सकता है, हम इस मामले को इसके सुचारू अंत तक लेकर जाएँगे।”

अपने ही पुलिसकर्मी को गिरफ्तार किया मुंबई पुलिस ने

सबसे ज़्यादा हैरानी की बात है कि मुंबई पुलिस ने 2018 आत्महत्या मामले की फाइल बंद करने के लिए अपने ही विभाग के एक अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तार के ठीक एक दिन बाद उस पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार कर लिया जिसने कोई सबूत नहीं उपलब्ध होने की सूरत में मामले की फाइल बंद कर दी थी। यह पुलिस अधिकारी 2018 में हुई अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की जाँच कर रहा था। 

मई, 2018 में अर्णब गोस्वामी पर इंटीरियर डिज़ाइनर अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया था। अन्वय नाइक द्वारा अलीबाग स्थित बंगले में आत्महत्या करने के बाद अर्नब के विरुद्ध एफ़आईआर दर्ज की गई थी। अपने सुसाइड नोट में अन्वय नाइक ने अर्णब और 2 अन्य लोगों पर आरोप लगाया था कि अर्णब ने स्टूडियो का काम कराने के बाद उन्हें 83 लाख रुपए का भुगतान नहीं किया था। 

इस मामले में जाँच हुई थी, जाँच के बाद पुलिस ने अंतरिम रिपोर्ट भी दायर की थी जिसके बाद अदालत ने इसे बंद करने का आदेश दिया था। इस मुद्दे पर रिपब्लिक टीवी ने पहले ही सफाई पेश की थी कि 90 फ़ीसदी भुगतान पहले ही किया जा चुका था जितना बचा था वह बचा हुआ काम पूरा होने के बाद होना था जो कि कभी पूरा हुआ ही नहीं।

चखना लाने से मना करने पर शराबी शादाब (पल्सर) ने की 14 साल के किशोर की चाकू गोदकर हत्या

दक्षिण पूर्वी दिल्ली के कालिंदी कुंज इलाके में एक 14 साल के किशोर को कुछ शराबियों ने नमकीन (चखना) लेकर आने के लिए कहा और उसने मना कर दिया। इस बात से नाराज़ होकर शराबियों ने उस किशोर की चाक़ू से हत्या कर दी। मृतक किशोर की पहचान अल्काश मलिक (14) के रूप में हुई है और पुलिस ने भी घटना को अंजाम देने वाले मुख्य आरोपित शादाब उर्फ़ पल्सर को गिरफ्तार कर लिया है। इसके अलावा मृतक किशोर के परिजनों का कहना है कि घटना में कुल 5 आरोपित शामिल थे। 

दक्षिण पूर्वी दिल्ली के डीसीपी आरपी मीणा ने घटना के विषय में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अल्काश मलिक अपने परिवार के साथ मदनपुर खादर में रहता था। लॉकडाउन के दौरान स्कूल बंद हो जाने की वजह से वह अपने पिता के साथ बिरयानी की दुकान में मदद करता था। बुधवार (4 नवंबर 2020) की शाम को अल्काश के परिवार वालों ने उसे रोटी लाने के लिए भेजा था। घर से कुछ दूर पहुँचने पर 4 से 5 लोग शराब पी रहे थे, उनमें से शादाब उर्फ़ पल्सर नाम के शराबी ने अल्काश को नज़दीक की दुकान से नमकीन और गिलास लेकर आने के लिए कहा। 

अल्काश ने ऐसा करने से साफ़ मना कर दिया और इस बात से शादाब समेत अन्य लोग काफी गुस्से में आ गए। शादाब ने अल्काश को बुरी तरह पीटा और इसके बाद उस पर चाकू से कई वार किए जिसकी वजह से वह बुरी तरह घायल हो गया। इस वारदात को अंजाम देने के बाद सभी आरोपित मौके से फरार हो गए। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और अल्काश को गंभीर अवस्था में अपोलो अपस्ताल में भर्ती कराया।

अस्पताल में अल्काश को मृत घोषित कर दिया। फ़िलहाल पुलिस ने घटना के मुख्य आरोपित शादाब उर्फ़ पल्सर को गिरफ्तार कर लिया है। परिवार वालों की माँग है कि सभी आरोपितों की गिरफ्तारी होनी चाहिए। इसके आधार पर पुलिस ने मामले के अन्य पहलुओं पर जाँच शुरू कर दी है। 

जो बिहार में सब जानते हैं वह नीतीश कुमार ने खुद क्यों कहा, PM मोदी ने उन्हें ‘जरूरत’ क्यों बताया?

“आज चुनाव का आखिरी दिन है और परसों चुनाव है। ये मेरा अंतिम चुनाव है। अंत भला तो सब भला। अब आप बताइए कि वोट दीजिएगा न इनको? हाथ उठाकर बताइए। हम इनको (उम्मीदवार को) जीत की माला समर्पित कर दें?”

नीतीश कुमार ने 5 नवंबर को पूर्णिया के धमदाहा की रैली में उपरोक्त बातें कही। ऐसा नहीं है कि बिहार के लोगों को यह पता नहीं है कि 69 साल के नीतीश कुमार अगले विधानसभा चुनावों तक 74 साल के होंगे और नेतृत्व की भूमिका में नहीं रहेंगे। बहुत सारे लोगों को यह भी लगता है कि वे शायद 10 नवंबर को चुनाव के नतीजे आने के बाद भी राज्य की राजनीति में केंद्रीय भूमिका में न हों।

बावजूद अब तक ‘लालू-राबड़ी के 15 साल बनाम अपने 15 साल’ के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे नीतीश कुमार की इस ‘भावुक अपील’ के गहरे मायने हैं। अपने तरकश का यह आखिरी तीर उन्होंने बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल किया है।

इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि बिहार विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में 7 नवंबर को किन इलाकों में वोट डलने हैं। आखिरी चरण में सीमांचल, कोसी के अलावा तिरहुत और मिथिलांचल की बची हुई सीटों पर वोट डलेंगे। कुल 78 सीटों पर इस चरण में मतदान होना है।

आखिरी चरण की 37 सीटों पर जदयू के उम्मीदवार हैं। मधेपुरा, सुपौल, सहरसा, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज की 20 सीटों पर जदयू लड़ रही है। इनमें से करीब एक दर्जन सीटों पर पिछली बार भी उसे जीत मिली थी। 9 सीटें ऐसी हैं जहाँ लगातार दो बार से वह जीत रही है।

इन सीटों पर अल्पसंख्यक, अतिपिछड़े, महिलाएँ और प्रवासी वोटर निर्णायक हैं। 35 सीटों पर अति पिछड़ी जातियाँ असरदार हैं। 30 सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाता प्रभावशाली स्थिति में हैं। सीमांचल की कई सीटों पर 50 से 60 फीसदी तक अल्पसंख्यक वोटर हैं।

महिलाएँ, अति पिछड़े और अल्पसंख्यकों के एक हिस्से को जदयू अपना वोट बेस मानता है। महिलाओं को छोड़ दे तो नीतीश कुमार का आधार इस चुनाव में खिसकता नजर आया है। ऐसे में उनकी ‘अंतिम चुनाव’ वाली अपील काम कर गई तो न केवल यह बिखराव रुकेगा, बल्कि एनडीए का बहुमत भी मजबूत होगा। यह भी संभव है कि इस अपील की बदौलत जदयू खुद उस आँकड़े तक पहुँच जाए, जहाँ फिलहाल उसके पहुँचने की कोई सूरत नहीं दिखती है।

नीतीश कुमार की इस भावुक अपील के बीच जिस बात की कम चर्चा हुई, वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिहार के लोगों के नाम लिखी चिट्ठी। इसमें प्रधानमंत्री ने बिहार के विकास के लिए नीतीश सरकार को अपनी जरूरत बताया है। लिखा है, “मैं बिहार के विकास को लेकर बहुत आश्वस्त हूँ। बिहार के विकास में कोई कमी न आए, विकास की योजनाएँ अटके नहीं, भटके नहीं, इसलिए मुझे बिहार में नीतीश जी की सरकार की जरूरत है।”

आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने भी पत्र लिखने के लिए वही दिन क्यों चुना जिस दिन नीतीश कुमार ने भावुक अपील की?

जैसा कि हमने अपनी पिछली रिपोर्ट में बताया है कि बिहार चुनाव के पहले चरण के बाद बीजेपी को जो फीडबैक मिले थे, वे बेहद निराशाजनक थे। हालाँकि दूसरे चरण में एनडीए ने इसकी भरपाई की है और वह सरकार बनाने की स्थिति में दिख रही है। ऐसे में तीसरे चरण में वोटों का बिखराव रोकने के लिए और जमीन पर चल रही उन तमाम चर्चा को विराम देने के लिए इस रणनीति पर अमल किया गया है, जो चुनाव बाद बीजेपी और जदयू में अलगाव की बात करते हैं।

असल में यही चरण तय करेगा कि एनडीए बस बहुमत के पास आकर ठहर जाएगी या फिर वह मजबूत स्थिति में होगी। इस चरण में अकेले जदयू की प्रतिष्ठा ही दॉंव पर नहीं लगी है। बीजेपी का भी काफी कुछ दॉंव पर लगा हुआ है। यही चरण तय करेगा कि बीजेपी अकेले राजद से कितना आगे होगी।

2015 के विधानसभा चुनावों में आखिरी चरण की 78 सीटों में से 54 महागठबंधन ने जीती थी। इन 54 में से 23 सीटें अकेले जदयू की थी। राजद को 20 और कॉन्ग्रेस 11 सीटें मिली थी। पिछले चुनाव में जदयू के बिना लड़ी बीजेपी ने भी इन सीटों में से 20 पर जीत हासिल की थी। निर्दलीय को दो और भाकपा-माले तथा रालोसपा को एक-एक सीटें मिली थी।

यानी, 43 सीटें ऐसी हैं जो पिछली बार जदयू और भाजपा को मिली थी। इन सीटों को कायम रखना दो कारणों से मुश्किल लग रहा था। पहला, नीतीश कुमार को लेकर नाराजगी और अति पिछड़े और महादलितों के बीच उनका खिसकता आधार। दूसरा, हमने इस पूरे चुनाव के दौरान पाया है कि जो उम्मीदवार पिछले 10-15 साल से लगातार विधायक हैं, उनके खिलाफ लोगों में काफी नाराजगी है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें जगह-जगह विरोध भी झेलना पड़ा था। इसके अलावा बीजेपी के कोर वोटरों में नीतीश को समर्थन को लेकर भ्रम की स्थिति भी दिख रही थी।

लिहाजा, नीतीश और मोदी दोनों ने आखिरी दिन यह पासा फेंका है। यदि जमीन पर इसका असर होता है और नतीजे पिछले चुनाव के तरह ही दोनों दल दोहराने में कामयाब रहे तो एनडीए उस स्थिति में पहुँच सकती है, जिसका अनुमान फिलहाल कोई राजनीतिक विश्लेषक लगाने को तैयार नहीं हैं।

2015 के चुनाव में आखिरी चरण में 18 सीटें ऐसी थी जहाँ बीजेपी और जदयू के बीच पिछली बार सीधी टक्कर हुई थी। इनमें से 7 पर जदयू, 10 पर बीजेपी को सफलता मिली थी। एक सीट भाकपा-माले ने दोनों दलों को पछाड़कर हासिल की थी। इसके अलावा 10 सीटें ऐसी थी, जहाँ जदयू और लोजपा की टक्कर हुई थी। सारी सीटें जदयू के खाते में गई थी। इस बार समीकरण बदले हुए हैं और जदयू को लोजपा नुकसान पहुँचाती दिख रही है। लिहाजा मोदी ने भी मतदाताओं में भ्रम दूर करने की कोशिश की है। इसका मकसद लोजपा को अपने कोर वोटरों तक ही सीमित रखना है जो एक खास वर्ग में ही सीमित है। यदि ऐसा होता है तो पिछले दो चरणों में लोजपा ने जिस तरह से जदयू को नुकसान पहुँचाया है, वह अब नहीं दिखेगा। इसी तरह दो सीटों पर जदयू और हम के बीच टक्कर थी। दोनों सीटों पर जदयू भारी पड़ी थी और इस बार हम एनडीए में ही है।

दिलचस्प यह है कि आखिरी चरण की 78 सीटों में 58 ऐसी हैं, जिस पर पिछली बार पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने ज्यादा वोट डाले थे। नीतीश कुमार के लिए सुकून की बात यह है कि महिलाओं के बीच कमोबेश उनकी लोकप्रियता पहले जैसी ही बनी हुई है। लिहाजा उनका इमोशनल कार्ड चला तो इस आखिरी चरण में चमत्कार भी संभव है और 10 नवंबर को आने वाले नतीजे बेहद चौंकाने वाले हो सकते हैं।

यही कारण है कि नीतीश कुमार के अंतिम चुनाव वाले बयान पर पलटवार करने में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान ने देरी नहीं की। तेजस्वी ने कहा कि हम पहले ही कहे थे नीतीश जी थक गए हैं। उन्होंने अब इसे मान भी लिया है। वहीं, चिराग पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार ने जेल जाने के डर से संन्यास की घोषणा की है।

एक सच यह भी है कि नीतीश कुमार (113 सभा) से दोगुने से भी ज्यादा इन चुनावों में सभा करने वाले 30 साल के तेजस्वी यादव (251 सभा) और करीब-करीब नीतीश के बराबर सभा करने वाले 38 साल के चिराग पासवान (110 सभा) उस राज्य में नीतीश कुमार का विकल्प बनने में नाकामायब रहे हैं, जहाँ 50.27 फीसदी वोटर 20 से 39 वर्ष के हैं।

हर अपमान SC/ST अधिनियम का उल्लंघन नहीं, जब तक वह ‘सार्वजनिक रूप से’ जातिगत न हो: सर्वोच्च न्यायालय

देश की सबसे बड़ी अदालत ने गुरुवार (5 नवंबर 2020) को एक अहम टिप्पणी की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के तहत दर्ज की जाने वाली शिकायतें सिर्फ इस आधार पर पंजीकृत नहीं की जा सकती हैं क्योंकि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय से आता है। कृत्य के तहत उठाए गए सवाल व्यक्ति की जाति के लिए निर्देशित होने चाहिए। 

यह टिप्पणी ऐसे वक्त में आई है जब पिछड़े वर्ग/समुदाय से आने वाले कई लोग अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम का दुरुपयोग करते हैं। यहाँ तक कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति के साथ होने वाले ‘गैर जातीय’ अपमान के मामले में भी कठोर कार्रवाई होती है।   

जातिगत अपमान होने पर ही कर सकेंगे शिकायत 

सर्वोच्च न्यायालय के 3 न्यायाधीशों की पीठ (एल नागेस्वरा राव, हेमंत गुप्ता और और अजय रस्तोगी) ने इस मुद्दे पर टिप्पणी की। पीठ ने टिप्पणी करते हुए न्यायालय ने कहा, “किसी व्यक्ति का अपमान या धमकी अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति कानून के तहत अपराध नहीं होगा जब तक कि इस तरह का अपमान या धमकी पीड़ित के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने के कारण नहीं है।”

अपमान का सार्वजनिक होना ज़रूरी

न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी शिकायत को सिर्फ इसलिए अनुसूचित जाति अनुसूचित जाति अधिनियम का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है क्योंकि उस समुदाय का सदस्य है। पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी मामले में सबसे ज़रूरी आधार यही है कि पीड़ित व्यक्ति को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया गया हो, सिर्फ तभी उस शिकायत को अनसूचित जाति अनुसूचित जनजाति का उल्लंघन माना जाएगा। इसके अलावा इस तरह के मामलों में एक और ज़रूरी बात यह है कि मामला सार्वजनिक या कई लोगों के बीच में होना चाहिए, इसके बाद ही अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3 (1)(r) के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। 

क्या है मामला

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी हितेश वर्मा नाम के युवक द्वारा दायर की गई याचिका पर  सुनवाई करते हुए की। हितेश वर्मा ने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम की सीआरपीसी (CrPC) धारा 482 और 3 (1)(r) के तहत खुद पर दायर की गई चार्जशीट को नष्ट करने के लिए यह याचिका दायर की थी। हितेश की याचिका इसके पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने खारिज कर दी थी। सर्वोच्च नायालय ने इस बात का उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता द्वारा किया गया अपमान की घटना पीड़ित के आवास पर हुई थी, यानी आम लोगों की गैरमौजूदगी में। 

क्योंकि जाँच में यह बात भी सामने आई कि मामला संपत्ति से संबंधित विवाद से जुड़ा हुआ था इसलिए इस पर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति की धारा 3 (1)(r) लागू नहीं की जा सकती है। न्यायालय ने कहा, “इस मामले में दोनों पक्ष संपत्ति पर स्वामित्व को लेकर पैरवी कर रहे हैं। अपशब्द कहने और अपमान करने का आरोप उस व्यक्ति पर लगाया गया है जो संपत्ति पर अपना दावा कर रहा है। अगर वह व्यक्ति अनुसूचित जाति से आता है तब भी इस मामले में अधिनियम की धारा 3 (1) (r) लागू नहीं की जा सकती है।          

प्राइवेट जॉब्स में स्थानीय लोगों को 75% आरक्षण देगा हरियाणा, विधेयक पारित

आरक्षण की नीति के संबंध में हरियाणा की राज्य सरकार ने एक अहम निर्णय लिया है। हरियाणा में निजी क्षेत्र की नौकरियों (प्राइवेट सेक्टर) में स्थानीय उम्मीदवारों को 75% तक आरक्षण का लाभ मिलेगा। बृहस्पतिवार (5 नवंबर 2020) को हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने इसके संबंध में विधानसभा में विधेयक पारित किया गया। चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी दल जजपा ने अपने घोषणापत्र में इस बात का वादा किया था। 

यह आदेश उन कंपनी, सोसाइटी, ट्रस्ट, फर्म या समूहों पर लागू होगा जिनमें 10 या अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं और जो हरियाणा में पहले से मौजूद हैं या नई स्थापित हुई हैं। यह आदेश विशेष रूप से नई भर्तियों पर लागू होगा। इस आदेश से जुड़ी एक और अहम बात यह है कि 50 हज़ार या इससे कम वेतन के दायरे में आने वाली नौकरियों पर ही यह आदेश लागू होगा।

इस बिल को लेकर हरियाणा मुख्यमंत्री कार्यालय के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया है, “मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने विधानसभा में कहा कि ‘हरियाणा राज्य के स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक-2020’ लाने का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार उपलब्ध करवाना है। इससे निजी क्षेत्र में हरियाणा के युवाओं की 75% हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी।”

इसके अलावा, आगामी 3 माह के भीतर कम्पनियों को सरकारी पोर्टल पर पंजीयन कराते हुए इस बात की जानकारी देनी होगी कि 50 हज़ार से कम वेतन वाले कितने कर्मचारी काम कर रहे हैं और उनमें से कितने हरियाणा के हैं। आदेश के संबंध में यह भी कहा गया है कि इस डाटा को साझा करने या अपलोड करने के लिए कंपनी नए कर्मचारी नहीं रख सकती है।

कंपनी मालिक के पास यह अधिकार होगा कि वह एक जिले से 10 फ़ीसदी से अधिक कर्मचारी न रखे। साथ ही, किसी भी उच्च दर्जे के पद के लिए कुशल उम्मीदवार नहीं मिलने की सूरत में आरक्षण में छूट दी जा सकती है। इस संबंध में डीसी या उससे वरिष्ठ अधिकारी का निर्णय मान्य होगा। हर फर्म, कंपनी या समूह को औसतन 3 महीने की अवधि में इस नीति को लेकर स्टेटस रिपोर्ट देनी होगी।

एसडीएम या इससे वरिष्ठ अधिकारियों के पास अधिकार होगा कि वह आदेश लागू करने के संबंध में जाँच के लिए जानकारी ले सकें। इस कानून का पालन नहीं करने वालों पर इस कानून के प्रावधानों के तहत कार्रवाई होगी। हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने हरियाणा के स्थानीय उम्मीदवारों का नियोजन विधेयक 2020 विधानसभा में पेश किया। इस विधेयक को काफी चर्चा के बाद सर्वसम्मति से  पार्टी कर लिया गया। विपक्ष ने इस विधेयक के ढाँचे पर कई तरह के सवाल भी खड़े किए, उनका कहना था कि देश के सभी युवाओं को नौकरी का समान अधिकार और अवसर मिलना चाहिए।

हरियाणा के उपमुख्यमंत्री ने भी ट्वीट करके इस विधेयक के पारित होने पर बधाई दी। उन्होंने इसे भावुक क्षण बताया और कहा सरकार का हिस्सा बनने के ठीक एक महीने बाद उनके सामने यह भावुक पल आया है।

मृतक किसान ने शिवसेना MP पर लगाया था आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप, परिवार ने की अर्णब जैसी त्वरित कार्रवाई की माँग

महाराष्ट्र में एक किसान ने वर्ष 2019 के अप्रैल माह में आत्महत्या की थी और अपने सुसाइड नोट में शिवसेना सांसद ओमप्रकाश राजे निम्बालकर पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया था। दिलीप धवले नाम के इस किसान का परिवार अभी भी न्याय का इंतजार कर रहा है। मृतक किसान के परिवार की माँग है कि जिस तत्परता से मुंबई पुलिस रिपब्लिक भारत के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, उसी तरह से उन्हें भी न्याय दिलाया जाए।

उस्मानाबाद पुलिस ने किसान को आत्महत्या के लिए उकसाने और धोखाधड़ी के कथित आरोपों में शिवसेना के सांसद ओमप्रकाश राजे निम्बालकर और 56 अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया था। धवले, जो उस्मानाबाद के कास्बे तडवाले गाँव के थे, ने दो सुसाइड नोट छोड़े थे, एक ढोकी पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर के पास, और दूसरा, मतदाताओं को संबोधित करते हुए। उन्होंने लिखा कि मिल को समय पर ऋण चुकाने में विफल रहने के बाद उनकी जमीन को तीन बार नीलाम किया गया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सूखे के कारण उन्होंने ऐसा कदम उठाया।

आत्महत्या करने वाले किसान की पत्नी वंदना धवले ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से की माँग की है कि दिलीप धवले की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार शिवसेना सांसद ओमप्रकाश राजे और अन्य आरोपितों से तत्काल निपटा जाना चाहिए।

उस्मानाबाद में प्रेस वार्ता करते हुए धवले के परिवार ने उनकी मौत के मामले की जाँच में देरी होने पर आक्रोश जाहिर किया। दिलीप धवले की पत्नी वंदना धवले ने कहा कि लोकसभा चुनावों के दौरान उद्धव ठाकरे ने उन्हें इंसाफ दिलाने का वादा किया था। इसके बाद उन्होंने बताया कि उनके पति ने इसलिए आत्महत्या क्योंकि उनके साथ आर्थिक धोखाधड़ी हुई थी, जिसके चलते उन्हें अपमान का सामना करना पड़ा था। धवले के परिवार का यहाँ तक कहना था कि घटना के 5 महीने बाद इस संबंध में मामला दर्ज किया गया था और मामला दर्ज किए जाने के बाद एक साल पूरे हो चुके हैं लेकिन पुलिस ने अभी तक चार्जशीट दायर नहीं की है। 

धवले के भाई राज और बेटे दीपक ने भी इस मामले पर पुलिस के लापरवाही भरे रवैये को लेकर रोष जताया है और साथ उद्धव सरकार से निवेदन किया है कि उन्हें जल्द से जल्द न्याय दिलाया जाए। इसके अलावा धवले के परिवार ने कहा कि वह अगले दो दिनों में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मुलाक़ात करने के लिए मुंबई आएँगे और विस्तार से जानकारी देंगे कि निम्बालकर की वजह से उनकी कितनी दुर्दशा हुई।

मृतक किसान दिलीप धवले के परिवार ने इस पर आशा जताई कि जिस तरह मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने नायक परिवार का कष्ट जानने के बाद तत्काल प्रभाव से कार्रवाई की, ठीक उसी तरह मुख्यमंत्री इनके मामले में भी तत्काल प्रभाव से कार्रवाई का आदेश देंगे। 

वहीं, शिवसेना नेता ओमप्रकाश राजे निम्बालकर ने इस तरह के सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है और सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। उनका कहना है कि न तो वह शुगर फैक्ट्री के बोर्ड का हिस्सा थे और न ही बैंक के तंत्र (बॉडी) में शामिल थे। उन्होंने एक तरह से सारा आरोप बैंक पर लगा दिया है।

मुंबई पुलिस रिपब्लिक TV के खिलाफ गलत बयान देने के लिए बना रही दबाव: हंसा रिसर्च ग्रुप ने दाखिल की हाईकोर्ट में याचिका

टीआरपी हेरफेर मामले में हंसा रिसर्च ग्रुप ने मुंबई पुलिस पर बेहद संगीन आरोप लगाए हैं। ग्रुप ने कहा है कि मुंबई पुलिस द्वारा उन्हें रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के खिलाफ गलत बयान देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

बार और बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, BARC के बार-ओ-मीटर (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) का संचालन करने वाली कंपनी ने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख करते हुए इस मामले की जाँच मुंबई पुलिस के बजाय केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की माँग की है।

बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर याचिका में हंसा रिसर्च ने आरोप लगाया है कि पुलिस उनके कर्मचारियों को फर्जी बयान जारी करने के लिए दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। साथ ही रिपब्लिक टीवी द्वारा जारी एक डॉक्यूमेंट को फर्जी करार देने के लिए कह रही है।

हंसा रिसर्च की रिपोर्ट, जिसके आधार पर टीआरपी मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी, उसमे सिर्फ इंडिया टुडे के नाम का उल्लेख करते हुए कहा गया था कि इंडिया टुडे चैनल को देखने के लिए बार-ओ-मीटर वाले ने घरों को रिश्वत दिया था। वहीं पुलिस द्वारा लगाए गए आरोप के विपरीत इसमें रिपब्लिक का नाम नहीं था। इसके अलावा एफआईआर में भी इसका जिक्र नहीं है।

याचिका में कहा गया है, “याचिकाकर्ताओं को लगातार क्राइम ब्रांच में लंबे समय तक रखा जाता है और गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है और बार-बार झूठे बयान देने के लिए दबाव बनाया जाता है।”

याचिका हंसा समूह के निदेशक नरसिम्हन के स्वामी, सीईओ प्रवीण ओमप्रकाश और नितिन काशीनाथ देवकर की तरफ से दायर किया गया है। याचिका में कहा गया कि पुलिस को पहले ही बताया जा चुका है कि तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जा रहा है कि रिपब्लिक द्वारा दिखाए गए डॉक्यूमेंट सही है या नहीं।

हंसा द्वारा दायर याचिका में यह भी कहा गया है कि उनके अधिकारियों से बिना लिखित सूचना के पूछताछ की जा रही है और उन्हें दस्तावेज तैयार करने का समय भी नहीं दिया गया है। याचिकर्ताओ पर इसके लिए दबाव भी बनाया गया।

मुंबई के पुलिस आयुक्त परम बीर सिंह, सहायक पुलिस निरीक्षक सचिन वाज़े और एसीपी शशांक संभल को याचिका में उत्तरदाताओं के रूप में नामित किया गया है। हंसा रिसर्च के कर्मचारियों को 12 अक्टूबर के बाद से बार-बार अपराध शाखा के कार्यालय में बुलाया गया और फिर घंटों इंतजार करवाया गया है।

कंपनी का कहना है कि उसके कर्मचारियों को मुंबई पुलिस द्वारा परेशान किया गया, क्योंकि उन्होंने रिपब्लिक टीवी के खिलाफ गलत बयान देने से इनकार कर दिया था। हंसा रिसर्च ने यह भी बताया है कि यह टीआरपी हेरफेर मामले में वे शिकायतकर्ता थे और अब उन्हें ही पुलिस द्वारा परेशान किया जा रहा है।

याचिका में कहा गया, “यह एक अनोखी स्थिति है, जहाँ किसी अपराध में पहले मुखबिर को जाँच एजेंसी द्वारा परेशान किया जा रहा है और एक आरोपित की तरह ट्रीट किया जा रहा। यह पूरी तरह से कानून और कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के खिलाफ है। यह एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है और इसमें माननीय उच्च न्यायालय द्वारा तत्काल हस्तक्षेप किया जाना चाहिए।”

यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि हंसा रिसर्च ने अपने एक कर्मचारी विशाल भंडारी के खिलाफ मामला दायर किया था, जिसने 2 घंटे प्रतिदिन इंडिया टुडे चैनल देखने के लिए BARC पैनल हाउसों को पैसे देने की बात कबूल की थी। यह पैसे उसे चैनल द्वारा भुगतान किया गया था।

हालाँकि, परम बीर सिंह द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान टीआरपी मामले में रिपब्लिक टीवी का नाम लिया गया था, और उन्होंने इंडिया टुडे के नाम का उल्लेख नहीं किया। जिसके बाद हंसा रिसर्च की मूल शिकायत और मामले में पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में देखा गया कि इंडिया टुडे को मामले में कई बार नामित किया गया था जबकि उसमें रिपब्लिक टीवी का नाम नहीं था।

तभी से परम बीर सिंह और सचिन वाजे के नेतृत्व में मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी को फँसाने के लिए उसके खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। चैनल के अधिकारियों और पत्रकारों को रोजाना पुलिस स्टेशन में बुलाया जाता है और उनसे घंटों पूछताछ की जाती है।

अब हंसा रिसर्च का कहना है कि उनके कर्मचारियों को भी उसी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। कुल मिलाकर उन्हें लगभग 200 घंटों तक बिना किसी उचित कारण के हिरासत में रखा गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि याचिकाकर्ताओं और अन्य अधिकारियों को बुलाने और हिरासत में लेने का एकमात्र उद्देश्य उन पर दबाव डालना और उन्हें निराश करना है ताकि वे सचिन वाजे की इच्छा के अनुसार गलत बयान दे सकें।

हंसा रिसर्च का कहना है कि पुलिस और मीडिया उन्हें आपसी हमला करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। जिसका नुकसान उन्हें झेलना पड़ रहा है।

कंपनी का कहना है कि वह यह नहीं कह सकते है कि रिपब्लिक ने बिना किसी फिजिकल डॉक्यूमेंट को दिखाए एक नकली दस्तावेज़ प्रदर्शित किया, क्योंकि टीवी पर जो दिखाया गया था, उससे इसकी प्रामाणिकता निर्धारित करना मुश्किल है। लेकिन इसके बावजूद पुलिस उन्हें यह बयान देने के लिए परेशान कर रही है कि दस्तावेज नकली है।

उन्होंने यह भी कहा है कि वाज़े और क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने झूठे और असत्यापित तथ्यों के आधार पर मीडिया स्टेटमेंट बनाने का अभियान शुरू किया है।

करतारपुर गुरुद्वारे की जिम्मेदारी पहुँची ISI के हाथ: नई संस्था में नहीं है एक भी सिख, भारत ने किया विरोध

पाकिस्तान की इमरान सरकार ने पिछले साल करतारपुर गुरुद्वारे के मुद्दे को खूब भुनाया था। अब इसी मामले पर उनकी नई चाल सामने आई है। सिखों की आस्था के प्रतीक करतारपुर गुरुद्वारे के प्रबंधन का काम काज इमरान सरकार ने एक ऐसी संस्था को सौंपा है जिसका दूर-दूर तक सिख समुदाय से लेना-देना नहीं है बल्कि उसके तार आईएसआई से जुड़े बताए जा रहे हैं।

आजतक की खबर के अनुसार, पाकिस्तान की इमरान सरकार ने करतारपुर के रख रखाव की जिम्मेदारी सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से छीनकर जिस प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ईकाई को सौंपी है, उसकी अगुवाई मो तारिक खान करेंगे और उसके सभी सदस्य Evacuee Trust Property Board (ETPB) से जुड़े हुए हैं। इसे लेकर कहा जाता है कि इस बोर्ड को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई कंट्रोल करती है। इस नई नई संस्था में एक भी सिख नहीं है।

पाकिस्तान द्वारा जारी आदेश

खबर है कि करतारपुर गुरुद्वारे के जरिए पाकिस्तान व्यापार का प्लान बना रहा है। अपने आदेश में उन्होंने प्रोजेक्ट बिजनेस का भी जिक्र किया है। इस खबर के सामने आने के बाद इसका जगह-जगह विरोध हो रहा है। भारत ने इस पर आपत्ति व्यक्त करते हुए अपना बयान जारी किया है।

भारत के विदेश मंत्रालय ने लिखा, ”हमने उन रिपोर्टों को देखा जिनके मुताबिक पाकिस्तान ने पवित्र गुरुद्वारा करतारपुर साहिब का प्रबंधन एवं देखरेख का कार्य अल्पसंख्यक सिख समुदाय की संस्था पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से लेकर एक गैर सिख संस्था इवेक्वी ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड के हाथों दिया जा रहा है।”

आगे बयान में लिखा गया, “पाकिस्तान का यह एकतरफा निर्णय निंदनीय है और करतारपुर साहिब कॉरीडोर खोले जाने की भावना और सिख समुदाय के धार्मिक ख्यालों के विरुद्ध है। ऐसे कदम पाकिस्तानी सरकार और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों एवं कल्याण के लंबे चौड़े दावों की असलियत उजागर करते हैं।”

भारत के विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को कहा है कि वह सिख समुदाय के अधिकारों के हनन करने वाले इस फैसले को वापस ले लें। गुरुद्वारे के प्रबंधंन संबंधी मामलों का प्रबंध करने का अधिकार केवल सिख समुदाय का है।

इसी प्रकार दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान कैबिनेट ने गुरुद्वारा श्री करतारपुर साहिब के प्रबंधन का जिम्मा पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से छीन कर गैर-सिख निकाय ईटीपीबी को सौंपा है। पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई का संगठन ईटीपीबी ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब का नियंत्रण करेगा।”

बिहार के लिए मुझे नीतीश सरकार की जरूरत, डबल इंजन की ताकत विकास को नई ऊँचाई पर पहुँचाएगी: PM मोदी

बिहार विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण का प्रचार गुरुवार (5 नवंबर, 2020) को समाप्त हो गया। आखरी चरण के कुछ क्षण पहले पीएम नरेंद्र मोदी ने बिहारवासियों के नाम पत्र लिखा है। इस पत्र को पीएम मोदी ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है। इस पत्र में उन्होंने बिहार की जनता से एनडीए पर भरोसा करने और एनडीए की बिहार में सरकार बनाने की बात की है।

प्रधानमंत्री ने लिखा, मेरे प्रिय बिहार के भाइयो और बहनों, सादर प्रणाम। आज इस पत्र के माध्यम से आपसे बिहार के विकास, विकास के लिए एनडीए पर विश्वास और विश्वास बनाए रखने के लिए एनडीए के संकल्प के बारे में बात करना चाहता हूँ।

PM मोदी ने कहा कि इस पत्र के माध्यम से वह बिहार के विकास के लिए राजग पर विश्वास और विश्वास बनाए रखने के लिए राजग के संकल्प के बारे में बात करना चाहते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘युवा हों या बुजुर्ग, गरीब हों या किसान, हर वर्ग के लोग जिस प्रकार आशीर्वाद देने के लिए सामने आ रहे हैं, वह एक आधुनिक और नए बिहार की तस्वीर दिखाता है।’’

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’’ के मंत्र पर चलते हुए राजग की सरकार बिहार के गौरवशाली अतीत को फिर स्थापित करने के लिए कटिबद्ध है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि एनडीए के लिए मानव जीवन की गरिमा सर्वोपरि है। हम हर नागरिक को देश की उन्‍नति और प्रगति में भागीदार मानते हैं। पहले देश के विकास में बनावटी बाधांए खड़ी करके रखी गई थीं। जिससे युवाओं, महिलाओं और किसानों के लिए अवसर कम होते गए। लेकिन एनडीए के निरंतर प्रयासों से अब यह‍ स्थिति बदल गई है। एनडीए ने बिहार में बिजली, पानी, सड़क, इलाज, शिक्षा और कानून व्‍यवस्‍था हर क्षेत्र में बहुम काम किया है।

उन्होंने आगे कहा, मूल आवश्‍यकताओं की पूर्ति के बाद अब यह दशक बिहार की आकांक्षाओं की पूर्ति का है। एनडीए का प्रत्‍येक साथी, इन आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए निष्‍ठा के साथ काम करने के लिए तत्‍पर है। बिहार को अभाव से आकांक्षा की ओर ले जाना एनडीए सरकार की बहुत बड़ी उपलब्धि है।

उन्होंने कहा, ‘‘यह हम सब के लिए गर्व का विषय है कि बिहार चुनाव का पूरा फोकस विकास पर केंद्रित रहा। राजग की सरकार ने पिछले वर्षों में जो कार्य किए उसका हमने ना केवल रिपोर्ट कार्ड पेश किया बल्कि जनता जनार्दन के सामने आगे का विजन भी रखा। लोगों को भरोसा है कि बिहार का विकास राजग सरकार ही कर सकती है।’’

पीएम मोदी ने कहा, “हर गरीब को पक्‍का घर देना हो, घर-घर शौचालय बनाना हो, घरों में नल से जल देना हो, बिजली पहुँचानी हो, गैस कनेक्‍शन देना हो, हर गरीब को बैंक से जोड़ना हो, यह सब बिहारवासियों के वोट की ताकत से ही संभव हो पाया है। बिहार की बहनों, बेटियों की अपेक्षाएं और आकांक्षाएँ भी अब निरंतर बढ़ रही हैं। उनको शौचालय की सुविधा मिली तो उनमें सुरक्षा का एहसास आया। उनके नाम से प्रधानमंत्री आवास योजना का घर मिला तो चिंता कम हुई।”

गरीबों के लिए लाई गई योजनाओं के बारे में आगे उन्होंने कहा, “जनधन खाता खुला, मुद्रा योजना से बैंक लोन मिला तो नया आत्‍मविश्‍वास जागा। समाज में आत्‍मविश्‍वास तब और बढ़ता है, जब जन्‍म से लेकर बुढ़ापे तक संपूर्ण सुरक्षा कवच मिले। बीते वर्षों में एडीए ने गर्भावस्‍था से लेकर बुढ़ापे में पेंशन और बीमा तक की सुरक्षा दी है। आज बिहार का गरीब से गरीब परिवार भी गंभीर बीमारी का इलाज देश में कहीं भी मुफ्त में करा पा रहा है।”

उन्होंने कहा कि अव्यवस्था और अराजकता के वातावरण में नव निर्माण असंभव होता है। उन्होंने कहा, ‘‘वर्ष 2005 के बाद से बिहार में माहौल भी बदला और नव निर्माण की प्रक्रिया भी आरंभ हुई। बेहतर संसाधन और कानून का राज सामाजिक और आर्थिक संपन्नता के लिए अनिवार्य है। बिहार को यह दोनों राजग ही दे सकता है।’’

अपनी बात को विराम देते हुए पीएम मोदी ने कहा, “बिहारवासी ‘स्‍वामित्‍व योजना’ का भी बहुत उम्‍मीद के साथ इंतजार कर रहे हैं। इन मजबूत कदमों से आम लोगों का सशक्तिकरण होगा और उन्‍हें गरिमापूर्ण जीवन मिलेगा।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, साथियों, बिहार में वोट पड़ रहा है-
जात-पात पर नहीं, विकास पर
झूठे वादों पर नहीं, पक्‍के इरादों पर
कुशासन पर नहीं, सुशासन पर
भ्रष्‍टाचार पर नहीं, ईमानदारी पर
अवसरवादिता पर नहीं, आत्‍मनिर्भरता के विजन पर

आगे नीतीश सरकार पर भरोसा जताते हुए मोदी ने कहा, ‘‘मैं बिहार के विकास को लेकर बहुत आश्वस्त हूँ। बिहार के विकास में कोई कमी ना आए, विकास की योजनाएँ अटकें नहीं, भटकें नहीं इसलिए मुझे बिहार में नीतीश जी की सरकार की जरूरत है। मुझे विश्वास है कि डबल इंजन की ताकत इस दशक में बिहार को विकास की नई ऊँचाई पर पहुँचाएगी।’’ जय बिहार, जय भारत!’

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण के तहत अब तक 135 सीटों पर मतदान संपन्न हो चुके हैं जबकि तीसरे और अंतिम चरण के तहत शनिवार यानी 7 तारीख को 78 सीटों पर मतदान होने हैं। वोटों की गिनती 10 नवंबर को होगी।