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PM मोदी ने की कोरोना स्थिति और वैक्‍सीन की तैयारियों की समीक्षा: त्यौहारों और चुनाव को लेकर कही ये बात

कोरोना वायरस और कोरोना वैक्सीन के वितरण को लेकर आज पीएम मोदी संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक की। इस दौरान प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोजन की तरह टीका वितरण की ऐसी प्रणाली विकसित करने का सुझाव दिया जिसमें सरकारी और नागरिक समूहों के प्रत्येक स्तर की भागीदारी हो।

पीएम मोदी ने प्रतिदिन के मामलों और वृद्धि दर में लगातार गिरावट का भी उल्लेख किया। उन्होंने लोगों से अपील की कि कोरोना से लड़ाई में बिल्कुल भी लापरवाही न बरती जाए। प्रधानमंत्री ने त्यौहारों के दौरान सामाजिक दूरी, साफ-सफाई, कोविड-19 दिशा-निर्देशों का पालन करने और आत्मसंयम बरतने की बात भी कही।

बता दें इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य), प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार, वरिष्ठ वैज्ञानिक, पीएमओ और अन्य विभागों के अधिकारी भी इस बैठक में उपस्थित थे।

पीएमओ की ओर से जारी बयान में बताया गया कि भारत में तीन टीके विकसित होने के उन्नत चरणों में है, जिनमें से दो टीके चरण दो में और एक टीका तीसरे चरण में है। बयान में कहा गया है कि कोविड-19 वायरस जीनोम पर दो अखिल भारतीय अध्ययनों से पता चलता है कि वायरस आनुवंशिक रूप से स्थिर है, इसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं है।

पीएम मोदी के कहा कि भारतीय वैज्ञानिक और शोध संस्थान पड़ोसी देशों अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, मॉरीशस, नेपाल और श्रीलंका के साथ मिलकर भी काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिक समुदाय को निर्देश दिया कि क्लीनिकल ट्रायल और शोध का यह कार्य सिर्फ पड़ोसी देशों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस सहयोग का विस्तार पूरी दुनिया में होना चाहिए।

गौरतलब है कि मोदी ने वैक्सीन के पूरे देश में तेजी से वितरण के तौर तरीके विकसित करने पर भी जोर दिया। इसके लिए कोल्ड स्टोरेज चेन, वितरण नेटवर्क, निगरानी तंत्र, उपकरण और मूल्यांकन व्यवस्था दुरुस्त करने के निर्देश भी दिए।

बता दें कि देश में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या 74 लाख के पार चली गई है, वहीं संक्रमण मुक्त हुए लोगों की संख्या भी 65 लाख से अधिक हो गई है। इस प्रकार संक्रमण से स्वस्थ होने वालों की दर 87.78 प्रतिशत हो गई है।

‘शौर्य चक्र सम्मानित बलविंदर सिंह की हत्या के लिए पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार जिम्मेदार, मिन्नतों के बावजूद नहीं दी सिक्योरिटी’

पंजाब में आतंकवाद से लड़ने वाले शौर्य चक्र से सम्मानित बलविंदर सिंह (62) की पंजाब के तरण तारण जिले में अज्ञात हमलावरों ने कल (16 अक्टूबर, 2020) गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने बलविंदर पर उस समय हमला किया जब वह भीखीविंड गाँव में अपने घर से लगे दफ्तर में थे। बेरहमी से सिंह को मौत के घाट उतारने के बाद आरोपी मौके से फरार हो गए।

वहीं अब उनकी पत्नी जगदीश कौर ने अपने पति की हत्या का जिम्मेदार कॉन्ग्रेस शासित राज्य सरकार पर लगाया है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार शौर्य चक्र से सम्मानित बलविंदर सिंह की पत्नी जगदीश कौर ने कहा, “हमारे परिवार पर हमलों की 42 पंजीकृत एफआईआर हैं और कई ऐसे अनगिनत अन्य हमले भी हुए जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है। सुरक्षा वापस लेना गलत था।”

बलविन्दर सिंह के भाई रंजीत सिंह ने बताया था कि राज्य सरकार ने तरण तारण पुलिस की सिफारिश पर एक साल पहले उनका सुरक्षा घेरा वापस ले लिया था। उन्होंने कहा कि पूरा परिवार आतंकवादियों की हिट लिस्ट में रहा है।

सिंह की पत्नी ने कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली अमरिंदर सरकार पर पति की हत्या को लेकर नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने आगे कहा, “इसके लिए (हत्या) सरकार, प्रशासन और खुफिया एजेंसियाँ ​​जिम्मेदार हैं। हमने फिर से सुरक्षा की माँग की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। जिनके लिए सिक्यूरिटी कवर सिर्फ स्टेटस सिम्बल है, उन्हें भी प्रदान किया गया है। जबकि हमें वास्तव में इसकी आवश्यकता थी, लेकिन हमें प्रदान नहीं किया गया।”

वहीं बलविंदर सिंह की बेटी प्रनप्रीत कौर ने कहा, “अगर हमारे पास सुरक्षा होती तो ऐसा नहीं होता, क्योंकि हत्यारों को प्रतिशोध की आशंका होती। हमने कई ईमेल, लिखित आवेदन भेजे और अधिकारियों से भी मुलाकात की, लेकिन फिर भी हमें कोई सुरक्षा नहीं मिली।”

बता दें इससे पहले पत्नी जगदीश कौर ने पत्रकारों से कहा था कि, जब तक हत्यारों को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक परिवार उनका अंतिम संस्कार नहीं करेगा। उन्होंने अपने परिवार के लिए सुरक्षा की माँग भी की थी। संधू की पत्नी ने कहा, परिवार के सभी सदस्य, मैं, मेरे दिवंगत पति और उनके भाई रंजीत सिंह संधू तथा उनकी पत्नी बलराज कौर संधू शौर्य चक्र से सम्मानित हैं। केन्द्र ने आतंकवाद से लड़ने के लिये हमें यह सम्मान दिया था। जिसके परिणामस्वरूप आतंकवादियों ने मेरे पति को मार डाला।

वहीं ताजा खबरों के अनुसार, एसडीएम राजेश शर्मा ने माँगे मानने का आश्वासन दिया। इसके बाद स्वजन अंतिम संस्कार के लिए राजी हो गए हैं। बता दें बलविंदर सिंह कई साल तक राज्य में आतंकवाद के खिलाफ बहादुरी से लड़ते रहे और आतंकवादियों ने पहले भी कई बार उन पर हमले किये थे।

गौरतलब है कि शुक्रवार सुबह करीब 6 बजे बाइक पर 2 लोगों ने बलविंदर का दरवाजा खटखटाया। बलविंदर ने गेट खोला तो एक हमलावर घर में ही बने ऑफिस में आ गया और बलविंदर पर 4 राउंड फायर कर भाग गया। वहीं बलविंदर के भाई रणजीत सिंह ने संदेह जताया है कि इस हमले के पीछे आतंकी हो सकते हैं। पुलिस अधिकारी अभी इस बारे में कुछ भी नहीं बता रहे हैं। पुलिस पर ढिलाई बरतने का भी आरोप है। परिवार के मुताबिक, हमले की जानकारी दिए जाने के आधे घंटे बाद पुलिस मौके पर पहुँची,  जबकि थाना घर के पास ही है।

पत्रकार प्रदीप भंडारी को मुंबई पुलिस ने घेर लिया, उनके साथ मारपीट की और अवैध रूप से हिरासत में लिया: रिपब्लिक TV

मुंबई पुलिस की बौखलाहट फिर सामने आई है। मुंबई पुलिस ने शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) को रिपब्लिक टीवी के कंसलिटिंग एडिटर प्रदीप भंडारी को गैर कानूनी तरीके से हिरासत में लिया। रिपब्लिक टीवी का कहना है कि पुलिस ने कानून का पूरी तरह से उल्लंघन किया। प्रदीप भंडारी के पास अग्रिम जमानत था, इसके बावजूद उन्हें हिरासत में लिया गया। खबर है कि उनके जल्द ही गिरफ्तार होने की संभावना है।

मीडिया रिपोर्ट में बाताया जा रहा है कि प्रदीप भंडारी को वकील से मिलने से रोका गया। इतना ही नहीं, उनका फोन भी छीन लिया गया है। रिपब्लिक टीवी का कहना है कि 10-12 पुलिस ने प्रदीप को घेर लिया था और खार वेस्ट थाने में प्रदीप के साथ मारपीट भी की गई।

हाल ही में भंडारी के खिलाफ़ पुलिस थाने में आईपीसी की धारा 188 (लोक सेवक द्वारा विधिवत आदेश देने की अवज्ञा), 353 (लोक सेवक को अपने कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और बॉम्बे पुलिस कानून की धारा 37 (1), 135 के तहत मामला दर्ज हुआ था। इसी के बाद उन्हें पूछताछ के लिए थाने में हाजिर होने को कहा गया था और प्रदीप भंडारी ने केस दर्ज होने के बाद मुंबई पुलिस कमिश्नर को निशाने पर लिया था।  

इससे पहले मुंबई पुलिस ने एक बार फिर प्रदीप भंडारी को समन जारी कर किया था। उन्हें 22 अक्टूबर को 4 बजे तक कोर्ट में पेश होने को कहा गया था। प्रदीप भंडारी ने पुलिस कमिश्नर को उनके राजनीतिक आकाओं के इशारे पर काम करने और पुलिस की वर्दी का सम्मान नहीं करने के लिए फटकार लगाई थी और उनका इस्तीफा माँगा था। उन्होंने यह भी कहा कि मुंबई पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने के प्रयास में है, इसके लिए उनके खिलाफ गैर-जमानती धाराओं के तहत आरोप दायर करने की योजना बना रही है।

गौरतलब है कि 15 अक्टूबर को सुशांत सिंह मामले में रिपोर्टिंग करने वाले रिपब्लिक टीवी पत्रकार प्रदीप भंडारी की अग्रिम जमानत याचिका कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई थी। इससे पहले उनके ख़िलाफ़ गैर जमानती धाराओं में मुंबई पुलिस ने समन जारी किया था

दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगा: ED ने ताहिर हुसैन के खिलाफ कड़कड़डूमा कोर्ट में दायर किया आरोपपत्र, प्रॉडक्शन वारंट जारी

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने उत्तर पूर्वी दिल्ली हिंसा से जुड़े एक मामले में आम आदमी पार्टी (AAP) के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक अधिनियम (पीएमएलए), 2002 की धारा 44 और 45 के तहत कड़कड़डूमा कोर्ट में आरोपपत्र दायर किया है।

मामले में दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट का कहना है, “अभियुक्तों की संलिप्तता के बारे में प्रथम दृष्टया पर्याप्त भड़काऊ सामग्री है।” इसके अलावा ईडी की चार्जशीट में अमित गुप्ता नाम के एक शख्स को भी आरोपित बनाया गया है। कड़कड़डूमा कोर्ट ने ईडी के चार्जशीट का संज्ञान लिया है और ताहिर हुसैन के खिलाफ प्रॉडक्शन वारंट जारी किया है। वहीं कोर्ट ने अमित गुप्ता को 19 अक्टूबर को पेश होने के लिए कहा है।

इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (अक्टूबर 16, 2020) को इस साल फरवरी में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए साम्प्रदायिक दंगे के मामलों में दाखिल चार आरोपपत्रों पर संज्ञान लिया था। इनमें से दो आरोप पत्र आम आदमी पार्टी से बर्खास्त पार्षद ताहिर हुसैन और दो आरोपपत्र निजी स्कूल मालिक फैसल फारूक के खिलाफ थे।

वहीं अदालत ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में फरवरी के सांप्रदायिक हिंसा से जुड़े दो मामलों में दो व्यक्तियों को यह कहते हुए जमानत दे दी है कि मामलों में शिकायतकर्ता घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी नहीं थे। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने मोहम्मद सगीर और मेहताब को जफराबाद क्षेत्र में दंगों के दौरान तोड़फोड़ और वाहनों में आग लगाने संबंधित दो मामलों में से प्रत्येक में 25,000- 25,000 रुपए के निजी मुचलके और उतनी ही राशि के जमानती मुहैया कराने पर जमानत प्रदान की।

मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने शिव विहार इलाके स्थित राजधानी स्कूल के मालिक फैसल फारूक और 17 अन्य के खिलाफ दाखिल आरोपपत्र पर संज्ञान लिया था, जिसमें आरोप है कि वे पास के डीआरपी कॉन्वेंट स्कूल को दंगों के दौरान आगजनी और संपत्ति को नुकसान पहुँचाने में शामिल थे। इसके साथ ही अदालत ने दो आरोपपत्रों पर संज्ञान लिया – एक हुसैन और नौ अन्य के खिलाफ और दूसरा हुसैन और पाँच अन्य के खिलाफ- जो खजूरी खास में दंगों से जुड़े हैं। अदालत ने कहा कि इन आरोपपत्रों में मामले को संज्ञान में लेने के लिए पर्याप्त सबूत है।

गौरतलब है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में सुनियोजित ढंग से सांप्रदायिक दंगा कराया गया। इसमें सैकड़ों लोगों की जान चली गई। कई परिवार बर्बाद हो गए, करोड़ों की संपत्ति जलकर राख हो गई। आम आदमी पार्टी की तुष्टीकरण की राजनीति के तहत अपराधियों को संरक्षण देने का काम किया गया।

असदुद्दीन ओवैसी ने मथुरा ईदगाह के खिलाफ RSS पर साधा निशाना, कहा- इस पर भी शुरु होगी हिंसक मुहिम

मथुरा की स्थानीय अदालत द्वारा कृष्णजन्मभूमि विवाद की याचिका स्वीकारने के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने ट्विटर के जरिए एक भड़काऊ बयान दिया है। ओवैसी ने अपने लोगों को संघ के डिजाइनों के प्रति सचेत रहने के लिए कहा। इसके अलावा ओवैसी ने कहा है कि संघ कृष्णजन्मभूमि मामले पर भी हिंसक मुहिम शुरू करेगी। बता दें याचिका में कृष्ण जन्मभूमि से सटे मस्जिद को हटाने की माँग की गई है।

ओवैसी ने ट्वीट किया, “जिस बात से डर था, वही हो रहा है। बाबरी मस्जिद से जुड़े फैसलों की वजह से संघ परिवार के लोगों के इरादे और भी मजबूत हो गए हैं। याद रखिए, अगर आप और हम अभी भी गहरी नींद में रहेंगे तो कुछ साल बाद संघ इस पर भी एक हिंसक मुहिम शुरू करेगी और कॉन्ग्रेस भी इस मुहिम का एक अटूट हिस्सा बनेगी।”

उन्होंने कहा कि मथुरा की जिला अदालत ने मथुरा की ईदगाह पर एक याचिका दाखिल की थी और कहा था कि लोगों को आरएसएस के डिजाइनों के प्रति सचेत रहना चाहिए।

ओवैसी ने पहले कहा था, “पूजा का स्थान अधिनियम 1991 पूजा के स्थान को परिवर्तित करने से मना करता है। गृह मंत्रालय को इस अधिनियम का प्रशासन सौंपा गया है, अदालत में इसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? शाही ईदगाह ट्रस्ट और श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ ने अक्टूबर 1968 में इस विवाद को हल किया। अब इसे पुनर्जीवित क्यों करें?”

गौरतलब है कि कुछ लोगों के समूह द्वारा श्रीकृष्ण जन्मस्थान के समीप बने ईदगाह को हटाने की माँग को लेकर मथुरा के जिला कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। जिसे जज ने 16 अक्टूबर, 2020 को स्वीकार कर लिया। इस मामले में अब अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी। कोर्ट ने दूसरे पक्ष को भी उनका मत रखने के लिए नोटिस जारी किया है।

इस संबंध में जिला जज मथुरा साधनी रानी ठाकुर की कोर्ट में 12 अक्टूबर को दायर की गई थी। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि के 13 एकड़ के कटरा केशव देव मंदिर के परिसर पर 17वीं शताब्दी में शाही ईदगाह बनाया गया था।

उनका कहना है कि इस समय जहाँ मस्जिद है कभी वहाँ कंस का कारागार था और वहीं पर कृष्ण का मंदिर था। मुगलों ने इसे तुड़वा कर वहाँ शाही ईदगाह मस्जिद बनवा दी।

बता दें इससे पहले मामले को लेकर मथुरा की सिविल जज कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन वहाँ से याचिका खारिज कर दी गई थी, जिसके बाद हिंदू पक्ष ने जिला जज की कोर्ट में अपील दाखिल की।

वह बाहुबली जिसके पीछे पड़ी रही यूपी-बिहार की पुलिस: अस्पताल में पूर्व मंत्री पर चलाई गोलियाँ, 15 साल खाई जेल की हवा, मिला RJD का साथ

बिहार की राजनीति में अपराध का कॉकटेल किसी से छिपा नहीं है। चुनाव सिर पर है और एक बार फिर से कई बाहुबली अब टिकट पाने की जुगाड़ में लग गए हैं। आज हम बात करेंगे उस नाम की, जिनका सिक्का कभी, ना सिर्फ बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश की अपराध की गलियों में भी चला करता था। 

बाहुबलियों की राजनीति, गुनाहों की गलियों से निकले उन सियासतदानों का सच है, जिनके दामन पर यूँ तो कई गुनाहों के दाग हैं, लेकिन सियासत के रसूख से उन्हें अलग पहचान मिलती है। ऐसे लोग खुद को जनता का ‘रहनुमा’ कहते हैं, लेकिन जनता की जुबान में उन्हें कभी अपराधी तो कभी बाहुबली कहा जाता है। बिहार की राजनीति में सक्रिय ऐसे ही लोगों की फेहरिस्त में एक नाम राजन तिवारी का भी है। राजन तिवारी ऐसे बाहुबली हैं, जिनका जलवा दो राज्यों यूपी और बिहार दोनों जगह रहा है।

श्रीप्रकाश शुक्ला के गैंग में सक्रिय रहे राजन तिवारी

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्में राजन तिवारी ने कॉलेज के वक्त से ही अपराध की राह पकड़ ली थी। यूपी के कुख्यात गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला का गैंग ज्वाइन कर राजन तिवारी ने जवानी के दिनों में ही साफ कर दिया था कि वह इसी राह पर चलेंगे। पहली बार राजन तिवारी का नाम राष्ट्रीय स्तर पर तब उछला, जब यूपी सरकार के विधायक रहे वीरेंद्र प्रताप शाही पर हमले में उनका नाम आया। 

यूपी के महराजगंज की लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से विधायक रहे वीरेंद्र प्रताप शाही मूल रूप से गोरखपुर कैंट के निवासी थे। 24 अक्टूबर 1996 को वह गोलघर कार्यालय से अपने घर जा रहे थे, जैसे ही वे कैंट में एक लॉज के पास पहुँचे तो उनकी कार पर बदमाशों ने जमकर फायरिंग की। हमले में शाही की जाँघ में गोली लग गई। लेकिन उनके गनर जयराम की मौके पर ही मौत हो गई। इस वारदात में श्रीप्रकाश शुक्ला और राजन तिवारी समेत चार लोगों को आरोपित बनाया गया था। हालाँकि, सबूतों के अभाव में राजन तिवारी को 2014 में बरी कर दिया गया।

यूपी पुलिस के डर से बिहार में रहने लगे राजन तिवारी

उत्तर प्रदेश में श्रीप्रकाश शुक्ला का एनकाउंटर होने के बाद राजन तिवारी बिहार भाग आए। यहाँ आकर उन्होंने फिर से गैंग बना लिया। यूपी पुलिस के डर से राजन तिवारी बिहार में रहकर ही अपने डर के साम्राज्य को चलाने लगे। इसी दौरान राजन तिवारी का नाम बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या में आया।

1996 में बिहार में मेधा घोटाला सामने आया। इंजीनियरिंग कॉलेजों में भर्ती कराने के नाम पर खेल हो रहा था। तब मुख्‍यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव ने सीबीआई जाँच की अनुशंसा कर दी तो बृज बिहारी संग उनके रिश्‍ते तल्‍ख हो गए। मंत्री पद तो गया ही, न्‍यायिक हिरासत में भी भेज दिए गए। हालाँकि, वहाँ बृज बिहारी की तबीयत खराब हो गई तो पटना के सबसे पॉश इलाके में बने पटना के इंदिरा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्‍थान में भर्ती कराया गया। यहीं उनकी जिंदगी का अंतिम अध्‍याय खून से लिखा जाना था।

गोलियों से छलनी हो गया था बृज बिहारी का शरीर

करीब 8 बजकर 15 मिनट हुए होंगे कि एक टाटा सूमो लगभग बीस कदम दूर आकर रुकी। पीछे एक अंबेसडर भी थी। एक शूटर ने तस्‍दीक की कि ये बृज बिहारी ही हैं और फिर पूरा अस्‍पताल गोलियों की गूँज से दहल उठा। एके-47, कार्बाइन, पिस्‍तौल जो कुछ हाथ में था, उसकी गोलियाँ बदमाशों ने बृज बिहारी के शरीर में उतार दीं। दोनों गाड़‍ियों में आए अपराधी हवा में गोलियाँ बरसाते हुए फरार हो गए। इस हत्याकांड में राजन तिवारी को निचली अदालत से आजीवन करावास की सजा भी हुई, लेकिन सबूतों के अभाव में वह साल 2014 में पटना हाईकोर्ट से बरी हो गए।

राजन तिवारी बिहार में लालू सरकार के मंत्री की हत्या में जा चुके हैं जेल

बृज बिहारी प्रसाद हत्याकांड में राजन तिवारी 15 साल चार महीने जेल में रहे, लेकिन सियासत के गलियारे में उनका रसूख बना रहा। इसकी वजह यह रही कि जेल जाने से पहले राजन तिवारी ने अपने ऊपर लगे दाग को छुपाने के लिए खादी पहन ली। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने आरजेडी का दामन थाम लिया। वह राजनीति में सक्रिय हो गए थे। यही वजह है कि जेल जाने से पहले और रिहा होने के बाद भी राजनीति में सक्रिय रहे।

मंत्री हत्याकांड में जेल जाने से पहले ही राजन तिवारी ने बिहार में सियासी जमीन तलाश ली थी। राजन तिवारी दो बार विधानसभा के लिए चुने गए। वह पूर्वी चंपारण के गोबिदगंज से लोजपा से विधायक रह चुके हैं। इसके अलावा राजन तिवारी 2004 में लोकसभा पहुँचने के लिए भी भाग्य आजमा चुके हैं।

दामन पर लगे दाग को छुड़ाने के लिए राजनीति में आए राजन तिवारी

लंबे समय तक जेल में रहने के चलते उनके रसूख में थोड़ी कमी जरूर आई है, लेकिन वह उसे दोबारा पाने की कोशिश में हैं। जेल से बाहर आने के बाद राजन तिवारी ने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले लखनऊ में बीजेपी की सदस्यता ली थी। इस पर काफी विवाद हुआ जिसके बाद उन्हें साइडलाइन कर दिया गया। इन दिनों दोबारा से बिहार विधानसभा चुनाव में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने 2016 में बीएसपी ज्वाइन किया था, लेकिन वहाँ से टिकट नहीं मिलने पर उन्होंने बीजेपी का रुख किया है।

लोजपा के प्रति झुकाव दिखा रहे हैं राजन तिवारी

बिहार विधानसभा चुनाव में राजन तिवारी लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के प्रति भी झुकाव दिखा रहे हैं। किसी जमाने में लालू प्रसाद यादव के करीबी रहे राजन तिवारी इन दिनों मीडिया में तेजस्वी यादव की कमियाँ और लोजपा प्रमुख चिराग पासवान की खूबियाँ गिनाने में लगे हैं। इतना ही नहीं राजन तिवारी ये भी मानते हैं कि बीजेपी और लोजपा की दोस्ती अटूट है।

माना जाता है कि बृज बिहारी हत्याकांड में एक साथ जेल जाने वाले पूर्व सांसद सूरजभान सिंह की मदद से राजन तिवारी लोजपा में जाने की कोशिश में हैं। हालाँकि, देखना होगा कि लोजपा या बीजेपी बिहार विधानसभा चुनाव में राजन तिवारी को टिकट देती है या नहीं।

1995 से 1998 के बीच राजन तिवारी के नाम से बिहार थर-थर काँपता था। राजन तिवारी कुख्यात बदमाश श्रीप्रकाश शुक्ला के दाहिना हाथ थे। श्रीप्रकाश शुक्ला ने जब यूपी के सीएम कल्याण सिंह को मारने की सुपारी ली उसके करीब तीन महीने बाद वो अपने गुर्गों के साथ मारा गया। लेकिन राजन तिवारी की जिंदगी की लकीर लंबी थी। वो सिर्फ न जिंदा बचा रहा बल्कि बिहार की राजनीति में ‘भद्र’ बन गया।

यह बात अलग थी कि उनके माथे पर दर्जनों मुकदमे दर्ज थे जिसमें सबसे महत्वपूर्ण बिहार सरकार में मंत्री बृज बिहारी प्रसाद का मर्डर था। राजन तिवारी के बारे में कहा जाता है कि उनके हाथ में एक के 47 हथियार तो होता था लेकिन वो दिमाग से काम करते थे। जिस तरह से श्रीप्रकाश शुक्ला बिना सोचे विचारे फैसला करता था उससे इतर जाकर राजन तिवारी सोचते थे।

प्रीतम सिंह की हत्या में भी आया नाम

वर्तमान में उन पर हत्या, लूट, अपहरण के 10 से अधिक मामले दर्ज हैं। राजन तिवारी पर उत्तर प्रदेश में पूर्व विधायक समेत कइयों की हत्या का आरोप है लेकिन दो दशक पहले एसटीएफ के इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह की हत्या का मामला ऐसा था जिसे लेकर महकमा अब भी क्षुब्ध है। इमानदार और तेज-तर्रार की छवि रखने वाले प्रीतम सिंह एसटीएफ की शुरूआती टीम का हिस्सा थे। माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला तक वह पहुँचने वाले थे कि उसके गुर्गों की गोली का शिकार बन गए। इस घटना के बाद समूचे प्रदेश की पुलिस भी श्रीप्रकाश के पीछे पड़ गई और उसे ढेर कर ही चैन लिया। 

अजीत सरकार हत्याकांड में भी रह चुके हैं आरोपित

राजन तिवारी बहुचर्चित माकपा नेता अजीत सरकार के हत्याकांड में भी आरोपित रह चुके हैं। राजन तिवारी के अलावा इस मामले में पप्पू यादव भी सजा काट चुके हैं। हालाँकि, इस मामले में भी पटना हाईकोर्ट ने दोनों को बरी कर दिया था। इस आपराधिक कृत्य की वजह से राजन तिवारी यूपी पुलिस के लिए वॉन्टेड बन चुके थे। यही वो वक्त था जब राजन तिवारी ने बिहार का रुख किया और कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए राजनीतिक जमीन तलाशने लगे।

बिहार की राजनीति में नेता और अपराधी एक सिक्के के दो पहलू

बिहार में बाहुबलियों का हमेशा बोलबाला रहा, ये किसी न किसी बड़े नेता के मददगार हुआ करते थे। वे उनके लिए बूथ कैप्चरिंग तक करवा देते थे। बदले में नेता भी उनकी हर बात मान लेते थे। कहा तो यहाँ तक जाता है कि बिहार की राजनीति में नेता और अपराधी एक सिक्के के दो पहलू हुआ करते थे। हालाँकि अब यहाँ कानून का राज चलता है। लेकिन, एक समय ऐसा भी था जब सरकार चाहे किसी की हो। लेकिन, राज बाहुबलियों का चलता था। वे खुद कानून बनाते। उनके खौफ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे पुलिस, डीएम और मंत्री तक की जान लेने से नहीं डरते थे, जिससे बिहार की जनता उस वक्त दिन में भी डरती थी।

‘पुलिस ने रसीदे लात-घूँसे-लप्पड़.. पीठ, एड़ियों पर दिए लाल निशान’: वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘कारवाँ’ का दावा

राजधानी दिल्ली में अहान पेनकर नाम के कथित पत्रकार ने दिल्ली पुलिस पर उनसे मारपीट करने का आरोप लगाया है। कथित पत्रकार का आरोप है कि उसके साथ तब मारपीट हुई जब वह एक 14 साल की लड़की के साथ हुए बलात्कार और हत्या के मामले की रिपोर्टिंग कर रहा था। अहान ने यह भी आरोप लगाया है कि दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसे बुरी तरह पीटा। अहान पेनकर वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘कारवाँ’ (Caravan) का कथित पत्रकार है। 

इस घटना की जानकारी ‘कारवाँ’ ने खुद ट्वीट करते हुए दी। वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट Caravan ने अपने ट्वीट में लिखा, “आज दोपहर (16 अक्टूबर 2020) में दिल्ली पुलिस ने कारवाँ के कर्मचारी अहान पेनकर के साथ मारपीट की। एसीपी अजय कुमार ने मॉडल टाउन पुलिस थाने के भीतर पेनकर को कई थप्पड़ और लातें भी मारी। जबकि पेनकर ने कई बार बताया कि वह पत्रकार है और इसके बाद उसने अपना पहचान पत्र (आईडी) भी दिखाया।” 

ट्वीट के अगले हिस्से में वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट कारवाँ ने लिखा, “पुलिस ने जबरन उसका मोबाइल छीना और रिपोर्टिंग के दौरान उसने जितने भी वीडियो बनाए थे सब डिलीट कर दिए। पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने के घंटों बाद छोड़ा और उसकी नाक, कंधे और एड़ी पर काफी चोटें आई हैं। दिल्ली में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के बाद हत्या हुई थी, जिसके विरोध में प्रदर्शन हो रहा था। पेनकर इस घटना पर रिपोर्टिंग कर रहा था। इस मामले में एफ़आईआर दर्ज कराने के लिए तमाम छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता मॉडल टाउन पुलिस थाने पर इकट्ठा हुए थे।”             

इस घटना पर अहान पेनकर का कहना था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान एक हाथ से वीडियो बना रहा था और दूसरे हाथ में पुलिस को दिखाने के लिए आईडी थी। फिर भी पुलिस उसे प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस थाने के भीतर ले गई। इसके बाद अहान ने कहा, “फिर एसीपी अजय कुमार थाने के भीतर दाखिल हुए और उन्होंने मुझे लोहे की रॉड से मारा। उन्होंने मेरे चेहरे पर पैरों से मारा जिससे मैं वहीं गिर गया और जब मैं ज़मीन पर गिरा हुआ था तब उन्होंने मेरी पीठ और कन्धों पर पैरों से मारा। इसके अलावा वहाँ कई और पुलिस अधिकारी मौजूद थे जिन्होंने प्रदर्शनकारियों को खूब पीटा।”

गौरतलब है कि कारवाँ वही वेबसाइट है जो अपनी ख़बरों की वजह से कम बल्कि ख़बरों के चलते पैदा होने वाले विवादों की वजह से ज़्यादा चर्चा में रहती है। वही वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट जो देश के तथाकथित आलोचनाधर्मी पत्रकार रवीश कुमार की प्रिय है। चाहे रेल में 10 यात्रियों की भूख की वजह से हुई मौत की फ़र्ज़ी ख़बर हो या हिंदुओं के गौमाँस खाने का अज्ञानी दावा

कालांतर में इस वेबसाइट ने हमेशा से ही संदिग्ध रही अपनी विश्वसनीयता को मतलब भर की हानि पहुँचाई ही है। यहाँ तक कि दंगे जैसे संवेदनशील मुद्दे से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दे पर भी कारवाँ की पत्रकारिता का रवैया अत्यंत निराधार रहा है।

26 फ़ीसदी FDI की अनुमति: केंद्र सरकार ने PIB मान्यता सहित डिजिटल मीडिया समूहों के उत्थान के लिए उठाए कई कदम

केंद्र सरकार ने डिजिटल मीडिया में विदेशी निवेश (FDI) के संबंध में अहम घोषणा की है। सूचना प्रसारण मंत्रालय ने इस मुद्दे पर प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि सरकार का उद्देश्य डिजिटल (न्यू) मीडिया के लिए ज़िम्मेदारी भरा माहौल तैयार करना है। 

इसके अलावा डिजिटल मीडिया को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना भी एक उद्देश्य है। डिजिटल मीडिया में 26 फ़ीसदी FDI की अनुमति होगी लेकिन इसके लिए सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इस कदम के एक और अहम मायने यह हैं कि इससे सरकार चीनी डिजिटल मीडिया पर भी लगाम लगा पाएगी।

सरकार द्वारा जारी किया गया यह आदेश स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर लागू होगा जिसमें एप्लीकेशन, वेबसाइट या न्यूज़ पॉडकास्ट बनाने वाले प्लेटफॉर्म मुख्य हैं। यह आदेश उन समाचार एजेंसियों पर भी लागू होगा जो डिजिटल मीडिया को ख़बरें प्रदान करती हैं। समाचार एग्रीगेटर्स को भी इस दायरे में रखा गया है। 

केंद्र सरकार द्वारा डिजिटल मीडिया समूहों को लगभग 1 वर्ष का समय दिया गया है जिससे वह इस अवधि में शेयर होल्डिंग से संबंधित मानदंडों को पूरा कर सकें। कुल मिला कर भारत में पंजीकृत और यहाँ मौजूद डिजिटल मीडिया समूहों पर 26 फ़ीसदी विदेशी निवेश का आदेश लागू होगा।      

केंद्र सरकार के इस फैसले का एक और बड़ा फायदा यह है कि अब विनियामक ओवरसाईट बनाई जा सकती है। इसका मुखिया (सीईओ) भारत का नागरिक होना चाहिए और विदेशी समूहों के लिए सुरक्षा स्वीकृति भी ज़रूरी हो जाती है। इस तरह के दिशा निर्देश अभी तक सिर्फ ब्रॉडकास्ट मीडिया पर लागू होते थे लेकिन अब यह डिजिटल मीडिया में भी प्रभावी होंगे। 

फ़िलहाल भारतीय डिजिटल मीडिया की दुनिया में ऐसे तमाम समूह हैं जो चीन से जुड़े हुए हैं। इसमें यूसी न्यूज़, ओपेरा न्यूज़, डेली हंट, हैलो, न्यूज़ डॉग आदि शामिल हैं, इनके अलावा भी दूसरे देशों के कई डिजिटल मीडिया समूह शामिल हैं। इनसे देश के हित और चुनाव प्रभावित हो सकते थे, अब इसे रोकने में मदद मिलेगी। ऐसा विदेशी निवेश स्वीकार किया जाएगा जिनसे हित सुनिश्चित हो सके। इसके अलावा भारतीय सीईओ होने से भी सकारात्मक नतीजे हासिल होंगे। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो चीनी और विदेशी मीडिया पर लगाम लगा पाना आसान होगा। 

सरकार का यह कदम नीतिगत है जिससे डिजिटल युग के तमाम ख़तरों का सामना करने में मदद मिलेगी। इंटरनेट किफ़ायती दाम पर उपलब्ध है इसलिए इसके दुरूपयोग की गुंजाईश काफी ज़्यादा है, सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है फ़ेक न्यूज़। इस श्रेणी के ख़तरों से निपटने में भी काफी आसानी होगी।  

सरकार की तरफ से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत पत्रकारों और संवाददाताओं के लिए जल्द बड़ा ऐलान हो सकता है। सरकार आगामी कुछ वर्षों में डिजिटल समसामयिक विषयक एवं समाचार मीडिया निकायों के पत्रकारों/संवाददाताओं, वीडियोग्राफर्स और छायाकारों को पीआईबी मान्यता के समानांतर लाभ देने पर विचार करने वाली है। 

इसके अलावा केंद्र सरकार ने डिजिटल मीडिया निकायों से खुद के हितों को आगे बढ़ाने और सरकार के साथ संवाद के लिए स्वयं नियमन संस्थाओं के निर्माण की अपील भी की। मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आधिकारिक बयान में यह भी कहा गया है कि परंपरागत मीडिया (अखबार, टेलीविज़न) को जितने लाभ प्राप्त हैं। आने वाले समय में यही लाभ ऐसे डिजिटल मीडिया निकायों को देने पर किया जा रहा है जो ख़बरों से लेकर समसामयिक विषयों की अपलोडिंग और स्ट्रीमिंग कर रहे हैं। 

इसमें तमाम प्रकार की सुविधाएँ शामिल हैं, जिसमें सबसे अहम संवाददाताओं/पत्रकारों, छायाकारों, वीडियो ग्राफर्स को पीआईबी की मान्यता, आधिकारिक संवाददाता सम्मलेन का हिस्सा बनने की अनुमति जैसे अहम लाभ शामिल हैं। इस आदेश की स्वीकृति के बाद सीजीएचएस लाभ और रियायती रेल किराया भी मिलना सम्भव होगा। इसके अलावा डिजिटल मीडिया निकाय ब्यूरो की सहायता से डिजिटल विज्ञापन के लिए योग्य हो जाएँगे जिससे उनके रेवेन्यू के नए अवसर भी बनेंगे।        

शादी की उम्र तय करना जरूरी, ताकि महज सेक्स की वस्तु और बच्चा पैदा करने वाली मशीन बनकर न रह जाएँ बेटियाँ

भारत में बाल विवाह को कुप्रथाओं की सूची में रखकर उसकी आलोचना करने का काम कई कथित बुद्धिजीवी समय-समय पर करते आए हैं। हालाँकि, इसके ख़िलाफ़ कोई ठोस कदम उठाने के लिए शायद ही कभी इनमें से कोई प्रयासरत हुआ हो। सबने इसे समाज की परंपरा मानकर ऐसे स्वीकारा, जैसे लकड़ी में दीमक और लोहे में जंग लगने की बात को स्वभाविक माना जाता हो।

वो दौर बिलकुल अलग था जब समाज में रहकर और समाज की ही बनाई कुरीति के ख़िलाफ़ राजाराम मोहन रॉय और केशव चंद्र सेन ने ब्रिटिश सरकार से स्पेशल मैरिज एक्ट पास करवाया था ताकि भारतीय समाज में विवाह की एक उम्र निर्धारित हो। इसमें लड़कों की शादी 18 साल से पहले और लड़कियों की शादी 14 साल से पहले प्रतिबंधित कर दी गई थी।

हाँ, ये बात और है कि समाज सुधार की ओर हुए इस प्रयास का कोई खासा फर्क देखने को नहीं मिला। लोग अपनी बनाई कुरीतियों का अपनी स्थिति के अनुसार अनुसरण करते रहे। बच्चों की शादी 2-3 साल की उम्र में हुई और किसी-किसी को तो पैदा होने के साथ ही शादी के बंधन में बाँध दिया गया।

मगर, इस एक्ट के अस्तित्व में आने का फायदा यह हुआ कि आगे चलकर इसी में सुधार किए गए व आजाद भारत में लड़कों की शादी की उम्र बढ़ाकर 21 वर्ष और लड़कियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई। 

लड़कियों की शादी के लिए उपयुक्त उम्र क्या होनी चाहिए? यह बहस वर्तमान में भी जारी है। लेकिन, आज एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इस मुद्दे को उठा कर देश की सैंकड़ों जागरूक लड़कियों को एक आत्मसंतुष्टि और उम्मीद की किरण प्रदान की है। 

संतुष्टि इस बात की कि यदि देश के प्रधानसेवक, जिनकी बातों का प्रभाव शहर की एलिट जनता से लेकर सुदूर गाँव में बैठे किसान तक पर पड़ता है, वह इस विषय पर गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं तो जाहिर है तो समाज में सकारात्मक बदलाव की नींव पड़ने वाली है। यह प्रक्रिया हो सकती है बहुत धीमी हो, किंतु इसका असर निस्संदेह ही प्रभावशाली होगा। उससे भी प्रमुख बात ये कि आखिरकार इस दौर में किसीने इस विषय की गंभीरता को समझा और उस पर फिरसे विचार करना आवश्यक माना है।

कुछ लोगों को लगेगा कि 18 साल की उम्र में आखिर क्या कमी है? इस विषय पर विचार क्यों किया जा रहा है? कौन सा ‘अनपढ़’ समाज अभी ही इस आयु सीमा का लिहाज करता है या कौन सा पढ़ा लिखा तबका अपनी बच्चियों को इस उम्र में विवाह योग्य मानता है? 

ये सारे सवाल किसी भी व्यक्ति विशेष के जहन में उठना बेहद लाजिमी है, वो भी तब जब उसे न समाज के हित से कुछ लेना-देना हो, और न लड़कियों के भविष्य से! मगर, ये प्रश्न उन लड़कियों के लिए किसी तीर से कम नहीं है जो आगे बढ़ने के सपने देखती हैं और उनके परिजन उन्हें 18 की होते ही विवाह सूत्र में बाँध देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ये सब आज भी आम है। वहाँ इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलेते हैं।

शिक्षा, व्यवहार, स्वास्थ्य के लिहाज से क्यों गलत है शादी के लिए 18 साल की आयु

शिक्षा के लिहाज से देखें तो कम से कम 3 साल की उम्र में एक बच्चे को स्कूल भेजा जाना शुरू होता है। 2 साल तो वह सिर्फ़ अपने आस पास की चीजों को ग्रहण करने में लगा देता है और 5 साल की उम्र तक वह पहली कक्षा में कदम रखता है। बिन किसी रुकावट यदि निरंतर पढ़ाई चलती रहे तो 12वीं कक्षा 17 साल की उम्र तक पूरी होती है। कहीं-कहीं ये आँकड़े 1-2 साल ऊपर नीचे भी हो जाते हैं। 

ऐसे में, यदि आज के दौर में भी लड़कियों की उम्र 18 साल कम से कम शादी की है तो उन रूढ़िवादी घरों में तो वह पहले ही अपनी उच्च शिक्षा से वंचित हो जाती हैं, जहाँ कानूनी पचड़े में फँसने से अच्छा, लड़की के 18 की उम्र पूरी होने का इंतजार किया जाता है, जहाँ मंशा तो कुरीतियों से प्रभावित होती है, मगर कानून का डर उन्हें 18 साल तक रोके रखता है। और जैसे ही लड़की इस तय आयु की सीमा के आसपास पहुँचती है, वह उसे विदा करने का इंतजाम कर देते हैं।

व्यवहारिक बदलाव की बात करें तो कम उम्र में शादी के कारण न केवल लड़की की शिक्षा पर इसका प्रभाव पड़ता है बल्कि उसके व्यवहार में भी अकस्मात् परिवर्तन आने लगते हैं। कुछ लड़कियों को तो अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु ही पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ इतनी बढ़ती चली जाती हैं कि या तो उसके भीतर गुस्सा उमड़ता है या फिर वह एकदम शांत होती जाती हैं। पुराने समय में नारी का खुद के प्रति नीरस रहना और बेवजह घरेलू कलह का बढ़ाना शायद इन्हीं प्रथाओं का परिणाम था। अगर, हमेशा से लड़की को उसे और उसकी संरचना को समझने का मौका दिया जाता, तो शायद ऐसी स्थितियाँ ही पैदा नहीं होतीं।

जीव विज्ञान में 10 से 19 वर्ष की आयु तक के बच्चे (लड़का हो या लड़की) को किशोर अवस्था में माना जाता है। किशोर अवस्था में लड़की हो या लड़का- उसके शरीर में तरह तरह के बदलाव हो रहे होते हैं। शरीर की बनावट से लेकर स्वभाव तक में स्वत: ही परिवर्तन झलकने लगता है। ऐसे में लड़का तो समाज के चार लोगों के साथ उठते-बैठते वक्त अपने भीतर हो रही तबदीली को कई हद तक समझ भी पाता है, मगर लड़कियाँ चार दिवारी में असहज से सिर्फ़ उधेड़ बुन में रहती हैं कि आखिर इन बदलावों के परिणाम क्या है?

फिर कम उम्र में विवाह और माँ बनने का इंतजार लड़कियों की सभी जिज्ञासाओं को मार देता है। उन्हें उसी में खुशी ढूँढनी पड़ती है, जिसकी ओर समाज और परिवार इशारा करते हैं। किशोरावस्था से लेकर युवावस्था तक में उसे केवल सेक्स की वस्तु और बच्चे पैदा करने की मशीन समझ लिया जाता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में आपने देखा होगा पुराने समय में अधिकाँश महिलाओं की उम्र और उनके बच्चों की उम्र में कोई खासा फर्क नहीं होता। इसकी वजह छोटी उम्र में हुआ विवाह ही होता है। खेलने कूदने की उम्र में लड़की को गर्भधारण करवा दिया जाता है। कई बार बच्ची अपने अपनी दर्द सहने की क्षमता पर विजयी होकर शिशु को जन्म भी दे देती है, लेकिन कई बार उसे समाज की बनाई कुरीति की भेंट भी चढ़ना पड़ता है, क्योंकि ये बात जाहिर जो लोग एक बच्ची को माँ बनाने की कल्पना कर सकते हैं, उन्हें उसके स्वास्थ्य से क्या सरोकार होगा? वो आखिर क्यों अस्पताल या फिर आशा वर्कर की ओर भागेंगे? शर्मनाक बात तो ये होती है कि कई बार कम उम्र में लड़कियों के साथ शादी करने वाले दोगुने उम्र के व्यक्ति भी होते हैं, लेकिन तब भी उन्हें उस बच्ची से एक शिशु की अपेक्षा रहती है।

लड़की की यदि शारीरिक क्षमता के मुताबिक देखा जाए तो 20-24 साल में लड़की में फर्टिलिटी रेट सबसे अधिक होती है। इसके बाद परिपक्तवा के साथ माँ बनने के लिए सबसे अच्छी 25-29 भी मानी जाती है। 30 की उम्र के बाद लड़की को माँ बनने में परेशानी होती है और उसकी प्रजनन क्षमता घटने लगती है। इसका मतलब ये नहीं होता कि वह  30 के बाद माँ बनने में अक्षम हो जाती हैं, बस उम्र बताने का तर्क यही है कि गर्भाधान की क्षमता बढ़ती उम्र के साथ घटती जाती है और परेशानियाँ उत्पन्न जरूर होती हैं। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि उसे 18 साल की उम्र में ही उसकी शादी करवाकर उसे माँ बनने को मजबूर कर दिया जाए। 30 से पहले और 18 के बाद, 20 से 29 की उम्र तो बचती है न!

जब बाल विवाह को रोकने के लिए लड़की की न्यूनतम उम्र 18 की गई, तो समय के मुताबिक वह एक क्रांतिकारी बदलाव था। मगर, अब यह समय की जरूरत है कि इसमें फिर बदलाव लाया जाए ताकि लड़की संभोग की वस्तु न रहकर समाज के उत्थान में भागीदार बनें।

लड़कियों के लिए सरकार जो योजनाएँ ला रही है उनका उद्देश्य है कि लड़कियों की भागदारी समाज कल्याण में और अधिक बढ़े। ऐसे में अगर लड़कियाँ मात्र 12वीं पास करके पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दी जाएँगी तो सरकार का उद्देश्य कभी पूरा नहीं होगा और उनका मानसिक विकास व शारीरिक विकास भी ख़िलवाड़ बन कर रह जाएगा।

लड़की को शिक्षा के स्तर पर सशक्त बनाना हो या शारीरिक रूप से परिपक्व बनाना हो, जरूरी है कि अब यह उम्र का दायरा थोड़ा और आगे बढ़े व मुमकिन हो तो 21 साल तक इसे किया ही जाना चाहिए।

निस्संदेह ही इस फैसले का असर समाज के कुछ तबकों पर बहुत देर से पड़ेगा खासकर ग्रामीण इलाकों में। मगर जब एक समय आने पर इसे हर चौथे घर में रिवाज की तरह अपना लिया जाएगा, इसे लेकर जागरूकता फैलाई जाएगी, तो यह हर घर तक पहुँचने में समय नहीं लेगा और शहर की किशोरियों की तरह ही ग्रामीण क्षेत्रों में पलने वाली लड़कियों का विकास और आर्थिक स्थिति में उनकी भागीदारी, सब बहुत तेजी से बढ़ती देखने को मिलेगी।

कुछ उदाहरण अगर एक बार स्थापित हो गए तो पिछड़ी सोच रखने वाले उन लोगों का विकास भी होगा जिन्हें लड़की की उम्र बढ़ने के साथ अपनी नाक का डर सताने लगता है। जिन्हें लगता है कि लड़की के किशोर अवस्था में प्रवेश करते ही वो किसी के भी साथ भाग जाएगी, या उसका किसी के साथ शारीरिक संबंध बन जाएगा।

ये बात अक्सर सुनने में आती है कि भारत में लड़कियों की कम उम्र में शादी की प्रथा शुरूआत से नहीं थी। मगर, जब विदेशी आक्रांताओं का जुल्म देश पर बढ़ने लगा और वह बच्चियों तक को अपनी भोगविलास की वस्तु समझने लगे, तो लोगों ने बच्चियों के अपहरण और बलात्कार रोकने के लिए इस प्रथा को प्रचलित किया और बाद में समय के साथ बिना संदर्भ समझे इसे परंपरा मान लिया गया। कुछ लोगों ने इस पौत्र सुख पाने से भी जोड़ कर सही साबित करने का प्रयास किया लेकिन इसके नतीजे महिलाओं के लिए सिर्फ़ घातक रहे। शिशुओं और माताओं की मृत्यु दर में वृद्धि हुई और शारीरिक व मानसिक विकास भी कम होता गया।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह आह्वान एक आशा की तरह है कि जो यदि चरितार्थ हो गया अगर तो लड़कियों को सपने देखने की आजादी, उन्हें पूरा करने के लिए संसाधन, सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने का मौका, खुद को साबित करने का अवसर, सब थोड़े और समय तक मिल पाएगा। देखना है कि केंद्र सरकार द्वारा गठित की गई समिति क्या रिपोर्ट देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज उन सभी जागरूक लड़कियों को आश्वासन दिया है जो इस मामले पर जल्द से जल्द फैसला लेने के लिए गुहार लगा रही हैं।

फिरोजाबाद में BJP नेता की हत्या के आरोप में मुख्य आरोपित सहित 3 गिरफ्तार: बाइक पर सवार बदमाशों ने सीने पर मारी थी गोली

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में भारतीय जनता पार्टी के नेता की हत्या के मुख्य आरोपित समेत 3 लोगों को हिरासत में लिया गया है। शुक्रवार (अक्टूबर 16, 2020) रात अपराधियों ने दुकान बंद कर घर जा रहे बीजेपी नेता दयाशंकर गुप्ता की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

फिरोजाबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) सचिंद्र पटेल ने जानकारी देते हुए बताया, “वारदात के मुख्य आरोपित सहित तीन लोग गिरफ्तार किये गए हैं। पुलिस सभी आरोपितों से पूछताछ कर रही है।” शुक्रवार रात हुई इस घटना से इलाके में हड़कंप मचा हुआ है। घटना के बाद गुस्साए व्यापारियों ने जाम लगा दिया।

यह घटना टूंडला विधानसभा की है। यहाँ थाना नारखी क्षेत्र के नगला बीच निवासी 42 वर्षीय दयाशंकर गुप्ता की परचून की दुकान है। वह बीजेपी के मंडल उपाध्यक्ष भी हैं। शुक्रवार रात करीब 8 बजे वह दुकान बंद कर रहे थे। तभी एक बाइक पर सवार तीन बदमाश आए और तमंचे से उन पर गोली दाग दी। गोली बीजेपी नेता के सीने में जाकर लगी, जिससे वह लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े। नेता को आनन-फानन में अस्पताल में ले जाया गया, जहाँ डॉक्‍टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

बीजेपी नेता की मौत की खबर लगते ही नगला में व्यापारियों ने एकत्र होकर जाम लगा दिया। घटना की जानकारी होते ही एसपी सिटी मुकेश चंद्र मिश्रा समेत कई थानों का फोर्स मौके पर पहुँच गया। पुलिस ने किसी तरह समझा-बुझाकर जाम खुलवाया। परिजनों ने बताया कि उपचुनाव के लिए बीजेपी प्रत्याशी के नामांकन से वापस लौटने के बाद दयाशंकर अपनी दुकान पर बैठे थे। दुकान बंद करते समय हमलावरों ने वारदात को अंजाम दिया।

फिरोजाबाद के भाजपा नेता की गोली मारकर हत्या के बाद आगरा के रामरघु हॉस्पिटल में भी हंगामा हुआ। भाजपा नेता की मौत के बाद परिजन और समर्थको ने जमकर हॉस्पिटल के बाहर हंगामा किया। आगरा के एम जी रोड पर जाम लगाने का प्रयास हुआ। एसपी सिटी पुलिस बल के साथ मौके पर मौजूद रहे। पुलिस ने आक्रोशित लोगों को समझाने का प्रयास किया। भाजपा नेता को गोली लगने के बाद आगरा के रामरघु हॉस्पिटल में रैफर किया गया था।

वहीं, घटना के पीछे प्रधानी की रंजिश बताई जा रही है, जिसमें डीके गुप्ता द्वारा 2015 में प्रधानी चुनाव लड़ा गया था। इस दरम्यान इनका अन्य विरोधी गुट से झगड़ा भी हुआ था। बताया जाता है कि दबंगों ने 2 दिन पूर्व दयाशंकर को जान से मारने की धमकी भी दी थी और शुक्रवार को इस घटना को अंजाम दिया गया। बताया जा रहा है कि इस बार भी मृतक डीके अपने गाँव में प्रधानी का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। उनके जीतने की पूरी उम्मीद थी। इस लिए भी आरोपितों द्वारा मारने की आशंका जताई जा रही है।

गौरतलब है कि इससे पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में मॉर्निंग वॉक पर निकले पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष संजय खोखर की हत्या कर दी गई थी। तीन अपराधियों ने इस वारदात को अंजाम दिया और फिर फरार हो गए। संजय खोखर को तीन गोलियाँ लगी थी, जिसके बाद मौके पर ही उनकी मौत हो गई