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TRP मामले की जाँच अब CBI के पास, UP में दर्ज हुई अज्ञात आरोपितों के खिलाफ शिकायत

TRP में गड़बड़ी का मामला अब CBI के हाथ में आ गया है। उत्तर प्रदेश सरकार की सिरफारिश के बाद लखनऊ पुलिस से जाँच का सारा जिम्मा CBI ने ले लिया है। इस संबंध में हजरतगंज थाने में कमल शर्मा नाम के शख्स ने शिकायत करवाई थी। वह ‘गोल्डन रैबिट’ कंपनी के सीआईओ हैं। यह शिकायत अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज हुई थी।

इस केस को आईपीसी की धारा 120(ब), 34, 406, 408, 409, 420, 463, 465, 486 के तहत दर्ज किया गया था। इसके अलावा इसमें आरोप लगाया गया था कि टीआरपी में फर्जी साधनों का उपयोग करके टीआरपी हेरफेर को अंजाम दिया गया।

टीआरपी स्कैम में दर्ज हुई एफआईआर
टीआरपी स्कैम में दर्ज हुई एफआईआर

एफआईआर में BARC को लेकर कहा गया कि चूँकि BARC, जिसने 2015 में अपना काम शुरू किया था, वह भारत में TRP रेटिंग मुहैया कराने वाली एक मात्र संस्था बनी हुई है, ऐसे में उसका विश्वसनीय और पारदर्शी होना अनिवार्य है।

टीआरपी स्कैम में दर्ज हुई एफआईआर
टीआरपी स्कैम में दर्ज हुई एफआईआर

इसमें लिखा कि अगर BARC कुछ चैनलों के लिए साजिश के तहत टीआरपी संबंधित डेटा जोड़कर काम करता है तो भारत में प्रोग्राम प्रोडक्शन, विज्ञापन व अन्य चीजों के नतीजे गंभीर हो सकते हैं। इससे उस चैनल, जिसके लिए टीआरपी में हेरफेर की गई हो, उसको गलत रूप से वित्तीय लाभ भी हो सकता है।

अपनी शिकायत में शिकायतकर्ता ने कहा कि उन्हें पता चला है कि कई चैनल और ब्रॉडकास्ट कंपनियों के साथ इन सबमें कई अज्ञात नाम हैं, जिन्होंने फायदा उठाने के लिए टीआरपी में हेरफेर की। सूचना से खुलासा हुआ है कि अज्ञात आरोपितों ने जानबूझकर एक साजिश के तहत व साझा इरादे के साथ न केवल टीआरपी से छेड़छाड़ की बल्कि घरों की पहचान भी लीक कर दी।

FIR में कहा गया कि इस तरह की गहरी साजिश किसी एक व्यक्ति का काम नहीं हो सकती। इसमें कई अज्ञात आरोपित हैं जो टीआरपी में गड़बड़ी करने के लिए एक इरादे के साथ इकट्ठा हुए और उद्देश्य की पूर्ती के लिए साजिश रची व उसे गलत तरह से हासिल भी किया। इसमें गलत टीआरपी के कारण विज्ञापनदाताओं को भ्रमित करके विज्ञापन के पैसे लेने की भी बात है। साथ ही ये भी कहा गया कि अगर चैनल की सही टीआरपी दिखाते तो उन्हें विज्ञापन के पैसे कभी नहीं मिलते।

शिकायत में ये भी कहा गया कि अगर टीआरपी के मुताबिक विज्ञापन दिए जाते हैं जैसे जितनी ज्यादा टीआरपी उतनी अधिक विज्ञापन का शुल्क, तो यह प्रत्यक्ष रूप से विश्वासघात है। इसके बताया गया है कि जहाँ मीटर लगाए जाते हैं वह भी गोपनीय होता है और इसका जिम्मा उस शख्स पर होता है जो उसे इंस्टाल करता है। उस व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह कोई गोपनीय सूचना लीक न करे और अगर वह ऐसा करता है तो यह गोपनीय के अनुबंध और विश्वासघात का अपराध है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यूपी सरकार ने इस संबंध में सीबीआई जाँच की माँग की थी। उससे पहले महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस ने टीआरपी केस में ही यह बात स्वीकार की थी कि टीआरपी मामले में दर्ज की गई एफ़आईआर में रिपब्लिक टीवी का नाम शामिल नहीं है। कोर्ट में उनके वकील ने भी माना कि रिपब्लिक आरोपित नहीं हैं। बता दें कि महाराष्ट्र राज्य और मुंबई पुलिस की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल पेश हुए थे। अर्नब गोस्वामी ने इस संबंध में मुंबई पुलिस कमिश्नर पर परमबीर सिंह पर 200 करोड़ रुपए का मानहानि मुकदमा ठोका है।

क्या आप राहुल गाँधी और ओवैसी से देश के हितों की कल्पना करते हैं: योगी आदित्यनाथ

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इन दिनों बिहार चुनावों के मद्देनजर रैलियाँ कर रहे हैं। कल रामगढ़ से शुरू हुई उनकी रैली अब जमुई तक पहुँच चुकी है। इस बार इस क्षेत्र से भाजपा की ओर से श्रेयसी सिंह उम्मीदवार हैं। उनके पक्ष में जमुई की जनता को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने राहुल गाँधी और ओवैसी को जमकर आड़े हाथों लिया।

उन्होंने कहा, “इस समय राहुल और ओवैसी पाकिस्तान की तारीफ कर रहे हैं। क्या आप इन दोनों से देश की हितों की कल्पना करते हैं? क्या ये देश का हित करेंगे? देश के दुश्मन जो भारत के अंदर आतंकवाद फैला रहा हो, जो उसके हित की बात कर रहा हो, उससे उम्मीद ही क्या कर सकते हैं?”

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रैली में कहा कि जो भी भारत के हितैषी हैं वे प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के नेता पाकिस्तान की तारीफ करते हैं। कुछ लोगों को कश्मीर से धारा 370 हटाने पर बहुत पीड़ा हुई। कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और ओवैसी को इतनी पीड़ा हुई थी वे बार-बार इसका विरोध करते रहे। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भी जानते हैं कि भारत के खिलाफ अगर कुछ भी करेंगे तो भारत की सेना घुसकर मारेगी।

उन्होंने लालू प्रसाद यादव के जंगलराज वाले दौर की तुलना नीतीश कुमार के समय से करते हुए कहा, “आज जो राशन मोदी और नीतीश जी के कारण गरीबों को प्राप्त हो रहा है, आखिर ये राशन लालू के शासनकाल में गरीबों को क्यों नहीं मिल पाता था? जिन लोगों ने गरीबों का राशन खाया क्या आप उन लोगों से उम्मीद करते हैं कि वो आप लोगों को रोज़गार देंगे?”

अपने संबोधन में योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रत्याशी श्रेयसी सिंह की तारीफ की और कहा कि उन्होंने हर जगह जमुई का नाम रौशन किया है। अब वह पहला कदम बढ़ाकर राजनीति में आई हैं, अपने पिता के नक्शे कदम पर चलना चाहती है। उनके पास विकास के लिए विजन है।

आगे सीएम योगी ने राजद के तेजस्वी यादव पर हमला करते हुए पूछा, “राजद के युवराज 10 लाख युवाओं को रोजगार देने की बात करते हैं। उनसे मैं पूछना चाहता हूँ कि 15 वर्षों के शासनकाल में उनके पिता और माता जी ने कितने को नौकरी दी। अगर गरीबों के उत्थान के लिए थोड़ा भी सोचा होता तो गरीबों का मकान, गैस कनेक्शन से लेकर सारी सुविधाएँ मिल गई होती। राजद के पोस्टर में एक ही परिवार के 4 लोगों का फोटो है। रघुवंश बाबू इसी का विरोध किया करते थे।” उन्होंने कहा कि वैसे लोगों के लिए परिवार ही देश है जो सर्वोपरि है।

मुख्यमंत्री ने सबका साथ सबका विकास का आह्नान दोहराते हुए कहा, “सबका साथ, सबका विकास हमारा मंत्र है। हमारे लिए पूरा देश परिवार है, देश हित सर्वोपरि है। लेकिन बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनके लिए परिवार ही पार्टी है, पार्टी ही देश है। उससे बाहर ये देख ही नहीं सकते।”

बंद किया गया पेरिस का मस्जिद, हमास समर्थित समूह भी भंग: शिक्षक सैमुअल की श्रद्धांजलि सभा में उपस्थित रहेंगे राष्ट्रपति मैक्रों

फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक इतिहास के शिक्षक सैमुअल की सिर्फ इसीलिए हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उन्होंने अभिव्यक्ति की आज़ादी की पढ़ाई के दौरान छात्रों को पैगम्बर मुहम्मद का कार्टून दिखाया था। इस वारदात के बाद घृणा फैलाने वालों और इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई के बीच फ्रांस ने पेरिस के बाहर स्थित एक मस्जिद को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। ‘The Grand Mosque of Pantin’ पर ताला जड़ दिया गया है।

ये मस्जिद फ्रांस की राजधानी पेरिस के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में स्थित एक सबअर्ब में स्थित है, जो बाकी इलाकों से थोड़ा पिछड़ा हुआ है। इस मस्जिद ने अपने फेसबुक पेज पर शिक्षक सैमुअल पैटी की हत्या से पहले एक वीडियो जारी कर उनके खिलाफ घृणा फैलाई थी। प्रशासन ने मस्जिद के बाहर इसे बंद किए जाने का नोटिस चस्पा दिया है। फ्रांस में मजहब के आधार पर कट्टर शिक्षा देने वालों और देश की सुरक्षा में संभावित खतरा पैदा करने वाले विदेशियों पर कार्रवाई हो रही है।

इस मस्जिद को 6 महीने के लिए बंद किया गया है और बताया गया है कि ‘आतंकवादी घटनाओं से बचाव के एकमात्र कारण’ के लिए ऐसा किया गया है। फ्रांस के ‘Seine-Saint-Denis’ विभाग ने ये नोटिस जारी किया। ये भी पता चला है कि हत्यारा उस अभिभावक से संपर्क में था, जो शिक्षक के खिलाफ घृणा अभियान चला रहा था। साथ ही हमास के पक्ष में आए हुए पहले के एक आदेश को भी रद्द कर दिया गया है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि देशवासी कार्रवाई चाहते हैं और सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है। हत्यारे ने व्हाट्सप्प पर उस अभिभावक से चैट किया था, जिसकी बेटी ने पैगम्बर मुहम्मद का कार्टून दिखाने वाले शिक्षक की शिकायत की थी। इसके बाद उस अभिभावक ने इसे ‘पोर्नोग्राफी’ बताते हुए उन्हें बरखास्त करने की माँग के साथ विरोध में समर्थन जुटाना शुरू कर दिया था। हत्यारा अब्दुल्लाख भी पुलिस की गोली से मारा गया।

इस हत्याकांड के कुछ ही सप्ताह पहले फ्रेंच राष्ट्रपति ने ‘इस्लामी अलगाववाद’ के कारण चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि इस्लाम एक ऐसा मजहब है, जो पूरी दुनिया में ही संकटकाल से गुजर रहा है, सिर्फ फ्रांस में ही ऐसा नहीं है। फ्रांस के गृह मंत्री गेराल्ड ने कहा कि देश ‘अंदर के दुश्मनों’ से लड़ रहा है। फ्रांस में सक्रिय हमास का समर्थन करने वाले समूह को भंग कर दिया गया है। उसके मुखिया अब्देलहकीम से पुलिस पूछताछ कर रही है।

वहीं अब मस्जिद के प्रबंधक मोहममद हेंनीचे ने अब वीडियो शेयर करने को लेकर खेद जताया है। उन्होंने कहा कि ये वीडियो सिर्फ मुस्लिम छात्रों की चिंताओं के लिए शेयर किया गया था। साथ ही दावा किया कि इस्लाम में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। अब ‘Sorbonne’ विश्वविद्यालय में बुधवार (अक्टूबर 21, 2020) को उक्त शिक्षक को श्रद्धांजलि दी जाएगी, जिसमें राष्ट्रपति मैक्रों, पीड़ित परिवार और 400 अतिथि उपस्थित रहेंगे।

मंगलवार को संसद में भी इस घटना के कारण एक मिनट का मौन रखा गया। ‘Conflans-Sainte-Honorine’ में उसी दिन शाम को हजारों लोगों ने जमा होकर ‘मैं भी सैमुअल’ का नारा लगा आकर इस्लामी कट्टरपंथियों का विरोध किया। ‘शार्ली हेब्दो’ के अगले अंक में ‘सिर कटा हुआ गणतंत्र’ नाम से एक शीर्षक भी आने वाला है। इसके संपादकीय में बताया जाएगा कि कैसे ये हत्यारे लोकतंत्र का गला काटना चाहते हैं।

ज्ञात हो कि उधर वहाँ के 4 NGO ने ट्विटर के खिलाफ भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। हेट स्पीच पर लगाम लगाने में विफल रहने के कारण उसे कोर्ट में घसीटा गया है। हत्यारे का सन्देश और शिक्षक के मृत शरीर के साथ तस्वीर ट्विटर पर डाली गई थी, जिससे वहाँ के कई संगठन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से खफा हैं। हत्यारे ने अपने ट्विटर अकाउंट से भी आपत्तिजनक चीजें डाली थीं। वहाँ के ये NGO सरकार के साथ खड़े हैं।

जमुई से BJP प्रत्याशी श्रेयसी सिंह से चुनावी मुद्दों पर बातचीत। BJP’s Shreyasi Singh interview

बिहार की वैसी जगहों से ऑपइंडिया लगातार आप तक ग्राउंड रिपोर्ट्स ला रहा है, जो बिहार की असली कहानी बताती हैं। इसी शृंखला में मैं आज बिहार के जमुई गया जहाँ मैंने भाजपा प्रत्याशी श्रेयसी सिंह से चुनावी मुद्दों को लेकर बातचीत की। 

इस दौरान हमने उनसे उनके आदर्शों और विकास के पैमाने को जानने की कोशिश की। हमने श्रेयसी से यह जानने की कोशिश की कि उन्होंने बीजेपी को ही क्यों चुना, जबकि उनके पास कई विकल्प थे। इसके अलावा, उन्होंने जमुई जैसी मुश्किल सीट को ही क्यों चुना, इस पर भी विस्तार से बातचीत की।

यहाँ क्लिक कर देखिए यह वीडियो

‘लालू के रेल’ की तरह ही था बिहार का ‘चरवाहा विद्यालय’: जिस काम में लगे 6 विभाग, वो बना शराब, जुआ और ताश का अड्डा

लालू प्रसाद यादव के 15 साल के जंगलराज के दौरान अगर बिहार का सबसे ज्यादा किसी क्षेत्र में नुकसान हुआ, तो वो है – शिक्षा। शिक्षा के क्षेत्र में बिहार इतना पीछे चला गया, जिसकी कीमत उसे आज तक भुगतनी पड़ रही है। उस दौरान लालू यादव ने लाइमलाइट के लिए ‘चरवाहा विद्यालय’ जैसे प्रयोग तो किए, लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुआ। हाँ, बिहार की साक्षरता दर ज़रूर पानी माँगती हुई नज़र आई।

बिहार में मुजफ्फरपुर स्थित तुर्की में लालू यादव ने पहले ‘चरवाहा विद्यालय’ का उद्घाटन किया था। आज भी जाकर अगर आप इसकी हालत देखें तो आपको तरस आएगा। लालू यादव ने दावा किया था कि मवेशी चराने वाले बच्चे यहाँ पढ़ेंगे। लेकिन, वो इसका जवाब नहीं दे पाए कि आखिर बच्चे गाय-भैंस-बकरी चराएँगे ही क्यों? बच्चे सिर्फ शिक्षा क्यों नहीं लेंगे? सरकार का दावा था कि मवेशी चराने वाले बच्चे अपने जानवरों को आसपास छोड़ कर इस विद्यालय में पढ़ेंगे।

इसके लिए शिक्षकों की भी तैनाती की गई थी। लालू यादव द्वारा इसका उद्घाटन सुर्खियाँ भी बना था। गोपालगंज से लेकर गोरौल तक, हर जगह चरवाहा विद्यालय खुले। एक तरह से लालू यादव की सरकार ने बच्चों के मवेशी चराने को मान्यता दे दी और ये धारणा बना दी कि शिक्षा ज़रूरी हो या नहीं, लेकिन उनका मवेशी चराना ज़रूरी है। साथ ही उन्हें ज़िंदगी भर के लिए ‘चरवाहा’ के रूप में सीमित रखने का प्रयास किया।

लालू यादव ने ‘ओ गाय चराने वालों, भैंस चराने वालों.. पढ़ना-लिखना सीखो।‘ नारे के साथ बिहार या भारत ही नहीं बल्कि देश से बाहर भी अपनी सुधारवादी छवि बनाने की कोशिश की और 1-2 वर्षों तक तो सब ठीक रहा, लेकिन उसके बाद न तो शिक्षकों का कोई अता-पता था और न ही छात्रों का। जिन छात्रों को गाय-भैंस चराने को कहा जाए और साथ ही चारा काट कर ले जाने की ड्यूटी भी हो, वो भला पढ़ेंगे कैसे?

उनकी शिक्षा के लिए अगर पहले से ही मौजूद विद्यालयों को संसाधन-संपन्न बनाया गया होता, या फिर नए भवन बनवा कर अच्छे शिक्षकों की भर्तियाँ होती, तो शायद बात बन सकती थी। बच्चों को आर्थिक सहायता दी जाती पढ़ने के लिए, तो तस्वीर दूसरी होती। लेकिन, लालू यादव को खबर बनवानी थी। मुजफ्फरपुर में ‘चरवाहा विद्यालय’ के लिए 25 एकड़ की भूमि दी गई थी और इसका उद्घाटन दिसंबर 23, 1991 में हुई थी।

वहीं जनवरी 15, 1992 से ये विद्यालय चालू हो गया था। विद्यालय में 5 शिक्षक, ‘नेहरू युवा केंद्र’ के 5 स्वयंसेवी और इतने ही एजुकेशन इंस्ट्रक्टर्स की तैनाती की गई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका इतना प्रचार किया गया था कि अमेरिका और जापान तक से टीमों को बुला कर यहाँ घुमाया गया था। लालू यादव हमेशा से मार्केटिंग को लेकर नए तरकीब निकालते रहे हैं, ताकि वो चर्चा में बने रहें। अपने रेल मंत्रित्व काल में भी उन्होंने यही किया।

उनके रेल मंत्री रहते रेलवे के मुनाफे के किस्से दुनिया भर में मशहूर हुए। उन्होंने खुद की ‘मैनेजमेंट गुरु’ की छवि बना दी और तमाम घोटालों और 15 साल के जंगलराज के बावजूद सफ़ेद कुर्ते-पाजामे और संसद में मजाकिया बयान दे-दे कर उन्होंने मीडिया में अपनी छवि चमकाई। जबकि हुआ ये था कि लालू के दौर में रेल के पास कैश सरप्लस (नकद अधिशेष) 88,669 करोड़ रुपए बताया गया और मीडिया में इसकी खूब वाहवाही ली गई।

जबकि असलियत यह है कि ये राशि 39,411 करोड़ रुपए थी। यूपीए-2 के दौरान रेल मंत्री बनीं ममता बनर्जी ने ‘लालू के रेल’ की पोल खोली। सोचिए, एक सरकार अपने ही पिछले कार्यकाल के एक मंत्री की असलियत को सामने लाने के लिए ‘श्वेत पत्र’ लाने को विवश हो गई। एकाउंटिंग (लेखा परीक्षा) के उस वक़्त जो नियम-कायदे थे, उन्हें ही बदल डाला गया। कुछ यही हाल लालू यादव ने 15 सालों में बिहार की शिक्षा का भी किया था।

इसी तरह चरवाहा स्कूल को चलाने की जिम्मेदारी कृषि, सिंचाई, उद्योग, पशु पालन, ग्रामीण विकास और शिक्षा विभाग को दी गई थी। अब आप सोचिए, 6 विभागों को एक विद्यालय चलाने की जिम्मेदारी दी गई, वो भी उस बिहार में, जहाँ भ्रष्टाचार चरम पर था। फंड्स कौन से विभाग में कहाँ अटके रहेंगे और फाइलें कितने समय में एक दफ्तर से दूसरे तक का समय तय करेंगी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।

लेकिन, वो तो लालू यादव थे। उन्होंने बच्चों को मध्याह्न भोजन, दो पोशाकें, किताबें और मासिक छात्रवृत्ति के रूप में 9 रुपए देने की घोषणा की थी। भले ही आज से 30 वर्ष पहले 9 रुपए की वैल्यू ज्यादा रही होगी, लेकिन क्या इतने कम की छात्रवृत्ति से बच्चे पढ़ सकते हैं? एक सुस्त प्रशासन के सुस्त अधिकारियों को एक नकारे राजनीतिक नेतृत्व के अंदर उन्हें काम करना था, जो संभव नहीं हो पाया।

बाद में राजद कहने लगी कि बाहर के लोगों ने इसकी खूब तारीफ की लेकिन यहाँ के लोगों ने इस इस कदम को बदनाम किया, दुष्प्रचार किया। उस समय लालू यादव के साथ रहे जीतन राम माँझी, जो बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने, ने बीबीसी को बताया था कि ये एक ‘आईवॉश’ था, जिसका कोई व्यावहारिक लक्ष्य नहीं था और लालू यादव ने समाज को बेवकूफ बनाया। सब उनसे स्कूल-कॉलेज खोलने को कहते रहे और वो नज़रअंदाज़ करते रहे।

लालू यादव इसकी चर्चा के बाद बिहार में ‘पहलवान विद्यालय’ खोलने की बातें करने लगे, जहाँ उनके हिसाब से पढ़ाई के साथ-साथ लड़ाई (कुश्ती) भी होगी। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCIRT) ने अपने सर्वे में पाया था कि ये सभी विद्यालय जुआ, शराब और ताश खेलने वालों के अड्डे बन गए थे। लालू यादव 113 ‘चरवाहा विद्यालय’ खोलने की योजना बनाई थी। उन्होंने भोजपुरी में क्लास भी ली थी।

इस दौरान भी लालू यादव बच्चों को सलाह देते रहे कि वो अपने जमींदारों को ‘मालिक’ कहना छोड़ें, जो अच्छी बात है, लेकिन, वो खुद पूरे बिहार का ‘मालिक’ बन कर समाज को नियंत्रण में रखना चाहते थे। तभी तो आज भी जब राजद नेताओं और लालू यादव के सुपुत्रों से पूछा जाता है कि उन 15 सालों में क्या हुआ तो वो कहते नहीं थकते कि ‘सामाजिक न्याय’ हुआ। हालाँकि, ये क्या है, ये वो लोग आज तक नहीं समझा पाए।

जनसंघ: ‘राष्ट्रवाद’ को आवाज देने वाला पहला राजनीतिक दल, जिसके कार्यकर्ता सीमा से सियासत तक डटे रहे

देश के एक राजनीतिक दल से कितनी आशा की जानी चाहिए? एक राजनीतिक दल संकट के दौर में देश और देश की जनता के लिए कितनी अहम भूमिका निभाता है? इन सवालों के जवाब तलाशने पर पता चलता है कि जनता हर राजनीतिक दल का चुनाव करने से पहले उन्हें भरपूर आज़माती है। ऐसा ही एक जाँचा और परखा गया राजनीतिक दल है जनसंघ जिसकी पहचान आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी के रूप में होती है। वही राजनीतिक दल जिसकी पहचान किसी ज़माने में ‘दिया और बाती’ चिन्ह से होती थी। 

साल 1951 में आज ही के दिन, यानी 21 अक्टूबर को जनसंघ की स्थापना हुई थी। इसके बाद जितना कुछ हुआ वह पुरानी पीढ़ी के लिए इतिहास था और नई पीढ़ी के लिए वर्तमान। जनसंघ ने बीते अनेक दशकों में ऐसी कई वजहें दी जिनके आधार पर जनसंघ को जानना और समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है। चाहे वह जनसंघ का राजनीतिक इतिहास हो या युद्ध के दौरान निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका, नेताओं से लेकर कार्यकर्ता तक सभी ने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी भरपूर निभाई। 

जनसंघ का चुनावी इतिहास

1951 में स्थापना के बाद जनसंघ के सामने कई तरह की चुनौतियाँ थीं, जिसमें सबसे बड़ी चुनौती थी साल 1952 में होने वाले पहले लोकसभा चुनाव। ऐसा दौर जब देश में केवल 4 राष्ट्रीय राजनीतिक दल थे, देश के पहले चुनाव हुए और जनसंघ को 3 सीटें हासिल हुई। एक बात सुनिश्चित हुई कि देश में एक ऐसा राजनीतिक दल है जिसकी प्रस्तावना राष्ट्रवाद है। 1957 में देश के दूसरे लोकसभा चुनाव हुए और नतीजे आने पर दो विशेष बातें हुई, पहला जनसंघ को पिछली बार से 1 सीट ज्यादा हासिल हुई और स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार सांसद चुने गए। तीसरे और चौथे लोकसभा चुनावों में जनसंघ का प्रदर्शन अप्रत्याशित था, 1962 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ को 14 सीट हासिल हुई और 1967 के चुनावों में 35 सीटें।

इसके बाद जनसंघ को हासिल होने वाले परिणामों की सूरत बेहतर ही हुई, 1971 में हुए पाँचवे लोकसभा चुनावों में जनसंघ को 22 सीट मिली। फिर आया आपातकाल का दौर। आपातकाल के बाद 1977 में हुए छठे लोकसभा चुनावों में जनसंघ ने जनता पार्टी के साथ मिल कर चुनाव लड़ा। जनता पार्टी को कुल 295 सीट हासिल हुई और देश के तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक दल ‘कॉन्ग्रेस’ को करारी हार का सामना करना पड़ा। 30 महीने की इस सरकार के बाद 1980 में सातवें लोकसभा चुनाव हुए और इसमें जनसंघ को 35 सीटें हासिल हुई और साथ चुनाव लड़ रही जनता पार्टी को 31। फिर 6 अप्रैल 1980 में जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी की सूरत ली जो फ़िलहाल हमारे देश का सत्ताधारी दल है। 

जनसंघ के सामने आई चुनौतियाँ

ऐसे तो जनसंघ ने काल खंड में अनेक राजनीतिक समस्याओं का सामना किया लेकिन हर बड़ी मुश्किल से सकारात्मक नतीजे ही हासिल किए। जनसंघ देश का पहला राजनीतिक दल था जिसने ज़मींदारी और जागीरदारी का विरोध किया। जनसंघ ने ही जम्मू कश्मीर के मुद्दे पर तत्कालीन सरकार के रवैये का खुल कर विरोध किया। जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ही नारा था, “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे – नहीं चलेंगे।” इसके अलावा भारत ने जितनी बार पड़ोसी मुल्कों से युद्ध लड़ा उतनी बार जनसंघ ने अपनी उपयोगिता साबित की। सवाल उठता है कि सेनाओं के युद्ध में राजनीतिक दलों की कैसी भूमिका? 

1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया तब जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने सिविक और पुलिस ड्यूटी का किरदार निभाया। यही वजह थी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने साल 1963 के दौरान हुई गणतंत्र दिवस की परेड में इन कार्यकर्ताओं को मार्च करने के लिए बुलाया। 1965 के दौरान लाल बहादुर शास्त्री जी की सरकार में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में एक बार फिर जनसंघ और आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने वही भूमिका निभाई। इस बार कार्यकर्ताओं ने सैन्य मार्गों की सुरक्षा तक की और यह सिलसिला 1971 के दौरान इंदिरा गाँधी की सरकार में हुए युद्ध तक जारी रहा। 

अटल और आडवाणी ने निभाई अहम भूमिका

जनसंघ के सामने विसंगतियाँ भी कभी कम नहीं रही और चुनौतियों का यह सिलसिला देश की स्वतंत्रता के बाद से ही शुरू हो गया था। तमाम राजनीतिक दलों और विचारधाराओं के और कॉन्ग्रेस की सरकार के बीच खुद का अस्तित्व स्थापित करना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। पहले और दूसरे चुनावों में 3 और 4 सीटें जीतने के बावजूद जनसंघ का संघर्ष जारी रहा। 1968 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद जनसंघ के सामने सबसे बड़ा संकट नेतृत्व का था और फिर 1969 में अध्यक्ष चुने गए अटल बिहारी वाजपेयी। इसके बाद फिर लोकसभा चुनाव हुए और अटल जी की अगुवाई में जनसंघ ने देश की जनता को नारा दिया, “गरीबी के खिलाफ जंग।” 

इसी बीच लाल कृष्ण आडवाणी भी उभर कर आमने आए, पहली बार सांसद बने और फिर जनसंघ के अध्यक्ष। 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान भी जनसंघ ने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। 1977 में आम चुनाव हुए और महागठबंधन जनता पार्टी की सरकार बनी, अटल जी विदेश मंत्री बने और आडवाणी सूचना एवं प्रसारण मंत्री। भले सरकार 30 महीने में गिर गई पर 1980 में हुए सातवें लोकसभा चुनाव में जनसंघ ने एक बार फिर 35 सीट जीत कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इसके बाद जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी बनी, जिस पार्टी ने 1984 के चुनावों में 2 सीट जीती उसने ही 1989 के चुनावों में कुल 85 सीट हासिल की।        

जनता पार्टी के मुखिया जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल के दौर में जनसंघ के लिए एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था, “यदि जनसंघ सांप्रदायिक है तो मैं भी सांप्रदायिक हूँ।” इसके बाद जनसंघ/भारतीय जनता पार्टी ने जितनी लड़ाइयाँ लड़ी वह खुद में ऐतिहासिक थीं। चाहे वह 1990 के दौरान राम मंदिर के लिए सोमनाथ और अयोध्या के बीच रथ यात्रा हो या 1996 में 13 दिन और 1998 में 13 महीने की सरकार।

इस राजनीतिक दल के सामने विपरीत हालात कभी कम नहीं हुए, इसके बावजूद जनसंघ की मौजूदगी और प्रासंगिकता बराबर बनी रही। देश के राजनीतिक इतिहास में राजनीतिक दलों की कमी नहीं है लेकिन याद चर्चा और स्मरण उनका ही किया जाता है जिन्होंने जनता को निराश नहीं किया हो। अतीत कैसा भी रहा हो वर्तमान जनसंघ (आज की भाजपा) ही है। 

  

₹10 लाख प्रति सुनवाई: अर्नब गोस्वामी के खिलाफ लड़ाई में कपिल सिब्बल होंगे महाराष्ट्र की उद्धव सरकार के वकील

महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी ने आपराधिक मामला दायर किया था। इस ‘रिट पेटिशन’ पर सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे की सरकार की तरफ से कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल बतौर अधिवक्ता हिस्सा लेंगे। महाराष्ट्र की उद्धव सरकार का कोर्ट में प्रतिनिधित्व करने के लिए कपिल सिब्बल को 10 लाख रुपए और वकील राहुल चिंटिस को 1.5 लाख रुपए प्रति सुनवाई दिए जाने का निर्णय लिया गया है।

महाराष्ट्र की ‘महा विकास अघाड़ी’ सरकार के गृह मंत्रालय ने इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल की फी के लिए फंड्स जारी करने के लिए आदेश भी दे दिया है। इसमें बताया गया है कि प्रत्येक सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल को 10 लाख रुपए बतौर पेमेंट दिए जाएँगे। सुनवाई और सुनवाई पूर्व होने वाले विमर्श के लिए ये रुपए दिए जाएँगे। ये मामला पालघर में हुई 2 संतों की हत्या से जुड़ा हुआ है।

अर्नब गोस्वामी ने उस दौरान न सिर्फ महाराष्ट्र सरकार, बल्कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की चुप्पी पर भी सवाल खड़े किए थे। इसके बाद उनके खिलाफ महाराष्ट् सहित देश भर में दर्जनों FIR किए गए थे। तब उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर की थी। अर्नब गोस्वामी ने अपने शो में सोनिया गाँधी को ‘अंतोनिया माइनो’ कह कर बुलाया था, जिसके बाद उग्र कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनकी कार पर हमला भी किया था।

अर्नब गोस्वामी के साथ 11 घंटे तक पूछताछ भी हुई थी। इसके बाद बांद्रा में मजदूरों के जुटने के बाद भी अर्नब ने सवाल उठाए थे, तब उनके खिलाफ फिर से FIR दर्ज की गई। नवीं मुंबई में ‘रिपब्लिक’ के एक पत्रकार को हिरासत में लेने का आरोप भी महाराष्ट्र पुलिस पर लगा था। हाल ही में आरोप लगा कि चैनल के एक अन्य पत्रकार प्रदीप भंडारी को भी मुंबई पुलिस ने अवैध रूप से हिरासत में लेने की कोशिश की थी।

इधर महाराष्ट्र में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ और लोकप्रिय पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ बड़ी साजिश किए जाने का खुलासा हुआ है। शरद पवार की NCP के प्रवक्ता और महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार में अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मलिक का एक स्टिंग सामने आया है, जिसमें वो भविष्यवाणी करते दिख रहे हैं कि TRP स्कैम मामले से अर्नब गोस्वामी इतने हताश हो जाएँगे कि अंत में उन्हें आत्महत्या करनी पड़ेगी।

3.5 साल में 125 अपराधी मारे गए, 2607 घायल हुए: योगी सरकार ने 122 बलिदानी पुलिसकर्मियों के परिजनों को दिए ₹26 करोड़

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजधानी लखनऊ स्थित पुलिस लाइन में आयोजित पुलिस स्मृति दिवस परेड में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्होंने यूपी के पुलिसकर्मियों को सम्मानित किया और आँकड़े गिनाते हुए बताया कि उनकी सरकार की अपराध और अपराधियों के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस की नीति है, जिसके परिणाम स्वरूप विभिन्न जनपदों में दुर्दांत अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई के दौरान 20 मार्च 2017 से 5 अक्टूबर 2020 तक कुल 125 अपराधी मुठभेड़ में मारे गए और 2,607 घायल हुए।

उन्होंने अपनी सरकार बनने के बाद से अब तक, यानी साढ़े 3 साल तक के आँकड़े गिनाते हुए बताया कि कैसे उनकी सरकार ने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की है। ‘पुलिस स्मृति दिवस’ के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वीरगति को प्राप्त हुए सभी पुलिसकर्मियों को श्रद्धांजलि दी और कहा कि बलिदानी पुलिसकर्मियों के परिवार के साथ सरकार खड़ी हैं। अब तक ऐसे 122 परिवारों को कुल 26 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं।

सीएम योगी ने जानकारी दी कि कानपुर स्थित बिकरू गाँव में विकास दुबे के साथ हुए एनकाउंटर में बलिदान हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों को 50 लाख की जगह 1 करोड़ रुपए की सहायता राशि दी गई। पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ाने के लिए भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर पुलिसकर्मियों को विभिन्न पदक दिए गए। इस दौरान उन्होंने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिस की भी सराहना की। यूपी सीएम योगी ने अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पुलिसकर्मियों को सराहा।

2019-20 में उत्तर प्रदेश पुलिस के 9 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं। सीएम योगी ने कोरोना से निपटने के लिए यूपी पुलिस द्वारा किए जा रहे कार्यों की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि महिला बटालियन के लिए भी 3687 पद सृजित किए गए हैं। 1 सितंबर 2019 से 31 अक्तूबर 2020 तक देश भर में कुल 264 पुलिस के जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं, जिन्हें याद किया जा रहा है। यूपी के 9 में से 8 बिकरू कांड में ही बलिदान हुए।

इस मौके पर बिकरू कांड में वीरगति को प्राप्त हुए सीओ देवेंद्र मिश्रा, सब इंस्पेक्टर अनूप कुमार सिंह, सब इंस्पेक्टर महेश कुमार यादव, सब इंस्पेक्टर नेबूलाल, सिपाही जितेन्द्र कुमार पाल, सुल्तान सिंह, राहुल कुमार और बबलू कुमार के परिजनों को सम्मानित किया गया। सुल्तानपुर जिले में तैनात हेड सिपाही जितेन्द्र कुमार मौर्य के परिजनों को भी सम्मानित किया गया, जो अक्टूबर 3, 2019 को वीरगति को प्राप्त हुए थे।

उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर उठ रहे सवालों के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार (अक्टूबर 17, 2020) को बलरामपुर में ‘मिशन शक्ति’ की शुरूआत भी की थी। शारदीय से वासंतिक नवरात्र तक चलने वाले इस अभियान का उद्देश्य महिलाओं एवं बालिकाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन दिलाना है। मुख्यमंत्री ने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि महिलाओं, बेटियों, नाबालिग बच्चों और अनुसूचित जाति के लोगों के विरुद्ध अपराध करने वालों का सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं। 

पाकिस्तान: PM इमरान खान ने अप्रैल में गेहूँ मँगवाया था, अब रो रहा है कि उसकी बात कोई सुनता ही नहीं!

आटे के दाम उच्चतम स्तर पर पहुँचने के साथ ही पाकिस्तान के कई इलाकों में इन दिनों आटे की किल्लत चल रही है। इसी के चलते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने समय से गेहूँ आपूर्ति न होने पर मंगलवार (अक्टूबर 20, 2020) को अधिकारियों को फटकार लगाई। संघीय कैबिनेट की बैठक में अध्यक्षता करते हुए इमरान खान ने स्थिति को देखते हुए अपना गुस्सा भी व्यक्त किया।

पाकिस्तानी समाचार पत्र ‘डॉन’ की खबर के अनुसार, इमरान खान ने गेहूँ के आयात पर बात करते हुए कहा कि अगर इस साल जुलाई में 1.5 टन गेहूँ आयात किया जाता तो स्थिति औसत होती। यहाँ स्पष्ट कर दें कि डॉन की खबर में हो सकता है कि आँकड़े लिखते हुए कोई गलती हुई हो क्योंकि एक देश के लिए खाद्य सामग्री के रूप में 1.5 टन बहुत कम है, मुमकिन है कि वह 1.5 करोड़ टन की ओर इशारा कर रहे हों।

डॉन ने अपनी रिपोर्ट में एक अज्ञात सूत्र का हवाले से कहा है कि प्रधानमंत्री इमरान खान ने इसे प्रशासनिक नाकामी बताया है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस संकट का अंदाजा था था और उन्होंने अप्रैल में गेहूँ के लिए आदेश भी दिए थे, लेकिन तब भी इसका पालन नहीं हुआ। उन्होंने माना कि ब्यूरोक्रेसी ने राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (NAB) के डर से इस आदेश का पालन नहीं किया और यह भी माना कि अब इसकी सारी जिम्मेदारी सरकार पर आ गई है।

एक अन्य सूत्र ने बैठक की बात का खुलासा करते हुए बताया कि प्रधानमंत्री के सलाहकार ने भी इस बात की शिकायत की कि ब्यूरोक्रेशी ने NAB के डर से फाइलों को साइन नहीं किया।

सोमवार को हुए एक कार्यक्रम में इससे पहले प्रधानमंत्री इमरान ने कहा था कि इस साल अनुमान से परे बारिश हुई, खासकर गेहूँ की कटाई के मौसम में, जिससे फसल कम पैदा हुई और कीमत में वृद्धि हो गई।

बैठक में बताया गया कि पंजाब सरकार हर दिन 17,000 से 20,000 टन गेहूँ जारी कर रही है और माँग के अनुसार कमोडिटी के स्टोरों में भी आपूर्ति की जा रही है। यह भी बताया गया कि सिंध सरकार चालू माह में मिलों को 85,000 टन गेहूँ जारी कर रही है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों सोशल मीडिया पर पाकिस्तान की स्थिति को बयां करते कुछ वीडियो सामने आए थे। इस वीडियो से पता चला था कि पाकिस्तान के कई हिस्सों में आटा 75 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। कई जगहों पर तो आटे की किल्लत के कारण कुछ ही दुकानों पर आटा उपलब्ध होने की वजह से दुकानों पर लोगों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं। 

इसी दौरान एक शख्स आटा नहीं मिलने के कारण इतना दुखी और निराश हो गया कि वह अपना सिर पीट-पीट कर रोने लगा। जब मीडिया उसे कवर करने पहुँची तो उसने मीडिया के कैमरे के सामने अपना रोना-गाना शुरू कर दिया और इमरान खान सरकार को कोसते हुए अपने दुखड़े सुनाने शुरू कर दिए।

दरअसल, वह व्यक्ति कई दिनों से आटे के लिए तरस रहा था लेकिन उसे कहीं आटा नहीं मिला अंत में वह बेचारा रोने लगा। उसने वायरल वीडियो में बताया कि उसने व उसके परिवार बच्चों ने 3 दिनों से खाना नहीं खाया है। उसने बताया कि अपने बच्चों के कारण 3 दिनों से दौड़ रहा है पर उसे कहीं आटा नहीं मिल रहा है। 

वीडियो में वह व्यक्ति रोते हुए कहता है, “मैं अपने बच्‍चों के लिए तीन दिनों से दौड़ रहा हूँ लेकिन आटा नहीं मिल रहा है। 15 रुपए में एक रोटी मिल रही है। हम गरीब लोग कहाँ जाएँ, कहाँ से खाएँ। आटे के लिए इतना पैसा कहाँ से दूँ, दवाइयाँ कहाँ से खरीदूँ। हम सूखी रोटी भी खाने को तैयार हैं लेकिन वह भी नहीं मिल रही है। 3 दिन से मारा मारा फिर रहा हूँ आटे के पीछे।”

‘अर्नब इतने हताश हो जाएँगे कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़ेगी’: स्टिंग में NCP नेता और उद्धव के मंत्री नवाब मलिक का दावा

महाराष्ट्र में ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ और लोकप्रिय पत्रकार अर्नब गोस्वामी के खिलाफ बड़ी साजिश किए जाने का खुलासा हुआ है। शरद पवार की NCP के प्रवक्ता और महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार में अल्पसंख्यक विकास मंत्री नवाब मलिक का एक स्टिंग सामने आया है, जिसमें वो भविष्यवाणी करते दिख रहे हैं कि TRP स्कैम मामले से अर्नब गोस्वामी इतने हताश हो जाएँगे कि अंत में उन्हें आत्महत्या करनी पड़ेगी।

हाल ही में एक कॉन्ग्रेस नेता का भी स्टिंग सामने आया था, जिसमें वो कह रहे थे कि उद्धव ठाकरे अर्नब गोस्वामी से खफा हैं और उनके चैनल ‘रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क’ को नीचे गिराने के लिए IAS-IPS अधिकारियों की एक टीम का गठन किया है। कॉन्ग्रेस नेता ने दावा किया था कि इन सबके पीछे NCP के संस्थापक-अध्यक्ष और महाराष्ट्र के पूर्व-मुख्यमंत्री शरद पवार का हाथ है। अब ‘रिपब्लिक’ के अंडरकवर रिपोर्टर ने नवाब मलिक से सच्चाई उगलवाई।

उसने नवाब मलिक से पूछा कि ‘रिपब्लिक’ को क्यों निशाना बनाया जा रहा है, जिसके जवाब में NCP मुंबई के अध्यक्ष ने दावा किया कि अर्नब गोस्वामी खुद को पागल बना रहे हैं, उनके चैनल को कोई निशाना नहीं बना रहा। उन्होंने दावा किया कि अर्नब खुद की बनाई वास्तविकता में जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि अर्नब को लगता है कि सब ऐसे ही चलता है और जब एक दिन उसे पता चलता है कि सब झूठ है, तो वो कुछ भी कर सकता है।

नवाब मलिक ने दावा किया कि अर्नब गोस्वामी एक फोबिया से ग्रसित हैं। उन्होंने कहा, “ये दुनिया जालसाजी से नहीं चलती है। वो अब TRP मामले में फँस चुके हैं।” जब उनसे कहा गया कि BARC के पत्र में तो ‘इंडिया टुडे’ का नाम है और ‘रिपब्लिक’ का नाम है ही नहीं, तो मलिक ने कहा कि जाँच में सब पता चल जाएगा। उन्होंने कहा कि अर्नब इसमें स्पष्ट रूप से फँस चुके हैं और इसका असर उनकी मानसिक अवस्था पर पड़ेगा।

उन्होंने कहा, “बात ये है कि अर्नब गोस्वामी को कई सारी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। ये एक प्रकार का पागलपन है, जो बाद में फोबिया बन जाता है और फिर मानसिक उन्माद का रूप ले लेता है।” साथ ही उन्होंने कहा कि अर्नब के खिलाफ जितने भी केस चल रहे होंगे, उनसे हताश होकर वो आत्महत्या करने को विवश हो जाएँगे। नवाब मलिक के इस स्टिंग के बाद अब महाराष्ट्र सरकार इस मामले में घिर गई है।

रिपब्लिक टीवी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (अक्टूबर 19, 2020) को कहा था कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी TRP मामले में आरोपित नहीं हैं। इसके बाद रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क और अर्नब गोस्वामी ने मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर 200 करोड़ रुपए के मानहानि के मुक़दमे की बात कही है।