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खून पर खून और खून के बदले खून: बिहार में जातीय नरसंहार के बूते लालू ने कुछ यूँ खड़ी की थी ‘सामाजिक न्याय’ की इमारत

बिहार में लालू यादव के जंगलराज के दौरान जातीय हिंसा एक आम बात थी। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ये तुलना करने में लगा रहता है कि इन 15 सालों में बिहार में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए और गुजरात में खूब हुए। लेकिन, बिहार में लालू के राज में हुई जातीय नरसंहार की घटनाओं पर बात नहीं होती। सब जातियाँ ही आपस में लड़ रही थीं तो भला वो एकजुट कैसे होतीं? ये बिहार का वो ‘सामाजिक न्याय’ था, जिसकी बात लालू परिवार करता रहा है।

वो लालू यादव का ही राज था, जब बिहार में माओवादियों ने अपना सिर उठाया। कथित ऊँची-जाति के लोगों के नरसंहार होने लगे। इसके बाद सवर्णों की तरफ से भी संगठन खड़े हो गए और इस तरह से ‘खून के बदले खून’ की नीति पर काम होने लगा। बिहार में पूरा नब्बे का दशक जातीय नरसंहार की घटनाओं से भरा पड़ा है, जिनमें से प्रमुख की हम यहाँ चर्चा करेंगे। इससे हमें समझने में मदद मिलेगी कि कैसे लालू राज में क़ानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज थी ही नहीं।

1999: जब जहानाबाद में होता था मौत का तांडव

ये वो समय था, जब जहानाबाद में सीपीआई (माओवादी) और रणवीर सेना आमने-सामने थे। जहाँ एक तरफ खूँखार माओवादी संगठन बेरहमी से सवर्णों की हत्या कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ रणवीर सेना भी ‘बदला’ लेने के लिए उतारू थी और इस दौरान कई वारदातें हो रही थीं। 1999 में जहानाबाद में साल के पहले 10 सप्ताह में ही 80 लाशें गिर चुकी थीं। सेनारी का नरसंहार आज भी लोगों के जेहन में है।

तब अप्रैल 5, 1955 को आई ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन में प्रकाशित ग्राउंड रिपोर्ट में अभय किशोर नाम के एक ग्रामीण का जिक्र था, जिनके भाई और भतीजे को माओवादियों ने मौत के घाट उतार दिया था। उन्होंने कहा था, “क्या सोनिया गाँधी यहाँ तभी आएँगी, जब दलितों की हत्या होगी?” रवींद्र चौधरी नामक एक ‘भूमिहार’ जाति के व्यक्ति ने कहा था, “हम गाँधी की तरह बैठ कर तमाशा नहीं देख सकते, इसीलिए हम सब ने सुभाष चंद्र बोस बनने का फैसला किया है।“

वहीं, दलित भी इस आशंका से घिरे रहते थे कि जब माओवादी नरसंहार का बदला लेने वाले लोग आकर उनका काम तमाम कर दें। तब विपक्ष के नेता रहे सुशील कुमार मोदी ने कहा था कि ये राजद वाले ही दिन में राजनीति करते हैं और राज होते ही वो माओवादी बन जाते हैं। यह भी कहा जाता था कि राजद और MCC (प्रतिबंधित माओवादी संगठन) का आपस में अप्रत्यक्ष गठबंधन था। पुलिस तक इस संगठन से डरती थी।

पुलिस का कहना था कि माओवादी उन्हें सुनसान इलाकों में देखते ही घेर लेते हैं और उनका हथियार छीन लेते हैं। जो छोटे जमींदार थे, उनमें भी माओवादियों के कारण भय का माहौल था। जमीन होने पर भी कई लोगों ने उसे छोड़ रखा था और खेती नहीं करते थे, ताकि माओवादियों की नजर न पड़े। पुलिस की निष्क्रियता की परिणीति ही ‘रणवीर सेना’ के रूप में हुई और दोनों प्रतिबंधित संगठनों के बीच हिंसक संघर्ष चला।

राघोपुर नरसंहार: लालू के बिहार में जातीय हिंसा का भयानक रूप

पटना के बिहटा में स्थित है पटुत, जहाँ के राघोपुर गाँव में अप्रैल 21, 1997 की रात मौत नाची थी। उससे पहले बिहार पुलिस की बात कर लेते हैं, जो नेताओं की सुरक्षा में लगी हुई थी और भ्रष्टाचार व जातिवाद के कारण अपना काम ही भूल गई थी। अंग्रेजों के जमाने के हथियार थे, सो अलग। जून 1996 में गया के टेकारी पुलिस थाने में माओवादी घुसे और आराम से 5 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार कर सारे हथियार लूट कर चलते बने।

उससे एक साल पहले देहरी-गया पैसेंजर ट्रेन में दिनदहाड़े 3 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी गई थी। स्थिति ये थी कि 1996 में संज्ञेय अपराधों की संख्या 1.31 लाख पहुँच चुकी थी। उससे एक साल पहले ये संख्या 1.2 लाख के आसपास थी। 1997 में ही जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे चंद्रशेखर प्रसाद को मार डाला गया था। ये वो समय था, जब हर घंटे 16 लोग या तो मारे जा रहे थे, या फिर लूटे ये अपहृत किए जा रहे थे।

इसी बीच लालू के बिहार में जातीय नरसंहार का एक रूप राघोपुर में देखने को मिला, जहाँ हथियारबंद माओवादी गाँव में घुसे और उन्होंने ‘भूमिहार’ जाति के 6 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। तब विधायक रहे जनार्दन शर्मा के घर में बम फिट कर के उसमें 2 बार विस्फोट किया गया। माओवादियों की एक खासियत थी कि वो हमेशा 200-300 ये उससे भी अधिक की संख्या में आते थे। गाँव के आसपास रुक कर तैयारी करते थे, फिर हमला बोलते थे।

पवन सिंह नाम का एक व्यक्ति विधायक के घर में सो रहा था, जिसे खींच कर बाहर लाया गया और उसकी जाति की पहचान कर के उसे गोली मार दी गई। नक्सलियों ने गाँव को घेर कर कुछ लोगों को मौके पर ही मार डाला तो कुछ को लेकर वो जंगलों में गए। गाँव में फोन होने के कारण और लोगों की जानें बच गईं क्योंकि पुलिस से संपर्क कर के घटना का ब्यौरा दे दिया गया था। ये फोनलाइन भी नई-नई ही लगाई गई थी।

अब जब क्रिया हुई, तो प्रतिक्रिया भी हुई। राघोपुर में नरसंहार के बाद हैबसपुर में भी दलितों का खून बहा। 10 दलित मार डाले गए। इस घटना के 8 आरोपितों की सुनवाई के दौरान ही मौत हो गई थी, 13 फरार हो गए और अंत में 28 को बरी कर दिया गया। कहा जाता है कि ‘रणवीर सेना’ के लोग प्रतिशोध की ऐसी आग में जल रहे थे कि उन्होंने लौटते समय गाँव के कुएँ पर खून से संगठन का नाम लिख दिया था।

बारा: जब ‘भूमिहार’ जाति के 40 लोगों को सुला दिया गया मौत की नींद

अगस्त 12-13, 1992 का दिन। गया जिला का बारा गाँव। माओवादियों ने इलाके को घेरा और ‘भूमिहार’ जाति के 35 लोग घर से निकाले गए। पास में एक नहर के पास ले जाकर उनके हाथ बाँधे गए और सबका गला रेत कर मार डाला गया। इस मामले में सुनवाई लम्बी चली लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। न तो पुलिस उन अपराधियों को पकड़ पाई और न ही नक्सलियों ने पुलिस की समन को कोई तवज्जो दी।

जून 2001 में सेशन कोर्ट ने 9 लोगों को दोषी माना और इसके अगले साल सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को बरक़रार रखा। इनमें से 3 को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। हालाँकि, जनवरी 2017 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इन सबकी फाँसी की सज़ा माफ़ कर दी। कहते हैं कि इस घटना के बाद भी ‘रणवीर सेना’ ने पलटवार किया था और हिंसक संगठन ने लक्ष्मणपुर-बाथे में 58 दलितों को मार डाला गया। इसकी सुनवाई भी लम्बी चली।

यूँ गिनाने को तो बाथे, बथानी टोला, नाढ़ी, इकवारी, सेनारी, राघोपुर, रामपुर चौरम, मियाँपुर जैसी कई नरसंहार की घटनाएँ हैं, जिन्होंने पटना के अलावा जहानाबाद, अरवल, औरंगाबाद और शाहाबाद में क़ानून-व्यवस्था का नामोंनिशान ही ख़त्म कर दिया था। लेकिन, ‘क्रिया’ और ‘प्रतिक्रिया’ का ये दौर यूँ ही चलता रहा। लालू यादव बिहार के इन जातीय नरसंहारों के बीच अपनी ‘सामाजिक न्याय’ की व्यवस्था चलाते हुए वोट बैंक की राजनीति करते रहे।

जातीय हिंसा से अछूती नहीं थी राजनीति

बिहार में ये वो दौर था, जब राजनीति में भी जातिवाद चरम पर था। जहाँ एक तरफ लालू यादव माई (मुस्लिम-यादव) समीकरण बना रहे थे, वहीं दूसरी तरफ लोगों में चर्चा थी कि वो ‘भूरा बाल साफ़ करो’ (भूमिहार-ब्राह्मण-राजपूत-लाला) की नीति पर काम कर रहे थे। जाति के आधार पर तो टिकट आज भी बाँटे जाते हैं, लेकिन जातिगत राजनीतिक दुश्मनी उस दौरान चुटकियों में यूँ हिंसा की वारदातों का रूप ले लेती थी।

पेरिस: ऐसे लोगों के लिए किसी भी सेकुलर देश में जगह नहीं होनी चाहिए | Ajeet Bharti on Paris beheading by Islamist

पेरिस में एक शिक्षक का सिर काटने की घटना दुनिया भर के कट्टरपंथी मुस्लिमों के लिए ‘ये तो होना ही था’ मोमेंट था। एक ऐसी विचित्र घटना जो आजकल हर किसी को सुनाई पड़ती है, भले ही उसके होने के कारण हमें अजीब और विचलित करने वाले लगते हैं। लेकिन वहाँ हाथ में छुरा लिए हुए, अल्लाह-हु-अकबर का नारा लगाते हुए मुस्लिम की उपस्थिति हमें सामान्य ही नहीं लगती, बल्कि हम प्रतीक्षा करते हैं कि अब तो उसकी जान जानी तय है।

आप यह समझिए कि जो व्यक्ति पैगंबर के बारे में गलत सुनने पर हत्या कर देता है, वही मुस्लिम नहीं है। और जो हर दिन इस्लाम के बताए हर नियम को तोड़ते हैं, वही ये सर्टिफिकेट जारी करते हैं कि कौन मुस्लिम है। जानकार कहते हैं कि असली इस्लाम तो वही है, जो कट्टरपंथी जीते, क्योंकि वो काफिरों को कत्ल के योग्य मानते हैं।

पूरी वीडियो देखने के लिए इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करें

गया से 7 बार से विधायक, कृषि मंत्री प्रेम कुमार से बातचीत| 7-time MLA Prem Kumar interview

बिहार की वैसी जगहों से ऑपइंडिया लगातार आप तक ग्राउंड रिपोर्ट्स ला रहा है, जो वहाँ की असली कहानी बताती है। इसी शृंखला में मैं आज गया जिले जाना हुआ जहाँ के भाजपा प्रत्याशी और 7 बार से विधायक, कृषि मंत्री प्रेम कुमार से बातचीत की।

हमने भाजपा प्रत्याशी प्रेम कुमार से जानने की कोशिश की कि 7 साल जीत मिलने के बाद वो 8वीं पर मैदान में किस मुद्दे और रणनीति को लेकर उतरे हैं। इसके साथ ही उनसे सड़कों पर लगे जाम की समस्या और गंदे शहर की छवि को तोड़ने को लेकर उनके एजेंडे के बारे में जानने का प्रयास किया।

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नक्सलवाद कोरोना ही है, राजद-कॉन्ग्रेस नया कोरोना आपके बीच छोड़ना चाहते हैं: योगी आदित्यनाथ

बिहार विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए आए उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ का बुधवार (अक्टूबर 21, 2020) को बिहार में दूसरा दिन था। बुधवार को उन्‍होंने जमुई, भोजपुर के तरारी तथा पटना के पालीगंज विधानसभा क्षेत्रों में जनता से राष्‍ट्रीय जनांत्रिक गठबंधन (NDA) के प्रत्‍याशियों के लिए वोट माँगे।

इस दौरान उन्होंने वहाँ की जनता को संबोधित करते हुए कहा, “बीमारी में बचाव ही सर्वोत्तम उपाय है और ये बचाव वैसे ही जैसे इस भोजपुर क्षेत्र के लोगों ने नक्सलवाद से बचाव किया था। ये नक्सलवाद भी तो एक कोरोना ही है। इसका संक्रमण भी बहुत तेज फैलता है। लेकिन आपने बचाव किया, तो नक्सलवाद स्वाहा हो गया। ऐसे ही बचाव अगर कोरोना से करेंगे, तो कोरोना हमेशा के लिए समाप्त होगा।”

सीएम योगी ने कहा कि अब राम मंदिर बनने से पहले परिवारवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रवाद, आतंकवाद व जातिवाद का भी राम नाम सत्य होगा। अब कोई नहीं कह सकता कि भारत तेरे टुकड़े होंगे, क्योंकि भारत अब एक श्रेष्ठ भारत है। हमारे लिए जनता ही परिवार है, लेकिन उनके लिए परिवार ही पार्टी और पार्टी ही बिहार है। कॉन्ग्रेस और आरजेडी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। कॉन्ग्रेस गरीबों का राशन डकारती रही तो आरजेडी ने बेजुबान जानवरों का चारा भी नहीं छोड़ा। दोनों राजनीतिक दल नहीं, परिवार हैं। इनके एजेंडे में परिवार ही सर्वोपरि है।

श्रेयसी सिंह के समर्थन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनसभा करते हुए कहा जो भी भारत के हितैषी हैं वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के नेता पाकिस्तान की तारीफ करते हैं। कुछ लोग को कश्मीर से धारा 370 हटाने पर बहुत पीड़ा हुई। कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और ओवैसी को इतनी पीड़ा हुई थी वे बार-बार इसका विरोध करते रहे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी जानते हैं कि भारत के खिलाफ अगर कुछ भी करेंगे तो भारत की सेना घुसकर मारेगी।

इसके बाद आज की तीसरी जनसभा पटना के पालीगंज विधानसभा में थी जहाँ बोलते यूपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आज बिहार पर ज़िम्मेदारी है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में काफी हद तक कोरोना से लड़ाई जीत चुके हैं। राजद और कॉन्ग्रेस एक नए कोरोना के रुप में भाकपा माले को लेकर आपके बीच छोड़ना चाहते हैं, ये कोरोना से कम नहीं है। 

अपनी रैली में सीएम योगी आदित्यनाथ ने नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धियाँ गिनाते हुए कहा कि बीजेपी ने 12 करोड़ गरीबों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ दिलाया। 50 करोड़ गरीबों को 5 लाख रुपए का सालाना स्वास्थ्य बीमा का कवर भी प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार ने दिलाया। हमारे गठबंधन का तो एक ही संकल्प है कि हमारे लिए पूरा देश ही परिवार है।

उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के लिए तो एक ही परिवार सब कुछ है। रही आरजेडी की बात तो इनके पोस्टरों में चार लोगों को छोड़ कभी किसी पाँचवें को जगह नहीं मिली। ऐसे लोगों को नकारें और विकास के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के हाथों को मजबूत करें।

साथ ही उन्होंने कहा कि पाकिस्तान जब भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता था तो कॉन्ग्रेस के नेता कहा करते थे कि हम तब तक कुछ नहीं करेंगे जब तक कि पाकिस्तान परमाणु बम का इस्तेमाल नहीं करता। लेकिन अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारतीय जवानों के सर्जिकल स्ट्राइक के डर से दुनिया में भागे-भागे फिर रहे हैं।

राहुल गाँधी ने किया जातीय हिंसा भड़काने के आरोपित PFI सदस्य सिद्दीक कप्पन की मदद का वादा, परिवार से की मुलाकात

राहुल गाँधी ने अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड में कथित पत्रकार व PFI सदस्य सिद्दीक कप्पन (Siddique Kappan) के परिवार से मिलकर उनकी मदद का आश्वासन दिलाया है। केरल के कथित पत्रकार सिद्दीक को हाथरस मामले के मद्देनजर उत्तर प्रदेश जाते समय टोल प्लाजा से गिरफ्तार किया गया था। उस पर PFI से जुड़े होने और जातीय हिंसा फ़ैलाने की कोशिश के आरोप हैं। सिद्दीक कप्पन इस वक्त उत्तर प्रदेश की मथुरा अस्थायी जेल में बंद है।

सूचना के अनुसार, आज कालापेट्टा के रेस्ट हाउस में कप्पन के घरवालों ने राहुल गाँधी से मुलाकात की। इस समय कॉन्ग्रेस पूर्व अध्यक्ष वहाँ दौरे पर गए हुए हैं। परिवार ने इस मुलाकात में राहुल गाँधी से पूरे मामले में हस्तक्षेप की माँग करके पत्रकार की जल्द रिहाई करवाने की गुहार लगाई।

कॉन्ग्रेस सांसद से मुलाकात के बाद कप्पन की पत्नी रेहानथ ने बताया कि राहुल गाँधी उनके पति को रिहा कराने के लिए हर तरह से तैयार हो गए हैं। कथित पत्रकार की पत्नी ने यह भी कहा कि उनके पति को पुलिस ने हाथरस जाते समय गिरफ्तार किया था और अब वह उनके लिए चिंतित हैं क्योंकि वकील भी उनसे नहीं मिल पा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि हाथरस जाते हुए पिछले दिनों सिद्दीक कप्पन के साथ 3 अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया था। उसके ख़िलाफ़ संगीन अपराध करने की मंशा रखने के शक में सीआरपीसी की धारा 151 के तहत मामला दर्ज हुआ था। बाद में यह केस राजद्रोह और आतंकवाद रोधी कानून के तहत दर्ज कर लिया गया। 7 अक्टूबर को इन चारों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया था और अब उनकी हिरासत फिर बढ़ा दी गई है।

ज्ञात हो कि 6 अक्टूबर को हिरासत में लिए गए चारों आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153-ए (दो समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), आईपीसी की 295 ए (जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कार्य करने से भावनाओं को अपमानित करने का इरादा) के तहत मामला दर्ज किया गया था। fIR में बताया गया था कि अतीकुर्रहमान, आलम, केरल के सिद्दीकी कप्पन (जो कि कथित तौर पर पत्रकार है) और मसूद अहमद के पास गिरफ्तारी के दौरान 6 स्मार्टफोन, एक लैपटॉप व ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम के पैम्फ़्लिट पाए गए थे और ये लोग शांति भंग करने के लिए हाथरस जा रहे थे।

यहाँ बता दें कि राहुल गाँधी द्वारा कप्पन की रिहाई पर हस्तक्षेप की बात सामने आते ही उनपर सवाल उठने लगे हैं। यूपी सीएम के सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने लिखा,

“छुप कर हुई मुलाक़ात के बाद हाथरस के बहाने, यूपी को जलाने के खेल में कॉन्ग्रेस के हाथ का इससे बड़ा सुबूत क्या हो सकता है, भला। राहुल जी और उनकी कॉन्ग्रेस हर हाल में हिंदुओं को विखंडित करना चाहते हैं, PFI के दंगाइयों और CAA के बलवाइयों से कॉन्ग्रेस का रिश्ता अब तो जगज़ाहिर है।”

पेरिस: ‘घटिया अरब’ कहकर 2 बुर्के वाली मुस्लिम महिलाओं पर चाकू से हमला, कुत्ते को लेकर हुआ था विवाद

पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाने पर पेरिस में एक शिक्षक की इस्‍लामी कट्टरपं‍थी द्वारा गला काटने की घटना के बाद पेरिस में एफिल टॉवर के नीचे दो मुस्लिम महिलाओं को कई बार चाकू मारकर घायल कर दिया गया। इस दौरान ‘घटिया अरब’ (Dirty Arabs) कहकर उन्‍हें गाली भी दी गई। इस बीच फ्रांस की पुलिस ने दो संदिग्‍ध महिलाओं को इस हमले के बाद गिरफ्तार किया है।

डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने जिन महिलाओं को हिरासत में लिया है, वे ‘श्वेत महिलाएँ’ हैं और ‘यूरोप की लग रही’ हैं। पेरिस के अभियोजकों ने कहा कि इन महिलाओं के खिलाफ अब हत्‍या के प्रयास का मुकदमा चलेगा। इस हमले में घायल महिलाओं की पहचान अल्‍जीरिया मूल की फ्रांसीसी महिला केन्‍जा और अमेल के रूप में हुई है। केंजा को 6 बार चाकू मारा गया और उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है

कई लोगों ने इस हमले की तस्‍वीरें भी शेयर की

अमेल को भी अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है और उनके हाथों की सर्जरी हुई है। इस हमले के बार में आधिकारिक सूचना नहीं आने से सोशल मीडिया पर लोगों में जमकर उबाल देखा गया। कई लोगों ने इस हमले की तस्‍वीरें भी शेयर की हैं। हमले की यह घटना रविवार रात की बताई जा रही है। पेरिस पुलिस ने एक बयान जारी करके कहा कि 18 अक्‍टूबर को रात करीब 8 बजे पुलिस को सूचना मिली कि दो महिलाएँ चाकू के हमले में घायल हैं।

पेरिस पुलिस के सूत्रों ने डेली मेल को बताया कि चाकू से हमला करने के मामले में हत्‍या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और मामले की जाँच जारी है। हमले की शिकार हुई एक महिला ने अपना चेहरा बुर्के से ढक रखा था। केंजा ने बताया कि वो वॉक करने के लिए गए थे। एफिल टॉवर के पास एक हल्‍के अंधेरे वाला पार्क है और वो वहाँ पर थोड़ा घूमने लगे।

कुत्ते के भौंकने को लेकर शुरू हुआ था विवाद

केंजा ने कहा, “जब हम घूम रहे थे, उसी समय दो कुत्ते हमारी तरफ आ गए। इससे हमारे बच्‍चे डर गए। मेरी कजिन अमेल ने बुर्का पहन रखा था। उसने कुत्ते की साथ आई दो महिलाओं से अनुरोध किया कि बच्‍चे डर रहे हैं, इसलिए वे अपने कुत्ते को थोड़ा दूर लेकर चली जाएँ। इस अनुरोध के बाद कुत्ते की मालकिन ने जाने से मना कर दिया और दोनों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई।” इसके बाद कुत्‍ते के साथ आई महिलाओं ने कथित रूप से चाकू निकला और केंजा तथा अमेल पर हमला कर दिया।

गौरतलब है कि 15 अक्बूर को स्कूल टीचर सैमुअल पेटी ने छात्रों के साथ पैगंबर कार्टून को लेकर चर्चा की। इसके बाद पेरिस में सड़क पर उनकी गला काटकर हत्या कर दी। इसके विरोध में फ्रांस की सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। टीचर के सर्मथन में फ्रांस की सड़कों पर रैलियाँ निकाली गईं, जिसमें कई बड़े नेताओं ने भी भाग लिया।

47 वर्षीय इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी (Samuel Paty) को फ्रांस ने अपना सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार देने का फैसला किया है। यह घोषणा मंगलवार (अक्टूबर 20, 2020) की सुबह बीएफएम टीवी को दिए एक इंटरव्यू में वहाँ के शिक्षा मंत्री जीन-मिशेल ब्लैंकर (Jean-Michel Blanquer) ने की। इस सर्वोच्च पुरस्कार का नाम ‘ला लिगियन डी ऑनर’ (Legion d’Honneur) है।

2015 में भी हुआ था विवाद

पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर इससे पहले वर्ष 2015 में विवाद हुआ था। उस दौरान फ्रांस के शार्ली एब्दो पत्रिका के दफ्तर पर हमला किया गया था और 12 लोगों की हत्या कर दी गई थी।

शीना बोरा की गुमशुदगी के बारे में जानते थे परमबीर सिंह, फिर भी नहीं हुई थी FIR

रिपब्लिक चैनल से जारी विवाद के बीच मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह के करियर से जुड़े कई खुलासे सामने आए और चर्चा का विषय हैं। इसी कड़ी में अब परमबीर सिंह का नाम शीना बोरा केस से भी जुड़ गया है और पता चला है कि वो शीना बोरा की गुमशुदगी के बारे में भी जानते थे।

शीना बोरा केस सबसे पेचीदा और रहस्यमयी मामलो में से एक है। शीना बोरा के अचानक गायब होने व हत्या का पता चलने की इस घटना को 4 साल बीत गए हैं। बाद में जाकर इस केस में उनकी माँ इंद्राणी मुखर्जी को गिरफ्तार किया गया था। इंद्राणी काफी समय तक शीना को अपनी बहन बताती थीं।

24 अप्रैल 2012 को शीना ने मुंबई मेट्रो वन लिमिटेड कंपनी से छुट्टी ली और छुट्टी लेने के कुछ देर बाद ही उसने ईमेल के जरिए रिजाइन दे दिया। वह अपनी माँ इंद्राणी मुखर्जी (INX मीडिया की पूर्व सीईओ) के पति पीटर मुखर्जी (स्टार इंडिया के पूर्व सीईओ) के बेटे राहुल मुखर्जी के साथ रिलेशन में थीं। इंद्राणी हमेशा उन्हें लेकर कहती थी कि वह उनकी बहन हैं। 

24 तारीख के बाद शीना कभी किसी को नहीं नजर आईं। माना गया कि उनकी हत्या उसी रात हुई। इंद्राणी व उनके पूर्व पति संजीव खन्ना के ऊपर इसका इल्जाम लगा। कहा जाता है कि हत्या से पहले इंद्राणी ने उस जगह की रेकी भी कर ली थी जहाँ शव को फेंका जाना था। उन्होंने उसके शव को अपने घर वर्ली में भेजा जहाँ उसके शव को कथिततौर पर सूटकेस में भरा गया। अगले दिन उसे मुंबई के नजदीक रायगढ़ ले जाया गया और फिर उस बैग को आग लगा दी गई।

23 मई 2012 को पेन तहसील के ग्रामीणों ने बदबू आने और शव मिलने की शिकायत करवाई। शव ऐसे जला था कि उसको पहचाने जाने का कोई सुराग नहीं मिला।  3 साल बाद जब इंद्राणी का ड्राइवर श्यामवर राय किसी दूसरे केस में फँसा तो उसने शीना बोरा केस का खुलासा किया।

शीना के गायब होने की बात जानते थे परमबीर सिंह

अब रिपोर्ट्स बताती हैं कि 24 अप्रैल 2012 को शीना जब गायब हुई तो राहुल मुखर्जी और इंद्राणी, परमबीर सिंह के पास गए। वह उस समय कोंकण रेंज के आईजी हुआ करते थे। उन्होंने राहुल से शीना के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज करवाने को कहा भी, जिसका मतलब साफ है कि उन्हें शीना की गुमशुदगी की बात पता थी। लेकिन दिलचस्प चीज यह है कि वह रिपोर्ट कभी फाइल ही नहीं हुई।

26/11 और परमबीर सिंह का नाम

पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त हसन गफ्फूर ने कई पुलिस अधिकारियों पर आतंकवादी के ख़िलाफ एक्शन न लेने का इल्जाम लगाया था। हालाँकि परमबीर सिंह ने इसके बाद उन्हें मानहानि के इल्जाम में कानूनी कार्रवाई की धमकी दी थी और खुद का बचाव यह कहकर किया था कि जब वह होटल ताज व ओबरॉय में थे तब कई चैनल ने उन्हें टीवी पर दिखाया। यहाँ बता दें कि 26-11 के दौरान टीवी पर प्रसारण का आतंकियों को बहुत फायदा मिला था।

‘बुरा पुलिस’ कहने पर परमबीर सिंह ने पूर्व मुंबई कमिश्नर से मँगवाई थी माफी

साल 2018 के जुलाई में पूर्व मुंबई पुलिस आयुक्त जूलियो रिबेरो ने एक लेख लिखा था जिसमें बताया गया था कि दो अधिकारी पुलिस आयुक्त की पोस्ट के लिए लड़ रहे हैं। इस आर्टिकल में सिंह का बिना नाम लिए दो प्रतिद्वंदियों को ‘अच्छा पुलिस’- ‘बुरा पुलिस’ कहा था। बाद में ऐसा माना गया था कि इस लेख में जिसे बुरा पुलिस कहा गया वह परमबीर सिंह ही थे। इस लेख पर कार्रवाई करते हुए सिंह ने रिबेरो से माफी मंगवाई थी और उन्हें धमकी भी दी थी।

साध्वी प्रज्ञा के कारण भी आए चर्चा में

परमबीर सिंह अपने करियर में साध्वी प्रज्ञा के कारण भी सुर्खियों में आए थे। उस समय वह एटीएस हुआ करते थे। साध्वी प्रज्ञा ने इल्जाम लगाया था कि उन्हें एटीएस द्वारा यातनाएँ दी गईं ताकि वह ‘भगवा आतंकवाद मामले’ में जुर्म को कबूलें। साध्वी प्रज्ञा ने गंभीर आरोप लगाते हुए यह तक कहा था कि उन्हें गैर कानूनी हिरासत में लिया गया और 13 दिन तक प्रताड़िता किया गया। 

अजित पवार को क्लिन चिट देकर बने थे चर्चा का हिस्सा

गौरतलब हो कि परमबीर सिंह 1988 बैच के आईपीएस हैं। फरवरी में उन्हें मुंबई पुलिस आयुक्त चुना गया। इससे पहले वह गैर भ्रष्टाचार ब्यूरों के डीजी हुआ करते थे। वह पिछले साल भी अजित पवार को सिंचाई घोटाले में क्लिन चिट देने के कारण चर्चा में आए थे।

हिन्दू त्योहारों पर वामी-जिहादी गिरोह से कैसे निपटें?| Ajeet Bharti on Tackling Hinduphobia during festivals

भारत में हिंदुओं के हर त्योहार के पहले वामपंथियों, जकातियों, इस्लामी कट्टरपंथियों का एक गिरोह अचानक से सक्रिय हो जाता है। वह हर त्योहार में ये ज्ञान देने लगता है कि कहाँ क्या गलत है? इनके ऐसा करने का एक ही उद्देश्य होता है गाली सुनना और फिर इसको लेकर विक्टिम कार्ड खेलना। महिला होने का मतलब ये नहीं कि बेहूदगी करते रहो और सामने वाला सहता रहे कि ये तो महिला है, इसे कैसे जवाब दें?

हाल ही में कठुआ कांड में कुख्याति पाने वाली दीपिका नामक वकील ने किसी के द्वारा बनाए गए कार्टून को शेयर किया, जसमें नवरात्रि को लेकर भद्दा सा चित्रण था। दीपिका ने स्पष्ट रूप से लिखा नहीं था कि वो अपनी व्यथा कह रही है या कुछ और। अगर उनके घर में ऐसा होता है तो मेरी सहानुभूति उनके साथ है, अगर नहीं तो समाज के बारे में बेहूदगी दिखाने की आवश्यकता नहीं है।

पूरी वीडियो यहाँ देखें

गया के केनार चट्टी गाँव के कारीगर, जो अब बन चुके हैं मजदूर। Bihar Elections Ground Report: Wazirganj, Gaya

बिहार की वैसी जगहों से ऑपइंडिया लगातार आप तक ग्राउंड रिपोर्ट्स ला रहा है, जो वहाँ की असली कहानी बताती है। इसी शृंखला में मैं आज गया जिले के केनार चट्टी गाँव गया। जो पहले बर्तन उद्योग के लिए जाना जाता था, अब वो मजदूरों का गाँव बन चुका है।

हमने इस मुद्दे पर यहाँ के स्थानीय निवासी से बात की और जानने की कोशिश की कि इस तरह के हालत कब और क्यों बन गए। उन्होंने बताया कि जहाँ 20 साल पहले 40-50 घर इस उद्योग में शामिल थे, वहीं अब महज 4-5 घर ही इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उन्होंने इस उद्योग से संबंधित हर जानकारी हमारे साथ साझा की। 

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रवीश की TRP पर बकैती, कश्मीरी नेताओं का पक्ष लेना | Ajeet Bharti on Ravish’s TRP, Kashmir leaders

पिछले 10 दिनों में रवीश कुमार ने जिन मुद्दों पर बात की, उसमें सबसे मुख्य मुद्दा TRP है। जिस पर उन्होंने पत्रकारिता को लेकर ज्ञान दिया कि TRP का कोई मतलब रह गया। इसके बाद बिहार चुनाव और फिर राहुल गाँधी को एक साहसी नेता बताते हुए उनमें काफी संभावनाएँ देखी। उसके बाद नक्सलियों के ऊपर किस तरह से फर्जी केस बनाकर फँसा दिया जाता है, इस पर बात की। उन्होंने पीएम के ऊपर भी फब्तियाँ कसीं।

TRP पर ज्ञान देते हुए उन्होंने बहुत ही गूढ़ बातें कहीं। उन्होंने दर्शकों को सख्त बनने के लिए कहा। TRP पर रवीश ने पूछा कि मीटर दलित-मुस्लिम के घर है कि नहीं? अगर केबल वाले मीटर की तार काट देंगे तो फिर तो लोग उनका शो कैसे देखेंगे? रवीश यह बात नहीं स्वीकार पा रहे हैं कि उनकी स्वीकार्यता अब खत्म हो चुकी है। वो टॉप 10 चैनल से भी बाहर हैं।

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