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‘संजुक्ता बासु घिनौना जीव है’ – TimesNow को यह कहने के लिए माँगनी होगी माफी

न्यूज़ ब्रॉडकास्ट स्टैंडर्ड अथॉरिटी (NBSA) ने टाइम्स नाउ को आदेश दिया है कि वह राहुल गाँधी की घनघोर प्रशंसक संजुक्ता से माफ़ी माँगे। इसकी वजह यह है कि टाइम्स नाउ ने संजुक्ता बासु को हिन्दू हेटर (Hindu Hater) कह कर संबोधित किया था और इन दावों का खंडन करने का मौका भी नहीं दिया। 

क्या है मामले की पृष्ठभूमि 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार टाइम्स नाउ ने 6 अप्रैल 2018 में एक कार्यक्रम का प्रसारण किया था, जिसमें संजुक्ता बासु को ‘हिन्दू हेटर’, ‘आर्मी हेटर’, ‘राहुल गाँधी की ट्रोल आर्मी’ और ‘वाइल क्रियेचर’ (घिनौना जीव) जैसे नामों से संबोधित किया था। इस पर संजुक्ता बासु ने आरोप लगाया था कि टाइम्स नाउ ने इस विवाद में उनका नाम बेहद अपमानजनक और अभद्र तरीके से घसीटा है। इसके बाद कॉन्ग्रेस की परम प्रिय संजुक्ता ने यह भी कहा कि इस मामले पर उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर भी नहीं दिया गया। 

संजुक्ता ने कहा, “मेरा ऐसा मानना है कि कार्यक्रम विश्वसनीय नहीं था क्योंकि उसका आधार ही गलत था और उसमें दिए गए तर्क भी बेहद सीमित थे। मिसाल के तौर पर उन्होंने (टाइम्स नाउ) ने खुद यह बात स्वीकार की थी कि 6 अप्रैल 2018 को भाजपा नेता अमित शाह द्वारा किए गए किसी ‘कुत्ते बिल्ली हँसी मज़ाक’ की प्रतिक्रिया में यह कार्यक्रम प्रसारित किया गया था।

संजुक्ता बासु के NBSA में शिकायत दर्ज कराने के 19 महीने के बाद टाइम्स नाउ को यह आदेश दिया गया। इस मामले के संबंध में हो रही सुनवाई पर NBSA की निष्क्रियता को देखते हुए संजुक्ता बासु ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद समूह ने मामले में दखल दिया और टाइम्स नाउ को माफ़ी माँगने का आदेश दिया। 

NBSA का आदेश – सीधे प्रसारण के दौरान माँगी जाए माफ़ी

NBSA ने अपने आदेश कहा है कि 27 अक्टूबर को टाइम्स नाउ संजुक्ता बासु के नाम का बड़े अक्षरों में उल्लेख करते हुए (ऑन एयर) माफ़ी माँगे। 

आदेश में लिखा है, “हम इस बात पर खेद जताते हैं कि 6-04-2018 को टाइम्स नाउ चैनल पर रात 8 बजे प्रसारित किए गए India Upfronr@ और 9 बजे प्रसारित किए गए “The Newshour Debate’@ के संबंध में हमने संजुक्ता बासु की शिकायत का पक्ष शामिल नहीं किया। इसलिए रिपोर्टिंग के दौरान निष्पक्षता और तटस्थता के सिद्धांतों की अवहेलना करने की बात को ध्यान में रखते हुए इस बात पर स्पष्टीकरण देते हैं कि इसका उद्देश्य संजुक्ता बासु का अपमान करना नहीं था।” 

चैनल को इस बात का भी आदेश दिया गया है कि वह एक हफ़्ते के भीतर माफ़ी माँगने के प्रसारण की सीडी भी उपलब्ध कराए। इसके अलावा टाइम्स नाउ को यह आदेश भी दिया गया है कि वह एक हफ़्ते के अंदर अपनी वेबसाइट और यूट्यूब पर मौजूद इस मामले से जुड़े हर अपमानजनक वीडियो लिंक भी हटा दे।

संजुक्ता बासु ने राहुल गाँधी को दिया इस जीत का श्रेय

संजुक्ता बासु ने इस बात के लिए पूरा श्रेय राहुल गाँधी को दिया है। संजुक्ता बासु ने कहा कि राहुल गाँधी से मुलाक़ात के बाद यह लड़ाई शुरू हुई और इस वजह से यह ऐतिहासिक है। 

वह इस बात से उत्साहित थीं कि टाइम्स नाउ द्वारा ‘हिन्दू हेटर’ कहे जाने के बावजूद राहुल गाँधी ने उनसे मुलाक़ात करने में झेंपने की बजाय ट्विटर पर फॉलो बैक किया। 

संजुक्ता बासु के मुताबिक़ पुलवामा भीतर का षड्यंत्र था

पुलवामा में हुए भयावह आतंकवादी हमले के कुछ ही घंटे बाद संजुक्ता बासु ने पाकिस्तान प्रायोजित सीआरपीएफ़ जवानों पर हुए हमले को देश के भीतर की साजिश घोषित किया था। बिना किसी का नाम लिए उनका कहना था कि यह हमला भारतीय जनता पार्टी के निर्देश पर हुआ है। 

राहुल गाँधी भी करते हैं फॉलो 

पिछले साल 2019 के लोकसभा चुनावों में हार के कुछ हफ़्तों बाद राहुल गाँधी ने संजुक्ता बासु को फॉलो किया था। राहुल गाँधी ने ऐसा तब किया था, जब संजुक्ता बासु ने कहा था कि ट्विटर पर सिर्फ उनकी और राहुल गाँधी की बात को अहमियत दी जाती है। 

इस मामले में भी बिना किसी का नाम लिए उन्होंने कहा कि ट्विटर पर ऐसे सिर्फ 2 लोग हैं, जिनकी आवाज़ कुछ महत्वपूर्ण है और इन दोनों को ही चंद्रयान 2 की लॉन्चिंग से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आखिरकार अंतरिक्ष तकनीक के आधुनिकरण से ऐसे दो लोगों को क्यों फर्क पड़ना चाहिए, जिनकी बातों का ट्विटर पर महत्व है।

इसके बाद संजुक्ता ने यहाँ तक कह दिया कि सिर्फ इन दो लोगों को ही देश के भविष्य की चिंता है। इसके बाद उन्होंने खुद ही बताया था कि उन दो लोगों में एक वह खुद हैं और दूसरा आप लोग (नेटिज़न्स/फॉलोअर्स) बताएँ। 

अगले दिन जब उस दूसरे व्यक्ति को कोई नहीं पहचान पाया, तब उन्होंने खुद इस बात की घोषणा कर दी कि ट्विटर पर पूरे दिल से काम करने वाले दूसरे व्यक्ति राहुल गाँधी हैं। इसके बाद संजुक्ता बासु ने कहा कि राहुल गाँधी ने शीला दीक्षित ने निधन पर ट्वीट किया, कश्मीर को लेकर ट्रंप के बयान का पर ट्वीट किया, इन दोनों बातों को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया था। 

इतना ही नहीं राहुल गाँधी के इस्तीफ़े ने संजुक्ता बासु की आँख में आँसू ला दिए थे। 

संजुक्ता बासु इतनी अवसादग्रस्त को गई थीं कि उन्होंने देश को ही ‘गुडबाय/अलविदा’ कह दिया था। हालाँकि फ़िलहाल वह भारत में ही रह रही हैं।         

ससुर-नौकर से Sex करती है ब्राह्मण परिवार की बहू: ‘Mirzapur 2’ में श्रीकृष्ण की कथाएँ हैं ‘फ़िल्मी बातें’

‘अमेज़न प्राइम वीडियोज’ ने बृहस्पतिवार (अक्टूबर 22, 2020) को अपनी बहुचर्चित वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ का दूसरा सीजन 10 एपिसोड्स के साथ लाइव कर दिया। इसे तय समय से 3 घंटे पहले ही लाइव किया गया। इसमें अली फजल और दिव्येंदु शर्मा मुख्य किरदारों में हैं लेकिन दूसरे सीजन को कालीन भइया यानी, पंकज त्रिपाठी के नाम पर ही बेचा गया। सीजन-2 में विजय वर्मा को 2 जुड़वाँ किरदारों के रूप में एंट्री दी है है, जो ‘बिहार के गुंडे’ होते हैं।

अब सीधा पॉइंट पर आते हैं। अली फजल ने किस कदर दिल्ली के दंगाइयों का समर्थन किया था और हिन्दुओं की लाशों में अपने लिए ‘मजा’ ढूँढा था, ये तो सभी को पता है। दिव्येंदु शर्मा ने विरोध को दरकिनार करते हुए दावा किया था कि इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। वहीं, इस शो के निर्माताओं में से एक फरहान अख्तर, जो बिना कुछ जाने-समझे CAA विरोधी रैलियों में जाते थे, उनसे हिन्दुओं की भावनाओं के सम्मान की अपेक्षा ही बेमानी है।

पहले सीजन की तरह ‘मिर्जापुर’ का दूसरा सीजन भी गालियों से भरा पड़ा है, जहाँ गालियाँ न सिर्फ गुस्से में दी जाती है, बल्कि ये भी दिखाया गया है कि यूपी-बिहार के युवक आपस में बातचीत करते हुए मजाक में भी एक-दूसरे के माँ-बाप और परिवार को माँ-बहन की गालियाँ बकते हैं। अश्लीलता के प्रदर्शन में भी कोई कमी नहीं रखी गई है। हाँ, ‘वफादार’ मुस्लिम किरदारों का महिमामंडन ज़रूर जारी रखा गया है।

‘मिर्जापुर’ के दूसरे सीजन के पहले ही एपिसोड में एक दृश्य आता है, जहाँ मुन्ना त्रिपाठी किसी तरह बच कर अपने घर में ही बिस्तर पर पड़ा होता है और उसका इलाज चल रहा होता है। उसके पिता अखंडानंद त्रिपाठी उर्फ़ ‘कालीन भइया’ उसकी ‘लम्बी उम्र’ के लिए पूजा रखवाते हैं। वैसे भी बॉलीवुड में पूजा करते हुए उन्हीं लोगों को दिखाया जाता है, जो या तो एकदम ‘डम्ब’ होते हैं, या फिर पुराने ख़यालात वाले होते हैं।

इसमें भी ऐसा ही होता है। पूजा वाले दृश्य में मुन्ना त्रिपाठी पूजा-अर्चना की प्रक्रिया में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहा है, क्योंकि वो ‘कूल’ है और ‘नए जमाने’ का है। इतना ही नहीं, वो पंडित की तरफ हिकारत भरी नजरों से भी देखता नज़र आता है। यहाँ पूजा कराने वाले पंडित का जो चित्रण किया गया है, वो बॉलीवुड की दशकों पुरानी प्रथा का निर्वहन है, जिसके हिसाब से ब्राह्मण चुगलखोर, लालची और रूढ़िवादी होता है।

सामने पंडित की बैठ कर प्लेट में खीर खाते हुए ‘सुर्र-सुर्र’ की आवाज़ कर रहे होते हैं। पूरे दृश्य में एक एक ही अनाड़ी बैठा हुआ है और वो है ब्राह्मण, जिसका किरदार पंडित शिवेश शर्मा ने निभाया है। अचानक से मुन्ना त्रिपाठी को गुस्सा आता है और वो कहता है, “हो गया आपका? क्या इतनी देर से सुर्र-सुर्र करने में लगे हुए हैं। बाल्टी मँगवा दें? खा लीजिएगा उसमें।” इसके बाद मुन्ना धोती पहने हुए पंडित को वहाँ से भगा देता है।

यह एक दृश्य ये बताने को काफी है कि ब्राह्मणों को लेकर बॉलीवुड का नजरिया अभी भी वहीं का वहीं है। धोती पहने एक अनाड़ी सा आदमी, जिसे पूर्व-पश्चिम कुछ भी पता नहीं, एक जोकर और एक लालची इंसान – पंडितों को इसी तरह से दिखाया जाता रहा है और इसमें भी ऐसा ही किया गया है। एक और दृश्य ऐसा आता है, जहाँ ‘कालीन भइया’ के बूढ़े पिता और ‘भूतपूर्व गैंगस्टर’ सत्यानंद त्रिपाठी जाति-प्रथा को लेकर ज्ञान देते हैं।

बूढ़े त्रिपाठी का ‘दिव्य ज्ञान’ ये है कि जाति-प्रथा बनाई ही इसीलिए गई थी, ताकि सत्ता ब्राह्मणों के हाथ में रहे। ऐसे डायलॉग्स जानबूझ कर लिखे जाते हैं, जिसके पीछे न तो कोई ऐतिहासिक तर्क होता है और न ही कोई रिसर्च। ऐसे डायलॉग्स के जरिए समाज के एक वर्ग को ये एहसास दिलाया जाता है कि देखो, कैसे ब्राह्मणों ने तुम्हारा सैकड़ों सालों से शोषण किया है। इसी बात को यहाँ त्रिपाठी परिवार के सबसे वृद्ध सदस्य से बुलवाने की कोशिश हुई है।

एक और दृश्य है एपिसोड-6 में, जहाँ हर तरह के अवैध और उटपटांग कारनामों में लिप्त ‘रॉबिन’ अपनी गर्लफ्रेंड और गुड्डू पंडित की बहन डिम्पी को अपना असली नाम बताता है – राधेश्याम अग्रवाल। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण के बारे में भी ‘चर्चा’ होती है। वो समझाता है कि अंग्रेजी नाम होने पर जनता ज्यादा भरोसा करती है। फिर डिम्पी उसे बताती है कि ये नाम उस पर सूट करता है, क्योंकि वो ‘रंगीन’ है। रंग की बात आते हैं राधेश्याम कहता है, “भगवान कृष्ण के भी वैसे काफी रंग थे। लेकिन, प्रेम उनका एक से ही था।

यहाँ डिम्पी ‘फ़िल्मी बातें’ करने के लिए उस पर तंज कसती है और पढ़ाई करने लगती है। अर्थात, इनके लिए महाभारत और रामायण ‘फ़िल्मी बातें’ हैं। जो हिन्दुओं का इतिहास है, जो हमारी प्राचीन गाथाएँ हैं, उनके लिए इनके मन में यही भावना है कि वो फिल्मों के जैसे ही हैं। जहाँ भी कृष्ण की चर्चा होती है, केवल ‘रासलीला’ को गलत सन्दर्भ में पेश कर के इसी तरह से रंग और रंगीनियत की बातें की जाती हैं।

साथ ही महिलाओं का हर लिहाज से इसमें अपमान किया गया है। एक ब्राह्मण परिवार में एक महिला का अपने ससुर के साथ सम्बन्ध होता है और नौकर के साथ सम्बन्ध होता है। जब घर में नई बहू आती है तो ससुर की उस पर गलत नजर होती है। वेश्याओं को ‘विधवाओं के गेटअप’ में लाया जाता है और फिर वो कपड़े खोल कर नाचने लगती हैं। फिर ऐसे ही सीरीज बनाने वाले लोग महिला अधिकारों के झंडाबरदार भी बनते हैं।

वहीं, जो किरदार मुस्लिम है, वो अपने उसूलों का पक्का है। मकबूल त्रिपाठी खानदान का वफादार है और चाहे कुछ भी हो जाए, वो तब तक अपमान का घूँट पीता रहता है जब तक त्रिपाठी उसकी अम्मी को नहीं मार डालते। लाला भी मुस्लिम हैं, लेकिन वो खुद को व्यापारी बताता है और गुंडे-बदमाशों से दूर रहने की बातें करता है। जब कोई गवाह गोलीकांड पर बयान देने को राजी नहीं होता, तो बूढ़ा इमरान ही क़ानून का सहायक बन कर सामने आता है, सबसे हिम्मती वही है।

देखा जाए तो सीजन-1 में जो हिन्दू-विरोधी प्रोपेगंडा की नींव खड़ी की गई थी, सीजन-2 में उस पर एक कमरा बना दिया गया है। ब्राह्मण परिवारों में महिलाओं का आदर नहीं होता है, ये दिखाने का प्रयास किया गया है। त्रिपाठी, शुक्ला और पंडित सरनेम वाले तो पहले से ही गुंडे-बदमाश थे, अब बिहार के त्यागी को लाया गया है। यानी, चारों के चारों गुंडे घराने ब्राह्मण ही हैं। और अच्छा है तो सिर्फ इमरान, मकबूल और लाला।

निजाम व अंग्रेजों से लड़ने वाले योद्धा कोमाराम भीम को फिल्म में पहनाई मुस्लिम ‘स्कल कैप’, आदिवासियों ने किया विरोध

‘बाहुबली’ फिल्म सीरीज से लोकप्रियता बटोरने वाले निर्देशक एसएस राजामौली की अगली फिल्म ‘RRR’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। भारत में ब्रिटिश शासन के दौर में आदिवासी योद्धाओं पे आधारित इस फिल्म में रामचरण तेजा और जूनियर एनटीआर प्रमुख भूमिकाओं में हैं। फिल्म में जूनियर एनटीआर कोमाराम भीम का किरदार निभा रहे हैं, जिन्होंने ‘जल, जंगल और जमीन’ का नारा देते हुए निजाम व उसकी फ़ौज से लोहा लिया है। उन्हें स्कल कैप पहले दिखाया गया है।

कोमाराम भीम ने हैदराबाद को निजाम की सत्ता से आज़ादी दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी थी, लेकिन फिल्म में उन्हें ही इस्लामी ‘स्कल कैप’ पहने हुए दिखाया गया है। लोगों ने इस पर आपत्ति जताई है कि आदिवासी योद्धा कोमाराम भीम ने जिन इस्लामी आक्रांताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उन्हें इस्लामी स्कल कैप में कैसे दिखाया जा सकता है? गुरिल्ला युद्ध कला के धनी भीम ने निजाम राज के जमींदारों के अत्याचार के विरुद्ध हथियार उठाया था।

आदिवासी युवाओं ने शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को आदिलाबाद जिले के उदनूर में गोंड योद्धा कोमाराम भीम की प्रतिमा का अभिषेक किया। वे इस बात से नाराज हैं कि भीम के किरदार को निभाने वाले जूनियर एनटीआर को ‘RRR’ के टीज़र में स्कल कैप में दिखाया गया है। आदिवासी संगठनों का कहना है कि एसएस राजामौली को इतिहास की समझ के साथ फिल्म बनानी चाहिए। उन्होंने चेताया है कि अगर इस्लामी टोपी नहीं हटाई गई तो वो आंदोलन करेंगे।

इसी तरह से उनकी फिल्म ‘बाहुबली’ में भी आदिवासियों के अपमान को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ था। आदिलाबाद के आदिवासी संगठनों का कहना है कि कोमाराम भीम पर फिल्म बनने से उनकी कहानी ज्यादा लोगों तक पहुँचेगी, लेकिन इस तरह से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। 20 साल पहले भी उन पर फिल्म बन चुकी है। इस फिल्म में भीम के अलावा अल्लुरी सीताराम राजू की भी कहानी दिखाई गई है।

वहीं सोशल मीडिया पर इतिहास को लेकर ट्वीट करने वाले ‘ट्रू इंडोलॉजी’ ने लिखा कि कोमाराम भीम की बेटी का ही निजाम के तालुकदार अब्दुल सत्तार ने अपहरण कर लिया था और जबरन इस्लामी धर्मान्तरण करा दिया था। उसने पूछा कि 400 करोड़ रुपए के भारी बजट में बनाई जा रही फिल्म में ऐसा झूठ क्यों दिखाया जा रहा है? साथ ही कहा कि असलियत में ऐसा कभी नहीं हुआ है कि भीम ने इस्लाम का अनुसरण किया हो।

बता दें कि हैदराबाद सल्तनत ने सन 1799 में टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ लड़ाई में ईस्ट इंडिया कम्पनी की मदद की थी। इसके बदले में अंग्रेजों ने निज़ाम को टीपू के राज्य का एक टुकड़ा दिया। टीपू सुल्तान की अंग्रेजों के हाथों हार हुई और वह मारा गया। मराठों के ख़िलाफ़ युद्ध में भी हैदराबाद के निज़ाम ने अंग्रेजों का साथ दिया और बदले में सिंधिया के राज्य सहित कई मराठा जिले उसे इनाम के रूप में मिले। मीर अली उस्मान ख़ान बहादुर हैदराबाद का अंतिम निज़ाम था।

वसीम खान ने माता की झाँकी देखने मंदिर गई 3 साल की बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर ऑटो में किया बलात्कार

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ऑटो चालक वसीम खान ने मंदिर में खेल रही पड़ोस में रहने वाली 3 साल की बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर अपने ऑटो में बिठाकर बलात्कार किया। बच्ची जब घर पहुँची तब वह दर्द की वजह से रोने लगी और फिर उसने अपनी दादी को वसीम की हैवानियत की पूरी बात बताई।

दुष्कर्म की घटना को अंजाम देने वाले वसीम खान (32) को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। घटना ग्वालियर शहर के अंतर्गत आने वाले सेवानगर क्षेत्र की है। इस मामले के सामने आने के बाद पूरे क्षेत्र में तनाव बरकरार है।

उपनगर ग्वालियर के सेवानगर क्षेत्र में रहने वाले बच्ची के 30 वर्षीय पिता एक निजी संस्था में कर्मचारी हैं, उनका पूरा परिवार उनके साथ ही रहता है। पीड़ित बच्ची शुक्रवार (अक्टूबर 23, 2020) की रात लगभग 8:40 बजे पड़ोस में रहने वाले बच्चों के साथ माता की झाँकी देखने के लिए गई थी। वहाँ से वापसी के दौरान रास्ते में उसे वसीम खान मिला और वह बच्ची को चॉकलेट का लालच देकर अपने साथ ले गया। इसके बाद बच्ची को ऑटो की पिछली सीट पर बैठा कर उसके साथ बलात्कार किया। जब बच्ची ने भागने का प्रयास किया तब वसीम ने मासूम का मुँह दबा कर उसके साथ ज़्यादती की।   

इसके बाद बच्ची रोते हुए अपने घर आई, वहाँ उसकी दादी बैठी हुई थीं। बच्ची अपनी दादी से लिपटकर रोने लगी। बच्ची के कपड़ों पर खून लगा हुआ था। इसके बाद उसने घरवालों को पूरी आपबीती सुनाई। पूरी बात सामने आने के बाद पड़ोस के तमाम लोग वहाँ इकट्ठा हो गए। बच्ची के परिजन उसे लेकर आरोपित वसीम खान के घर पहुँचे लेकिन वह मौके से फरार हो चुका था। आरोपित वसीम ने छिपने का प्रयास किया पर लोगों ने उसे खोज लिया और जमकर पीटा। 

पुलिस ने ऑटो स्टैंड पर पहुँच कर वसीम को गिरफ्तार कर लिया। इसके अलावा पुलिस ने वसीम पर पॉक्सो एक्ट (POCSO- यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम) के तहत मामला भी दर्ज कर लिया है। मामला दो सम्प्रदायों से जुड़ा हुआ है इस बात को मद्देनज़र रखते हुए क्षेत्र में पुलिसबल तैनात कर दिया गया है। घटना की रात मौके पर एसपी अमित सांघी भी पहुँच गए थे।

महाष्टमी की पूजा के बाद माँ दुर्गा के मंदिर में तोड़फोड़, प्रतिमाएँ विखंडित की: Pak के हिन्दू बहुल इलाके में भी सुरक्षित नहीं हिन्दू

जहाँ एक तरफ पूरी दुनिया में हिन्दू नवरात्र का पर्व मना रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में माँ दुर्गा की प्रतिमा को ही विखंडित कर दिया गया। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के नगरपारकर स्थित में माँ दुर्गा के प्राचीन मंदिर में जम कर तोड़फोड़ की गई और साथ ही प्रतिमा को भी विखंडित कर दिया गया। पाकिस्तान की पत्रकार नायला इनायत ने सोशल मीडिया के जरिए विखंडित प्रतिमाओं की तस्वीरें शेयर की।

उन्होंने असामाजिक तत्वों की करतूतों के बारे में बताया। नायला ने लिखा कि हिन्दू समुदाय द्वारा वहाँ पर नवरात्र की पूजा किए जाने के बाद ये घटना हुई। तस्वीरों में देखा जा सकता है कि माँ दुर्गा की प्रतिमा के मस्तक को ही तोड़ कर अलग कर दिया गया है। साथ ही उनके वाहन शेर की मूर्ति के साथ भी तोड़फोड़ मचाई गई है। पाकिस्तान का हिन्दू समुदाय वहाँ के इस्लामी कट्टरपंथियों के भय के साए में जीता आ रहा है।

हालाँकि, सिंध पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि उन्हें इस घटना की सूचना मिली है और वो दोषियों की गिरफ़्तारी के लिए प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि जाँच के दौरान उन्हें कुछ इनपुट्स भी मिले हैं। ये घटना महाष्टमी के दिन हुई, जिसे दुर्गा पूजा के 9 दिन में सबसे पवित्र माना जाता है और इस दिन माँ महागौरी की पूजा की जाती है। स्थानीय पुलिस से हिन्दू समुदाय नाराज़ है और दोषियों की जल्द गिरफ़्तारी की माँग की गई है।

ये मंदिर थारपारकर जिले में स्थित है। पाकिस्तान के सिंध प्रांत के मुख्यमंत्री के स्पेशल असिस्टेंट पूंजो भील ने इस घटना पर दुःख जताते हुए कहा कि उन्होंने एसएसपी से बात की है। भील ने थारपारकर को मोहब्बत, अमन और भाईचारे की भूमि बताते हुए कहा कि यहाँ के सह-अस्तित्व को इस घटना के द्वारा चुनौती दी जा रही है। भारत और पाकिस्तान के कई अन्य हिन्दुओं ने सोशल मीडिया पर विरोध जताया।

थारपारकर के बारे में बता दें कि इस क्षेत्र में हिन्दू बहुसंख्यक हैं। क्षेत्र की 1.5 लाख की जनसंख्या में से 90,000 हिन्दू समुदाय से आते हैं। यहाँ प्राचीन काल में भी हिन्दुओं की बसावट रही है और आज भी इसे प्रमाण मिलते हैं। ऐतिहासिक जैन मंदिर यहाँ स्थित है। इसके अलावा चूडियो जबल दुर्गा माता मंदिर भी खासा लोकप्रिय है। यहाँ सदियों से जैन और हिन्दू समुदाय के लोग रहते आ रहे हैं, लेकिन अब इस्लामी मुल्क में उनके लिए खतरा पैदा हो गया है।

इससे पहले पाकिस्तान के सिंध के बदीन ज़िला स्थित कड़ियू घनौर शहर में अक्टूबर 10, 2020 को एक हिन्दू मंदिर में तोड़फोड़ की घटना सामने आई थी। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में मोहम्मद इस्माइल शैदी नाम के एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था। इस्माइल ने मंदिर में रखी मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया था और फिर मौके से फरार हो गया था। पाकिस्तान में आए दिन ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं।

शिवहर: जिस दिन एक कैंडिडेट को गोलियों से भून दिया गया, उसी दिन हमने क्या देखा…

शिवहर बिहार का सबसे छोटा जिला है। पिछड़ा भी। बाढ़ से प्रभावित भी। पूर्वी चंपारण के ढाका से शिवहर की ओर जाने वाली सड़क बागमती के किनारे-किनारे बेहद उबड़-खाबड़ है। या यूँ कहें कि बाढ़ से हुई तबाही के बाद चलने लायक जुगाड़ कर दिया गया है। इस सड़क पर हमारी कार ने जितने हिचकोले खाए, उससे कहीं ज्यादा शिवहर की चुनावी राजनीति हमें हिचकोले खाते दिखी। इकलौते विधानसभा वाले इस जिला में मुकाबला मुकाबला चतुष्कोणीय है। शिवहर विधानसभा के लिए दूसरे चरण में 3 नवंबर को मतदान होना है।

हालाँकि चतुष्कोणीय मुकाबले में श्रीनारायण सिंह नहीं थे, जिनकी शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को हत्या कर दी गई। उन्हें जनसंपर्क के दौरान गोलियों से भून दिया गया था। श्रीनारायण सिंह जिस नयागाँव के रहने वाले थे, हम कल वहाँ से गुजरे भी थे।

श्रीनारायण सिंह राजद के ही नेता थे। टिकट के दावेदार भी। लेकिन टिकट आखिर समय में पार्टी में शामिल हुए चेतन आनंद को मिला। इसकी वजह से पार्टी में बगावत हो गई। रंजन यादव की पार्टी जनता दल राष्ट्रवादी से श्रीनारायण सिंह मैदान में उतर गए।

इसी तरह बसपा के टिकट पर लड़ रहे संजीव गुप्ता भी राजद से टिकट चाहते थे। इस सीट से उनके पिता सत्यनारायण प्रसाद और भाई संजय गुप्ता विधायक भी रह चुके हैं। संजय गुप्ता को राजद ने बेलसंड से उम्मीदवार बनाया है। लेकिन संजीव को चुनाव नहीं लड़ने से वह नहीं मना पाई। चतुष्कोणीय मुकाबले का एक कोण संजीव भी हैं। संजीव जिस वैश्य समाज से आते हैं, उनके मतदाता इस सीट पर प्रभावी हैं।

राजद में बगावत के कई कोण होने के बावजूद चेतन आनंद की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। इसका कारण जदयू के निवर्तमान विधायक शरफुद्दीन और नीतीश कुमार से लोगों की नाराजगी है। शरफुद्दीन के गाँव से हमने एक रिपोर्ट भी की है, जिसे आप जल्द ऑपइंडिया पर पढ़ पाएँगे।

शरफुद्दीन के गाँव के मोहम्मद वामिक भी चुनाव लड़ रहे हैं। मोहम्मद वामिक का भी क्षेत्र में खासा प्रभाव है। विधायक पर हमले के आरोप में हाल तक जेल में बंद रहे वामिक, पप्पू यादव की पार्टी से मैदान में हैं। दोनों का घर अगल-बगल ही है और इस गाँव में तनाव पसरा हुआ है। लोग बात करने को तैयार नहीं होते। हम दोनों उम्मीदवारों के दरवाजे तक भी गए थे। पर लोगों ने हाथ जोड़ लिए और कहा कि आप गाँव की दूसरी तरफ चले जाइए। इधर माहौल ठीक नहीं है।

इन चार के अलावा श्रीनारायण सिंह जैसे कुछ और भी हैं, जिनको मिलने वाले वोट नतीजे तय करने में निर्णायक होंगे। असल में इस सीट पर राजद की स्पष्ट दिख रही जीत में राजद के बागी हो रोड़े हैं। राजद के एक स्थानीय नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, “चेतन जी के पक्ष में माहौल ठीक है। पर धीरे-धीरे कार्यकर्ता टूट रहा है। अभी चुनाव में काफी टाइम है। इसको ठीक नहीं किए तो मामला गड़बड़ा सकता है।”

हमने चेतन आनंद से संपर्क करने की कई बार कोशिश की पर बात नहीं हो सकी। बता दूँ कि चेतन आनंद, पूर्व सांसद आनंद मोहन के बेटे हैं। वैसे जिला पार्षद, मुखिया और राजद ​जिला उपाध्यक्ष रहे नारायण सिंह का भी जरायम की दुनिया से संबंध रहा है।

बिहार में NDA बनाएगी सरकार, BJP जीत सकती है अधिकतम सीटें: ABP-CVoter ओपिनियन पोल के नतीजे

बिहार विधानसभा चुनाव के मतदान की तारीख नजदीक आते ही सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपना पूरा जोर झोक दिया है। एक तरफ जहाँ प्रचार में तेजी देखने को मिल रही वहीं दूसरी ओर राजनेताओं के बड़े-बड़े वादे भी सामने आ रहे है। इसी बीच, बिहार विधानसभा चुनाव के लिए ABP-CVoter ने अपना ओपिनियन पोल जारी किया है। बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर हुए ओपिनियन पोल में नीतीश कुमार की अगुवाई वाला NDA 135-159 सीट से सबसे आगे नजर आ रहा है जबकि BJP इस चुनाव में सर्वाधिक सीट जीतने वाली पार्टी बन सकती है।

बिहार में पहले चरण में 28 अक्टूबर को 71 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। बता दें कि महागठबंधन का मुकाबला जेडीयू-भाजपा से है। आरजेडी के नेतृत्व वाले महागठबंधन में कॉन्ग्रेस और वामपंथी दल साथी हैं।

बिहार चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राहुल गाँधी भी उतर चुके हैं। एलजेपी के चिराग पासवान अकेले चुनावी समर में उतरे हैं। पहले चरण वोटिंग से पहले एबीपी न्यूज-सी वोटर सर्वे के मुताबिक नीतीश-भाजपा के खाते में 135-159 सीट, राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन को 77-98 सीट और एलजेपी को 1-5 सीट मिल सकती हैं, वहीं अन्य के खाते में 4 से 8 सीटें जा सकती हैं।

कुल 243 सीटों पर वोट प्रतिशत की बात करें तो NDA को 43% वोट मिल सकते हैं, महागठबंधन को 35% वोट मिल सकते हैं, चिराग पासवान की LJP को 4% और अन्य खातों में 18% वोट मिल रहे हैं।

गौरतलब है कि सर्वे के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी। भाजपा को 73 से 81 सीटें मिल सकती हैं, जबकि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली पार्टी जदयू को 59 से 67 सीटें मिल सकती हैं। वहीं विकासशील इन्सान पार्टी (VIP) को 3 से 7 सीटें मिल सकती हैं और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (HAM) को 0 से 4 सीटों के बीच कुछ भी मिल सकता है। दूसरी ओर राजद को महागठबंधन में 56-64 सीटें मिल सकती हैं, जबकि कॉन्ग्रेस को 12-20 सीटें मिल सकती हैं। ओपिनियन पोल के मुताबिक वामदल 9-14 सीटें में सिमटती नजर आ रही है।

एबीपी न्यूज सी वोटर के सर्वे में यह देखने को मिला कि 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे नीतीश कुमार से नाराज हैं और मुख्यमंत्री को बदलना चाहते हैं। 26% लोगों ने नीतीश कुमार से नाराजगी के बाद भी उन पर भरोसा जताया है। सिर्फ 14% लोग ऐसे हैं जो न नाराज हैं और न ही नीतीश को बदलना चाहते हैं।

सर्वे के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री के लिए लोगों से उनकी पहली पसंद के बारे में राय माँगी गई थी। जिस पर लोगों ने पिछले 15 वर्षों से राज्य में शासन कर रहे नीतीश कुमार पर 30 %, तेजस्वी यादव पर 20 %, चिराग पासवान पर 14% तो मौजूदा डिप्टी सीएम और भाजपा नेता सुशील मोदी पर 10% लोगों ने भरोसा जताया। यानी चेहरों की लड़ाई में नीतीश कुमार अपने बाकी सभी प्रतिद्वंदियों से कई कदम आगे खड़े हैं।

गुपकार गठबंधन के लीडर बने फारूक अब्दुल्ला: 370 की बहाली के लिए महबूबा, सज्जाद के साथ मिलकर खाई कसम

जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, पूर्व अलगाववादी और राजनेता सज्जाद लोन और कुछ अन्य लोगों ने एकजुट होकर ‘पीपल्स एलायंस फ़ॉर गुपकार डिक्लेरेशन’ का गठन किया है। गुपकार गठबंधन का उद्देश्य कथित तौर पर अनुच्छेद 370 और 35A की बहाली के साथ ही जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाने का है।

‘पीपुल्स अलायंस फॉर गुपकार डिक्लेरेशन’ ने डॉ फारूक अब्दुल्ला को अपना अध्यक्ष और महबूबा मुफ्ती को 6 पार्टी समूह का उपाध्यक्ष घोषित किया है। यह निर्णय पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के गुपकार रोड पर स्थित निवास पर आयोजित अलायंस में शामिल घाटी के शीर्ष नेताओं की दो घंटे तक चली बैठक में लिया गया।

वहीं, सज्जाद लोन को गठबंधन का प्रवक्ता बनाया गया है। उन्होंने अलायंस के प्रवक्ता की जिम्मेदारी सँभालते हुए अधिकारिक तौर पर पत्रकारों के समक्ष अलायंस के नवनियुक्त पदाधिकारियों के नामों की घोषणा की। गठबंधन ने जम्मू-कश्मीर राज्य के पुराने झंडे को अपना प्रतीक माना है।

6 दलों के समूह से बना ‘गुपकार गठबंधन’ 

6 दलों – राष्ट्रीय सम्मेलन (नेकां), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), पीपुल्स सम्मेलन (पीसी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी (सीपीआई-एम), पीपुल्स मूवमेंट (पीएम) और अवध नेशनल कॉन्फ्रेंस (एएनसी) – इस महीने की शुरुआत में एक साथ आए थे ताकि गठबंधन का गठन किया जा सके और राज्य की विशेष स्थिति की बहाली के लिए शांति से काम किया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र के लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने की कसम खाई।

नया प्रभार सँभालने के बाद पत्रकारों से बात करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने एलायंस के उद्देश्य को उजागर करते हुए कहा, “हम भाजपा के विरोधी हैं और इसका मतलब ये नहीं है कि राष्ट्र विरोधी हैं। यह राष्ट्र विरोधी जमात नहीं है। हमारा मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोगों का अधिकार बहाल हो।”

बता दें कि महबूबा मुफ्ती के 13 अक्टूबर को नजरबंदी से रिहाई के बाद इसी माह 15 को फारूक के घर पर 6 दलों की पहली बैठक हुई थी। जिसमें महबूबा मुफ्ती ने भी भाग लिया गया था। उस दिन फारूक की तरफ से कहा गया था कि कुछ दिनों में बैठक करके आगे की रणनीति बनाई जाएगी।

उन्होंने कहा था, “जम्मू कश्मीर और लद्दाख से जो कुछ छीन लिया गया है, उसकी बहाली के लिए हम संघर्ष करेंगे। हमारी एक संवैधानिक लड़ाई है, हम चाहते हैं कि भारत सरकार 5 अगस्त, 2019 से पहले के राज्य के लोगों के अधिकारों को वापस करे।” उसके बाद शनिवार को बैठक हुई।

महबूबा मुफ्ती ने J&K के अलावा दूसरा झंडा उठाने से किया इनकार 

महबूबा मुफ्ती ने शुक्रवार (अक्टूबर 23, 2020) को श्रीनगर में अपने आवास पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि जब तक उनका झंडा (जम्मू कश्मीर का पुराना झंडा) वापस नहीं मिल जाता, तब तक वह दूसरा झंडा (तिरंगा) नहीं उठाएँगी। मुफ्ती ने कहा कि उनका झंडा डाकुओं ने ले लिया है।

14 महीने तक हिरासत में रहने के बाद हाल ही में रिहा हुई महबूबा मुफ्ती ने कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों से बात करते हुए कहा था, “जब तक केंद्र सरकार हमारे हक (अनुच्छेद 370) को वापस नहीं करते हैं, तब तक मुझे कोई भी चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं है।” उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करने तक उनका संघर्ष खत्म नहीं होगा। वह कश्मीर को पुराना दर्जा दिलवाने के लिए जमीन आसमान एक कर देंगी।

‘कश्मीरी चाहते हैं कि भारत पर चीन शासन करे’

वहीं ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस’ के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि चीन ने कभी भी अनुच्छेद 370 को लेकर भारत सरकार के फैसले को स्वीकार नहीं किया है। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि चीन की मदद से फिर से अनुच्छेद 370 को वापस लाया जा सकेगा।

उन्होंने वामपंथी साइट ‘द वायर’ को दिए इंटरव्यू में कहा था, “पिछले साल 5 अगस्त को उन्होंने (मोदी सरकार ने) जो किया, वह भारत के ताबूत में आखिरी कील था। आज जब चीन हमारी तरफ बढ़ रहा है, कश्मीरी लोग चाहते हैं कि वो भारत में घुस जाएँ जबकि उन्हें पता है कि चीन ने मुस्लिमों के साथ क्या किया है, फिर भी वो चीन में जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम मुस्लिम बहुमत वाले राज्य थे, फिर भी हम पाकिस्तान नहीं गए। हम गाँधी के भारत में रहे, हमें मोदी का भारत नहीं चाहिए।” अब्दुल्ला ने कहा कि धारा 144 हटने के बाद लाखों कश्मीरी मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ भविष्य में सड़कों पर उतरेंगे।

गौरतलब है कि भाजपा सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 को रद्द करने के फैसले के बाद से ही विरोधी दल इस कदम के खिलाफ लगातार द्वेषपूर्ण अभियान चला रहे हैं। बता दें कि अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता था, जो कि अब केंद्र शासित प्रदेश बन गया है। 

दाढ़ी कटाकर ड्यूटी पर ‘चकाचक’ होकर लौटे सब इंस्पेक्टर इंतसार अली, एसपी ने लिया सस्पेंशन वापस

बिना अनुमति दाढ़ी रखने पर निलंबित किए गए दारोगा इंतसार अली ने आखिरकार अपनी दाढ़ी कटवा ली है। दाढ़ी कटवाने के बाद शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को वह एसपी बागपत के समक्ष पेश हुए, जिसके बाद एसपी अभिषेक सिंह ने उनका निलंबन वापस लेते हुए उन्हें बहाल कर दिया। पुलिस के यूनिफॉर्म कोड को लेकर अनुशासनहीनता बरतने पर उनको निलंबित कर दिया गया था। 

बागपत पुलिस द्वारा इसकी जानकारी देते हुए ट्विटर पर लिखा गया, ‘‘दाढ़ी काटकर निर्देशों का पालन करने के उपरान्त उपनिरीक्षक इंतसार अली को पुलिस अधीक्षक बागपत द्वारा निलंबन से बहाल किया गया।”

मामले में सब इंस्पेक्टर इंतसार अली ने भविष्य में पुलिस विभाग के निर्देशों का पालन करने का आश्वासन दिया। उन्होंने पुलिस अधीक्षक के सामने बहाल करने के लिए प्रत्यावेदन दिया, इस पर उन्हें बहाल कर दिया गया।

बागपत के एसपी अभिषेक सिंह के अनुसार, “इंतसार अली एक आवेदन पत्र के साथ आया था जिसमें कहा गया था कि उसने गलती की है और अब उसने आदेशों का पालन किया है। वह क्लीन शेव था और मैंने उसे तुरंत बहाल कर दिया।”

बागपत के रमाला थाने में तैनात सब इंस्पेक्टर इंतसार अली को 20 अक्टूबर को

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के बागपत जिला स्थित रमाला थाने में इंतसार अली बतौर सब इंस्पेक्टर (एसआई) तैनात थे। उन्होंने बिना अनुमति पिछले कुछ समय से लंबी दाढ़ी रखी हुई थी नतीजतन उन्हें पुलिस अधीक्षक ने निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद उन्हें पुलिस लाइन भेज दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उन्हें कई बार दाढ़ी रखने के लिए विभाग से अनुमति लेने का आदेश दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने बिना किसी भी तरह की अनुमति लिए पिछले काफी समय से दाढ़ी रखी थी।    

एसपी अभिषेक सिंह ने कहा था कि पुलिस में सिर्फ सिख समुदाय को ही दाढ़ी रखने की अनुमति है। हिन्दू-मुस्लिम सहित अन्य समाज को इसकी अनुमति नहीं दी गई है। पुलिस में अनुशासन का पालन करना सभी के लिए जरूरी है। इंतसार को कई बार नोटिस भेजा गया था कि दाढ़ी रखने के अनुमति लें, लेकिन लगातार इसकी अनदेखी की गई। अनुशासनहीनता में विभागीय स्तर पर निलंबित करने की कार्रवाई की गई। इसको किसी मजहब से जोड़कर न देखा जाए।

उन्होंने कहा था, “पुलिस मैनुएल के दिशा-निर्देशों के अनुसार सिख समुदाय के पुलिस कर्मियों के अलावा किसी भी अन्य समुदाय का व्यक्ति पुलिस विभाग में तैनात रहते हुए दाढ़ी नहीं रख सकता है। इस आदेश में कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक सभी आते हैं। अगर पुलिस विभाग से जुड़ा हुआ कोई भी व्यक्ति ऐसा करना चाहता है तो उसे सबसे पहले अनुमति लेनी होती है। इतने महत्वपूर्ण आदेश के बिना इंतसार अली बिना किसी भी तरह की आज्ञा लिए दाढ़ी रख रहे थे।”

वहीं इंतसार अली का कहना था कि वह अनुमति के लिए पिछले कई सालों से लगे हुए थे। उनके अनुसार वो एसपी और आईजी कार्यालय में भी अनुमति के लिए गए थे। हर जगह उनका पत्र लंबित पड़ा हुआ है और उनके निवेदन पर कोई सुनवाई नहीं हुई। 

ड्यूटी पर वेशभूषा को लेकर यह नियम हैं –

  • सिखों को छोड़कर यदि अन्य कोई सेवा में रहते हुए दाढ़ी रखता है तो उसको अनुमति लेना आवश्यक है।
  • पुलिस में रहते केवल मूंछ रखने की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती।
  • एसपी या एसएसपी के अधीन सेवारत लोगों को पहले स्थानीय स्तर पर अनुमति का प्रार्थना पत्र देना होता है।
  • यदि वहाँ से प्रार्थना पत्र निरस्त होता है तो आईजी स्तर पर अपील की जा सकती है। 

दिल्ली की जनता को मुफ्त कोरोना वैक्सीन देने को लेकर केजरीवाल ने नहीं दिखाया ‘इंट्रेस्ट’, कहा- ‘सोचेंगे’

कोरोना की वैक्सीन मुफ्त हो या इसके लिए सरकार कीमत वसूले, इस मुद्दे पर लंबी बहस चल पड़ी है। बीजेपी द्वारा बिहार में सत्ता में आने पर हर व्यक्ति को मुफ्त कोरोना वैक्सीन की घोषणा के बाद कई दलों ने कहा है कि उन्हें भी केंद्र से नि:शुल्क कोरोना वैक्सीन मिले। हालाँकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली के लोगों के लिए कोरोना वायरस वैक्सीन मुफ्त देने के मुद्दे पर गैर-कमिटेड नजर आ रहे हैं।

शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को मीडिया से मुखातिब होते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से कहा कि पूरे देश को फ्री वैक्सीन मिलनी चाहिए, ये पूरे देश का अधिकार है। केजरीवाल ने कहा कि सारे लोग कोरोना से परेशान हैं। इसलिए हर भारतीय को कोरोना का वैक्सीन मिलनी चाहिए। हालाँकि खुद दिल्ली के लोगों को मुफ्त टीके उपलब्ध कराने के बारे में उन्होंने कहा कि टीका विकसित होने के बाद सरकार इस पर निर्णय करेगी।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केजरीवाल ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दो फ्लाईओवरों का उद्घाटन करने के बाद संवाददाताओं से कहा, “जब टीका आएगा तब हम इस बारे में विचार करेंगे। तब देखेंगे कि इसकी क्या कीमत है और यह कितने लोगों को मुहैया कराई जा सकती है।”

अरविंद केजरीवाल की विमुखता दिल्ली में कोरोना वायरस वैक्सीन के संबंध में उनकी सरकार की नीति को स्पष्ट रूप से बता रही है। चूँकि स्वास्थ्य ‘राज्य’ का विषय है, इसलिए दिल्ली सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह कोरोना वायरस वैक्सीन के देश भर में लॉन्च होने के बाद दिल्ली के लोगों का उचित टीकाकरण सुनिश्चित करे।

हालाँकि, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल मुफ्त में वैक्सीन प्रदान करने और केंद्र में जिम्मेदारी को स्थानांतरित करने के प्रयास के बारे में बहुत ज्यादा इच्छुक नहीं हैं। देश भर में मुफ्त टीके उपलब्ध कराने के मुद्दे पर मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के हमले के बीच केजरीवाल का गैर जिम्मेदाराना बयान आया है।

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बृहस्पतिवार को आगामी चुनावों के लिए बिहार में भाजपा के घोषणापत्र को जारी करते हुए कहा कि बीजेपी बिहार में मुफ्त कोरोना वायरस टीके का वादा करती है। जिस तरह से दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने चुनाव से पहले फ्री पानी, फ्री बिजली का वादा किया था, उसी तरह बीजेपी ने फ्री टीका का वादा किया है।

उन्होंने कहा कि जब भी टीका उपलब्ध होगा, बिहार के लोगों को मुफ्त में दिया जाएगा। केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट रूप से यह उल्लेख नहीं किया कि केवल बिहार के निवासी ही टीका प्राप्त करने के लिए पात्र होंगे और यह तो निश्चित रूप से नहीं कहा था कि अन्य राज्यों को टीका नहीं मिलेगा।

हालाँकि, ट्रोल और कॉन्ग्रेस समर्थक ‘ऑनलाइन कार्यकर्ताओं’ ने भाजपा और केंद्रीय मंत्री पर हमला करने के लिए अपनी कोरी कल्पना का सहारा लिया। उनमें से कई लोगों ने COVID-19 के मुफ्त टीकाकरण देने के सरकार के कदम को को ‘क्रूर’ कदम बताया। अन्य विरोधियों ने यह कहकर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी कि टीका अन्य राज्यों को उपलब्ध कराया जाएगा या नहीं।

दरअसल, सच्चाई यह है कि चुनाव से पहले बिहार को केंद्र से खास तवज्जो नहीं मिल रही है। जब भी वैक्सीन विकसित होगी, केंद्र सभी राज्यों को वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी, फिर यह राज्य सरकारें तय करेंगी कि इसे मुफ्त में दिया जाए या लोगों से इसके लिए शुल्क लिया जाए।

टीकाकरण राज्य का विषय है। उन्होंने बताया कि अन्य सभी टीकाकरण कार्यक्रमों की तरह, केंद्र राज्यों को मामूली दर पर टीके प्रदान करेगा। इसमें भाजपा शासित और गैर-भाजपा शासित दोनों राज्य शामिल होंगे। फिर यह राज्यों पर निर्भर है कि वे टीके नि:शुल्क लगाएँ या इसके लिए शुल्क लें।

स्वास्थ्य ‘राज्य’ का विषय है और बिहार में बीजेपी ने सत्ता में आने पर नि:शुल्क टीका देने का वादा किया है। इसी तरह, गैर-भाजपा शासित राज्यों जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल या तो सभी के लिए टीके मुफ्त करने का विकल्प चुन सकते हैं या फिर अपने नागरिकों से इसके लिए शुल्क ले सकते हैं।

केजरीवाल भी गैर- कमिटेड बयान देते हुए अन्य की तरह ही कोरोना वैक्सीन का राजनीतिकरण कर रहे हैं और यह दावा करते हुए केंद्र पर दोषारोपण कर रहे हैं कि उन्होंने मुफ्त में टीकाकरण प्रदान नहीं किया।